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भारतीय समाज
राम आहूजा
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विषय सूची
(एणांशा।9) भूमिका लेखक की ओर से भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य
(छाज्नण्ात्ग १००तएह5 [एड 9689 50029)
# परम्पणगत हिन्दू सामाजिक संगठन
% परम्पणगत हिन्दू समाज , आधाएपूद मत एवं सिद्धाल
५ ६५8 भारतीय समाज * भारतीय सस्कृति पर सास्कृतिक पुतर्जागरण, , इस्लाम और पश्चिम का प्रभाव
% भारतीय प्रमाज में निलतरता तथा परिवर्तन के कारक
साम्राजिक स्तरीकरण
($004॑ 4४ ०कषणा)
० जाति व्यवस्था और सामाजिक स्तेरीकरण
० जाति और वर्ण, उपजाति एवं वर्ग
# जाति व्यवस्था में परिवर्तनः प्ररम्भ से मध्य और ब्रिटिशकाल तक-- इसके प्लास्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक पक्ष
०» वर्तमान भारत में जाति व्यवस्था
« क्या जाति व्यवस्था परिवर्धिद हो रही है, कमजोर हो रही है,या विधटित ते रही है ? जाति का भविष्य
० जाति में गतिशोलंगा
» जातिवाद
* समानता और सामाजिक सरयना के प्रकण
०» जाति और राजनौति
तय
33
विश्व सूची
अनुसूचित जातियाँ, अष्पृश्यता और पिछड़ा वर्ग ् ($छ8०९ए६ऐ (४5६5, एजाण्ण्लाक्राएए आए 82८7जत (955९5)
» अनुसूचित जातियाँ
» अस्पृश्यता * इसका उन्मूलन एवं दलित चेतना
० अन्य पिछड़ो जातियों और वर्ग
» कृषि और औद्योगिक वर्ग सरचना
परिवार, विवाह और नातेदारी 92 (सा, निद्यागाउ26 जाते (०5४9)
७ परिवार व्यवस्था
» विवाह व्यवस्था
नातेदारी व्यवस्था
» स्त्रियों की बदलती प्रस्थिति
आर्थिक अर्थव्यवस्था 44 (80८07स्0ए0० $एघथा)
# भारतीय अर्थव्यवस्था, निर्धनता एव मुद्रास्फौति
» बाजार अर्थव्यवस्था और उदारीकरण नीति इसके सामाजिक परिणाम
# यजमानी व्यवस्था
» आर्थिक विकास इसके निर्धाएक और सामाजिक परिणाम
» आर्थिक असमानताएँ
» व्यावसायिक विविधीकरण और सामाजिक सरचना
राजनैतिक व्यवस्था ॥78 (९०0०० $95 ८०) » ग़जनैतिक व्यवस्था अवधारणा और स्वरूप » परम्पपगद और आधुनिक पारतीय समाज में लोकताजिक राजनैतिक व्यवस्था और सरचना » गजनेतिक अभिजन भर्ती और सामाजिक परिवर्तन में उनको भूमिका » भारत में गजनैतिक दल » शक्ति का विकेन्द्रीकण और राजनैतिक भागीदारी
शैक्षिक व्यवस्था 208 (8&47८#70०१० $95६७)
» शिक्षा और समाज
* शिक्षा के उद्देश्य
» शिक्षा के परम्पणगत एवं आधुनिक सन्दर्भ
विषय सूची ता
० शैक्षिक असमानता और सामाजिक गविशौलता
० शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकोकरण
० शिक्षा की समस्याएँ
« शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति
» महिलाओं, अनुसूचित जातियों , अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को शिक्षा
« शैक्षिक पुनाठिन
8 धर्म ग््श (एड) » धर्म . अवधारणा और इसकी समाजशास््रोय सार्थकता # धर्म : जीवन प्रारूप # अन्तर्धामिक अन्तर्क्रिया और परिवर्तन # साम्पदायिकता ० धर्म निरपेक्षतावाद और धर्म निःपेक्षीकरण # घर्मीनिरपेश् समाज में धर्म
जनजातीय समाज 265
(प्रंएथ $००6७)
» भारत में जनजावीय समुदाय : सख्या एवं वितरण
« जनजातीय सपुदार्यों को विशेषताएँ
* जनजाति और जाति
० जनजातीय अध्ययन
* जनजातीय शोषण एवं असतोष
« जनजातीय समस्याएँ
$ जनजातीय आन्दोलन
# जनजातीय नेतृत्व
* आदिवासी महिलाएँ
« आदिवामी परिवर्तन , सरदात्मक भेदपराव और आदिवासी कल्याण और विकास
«» पप्मस्कृतिग्रहण और जनजातीय संस्कृति में परिवर्तन
# आदिवासियों का विस्थापन और पुनस्थापना
* एकीकरण और आत्मसातकण
थ्रामीण सामाजिक व्यवस्था 286 (रण 50९०४ 5:४८) # ग्रामीण समुदाय के सामाजिक-सॉस््कृतिक आयाम
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8 4
42
43
विषय यूवी
» कृषक वर्ग सरचना
» शक्ति सरचना परम्पण और परिवर्दन
» ग्रामीण निर्धनता एवं ऋणग्रस्तता
« बन्धुआ मजदूर
» भूमि सुधार . भ्रकृत्ति एव सामाजिक परिणाम # नियोजित ग्रामीण विकास
» पचायती राज
नगरीय सामाजिक संगठन 326 (एक्रक्क 5059 0एड058007)
» नगरीय, नगरीकरण तथा नगरवाद की अवधारणाएँ
» प्रामीण-मगरीय भेद जनसख्यात्मक वथा सामाजिक सास्कृतिक विशेषताएँ « प्रामीण-नगरीय अन्तर्क्रिया
# क्या भारतीय समाज 'ग्रामीण' से 'नगरीय' होता जा रहा है ?
नेगरय सामाजिक सगठन निसन््तरता एवं परिवर्तन
» नगगय समुदायों में स्तरीकरण और सामाजिक गतिशीलवा
» भृजातीय विविधवा और सामुदायिक एकौकरण
» नगरीय पडौस
» नगरीय समाज की समस्याएँ
« नगरों का वि-नगरीकरण और गाँवों का नगरीकरण
जनसंख्या गतिकी 353 (?0फुण॑गए०० 09प्रक्षाए०5)
» जनाकिकीय विश्लेषण
* जनसख्या विस्फोट
» जनसख्या वृद्धि एव नियत्रण को सैद्धान्तिक व्याख्यायें
# जनसख्या नीति
० परिवार नियोजन
# ज॑नसख्या विस्फोट नियत्रण के लिए सुझाए गए उपाय
भ्रष्टाचार 385 (एणाएए7ण)
* अवधारणा
« भ्रष्टाचार, एक ऐतिहासिक परिमक्ष्य
» लोकसेवकों में भ्रष्टाचार
» राजनैतिक प्रशाचार और घोटाले
» भ्रष्टाचार के कारण
विषय सूची
44
5
6
« भ्रष्टाचार का प्रभाव
० वियान
# भ्रष्टाचार को रोकने के लिए किए गए उपाय
* राजनौतिजों और सार्वजनिक कम्पनियों के भ्रष्टाचार पर आयोग # भ्रष्टाचार से सघर्ष
काला घन
(890८ १0769)
* अवधाण्णा
« काले धन दा फैलाव
० कालाधन ठत्पन होने के कारण # आर्थिक प्रभाव
# सामाजिक प्रभाव
# नियत्रण के उपाय
तस्करी
($ग्र7/877९)
# अवधारणा ख प्रकृति # विस्ताए
७ संगठित तस्करी
सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण
(8००० (॥भ26 कात १॥00टाग्राइ॥07)
० भारत में सामाजिक परिवर्तन अवधारणा, उद्देश्य, दिशाएँ एवं प्रतिरोध ७ निमोजन तथा सामाजिक परिवर्तन
# नियोजित परिवर्तन के कारक
० नगरीकरण और औद्योगोकरण
७ सामाजिक (सुधा) आन्दोलन
० सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाएँ.
« आपुनिकौकरण : अवधारणा, निदर्शक, प्रकृति और समस्याएँ.
संदर्भ ग्रंथ सूची (#96कभ्कए)
405
बा4
49
466
भूमिका
यह पुस्तक मेरी पूर्ववर्ती पुस्तकों से कुछ हट कर है। यह विभिन व्यवस्थाओं के परम्पतगत व आधुनिक ढाँचे-सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, शैक्षिक, ग्रामोण नगरीय और जनजातीय-अस्तुत करदी है तथा कुछ महत्वपूर्ण समस्याओं य प्रकरणों का विवेचन करती है। परम्परागत उपागम समाजशास्त्र, इतिहास तथा अन्य समाज विज्ञानों के बीच सम्बन्ध स्थापित करते हुए सुस्थित मूल्यों और विचारघाराओं पर प्रकाश डालता है जबकि आप निक ढाँचा समकालोन परिवर्तनों, सामाजिक विकास एवं प्रगति की रफ़्वार में भी रुचि रखता है, जो सभी नये प्रश्नों को जन्म देते हैं। समाजशास्त्रीय ढाँचा 'क्या था', क्या है' तथा “क्या सम्मावना है! पर प्रकाश डालता है। प्रत्येक अध्याय समकालीन भिनवाएँ, उदीयमन तत्व और भावी परिमिक्ष्य प्रस्तुत करता है। इस प्रकार का उपागम अदीत से वर्तमान तक के परिवर्तन के प्रकरणों के परीक्षण में कार्यात्मक है। समाज में विभिन्न व्यवस्थाओं की कार्यशीलता के लिए गहन विश्लेषण और सैद्धान्तिक मूल्याकन वाच्छित है |
वर्तमान भारतीय समाज को अब परम्परागत समाज नहीं माना जाता। इसे उमड़ते हुए आधुनिक समाज के रूप में देखा जाता है। लेकिन विभिन्न नियोजित उपायों से आधुनिक समाज में आए व्यवस्था परिवर्तन अपनाए गए उपायों के परिणामों के नकारात्मक पक्षों को श्री उजागर करते हैं| यदि आउक्षण नीवि आज कार्यात्मक हे और यदि दो या तीन दशकों बाद विकार्यात्मक सिद्ध होती है, तब क्या शक्तिशाली अभिजन इसमें परिवर्तन कर सकेंगे ? भदि समाज के कमजोर वर्ग, किस्रान वर्म, महिलाओं और युवाजनों द्वाव चलाए गए आन्दोलनों को गेका नहीं जाता, तो सामाजिक असन्दोष को यह सब कैसे उदव्यक्त कोंगे? इस प्रकार के प्रकरणों के मूल्याकन के लिए आवश्यक है कि इनको वर्तमान व उदीयमान दोनों समाजों के सर्दर्भ में प्रस्तुत किया जाये। इस पुस्तक में यद्यपि विभिन्न व्यवस््थाओं के सभी महत्वपूर्ण पक्षों के विश्लेषण एवं पुनरीक्षण का प्रयास किसा गया है, लेकिन इसका उद्देश्य वृहत् और महत्वाकाक्षी विश्लेषण नहीं है। किसी नये सिद्धान्त को प्रस्तुत करे का भो इरादा नहीं रहा है बल्कि यह समझाने का प्रयास किया गया है कि भारतीय समाज में समय-समय पर क्या होता रहा है।
वर्षों से मैंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं--अग्रेजी व हिन्दी दोनों ही में--जिनमें अपराध, झियों, और सामाजिक समस्याओं के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। यह पुस्तक प्तिमोगितात्मक परीक्षाओं के लिए प्रेरणादायक सामग्री के महत्व को अस्तुत करती है। अब- विभिन्न प्रकरणों का विश्लेषण विषय के विकास का बोध कराने का प्रयास है तथा विभिन्न
जता भूमिका
स्रोतों तक पहुँच को सुलभ बनाता है। उदीयमान समाजशासत्र को निस्न्तर परिवर्तन होते समाज के निरन्तर पूछताछ पर बल देना है। स्पष्ट है, यह हमारा दावा नहीं है कि कुछ बातें छूटी नहीं होंगी या कोई अध्याय कमजोर नही होगा। परन्तु व्यवस्थाओं के प्रमुख पर्षों का विस्तृत रूप से विवेचन करने का प्रयास किया गया है। मैने विविध दृष्टिको्णों को चर्चा की है, प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा विकसित प्रारूपों का विश्लेषण किया है, विविध सैद्धान्तिक व्याख्याओं का परीक्षण किया है तथा पुस्तक को अधिक विष॒द् और विस्तृत बनाने के लिए अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध विद्वानों के योगदान के उदाहरण भी दिए हैं। मुझे विश्वास है कि छात्र इस पुस्तक को स्वागत योग्य योगदान के रूप में देखेंगे। स्नातकोत्तर स्तर पर समाजशास् का अध्ययन करे वाले छात्रों सहित विभिन श्रेणियों के छात्रों के दृष्टिकोण को दृष्टिगत करते हुए मैंने विविध प्रतियोगिवात्मक परीक्षाओं में विनिहित उन शीर्षकों पर भी चर्चा करे का प्रयल क्या है जिनको आमतौर पर छात्र साहित्य न मिलने के कारण छोड देते हैं। विस्तृव परिमिक्ष्य में विषय को भली-भांति समझने का उद्देश्य रहा है।
अध्यायों को इस क्रमबद्ध रूप से व्यवस्थित किया गया है जैसा कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं व ग़ज्य प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रतियोगिद्ात्मक परीक्षाओं के लिए विषय सामप्री निश्चित की गई है। निर्धारित पाठ्यक्रम में जो कुछ पक्ष नहीं भी दिए गए हैं उन पर भी चर्चा छात्रों के हितों को घ्मान में रखते हुए को गई है। मैं आशा करता हूँ और आश्वस्त हूँ कि पुस्तक उनके लिए लाभकारी होगी जिनके लिए लिखी गई है क्योंकि यह विविध व्यवस्थाओं और प्रकरणों के वैज्ञातिक विश्लेषण और वाच्छित आँकड़े पठनीय विशद् शैली में प्रदान करती है।
राप आहूजा
लेखक की ओर से
बहुत समय से मैं एक ऐसी पुस्तक के लेखन पर विचार कर रहा था जिसमें भ्रास्तीय प्रशासनिक सेवाओं, राज्य प्रशासनिक सेवाओं, बैंक सेवाओं तथा नेट (घछ्ा) आदि प्रतियोगितात्सक परीक्षाओं में समाजशात्व विषय लेकर सम्मिलित होगे वाले छात्रों को इन परीक्षाओं के लिए आमतौर पर निर्धारित विभिन शौर्षकों का विश्लेषण तथा पर्याप्त और विस्तृत विवेचन उपलब्ध हो सके। यद्यपि मेरी दो पूर्ववर्ती पुस्तको--भारतीय सामाजिक व्यवस्था और भारत में सामाजिक समप्त्याए--में भी विविध प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं के लिए निर्धारित विषय निहित हैं, फिर भी कुछ ऐसे शीर्षक रह गए थे जिन पर विशेष रूप से इन पुस्तकों में चर्चा नही हो पाई थी, जैसे, आर्थिक व्यवस्था, ग्रजनैतिक व्यवस्था, धार्मिक व्यवस्था, ग्रामीण व्यवस्था, नारीय व्यवस्था, जनजातीय व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, आदि। वर्तमान पुस्तक का उद्देश्य शीर्षकों की विस्तृत व्याख्या के द्वाय इस खाई को पाठना है। पूर्ववर्ती पुस्तकों में विवेचित विषयों का पुनरीक्षण किया गया है तथा आधुनिकतम आँकड़ों से अद्यतन किया गया है। जो कुछ कमियां रह गई थी उनको भी ठीक करने का प्रयल किया गया है। में आशा करता हूं कि कैरियर परीक्षाओं में सम्मिलित होने वाले छात्र इस पुस्तक को काफी उपयोगी पार्येगे--कम से कम समाजशारू में निर्धारित दो पेपर में से एक पर। भारतीय विश्वविद्यालयों में समाजशात्र के स्वातकोत्तर छात्रों के लिए भी यह पुस्तक ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी सिद्ध होगी।
इस पुस्तक को यह रूप देने के लिए मैं अपने सहयोगी डा केवलरमानी तथा अपने पुत्र डा मुकेश आहूजा को हार्दिक धन्यवाद देना चाहूँगा, विशेष रूप से आवश्यक पुस्तकों व पत्र पत्रिकाओं के जुटाने में जो उन्होंने सहायता की। मैं अपने पुत्र सजय आहूजा का भी पुस्तक को हस्तलिपि तैयार करने के लिए आभारी हूँ। अत में अपनी पली के प्रति भी आधभाएं हूँ जिसने मुझे निरन्तर समर्थन दिया व श्रोत्साहित किया। छात्रों, शिक्षकों, व अन्य पाठकों की ओर से सुझाव व टिप्पणिया भो आमत्रित करता हूँ द्राकि इस पुस्तक को और अधिक सुधार जा सके |
प्रस्तुत पुस्तक का अग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद मेरे मित्र डा विप्र कुमार शर्मा ने किया है। मेरी पूर्ववर्ती दो पुस्तकों--भारतीय सामाजिक व्यवस्था और अपराधशात्र का भी डा
हाफ लेखक की ओर से
शर्मा ने ही सरल हिन्दी में अनुवाद किया था। सम्प्रति डा शर्मा अवकाश प्राप्त करने के बाद जयपुर में निवास करते हुए इसी प्रकार के लेखन कार्य से जुडे हुए हैं। में उनका अति आभार हूँ।
राम आहूजा
भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य
(प्रांडाण॑त्या श०्तगाए5 ण॑ धह पातांशा 50009)
परम्परागत हिन्दू सामाजिक संगठन (गरोन्नभंधाण्फञ प्लाचतए0 $0संक्ो 07:क्रा5स 0१)
परम्परागत, आधुनिक और आधुनिकोत्तर समाज अवधारणाएँ (॥धा।काओं, ए०्तटशा जाते ए0५5(-॥90007 805९0॥0९5 : ९(०7:क)
समाज का वर्गीकरण परम्परागत, आधुनिक और आधुनिकोत्तर समाजों में किया जा सकता है। फर्परागत समाज में व्यवहार सम्बन्धी प्रतिमानों और मूल्यों में धर्म (और जादू) पर बल दिया जाता है जिसमें वास्तविक या काल्पनिक अतीत से गहरे जुडाव अथवा निरन््तरता का सकेत मिलता है। यह समाज पवित्र भोज, बलि, एव कर्मकाण्ड (5४४४६) आदि को स्वीकार करता है। मोटे तौर पर परम्परागत समाज वह होता है जिसमें () व्यक्ति की प्रस्थिति उसके जन्म से निर्धारित होती है और वह सामाजिक गतिशीलवा के लिए कोई प्रयल नहीं कप्ता (2) व्यक्ति का व्यवहार अतीत की गहराइयों से जुड़े मूल्यों, प्रतिमानों, रीतियों व परम्पणाओं से संचालित होता है, तथा लोगों के सामाजिक लोकाचार एव व्यवहार पीढी दर पीढी थोड़े से ही बदलते रहते हैं। (3) सामाजिक संगठन (समाज में व्यक्तियों और उप-समूहों के सामाजिक सम्बन्धों का स्थाई स्वरूप जो सामाजिक अन्तर्क्रिया में नियमितता (८8ण७70) तथा पूर्वाभास (97८00०080709) प्रदान करता है) श्रेणोक्रम (#ंध्य्यणार) पर आधारित होता है। (५) अन्तर्क्रिया में नातेदारी सम्बन्ध प्रमुख होते हैं और व्यक्ति अपनी पहचान प्राथमिक समूहों से करता है। 6) सामाजिक सम्बन्धों में पद की तुलना में स्वयं व्यक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाता है। 6) लोग रुढिवादी होते हैं। (7) अर्थ च्यवस्था साल होती है, अर्थात यात्रिक (00) अर्थ व्यवस्था कौ त्रधानता होती है, तथा निर्वाह स्तर से ऊपर आर्थिक उत्पादकता अपेक्षाकृत कम होती है। (8) पौराणिक व काल्पनिक विचार (न कि तर्क पर आधारित विचार) समाज में सददोपरि होते हैं।
आधुनिकता परम्पयगद समाज से काफ़ो हटकर होती है। आधुनिक समाज विज्ञान और तर्क पर केद्धित होता है। स्टूअर्ट हाल (मश्वा 70 0549, 2८७॥०क व एधककदा उा। 7996, साथ ही [७0८ 0! 0०जर्णी, ४०००४०७५ 7997 , 40 भी देखें) के अनुसार आधुनिक समाज की विशेषताएं (जो कि इसे परम्परागत समाज से अलग करती है) यह हैं : 0) धर्म का पतन और धर्म निः्पेक्ष भौतिकवादी सस्कृति का उदय (धार्मिक विशेषता)। (2) सामन्तीय ([८069) अर्थ व्यवस्था के स्थान पर ऐसी अर्थ व्यवस्था जिसमें
2 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य
आदान प्रदान के लिए मुद्रा प्रणाली माध्यम प्रदान करती है। यह (अर्थ व्यवस्था) बाजार के लिए बडे पैमाने पर वस्तुओं के उत्तादन और उपभोग पर, निजी सम्पत्ति के वृहत् स्वामि पर, और लम्बी समय अवधि के लिए पूजी सप्रह पर आधारित होती है (आर्थिक विशेषता)। 6) ग़ज्य पर धर्म निरपेक्ष राजनैतिक सत्ता का प्रघुत्व वथा राजनैतिक मामलों पर धार्मिक प्रभाव का सीमित होना (राजनैतिक विशेषता)। (4) सरल श्रम विभाजन पर आपासि सामाजिक व्यवस्था का क्षय (८०७८) तथा नवीन श्रम विभाजन का विकास और नये वर्गों का उदय एवं खरो-पुरुष के बीच सम्बन्धों में परिवर्तन (सामाजिक विशेषता)। 6) नये राष्टं (जृजातीय अथवा राष्ट्रीय समुदायों) का निर्माण जिनके अपने उद्देश्यों के उपमुक्त अपनी परम्पराए तथा अपनी पहचान हो जैसे, फ्रान्स के द्वारा राजतत्र (00029) और कुलीनता (४7४(०८४०५) को अस्वीकार करना, ब्रिटेन का राजतत्र को प्रतीक रूप में अपनाना, यूंए, आर (मिश्र) द्वारा राजतत्र को अस्वीकार करना और लोकतत्र को स्वीकार करना, आदि (सास्कृतिक विशेषता)। (6) विश्व के प्रति वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण दृष्टिकोण का उदय (बौद्धिक विशेषता)। इस प्रकार जहा परम्परागत समाज की विशेषताओं में संस्कार, रीति रिवाज, सामूहिकता, सामुदायिक स्वामित्व, यथास्थिति तथा सरल श्रम विभाजन प्रमुख है, बही आधुनिक समाज की विशेषताओं में विज्ञान का उदय, वर्क और विवेक पर बल, प्रगति में विश्वास, विकास के लिए सरकार और राज्य को आवश्यक मानना, आर्थिक विकास और जटिल श्रम विभाजन, मानव को प्रकृति और पर्यावरण पर नियत्रण करने योग्य देखना, और जगत को द्वैदवाद (१७७॥७४७) या विशेषाभास के अर्थ में देखना, आदि प्रमुख हैं।
आएनिकोहर (708-7700८४0) समाज (या अति आधुनिकता) आलोचबात्मक जागृति पर बल देता है तथा प्रकृति, पर्यावरण और मानवता पर अमुप्रयुक्त विज्ञान (899॥०6 ८८7०६)
के विनाशक प्रभावों के प्रति चिन्तित है। यह प्रगति की दौड के अवाच्छित नकागलक
परिणामों और जोखिम की ओर सकेत करता है। यह गद्टवाद (जिस पर आयुनिक समाज में
बल दिया जाता है) मे वैश्वोकरण (&॥0७७॥5७७००) की भ्रक्रिया की ओर गविशील है।
आर्थिक विकास को महत्त्व देने (जैसा कि आधुनिक समाज में होता है) की अपेक्षा यह
पलक निकोत्तर समाज) सस्कृति को अधिक महत्व देता है। आधुनिक समाज (जो कि संसार को या विरोधाभास के अर्थ में देखता है) के विपपोत अतिआधुनिक समाज एकता, समानता और सबधन व जोड को महत्त्वपूर्ण मानता है।
परम्परागत भारतीय समाज तीन परिप्रेक्ष्य (गभा।णाण। प्रशंगा 802ंथ9 ; प्रशःर€ एच5एथ्लात ९5)
परम्पणगत समाज की उपरोक्त अवधारणा एवं विशेषताओं सहित, समाजशास्त्रीय परिेक्ष् में परम्पणगत समाज को किस अ्रकार देखा जा सकता है ? परम्पणगत भारतीय समाज को समाजशास्रोय आधार पर समझने के लिए वीन पश्मिक्ष्यों का उपयोग हो सकवा है प्रकार्यात्मक, मार्क्सवादी, और सामाजिक क्रिया परिम्ेक्ष् | प्रकार्यात्मक (दुर्खिम का) पश्रिक्ष् इस विच्यर पर आधारित है कि प्रमुख सामाजिक सस्थाए और उप-व्यवस्थाए (जैसे, नावेदारी, आर्थिक सस्थाए, आदि) मनुष्य की मूलभूव आवश्यकताओं (जैसे प्रजनन, उत्पादन, उपभोग) की पूर्वि करती हैं। मार्क्सवादी (कार्ल मार्वस) परिमेक्ष्य इस विचार पर आधारित है कि वर्ग
भारतीय समाज का ऐविद्यसिक परिदृश्य 3
सपर्ष एक मूलभूत सामाजिक शक्ति है और समाज की कार्यात्मकत्ता सर्पपूर्ण हितों वाले वर्णों से प्रभावित होती है। सामाजिक क्रिया (मैक्स वेबर) का परिप्रेक्ष्य इस पर बल देता है कि व्यक्ति समाज को बनाते है और प्रभावित करदे हैं न कि समाज व्यक्तियों को तथा समाज व्यक्तियों के अनुभवों की सरचना मही करता बल्कि “व्यक्ति” स्वय ही सामाजिक अनुभवों की रचना में सहायता कप्ता है।
प्रथम दो परिमरेक्ष्य सरचनात्मक हैं, अर्थात् वे प्रमुख रूप से यह विचार करते हैं कि समाज व्यक्ति और समूह के व्यवहार को किस श्रकार प्रभावित करता है बजाय इसके कि व्यक्ति और समूह समाज की रचना किस श्रफार करते हैं (वास्तव में त्तीसग़ दृष्टिकोण भी सरचनात्मक ही माना गया है)। अत सरचनात्मक समाजशास्त्री इस विषय में रुचि लेगा कि धार्मिक विचार और मूल्य या विज्ञान और हर्क या जाति और वर्ग, या परिवार और नातेदारी, या यात्रिक और औद्योगिक अर्थ व्यवस्थाएँ, या व्यक्ति कौ सामाजिक-सरचनात्मक स्थिति किस प्रकार समाज द्वारा अपेक्षा किए जाने वाली भूमिकाओं के निर्वाह के लिए व्यक्ति के अवसरों को प्रभावित करते हैं। जहाँ प्रकार्थवाद सामाजिक व्यवहार पर सहमति दर्शाता है, चही मार्क्सवाद और सामाजिक क्रिया सबधी दृष्टिकोण समाज में संघर्ष पर बल देते हैं। माइक डोनेल (७० 0" 0०७९, ॥997 6) के अनुसार सस्चनात्मक पस्प्रिष्त्य के आधार पर जो प्रश्न और उनके उत्तर बनाए जा सकते हैं वे है () समाज का निर्माण किस प्रकार होता है ? (2) यह (समाज) कैसे कार्य करता है ? 6) समाज में कुछ समूह किस प्रकार अन्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होते हैं ? (६) सामाजिक परिवर्तन किन कारणों से होता है? 5) समाज क्या सहमति पर आधारित होता है या सघर्ष पर ? (6) व्यक्ति का समाज के साथ क्या सम्बन्ध है ? हम इन्ही प्रश्नों के आधार पर परम्परागत भारतीय समाज का विश्लेषण करेंगे।
परम्परागत हिसू समाज . आधारभूत मत एवं सिद्धान्त (्स्रधाक्ष0ा॥ पझात्रत0 80009 ६ 825९ प्रकाश 0 005९5)
() हिददू जीवन दर्शन. कर्म एवं थर्म (सबंध 8९ तु [४ अन्काब काव 2काकाब)
परम्परागत भारतीय समाज से सम्बन्धित उपग्रेक्त प्रश्नों के उत्तर देने से पूर्व यह विचार करें कि वैदिक दर्शन में हिन्दुओं का जीवन के प्रति क्या दृष्टिकोण था ? मूल विचार यह था कि मनुष्य पूर्णछप से इच्छाओं का बना हुआ है। जैसी उसको इच्छाए होंगी वैसी उसको अन्तर्दृष्ट/विचारशीलता होगी (कृतु) जैसी उसकी विचारशीलता व समझ होगी वैसे ही उसके कर्म होंगे, और जैसे उसके कर्म होंगे वैसा उसका भाग्य बन जायेगा। अत यदि अपने जीवन काल में भनुष्य की कुछ इच्छाएँ पूर्ण होने से रह जातो हैं तो वह फिर जन्म लेगा, लेकिन यदि उसकी कोई इच्छा अपूर्ण नहीं रहती दब वह ब्रह्ममय (ईश्वर से एकाकार) हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में इच्छाओं के विवाश के लिए 'कृतु” (85८:७४०४) का दमन आवश्यक है। मनुष्य की इच्छा ही उप्ते इस ससार के जाल में फसाए रखती है अथवा वह जन्म मरण के बन्धन में फस्ता झहता है। अत कर्म ही पुनर्जन्म और इच्छाओं के बीच एक सयोजक है। इस्त
4 भारतीय समाज का ऐतिहापिक परिदृश्य
प्रकार इच्छाओं से छुटकारा प्राप्त काने के बाद मनुष्य अमर हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है।
यह कहना गलत होगा कि यही केवल एक मात्र हिन्दू दर्शन का दृष्टिकोण है। वास्तव में हिन्दू साहित्य में अन्तिम सत्य (पएए्रथ८ 7८०॥9) के अति अनेक दृष्टिकोण हैं। एक दृष्टिकोण इच्छाओं के त्याग के सम्बन्ध में गौता में दिया गया है। गौता में कर्म का दर्शन जीवन का नवीन दर्शन है। गीता में इच्छाओं से छुटकारा पाने (८३०४८४१००७) कौ अपेक्षा उनके शुद्ध उदात्तीकरण (६00॥77200/) पर बल दिया गया है और यह कर्म के सत्य स्वरूप को समझकर ही किया जा सकता है। (कापडिया, 972 - 3-4)
हिन्दू दर्शन एक ओर वर्तमान कौ अतौद के साथ निरन्तरता में विश्वास करता है (जिसमें यह समाहित (१0०/८०) है) और दूसरी ओर वर्तमान को भविष्य में अभिव्यक्त करता है। परम्पणओं के प्रति हिन्दुओं के आदर करने के पीछे उद्देश्य है। इसके द्वार विचार में साम्य (॥070०६८०८/५) और समन्वय (77०४७) प्राप्त किया जाता है। विभिन अवस्थाए केवल विभिन्न काल छण्डों में बल देने (८४०७॥४७०७) में अन्तर दर्शाती हैं। उदाहरणार्य, सतयुग में सत्य ही धर्म था,त्रेतायुग में 'यज्ञ" (बलि), द्वापर युग में 'शन' और कलियुग में 'दान'। हिन्दू दर्शन कुछ आध्यात्मिक विचारों में भी विश्वास रखता है, जैसे, 309 “युण्य' 'धर्म', आदि । इन विचारों पर हम हिन्दुत्व के मूल विश्वास' के रूप में चर्चा
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हिन्दुत्व के मूल विश्वास व उसूल (छ9ह० पल्लाल$ ग॑ गा्रतपांडफ)
हिन्दुत्व के मूल विश्वासों और सिद्धान्तों को केद्र बिन्दु बना कर क्या यह कहा जा सकता है कि हिल््दुत्व समावता व समतावाद (८६४६॥७) में विश्वास करता है ? क्या कर्म और पुनर्जन्म के विचार सप्री हिन्दुओं के स्वीकार्य हैं ? क्या मोक्ष सभी का अन्तिम लक्ष्य है? क्या सहिष्णुता एवं अहिसा हिन्दुत्व के लक्षण हैं ? क्या सभी हिन्दू व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा में विलय में विश्वास करते हैं 2 योगेंद्र सिंह (973 - 37) का विचार है कि हिन्दुत्व के आदर्शात्मक सिद्धान्व (॥०780४० 977०७) विश्वासों, आदर्शों, अनुमति के तकों, उदारवाद, रचना और विनाश, सुखवाद (#८००४७०), उपयोगिताबाद (ए॥(द्7उत्ाडगा)._ तथा आध्यात्मिक सर्वातिशयता (8एएएगे॑ ह्ाउव्शाएंट्राट्शर गिं रा हैं। मोटे तौर पर हिन्दुत्व के मूल विश्वासों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता
१, आध्यात्मिक विचार (ए७४०७७७:७) [8९७७)
हिन्दुत्व कुछ आध्यात्मिक विचारों (ईश्वर के स्वभाव के विषय में तथा धार्मिक विश्वासों की स्थापना से सम्बन्धित सिद्धान्तों की श्रखला) में विश्वास रखता है, जैसे कि पुनर्जन्म, ओम की अमस्ता, पाप, पुण्य, कर्म, धर्म और मोक्ष। कर्म का सिद्धान्त एक हिन्दू को यह सिखाता है कि वह अपने उन कर्मों के कारण विशेष सामाजिक समूह (जाति/परिवाएं में जन्म लेता ऐ, जो उसने अपने पूर्व जन्म में किये थे। धर्म का विचार यह कहता है कि यदि वह इस जन्म
भारतीय समाज का ऐविद्यसिक परिदृश्य 5
भें अच्छे कर्म करेगा तो अगले जन्म में वह उच्च सामाजिक समूह में जन्म लेगा। मोक्ष का विचार मनुष्य को स्मरण कराता है कि उसके पाप और पुण्य उसके जन्म मरण के चक्र से मुक्ति निर्धारण करेंगे।
2. अपक्द्रिता और पवित्रता (00097 जाते एछावरी३)
हिन्दुत्व में अपवित्रता और पवित्रदा के विचार भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि पवित्रता और अप्रवित्रता के नियम अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हैं लेकिन हर जगह वे जीवन के बडे भाग में रहते हैं। उनका महत्व, सहभोजी (८०कमाए०८०५७) सम्बन्धों में, दूसरे समूह के सदस्यों के स्पर्श और शारीएिक सम्पर्कों में दूरो बनाए रखने में, अर्न्तजातीय विवाह में, तथा व्यक्ति के निजी जीवन के कई अवसरों (जेसे जन्म, मृत्यु, विवाह, मासिक ऋतु चक्र (06०४७७४४०४), प्रार्थना आदि) में अत्यधिक होठा है। अपवित्नता की अवधारणा जन्म से सम्बद्ध है न कि स्वच्छता से । पवित्रता के नियमों के उल्लंघन की गम्भीरता के आधार पर व्यक्ति को प्तरल या बृहत् शुद्धीकरण सस्कार करने पडते हैं। ऐसे मामलों में जाति पचायत्र हो आवश्यक अनुशासनात्मक कदम उठाती है।
3, श्रेणीक्रम (प्राशत्ब०त्त))
हिन्दुओं में श्रेणीक्रम इन अर्थों में मिलता है. (४) वर्ण और जातियों में विभाजन; (8) व्यक्ति के चमत्कारी (८॥७75779॥0) गुर्णो में (जिनमें सर्वोच्च सद्गुण 'सत््व', अर्थात साधुओं और बाह्मणों से सम्बद तेजस्विता है, और उसके बाद रजो गुण अर्थात, कर्म (३०४०४) और शक्ति (900८४) के प्रति प्रतिबद्धता है, जैसा कि राजाओं और क्षत्रियों में मिलता है, और अन्त में 'तमस्' गुण हैं जो कि श्रेणीक्रम में निम्मतम हैं और जो आलस्य और पतित कार्यों में सलगन हैं) (०) जीवन लक्ष्यों से सम्बद्ध मूल्यों में, जैसे काम (अर्थात् इन्द्रिय भोग और थौन सुख को तलाश में), अर्थ (अर्थात् घनोपार्जन), धर्म (अर्थात् धार्मिक, सास्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों में नैतिक कर्तव्यों का निर्वाह), और ग्रोक्ष (अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति)।
4. मूर्ति पूजा [80 १४०5७)
हिन्दू धर्म वी सबसे अधिक उल्लेखनोय विशेषता मूर्ति पूजा में विश्वास है। पूज्य-मूर्ति एक सी नहीं होती है बल्कि यह विभिन्न धर्म सम्परदाणयों में. भिन्न होती है। भत्येक घर्ण सम्प्रदाय को एक मूर्ति होती है (कृष्ण, राम, गणेश, शिव, हनुमान, आदि) जो अलग-अलग मन्दिएं में स्थापित होती है और सदस्य समय समय पर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इन मन्दिरों में स्लेच्छों (पुस्लिमों और अस्पृश्यों) के प्रवेश निषेध के पीछे मन्दिरों को अपवित्रता से बचाने का उद्देश्य था न कि अन्य घर्मो के साथ मन मुटाव।
5, ऐकेश्वरवादी लद्ण (शणाणायोर फाह्ाग्लंघ) हिल््दुत्व को प्रमुख विशेषता है कि यह समान रूप से एकाश्मीय धर्म नहीं है बल्कि
6 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृरय
लवीले धार्मिक पन््थों का समन्वय है। यही लचीलापन इसकी शक्ति है जिसमें गैरःजाति और वैदिक समूहों के, धर्मशा्त्रों की अवड्ञा करते हुए भो, रहने वी अनुमति है।
6. सहिष्णुता (॥00:77८९)
क्या हिन्दुत्व सहिष्णु है ? एक दृष्टिकोण तो यह है कि हिन्दुत्व एक धर्मनिरपेक्ष (६४०॥») और सहिण्ु दर्शन है क्योंकि यद्यपि यह अपने में अनेक मर्तों और उपासना पद्धतियों को समेटे हुए है लेकिन सभी हिन्दू सामान्य देववाओं को शपथ लेते हैं। सामाजिक समुदायों की पृथक्ता तथा इतकी धार्मिक विविध पहचान ने प्रत्येक समूह को पृथक अस्तित्व के साथ रहने को सम्भव कर दिया। झगडा केवल सरक्षण के लिए प्रतिस्पर्धा में हो सकता है। इससे हिन्दू धर्म में सहिष्णुता स्पष्ट हैं।
लेकिन ऐसे विद्वानों का भी एक समूह है जो हिन्दुत्व में धार्मिक असहिष्णुता की बाव करता है। इन्होंने पन्थिक (६८०»7३००) प्रतिद्वद्धित और संर्षों के विषय में चर्चा को है। प्रारम्भ में शैव मतावलम्वियों ने वौद्धों और जैनियों का उत्तीडन किया। ईसा के पश्चात् प्रथम सहस्ाबदि (प्रशी्याग्राएण) के मध्य में उत्तर भारत में मिहिर कुल और शशाहू द्वात बौद्ध मठों का विनाश किया गया और बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की गई। वैष्णव परिमेक्ष्य में मूल ग्रन्थों (०४४६) का पुनरलेंखन घार्मिक असहिष्णुता का एक और रूप है क्योंकि यह कार्य केवल जैन पस्रिश्य को ठीक करने के लिए किया गया था। सन्यासी समूहों में भी कुम्म मेले में प्रथम स्नान के प्रश्त पर दसनामियों और बैदग्ियों के बीच झगडा विदित है। इस प्रवार का विरोध हिन्दुओं का अन्य धर्म के लोगों से नहीं था बल्कि एक विशेष पन्य (5९०) के लोगों का दूसरे पन््य के लोगों के प्रति था।
7. पृथक्कता ($ल्.क्बाईणा)
हिन्दू धर्म कौ एक और विशेषता यह है कि यह सामाजिक सम्बन्धों में, तथा पूजा और धार्मिक विश्वा्सों में सामाजिक समुदायों (जातियों) के अलगाव का समर्थन करता है। पृथक्कता की प्रकृति वर्ण/जाति की स्थिति पर निर्भर करती है जिनकी रचना परम पुरुष के शरीर से (ब्राह्मण उसके मुख से, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से, वैश्य उसको जघा प्रदेश से, और शूद्र उसके चरणों से) ही हुई थी। इसके विशेध में तर्क यह दिया ज्ञाठा है कि इस प्रकार वी पृथक्क्ता में केवल कुछ ही पन््थ और प्रतिष्ठित ब्राह्मण, जिनमें शकराचार्य प्रमुख थे, विश्वास करते थे। लेकिन यह तर्क सही नही है क्योंकि सप्री हिन्दू विश्वास करते हैं कि किसी विशेष समूह की सदस्यता जन्म से निर्धारित की जाती है न कि योग्यता से । तब भी यह कहा जाता है कि हिन्दुत्व में विविध पन््य न पनपते और नष्ट हो जावे, यदि बौद्धिक श्रेष्ठ पर्दों का निर्धारण विशेष समूह में जन्म के आधार पर होता।
8. अहिंसा (४०४-श०णल्तत्)
क्या हिन्दुत्व अहिंसा में विश्वास करता है ? एक सम्प्रदाय का मानना है कि हिन्दू अर्हिसक लोग हैं, लेकिन दूसग सम््रदाम मानता है कि धार्मिक हिंसा हिन्दूवाद के लिए अपरिवित
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विचार नहीं है, गीता का त्याग पर बल देना निश्चित रूप से अहिंसा पर आधारित नहीं है। लेकिन ]7वी शत्ाब्दि में उप-महाद्वीप में बहुचर्चित भक्ति मार्ग निश्चित रूप से हिंसा के विरुद्ध था।
यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व में अहिंसा का समावेश इसमें भक्ति और सस्कार (गण) पक्ष पर बल दिए जाने के बाद हो हुआ, या जब वैष्णव और शैव पन््थों का उदम बआारहवी शताब्दि के बाद हुआ, या जब भ्क्ति-उदारवादी परम्पराएं [5वी व 6वी शतताब्दियों में पनमी जब कयोर, तुलसीदास जैसे सन्त उत्तर प्रदेश में, गुए नानक पजाब में, चैतन्य महाप्रभु मगाल में, मौरा बाई राजस्थान में, और तुकाराम तथा ग्मदास महाराष्ट्र में उदित हुए। इन सन््तों ने न केवल अपनी भाषा में लोगों तक धार्मिक विश्वास पहुंचाए बल्कि उन्होंने रूढिवादिता को आलोचना करते हुए सस्कार-युक्त (709-70029) धार्मिक विश्वार्सों को सरल मानवीय मूल्यों में बदल दिया।
(9) पुरुषार्थ . भारतीय सस्कृति के मूल्य (शात्एशीग्रापाज : ज्ञॉशर5 ता छत) एचंात्टो
हिन्दू सस्कृति चार मूल्पों पर केद्धित है. काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष) यह चौहरी मूल्य व्यवस्था इस मान्यता पर आधारित है कि मानव को बहुत सी आवश्यकताएं होती हैं (देखें, 87 [(४७०|, छवाशूपर खा मवाक्ा (072, 02! 955 -8)। मनुष्य को भोजन और यौन सुख की, शक्ति और सम्पत्ति की तथा मानव समाज और जगत के साथ सम्बन्धों की अर्थात् मानव समाज की आवश्यकता होती है। शागैरिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि काम है; शक्ति और सम्पत्ति की आवश्यकता की सन्तुष्टि अर्थ है, सामाजिक व्यवस्था की अप को सन्तुष्टि धर्म है; और जगत के साथ एकाकार होने की आवश्यकता की तृप्ति ही मोक्ष है।
साधारण अर्थ में काम का अर्थ मत्र के निर्देशों के अन्तर्गत संचालित पाँच इच्धियों--दृष्टि (७9), श्रवण (#९थगाह), स्पर्श (00०), स्वाद (१३४०), और गन्ध (&गथ])-के द्वारा सुखद अनुभवों को इच्छा है।
यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या शारीरिक सुख प्राप्ति का प्रथल ठोक है ? इसका उत्तर है कि कष्ट और पीडा स्वय में बुरे हैं। आज जिस प्रकार हम सभी इस तथ्य से सहमत हैं कि लोगों को गरोबी और कष्ट का निवारण उनकी बीमारियों के इलाज और उनसे बचाव के द्वार, इनकी आर्थिक स्थिति सुधा कर, तथा उनके मकान और मनोर्जन, आदि के साधनों की सुविधा प्रदान कस्के किया जा सकता है, उप्ती प्रकार शागैस्कि झुख मनुष्य को यातनाओं को कम करता है। उदाहरणार्थ, स्वादिष्ट भोजन आनन्द देता है लेकिन यह अपच (70॥8०50०7) पैदा करता हे और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है और हम खग़ब स्वास्थ्य का दुख भोगते हैं। स्वास्थ्य का सु्ध लेने के लिए हम भोजन बन्द कर देते हैं। इस प्रकार प्रतिस्पर्धात्यक सुख के बीच चयन के सिद्धान्व के माध्यम से उसने एक दुख दूसरे सुख के द्वार समाप्त हो जाता है। जहा इद्धिय तृप्ति मस्तिष्क द्वारा निर्देशित नहीं चहा “काम” मानव स्तर का नहीं रहता। सानव समाज ने इद्धिय सुझों न्
है भारदीय समाज का ऐविद्प्तिक परिदाव
अलग से वस्तुओं का विकाप्त किया है। हमने पाक कला, फैशन, भ्रमण स्थलों, बाग बगीचों, सगौत, कला, आदि का विकास किया है । यह सभी विकास “काम की तृप्ति में सहायक हैं। “काम' में यौन सुख भी निहित है क्योंकि यह शारीरिक सुख होता है। फ्रायड ने भी माना है कि सभी शारीरिक सुखों की परिणति यौन सुख में ही होती है। अत “काम' वह मूल्य है जिसकी तृप्ति इन्द्रियों द्वाश ही होदी है।
अर्थ” प्रकृति और मनुष्य पर शक्ति प्राप्त करने के लिए मानव को एक आवश्यकता है। एवरेस्ट पर विजय और बाढ, अकाल और महामारी पर नियंत्रण प्रकृति पर विजय प्राप्त कप्ने की अभिव्यक्ति है। विज्ञान प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की इच्छा की अभिव्यक्ति है। धन, प्रकृति और मनुष्य पर अधिकार का रूप है। आज हम शक्ति की राजनीति वी बाद करते हैं। हिटलर और मसोलनी जैसे तानाशाओं के आदर्श इन्द्रिय सुख नहीं थे बल्कि भूमण्डल पर अधिकार करना था। 998 में पाँच परमाणु महाशक्तियों (अमेरिका, रुस, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रास) ने घोषणा की कि वे अपने परमाणु अस्रों को नष्ट नहीं करेंगे और फिर भी भारत पर सीटीबीटी पर हस्ताक्षर के लिए दबाव डालना, (जिसने केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य से मई 998 में पोखरन में परमाणु परीक्षण किया था) भूमण्डल पर उनके प्रभाव की इच्छा का ही चयोतक है। भारतीय सस्कृति में यह सब “अर्थ” में निहित है।
“अर्थ' प्रकृति और मनुष्य पर शक्ति प्राप्त करने की इच्छा तथा धन की इच्छा, दोगें ही है। क्या यह इच्छा मूल्यवान है ? यदि हाँ, दो हम पूँजीवाद तथा शक्ति की राजनीति की निन््दा क्यों करते हैं ? 'अर्थ' उस समय बुरा (८शा) हो जाता है जब यह मानव की विभिन्न मार्गों का तिसस्कार कर्ता है तथा जब यह औचित्य (8&॥/0005०८६४) से नियंत्रित नहीं होता, जैसे दूसरों के अधिकारों को या मानव की आवश्यकताओं को महत्त्व नहीं देता। अमेरिका, रुस, योरप आदि की विज्ञान और उद्योग में आधुनिक प्रगति 'अर्थ' के कारण ही हुई है। हम उनकी सभ्यता को भौतिकवादी कहते हैं क्योंकि वे लोग प्रकृति और मनुष्य पर विजय प्राप्त करने में मशगूल हैं। यदि “अर्थ” को अनियत्रित छोड दिया जाये तो यह अपनी हो उपलब्धियों का व्रिनाश कर सकता है और मानव जाति का सर्वनाश कर सकता है। पर्म के नैतिक व नीतिशाख्रीय सिद्धान्तों को मनुष्य के इन्द्रिय, आर्थिक, व राजनैतिक आकाशक्षाओं को नियन्त्रित करना चाहिए।
धर्म उस एकौकरण (7/८६:7४००) के सिद्धान्त के लिए है जो व्यक्ति, समुदाय तथा समस्त जगठ के जीवनक्रम में निहित है। वह सब जो व्यक्ति और समाज की अखण्डवा को तोडता है वह “अधर्म” है। इस प्रकार 'धर्म' उन कर्तव्यों को बताता है जो व्यक्ति को पूरे करने चाहिए यदि समाज को विधटित नहीं होने देना है। जिस प्रकार विद्यालय/विश्वविद्यालय में शिक्षकों के लिए नियम (कक्षाए, लेना ,निश्चित समय में कोर्स पुणे करना, आदि) छात्रों के लिए नियम (कक्षाओं में बेठने, शुल्क भुगतान, परीक्षा में बैठने, आदि सबधी), और प्रशासकीय वा क्लर्क कर्मचारी वर्ग के लिए भी नियम (अभिलेखों का संरक्षण, परीक्षाओं का सचालन, आदि) होते हैं, तथा सभी के द्वारा नियमों का अनुपालन व्यवस्था स्थायित्व प्रदान करता है और विचलन से शैक्षिक सस्थाओं का पतन होने लगता है, उसी प्रकार समाज में प्रत्येक व्यक्ति को कुछ कर्तव्य करने होते हैं। रीतिया, परम्पराए और नियम इन कर्तव्यों को निर्देशित कस्ते है। मनु व रामानुजन जैसे विचारकों ने धर्मशास्त्र में इई
भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य 9
कर्तव्यों का वर्णन किया है ताकि मानव सम्बन्ध नियमित रूप से चलते रहें। उन्होंने इन्हे हमारे अस्तित्व, आनन्द और उद्विकास के लिए मूल्यवाव भी समझा था।
भारतीय सस्कृति में एस पी कनाल (5.9. छ०४० ०७ ०५) के अनुसार इन कर्तव्यों के पीछे जो व्यवस्थाएं हैं, वे हैं . (3) वर्णाश्रम धर्म या विशेष धर्म (9) प्ामारण या सामान्य धर्म । वर्णाश्रम कर्तव्य जीवन की चार अवस्थाओं में विभाजित हैं. विद्यार्थी जीवन, गृहस्थ जीवन, कर्मविरत जीवन और त्याग का जीवन (्यप््रण/707) | इनका सम्बन्ध पेशेवर भूमिकाओं से भी है। झाप्ररण धर्म का सकेत उन साधारण कर्तव्यों की ओर है जो जीवन की किसी एक अवस्था या पेशेवर भूमिकाओं से सम्बद्ध नहीं होते, जैसे चोरी से बचना (आस्वेके, क्रोध का दमन (अक्रोथ), क्षमा, पश्राणि मात्र को आहत करने से बचना (अहिस, और सत्य। ये कर्षव्य मनुष्य के मनुष्य के प्रति सामान्य कर्तव्य हैं।
धर्म में सदगुण भी सम्मिलित हैं (कर्तव्य और सद्गुण भिन होते हैं। कर्तव्य कर्म के लिए है और सदगुण मस्तिष्क की आन्तरिक दशा को दर्शाता है। उदाहणार्थ, किसी व्यक्ति को अवैधानिक योन क्रिया से बचाना कर्तव्य है और यौन विचाएँ से मुक्त ररना सद॒गुण है। क्योंकि सदृगुण मन की पवित्रता है इसलिए गुणवान जीवन कर्त्तव्य को अवस्था से कही ऊपर है। अच्छा कार्य करने से अच्छा है अच्छा होना। कर्तव्य बिना यह सोचे किए जाते हैं कि क्या चीज उन्हें अच्छा बनाती है। सदगुण सही और गलत पर मनन करता है। कर्तव्य परम्परागत नैतिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जब कि सदगुण नैतिक विक्षाएँ का। माता-पिता को प्यार करने वाले १४ तथा उन्हें आर्थिक सहयोग देने वाले पुद्र दोनों में अन्तर है । बाद वाला पुत्र वही करता है जो समाज ने उसके लिए मावा-पिता के लिए कर्त्तव्य निर्धारित किए हैं जबकि पहला पुत्र दया के वे अनेक कार्य कर्ता है जो समाज द्वाण निर्धारित नहीं किए गये हैं। सदगुण गतिवान हैं जबकि कर्तव्य स्थिर हैं। लेकिन कत्तंव्य सदृगुणों का मार्ग प्रशस्तत करते हैं। धर्म समाज को एक सूत्र में बाँधे रखा है और सद्गुण हमारे मस्तिष्क में एकता भाव पैदा करे हैं।
ओक्ष मुक्ति या स्वतत्रता की स्थिति बताता है। शकरा ने शुख्य अयोजन या अन्तिम लक्ष्य और गोग अयोजन या द्वैतियक लक्ष्यों में भेद किया है। किसी भी वस्तु के लिए इच्छा करना 'मुख्य प्रयोजन' होता है लेकिन किसी वस्तु को 'मुख्य प्रयोजन” के लिए प्राष्ति गौण प्रयोजन' होता है। आनन्द मुख्य प्रयोजन का विषय है जबकि किसी नौकरी के लिए प्रशिक्षण धनार्जन गौण प्रयोजन है। शकरण की मान्यता है कि आनन्द दो प्रकार का होठा है . अलुघ्वरन्य आनन्द तथा पएमण आजन्द। प्रथम आउन्द हारे श्र के माध्यप से प्राप्त रोता है जबकि दूसए आध्यात्मिक आनन्द है। मोक्ष, आत्मा की बह्य के साथ पहचान करना अथवा सम्पूर्ण सत्य की अनुभूति है।
भारतीय सस्क्ृत्ति में मोक्ष प्राप्ति के लिए दो अवस्थाएं बताई गई है. अवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्य (अवस्था)। प्रवृत्ति अवस्था शारीरिक आवश्यकताओं की नियमित सन्तृष्टि की अवस्था है और इसमें सासारिक वाच्छित यस््तुओं का आनन्द निहित है, जबकि निवृत्ति में ससार के भ्रवि वैराग्य भाव विकप्रित होता है। दोनों अवस्थाए निरन््तर और एक दूसरे की पूरक हैं। (दिखें, 5 7 बाज, ०ए ८४, 955)
0 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य
(४0) आश्रप जीव के आद्यों की प्राप्ति की अवस्याएँ
(4ऑफबशवह 3408 का कट्बााएपू 06 इबंट्व5 ० ॥(6)
आम्रम जीवन की अवस्पाएँ हैं जो जोवन के आदकों को प्राप्त करने के लिए पर्यावरण एव प्शिक्षण प्रदान करते हैं। आश्रम चार होते हैं। ब्रह्मचर्य (छात्र जीवन), गृहस्थ (पारिवारिक जीवन), वानप्रस्थ (कर्मविरत व अवकाश भ्राप्त जीवन), और सन्यास्त (त्याग का जीवन)। प्रथम दो अवस्थाएँ भवृत्ति मार्ग प्रदान करती हैं तथा दूसरी दो अवस्थाएँ निवृत्ति मार्ग के विकास में सहायक होती हैं। प्रत्येक अवस्था भें कुछ विशेष कर्तव्य होते हैं (विशेष घर्म)। यहाँ हम गृहस्थी, ब्रह्मचारी (विद्यार्थी) कर्मविरत व्यक्ति तथा सन्यासी व्यक्ति के कर्त्तव्यों की पृंधक चर्चा करेंगे। जिस प्रकार आश्रम जीवन विशिष्ट कर्तव्यों का आभास कढाते हैं, वर्ण जीवन में चार पेशे सबन्धी भूमिकाओं से सम्बन्धित कर्तव्य बताते हैं विद्वता सम्बन्धित पेशा, प्रशासन व रक्षा सम्बन्धित पेशे, उत्पादद और वितरण सम्बन्धित पेशे, तथा अकुशल श्रम सम्बन्धित पेशे । अत आश्रम व्यवस्था के साथ साथ हम वर्ण व्यवस्था का विश्लेषण भी करेंगे।
ब्हाचर्य आश्रम यह सभी युवा लोगों के लिए शिक्षा गृहण करने की विशेष अवस्था है जिसके पश्चात ही वे जीवन में स्वत्त्रता पूर्वक कार्य करने योग्य बनते हैं। घर पर बालक शिक्षा प्राप्त करता है कि किस प्रकार वह भोजन करे, चले, बोले, कपडे पहने, और दूसरों की उपस्थिति में किस प्रकार व्यवहार करे। कुछ जातियों व समुदायों में वह यह भी सीखता है कि जमीन पर हल किस प्रकार चलाये जॉयें, जूते कैसे बनाये जायें, मिट्टी के बर्तन कैसे बनायें, लोहार, सुदार, बढई आदि के कार्य किस प्रकार किये जाँयें, आदि | लेकिन बह पढ़ना लिखना था अन्य व्यवसायिक प्रशिक्षण की शिक्षा प्राप्त नही करता। यह शिक्षा उसे गुरु से मिलती है। शिक्षा की इस अवधि में उसे कुछ आदर्शों का अनुपालन करना पडता है और बुछ विशेष पर्यावरण में रहना पडता है। अतीत में विद्यालय आवासीय होते थे जहा कुछ सस्कारों के बाद 8 से 72 वर्ष की आयु के बीच बालक को उस विद्यालय में प्रवेश कराया जाता था तथा उम्रको ज्ञान दिया जाता था, किसी शिल्प आदि में दीक्षा दी जाती थी, एवं सामान्य एवं शारीरिक शिक्षा तथा तर्क में प्रशिक्षण दिया जाता था। इस अवस्था के प्रमुख लक्षण थे शिक्षक का कुशल ज्ञान, गुरु शिष्य में साथी भाव (८०34९) कया शिक्षक की निष्ठा, और कुछ मूल्यों और आदर्शों के प्रति छात्रों को प्रतिबद्धता। इस अवस्था में छात्रों को जीवन का अनुशासन सिखाया जाठा था तथा उन्हें चार म्रतिज्ञाएँ लेनी पडती थी यौन प्रवृत्ति पर नियत्रण, भोजन और वर्र में सरलता (जिससे समानता, प्रावृभाव और स्वतत्रता का आभास हो सके) गुरु कौ आज्ञापालन के प्रति सम्मान (अनुशासन पैदा करने के लिए) तथा ज्ञान अर्जन के लिए परिश्रम करना, और दैवो शक्तियों के सहयोग के लिये प्रार्थना (म्रों का उच्चारण और ध्यान) कस्ना। अत पवित्रता, सरलठा, कठिन परिश्रम, ज्ञान के प्रति समर्पण और आध्यात्मिक सत्य छात्र जीवन के आदर्श होते थे।
गृहस्थ आद्रभ जीवन की इस अवधि में 25 वर्ष के विद्यार्थी जीवन के बाद वे 25 वर्ष आते हैं जिनमें व्यक्ति समाज के प्रभावी सदस्य के रूप में सक्रिय भूमिका निभाता है। यह गृहस्थ तथा बैवाहिक जीवन होता है। आदर्श विवाह उसे समझा जाता था जो मोक्ष प्राप्ति के लिए किया जाता था तथा जो गृहस्थ के कर्चव्यों (जिन में बच्चों का लालन-पालन तथा पूर्वजों का श्राद्ध भी सम्मिलित होता था) के माध्यम से बौद्धिक सत्सग तथा अन्तिम
भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य ॥॥॥
मुक्ति के लिए होता था। इस प्रकार हृदय की पवित्रता, परस्पर विश्वास, शील (७०४४४) और परस्पर प्रेम आदि सदगु्णों का विकाप्त करके विवाह को मात्र जैविक साहचर्य (छंग0ट्टांटघ 45६०थआ0णा) से ऊपर उठाया गया था। भारतीय सस्कृति विवाह को मात्र साहचर्य ही नहीं बल्कि पूर्णरूपेण एकाकार (७७६०।७८ ०८१८5) मानती है। विवाह री पुरुष को एक सूत्र में बाघता है जिसका आधा भाग स्री व आधा पुरुष होता है। यह एकीकरण केवल जीवन काल में ही समाप्त नहीं होता बल्कि यह तो जन्म जन्मान्तर तक चलता रहता है। इस प्रकार क्यों कि विवाह एकाकार होने के आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए होता है (जैविक व सामाजिक उद्देश्यों से प्रेरित समागम से भिल), इसलिए यह एक समझौता नहीं पहन्तु पवित्र बन्धन माना जाता है।
दानप्रस्थ आश्रम . बच्चों के प्रति उत्तरदायित्वों के पूरा हो जाने के बाद माता-पिता से समाज कल्याण कार्य करने की अपेक्षा को जाती है ताकि वे मोह पाश में न फंसे रहें। उन्हें जंगल में नहीं जाना होता है और न ही मानव आवास एव घने बसे नगरों से दूर बल्कि गावों में हो रहना होता है। इस प्रकार तीसरी अवस्था का उद्देश्य कार्य और रूचि के नवीन स्तरों का विकास करना है, न कि किसी विशेष स्थान भें चले जाना मात्र। इसके पीछे यह भी भावना है कि दूरस्थ (गाँवों) के लोग भी अपनी समस्याओं के समाधान में इन लोगों के अनुभव का लाभ उठा सकें। राजा और शासक भी इन निवृत्ति प्राप्त लोगों के पास इसी उद्देश्य से जाते थे। वामप्रस्थी लोग सामाजिक समस्याओं के समाधान में अच्छे पथ प्रदर्शक होते थे। वृद्ध लोगों का कि त्ति प्राप्त करना 50 वर्ष की आप के बाद जो निश्चित आयु नही है बल्कि औसत आयु है जिसमें विविधता की अनुमति है) युवकों को अनुभव प्राप्त करने और जीवन को समृद्ध बनाने में योगदान करने का अवसर भी श्रदान करता है। वृद्धों द्वार सक्रिय जीवन से बहुत देर से निवृत्ति प्राप्त करने से युवाओं को नवीन कार्य क्षेत्र प्रारम्प करने का अवसर नहीं मिलता। वानग्रस्थ अवस्था में पति और पति के आपसी सम्बन्धों के डूटने की अपेक्षा भी नही की जाती | यह पति पलि के बिचारें पर निर्भर होता है। लेकिन उनसे पवित्र और विरक्त जीवन व्यतोत किए जाने की अपेक्षा की जाती है। तृतीय अवस्था का सास्कृतिक महत्व यह है कि शारीरिक सुख भोगने के बाद जब शरसैर अशकक््त हो जाता है वो व्यक्ति को कुण्ठा एव गिग़वट की भावना सवाने लगठी है। तब वह कृत्रिम साधनों से शारीरिक सुख प्राप्त करने की इच्छा करने लगता है। निवृत्ति से व्यक्ति कुण्ठा से छुटकाग प्राप्त कर लेता है। जैविक इच्छाओं में कमी (यौन. आत्म अभिकथन) मानव कल्याण में रुचि से पूरी हो जाती है।
सन्याय्त आश्रम जीवन विकास की अन्तिम अवस्था सन्यास है। यह वानप्रस्थ से दो अर्थों में भिन्न है--रुचियों के विकास में और भेरणा (00४4७४०॥) के विकास में | जहाँ गृहस्थ अवस्था में रुचि का प्रमुख केन्द्र परिवार और वानप्रस्थ अवस्था में सम्पूर्ण मानव समाज होता है वहा सन्यास अवस्था में सर्वव्यापी (७०५७६७) चेतना पर आधारित समस्त जगत (१७८१९) रुचि का केन्द्र होता है । जहा तक गृहस्थ अवस्था में प्रेणणा का सम्बन्ध है, व्यक्ति परिवार और उसके सदस्यों में रुचि लेने की भ्रेरणा आप्त करता है जबकि वानप्रस्थ में वह विशेष समूह, समुदाय यथा मानव प्माज में ही रुचि लेने के लिए प्रेरित होता है। दोनों हो अवस्थाओं में यदि आकाक्षाओं की पूर्वि हो जाती है तब गृहस्थी और वानप्रस्थी
व2 भारतीय सम्राज का ऐतिहासिक परिदृश्य
दोनों हो सुख का अनुभव करते हैं, यदि नहीं तो वे दुखी रहते हैं! जब प्रेरणा किसी लक्ष्य से सम्बन्धित होती है तब उसमें सफलता से सुख की तथा असफलवा से दुख की अनुभूति होती है | इस प्रकार के क्वार्यों को रुचिकर कार्य (0६९६४८१ 3०0०) अर्थात् फल से प्रेणि कार्य कहा जाता है। इसके विपयेत, सन््यास में कार्य रुचिविहीन कार्य होता है। सत्य बोलने का ही उदाहरण लें। एक व्यक्ति तब सत्य बोलता है जब उसे कोई लाभ हो और दूसए व्यक्ति तब भी सत्य बोलता है जब उसे हानि हो क्यों न उठानी पडे। व्यक्ति सत्य तब बोलता है जब इसको या तो कर्त्तव्य मानता है या फिर अन्तरात्मा की आज्ञा समझता है। इसमें वह न तो लाभ-हानि की गणना करता है और न ही अपने जीवन खोने की। केवल सन्यासी ही निस्वार्थ कार्य करने के लिये प्रेरित होता है जिसे फल की चिन्ता न इस जम्म में है और म बाद में। सन््यासी की सरल पोशाक जीवन के उस आदर्श का प्रतीक होती है जिसके लिए वह जीवित है। सन्यासी अपने घर द्वार का समर्पण कर देता है क्योंकि वह वो समस्त जगत क्यो हो अपना घर मानता है। वह भय, इच्छा और घृणा से ऊपर उठ जता है। इस प्रकार सनन््यास अकर्मण्यता का जीवन नहीं है बल्कि सक्रिय जीवन है जो प्रेरणा और बहुजन हिताय के सर्वोच्च शिखर तक उठ जाता है।
यहा यह उल्लेखनीय है कि जीवन को ये चार अवस्थाए औसत व्यक्ति के लिए हैं। प्रतिभावान या असाधारण गुणों वाले व्यक्ति के लिए ये आवश्यक नहीं हैं। टैगोर और चार्ल्स डिकन्स जैसे लोग कभी भी स्कूल नहीं गए। शैली और वर्डसवर्थ जैसे लोग अधिक शिक्षित नही थे फिर भी वे महान कवि हुए। प्रतिभावान किसी भी अवस्था में लाप कर शिखर पर पहुच सकते है ।
(४0) वर्ण समाज की चतुर्पुखी व्यवस्था (िगाबवह वह #त्फ्र[गिव 0/4७ ण 5०00०)
वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था से भिन्न है। जाति व्यवस्था के विषय में यह विश्वास कियां जाता है कि यह भारतीय सस्कृति पर बदनुमा दाग है क्योंकि इसने समाज को सर्घर्षमय कैम्पों में विभाजित कर दिया है, भारतीय जन को एक बडे भाग को कह्टों में धकेला है, और सामाजिक न्याय को कठिन बना दिया है। जाति व्यवस्था सामाजिक रूप से हानिकारक, राजनैतिक रूप से आत्मघाती, नैतिक रूप से घृणित और आर्थिक रूप से विनाशकारी सिंद हुई है। पसनतु वर्ण व्यवम्था लोगों का उनकी अभिरुचि, योग्यता और पेशों के आधार पर समूहों में विभाजन है। अभिरुचियों और योग्यताओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है (४) विद्त्ता के लिए, (७) प्रशासन और रक्षा के लिये, (०) उत्तादन और वितरण के लिए, और (6) अकुशल श्रम के लिए। प्रथम समूह के लोगों को ब्राह्मण कहा गया जो पूजा अर्चना, अध्यापन, औषधि, इत्यादि कार्यो में लगे, दूसरे समूह को क्षत्रिय कहा गया जो युद्ध, प्रशासन और शासन करते थे, तीमरे समूह को वैश्य कहा गया जो कृषि, व्यापार और वाणिज्य करने लगे, और चौथे समूह के लोगों को शूद्र कहा गया जो अन्य तीन सदस्यों के निर्देशन में अकुशल श्रम करने के लिए लगाए गए।
ब्राह्मणों में आत्म नियत्रण, पवित्रता, शुद्धता, गम्भीरता, क्षमा, सरलता, बुद्धिमानी, सले और दार्शनिक अर्न॑॑दृष्टि के गुण होते हैं। क्षत्रियों में साहस, शक्ति, दृढ़ता, कुशल,
भततोय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य 43
दानशोलता, और प्रशासकीय योग्यता जैसे गुण होते हैं। वैश्यों में कठिन परिश्रम, बुद्धि, और शीक्र निर्णय करने के णुण होते हैं। शूद्रों में प्रशिषण के अभाव में योग्यता एवं पात्रता की कमी रहती है इसलिए उन्हें दूसरों के निर्देशन में काम करना पडता है और उनको आधीनता और सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है।
ब्राह्मणों के कर्तव्य (पर्म) हैं - पूजा अर्चना करना, सस्कार एवं यज्ञ आदि करवाना हथा अध्यापन। क्षत्रियों के कर्चव्य हैं: बाधाओं से सुरक्षित रखना, उन पर शासन करना, दुष्टों को दण्ड देना तथा राष्ट्र निर्माण में लगे संस्थानों को उदारता से सहयोग देना। वैश्यों के कर्त्तव्य हैं . कृषि कार्य करना, दूसयें से वस्तुए लेकर उन्हें सुरक्षित रखना और बेचना, पशुओं को पाला, तथा गरीब और जरुरतमदों की सहायता करना | शूद्रों के कर्तव्य हैं वे कार्य करमा जो अन्य लोग उनसे कराना चाहते हों। शूद्रों को वेदों को पढने की, वैदिक सस्कार करने को, >था मत्रों के उच्चारण की अनुमति नदी है
कोई भी व्यक्ति या समूह इन योग्यताओं के आधार पर किसी भी वर्ण में स्थान भ्राप्त कर सकता था। इस प्रकार वर्ण की सदस्यता जन्म से नहीं वरन् योग्यता से निर्धारित होती थी। एक शुद्र अपनी योग्यता से ब्राह्मण हो सकता था, एक ब्राह्मण वेद न पढने के कारण शूद्र हो सकता था, तथा इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपना वर्ण बदल सकते थे। भागवत गीता में भी उल्लेख है कि चारों वर्णों का गठन शुण' सिद्धान्त पर अर्थात् स्वभाव से सबधित व अर्जिव लक्षणों के आधार पर और कर्म सिद्धान्त आर्थात् पेशे के आपार पर किया गया है । परन्तु कुछ विद्वानों का मानना है कि वर्ण व्यवस्था उतनी ही कठोर थी जितनी आज जाति व्यवस्था है। प्रास्म्म वी कुछ धार्मिक पुस्तकों में उल्लिखित व्यपितयों के उत्थान के जो उदाहरण हैं (जैसे, वर्शिष्ठ जो वेश्या से जन्मे थे, व्यास मछुआएिन से जन्मे थे, पाराप्तर निम्न जन्म की कन्या से जम्मे थे) पे नियम न होकए केवल अपवाद (७५८८७७००७) ही थे ।
(५) जातिया (८29०5)
प्रिद्धान्त रूप में जातियाँ जन्म के आधार पर लोगों को समूहों में विभकत करती हैं जिसमें कुछ लोगों को कुछ विशेषाधिकार दिये जाते हैं तथा अन्य को उन से वचित रखा जाता है। जातियों के अपने आचारतत्व, अपनी जीवन शेली, सही और गलत के प्रति अपनी घारणाएँ, और उनके रीति-रिवाज होते हैं। जाति में निहित अभिप्रेरक (7/४८) प्रजातीय (8८४) एवं नृजातीय (०४४४०) था। भारत को एक के बाद दूप्तरे प्रजादीय आक्रमणों का सामना करना पडा था। इतिहास के प्रारम्भ में भी, भारत में भिन्न-भिन्न प्रजातियों के लोग रहते थे दड्रविड, मगोल, व भेडौटरेरियन। बाद में अन्य प्रजातियों के लोग परिश्यन, युनानों, और सोथियन भारत में बस गए। जब अन्य देशों (ब्रिटेन, अमेरिका, आदि) को निर्मूलन (ल्वश्ग्राणा॥॥00), सपरिवर्तन (८००४६:झं०४) (जोवन-शैली परिवतन सहित) और मानव अधिकारों को चज्वना, (जैसे, कानून सरक्षण की मनाही) सबधी प्रजातीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था, भारत ने इनका सामना सामजस्थ के द्वार अर्थात् इस प्रकार से परस्थर सामजस्थ से किया कि अत्येक प्रजातीय समूह जीवन का अपना प्रतिमान विकसित कए सवा। भ्राएम्भ में दो प्रवासी (9हा90/७) प्रजातीय समूह सामाजिक, वैवाहिक व सहभोजी सम्बन्धों के स्तर पर एवं विश्वास और रिवाजों के स्तर पर अधिक कठोर नही थे और भारत
१4 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य
के मूल निवासियों के साथ मेलजोल में काफी लघौले थे, लेकिन धीरे-धीरे अनेक समूहों ने अपने पेशे व जीवन-शैली बदल दिये और नये नाम धारण कर लिए। यही समूह जातिया कहलाए और उनकी सख्या में वृद्धि होती गई। प्रत्येक जाति ने अपने जीवन के तरीकों और विशेषताओं की सुरक्षित रखने के लिए दूसरों के साथ अन्तक्रिया में सामाजिक तथा आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए। इस प्रकार नयी-नयी जातियों तथा उपजातियों का उदय हुआ। गुप्त काल (300 » 0 से 500 & 0 ) तक जाति व्यवस्था बहुत कठोर हो गई तथा अन्य सभी जातियों के ऊपर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित हो गया। इसी जातिगत कठोरता, ब्राह्मणों के वर्चस्व और निम्न हिन्दू जातियों पर विविध प्रतिबन्धों पर आक्रमण शुरू हुए--प्रथम वो बुद्ध के द्वाग, तत्पश्चात भक्ति आन्दोलन के प्रास्म्भ होने से अनेक भक्तों के द्वात। लेकिन जाति व्यवस्था बीसवी सदी के प्रारम्भ तक कठोर बनी रही, जब तक अग्रेजों ने औद्योगीकरण, 'शहरीकरण, एव शिक्षा प्रसार को प्रक्रिया आरम्भ को तथा रामकृष्ण, विवेकानन्द, गाधी, आदि महान पुरुषों ने सामाजिक विचारधाराओं द्वारा जाति व्यवस्था पर आक्रमण करना शुरु किया। आज जाति के बन्धन ढीले पडते जा रहे हैं यद्यपि यह नही कहा जा सकता कि जाति व्यवस्था समाप्त हो रही है या भविष्य में समाप्त हो जायेगी । अब जब जाति व्यवस्था ग़जनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और अनुसूचित जातिया, जनजातिया व अन्य पिछड़ी जातिया जो कि हमारे देश की कुल जनसख्या के अच्छे प्रतिशत में हैं (77%), कुछ विशेषाधिकारों का लाभ लेने लगी हैं (जैसे, नौकरियों, शिक्षा सस्थाओं, विधायिकाओं में आरक्षण, वथा छात्रवृत्तिया, आयु सीमा में छूट आदि प्राप्त कर रहे हैं) और इस प्रकार स्वार्थी प्रवृत्ति का 283 हो रहा है, इस सबसे ऐसा प्रतोत होता है कि जाति व्यवस्था हमारे देश में जारी गी।
थुगो से भारतीय समाज भारतीय सस्कृतिं पर सास्कृतिक पुनर्जागरण
बौद्धयर्म, इस्लाप और पश्चिम का प्रभाव
(पाताज्षा 802) [700शञश 06 82865 : ॥ए३८६ ण 0पॉए०४। शफक्तां5५आ८९, ॥ए१0॥50, 4599, थाएं धो १४७६५ ठग वठक्षा एजापएर)
आदि हिन्दू वैदिक दर्शन पर बौद्ध और जैन धर्मों का प्रभाव था। यद्यपि दोनों ही पृथक धर्मों के रूप में विकसित हुए थे लेकिन उनकी जडें हिन्दू परम्पराओं में भी काफी गहरे जमी थी। जैन लोगों को शहरी वाणिज्य समुदाय का सरक्षण प्राप्त था जबकि बौद्धों को राजकुमाएँ का संरक्षण था। दोनों ही निम्न्तसता के मूल्य, पूर्व निर्धारण, (०त८७॥०७), पुनर्जन्म, आवागमन (पग्रणक्म80००) पर बले देते थे ओर श्रेणीक्रम (86८:8०09)) तथा वर्ण और जाति व्यवस्था में विश्वास की आलोचना करते थे। दोनों ही मन्दियों में बलि प्रथा के निषेध और अहिंसा पर बल देते थे। बौद्ध धर्म की सदस्यता सभी जातियों और लिंगों के लिए खुली थी। बौद्ध धर्म निर्वाण के माध्यम से आत्मा की मुक्ति पर केद्धित था, जबकि जैन धर्म आत्म सयम के माध्यम से नैतिक गुर्णो की भावना के विकास के द्वाय आत्मा की मुक्ति वी बात करता था। सक्षेप में कहा जा सकता है कि बौद्ध और जैन धर्मों का ईश्वर सबधी नास्तिक दृष्टिकोण है जबकि हिन्दुत्व आस्तिकवाद पर आधारित है। एक भकार से बौद्ध और जैनियों वे हिन्दू धर्म को कुछ विशेषताओं का विरोध किया, जैसे कठोर औपचारिकतावाद
भारवीय समाय का ऐतिहासिक परिदृश्य हा]
(पंहांप.. 07्रक्षााणो, बर्बसतापूर्ण सस्कार (ज्ामरांधव। ग्रोएशीशा), औ्रैणीक्रम पर आधारित मूल्य व्यवस्था, ब्राह्मणों का वर्बस्व, और धार्मिक कट्टस्वाद!
हिन्दू मूल्यों और विश्वा्सों पर शंकराचार्य (नवी शवाब्दि), गमानुजाचार्य 0007-37 अर्थात् ।[वी व 2वी शर्ताब्द), और मराधवाचार्य (4 दी शर्ब्दि! के उपदेशों का भी प्रभाव पडा डिन्होंने देश के भिन्न-भिन कोनों में ऐकेश्वरवाद (कघ०४०(॥८६छ७) के प्रसार के लिए में की स्थापना की। रामानुजावार्य ने वैष्णव सम्प्रदाय को स्थापता की और जैन, शैव तथा निप्त जाति के व्यक्तियों को भी अपना अनुयायी बना लिया। दक्षिण भारठ के लिंगायत सम्प्रदाय ने अनेक गैर ब्राह्मणों को मात्र (८ुए/एक४०9) शिव की पूजा अर्चना के लिए परिवर्तित कर लिया।
पद्धहवी और सोलहवीं शर्ताब्दि के बीच भक्ति सप्नदाय का उदय हुआ जिसने हिन्दू धर्म में कुछ नवीन मूल्यों का प्रचार काने का प्रयास किया । कबीर (440-528), गुर नानक (469-538), ग्रमानन्द (चौदहवी और पद्धहवी शवाब्दि), तुकाग़म और रामदास आदि सन्तों जे हिन्दू धर्म में समतावादी (८९०४३॥०४४आ॥) एवं गैस्श्रेणीक्रामफ मूल्य व्यवस्या पर बल दिया। उन्होंने हिन्दू परम्पराओं की उदारता तथा इस्लाम के साथ समन्वय के लिए भी प्रयल किए।
मध्य युग में इस्लाम ने हिन्दू आदशों को प्रभावित किया। यद्यपि मुसलमानों के आक्रमण भारत पर दसवो शताब्दि में हो शुरु हो गए थे लेकिन पन्द्रहवी शवाब्दि से इस्लामी संस्कृति का हिन्दू महान परम्पणओं पर प्रभाव प्रकट होने लगा। इस्लाम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करा। यह धर्म एकेश्वववादो और गैए श्रेणीबद्ध है, अर्थात् यह समानता में विश्वास रखता है। यद्यपि हिन्दू और इस्लाम दोनों ही धर्म सम्पूर्णता (४०७0) के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं लेकिन हिन्दू धर्म में यह सम्पूर्णता श्रेणोक्रम से सम्बद्ध है जबकि इस्लाम में यह सम्पूर्णता श्रेणीक्रमता से भिल है।
योगेद्ध सिंह 0973 67) ने हिन्दू परम्पंणओं पर इस्लाम के प्रभावों का तीत चएणों में विवेचन किया है इस्लामिक शासन काल में (206-88), ब्रिटिश शासम काल में (अगरहवीं, उन्नीसरवी और स्वतत्रत्ता आन्दोलन काल में (930 से देश के विपाजन तक)। इस्लामी शासन काल में कुछ मुस्लिम शासकीं ने हिन्दू मन्दिरों को नष्ट काने, इस्लाम वा प्रचार करमे और हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की मीति अपनाई। इस काल में यद्यपि हिन्दू और मुसलमानों के बीच तनाव और सघर्ष हुए परन्तु साथ में अनुकूलन (8039(४0०प), परम्पणओं का सास्कृतिक समन्वय (5क्ञा०आ5) और हिन्दू मुसलमानों के सांस्कृतिक सहअस्तित्व (००-८४४८४८८) को भी प्रोत्साहन मिला। सूफोवाद ने भी हिन्दुओं को प्रभावित किया। इसमें विशगी (७४००४८) व्यक्तिगत नैतिकता, भौतिकवाद की क्षण भगुरता (8909 40 5807 0:४८) वधा आत्म बलिदान पर बल दिया जाता है। गैर-सस्कारवाद (००ा-मराप्फणा) वधा निरपेश्ष (७६४००) ऐकेश्वववाद भी जो कि सूफी सन्तों और दार्शनिकों द्वारा बताया गया था, हिन्दू जन मानस को अच्छा लगा। योगेन्र सिंह ने सकेत दिया है कि कुछ मुस्लिम शासकों एवं विद्वानों ने हिन्दू परम्पणओं के कुछ पक्षों को इस्लाम धर्म के साथ मिलाने का भी प्रयल किया। उदाहरणार्थ, अकबर ने दीन-ए इलाही नामक एक जये समन्वित प्रन्य (7४८७० ८ए/) को प्रार्प किया जो कि हिस्दू, इस्लाम, जैन तथा
6 भारतीय समाज का ऐतिहासिक प्रिदृरय
पारसी धर्म का मिश्रण था। दारा सिंह ने इस्लाम के साथ उपनिषदीय (ए.8ण४४80०0) ऐकेश्वरवाद के समन्वय (5५॥/8८७७) की वकालत को। प्रसिद्ध विद्वान अमीर खुसरों ने मुसलमानों को हिन्दू परम्पणओं की व्याख्या व टिप्पणी दो। सोलहवीं और सत्रहवी शताब्दि में अनेक मुसलमान कवियों और लेखकों ने हिन्दी में लिखा। फिर भी, इस्लामी धार्मिक और राजनैतिक अभिजात वर्ग न केवल महत्वपूर्ण प्रशासकीय, न्यायिक और राजनैतिक पदों पर आसीन थे बल्कि वे इस्लाम की निरन््तरवा और विस्तार में भी विश्वास करते थे। ब्रिटिश शासन काल में स्थिति बदल गई और मुसलमान अभिजात वर्ग की शक्ति और स्थिति कमजोर होने लगी। अत, महान् इस्लामी परम्पण अपने प्रारम्भिक जोश और विश्वास को कायम न रख सको। अठारहवो शर्ताब्दि में इस्लाम को पूर्ववर्ती उदार प्रवृत्तियों समाप्त होने लगी और उनके स्थान पर कट्टरवाद तथा पुनरुद्धार इसके प्रमुख आधार बन गए। हिन्दू परम्परा लोकाचार में अनुकूलिनी (3५०70७४०) की अपेक्षा अधिक प्रतिक्रियावादी हो गयी और सास्कृतिक परिवर्तन की दौड में पोछे रह गयी। दूसरी ओर इस्लामी परम्पराएँ अधिक राजनोतिकृत हो गयीं, लेकिन उनीसवी शववाब्दि में ठदार और कट्टर इस्लामी परम्पणओं वा की पर (7०क्राट/09) शुरु हो गया। इन दो सास्कृतिक शक्तियों के बौच खौचतान से उत्पनन राजतिक सास्कृतिक घटना मे पृथक इस्लामी राष्ट्र (पाकिस्तान) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
भारत में ब्रिटिश शासन की अवधि में, योगेन्द्र सिंह 973 43) के अनुसार हिन्दुल में दो प्रकार के सुधार आन्दोलनों का उदय हुआ। प्रथम, वे सुधार जो वेदों के प्रारम्भिक आदर्शों के अनुसार हिन्दू धर्म में मूल्यों और सास्कृतिक प्रथाओं में परिवर्तन चाहते थे और दूसरे वे जो नवीन व परम्पणगत मूल्यों और सास्कृतिक प्रतिमानों के समन्वय लाने की परिकल्पना करते थे। प्रथम श्रेणी के अं में स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण (836-86), विवेकानन्द (863 902), और महात्मा गान्यी प्रमुख थे जबकि दूसरी श्रेणी के सुधारकों में राजा गममोहनराय, और नेहरु थे। दयानन्द, विवेकानन्द और गान्धी जी ने हिन्दू धर्म के मूलभूत सास्कृतिक प्रसगों को अस्वीकार नहीं किया था। उन सभी ने वर्ण व्यवस्था, श्रेणीक्रम सिद्धान्व, कर्म योग अथवा निरपेक्ष (8७४०४८०) सामाजिक क्रिया को स्वीकार किया था। सभी ने जाति को सस्कारगव निर्योग्यताओं (00॥5४० 0:४)0८5) को हिन्दू परम्पण में गलतफहमी पर आधारित समझा और उनके निषेध के लिए प्रयल किए। यद्नपि स्वामी दयानन्द ने गैर हिन्दू सास्कृतिक मूल्यों और धार्मिक विश्वासों को अस्वीकार करे वी वकालत की लेकिन विवेकानन्द और गान्धी ने ऐसे निषेध पर बल नहीं दिया।
यह सब दर्शाता है कि किस प्रकार हिन्दू धर्म, हिन्दू विश्वास और मूल्य समय-समय पर बदलते रहे हैं और भारतीय सस्कृति में धार्शिक सास्कृतिक परिवर्तन होता रहा है।
भारत भें पश्चिम और आधुनिकीकरण का प्रभाव
(परएन८ ण॑ धर १६5६ आठ ऐै0तशाकांस्थाएा 9 ॥0793)
अलातास (५]४७७, 972 व2/) के अनुसार भारत पर पश्चिम के प्रभाव की पाँच चरणों में चर्चा को जा सकती है। प्रथम चरण सिकन्दर के आक्रमण से सम्बद्ध है जो भावी शताब्दियों के वाणिज्य और व्यापार सम्बन्धों के कारण शान््रिपूर्ण आदानअदान में बदल
श्रारवीय समाज का ऐविद्ासिक परिदृश्य ९
गया। दूसग चरण पद्महवी शव्ाब्दि के अन्त (498 ४.0.) से प्रारम्भ हुआ जब
दास्कोडिगामा अपने जहाजों के साथ कालोकट में आया। कुछ हो वर्षों में पुर्तगालियों ने
गोआ पर अधिकार कर लिया। लेकिन इन पशिचमो लोगों का प्रभाव सोमित ही रहा। तीसरा चरण अठारहवी शताब्दि के प्रारम्भ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन की स्थापना से प्रारम्भ हुआ और बाद में अठारहवी रावाब्दि के मध्य तक ब्रिटिश शासन भाखत में स्थापित हो गया। भरत में पश्चिमी सस्कृति के विस्तार का यह प्रथम चरण था! चौथा चरण उनौसवी शताब्दि के आरम्भ से औद्योगिक क्रान्ति के कारण प्रारम्भ हुआ। अग्रेजों द्वाप कच्चे माल के स्रोत के रूप भें भारत के आर्थिक शोषण के साथ सास्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी पश्चिमी आधिपत्य का विस्तार प्रारम्प हुआ पाँचवा चरण 7947 में देश कौ राजनैतिक स्वाधीनता के पश्चात से प्रारम्भ हुआ।
हमारे समाज पर सस्कृहि और सामाजिक व्यवस्था के सदर्भ में पश्चिमी सस्कृति का प्रभाव क्या हुआ है ? इस प्रभाव का सक्षेप में इस भ्रकार दर्णन किया जा सकता है :
0) बैंकिंग अणाली सार्वजनिक प्रशासन, मिलिट्री सगठन, आधुनिक औषधियों, कानून आदि जैसी पश्चिमी सस्थाओं का हमोरे देश में प्रारम्भ हुआ।
(2) पश्चिमी शिक्षा ने देश के लोगों का दृष्टिकोण विस्तृत किया जिन्होंने अपने अधिकारों और आजादी की बातें करना शुरू कर दिया। नवीन मूल्यों और वर्कसगत व धर्मनिपेक्ष भावना का प्रारम्भ तथा व्यक्तिवादिता, समानवा, और न्याय को विचारधाराओं का महत्व बढने लगा।
8) वैज्ञानिक नवाचारों कौ स्वीकृति ने रहन-सहन के स्तर को उठाने और लोगों को भौतिक कल्याण प्रदान करने की आबांक्षाओं को बढावा दिया।
६). कई सुधार आन्दोलन भी शुरु हुए। अनेक पाम्परवादी विश्वाप्तों और समाज के लिए विकार्यवादी प्रथाओं को त्याग दिया गया तथा व्यवहार के अनेक नये प्रत्तिमानों को प्रार्म्म किया गया।
७) हमारी औद्योगिकौ, कृषि, उद्यमकर्ता (६॥७४८७८८४८ए४४) और उद्योग का आधुनिक्ौकरण किया गया जिससे हमारे देश का आर्थिक कल्याण मारम्ध हुआ।
6) स़जनेतिक मूल्यों के श्रेणोक्रम का पुनर्गठन किया गया है। लोकतात्रिक सरकार के स्वरूप को स्वीकार करते हुए सभी देशो (४०४0४८) राज्य, जो कि साम्राज्यवादी (900270॥०) सरकार के आपीन थे, भारतोय राज्य में मिला दिये गए हैं और जमीदाएें तथा सामन्तों की सत्ता और अधिपत्य समाप्त कर दिए गए हैं।
(0) विवाह, परिवार और जाति जैप्ती सस्याओं में स्तरचनात्मक परिवर्तन आया है जिससे सामाजिक जीवन, पर्म, आदि में नये प्रकार के सम्बन्धों का उदय हुआ है।
(8) सचार के आधुमिक साधनों के प्रारम्भ हो जाने से, जैसे रेलवे व बस से यात्रा, डाक सेवा, समुद्री व हवाई यात्रा, प्रेस, रेडियो और दूरदर्शन, आदि आदमी के जीवन के कई पक्ष प्रभावित हुए हैं।
७) राष्ट्रीया की भावगा का उदय हुआ है।
(0) मध्यम वर्ग के उदय से समाज के प्रबल (00900 मूल्यों में परिवर्तन आया है।
8 प्रारतीय सम्राज का ऐतिहासिक परिदृश्य
अलातास (»]89७) ने हमाय सस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में चार प्रकार के परिवर्तनों के सदर्भ में पश्चिमी सस्कृति के प्रभाव का वर्णन किया है : समाप्ति वाले (०॥क7७0४०).. परिवर्तन, सयोज्य व योगात्मक (000४०) परिवर्तन, समर्थक (&णए7०४४०) परिवर्तन एवं सश्लेषणात्मक (5;7820०) परिवर्तन। सम्राष्ति वाले परिवर्तन वे परिवर्तन हैं जो सास्कृतिक विशेषताओं, व्यवहार के स्वरूपों, मूल्यों, विश्वार्सो, मस्थाओं, आदि के समाप्ति के कारण होते हैं। उदाहरण स्वरूप, हम युद्ध में अख्न श्तों में कुल परिवर्तन, सती प्रथा उन्मूलन, आदि के उदाहरण ले सकते हैं। सयोज्य परिवर्तन जीवन के विविध पशों में नवौत सास्कृतिक विशेषताओं, सस्थाओं, व्यवहार के स्वरूपों और विश्वासों/प्रथाओं को अपनाने को सदमित करते हैं। ये (400/00४७) लोगों की सस्कृत्ि में पहले नहीं थी। हिन्दू समाज में तलाक का प्रारम्भ, पिता की समत्ति में पुत्री को हिस्सा देना, पचायतों में चुनाव प्रक्रिया लागू करना, आदि इस प्रकार के परिवर्तनों के कुछ उदाहरण हैं। समर्थक परिवर्तन वे हैं जो पश्चिमी प्रभाव के सम्पर्क में आने से पहले समाज में विद्यामन मूल्यों, विश्वास्ों और व्यवहार के स्वरूपों को सुदृढ करते हैं। इस्त प्रकार के परिवर्दन का एक उदाहरण ऋण लेनदेन में हुण्डी प्रथा का प्रयोग है। सश्लेषणात्मक परिवर्तन विद्यमान तततों तथा अपनाएं गए तत्त्वों से मिलकर नए स्वरूपों की रचना करते हैं। इसका सबसे सरल उदाहरण आवासीय रूप से एकाकी किन्तु कार्यात्मक रूप से सयुकत परिवार है जो माता पिता तथा सहादसों के प्रति सामाजिक कर्तव्यों को आज भी निभाए जा रहे हैं। सश्लेषणातमक परिवर्तन के दो और उदाहरण हैं दहेज प्रथा का जारी रहना किन्तु दहेज की रकम के लेने व १४: पर प्रतिबन्ध के साथ, तथा जोवन साथी के चुनाव में माता पिता तथा बच्चों का सम्बद्ध
ना ।
पश्चिमी प्रभाव के कारण परिवर्तनों का वर्गीकरण केवल विश्लेषणात्मक उद्देश्यों के लिए है। व्यवहार में इन दोनों को एक दूसो से अलग करना सम्भव नहीं है। एक ही प्रकार के परिवर्तन के भीतर अन्य प्रकार के परिवर्तनों के तत्त्त देखे जा सकते हैं | उदाहरण के लिए वस्र उद्योग के प्रारम्भ होने में समर्थक तत्व भी इस अर्थ में निहित हैं कि यह कपडे के उत्पादन में सुविधाजनक होता है, लेकिन साथ हो साथ, क्योंकि इसने हाथकरपा उद्योग वो पीछे धकेल दिया तो इसमें समाप्ति वाले (#एघ॥0४८) परिवर्तनों के तत्वों का समावेश भी कहा जा सकता हैं। काणगार व्यवस्था में खुली जेल या प्राचीर-विहीन (एआ- ०5 काणगार परिवर्तन का एक और उदाहरण है जिसमें प्ीन विभिन प्रकार के तत्व हैं। शिक्षा व्यवस्था में परितर्वनों में भी इसी प्रकार अन्य परिवर्तनों के तत्वों का समावेश है। बैंकिंग अणाली, परिवार व्यवस्था, विवाह व्यवस्था, आदि में भी इसी भ्रकार परिवर्तन के विविध तत्वों का समावेश दिखाई देता है।
अब मुख्य प्रश्न है. भारत पश्चिमी प्रभाव के सम्पर्क के बाद कहाँ पहुँचा है? क्या भारत ने प्रगति की है ? क्या इसने लोगों के कल्याण में कोई योगदान किया है ? कया इस प्रश्न का निरपेक्ष रूप से उत्तर दे पाना सम्भव है ? क्या निरपेक्षवाद दा दार्शनिक पक्षपाठ को इस प्रकार के विश्लेषण करते समय अलग रखा जा सकता है ? कुछ विद्वान अनुभव करते हैं कि ड्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत के समक्ष अनेक समस्याएं थीं, जैसे आर्थिक पिछडेपन की प्मस्या, बडी सख्या में लोगों के गयैबी रेखा से नीचे रहने की समस्या,
भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य 9
मेगेजगारी, जोवन के हर क्षेत्र में धर्म का वर्चस्व, ग्रामीण ऋणग्रस्तता, जाति संघर्ष, साम्प्रदायिक असामजस्य, पूजी की कमी, प्रौद्योगिकी क्षमता वाले दीक्षित कर्मियों को कमो, मानव एवं भौतिक ससाधनों को मतिशील बनाने के साधनों की अपूर्णता, आदि । पश्चिमी प्रभाव ने इन समस्याओं के वैकल्पिक समाधान प्रदान किए हैं। लेकिन कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि इन प्मस्याओं के समाधान में पश्चिमी प्रभाव मे भास्त को कोई सहायता नही दी। यदि कुछ समस्याओं का समाधान हुआ भी है दो अनेक नवीन समस्याएँ जन्मी हैं। भारत उनका सामना पश्चिमी मॉडल के आधार पर नही कर रहा है। भारत अपने स्वदेशी मॉडल द्वारा ही कर रहा है। देश की स्वतंत्रता के पश्वात ही औद्योगिक विकास का उदय हुआ, शिक्षा का विस्तार हुआ, प्रामोण रोजगार के अवसर पिलने लगे, जनसख्या नियंत्रण का प्रयास होने लगा, इत्यादि! इस प्रकार पश्चिमी शासन से मुक्ति से, न कि पश्चिम के सम्पर्क से, आधुनिकीकरण सम्भव हुआ।
सत्य तो यह है कि जीवन के कुछ क्षेत्रों में पश्चिम के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार करना पडेगा। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, आधुनिक प्रौद्योगिकी, श्राकृतिक आपदाओं से निबटने के आधुनिक तरीके, देश को बाहरी खतरों से सुरक्षा प्रदान करने की आधुनिक विधिया, आदि भारत के इतिहास में पश्चिम के निर्विवाद योगदान माने जायेंगे। लेकिन भारत जनमानस के उत्यान में अपनी परम्पशगत सस्थाओं , विश्वासों, और प्रधाओं का भी भयोग कर रहा है। इस प्रकार पश्चिमी प्रभाव और विभिन व्यवस्थाओं के आधुनिकीकण के बाद भी, भारत, भारत ही रहेगा। भारतीय सस्कृति जीवन्त और आने वाली कई दशाब्दियों तक चलही रहेगी।
आज का हिन्दू दर्शन प्रारम्भिक हिन्दू दर्शन से भिन है। नव हिन्दूवाद, जिसे 'अभिषदीय हिन्दूवाद' (5990॥29/०6 स000/5४) भी कहा जाता है, विस्तार और अकन (5८४) में पूर्वहूपेण स्वदेशी है। यह किसी नवीन पथ को उपज नहीं है बल्कि यह एक नवीन धार्षिक स्वरूप है जो पूर्व के सभी पन्धों को एक सूद्र में पियेने के श्रथल में लगा है। इस “अभिषदीय हिन्दृवाद” की रचना धार्मिक उद्देश्यों कौ अपेक्षा राजनैतिक उद्देश्यों के लिए अधिक है, अत इसको 'राजनैतिक हिन्दूवाद' भी कहा जाता है। ईसाई और मुस्लिम हिन्दुओं को 'अन्य' (४८ ०0८४७ मानते थे जैसे कि हिन्दू उन्हें 'म्लेच्छ' मानते थे। अनिवार्यत नंद हिन्दूधाद उनीसवी और बीसवी शताब्दियों में अपरिहार्य (४28700900८) अथवा टालने बाला नहीं था। बीसवी शतार्दि के नव हिन्दूवादी आन्दोलनों को विशेषरूष से स्वतव्॒ता के बह, एज़लैलिक एए दे दियए, गएण, जिसे, अब, थी, इस रूप ऐें, हिल्टूल्ल वो, स्वीकाए किया जा, है। ऐमिला थापर (985 27) के अनुसार वर्तमान में पाया जाने वाला अभिषदीय हिन्दूवाद इसी परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है और आज इसी अभिषदीय हिन्दूवाद को स्वदेशी भारतीय धर्म का उत्ततधिकाएआप्त एक मात्र दावेदार के रूप में आपे बढाया जा रहा है ।
इस “अभिषदीय हिन्दूवाद' को धार्मिक अभिव्यक्तियों (०८5०१) की नयी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए म्रामीण अमीर व्यक्तियों और शहरी मध्यम वर्गीय लोगों के राजनीति में ऐकेश्वस्वादी हिद्दुत्व में लाने के लिए अधिक प्रयोग किया जा रहा है। नये सशोधित हिन्दुवाद के भेष में बडी सख्या में लोगों को अनुयायी बनाने में और उन की
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आरतोय यमाज का ऐतिहासिक प्रतिरव
आवाज को उठने में प्रयल किये जा रहे हैं। अभिषदीय हिन्दूवाद के आगरहों (999०० में राजमैतिक उद्देश्य सदैव निहित रहता है।
रोमिला थापर (एणाण७ 7900», 3985 2(-22) तथा कुछ अन्य विद्वानों ने इस
म॒व हिन्दूवाद के निम्नलिखित मूल तत्त्व (90504) बताये हैं
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अभिषदीय हिन्दूवाद का अधिकार आघार ब्राह्मण कालीन मूल मन्थ-गौता और चेदान्त विचार--है। यह धर्मशास्रों के कुछ पक्षों को स्वीकार करता है और एक आधुनिक सुधरा हुआ धर्म प्रस्तुत करने का प्रयल करता है। यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व” का आदर्श अर्जित परम्पप और इस पस्म्पण के सक्रिय पुनर्निर्माण के मेल पर आपारित है, या यह भी कहा जा सकदा है कि हिन्दुत्व” एक सरचिव विश्वास व्यवस्था, (६४४८४ए7०८१ ७८४४6 5956०) है जिसमें अतीत की व्याख्या व टौका टिप्पणी, वर्तमान का विश्लेषण, तथा भविष्य के व्यवहार के लिए मार्ग दर्शक विचारों का सम्रह निहित है।
'इसकी मान्यता है कि गैर-जावि धार्मिक पन््य के लोगों को शक्तिशाली लोगों के धर्म को स्वीकार करना पड़ता है लेकिन उनका आधीन बनकर रहना पड़ता है | समाज की निचली श्रेणी के लोग नये धार्मिक आन्दोलनों के माध्यम से उच्च गतिशीलवा के लिए प्रयल कर सकते हैं।
यह धर्म परिवर्तन (97052ए४४००) में विश्वास करता है क्योंकि इसका दावा है कि हिन्दुओं पर युनानियों, तुर्कों, मुगलों और अग्रेजों द्वारा हजायें वर्षों तक अत्याचार किए गए थे। इसी प्रसम में वे धर्म परिवर्तन, मन्दिरों को नष्ट करने, मूर्तियों को तोडे जाने, मन्दिरों की सम्पत्ति को जब्त करने, आदि को इसी में सम्मिलित करते हैं।
इसलिए वे मठों, आश्रमों, मन्दिरों, रथ यात्राओं की रचना को न्याय सगत ठहरते हैं
और मुसलमानों तथा ईसाइयों को हिन्दू बनाने को तर्क संगत मानते हैं। मीनाक्षीपुरम (982) में, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात (998) में, दक्षिण भारत (999) में
धर्मान्तरण कैम्पों का गठन हिन्दू धर्म के मूल मतानुयायियों ((0४0व0८०४/४७)
द्वार समर्थित एव रक्षित था। गत बीस वर्षों में, विश्व हिन्दू परिषद का दावा है कि
उन्होंने लगभग 47,000 मुसलमानों को परिवर्तित किया जो कि लगभग 8,000
परिवारों से सम्बन्धित थे (मुख्यत मेहराव, और रावत सम्पदार्यों के जो कि परम्पणगत
प्रधाओं को मानते थे, जैसे मुर्दे को दफनाना, निकाह सस्कार करना, हलाल करके
खाना, मूर्ति पूजा की निन््दा करना, ईद, शबे ए-बारात, आदि त्यौहार मनाना), और राजस्थान में चार जिलों (अजमेर, पाली, उदयपुर, और भौलवाडा), तथा गुजग़त और दक्षिण भारत के 2000 ईसाइयों का भी धर्मान्तरण किया।
यह समानतावाद का समर्थन नहीं करता। यह सामाजिक व आर्थिक असमानता को
मान्यता प्रदान करता है और श्रेणीक्रम सरचना स्वीकार करता है। इसके विपरीत
इस्लाम जैसे धर्म सिद्धा्तत समानतावादी हैं। बौद्ध जैसे अन्य धर्म समानता का
जीवन के नैतिक क्षेत्र में निषेध करते हैं। हिन्दूबाद का जन्म और उद्विकास ऐसे
काल में हुआ जब असमानताओं को जीवन का एक संत्य माना जाता था, और घर्म
का सामाजिक कार्य इस (असमानदा) में परिवर्तन करना नहीं था बल्कि उन लोगों के
भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिविश्य द्र
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लिए इस सत्य को सुधारना था जो इस (असमानता) को कठोर व अपधर्षी (2एः्ब४5०) मानते थे। यह पार्मिक अभिव्यक्ति (प्र्मा/८४७0०॥) को विविधता (गाणाफ॥ता/) को जरूरी नही मानता। यह कुछ चुनिन्दा सस्कारों, विश्वा्सों और प्रथाओं को आवश्यक प्रानता है इसलिए उन्हें अधिक महत्व दिया जाता है। यह परम्पशागत स्थिति से छूटने की स्थिति है। छाँटने का कार्य कौन करे, किन खोतों से यह कार्य किया जाये और किस्त उद्देश्य के लिए किया जाये, ये सब विचारणीय महत्व के बिन्दु हैं। अभिषदीय हिन्दूवाद के लिए बढ़ते हुए महत्त्व का एक कारक है हिन्दुओं का अन्य देशों में फैलना) भाप्त के बाहर रहने वाले हिन्दू सास्कृतिक असुशक्षा की भावना से पीड़ित रहते हैं क्योंकि वे ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, खाड़ी देशों, यूरोप या उत्तरी अमेरिका जैसे इस्लामी या ईसाई समारजों में अल्पसख्यक समुदाय के रूप में होते हैं । यह अल्पसख्यक समुदाय (हिन्दू) बहुधा हिन्दुत्व के ऐसे स्वरूप को पसन्द करता है जिसको वे हिन्दू स्कूलों के माध्यम से अपने बच्चों को सिखा सकें और जो उनके नये उद्यम का प्रमर्थन करे। अन्य देशों में बसे ये अल्पसख्यक समुदाय और उनका वित्तीय समर्थन अभिषदीय हिन्दूवाद के धर्मापदेशकों और सस्थाओं के लिए. आधार प्रदान कोगा। इस विस्तार का महत्व न केवल नव-हिन्दूवाद को भारत में रहने वाले और बाहर बसे सर्थकों के बीच, सामाजिक कडी का स्पष्ट प्रदर्शन है बल्कि उस बढती हुई सन्निकटता का भी जिससे संघ, परिषद और समाज विदेशों में सभाए कस्ते और उनका समर्थन प्राप्त करते हैं और घनी व्यक्तियों के 'मत परिवर्तन (००एएथअंण) में सफलता प्राप्त कर रहे हैं। अभिषदीय हिन्दूवाद ने भारतीय राष्ट्रवाद की एक नवीन अवधारणा जस्तुत कौ है जिसे “हिन्दू राष्ट्रवाद' को सज्ञा दी गई है। इस अवधारणा के अनुसार हिन्दू बहुसख्या में होने के माते, और अतीत में जो कुछ भो महान् और वौरता के कार्य हुए उनके उत्तराधिकारी होने के नाते, अन्य लोगों पर आधिपत्य रखने, अधिकार दर्शाने और उन्हें अपने आधीन समझने के लिए अधिकृत मानते हैं। यह कहा जाता है कि कोई भी, गैर-हिन्दुओं सहित, भारतीय हो सकता है बशर्ते कि वह हिन्दू देवताओं को स्वीकार करे और गैर-हिन्दुओं को विदेशी माने। हिन्दू अन्य गैरहिन्दुओं की अपेक्षा अधिक देश भक्त हैं। गैर हिन्दुओं को अपनी राष्ट्रवादी विश्वसनीयवा सिद्ध करने के लिए बहुसख्यक समुदाय के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करना चाहिए और पूजा के उन स्थलों को गिराने में देश भक्ति का कर्तव्य मानकर हिन्दुओं के साथ मिलना चाहिए, जो स्थल गैर-हिन्दुओं के द्वारा हिन्दू मन्दियें पर स्थापित कर दिए गये थे । हिन्दू राष्ट्रवाद उन गैर्हिन्दू लोगों के लिए हिन्दुओं के क्रोध का सामना करने की घमको है जो उपरोक्त लीक पर चलने मे मना करने हैं। ये अतिवादी धार्मिक नेता जो हिन्दुत्व और हिन्दू ग्रष्ट॑णद को बात करते हैं न्यायपालिका में विश्वास नहीं रखते और स्थापित मस्थाओं के प्रति सम्पान नहों करते। वे घानते हैं कि 'लोक शक्ति' रा शक्ति से अधिक महान है।
७) नच हिन्दूबाद या हिन्दुत्व के अगेता (छाणए०एव्मा>) सापेक्ष धर्म निरपेक्षता
22 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य
(०४४८. 5६८एगाडण) की बात करते हैं। वे मुसलमानों के परिषोषण (एथगएशणाढ) वी ओर उन्हें सरक्षण दिये जाने तथा अल्प सज्यकों को एज्य द्वात विशेषाधिकार दिये जाने को “मिथ्या धर्म निसपेक्षवाद' (5९७००-5९८एवरयंधाओ मानते हैं। “सापेक्ष धर्म निरपेक्षता' उतके अनुसार समान आचारसहिता, अधिकारों और उत्तरदायित्वों से बन्धे सभी धार्मिक समुदायों को एक साथ आने की कल्पना है! इस प्रकार वे चाहवे हैं कि सरकार द्वारा एक नागरिक सहिता (शा ०००६) लागू की जाये जो भारत के सभी नागरिकों पर धर्म और जाति भेद भाव के बिना समान रूप से लागू हो। वे केवल हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, या पारसियों के लिए अलग-अलग, विवाह सम्बन्धी तथा सम्पत्ति सम्बन्धी नियमों को लागू कराना नहीं चाहते। उनका विश्वास है कि साम्प्रदायिक सघर्षों के लिए यह एक आदर्श लोक्तात्रिक समाधान होगा। वे यह नहीं मानते कि इससे अल्प सख्यक समुदायों वी धार्मिक व सास्कृतिक पहवान बहुसख्यक समुदाय में निमगन (६प्रण्णटाहुल) हो जायेगी। अपेक्षाकृत उनका विश्वास है कि इस प्रकार को नीति (समान सहिता) सभी सम्पदायों में प्रचलित अन्ध विश्वार्सों, सडे गले रिवाजों तथा तर्कहीन व पिछड़ेपन की प्रथाओं को समाप्त कर देगी और एक वैज्ञानिक सोच का विकास करेगी जो धर्म निरपेक्ष राज्यों के लिए मोड का पत्थर होना चाहिए। जिन भावनाओं का उदय हो रहा है वह यह हैं कि अभिषदीय हिन्दूवाद, जो स्वदेशी हिन्दूवाद की पुनर्स्थापना का दावा कर रहा है, वास्तव में स्वय को स्थापित कर रहा है। यह तो केवल समय ही बतायेगा कि यह नव हिन्दूवाद या 'हिन्दुत्व” या हिन्दूवाद का पुनर्पष्टीकरण (:0्ा्टाएए८(७७०४) अर्थार्त 'हिन्दू राष्ट्रवाद' का आदर्श भारतीय राजनीति के धर्म निरपेक्ष स्वरूप को कहा तक प्रभावित करेगा। इसी प्रकार, केवल समय ही यह निर्धारित करेगा कि वे धार्मिक विचारधाराए जो जन साधारण पर अपना वर्चस्व स्थापित करेंगी, भारत के लोगों के हितों और आकाक्षाओं पर खंगी उतरेगी या फिर सामाजिक व्याधि की दशाए पैदा करेंगी जो समाज में घृणा व द्वेष उत्पल करेंगी।
भारतीय समाज भे निरन््तरता तथा परिवर्तन के कारक (ट०ए5 (०एराणएांए बाते एफ: 70 वर $8०लल॑एछ)
ऐसे अनेक कारक हैं जो भारतीय समाज में निरन््तरदा बनाए रखने तथा परिवर्दन के लिए उत्तरदायी हैं। परिवर्तन एकीकरण (/॥/८८४७०००) और अनुकूलन के माध्यम से आ सकता है। अनुकूलन तब होता है जब विद्यमान सस्थाएँ नयी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एफए से सापवस्ण करें| एबीकरण दब होदा है जब कोई समाज नये रत्तों को पाएण के और इनको अपना हिस्सा बना ले। उन अनेक कारकें में से जिन्होंने हमारे समाज को अनुकूलन या एकीकरण के लिए प्रेरित किया है या इसमें बाधक बने हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं राजनैतिक स्वतत्रतरा और लोकताद्रिक मूल्यों का चलन, औद्योगोकरण, नगग्ैकरण, शिक्षा प्रसार, चैधानिक उपाय, जाति प्रथा में सामाजिक परिवर्तन, और सापाजिक आन्दोलन ठथा सामाजिक चेतना (जैसे, परिवारवाद, वैश्वीक्रण, और जातिवाद विरोध)।
भ्रात्तीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य 23
राजनैतिक स्वतत्रता और लोकतात्रिक मूल्यों का प्रारम्भ (तर ९॥शभाप्य व्रऐशुशातेतारष 90 ॥7007तीणा ण॒ एशा०्टआ९ रंश॥९5)
गजनैतिक स्वतत्रता से सभी व्यक्तियों को यह अवसर प्राप्त हुआ है कि वे अपनी पहचान, स्थिति, प्रतिबद्धता, और इच्छाओं में निहित हितों और मूल्योन्युख चेवना और अचेतना के चारों और रहकर स्वयं का विकास कर सकें। आज व्यक्ति अपनी व्यक्तिवादिवा को लेकर अधिक परेशान है। वे समूह जो पीढियों तक स्वतंत्र सामाजिक अन्तर्क्रिया से बचित रहे थे अब वे भी सामाजिक ढाँचे में भेदभाव पूर्ण विशेषाधिकार प्राप्त करके ऊंचा उठने का आग्रह कत्ते हैं। वे क्षेत्र जो ब्रिटिश शासकों की नीतियों के कारण आर्थिक रूप से पिछड रहे थे, अब विकास योजनाओं में अपना हिस्सा चाहते हैं। कुछ नृजातीय (॥०) समूह अपनी सास्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए राजनैतिक स्वतत्रता चाहते हैं। धार्मिक समूह अपने सदस्यों को कुछ मूल्य और उप-सांस्कृतिक प्रतिमानों को सिखाने की आजादी चाहते हैं। इन सभी आकाक्षाओं और मांगों ने गत पाय दशाब्दियों में हमारे देश में आधुनिकौकरण की प्रक्रिया और सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति को प्रभावित किया है।
शजनैतिक स्वतत्रदा ने सामन््तों जमीदारी प्रथा, जागीरदारी और राजाओं के राज्यों का उन्मूलन करके हमारे समाज की संरचना और इसकी अधिकार प्रणाली में भारी परिवर्तन करते का मार्ग भशप्त किया है। इसने हमारे प्रामोण समाज के आर्थिक और सामाजिक आधार में क्रान्ति लाने का काम किया है जिसके परिणाम आज भारत के प्रत्येक गाँव में देखे जा सकते हैं। किराये पर भूमि लेने वाले काश्तकार अब इतने स्वाधीन हैं कि वे शक्तिशाली ग्रामीण मध्यम वर्ग के रूप में उभरे हैं। राजनैतिक परिक्षेत्र में इस वर्ग की महत्त्वपूर्ण और अ्रभावशाली आवाज है। देश में हरित क्रान्ति मुख्यत, इसी वर्ग को देन रही है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक लचौलापन, ब्राह्मणीय पस्म्परओं के प्रति सहिष्णु उदासीनता, सास्कृतिक एवं भूमि सम्बन्धी आव्दोलनों के निसतर भागोदागे, और कलहप्रिय उपयोगितावाद (फ0हपशटा०0४ ४४॥४४०॥४४) ने इस वा को देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की है। यही समूह आज देश के शक्तिशाली पिछड़े वर्ग के आन्दोलन का नेतृत्व कर रहा है।
राजनैतिक स्वतत्रता ने राष्ट्र के लिए औद्योगिक, प्रौद्योगिकोय/वैज्ञानिक दथा प्रबन्धकीय विकास को सम्भव बनाया हे। एक अत्यन्त सुदृढ प्रौद्योगिक और वैज्ञामिक मानव शक्ति को उत्पनन किया गया है। योगेन्द्र सिंह (994 22) ने भी कहा है कि एक नये वर्ग, जो स्वतत्रता पूर्व के मध्यम वर्ग की विशेषताओं से बिल्कुल भिन्न है, का उदय हुआ है। इस वर्ग का कही अधिक विस्तृत सामाजिक आधार है जो निम्न और मध्यम जातियों और समाज के ऐसे ही स्तरों से सम्दद है। शहरो क्षेशें में नये उद्चपी और पेशेब९ वर्ण और घाँवों के धनवान कृषक वर्ग भार के मध्यम वर्ग में आते हैं जो अनुमानत भारत की कुल जनसख्या के एक चोथाई के लगभग हैं। देश की जीडीपी (0 9 7) में सेवारत क्षेत्र के भ्रतिशव में निएनर वृद्धि हुई है जो दर्शाता है कि समाज की रचना और आर्थिक सरचना में किस सीमा तक परिवर्तन आया है। उपनिवेशवाद ने भारतीय समाज की औद्योगिक नीव को थ्षीण व दुर्दल बना दिया था और स्वतत्रता के बाद देश आज औद्योगिक प्रगति के मामले में तेरहवें
4 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदय
स्थान पर आ गया है। ये उपलब्धिया इसके सामाजिक जीवन के आधारभूत क्षेत्रों में योजनाबद्ध विकास का परिणाम हैं।
नगरीकरण (0व्रत5॥व0ज)
नगगैकरण एक और कारक है जिसने परिवार व समाज को प्रभावित किया है। गठ कुछ दशाब्दियों में हमारे देश की शहरों जनसख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। मध्य अठारहवीं श्वाब्दि में भारत में करीब 0 प्रतिशत जनसख्या शहरों में रहने वालों की थी। उन्मीसवीं शवाब्दि के दौरान भारत के शहरवासियों की सख्या सौ वर्षों में दस गुनी हो गई, बौसवीं शताब्दि में जब समूचे देश की जनसख्या 90। में 23 करोड 80 लाख से बढकर 9 में 84 कंग्रेड 63 लाख हो गई, शहरी जनसख्या में बहुत अधिक वृद्धि हुईं। 95। में शहरी जनसंख्या कुल जनसख्या कौ ]7 29 प्रतिशद थी, जो 96] में बढकर 7 97 प्रतिशत,97 में 99] प्रतिशत, 987 में 23 34 प्रतिशत और 99 में 2573 प्रतिशत हो गई। 7% में शहरी जनसख्या की दस वर्षीय विकास दर 264। प्रतिशत थी जो 97 में बढ़कर 38 23 प्रतिशत, 98 में 46 4 प्रतिशत और 99। में 36 9 प्रतिशत रही । सही अर्थो में भारत वी शहरी जनसख्या 96 में 78 करोड थी जो 99। में 2.7 करोड हो गई। (#/०:90007 7१०॥६ 840०, 998 24)
शहरी क्षेत्रों में परिवार, नातेदायी, जाति व विवाह आदि व्यवस्थाएँ ग्रामीण क्षेत्रों से म केवल रचना में भिन्न होती हैं बल्कि विचारधाय और कार्यप्रणाली में भी भिनल हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है कि शहरी क्षेत्र में एकल परिवार, गैरःशहरी एकल परिवार से कुछ छोय होता है, और नगरवासी ग्रामवासियों की अपेक्षा एकल परिवार को अधिक पसन्द करता है। एमएसगोरे (0968) ने उल्लेख किया है कि शहरी परिवार अपनी अभिरुचियों, भूमिवा दृष्टिकोण और व्यवहार में सयुक्त परिवार के प्रहिमानों से भिन होते हैं। उदाहरण के लिए, निर्णय करने के क्षेत्र में, ग्रामीण परिवारों के विपरेत शहरी परिवारों में बच्चों के विषय में वरिष्ठ पुरुषों को अपेक्षा माता पिता ही निर्णय लेते हैं, उनकी सख्या अपेक्षाकृत इसी रुझान के ग्रामीण लोगों में कम होती है।
परन्तु आईपी देसाई (964) इस विचार से सहमत नहीं है कि नगरीकरण सयुक्त परिवार व्यवस्था को तोडने का काम करता है। सयुक्ता (0४७८५४) पर नगयीकरण के प्रभाव का विश्लेषण करते हुए उन्होंने परम्परागत सयुक्तता और शहरी क्षेत्र में परिवार के रहने को अवधि में महत्वपूर्ण सम्बन्ध पाया। उनकी परिकल्पना थो कि शहरी क्षेत्र में परिवार का लम्बे समय तक रहना सयुक्तत्ा की मात्रा को कम करेगा। परन्तु उन्होंने पाया कि सयुकतता “बहुत पुणने' (८७ ०6) (शहरों में 50 वर्षों से अधिक समय से रह रहे) ठथा “पुराने (०४०) परिवारों (शहर में 25 से 50 वर्ष की अवधि से रह रहे) में नये” परिवारों 25 या इससे कम वर्षों से शहरों में रह रहे) की अपेक्षा अधिक विद्यमान है।
ल्युइस वर्थ (005 9४०४, 938) का भी मानना है कि शहर परम्परात्मक प्रकार के पारिवारिक जीवन के लिए प्रेरणादायक नहीं होता। उनके अनुसार परिवार (सामाजिक जीवन की एक इकाई के रूप में) गांव के वृहद् नातेदारी समूह के लक्षण से मुक्त हो जाता है तथा परिवार के सदस्य अपने पेशे, शिक्षा और धार्मिक, मनोरजन और राजनैतिक जीवन में
भारतीय समाज का ऐविलासिक परिदृश्य 25
अपनी अलग रुचियों के अनुसार लगे रहते हैं।
अन्य अनेक सामाजिक व्यवस्थाओं में भी शहरों में परिवर्तन परिलक्षित होते हैं । शहरी क्षेत्रों में नातेदारो सम्बन्ध इतने निकट के नहीं होते जितने ग्रामीण क्षेत्रों में । शहरों में जब केवल प्राथमिक व द्वैतियक नातेदार ही निकट सम्पर्क रखते हैं, गांवों में तृतीयक व दूर के नातेदार भी सम्बन्ध बनाए रखते हैं। शहरों में जाति व्यवस़्या इतनी कठोर नही है जितनी गाँवों में। शहरों में जाति अब अबल सामाजिक पहचान नहीं है जिसके माध्यम पे लोग अपनी सामाजिक अनाक्निया को अभिव्यक्त कों। लेकिन गाँवों में लोग अभी भी अपने सामाजिक, राजनैतिक और सास्कृतिक लक्ष्यों को जाति के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं। शहरों में जाति पंचायतें जाति संघों में प्रतिस्थापित होती जा रही हैं। वे सघ अब सजातीय विवाह के प्रति मानों प्रदूषण और शुद्धता, या जाति विवादों के समाधान, आदि के प्रयास सबधी दबाव डालने की भूमिका नही निभाते बल्कि इन जाति संघों ने अपना कार्यात्मक व संघीय क्षेत्र विस्तृत कर लिया है। इस कार्य श्रणाली में लगभग 300 जातियां सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
हमारा विचार है कि विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन में नगरौंकरण की भुला अहम् रही है। शहरी रहन-सहम मे संयुक्त परिवार के स्वरूप को कमजोर किया है
एकल परिवारों को मजबूत। शहर नये व्यवसायों तथा उच्च शिक्षा के लिए निरन््ता
अवसर प्रदान करते हैं। जो परम्पणगत पारिवारिक व्यवसाय छोडकर नये अपनाते हैं वे परम्परागत पेशे अपनाने वाले लोगों की अपेक्षा अपनी अभिरुचि में अधिक बदलाव प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार शररी क्षेत्रों में शिक्षित लोग संयुक्त परिवार के प्रतिमानों के पक्ष गें कम होते हैं! यह कहा जा सकता है कि अभिरुचि में परिवर्दन का शहर में रहने को अवधि से सीधा सम्बन्ध है। शहर स्ियों को भी लाभकारी रोजगार के अवप्नर प्रदान करते हैं और सत्र घन अर्जन करने लगती है तो वह कई क्षेत्रों में स्वतत्रता भ्राप्त कर लेती है। वह पति के परिवारोन्युख होने से अधिक से अधिक बचने का प्रयल करती है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे समाज में परिवार के स्वरूप में शहरी रहन-सहन ने कुछ भिन्ताए पैदा की हैं।
औद्योगीकरण (प60503॥73607)
भारत में औद्योगीकरण को प्रक्रिया का जारम्म उन्नीसवी शताब्दि के अन्तिम 25 वर्षों और 20वीं शर्वाब्दि के पूर्वार्ध में प्रारम्भ हुआ। नवीन उद्योगों के चारों ओए शहरों का विकास
४083 । औछ्योगोकरण से पूर्व हमारे यहा () कृषि आधारित मुद्राविहीन अर्थ व्यवस्था थी, (॥) प्रौद्योगिकी का ऐसा स्तर था जहां घरेलू इकाई भी आर्थिक आदान-प्रदान की इकाई थी, (प) पिवा-पुत्र तथा भाई-भाइयों के बीच पेशों में अन्तर नहीं होता था (४४) ऐसी मूल्य व्यवस्था थी जहा बजुर्गों को प्रभुता और परम्पणओं को पचित्रता दोनों ही “विवेक (0०४४५) के सिद्धान्न के विपतीत माने जाते थे। लेकिन औद्योगोकरण से आमतौर घर हमारे समाज में और विशेष रूप से परिवार में आधिक और सामाजिक व सास्कृतिक परिवर्तन आये। आयिक क्षेत्र में इसका परिणाम है काम में विशिष्टोकरण, व्यावसायिक गतिश्ोलता, अर्थव्यवस्था का मुद्रीकण, तथा नातेदारी व व्यावसायिक साचना में बिखराव। सामाजिक क्षेत्र में इसका परिणाम है : मामीण क्षेत्रों से लोगों का शहरी क्षेत्रों में प्रत्रजन, शिक्षा का विस्तार और एक
हे
26 भ्रारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य
सुदृढद केद्रीय राजनैतिक सरचना। सास्कृतिक क्षेत्र में शहरीकरण से विश्वासों में धर्म निरपेक्षता सम्भव हुई है। पारिवारिक सगठन पर औद्योगीकरण के तीन महत्तवपूर्ण प्रभाव ड् है - श्रथम, परिवार जो उत्पादन की प्रमुख इकाई था अब उपभोक्ता इकाई में बदल गया है। एकीकृत आधिक उद्यम में परिवार के सभी सदस्यों के एक साथ काम करने के बजाय, परिवार के कुछ पुरुष सदस्य परिवार के लिए रोजी रोटो कमाने हेतु घर से बाहर जाते हैं। इसने न केवल सयुक्त परिवार के परम्परागव सरचना को बल्कि सदस्यों के बीच सम्बन्धों को भी प्रभावित किया है। दूसरे, फैक्ट्री रोजगार ने युवा प्रोढों को अपने परिवारों पर सोधी निर्भरता से मुक्त कर दिया है। उनके पासिश्रमिक ने क्योंकि उन्हें आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बना दिया है, अत घर के मुखिया का प्रभुत्व और भी कम हो गया है। शहरों में कई मामलों में पुरुषों के साथ उनकी पतियों ने भी काम करना व धनार्जन शुरु कर दिया है। इसने एक सीमा तक अन्तगारिवारिक सम्बन्धों को प्रभावित किया है। अन्तिम, बच्चे अब आधधथिक परिसम्पत्ति (७४४४(७) ने होकर दायित्व (॥809॥025) बन गए हैं। यद्यपि कुछ मामलों में बाल श्रम के उपयोग व दुरूपयोग बढ गए हैं, कानून बच्चों को काम की अनुमति नहीं देता। इसी के साथ शैक्षिक आवश्यकताए इतनी बढ गई है कि बच्चों को लम्बे समय तक अपने माता-पिता पर निर्भर रहना पडता है। शहरों में आवासोय व्यवस्था महंगी है और बालकों का रख रखाव भी। इस प्रकार औद्योगीकरण के कारण घर और काम अलग अलग हो गए हैं। कुछ समाजशास्त्रियों ने औद्योगीकषण के कारण एकल परिवारों के उद्भव (८णथह०॥००) के सिद्धान्त को चुनौती दी है। यह चुनौती अनुभवजन्य अध्ययनों और विश्व के भिन-भिन भागों में परियार व्यवस्था की विविधता पर तैयार किए गए दस्तावेजों (१०८णाधरथ्णाआा०0) पर आधारित है। एमएसए राव, एमएस गोरे तथा मिल्टन सिंगर जैसे विद्वानों के अध्ययनों ने यह बताया है कि सयुकतवता व्यापारी समुदाय में अधिक प्रचलित है और इसे अधिक अच्छा माना जाता है और कई एकल परिवार विस्तृत नातेदायी बन्धन बनाए रखते है । पश्चिमी औद्योगिक जगत में अनेक आधुनिक अनुसधानकर्त्ताओं ने भी अवैयक्तिक विस्तृत जगद और परिवार के बीच नातेदारों की समर्थक भूमिका और उनके बीच सयोजक के कार्य पर बल दिया है (५७७ !970) | सामाजिक इतिहासकारों ने भी दर्शाया है कि औद्योगीकरण से पूर्व भी यूगेप और अमेरिका में एक सास्कृतिक प्रतिमान के रूप में एकल परिवार प्रचलित था। परन्तु यह उल्लेखनीय है कि नातेदारों की समर्थक भूमिका (४0900॥४९ 706) में अनिवार्यता का वह लक्षण नही है जो भारतीय एकल परिवार के दायित्वों (00॥820075) में पाया जाता है। एकल परिवार के नवयुवक आज भी प्राथमिक नाहेदाएं (जैसे, मादा पिता, सहोदर) के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह स्वेच्छा से करते हैं। निकट स्वजन (॥0) से एकता और परिवार के साथ एकता-भाव का निर्वाह भी करते हैं, यद्यपि वे अलग-अलग मकानों में रहते है (,0०४४ 90८, 974 . 377) इन सभी परिवर्तनों ने हमारे परिवार व्यवस्था में परिवर्तन किया है। जहा आमीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर जनसख्या को गतिशीलठा से अधिकार शक्ति मे कमी आई है, धर्म निरपेक्षवाद मे ऐसो मूल्य व्यवस्था का विकास किया है जो व्यक्तिगत प्रेरणा और उत्तरदायित पर बल देती है। व्यक्ति अब प्रतिबन्धात्मक पारिवारिक नियत्रण के बिना काम करता है।
भारतीय समाज का ऐतिहासिक फ्रिदृस्य 27
पहले जब व्यक्ति परिवार में काम करता था और सभी सदस्य उसके काम में उसको सहायता करते थे, तब परिवार के सदस्यों में अधिक घनिष्टता होती थी, लेकिन क्योंकि अब वह परिवार से दूर उद्योग/आफिस में काम कण्ता है, अत सम्बन्धों को घनिष्ठता पर प्रतिकूल अभाव पडा है। परिवार के सम्बन्धों पर औद्योगीकरण का अभाव एरिवार की आत्मनिर्भरता से भी तथा परिवार के प्रति रूचि में परिवर्तन से भी स्पष्ट होता है। इस प्रकार औद्योगीकाण ने एक नये प्रकार के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति में योगदान दिया है जिसमें सयुक्त परिवार का प्रभुतापूर्ण सगठन जो प्रारम्भ में था अब कठिन हो गया है। औद्योगीकरण के प्रभाव के कारण समुदायों की सामाजिक रूपोखा (फाणी५) अन्तर्क्रियाओं के अनेक पहलुओं को प्रस्तुत करती है, जैसे विभिनन क्षेत्रों, समुदायों व सामाजिक श्रेणियों के मध्य सम्पर्क (॥7:०8८७) व अन्वक्रियाएँ। यह लोगों के एक थेत्र से दूसरे में प्रवजन से भौ प्रदर्शित होता है जिसने द्विभाषावाद (॥॥॥80/79७9४) को बढावा दिया है। 99। की भारत जनगणना ने द्विमाषावाद को लगभग 5 भ्रतिशत बताया है जबकि समुदायों के सर्वेक्षण में इसका 60 प्रतिशत तक अनुमान किया गया है। सांस्कृतिक शेत्रों में भी समानता एवं अन्तृक्निया सास्कृतिक लक्षणों में प्रदरशिव होती है। यह क्षेत्रों (रण) और सीमाओं ((०४४॥0म८७) से परे भी बडी सख्या में समुदायों के लिए भी सत्य ऐै। इस प्रकार के सास्कृतिक लक्षण न केवल सस्कारों और सस्थात्मक प्रधाओं से बल्कि पेशों की प्रौद्योगिकी दक्षताओं और श्रम विभाजन से भी सम्बन्ध हैं। अनेक समुदाय अपने परम्परागत पेशे से हट गए हैं और सरकार द्वारा प्रायोजित विकास कार्यक्रमों के प्रति तीव्र जागृति दर्शाते हैं। उच्च आकाक्षाओं के साथ इस भ्रकार की जागृति सामाजिक व्यवस्था में एक प्रकार का तनाव और सपर्ष पैदा कप्दो है जो हमारे सामाजिक जीवन के अमेक क्षेत्रों में परिलक्षित होती (देखें, जएड:पएब इगएाः "काठ्टया 8009. 50थ00णा गे होता" ह,53600989769 पाए कात #फऊा: 0795 05999 (०९) 7॥6 एछाकाट रेटव८०८०८ 995 22-23)
शिक्षा में विस्तार (0९85९ 40 रिशा८७०णा)
आधुनिक युग में भारतोय समाज ने अपनी शिक्षा व्यवस्था में विस्तार किया है क्योंकि इसे अधिक साक्षर लोग चाहिए। यद्यपि साक्षस्ता का प्रतिशत 95 के 36 प्रतिशत से बढकर 999 में 60 प्रतिशत हो गया है तथापि 33 कप्रेड लोग अभी भी साक्षर बनाने हैं। पुरुष साक्षरता दर अब 70 प्रतिशत पर पहुँच गई है और र्री साथरता दर (4999 के अन्त एक) 50 प्रतिशत हो गई है। राज्यों में साक्षरता दर केरल, मिजोर्म, गोआ, दिल्ली में 75 प्रतिशत से ऊूपर तथा 5 था 6 केन्द्र शासित प्रदेशों में 70 भ्रतिशद से उमर पहुच गई है। 6 राज्यों में साक्षरता 50 से 65 प्रतिशत तक हो गया है। अनुसूचित जातियों में शिक्षित प्रतिशत 37 अ्रतिशत तथा अनुसूचित जनजातियों में 30 प्रतिशत (!99]) तक पहुँच गया है। स्कूलों और कालेजों में पढने वाले छात्रों की सख्या (स्नातक स्तर तक केवल) 97 में 5 48 करोड से बढकर 99] में 846 करोड हो गई है (#/&फ्0#6 7दहिंग् ##द्वव, 998 42-47)।
शिक्षा ने न केवल लोगों की अभिवृत्तियों, विश्वासों, मूल्यों और विचारघागओं में परिवर्तन किया है बल्कि वैयक्तिकता (्रताधवठण४&गा) की भावनाओं को भी भडकाया है।
28 भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य
बढती हुई शिक्षा न केवल सी पुरुषों के जीवन-दर्शन में परिवर्तन करती है बल्कि खियों के जौवन में रोजगार के नये क्षेत्र भी प्रदान करतो है। आर्थिक स्वतत्रता प्राप्त करने के बाद जरिया पारिवारिक मामालों में अधिक दखल (४०४०८) चाहती हैं और किसी के भी प्रभुत्व को अस्वीकार करती हैं. यह दर्शाढा है कि किप्त प्रकार शिक्षा परिवार में सम्बन्धों में परिवर्दन करती है और अन्तत सरचनात्मक परिवर्तन भी आते हैं।
आई पो देसाई और एलिन डी रास ने भो शिक्षा और परिवार के पारस्परिक भ्रभाव के विषय में चर्चा की है। आई पीदेसाई ने सयुक्त परिवार के विरूद्ध शिक्षा की कार्यप्रणाली के दो तरीके बताए हैं. एक, व्यक्तिवाद पर बल देकर शिक्षा लोगों के सामने ऐसे प्रकार के परिवार की रूपरेखा प्रस्तुत करती है जो विद्यमान सयुक्त परिवार की रूपरेखा के विपरीत है, और दूसरा, लोगों को ऐसे व्यवसायों के लिए तैयार करती है जो उनके मूल स्थानों में नही पाये जाते जिसके फलस्वरूप वे पैदूक परिवार से अलप हो जाते हैं और ऐसे क्षेओरों में रहते हैं जहा उनको अपनी शैक्षिक योग्यता के अनुरूप व्यवसाय मिल जाता है। समय के दौरान ये लोग अपने माता पिदा के परिवार से सम्पर्क कम कर देते हैं और रहने (निवास) तथा विचार के ऐसे नये दरीके विकसित कर लेते हैं जो सयुक्त परिवार के लिए घातक पसनु एकल परिवार के लिए साधक होते हैं।
लेकिन देसाई मे महुआ (१४७४४४०) के अपने हो अध्ययन में आश्चर्य से यह पाया कि शैक्षिक स्तर की वृद्धि के साथ साथ सयुकतता में भी वृद्धि हुई और एकलता में कमी आई। देसाई का मठ है कि केवल कुछ लोग ही समाचार पत्र या सामान्य और लोकप्रिय पुस्तकें खरीदते हैं। लोगों के विश्वास और विचार समाचार पत्रों, पत्रिकाओं या विशेष रूप से अग्रेजी की पुस्तकें या सामान्य रूप से पश्चिमी शिक्षा प्रणाली से सीधे प्रभावित नही होते। शिक्षा का जो कुछ भी भ्र्नाव लोगों पर होता है वह मव अभिजात वर्ग तथा घर और स्कूल के वातावरण से ही हो सकता है। अत परिवार के मुखिया का या सारे घर का शिक्षा स्तर नये और भिन्न विचारों और विश्वासों के प्रभाव का सकेत नही होता। यह नये विधारों वाले व्यक्तियों के साथ सम्पर्क पर निर्भर करता है (वही 07)।
हमें देसाई के कथन में कोई तर्क नहीं दिखाई देता। यह सत्य है कि परिवार से बाहर व्यक्ति के सम्पर्कों के प्रकार व्यक्ति की अभिरुचियों और विश्वासों को प्रभावित करते हैं लेकिन उसका अपना ही प्रभाव होता है। दूसरी ओर, परिदार के सदस्यों, का शैक्षिक स्तर व्यक्ति के विचारों और विश्वासों में परिवर्तन का एक अलग ही महत्त्वपूर्ण कारक होता है। इसलिए यह नहीं माना जा सकठा, जैसा कि देसाई मानते हैं,कि परिवार के सदस्यों का शिक्षा का स्वर परिवार के सगठन और सरचना में परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण कारक नहीं है।
इसी प्रकार देसाई का यह निष्कर्ष कि शिक्षा के स्तर में वृद्धि के साथ सयुक्तता में वृद्धि और एकलता में कमी होती है, भी सत्य प्रतीत नहीं होता। सम्भवत उनके निष्कर्ष परिवार के शिक्षा स्तर का पद लगाने के लिए उनके अध्ययन में गलत विधि का प्रयोग के के कारण हों। उन्होंने परिवार की शिक्षा का औसत, परिवार के “न पढने वाले” सदस्यों (अर्थात् वे वयस्क और बडे बच्चे जो और अधिक शिक्षा नहीं प्राप्त कर सकते) के स्कूल जाने के औसत वर्षों की सख्या के आधार पर लिया। इन सभी सदस्यों द्वार स्कूल के वर्षों की औसत सख्या को सदस्यों की सख्या से भाग दे कर परिवार कौ शिक्षा का औसत निकाला
भारतीय समाण का ऐतिहासिक परिदृश्य 29
गया। परिवार के शिक्षा स्तर का पता लगाने की यह विधि निश्चय ही प्रश्न-चिन्ह लगाने योग्य है। यदि उन्होंने अन्य विद्वानों द्वाश आमतौर पर प्रयोग किए जाने वाली विधि का प्रयोग किया होता, तब उन्हें भिन्न परिणाम मिलते। केवल तर्क के लिए यदि यह मान भी लिया जाये कि परिवार के शिक्षा स्तर का पता लगाने की उनको विधि सही थी तो स्नातक शिक्षा प्राप्त परिवारों में सभी एकल परिवार क्यों थे और एक भी परिवार सयुक्त क्यों नहीं था 2 यदि अधिक शिक्षा सयुक्तता की वरीयता दर्शाती ऐ, तब स्तातक परिवाएं में मैट्रिक या गैस्मैट्रिक परिवारों कौ अपेक्षा सयुक्त परिवारों को अधिक सख्या होती। इन तकों के आधार पर परिवार सरचना और शिक्षा के बीच सम्बन्धों के प्रकार के विषय में देसाई के विचार से हम सहमत नहीं हैं। हमारो मान्यता है कि शिक्षा में वृद्धि एकलता के विचार को बढावा देतो है न कि सयुक्तता को।
गस 964) ने कहा है कि मौजूदा व्यवसाय ऐसे हैं कि उन्हें विशिष्ट शिक्षा-दीक्षा और कुशलता की आवश्यकता अपने से ऊचा उठाने के लिए बेटों को उच्च शिक्षा दिलाने हेतु सदेव महत्वाकाक्षी एहते हैं, विशेष रूप से शहरों में प्रध्यम और उच्च परिवासें में | कुछ गरीब माता-पिता इतने महत्वाकाक्षी होते हैं कि वे किसी भी कष्ट, बलिदान और मुसीबत को कौमत पर अपने बेटों को उच्चतम शिक्षा दिलाने को प्रयलशील रहते हैं। कभी कभी तो वे स्वय को ही प्रमुख आवश्यकताओं और सुविधाओं से वचित रखते हैं। ऐसे मामलों में यदि दुर्भाग्यवश उनके बेटे परीक्षा में असफल हो जायें या एक योग्यता स्तर तक न पहुँच पाएँ, तो उनके माता-पिता निराश हो जाते हैं। कुछ ऐसे मामलों में वे अपने बच्चों को भला-बुग भी कहना शुरू कर देते हैं। कभी-कभी यह इतना अधिक हो जाता है कि उनके लड़कों की सफलता भ्राप्त करने की योग्यता और इच्छा ही समाप्त हो जाती है और वे परिवार से नाता वोड लेते हैं। दूससे ओर कुछ ऐसे मादा-पिता भी होते हैं जो अपनी गयैबी के कारण अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति अति महत्वाकाक्षी नहीं होते लेकिन उनके बच्चे अत्यधिक भहत्वाकाध्ी होते हैं। इसलिए ये (बच्चे) अपने माता-पिता को छोडकए भिन्न शहरों या कस्बों में शिक्षा श्राप्त करने चले जाते हैं। आर्थिक रूप से अपनी सहायता स्वय करने के लिए वे ट्यूशन या नौकरी कर लेते हैं। इस प्रकार ये बच्चे धीरे-धीरे अपने परिवारों से नाता तोड लेते हैं। शादी के बाद भी वे शहरों में हो रहना जारी रखदे हैं। इस प्रकार से शिक्षा उनके परिवार को प्रभावित करती है (वही, 208-237) | स्त्रियों के मामले में भी शिक्षित लडकियों का दृष्टिकोण अपने पत्ि, बच्चों व परिवार के प्रति बदल जाता है और वे अपनी रूढिवादी सास से भिड जाती हैं और पृथक घर में रहने पर जोर देती हैं। यह सब परिवार के स्वरूप पर शिक्षा के अभाव को दर्शाता है। जैसे जैसे शिक्षा का स्तर उठता है, एकल परिवाण के पश्षथर लोगों का प्रतिशत भी बढ़ता है तथा सयुक्त परिवार में रहने कौ इच्छा वाले लोगों का अ्तिशत घटता जाता हैं।
वैधानिक उपाय (<टाज8652 'शट्ब॥उ)
वैधानिक उपायों का भी समाज पर प्रभाव पड़ता है। बाल विवाह का निषेघ और बाल विवाह प्रतिबन्ध अधिनियम, 4929, (976 में सशोधित) तथा हिन्दू विवाह अधिनियम, 955 ने शिक्षा के लिए उपलब्ध अवधि बढ़ा दी है तथा विवाह के बाद नये वातावरण में
30 भारतीय समाज का ऐविहासिक प्रिदृरय
दम्पत्तियों के अनुकूलन में कार्यात्मक योगदान दिया है। साथी के चुनाव में स्वतत्रता और विशेष विवाह अधिनियम, 954 के आधार पर एक आयु के बाद माता पिता को अगुप्त्ति के बिना किसी भी जाति व धर्म में विवाह करना, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 856 के अनुसार विधवा पुनर्विवाह की अनुमति, हिन्दू विवाह अधिनियम, 955 के आधार पर किसी भी समय विवाह विच्छेद, तथा हिन्दू उत्ताधिकार अधिनियम, 956 के अनुसार पिठा की सम्त्ति में से पुत्री को हिस्सा देना जैसे कामूनों ने न केवल व्यक्तिगत सम्बन्धों में ओर परिवार रचना में सुधार किया है बल्कि सयुक्त परिवार में स्थायित्व भी प्रदान किया है। उत्तराधिकार अधिनियम, 956, हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 856, सदी पथा निषेध अधिनियम, 987, दहेज निषेध अधिनियम, 96), अनैतिक धन्या निरोधक अधनियम, 956 (छाग' फिर से नाम दिया गया) तथा स्त्रियों के अभद्र प्रदर्शन (निषेध) अधिनियम, 986, आदि इन सभी अधिनियमों ने समाज में स्त्रियों के स्वर की उठाने और उनके अति हिंसा और उनका शोषण रोकने में योगदान किया है। नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम, 955, अस्पृश्यता अधिनियम, 955 तथा अनुसूचित जाति और जन जाति (अत्याचार के विरुद्ध निरोधक) अधिनियम, 989 ने समाज के कमजोर वर्गों का शोषण रोक दिया है। इन अधिनियमों के अलावा, बन्धुआ मजदूर प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 976, बाल श्रम (निषेष और नियमतीकरण) अधिनियम, 986, मानवाधिकार सरक्षण अधिनियम, 993, समान पारिश्रमिक (7८एणा०ा90079) अधिनियम, 976, मुस्लिम महिला (तलाक से सरक्षण का अधिकार अधिनियम 986, ने समाज के अनेक पीडित श्रेणियों को राहत पहुँचायी है।
जाति व्यवस्था में परिवर्तन (एफशआह९ 0 (४५8९ 8३9९0) जा खा में होने वाले परिवर्तनों को चर्चा अध्याय 2 (“सामाजिक स्वरीकरण”) में वी गयी है।
सामाजिक आदोलन और सामाजिक चेतना (80069 '05रगाशा5$ शत $50ठ6॑9ा #ज्षत्नत्शा९५5५)
विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों ने विभिन्न प्रकार के समूहों में अधिकारों के प्रति चेतना जागृत की है। जनजातियों, किसानों, स्त्रियों, और पिछडी जातियों के आन्दोलनों कौ चर्चा “सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण” अध्याय 6 में की गयी है ! यहा हम विशेष रूप से तोन आन्दोलनों--नारीवाद (विशपर5ण), वैश्वीकरण (हात्कबाय्क्ा००ऐ, और जाति विरोधी (३७०७ ८४४८5४७--की चर्चा करेंगे।
नारीवाद (णांपरॉंडण)
3950 तक हमारे समाज में नारी हर प्रकार से पुरुषों के आधीन थी। समाज में उसका अधीनस्थ और द्वैतियक स्थान था। आज स्त्रियां अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गई
हैं। वे समानता के अवसर चाहती हैं और अपनी पहचान अलग से चाहती है। यद्यपि उच्च स्थिति पदों में स्रियों के अनुपात में कुछ वृद्धि हुई है, फिर भी स्त्रियों के श्रति हिंसा की दर
भारतीय सपाज का ऐविद्ापिक परिदृस्य ञञ
बढ रही है। नारोवादी आन्दोलन रियों को अपनी इच्छा की भूमिका निर्वाह के अवसर चाहते हैं। इसमें आश्चर्य नहों कि सामाजिक वैज्ञानिकों, बुद्धेजीवियों और पत्रकारों ने लिग-निसपेक्ष हिल 2 नशा भ्ापा में बोलना शुरू कर दिया हे। रियों की प्राथमिकताएँ, हिल पितृतनत्र के विषय सभी सामाजिक-प्जनैतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गए है। मारीवादी आच्दोलनों ने यह भाव (5०छपशा८०0) विकसित किया है कि राजनैतिक ओर सार्वजनिक जीवन को मुख्य थारा बहुसख्यकों के मूल्यों और अनुभवों से बहुत दूर हो गई है। मारवादी चाप “व्यक्तिगत ग्रजनैतिक है” (॥८८४०७० ७ [०॥ए८०) केवल वैचारिक अभिव्यक्ति नही है बल्कि यह तो सामाजिक परिवर्तन के लिए एक कार्यक्रम है।
वैश्वीकारण (ठकत्रा5त०ा)
वैश्वीकरण एक सामाजिक भ्रक्रिया है जिसमें सामाजिक और सास्कृतिक प्रबन्धों में भौगोलिक बन्धन कम हो जाते हैं और जिसमें लोग अधिकाधिक जाएृव हो जाते हैं कि वे (भौगोलिक बन्यन) कम होते जा रहे हैं (॥/ज००॥ ५४४८६, १0905 3)। इस प्रकार वैश्वीकरण कौ प्रक्रिया में भौतिक दूगे और बाघाएं सामाजिक और सास्कृतिक मामलों में सचाए और विनिमय में कम महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। पचास वर्ष पूर्व ग्रामों से नगरों की ओर गतिशौलवा होती थी, फिर यह शहर और शहर के बीच अधिक हो गई, क्षेत्र से क्षेत्र के बीच बढ़ गई, और अब यह एक देश से दूसरे देश के बीच अधिक हो गई है। हर आदमी जानता है कि आज लोगों दथा वस्तुओं को अतीद वी अपेक्षा अधिक देजी से लाया ले जाया जा सकता है और शब्द तथा सन्देश सारे दुनिया में मिनटों व क्षणों में भेजे जा सकते हैं। पचास वर्ष पूर्व वाणिज्य व्यापार सम्बन्धी सन्देश, या सामाजिक सस्कृति और यहा तक कि राजनैतिक सन्देश भी काफी प्रयल और कई सप्ताह में पहुचते थे, लेकिन आज कुछ हो मिनट लगते हैं। इस प्रकार आर्थिक जीवन, गजनीति, और सस्कृति में समकालीन जीवन में भूमण्डलीबृत आयाम स्पष्ट दिखाई देता है। विविध स्तर पर बढतो हुई अन्तर्क्रिया के साथ हो हए स्तर पर प्रतिक्रिया जल्दी ही होने लगती है। स्थानीय, राज्य, राष्ट्रीय एवं अनर्राष्ट्रीय स्तरों पर परस्पर सहयोग ने कार्यवाही और पहचान को प्रभावित किया है।
भारत में लोगों के बीच वैश्वीकरण के परिणाम अब आर्थिक, राजनैतिक और सास्कृतिक क्षेत्रों भें देखे जाते हैं। आर्थिक प्रभाव व्यापार के रास्तों, व्यापार विकास, आर्थिक स्वतत्रता, विश्व में पूजी के विघ्तृत फैलाव, आदि में दृष्टिगोचर हो रहे है। राजनैतिक परिणाम यह है कि ब्लाक-विप्तृत अर्न्द्त्कतें सश्याए (छो06:-ए्ाते८ फाटा-(0फटएात्तलएए १750/70078) सार्वभौमिक शक्ति और उपस्थिति के साथ विकसित हुई हैं। 'यट्ट-पज्या (7०॥०7-98/6) अब जौवन को बडी समस्याओं के लिए बहुत छोटे रूप में देखे जाते हैं। *ग्रष्ट-णज्यों' ने बड़ी समस्याओं का प्रभावशाली ढंग से सुलझाने के लिए बडो इकाइयों की खातिर कुछ शक्ति कम कर दी है। सक्षेप में, आधुनिक 'राष्ट्रटाज्य' को शक्ति कम हो गई है, भूषण्डलीय संस्थाओं का विकास हुआ है और एक “अतिरिक्त राष्ट्रीय "ज्य' (5एए73-॥007०] 582) का उदय हुआ है। सास्कृतिक परिणाम यह हुआ है कि विश्व स्तर पर एक सामान्य (०००४४०४) सस्कृति का विकास हुआ है। यहा सस्कृति को अधिक सामान्य अर्थों में ग्रयोग किया गया है। इसका अर्थ “जीवन के तरीके' (४ब३ ० रा) से
32 भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य
लगाया गया है। इसमें न केवल आर्थिक, राजनैदिक व सामाजिक ग्रतिमान बल्कि अवकाश (खाली प्रमय) (ा5ण८) और उपभोग (००८ण्णएएणा) भी निहित हैं। फेदरस्टोन (#८४४८०४००८) ने सास्कृतिक वैश्वीकरण का उदाहरण देते हुए भूमण्डलीय वित्तीय बाजार के विकास का उदाहरण दिया है जिसमें प्रमुख कर्मी अनेक व्यापारों और जीवन शैली के अतिमानों और मूल्यों में हिस्सा लेते हैं जैसे, खाली समय और काम में सन्दर्भों के अन्तर्राष्टीय स्वरूप की काम में लाना। उपभोग के कुछ अन्य क्षेत्रों, जैसे 'फास्टफूड' 'विश्व' कारों का भी भूमण्डलीकरण हो चला है। पस्तु सास्कृतिक भूमण्डलीकरण का अर्थ यह नहीं है कि सास्कृतिक अन्तर है ही नहीं (देखें, (७ 0" 7०07८, ०.9 था, 596-97) ।
जातिवाद विरोध (#॥्रप (9लंडण)
जाति शोषण और जातिवाद के विगेध और जाति समानता त्रथा निम्न जाति के लोगों को विशेष अधिकार देने के पश्ष में आन्दोलन हुए हैं। यह आन्दोलन सास्कृतिक तथा सरचनात्मक आयार्मों, दोनों में हुए हैं। सास्कृतिक रूप में, जाति प्रतिबन्धों पर प्रहार करके और सामाजिक आन्दोलनों के यथार्थ को तथा सामाजिक गतिशोलता को स्वीकारते हुए उन्होंने जाति-पूर्वाअहों का विरोध किया है। जातिवाद विगेघ सरचनात्मक पक्ष सस्थाओं के भोतर शक्तिहीनता को बात पर ध्यान आकर्षित करता है, जैसे व्यापार, नौकरी, शिक्षा, विधान, आदि।
उपसहार में यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन की शक्तियों का, जिनका सामना आज का भारत कर रहा है, केवल प्रकार्यात्मक पक्ष ही नही है बल्कि उनका विकार्यात्मक (०॥ए८ा०००) पक्ष भी है। जादि, नृजातीय और स्वार्थी समूहों की राजनीति पर आधारित, सास्कृतिक, राजनैतिक व सामाजिक तनाव जो आज व्याप्त हैं, स्वतत्रद्य के बाद से ही इस प्रक्रिया के अग रहे हैं। आज परिवर्तन का सास्कृतिक पक्ष न केवल दलितों, घार्मिक अल्प सख्यकों और स्त्रियों द्वारा नवीन पहवान की खोज में परिलक्षित हो रहे हैं बल्कि मीडिया द्वार उनकी समस्याओं को उजागर किया जाना महत्त्वपूर्ण हो गया है। जैसे जैसे विकास कार्यक्रम गति पकडते हैं, बैसे सामाजिक असमानठाओं का उतना ही तौब होता आवश्यक हो जाता है। इन मामलों पर मीडिया की रिपोर्ट के साथ ही असमानवाओं की अभिव्यक्ति खतरनाक रूप से परिवर्तन की दिशा धारण कर लेवी है जिसका परिणाम विविध अ्रकार की चम्म परिणितियों (७ताटाा57७) में होता है।
2
सामाजिक स्तरीकरण
($०लंडो 8|त्य्रपंरिस्था0एा)
जाति व्यवस्था और सामाजिक स्तरीकरण (९३६९ 8॥छशा। भा0 5029 5060०)
समाज इस प्रकार श्रेणीक्रम समूहों में विभाजित हैं कि यधपरि विविध समूह परस्पर सम्बन्धों में असमान समझे जाते हैं लेकिन एक ही 85 हू के सदस्य समान माने जाते हैं। सामाजिक स्त॒रीकएण के दो प्रमुख आधार जाति और वर्ण है,लेकिन कुछ अन्य मान्य आधार आयु, लिंग, प्रजादीय/नृजातीय भी हैं। सामाजिक स्तरीकरण साप्राजिक विभेदीकरण से भिन्म है। “विभेदीकरण व्यापक अर्थ में प्रयोग होता है क्योंकि यह तुलना के उद्देश्य से व्यक्तियों और समूहों को एक दूसरे से अलग और स्पष्ट करता है । उदाहण्णार्थ वर्ग के भीतर ही आय (उच्च, मध्यम और निम्न) व्यवसाय (उच्च स्थिति वाला और निम्न स्थिति वाला) और शिक्षा (उच्च स्वर, मध्य स्तर और निम्न स्तर, तुलना और विभेदोकरण का आधार प्रदान करते हैं। स्तगीकरण तब होता है जब भेद श्रेणीबद्ध क्रम में अंकिव किए जाते हैं।
जाति : एक इकाई (समूह) और व्यवस्था के रूप मे ((०७६ ३ #७ 8 एग्ां[ (हुए00फ) 9एते 8 599 0ग्र)
भारत पें जाति और वर्ग श्रेणीबद्ध क्रम के आधार के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। परन्तु जाति को, जो धार्मिक विश्वास में आवद्ध है, स्तरीकरण के साप्ताजिक, आर्थिक और धार्मिक उद्देश्यों के लिए महत्वपूर्ण आधाए माना जादा है। 'जाति/ एक आनुवाशिक सामाजिक समूह है जो अपने सदस्यों को सामाजिक गठिशौलता (यानी सामाजिक प्रस्थिति बदलने) कौ अनुमति प्रदान नही करती | इसमें जन्म के अनुसार प्रस्थिति अथवा श्रेणी निर्धारित होती हे जो व्यक्ति के व्यवसाय, विवाह, और सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करती है।
जाति एक इकाई (समूह) और व्यवस्था दोनों ही रूप में अयोग होती है। इकाई के रूप में जाति एक 'बन्द-क्रम (८०६८०) प्रस्थिति समूह' होती है, अर्थात् एक ऐसा समूह जिसमें सदस्यों को प्रस्थिति, उनका पेशा, जीवनसाथी के चयन का क्षेत्र, तथा दूसरों के साथ अन्तक्रिया, आदि निश्चित होते हैं। व्यवस्था के रूप में, जाति का अर्थ 'प्रतिबन्धों कौ सामूहिकता, (००१८८४पं/)) से होता है, जैसे सदस्यता परिवर्तन, व्यवसाय, विवाह और सहभोज तथा सामाजिक सम्बन्ध आदि पर प्रतिबन्ध | इस सन्दर्भ में एक पूर्वधारणा यह है कि कोई भी जाति पृथक नहीं रह सकती अथवा प्रत्येक जाति दूसरे जातियों से आर्थिक,
ठ4 सामाजिक स्तर्ीकरण
राजनैतिक और सस्वार सम्बन्धों (709॥50८ 7297००७) के जाल में जुडो हुई है।
जाति. म्ाचनात्यक और सास्कृतिक अवधारणाएँ (९०5४४ : $एलाए आए (एज! (०7०5)
जाति को सरचनात्मक तथा सास्कृतिक सदभों में देखा जाता है। सरचनात्मक आधार पर यह अन्त सम्बद्ध प्रस्थितियों, विविध निषेधों के आधार पर जातियों के बोच प्रतिमानित (7०(०:०८०) अन्त्क्रिया, और सामाजिक सम्बन्धों के एक स्थाई स्वरूप (॥306 5८0) कौ ओर सकेत करतों है। सास्कृतिक आधार पर इसको मूल्यों, विश्वासों और प्रथाओं वी व्यवस्था के रूप में देखा जाता है! अधिकतर विद्वानों ने जाति को एकात्मकता (50069) के रूप में देखा है,न कि मूल्यों और अभिवृत्तियों की सामूहिंकता के रूप में | जाति व्यवस्था को सरचना ऐसी है कि इसमें प्रस्थितियों, भूमिकाओं और सामाजिक प्रत्तिमानों के सदर्भ में प्रत्येक जाति के सदस्यों की, और प्रत्येक जाति को एक ममूह के रूप में भी, एक परसर सम्बन्ध अधिवारों और दायित्वें| की सुर्गाठत व्यवस्था (छ६80७९० ७४७७७) मिलती है। सरचनात्मक अर्थ में बृगिल (800९८, 958 9) ने जाति को “आनुवाशिक रूप से विशिष्ट (६9६८०॥५००) और श्रेणीक्रम में व्यवस्थित (८-ब्लांट्थीए ग्रा308०0) समूह कहा है, जबकि व्यवस्था के रूप में उन्होंने इसके तीन लक्षणों की व्याख्या बी है : श्रेणीक्रम, आनुवाशिक विशिष्टीकरण, और विकर्षण (-धएणं००) | अन्तिम लक्षण वी व्याख्या करते हुए उसने दावा किया है कि विभिन्न जातिया परस्पर आरक्षण (#एथ्ट) वी अपेक्षा प्रतिकर्षण (#धकृथ्ट) करती हैं। यह विकर्षण अन्तर्विवाह, सहभोज निषेषों, और सामाजिक सम्पर्कों में प्रकट होते हैं। परन्तु यह व्याख्या सत्य नहीं है। जातियों के बीच प्रतिकर्षण न तो दिखाई देता है और न ही देखा जा सकता है क्योंकि उन्हें (जातियों को) एक दूसरे की आवश्यकता होती है। कैथलोन गफ़ (696८७ 000, ए [,28०0, 960: ) जाति को पदक्रम जन्म प्रस्थिति (80:28 ७॥0-990०७) समूह कहती है जो प्राय अन्तर्विवाही (८०००६०००७७) होते हैं और एक व्यवसाय से जुडाव रखते हैं"। सेनार्ट (5०००, 930) ने जाति को एक “ऐसा बन्द सघ (०»0०:४००४) कहा है जो आनुवाशिक दूसरी जातियों के माथ एक से पेशे से सम्बन्धित, तथा एक परिषद् (००७७०) से सचालित होता है जो अपने सदस्यों पर दण्ड द्वारा नियत्रण रखता है।” इस परिभाषा में “बद संघ” पर प्रश्न चिन्ह लगाया गया है। इसके अतिरिक्त, सभो जातियों में परिषद (पंचायत) नही होती | बेली (89॥८9) और श्रीनिवास ने जाति को 'सरचना' के रूप में माना है और जाति की परिभाषा नहीं दी है। एनकेदत्त (च६ 00॥, 937. 3-4) ने जावि व्यवस्था का वर्णन करदे हुए इसके द्वारा विवाह, खानपान, व्यवसाय व आनुवाशिक सदस्यता में परिवर्तन पर प्रतिबन्ध की चर्चा को है। इसके साथ उसने जातियों के श्रेणीक्रम में वर्गीकरण की बात भी कही है। ओपलर भारिप्त (0डञौद्व 'जैणागा5, 7950.. 284) मानता है कि जादि की छोटी सी परिभाषा सन्तोषजनक नहीं है,इसलिए जाति के लक्षण बताना ही अधिक प्रभावी है। उसने जाति व्यव था के तौन मुख लक्षण बतारे हैं आनुवाशिक सदस्यता, अन्तर्विवाह, तथा सामाजिक अन्तक्रिया को नियमित करने वाले प्रतिमान। (50ए९४४, 957 * 2-9) भी जाति व्यवस्था की ऐसी हो विशेषताए बताई है। आनुवाशिक सदस्यता के अतिरिकत,
सामाजिक स्तरोकरण 35
जाति पचायत, श्रेणीक्रम, और अन्वर्विवाह जैसे लक्षण बताते हुए उसने भोजन व सामाजिक अन्तक्रिया पर प्रतिबन्ध, व्यवसाय के असीमित चयन की कमी, और नागरिक (घी) तथा धार्मिक निर्योग्यवाओं की ओर भी सकेव किया है। विक्टा डिसूजा (जलता ]0'80729,7969 * 72) ने जाति व्यवस्था की परिभाषा के सन्दर्भ में कहा है कि “जाति व्यवस्था उन आनुवाशिक सपूहों का प्रस्थिति श्रेणीक्रम (#शण् प्र अण७) को सरचना पें एकीकरण (70267०0०॥) है जो आपस्ती सबधों में हो विपमागी (द60207075) परन्तु आतरिक रूप से वे समरूप (#०7१०९०४०७) हैं। यह अवधारणा जाति व्यवस्था को समाज में आनुवांशिक समूहों के बौच श्रेष्ठ या आधीन सम्बन्ध बताती है तथा उन दशाओं का वर्णन भो करतो है जिनमें ऐसे सम्बन्ध स्थापित होते हैं।
योगेद्ध सिंह 0974 39) मानते हैं कि सरवनात्मक रूप से जाति व्यवस्था दो अ्रवृत्तिया (ध0८०८ं८७) एक साथ प्रदर्शित करती है : एक खण्डों में विभकत ($६हपा०णाव) और दूसरी समन्वित (०९०यंट) | खण्डित यथार्थ के रूप में प्रत्येक जाति या उप-जाति परस्पर विकर्षण (70॥ए० 7०७9७)$079), सामाजिक दूरी व सामाजिक असमानता को दर्शाती है, किन्तु एक समन्वित व्यवस्था के रूप में जाति खण्ड (६०७७९८८७) जजमानी प्रथा के माध्यम से पारस्परिकता के सिद्धान्त द्वारा आपस में जुडे हुए होते हैं। बेली (820८9) ने जाति स्तरैकरण के सन्दर्भ में कहा है कि यह “बन्द सम्रन्वित स्तरीकरण” है और इसके विपरीत वर्ग “खण्डित स्तरीकरण” है। जाति व्यवस्था में सामाजिक खण्ड (जातिया व उपजातिया) सहयोग के माध्यम से अन्तर्क्रिया काते हैं और वर्ग व्यवस्था में प्रतियोगिता के माध्यम से करते हैं।
जाति - अध्ययन के तीन पश्िध्षय (09७६ ; 7६९ एश5००/१६५ ८ 800))
भारत में जाति व्यवस्था का अध्ययन तोन परिभरक्ष्यों में किया गया है * भारतशाज्रीय (0०0०/०झ८०), सामाजिक-मानवशास््रोय, और समाजशाख्लीय। भारतशास्त्रीय विद्वानों ने जाति को धर्मप्रथ सबधी (5८४.५07४) दृष्टिकोण से, मानवशारित्रयों ने सस्कृति दृष्टिकोण से, और समाजशास्त्रियों ने सामाजिक स्तगीकरण की दृष्टि से देखा है।
भाराख्रीय परिप्रेक्ष्य में जाति व्यवस्था की उत्पत्ति, उद्देश्य और भविष्य आदि के अध्ययन के लिए धर्मगरन्थों को आधार बनाया गया है। जिन्होंने इस परिमेक्ष्य का प्रयोग किया है उनका मानना है कि वर्णों को उत्पति बह्मा के शरीर से हुईं और जातिया वर्ण व्यवप्तधा में विखडित इकाइया (ह5०ए४ ७मजे हैं जिनका विकास अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरूप हुआ। यद्यपि विविध जातियों द्वारा माने जाने वाले रीति रिवाज 200.00 80 में लिखी गयी स्मृत्ियों में विहित (97०5०:9००) हैं परन्तु क्षेत्रीय, भाषायी, नृजातीय (८४४०0 और फ्रिकापरस्त (5८८४ांब्य) भिलताए धीरे-धीरे जाति सम्बन्धों को प्रभावित करती रही | भाग्तशारियों के अनुसार जातियों की उत्पत्ति श्रम विभाजन के उद्देश्य से हुई। धीरे-धीरे जातिया अधिक कठोर होती गईं तथा सदस्यता और व्यवसाय आनुवाशिक हो गए। जाति व्यवस्था में कठोरता कर्म” और “धर्म” में विश्वास का परिणाम है जिसका अर्थ है कि धर्म हो जाति परम्पराओं व नीतियों के लिए प्रेरक शक्ति (गरणारभाणड एफ) था। भाएशाप्तों यह भी कहते हैं कि क्योंकि जातिया दैवोय (0:४४6) हैं, अत वे भविष्य
36 सामाजिक स्तरकरण
में भी जारी रहेंगी (/&एा9, 972 59) |
स्ास्कृतिक परिमिक्ष्य को मानवश्ास्तियों ने (व्णाणा, उरााहछ, ॥#70&0८7) तीन दिशाओं में विभक्त किया है सरचनात्मक, सस्थात्मक तथा सम्बन्धात्मक। सरचनात्मक दृष्टिकोण जाति व्यवस्था को उत्पत्ति, विकास और सरचना में परिवर्तन को म्रक्रिया पर केन्द्रित है । संस्थात्मक (750(700४०)) दृष्टिकोण (7८४ ॥099) के अनुसार जाति व्यवस्था केवल भारत में ही पाई जाने वाली अनोखी व्यवस्था नही है, बल्कि यह अमरीका आदि में भौ पाई जाती है। सम्बन्धात्मक (८७७०७) दृष्टिकोण के अनुसार जाति स्थितियाँ सैन्य बलों, व्यापार, फैक्टरी, प्रबन्धन, राजनीति, आदि में भी देखी जा सकती है। इन संगठनों में जाति व्यवस्था तब कमजोर होती है जब गतिशीलठा सामान्य होठी है और तब टृढ होती है जब इसमें रुकावट हो ।
समाजशास्रीय दृष्टिकोण जाति व्यवस्था को सामाजिक असमानत्ा के रूप में देखता है। समाज के कुछ सरचनात्मक पक्ष होते हैं जो सदस्यों को विविध सामाजिक स्थितियों में विभाजित कर देते हैं।
तीन विविध प्रस्निक्ष्यों के सन्दर्भ का यह अर्थ नहीं है कि समाजशास्त्री, भारतशास्त्रियों और मानवशारिबयों की भाँति जाति व्यवस्था की उत्पत्ति एव विकास में रुचि नहीं रखते, या कि मानवशाश्तियों को समाजशाझ्लियों की भाँति जाति व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण के परिणाम के रूप में स्वीकार्य नही है।
जाति और वर्ण, उपजाति और वर्ग (७6 ब0व धान, 5909-९७६&९ 9॥6 (0॥355)
जाति और वर्ण (८5९ क्ा्व 74)
जाति और वर्ण दो भिन्न अवधारणाएँ हैं। सामाजिक सगठन का हिन्दू सिद्धान्त वर्णाश्रम संगठन के सन्दर्भ में ही है, जहाँ वर्ण और आश्रम संगठन दो अलग संगठनों के रूप में माने जादे हैं। आश्रम सगठन ससार में व्यक्ति के व्यवहार को जीवन की विविध अवस्थाओं में इंगित करता है, जबकि वर्ण सगठन उस कार्य से सम्बद्ध है जो व्यक्ति समाज में अपनी स्थिति (9090०४) के अनुकूल तथा अपने जन्मज्यत स्वभाव व अपनी प्रवृत्तियों और भरकृति के अनुसार करेगा। यद्यपि ऋग्वेद में दो वर्णों का ही उल्लेख है--आर्य और दास--और समाज के विभाजन का उल्लेख तीन क्रमों में है-- ब्रहम् (पुरोहित), क्षत्र (योद्धा) और विस (सामान्यजन)-लेकिन चौथे क्रम अर्थात शृद्र का कही भी उल्लेख नहीं है, यद्यपि आर्यों द्वा घृणा किए जाने वाले समूहों का सन्दर्भ आता है, जैसे अयोग्य, चाण्डाल, और निषाद, आदि। ये चार क्रम अन्तव चार वर्ण हो गए। वैदिक काल में उच्च या निम्न वर्ण जैसा कुछ नहीं था। समाज का चार वर्णों में विभाजन-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र श्रम विभाजन पर आधारित था। प्रत्येक वर्ण के सदस्य अलग-अलग कार्य करते थे (क्रमश पुजारी का, शासक व योद्धा का, व्यापार का और सेवाओं का), विभिन देवी देवताओं की पूजा करते थे और विविष-सस्कारों का पालन करते थे, लेकिन सह-भोज या सामाजिक सम्बन्धों या एक वर्ण से दूसरे वर्ण में परिवर्तन पर कोई भ्रतिबन्ध नहीं थे। बाद में, जैसे-जैसे हम वैदिक काल (000-000 ४80) से ब्राह्मण काल 050 8८ से 700 ४70 ) तक चलते है, ये चारों वर्ण
सामाजिक स्तरीकरण अञऊ
श्रेणीक्रम में व्यवस्थित होते चले गए और ब्राह्मण सर्वोच्च शिखर पर एहे। एक दृष्टिकोण के अनुसार वर्ण का अर्थ होता है रण, और शायद इस्ोलिए समाज का विभाजन गेरे और काले राग के आधाए पर हो गया। हट्न (8७००, 963 .66) का विश्वास है कि यह सम्भव है कि यह एग-भेद काफी भात्रा में प्रजाति (9००) से सम्बद्ध है। होकार्ट (प्र०८आ॥,॥950 46) के अनुप्तार रा का सास्कारिक (कर्मकाडी) (70४0०) महत्त्व है न कि प्रजातीय (#ब्टाओ) ।
वर्णों की उत्पत्ति की भांति ही जातियों की उत्पत्ति को भी रिजले, घूर्ये, मजमूदार, आदि जैसे विद्वानों द्वारा प्रजातीय अर्थों में व्याख्या की गई है किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि जातिया वर्णों के उप-भाग (&09-ठाश७075) हैं। जातियों की उत्पत्ति का बर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। जातियों का श्रेणीक्रम और जाति की गतिशीलता वर्ण के सदर्भ में ही प्रयोग होने लगी। इस प्रकार वर्ण ने एक ऐसी छपरेखा (57:४०: अस्तुत कर दी जिसमें जाति के प्रति सभी भारतीय विचार और सभी प्रतिक्रियाएं उसी में सम्मिलित हो गईं (पर50, 963 96) । श्रीनिवास में 962.69) भी यह कहा है कि वर्ण मे एक सामान्य साम्राजिक भाषा प्रदान की है जो सम्पूर्ण भारत के लिए सही है, अर्थात् इसने एक सरल और स्पष्ट योजना अदान कर के सामान्य ख्री पुरुषों को जाति श्रथा समझने और अपनाने के योग्य बना दिया है जो भारत के सभी भागों में लागू है। उसने यह भी माना है कि वर्ण व्यवस्था का महत्व इस बात में निहित है कि इसने अखिल भारतीय स्तर पर एक ढाचा (770) प्रदान किया है जिसमें निम्न जातियों ने सदैव उच्च जातियों के रीति रिवाजों को अपना कर अपनी प्रस्थिति को ऊवा काने का प्रयल किया है। इससे समस्त हिन्दू समाज में समान सस्कृति के विस्तार में सहायता मिली है।
जाति और उप जाति (2७७(६ 70 800-09४९)
जाति और उपजाति के बीच अन्तर स्पष्ट नही है क्योंकि दोनों के समान लक्षण हैं। एक उपनजाति जावि का हो उप विभाजन है। 'ब्राह्मण' वर्ण और जाति दोनों में हो पदासीन हैं। कान्यकुब्ज, सग्यूपातैण और गौड ब्राह्मण जाति के उदाहरण हैं, और श्रीमाली, पुरोहित और पुष्कर्ण ब्राह्मण उपजातियों के उदाहरण हैं, जबकि भारद्वाज, गौतम और कश्यप ब्राह्मण गोत्र हैं। जातिया और उप-जातिया अन्तर्विवाहों समूह हैं लेकिन गोत्र बढिविवाही समूह हैं। उप-जातियों की उत्पत्ति के विषय में दो दृष्टिकोण हैं : प्रथम कि उनका एक ही समूह के विखण्डन से उदय हुआ, और दूसग कि उनका उदय स्वतत्र समूहों के रूप में हुआ (५ (2. %9965 960 : १०ह०७४ 204, 4968, [73एज॥ ॥(३४९, 7958, (४३णाश, 8 7, 968 :44) । घूर्ये के अनुसार (957 34) उपरजातियों का जातियों में प्रभेद निम्न कारकों के आधार पर किया गया - क्षेत्रीय पृथकता, मिश्रित उत्पत्ति, व्यावसायिक श्रेष्ठता, व्यावसायिक अविधि (६८४ँ५०८) में अन्तर, रीति रिकाज़ों में असमानता, और उपनाम का अपनना। रिजले (95), हृद्नन 96 : 55) और मजूपदार (958 -357) ने उपजाति को मुख्य जाति से अपनी भ्रस्थिति को उठाने के लिए टूटने का परिणाम कहा है। बो आर चौहान (968 45) ने माना है कि विखण्डन के कारण उपजाति का जन्म प्रव्रजन, रिवाजों के परिवर्तन, राजनैतिक
38 सामाजिक स्त्करण
लिर्षयों आदि कारवों के प्रकाश में समझाया जा सकता है | क्रिकपैटिक (एमंलकुअमंप 92) ने कहा है कि उपजातियों, जो जातियों से विखण्डित समूह हैं, प्रास्म्प में प्रदजन (प्मह्टाआाणा) तथा सामाजिक व राजनैतिक कारकों के परिणाम स्वरूप अख्ित्व में आई लेकिन आज वे कसी घृणित जाति में ममृद्ध व्यक्तियों द्वारा अपने निम्न जातीय भाइयों से अलग होकर नये नाम से सामाजिक पैमाने में अपने को ठठाने और अपने को किसो उच्च जाति से सम्बद्ध करने के प्रयलों के फलस्वरूप अस्तित्व में आ रही हैं। आदर बेतेई (#जअ८ छलथा।८) (965) ने एक जाति द्वार अनेक उपजातियों को अपने अर्न्तगत मिलाने तथा जाति के बार्यों में विविध घुवना (50१७ एए७7७) को प्रकाशित किया है।
आज जातियों और उप जातियों के विविध कार्य (97८00॥) और क्रियाकलाप (००/श॥८३) हैं। उपजातियों ड्वाग किए जाने वाले तीन कार्य हैं. विवाहों का नियंत्रण करा, सहभोज मम्बन्धों का प्रतिबन्ध, और एक वृहत समाज के भोतर ही रहन-सहन के अर्थ में साम्प्रदायिक जीवन या व्यवह्वर को सचालित करना। जातियों के तीन कार्य हैं * प्रस्थिति प्रदाव करना, नागरिक और धार्मिक अधिकारों की सीमाओं को समाप्त करना, और व्यवप्ताय का निर्धारण करना। इन विशेषताओं के सन्दर्भ में घूर्ये 0957 -9) ने माना है कि "हमें उपजातियों को ही वास्तविक जातियों बी मान्तया देनी चाहिए” । एमी मेयर (१७४३, 960
5]) ने भी जाति से उपजाति को मान्यता देने की आवश्यक्ता के विषय में कहा है। उसने
घूरें के जाति के सन्दर्भ को समाज के लिए सार्थक और उपजाति को व्यक्ति के सन्दर्ष में सार्थक माना है। एक ही जाहिं के भीतर सदस्यों के सन्दर्भ में उसने माना है कि उपजाति उनके लिए अधिक सार्थक है, जबकि अन्य जाति के सदस्यों के सन्दर्भ में उसका विचार है कि जाति पहचान का मुख्य बिन्दु है। इस प्रकार उसका विचार है कि एक दूसरे से अधिक सथार्थ नं बन कर जाति और उपजाति सह अस्तित्व बनाये रख सकती हैं।
जाति व्यवस्था को इकाई क्या है 2 क्या यह जाति है था उपजाति 2? श्रीनिवास (952 24) वा मत है कि 'उपजाति' ही जाति व्यवस्था की “वास्तविक” इकाई है। परनु अपने अध्ययन में (कर्नाटक राज्य के मैसूर प्रदेश में रामपुर गाँव में) उसने जाहि को ही केन्द्र-बिन्दु माना था। मेयर (9608) के अनुसार क्षेत्रीय (८09) स्तर पर उपजातिं अन्तर्जादीय तथा अन्त जातीय सम्बन्धों की इबाई हो सकती है। लेकिन गाँव के भीतर अना्जार्तीय सम्बन्ध उपजाति के बजाय जातियों के सदर्भ में देखे जाते हैं। इरावती कवें (938 33) उपजातियों को विश्लेषण की 'अन्तिम इकाइया' मानती हैं। घूर्ये (950 : 20) की मान्यता है कि आमत्तौर पर जाति ही अधिकतर समाज के द्वारा मान्यता प्राप्त होती है लेकिन एक विशेष जाति या व्यक्तियों द्वार उपजाति ही अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए हमें उपजाति को ही जाति संस्था के समाजशास्द्रीय रूप में सही दृष्टिकोण जाते के लिए यान्यवा देनी चाहिए। स्टीवेन्सन (8$00६४०७००, 7954) के अनुसार जावि और उपजाति की अवधारणाओं में भ्रम रोने के कारण अच्छा दो यह है कि इन दोनों के बीच के अलए दी उपेक्षा कर दी जाये। लेकिन ऐसा नहीं क्या जा सकता क्योंकि दोनों के कार्य अलग-अतग हैं।
सामाजिक स्तरोकरण 3प्र
जाति और वाई (0४5६ गात (759)
जाति और वर्ग, मैक्स वेबए के अनुसार, दोनों हो 'प्रस्थिति-सपूह' हैं। प्रस्थिति समूह उन व्यक्तियों का समूह है जिनकी एक जैसी जीवन शैली होती है और जो एक हो प्रकार की चेतना अभिव्यक्त करते हैं। जहा जाति को एक निर्धारित सास्कारिक (॥ए8॥500) प्रष्थिति वाला आनुवाशिक समूह समझा जाता है वही सामाजिक वर्ग ऐसे लोगों की श्रेणी होती है जिनकी अपने सम्प्रदाय या समाज में अन्य खण्डों (६८४८४) के साथ सम्बन्धों के अर्थ में समान सामाजिक-आर्थिक भस्थिति होती है। व्यक्ति और परिवार जो एक सामाजिक वर्ग जनाते हैं शैक्षिक, आर्थिक और प्रत्तिष्ठा प्रस्थिति में सापेक्ष रूप से समान होते हैं। वे जो एक ही सामाजिक वर्ग के रूप में वर्भीकृत हैं उनको जीवन के एक-समान अवसर प्राप्त होते हैं। कुछ समाजशास्त्री सामाजिक वर्गों को प्रकृति में प्रमुख रूप से आर्थिक मानते हैं जबकि कुछ अन्य विद्वान दूसरे कारकों पर बल देते हैं, जैसे अतिष्ठा, जीवन शैलो, अभिवृत्तियाँ, आदि। जाति व्यवस्था की विशेषता सचिव असमानता' (८४क्रण३४६८ ॥7८५००!४३) है, लेकिन वर्ग व्यवस्था कौ विशेषता 'विकीर्ण ((५७८६००) असमानवा, है। एक वर्ग के सदस्यों कौ समाज में अन्य वर्णों के साथ एक समान सापाजिक-आर्थिक प्रस्थिति होती है, जदकि जाति के सदस्य अन्य जातियों के साथ उच्च या निम्न प्रस्थिति अनुभव करते है। जाति भारत में पाई जाने वालो अनोखी व्यवस्था है ([.८४०७ ७7७ 70ल्20०४0 लेकिन वर्ग विश्वध्यापी सार्व भौमिक घटना है । जाति गाव में एक सक्रिय राजनेतिक शक्ति के रूप में काम करती है न कि वर्ग के रूप में | आद्रे बेतेई ने दक्षिण भारत में श्रीपुरम में जाति और वर्ग के अध्ययन में पाया कि साम्प्रदायिक और राजबैतिक कार्यवाही के लिए वर्ग आघार मही होता। इस सन्दर्भ में लीच ([960) ने कहा है कि जब जाति आर्थिक और राजनैतिक कार्य करती है और दूसरी जातियों के साथ प्रतिस्पर्षा करती है तो यह जाति सिद्धान्तों की पण्वाह नहीं करती । गफ़ और रिचर्ड फाक्स (50ए.॥ 2४0 ॥20080 ए09) ने भी यही स्थिति मानी है। परन्तु एमएन श्रीनिवास (972 7) लौच के साथ इस बिन्दु पर सहमत नही है। उनकी मान्यता है कि जातियों के भीतर प्रतिस्पर्धा को जाति सिद्धान्तों कौ परवाह न करना नहीं कहा जा सकता। यह सत्य है कि जातियों एक दूसरे पर निर्भर हैं (यजमानी ज्धा) लेकिन इस अन्तर्तिभर्ता के साथ जातिया यजमैतिक और आर्थिक शक्ति वा सास्कारिक प्रस्थिति प्त करने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करती हैं। जाति और वर्ग के बौच एक और अन्तर पह है कि जाति की समन्वित (०290०) विशेषता होती है लेकिन वर्ण खण्डों (४८४४४८४॥७) में बैंटा होता है। जाति व्यवस्था में उच्च जातिया निम्न जातियों की सेवाओं के लिए आपस में स्पा करतो हैं लेकिन वर्ग व्यवस्था में निम्म वर्ग उच्च वर्ग का सरक्षण प्राप्त करने के लिए परस्पर अिस्पर्धा करते हैं (८७०७ 960 : 5-6) | जाति व्यवस्था में किसी जाति की प्रस्थिति आधिक व राजनैतिक विशेषाधिकारों से निर्धारित नहीं होती बल्कि सता की कर्मकाडी (#एथ) वैधानिकता से होठी है, अर्थात् जाति व्यवस्था में कर्मकाड़ी प्रतिमान शक्ति और घन के प्रतिमानों को परिधि में रही होते हैं (0७%०४९ । उदाहरणार्थ, यद्यपि ब्राह्मणों के पास आर्थिक या राजनैतिक शक्ति नही होती, फिर भी जाति श्रेणीक्रम में उनका स्थान सर्वोपरि होटा है। वर्ण व्यवस्था में कर्मकाडी प्रतिमानों (छाएव मण्या७) का कोई
की सामाजिक स्तरकाण
महत्व नही होता बल्कि शक्ति और घन ही व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धाण करते हैं। बेल ड्यूमात्ट के कथन प्ले सहमत नहीं है कि आर्थिक मूल्यों के बजाय धार्मिक विचार प्रत्येक जाति के क्रम को स्थापित करते हैं। वे कहते हैं कि यदि हम इस कथन को स्वीकार वर तें तो इसका अथ होगा कि आधिक ससाधर्नों पर नियत्रण में परिवर्तन क्रम (६8900 में पत्िर्दी किये बिता हो सकते हैं। यह केवल आशिक सत्य है। ब्राह्मणों और अस्पृश्यों के लिए या सत्य हो सकता है लेकिन मध्य जातियों के लिए नहीं। बिस्सीपाण (99०9) में अपने अध्यपन में 957 264-65) उसने पाया कि धन में परिवर्तन से क्रम (६200 में परिवर्त आ जावा है। अन्त में, सामाजिक गतिशीलता जाति व्यवस्था में सम्भ्रव नही है लेकिन वर्ग व्यवस्था में प्रस्थिति परिवर्दन सम्भव है। डीएन मजूमदार (958) ने इस सन्दर्भ में जाति को बन्द वर्ग के रूप में समझाया है। एमएन श्रीनिवास ने इस विचार को स्वीकार नहीं किया है। वह मानवा है (962 42) कि गतिशीलठा केवल स्स्कृतीकरण और पश्चिमौकरण को प्रक्रियओं से ही सम्भव है। आन्द्रे बेतेई (965) ने भी कहा है कि कोई भी सामाजिक व्यवस्था पूर्णः्पेण बन्द नहीं होती। वैकल्पिक समन्वय के लिए थोडा ही भले हो लेकिन विस्तार की गुजाइयश होती है।
गैर-हिुओ में जाति व्यवस्था (089९ 5)#0ा। #ण०णाड़ ि०्घनी॥05)
क्या जाति विशिष्ट (|&70९४/आ75॥0) या सार्वभौमिक (एग्ाए८75थ5७८) घटना है. ? वया यह अनोखी व्यवस्था केवल भारत में ही पाई जाती है या यह अन्य देशों में भी पाई जाती है ? मुख्य विचार यह है कि जाति को जब सास्कृतिक घटना (विचारधारा या मूल्य व्यवस्था) के रूप में देखा जाता है दो यह केवल भारद में ही पाई जादी है और जब सरचनात्मक घटना के रुप में देखा जाता है तो यह अन्य समाजों में भी पाई जाती है।
स्वदत्रता से पूर्व जनगणना आयुक्तों ने भारत में (वर्तमान पाकिस्तान सहित) जाति को तरह की अनर्विदाही समूझें और गैर-हिन्दुओं में व्यावसायिक विशिष्टीकरण होने की रिपोर्ट दी थी। एनके बोस के अनुसार (949 957) हिन्दुत्व से परिवर्तित मुघ्लिम लोग भी जाति आरूप में अन्तर्विवाह और आनुवाशिक परम्परागत व्यवसाय को हो अपनाए हुए थे क्योंकि वे इसमें आर्थिक सुरक्षा का अनुभव करते थे। 956 और 965 के बीच आरणुप्ता द्वारा 4956 में (त्ती पश्चिमी उनरप्रदेश के एक गाव के मुस्लिमों में), जी अनसारी द्वाग 960 में (१॥४७॥७॥ (०७६८५ ॥ 0 ?), अहमद द्वार 962 में (00 |शफ्राक्ता एक्राक ४ 09), एम के सिद्दीकी द्वाय 970 में (29७6 4० वैवफाफाड ण॑ एब्रोट्णाशे, गुहय द्वाय 97 में (एफ! छलाहुआा ध०कावा5), साग्रे द्वात 959 में (छा 787७, आईपी पिंह द्वारा 958 में (सिखों परी, शिफरा स्ट्राहिजोणर (5७८४० 58८20ए७7) गे 4959 मैं (८७७ परी, और मैकिम मेरियट (४८6८ प्ब्ा०0) द्वारा 4960 के दशक में किए गये अध्ययनों से गैरूहिन्दुओं में जाति प्रथा के प्रचलन का सकेव मिलता है (देखें $णश्ुर८ जाग, “(बञ्नद ग 7647, 0558 एटफुणा ता 4 आशा मै रिक्षक्ाएँ: मा इठबागंग्छ गाव उत्दव अवधीएंग्ढए, 974... 243) । डयूमान्ट, लीच, पोकाक, और यो एनमदान ने भारतोय सभ्यता के बाहर के लोगों का अध्ययन किया और उममें जाति
सामाजिक स्तरीकरण बा
की सामाजिक सरचना के लक्षण पाये। लीच ने अपने अध्ययन (87८८४ ता (४४6 व इ0ण9 वग08, 00)0॥ भाव 'ए०धा। १४८६: 72059, 960) में श्रीलंका में बौद्धों में तथा पाकिस्तान में स्वाद (५७४७) के मुसलमानों में जातियां देखी। रयूक नाइट (स८फटा८ ए्णाह॥, 7987) और बेरीमैन (छल्माथ्याक्षा, 966) में भी यूगोप और अमरीका में प्रजावोय स्वरीकरण में जाति व्यवस्था की कुछ विशेषताएं और जापान में अस्पृश्य जातियों को सन्दर्भित किया है। स्तरीकरण के जाति और प्रजाति व्यवस्था की तुलना के बावजूद भी यह कहना अधिक सही होगा कि सरबनात्मक तथा सास्कृतिक दृष्टि दोनों से जाति प्रथा उन क्षेत्रों तक हो सीमित है जहां भारतीय सभ्यता के कुछ तत्व पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों की जनसज्या अनेक अन्तर्विवारी सामाजिक इकाइयों में विभकत है जो वर्ण नमूने के क्षेत्रीय प्रहिदर्श को अपनाए हुए श्रेणीक्रम में अन्तर्क्रिया करते हैं ।
योगेद्र मिह ($०७०ण०छ्ए ० 8०८ 5४४ ८३४00, 4 ६0९५ ण॒॑ हठट्काती का 92०08 क्षाव 5०द्वव .448॥7०79००9७१, ५०. 4, 7974 , 336) ते सैद्धान्तिक रचना के दो स्तरों के बीच अन्तर करते हुए जाति के प्रति चार दृष्टिकोणों का सन्दर्भ दिया है . सास्कृतिक व सरचनात्मक तथा सार्वभौमिक व विशिष्टीकरण। ये चार दृष्टिकोण हैं सास्कृत्रिक-सार्व भौमिक, सास्कृतिक-विशिष्टीकरण, सरचनात्मक-सार्व भौमिक और सरचनात्मक- विशिष्टीकरण। लोच (3960) ने जब जादि के सरचनात्मक विशिष्टीकृत दृष्टिकोण का प्रयोग करते हुए माना है कि जाति प्रथा भारतीय समाज तक ही सौमित है, अन्य लोग जो जाति को सरचनात्मक सार्वभौमिक दृष्टिकोण से देखते है, मातते हैं कि भारत में जाति, सामाजिक स्तरीकरण के बन्द स्वरूप की एक सामान्य घटना है। घूर्ये (957,096) जैसे समाजशालियों का तीसरा दृष्टिकोण भी है जो जाति को सास्कृतिक सार्वभौमिक पटना मानते हुए, (विशेष रूप से उस श्रेणीक्रम में जो व्यक्तियों या समूझें के क्रम को निश्चित करने का आधार बनाता है) कहते हैं कि जाति जैसा स्तरौकरण का आधार अधिकतर परम्परागत समाजों के रूप में भारत में जाति प्रस्थिति आधारित सामाजिक स्तरकरण कौ सामान्य व्यवस्था का एक विशेष स्वरूप है। पूर्व में मैक्स वेबर द्वाश बनाया गया यह दृष्टिकोण समकालीन समाजशाज्त्र में भी प्रचलित है। जाति पर चौथा विचार सास्कृतिक-विशिष्टीकरण विचार है। डयूमान्ट (00७5 ए00०४, 986, 96) मानता है कि जाति केवल भारत में ही पाई जाती है।
योगेद्र छिंह (974 “37) ने जापि के ससचनात्मक विशिष्टीकृत विचार को मानते हुए कहा है कि सस्थात्मक अस्रमानता और इसके सास्कृतिक थे आधिक अवयब (०एणवाशंण्क) चाप्तव में थे काएक हैं जो भार में सामाजिक स्तरीकरण की अनोखी व्यवस्था के रूप में बनाए हुए हैं। सरचनात्मक दृष्टि से जाति व्यवस्था में चार मुद्दे 55४८७) विशेष महत्त्व के हैं. 6) जाति क्रम (शायाए) निर्धारण में इकाई अवयवों (का ००एए०४८४/३) से सम्बद्ध (जैसे, वर्ण, जाति, उपजाति), (0) जाति विलय (78००) और विखण्डन (&$709) के तरीके, जाति सघ निर्माण, जाति महासघ या सस्कृतीकरण द्वारा नयी डपयाति बनाते से सम्बद, (0) सामाजिक गतिशोलता की भक्रिया में जाति अ्रभुत्व व सर्ष से सम्बद्ध, और (७) जाति व्यवस्था में सामाजिक गतिशीलहा के विस्तार से सम्बद्ध। इन सन्दभों में जाति केवल भारत में हो पाई जातो है।
42 सामाजिक स्तर्वकरण
जाति व्यवस्था में परिवर्तन प्रारण्प से मध्य और ब्रिटिशकाल तक--
इसके सास्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक पश्ष
(एएश्मार्श गा 0 ए 0४5४९ $7ञधा : फिणा सि्राए 00 शिर्तेल्त शत फणाओं एशा०्तेडनांड सिने, ९८०ए००फांट द्याऐे 5००9 #5ए९टा5)
जाति व्यवस्था जैसी आज है यह अनेक शताब्दियों में विकसित हुईं है। प्राचीन काल में (६,०00 8 0 से 700 & 7, अर्थात् वैदिक, ब्राह्मण, मौर्य तथा मौर्योत्तर काल में (या सागा, कुषाण और गुप्त काल), इसके कार्य और सरचना मध्य काल (राजपूत और मुस्लिम काल अर्थात् 700 » 9 से 707 » 9 तक) और ब्रिटिश काल (अर्थात् 7757-947 # 9) से काफी भिन्न थी।
वैदिक काल (500 8,0.-322 8.0.)
जाति व्यवस्था के प्रचलन से सम्बद्ध दो विचार हैं। एक सम्प्रदाय (पर७७8, 863, एुशा, राह /900 0006 ४०५० 940, छे ९ ॥(90०, 979) का मानना है कि जाति व्यवस्था पहले से ही विद्यमान थी और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, जाति के तीन भाग थे जिन्हें ऋवेद काल के समाज ने स्पष्ट मान्यता प्रदान की थी। परन्तु शूद्र जाति विद्यमान नहीं थी। दूसरा सश्नदाय (फ८०, 882 और 6#79८, 932) मानता है कि ये तीन जातिया नही वरन् वर्ण थे जो आनुवाशिक न होकर लचीले थे। ब्राह्मण काल में, जो ब्राह्मण और उपनिषदों के बाद का काल था, चार वर्णों की श्रेणीक्रम व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी और आगे आने वाले समय में भी चलती रही। धर्म की आड में ब्राह्मण लोग विशेषाधिकार्यें का आनन्द लेते रहे जिसने उन्हें अनेक प्रतिबन्ध लगाने योग्य बनाया। यद्यपि ब्राह्मण और क्षत्रिय एक दूसरे पर श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए परस्पर सघर्षरत रहे लेकिन क्षत्रियों ने वैश्यों तथा शूद्रों के ऊपर अपनी शक्ति बढा ली) विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सामाजिक सम्बन्धों के विषय पर सहिताओं और ब्राह्मणों में, जाति भिन््नताए स्पष्ट होती गयी। रामायण और महांभातत (००९७) काल के पिछडे भाग में पुजारी कार्य आनुवशिक हो गया और अपरिहार्य रूप से ब्राह्मणों ने रक्त की पविद्रता और अन्य लोगों पर अपनी श्रेष्ठता प्राप्त करने पर ध्यान देना शुरु कर दिया। उन्होंने गृह सूत्र 700-300 8 0) तथा धर्म सूबर 600-300 80) के माध्यम से सामाजिक व्यवहार और सम्बन्धों को सहिता बना दो। अत यह कहा जा सकता है कि जाति प्रथा का प्रारम्भ-बिन्दु परावैदिक काल (800-500 80) और महाकाव्य (रामायण-महाभारत) काल 600-200 8 ८) था। क्योंकि सामाजिक स्तरीकरण का आषार श्रम विभाजन था, इसलिए अपने मौलिक स्वरूप में यह जाति व्यवस्था की अपेक्षा वर्ग व्यवस्था अधिक थो। प्रजाति कारक, व्यावसायिक पूर्वाप्रह, कर्म का दर्शन, और शुद्धता तथा अशुद्धता की धार्मिक अवधारणा सभी ने जाति व्यवस्था की रचना में योगदान दिया।
मौर्य काल 622 8 ८ से 84 8 ८. तक) में सम्पूर्ण भारत एक शासक के आंघीन प्रथम बार राजनैतिक रूप से एक हुआ। राजनैतिक एकता ने देश की सास्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया। कौटिल्य के लेख इस काल मे जाति प्रथा के सामाजिक सगठन और कार्य प्रणाली पर प्रकाश डालते हैं। कौटिल्य (शूद्र शासक चद्ध गुप्ठ मौर्य का एक ब्राह्मण मरी) ने
सामाजिक स्तरीकरण 43
ग्राह्मणों द्वा शूद्ों पर लगाए गए कई प्रतिमन्धों को हटाने का प्रयल किया और घोषणा की [के शाही कानून पर्म के काबून से ऊपर होंगे। चद्रगुप्त मौर्य के पौत्र अशोक के शासन काल में बाह्मणों के अधिकारों और विशेषाधिकारों को एक और आघात लगा। अशोक की धार्मिक नौति सहिष्णुता और सार्वभौमिक भ्रातृत्व पर आधापित थी जो जाति बन्धनों को नहीं मानव्री थीं। इन सभी उपायों के कारण जाति प्रथा इस काल में एक कठोर सस्था के रूप में विकसित न हो सकी।
मौर्योतर काल में ब्राह्मण धर्म और जाति व्यवस्था को विकास के पुनर्जागरण के लिए फिर से प्रोत्साहन दिया गया । ब्राह्मणों ने मनुस्मृति (85 छ0) में अपने लिए विशेषाधिकार्यें का प्रावधान किया और शूद्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लूगा दिए। मनु स्मृति में शूद्रों के लिए ब्राह्मणों का अपमान करने पर कठोर दण्ड का प्रावधान किया गया (जीभ काटना, मुह में कौल ठोकना, कानों में गर्म तेल डालना, आदि)। अत, इस भ्रकार के प्रावधानों से कानून में समानता पूरी श़रह नष्ट कर दी गई और जाति प्रथा कठोर मार्ग पर चल पडो और इसने एक नवीन सरचना धारण कर ली। गुप्त काल (जो सुंग काल के बाद आया, 300 8 7.-500 ४.0 ) हिन्दू जागरण का काल था। इस काल में ब्राह्मणबाद भारत का नृजातीय (७१००) पर्म हो गया और जाति प्रथा को अधिक प्रोत्साहन मिला। पस्न््तु यह बहुत कठोर नहीं हुआ। विवाह के नियम लचौले थे और अत्तर्विवाह तथा अर्न्तपोज के उदाहरण मिलते थे। शूद्रों को व्यापार, शिल्पी और कृषक व्यवस्ताय अपनाने की स्वीकृति थो। लेकिन इस काल में अस्पृश्यता लपभग उद्नी ही थी जितनी कि आज है। शुद्र लोग मुख्य आवासीय शेत्रों से बाहर हो रहते थे। गुप्तोत्तर काल में (हर्षवर्धन और अन्य, 606-700 # 7.) भी जाति प्रथा की वही सरचना जासे रहो जो गुप्त काल में थो। इस काल को सामाजिक, धार्मिक और आधधिक दशाओं का विशद चर्णन चोनी विद्वान छ्ेनसाँग के लेखों में उपलब्ध है जो 630 # 0. में भार आया था और 23 वर्ष तक यहा रहा। वह लिखता है कि जाति सामाजिक ढाँचे पर हावो थी, ब्राह्मणघाद का आधिपत्य था, और अशुद्ध पेशेवर लोगों (भगी, कप्ताई, आदि) को नगर कौ चाए दीवाे के बाहर रहना होता था।
मध्य युग में राजपूत काल (700 से 7200 & 0) और मुस्लिम काल (206 & 0 से 7707 # 0 ) शामिल हैं। यजपूत् काल में हिन्दुओं का सास्कृतिक जीवन म्रारभभ काल के जीवन से बिल्कुल भिन्न था। राजनैतिक कारकों के कारण भारतीय सामाजिक व्यवस्था नहीं बदली। ब्राह्मणों ने स्व्य को विशेषाधिकार दे रखे थे। शकरचार्य द्वाय स्थापित मंठ विलासो जीवन के केन्द्र बन गए थे। देवदासो प्रथा ने मच्दिरों भें वेश्यावृत्त को विकसित किया, जिसते नैतिक आचार सहिता कमजोर हो गई ६ राजपूरों की अपने चश्ों, के प्रति निष्ठा ने उन्हें देश के प्रति राष्ट्र भक्ति से उदासौन बना लिया। नयी जातियों और उपजातियों का जन्म हुआ जो अपने ही हितों में इतने सलग्न हो गए कि इसका देश के सामाजिक और राजनैतिक जीवन पर चुश प्रभाव पड़ा। परिणामत , विदेशों मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण शुरु कर दिया। 75 # 9 में भारत में महमूद गौरी द्वारा मुस्लिम साम्राज्य की नौव रखी गई और उसके बाद मुगल आक्रमण होते रहे। मुस्लिम काल (206 से 707 # 0) में जाति प्रथा और अधिक कठोर हो णई क्योंकि मुस्लिम हिन्दुओं के लचौलेपन में समाहित मही हुए। उनका घर्म ऐकेश्वरवादी होने के कारण अनेकेश्वरवाद से समझौता न कर सका,
ब्व सामाजिक सरोकरप
मुमलमानों ने भारत पर क्योंकि घार्किक जेहाद बोल दिया और लोगों को इस्लाम में परिवर्दित करे व्य प्रयल क्या, ग्राह्ममों ने हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन से बचाने का उत्तरदायित्व सम्भालते हुए, हिन्दुओं पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए और जाति व्यवस्था को कठोर बना दिया! यद्यपि कुछ भक्तों ने-जैसे रामानुज, कबीर, गुरु खनक, चैतन्य, तुवायम, तुलसीदास, जमम॒देव, आदि इस ब्लल में भक्ति की राह दिखाई जो मूर्विपूजा और जावि की निन््दा कखे थे, लोगों में समानता का उपदेश देवे ये, अति कमंकाप्ड तथा पुजारी वर्ग के आधिपत्य वा विशेध करते थे, फिर भी भक्त मार्ग जाति व्यवस्था को ठोड न सका। ब्राह्मणों का हिन्दुओं पर नेतृत्व जारी रह क्योंकि मन्दिर न केवल घार्मिक कृत्यों के लिए प्रयोग होते थे बल्कि सामाजिक, राजनैतिक व सास्कृतिक त्र्ियाक्लापों के लिए भी ॥ ब्राह्मणों ने यह घोषणा कखे हुए कि वे सभी हिन्दू जो मुसलमानों के लिए या उनके साथ द्मम करेंगे, वे मलेच्छ समझे जायेंगे, बाति भेद को और कठोर व गहरा वना दिया। इम भ्रकार लोहार, सुनार, नाई, धोदो, खाठी, और ऐसे ही लोग निम्न जाति के समझे जाने लगे। पुराण फ्रि से लिखे गए और जावि व्यवस्था वो और कठोर बनाने के उद्देश्य से नये आदेशों का प्रावधान किया गया।
प्रारम्भिक व्रिटिश कान (या पूर्व औद्योगिक युग) में देश के भौविक विकास, बाहर दुनिया से सम्पर्क, सरकार की सामाजिक-आर्थिक नौतियों और कुछ वैधानिक उपायों द्वाय हमारे धार्मिक सिद्धान्तों, सामाजिक प्रधाओं ठथा समाज की जाति सरचना में भी परिवर्तन आया। जाति पचायतों की न्यायिक शक्निया दौवानी तथा फौजदारों न्यायालयों को दे दी गई। 850 का जाति निर्योग्यदा निवारण ()&89065 ए८ण०७ट। ४८) अधिनियम, 856 का विधवा पुनर्विवाह अधिनियम और 872 का विशेष विवाह अधिनियम ने धो जाति प्रथा पर प्रहार क्यिा। जाति प्रथा की दृढठा को एक और आघात तब लगा जब दुछ सामाजिक उपायों से अस्पृश्यों को कुछ निर्योग्योग्रए समाप्त कर दीं गई। पस्नु ब्रिटिश सरब्गर ने इन उपायों को विशुद्ध प्रशासनिक कारणों से किया था न कि इसलिये कि सरकार जाति प्रथा समा झरना चाहती थी। घूर्ये (968 90) ने भी ऐसे ही विचार व्यक्द किए हैं। ममाव सुधारवों के कुछ सामाजिक आन्दोलनों ने भी जाति व्यवस्था पर प्रह्मर क्या। राड्धा राममोहन गाय द्वाय चलाये गये “ब्रह्म सझाज आन्दोलन' ने जाति बन्यनों को अस्वीकार कर दिया और मनुष्य के सार्वभौमीकरण तथा भ्रादृत्व के लिए कार्य किया। न्यायमूर्ति रानाडे द्वार समर्थित 'प्रार्था सभा आन्दोलन' ने भी अन्वर्जादीय विवाह, अर्न्चभोज, तथा विधवा पुनर्विवाह आदि समाज सुधारों को ओर ध्यान केन्द्रित क्या। स्वामी दयातन्द सरस्वती द्वार स्थायित “आर्य समाज आन्दोलन” तथा “समकृष्य मिशन आन्दोलन' ने भी जाति के विरुद्ध आवाज उठाई और इसके उन्मूलन क्त उपदेश दिया। दक्षित् भारद के लिंगायत आन्दोतन ने लोगों को ज्यति व्यवस्था छोडन का उपदेश दिया। यद्यपि ये सभी प्रहर इस कल में (अर्घात् 20वीं ज्ञवब्दि के प्रधम 25 वष्ञों में) जाति व्यवस्था की कठोरताओं को समाप्त न वर सके, प्रि भी जाति के कुछ सरचनात्मक गुण निश्चित रूप से प्रभावित हुए।
ऑद्योगिक अवधि, दिटिश काल में प्रथम विश्व युद्ध के बाद 970-25 से प्रस्म हुईं। औद्योगोक्रण और नगैक्रण (गावों से शहरों में लोगों व्म प्रव॒जन) की प्रक्रिया ने भी जाति सरचना को प्रभाविव क्या। औद्योगिक विकास ने लोगों को जीवन निर्वाह का नया साथन प्रदान क्या और पेशेवर गतिज्ञौलता सम्भव हो सकी ! नयो आवागमन की सुविधाओं
पामाजिक ख्ेकरण बढ
में भी शीघ्र संचार सम्भव बना दिया जिसने सभी जाति के करोडों लोगों को एक साथ ला दिया। भोजन संबंधी सबधों पर निषेध (०७००७) तब कमजोर पडने लगे जब विभिन्न जातियों के औद्योगिक श्रमिकों ने गांवों में अपने परिवारों को छोडकर शहरों में एक हो मकान में इक्टठा रहना शुरू कर दिया!
नगरीकरण और शहरों के विकास ने जाति प्रथा की कार्य प्रणली को काफी बदल दिया। न केवल सहभोजी अवरोध कम हो गए हैं बल्कि ब्राह्मणों के अधिकारों पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगे हैं। किंगस्ले डेविस (08०४ 70295, 495) ने कहा है कि शहरों का अनजानापन, भीड़-भाड़, गतिशीलवा, घर्मनिरपेक्षत और परिवर्तशीलता जाति को क्रियात्मकता को लगभग असम्धव बना देती है। घूर्ये (96 * 202) भी शहरी जीवन के विकास के कारण जाति प्रथा को कठोरताओं में परिवर्वन को स्वीकाप़्ा है। एमएन. श्रीनिवास (962 - 85-86) का भी मानना है कि ब्राह्मणों के शहरों में प्रत्॒जन के कारण, गैस्ब्राह्मण पहले जैसा आदर भाव नहीं दर्शाते और अन्तर्जादीप खान-पान के निषेध कमजोर हो रहे हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जाति प्रधा की सरवना और कार्य प्रणाली और इसके संस्कार, आर्थिक व सामाजिक पक्ष ब्रिटिश काल के औद्योगिक चरण में काफी बदल गए।
दर्दमान भारत में जाति व्यवस्था (0०5६ 8) #श॥्१र 9 77६5९आ 89)
947 में देश की सजनैतिक स्वतत्रता के बाद, औद्योगोकरण और नगरीकरण के अलावा
अन्य कारणों ने भी जावि व्यवस्था को प्रभावित किया। ये हैं. विभिन्ल राज्यों का विलय,
अनेक सामाजिक कानूनों का लागू होना, शिक्षा का विस्तार, सामाजिक-धार्मिक कु और
आन्दोलन, पश्विमोकरण, आधुनिक पेशों का विकास, स्थान गतिशीलता, ओर बाजार
अर्धव्यवस्था का विकास। वर्तमान काल में जाति कौ कार्यप्रणाली के बारे में मोटे तौर पर
निम्नलिजित निष्कर्ष निकाले जा सकते है .
* जाति व्यवस्था उन्पूलन की भ्रक्रिया में नही है बल्कि आधुनिक परिवर्तनों के साथ पर्याप्त सामजस्य कर रही है।
* जाति का घार्मिक आधार दूट गया है।
«» विधिष भ्रकार के प्रतिबन्ध लगाने की पुरानी प्तामाजिक प्रथाए समाप्त हो गई है। जाति अब नवीन मूल्यों वाली व्यक्तिगत स्वतत्रता पर अ्तिबन्ध नही लगा सकती।
* अब जाति व्यक्ति के पेशेवर जीवन को निर्धारित नही करती यद्यपि उसकी सामाजिक प्रस्थिति आज भी उसकी जातीय सदस्यता पर निर्भर है।
* ५२३ जावि/दलितों को समानता प्रदान करने के लिए गम्भीर प्रयल किये जा रहे
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* अत्तर्जातीय सपर्ष बढ रहे हैं, परन्तु यह सघर्ष सास्कारिक प्रस्थिति के आधार को अपेक्षा शक्ति अर्जित करने के लिए अधिक हैं।
* जातिवाद में बढ़ोत्तरी हुईं हैं।
* में यजमानी प्रथा कमजोर पड गई है, इससे अन्दर्जादोय सम्बन्धों पर प्रभाव पडा ।
46 सामाजिक स्तरीकरण
० गावों में किसी जाति का वर्चस्व अब उसको धार्मिक भ्रस्थिति पर निर्भर नही करता।
० जाति और राजनीति एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं।
» एक ओर कुछ जातियों के सगठन मजबूत हुए हैं तो दूसरा ओर अधिकतर जातियों ने अपनी सामूहिक एकता खो दी है और उत्तरदायित्व कौ भावना का हास हुआ है।
० जाति अब सामाजिक प्रगति व राष्ट्रीय विकास में बाघक नहीं है जाति व्यवस्था के बावजूद भी भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर है।
क्या जाति व्यवस्था परिवर्तित हो रही है, कमजोर हो रही है, या विधटित हो रही है ? जाति का भविष्य
([5$ (७४९ $%95छा (आाएंणए, जेट्बपशाआए 07 छ57ध्ट्रामणट ? फाणा'€ ण॑ (856 $956॥)
जाति प्रथा के भविष्य के विषय में तथा वर्तमान के सम्बन्ध में दो विचार हैं। एक विचार यह है कि जाति व्यवस्था तेजी से बदल रही है और कमजोर हो रही है, यद्यपि यह समाप्त नही हो रही है। इस सम्प्रदाय के डीएन मजमूदार, कुप्पूम्वामी, काली प्रमाद, गार्डनर मर्फी, पालीन कोलेन्डा, और मैक्स वेबर जैसे 950, 960 और 970 के दशक के विद्वान हैं, ओर आए के मुकर्जी, ई जे मिल्लर, और एमएन श्रीनिवास जैसे 970, 980 और 990 के दशक के विद्वान हैं। दूसरा विचार है कि जाति व्यवस्था इतनी तेजी से नही बदल रही है। परिवर्तन धीमी गति मे हो रहा है। इस सम्प्रदाय के प्रारम्भिक विद्वान घूर्ये, आई पी देसाई, नर्मदेश्वर प्रसाद और कापडिया जैमे और वर्तमान विद्वान डामले, डयूमान्ट, आत्द्रे बेतेइ, हैरोल्ड गूल्ट योगेद्ध सिह, एससी दुबे, और टीएन मदान जैसे है।
डीएन मजूमदार ने “कैसे जाति प्रथा तेजी से बदली है” की व्याख्या करदे हुए जातियों के विलय और विखण्डन और जनजातियों के एकीकरण का सन्दर्भ दिया है। कुप्पूस्वामी (देखें, ड०लगंग्शब्बा आधालका, 56फाशाएटश. 792) और कालीप्रसाद ($905॥7 बहाहक्ृप्रशतत 6९कार 4 उापत) का. काशि-एव्रडऑर रिशाशकतप्रफ, प,0रपा०ए एग्राएथज्आाए, ॥.0टॉंए०७छ, 954 3) ने भी जाति व्यवस्था में कुछ मूलभूत परिवर्तनो का सकेत दिया है। काली प्रसाद के अपने निष्कर्ष ने कि 90 प्रतिशत उच्च जाति के लोगों ने निम्न जाति के लोगों को भोजन में अपना साथी स्वीकार कर लिया है, उसे यह कहने के लिए मार्ग प्रशस्त किया कि जाति विखण्डन अब तेजी से समाप्त हो रहा है। गार्डनर मर्फी ने ([8 छ८ शहद [| 3९७, 7953 65) जिसने 7950-52 के दौयन भार में सामाजिक तनाव पर अध्ययन किए थे, यह निष्कर्ष निकाला कि जाति व्यवस्था को का सामना करना पड रहा है। मैक्स वेबर (77759 ०४ 5००४०४०७/, 952) का विचार था कि सभी जाति सम्बन्ध छिल भिल हो गए हैं और बुद्धिजीवी विशिष्ट राष्ट्रवाद के अधिकर्ता हो गए है। आरके मुकर्जी (7#6 उ#ढ कब सदा ली कर सब खवद्ण (कफ 958) ने कहा है कि जाति प्रथा के आर्थिक पक्ष (व्यावसायिक विशिष्टीकरण में परिवर्तन) , और सामाजिक पक्ष (च्च जातियों के रीति रिवाजों को महण करना, अपवित्र/ अशुद्ध पेशों का त्याग) बहुत बदल गए हैं। उसने कहा कि यह परिवर्तन शहरी क्षेत्रों में विशेष हैं जहा
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सामाजिक मेलजोल और जादि सहभोज आदि के नियम अधिक ढीले पड गए हैं और निम्न जातियों की सामाजिक और धार्मिक निर्योग्यताएं समाप्त कर दी गई हैं। ईज़े मिल्लर (958) ने जाति प्रथा में परिवर्तन की बात करते हुए कहा है कि अतीत में जब अन्तर्जातीय सम्बन्धो में परम्पस से मान्य और स्पष्ट अधिकार, दायित्व और ज्रभुत्त और आधीनता के प्रतिमान विधमान थे, वर्तमान में अन्तर्जातीय सम्बन्धों का स्वरूप अत्यधिक बदल गग्रा है। भिल्लर के साथ ब्राइस्न रियान (89०6 7१५)७७) एसएन श्रीनिवास, एससीदुबे जैसे अनेक अन्य विद्वानों ने भी बताया है कि जाति व्यवस्था में परिवर्तन हो रहा है। एमएन श्रीनिवास (952 380 १985) ने माना है कि जातियों के बीच परस्पर अधिकार और कर्तव्य धणशायी हो रहे हैं। गांवों में व्यक्ति में जाति के प्रति वफादायी में बदलाव नोट किया जा रहा है। यह परिवर्तन मस्कृतीकरण और पश्चिमीकरण के कारण भी आया है। ब्राह्मणों से पहले अग्रेजों का स्थान हो गया था, पले ही वे गाय, आदि का मास खते थे, शराब पीते थे व पाइप से धूप्रपान करते थे। लेकिन लोग डरते थे,उनकी प्रशसा करते थे और उनका सम्मान करते थे। परिणाम यह हुआ कि नयी और धर्म निरपेक्ष जाति व्यवस्था परम्पणगत व्यवस्था पर हावी हो गई जिसमें अप्रेज नये क्षत्रियों को तरह उच्च शिखर पर आसीन हो गए।
लेकिन दूसरी विवारधार के विद्वान (जो जाति अ्रथा में होने वाले परिवर्गन की धौमा और क्रमिक तथा यहाँ तक कि कुछ मामलों में ऊपरी व दिखाऊ बताते हैं) इन परिवर्तनों को समूची जाति व्यवस्था के लिए विघटनकारी नही मानते । ये विद्वान, यद्यपि जाति प्रथा के पूर्ण समापन की बात नही कहते, फिर भी उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि आज जाति बिल्कुल वैसी नहीं है जैसे अर्ध या पूर्ण शर्ताब्दि पूर्व थी। उदाहरणार्थ, एआर देसाई और दामले (9876, 798] : 66) ने कह्य है “जाति व्यवस्था के लक्षणों में परिवर्तन की विस्तृतता इतनी महान नही है जितनी समझो जाती है। इन परिवर्तनों ने समूची जाति व्यवस्था के आवश्यक लक्षणों को प्रभावित नहीं किया है।” घूर्ये 96, 209-20) का विचार था कि जाति व्यवस्था ने अपनी कुछ विशेषताओं को हटा दिया है। उसने कहा कि अब जाति व्यक्ति के पेशे को निर्धारित नहीं करतो लेकिन पुरानी व्यवस्था का अनुसरण करते हुए विवाह व्यवस्था में वही भावना जाए है । व्यक्ति को जीवन के महत्वपूर्ण अवसर पर अब भी जाति की सहायता पर ही निर्भर रहना पडता है, जैसे विवाह और मृत्यु, आदि। ठसने आगे कहा, “यद्यपि जाति न्याय करने वाली इकाई के रूप में अब काम नही करदी फिर भी व्यवित पर इसकी पकड कम नही हुई है। व्यक्ति आज भी जाति को गय से नियत्रित् होते है” (वही . 90) | उसका विश्वास था कि सामाजिक जीवन में जाति व्यवस्था वी ताकद अभी तक हमेशा की तप्ह मजबूत है (वहों 27)।
नर्मदेश्वर प्रसाद (!956 240) ने जाति के कार्यों को दो स्तरों पर विश्लेषित किया है : सास्कारिक (702) (विवाह, भोज, आदि) और वैचारिक (620०0) (त्राह्मणों के प्रति अभिवृत्ति, चुनाव लड़ने के लिए एक हो जाना, आदि)। उसने पाया कि दोनों ही स्तरों पर पत्विर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों के बावजूद भी जाति प्रथा काफी सोमा तक वैसी ही है। व्यवस्था के भीतर तो परिवर्तन हो रहे हैं, किन्तु व्यवस्था से परे नहीं।
कापडिया (७(०च९ ॥ प्रोक्षाहपता" जग उठ्दगंगलव्ल मपराकका, 5९छट्जऑटा 3962 : 75) ने चार विशेषताओं को केन्द्र मानकर जाति व्यवस्था की विशेषताओं के
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परिवर्तनों का अध्ययन करने का प्रयल विया जाति पचायतें, सहभोजी निषेध, सास्कारिक पवित्रता, और अन्तर्विवाह। जाति पचायतों को कार्य प्रणाली का विश्लेषण करते हुए उसने पाया कि जब जाति पचायते 860 और 790 के दशकों में शक्तिशाली थी, 960 के दशक में भी वे शक्तिशाली रही यद्यपि कानूनी रूप से उन्हें अपने सदस्यों को बहिष्कृत (७७-००गणाएण्शा०) कर परम्परागत अतिमानों को थोपने का अधिकार नहीं रह गया था। थे अपने सदस्यो के मन और व्यवहार को नियत्रित व सचालित करती रहती थीं। सहभोजी निषेधों की बात कस्ते हुए उसने पाया कि यद्यपि यह सत्य है कि आमीण क्षेत्रों तक में अर्न्वभोज (जहा सब जातियों के सदस्य पक्ति में बैठकर भोजन करते हैं--हरिजनों सहित) 960 के दशक में असाधारण बात नही थी लेकिन साथ ही इस बात के साक्ष्य भी हैं कि शहरी क्षेत्रों में भी इस प्रकार के निषेध मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे (बही 74) | उत्सवी शुद्धता (८४०मा०णा॥! एण70) में परिवर्तन के सन्दर्भ में कापडिया (वही 77) ने कहा कि अशुद्धता (709४०॥) की हिन्दू अवधारणा विषय-द्षेत्र (००७०) में विस्तृत थी और सदी के 20 वर्षों तक परिपालन (०७$८४४०८८) में भी अधिदेशाल्क (ए27०१/०५) थी। यह नियम आज भी (960 के दशक तक) ग्रामीण और नगरेततर क्षेत्रों (00) में उच्च जाठि परिवारों में पालन किए जाते हैं। लेकिन समग्र रूप से (0 (॥0 ७/॥0/6) कहा जा सकता है कि उनसे लगभग छुटकारा पा लिया गया है। अन्त में, अन्तर्विवाह के सन्दर्भ मे (वही 77) उसने कहा कि जाति के अन्तर्विवाही चरित्र में परिवर्षन स्पष्ट नही है। अन्दर्जातीय विवाहों की सख्या में वृद्धि देखी जा सकती है, विशेष रूप से गत 20 वर्षों मे। साथ ही जाति अन्तर्विवाह के मौजूद होने के साक्ष्य भी है।” इस प्रकार उसने निष्कर्ष रूप में कहा (वही 87) कि लोग जाति के विषय में कुछ भी कहें, जाति बन्धनों की स्वीकृति आज भी (960 के दशक तक) है। इस सा्ष्य में त्रुटि नही है कि जाति अन्तिम साँसें नही गिन रही है, यद्यपि इसमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए है।
“आजकल जाति व्यवस्था का क्या हो रहा है” इस प्रश्न पर डयूमान्ट अपनी पुस्तक (काम, मेग्लाक्माशक्रातं्रता5, 97.. 277-8) में कहता है कि समकालीन (०ण्णाटागएणश्षा)) साहित्य में परिवर्तन को अतिशय के (०जए॒ष्टट:८0) ढंग से प्रस्तुत किया है। इतना निश्चित है कि जाति समाज एक समग्र रचना (छद्यश्ी! गण6छ०0 के रूप में परिवर्तित नहीं हुआ है। मात्र परिवर्तन जो हुआ है वह यह है कि जातियों की परम्परागत परस्पर निर्भरता के स्थान पर उन अथाह खण्डों (॥9००८४४७॥९ ए०८७) वृद्धि हुई है जो आत्म निर्भर हैं तथा एक दूसरे के साथ प्रदिस्पर्धा में भी हैं। डयूमान्ट ने इसको जाति का ठोस प्रमाणीकरण (हाफडाक्राधकरक्ा00 ० ९०४०) कहा है (8 पार श३8वशा' बालेल था 07एगोपवा 5700 (८0), उत्ददा उ#बरएवट्दाा00, 2792. 62)
आब्े बेतेइ (976 6-65) ने भी जाति प्रथा में कुछ परिवर्तनों का हवाला दिया है। उदाहरणार्थ, सरचनात्मक दूरी में, जीवन शैली में, सहभोजी सम्बन्धों में, और अन्तर्विवाह आदि में। अतीत में जातियों के बीच सरचनात्मक दूरी न केवल विविध जोवन शैली अपना कर रखी जाती थी बल्कि विवाह, सहभोज और सामान्य सामाजिक परस्पर लेनदेन में विविध अकार के निषेधों द्वारा भी रखी जातो थी। आज एक ही उपजाति के दो उपविभागों के बीच सरचनात्मक दूरी इन दोनों में से किसी एक के बीच की अपेक्षा कम है। परम्परागत व्यवस्था
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में विशेष जाति की विशिष्ट जीवन शैली में भी परिवर्तन आया है। परम्पणगत व्यवस्था में सहभोज की इकाई जाति मम्दद्धता के अर्थ में स्पष्ट रूप से कठोस्ता से परिभाषित कौ गई है। हाल के ही दशकों में इस इकाई का क्रमिक विस्तार हुआ ऐ। आज ब्राह्मण 'स्वच्छ' शूद्रों के साथ भोजन कर सकते हैं लेकिन आमतौर पए मलिन/अशुद्ध (0"ए०४८) जाति के सदस्यों के साथ मही। अन्तर्विवाह की इकाई का भी विस्ताए हुआ है यद्यपि थोडा हो। बेते३ के अनुसार जाति व्यवस्था में ये सभी परिवर्तन भौगोलिक गतिशौलता, पश्चिमी शिक्षा, नये पेशों के सृजन-जिनमें प्रवेश जाति के अलावा अन्य कारकों के आधार पर भी होता है, आधुनिकीरण की प्रक्रिया, और राजनैतिक कारकों के परिणाम हैं। परन्तु यह भी स्पष्ट है कि कुछ जातियों में अन्य को अपेक्षा आन्तरिक विभेद बहुत अधिक आ चुके हैं। वे जातिया जिन पर पश्चिमीकरण का प्रभाव सबसे अधिक पडा है वे हैं जो सबसे अधिक बदली हैं! ठदाहरणार्थ, ब्राह्मण, कायस्थ, नायर, आदि जातिया तथा सामान्य रूप से वे जातिया जिन्होंने पश्चिमी शिक्षा ग्रहण की है और मध्यम-वर्गोय पेशे अपनाए हैं और जो मुख्य रूप से वितरण (व500॥07) की दृष्टि से शहरी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक-वर्गीय जातियों ने अधिक समता बनाएं रखी है तथा उन पर परिवर्तन का प्रभाव कम हुआ है ।
हैरेल्ड गूल्ड (प्रक्षणत (3000, 988 . 58) ने कहा है कि सत्य कही इन स्थितियों के बीच स्थित है। जाति व्यवस्था पर औद्योगीकरण का प्रभाव अधिक हुआ है, अपेक्षाकृच घेबर के विचार के। लेकिन उप्त पैमाने पर जिस पए मार्क्स ने पूर्वातुभान किया था जाति विलोन नही हुई है। पारसस (850४, प्र 5०दववां 5)50%, 7952 . 85) ने इस यथार्थ (८७४9) की 'अनुकूलिनी सरचनाएँ" (४09900० शाए्ट!णा८७ केहका विशेषता बवायी है। इन अनुकूलिनी सरचनाओं ने म्रतिस्पर्धात्मक दवाबों में घिरे लोगों के सरचनात्मक तनावों (६:४८४४०९०० $:श४४) को कम किया हैं। हैरोल्ड गूल्ड की मान्यता है कि भारत भें जाति की यह विशेषता (अनुकूलिनी सरचना की) न केवल शहरों में स्पष्ट है बल्कि गाँवों में भो है जहा जाति अभो भी सुरक्षा, एकता ओर लोगों के समूहों के लिए वरीयता व्यवहार को बनाये हुए है।
हैरोल्ड गुल्ड के अनुसार (988 62-764) आधुनिक होते हुए भारतीय समाज में अनुकूलिनी सरचनाओं की तरह कार्य करने वाली जातिया (जो उनका भविष्य स्थाई एवं सुरक्षित बनाती है) का तीन स्वरों पर पर्मेक्षण किया जा सकता है . राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक । राजनेतिक स्तर पर गावों और शहरों दोनों में जाति साम्प्रदाधिकता और राजनैतिक गुरबाजी आपस में जुडी हैं। ससदीष लोकतन्त्र (जो भुप्त मतदान से जुडा है) में लोगों को संख्या, सम्ताघनों एवं उन लाभों ((६४००:७) (जो चुनाव में जीतने के उपरान्त पद प्राप्त कहने से प्राप्त होते हैं) के जोड-तोड (छग्रफापेंआ07) को महत्व मिला है। लोकतात्रिक ग़जनीति क्योंकि हित-समूहों में पद और सत्ता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों में एक प्रतिस्प्धों है, यह स्वाभाविक है कि भारतीय समाज में स्वार्थ समूहों की रचना विखण्डन (००४०४०) और एकता (६6०89) (जो जातियों और नृवशीय समुदायों को विभाजित करवी है) दोनों ही रेखाकित होंगी । जादिवाद राजनैतिक मुद्दों और निर्णयों को प्रभावित करता है, जाति निवेदनों (399००) के बाद धार्मिक निवेदन किये जाते हैं। यह वष्य भाखत में हिन्दू और मुस्लिम ग़जनेतिक कार्यविधि से प्रभावित होता है। इसमें आश्चर्य नहीं कि जाति
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का सभी राजनैतिक स्तरों पर शोषण किया जायेगा। आर्थिक स्तर पर यद्यपि यह सत्य है कि श्रमिकों व पारिश्रमिक लेने वालों की आर्थिक गतिशीलता, पुरस्कार वितरण, और श्रमिकों की भर्ती, उनकी कार्य गुणवत्ता के आधार पर निर्धारित होते हैं, और विभिन जातियों के लोग आधुनिक पेशे अपनाते हैं, लेकिन यह भी समान रूप से सत्य है कि विशेष रूप से गाँवों मे उनकी स्थिति प्रचलित जाति सरचना और अन्तर्जातीय सम्बन्धों पर ही निर्भर है। भारत में आज व्यक्तियों के लिए जो आर्थिक समस्या है वह है 'कमी' (८४०७) की-धन की, नौकरी की और अवसरों की--जिससे उस नयी आशिक व्यवस्था में भाग ले सकें जो कि धीरे धीरे बन रही है और स्पष्ट रूप से धन और शक्ति का प्रमुख साधन हैं ! इस प्रकार जाति के वे पक्ष जो आधुनिक व्यावसायिक व्यवस्था में शक्ति और पद के सम्भावित दावेदारों के लिए अति लाभदायक होते हैं, जातिवाद और भाई-भतीजावाद (छ८एणाड्ए) ही है। सामाजिक स्तर पर जीवन शैली निर्धारण में तथा उस क्रम स्थिति निर्धारण में जिममें विवाह निश्चित होने हैं, जातियोँ अभी भी महत्त्वपूर्ण हैं। यद्यपि जातियों के पुराने सस्काए और पेशेवर कार्य तेजी से अदृश्य हो रहे हैं, फिर भी जाति में अन्तर्विवाह अभी भी सुरक्षित हैं। जाति सरचना को शुद्धता का विचार विद्यमान रखा गया है तथा आधुनिक सामाजिक सूचीक्रम की आवश्यकताओं के अनुकूल बना लिया गया है। यह भी नोट करने योग्य है कि भारत के अभिजात्य श्रेणी के लोग (०॥॥६) बहुत ज्यादा उच्च जातियों के हैं, जब कि निन जाति व दास श्रेणी के लोग जातियों का सामौष्य विरोध सुध्म रूप से प्रदर्शित करते हैं। योगेंद्र सिंह (974 324 327) ने भारत में जाति प्रथा के भविष्य के सम्बन्ध में तीन परिकल्पनाओं की चर्चा की है (६) उत्पादन की विधि सबंधी परिकल्पना, (7) जाति लचोलापन परिकल्पना, और (79) सरचनात्मक अनुकूलिनी परिकल्पना । उत्पादन को विधि (एा006 ०0 ए700प८00०) संबंधी परिकल्पना, जो किगस्ले डेविस, मार्क्सवादी (एआरदेसाई) और गैर मार्क्सवादी दोनो प्रकार के समाजशासियों द्वारा समर्थित है, के अनुसार जाति का पतन हो रहा है। किंगस्ले डेविस के अनुसार जाति के पतन के साक्ष्य (0) सहभोजी निषेधों मे ध्यान देने योग्य ढीलापन और भोजन के निषेधों के उल्लंघन की सहन करना, (2) अन्तर्विवाह (हरा्ट-..४४०४७८०) की बाधाओं की उपेक्षा करने की बढती अवृत्ति या अन्तर्जातीय विवाहो की बढ़ती सख्या, 8) पेशेवर गतिशौलता में वृद्धि, (4) जाति पचायतों का बिल्कुल कमजोर होना ७) यजमानी प्रथा का कमजोर पडना, (8) निम्न जातियों पर उच्च जातियों के प्रभुत्व और प्रभाव का कम होना, ()) अस्पृश्यता का धीरे-धीरे समापन, और (४) सामाजिक गतिशीलता का विकास। किंगस्ले डेविस (ढग्राइ०० 08७9) ने औद्योगीकरण के प्रभाव में अनुकूलिगी परिवर्तनों (302975७ ८ाश्याट८७) के माध्यम से जाति के वर्ग में परिवर्तन होने की सम्भावना व्यक्त की है, यद्यपि ऐसे परिवर्तनों को विवेचना करने के लिए वह मार्क्सवादी विवारघाए का प्रयोग मही करता। दूसरी ओर एआरदेसाई यद्यपि यही विचार रखते हैं (जाति का वर्ग में परिवर्तित होन) लेकिन उसने अपने तकों को मार्क्सवादी सिद्धान्त पर आधारित किया है। उसके अनुसार जाति कृषि सामन््ती (८009) व्यवस्था पर आधारित सम्पत्ति के स्वामित्र और उत्पादन कौ शक्तियों की सामाजिक अभिव्यक्ति है। वह मानता है कि (90
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-8-92) कुछ दर्जन जातिया ही आर्थिक संसाधनों, राजनैतिक शक्ति, और उपलब्ध शैक्षिक तथा सांस्कृतिक सुविधाओं का एकाधिकार (क्राणा०एण०) रखती हैं। आर्थिक ढाँचे में मूल परिवर्तन अपनाए बिना जादि श्रेणीक्रम और जाति व्यवस्था को समाप्त करना सम्भव नही होगा।
“जाति की लचौलेपन' सबधी परिकल्पना (मूल स्थिति को पुन आ्राप्त करना) के अनुसाए, औद्योगीकरण, प्रौद्योगीगी का विकास, पश्चिमीकरण, और अन्य लोकतांत्रिक सस्थात्मक विस्तार, जाति कार्यों की प्रक्रिया को प्रतिबन्धित करने कौ अपेक्षा अधिक सक्रिय और विस्तृत करते हैं। ये सब कारक जाति के क्रमों (/&7/:8) के विलय में और सगठनात्मक गतिशीलता तथा सुव्यवस्थीकरण (7200४»9/०) में योगदान देते हैं। एमएस. श्रीनिवास (964) कहता है कि जहा मध्ययुगोन भारत में जाति गतिशोलता विखण्डन (85507) पर आधारित थी, वही आधुनिक भारत में जाति प्रखण्डों (६६०००८०४७) के विलय का मच सक्रिय हो गया है। इस प्रक्रिया में नि-सन्देह जाति की प्रकृदि में कुछ परिवर्तन होता है किन्तु यह मानना सही नही होगा, जैसा बेली (8७॥८७) मानता है,कि जातिया अपने लक्षण ही बदल देती हैं। जाति व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होदा। आने बेतेइ ने जाति के लचीलेपन की परिकल्पना का समर्थन किया है । उसने जाति की तरह हो नये सरचना स्वरूपों (पेशेवर तथा व्यावसायिक समूह) की चर्चा की है। बेतेइ का कहना है (965) कि “राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन से प्रस्थिति समूहों (जातियों) के समाप्त होने की सम्भावना 8५ । भविष्य के प्रस्थिति समूह निस्सन्देह जाति व्यवस्था के चिन्ह अपने साथ अवश्य ले जायेंगे।"
“जाति के लचीलेपन सबभी परिकल्पना' के विरुद्ध सरचनात्मक अतुकूलिनी (शा0एा८0 2प9008007) परिकल्पना है। इस परिकल्पना (6०८४ * 960, 8०४9 ; १963, भ्र०हधावाब आगए। . 969, एशुरं ए०ण७०० 970) के अनुसार जाति सपपों, जाति महासधों और जाति एकता की रचना के माध्यम से जातिया अपना मूल चणि समाप्त करती हैं और वर्ग-प्रकार का स्वरूप धाएण कर लेती हैं। इस विचार के प्रतिपादक इन परिवर्तनों को परिवर्तन के अपरिहार्य अवस्थाओं (सो ४98०) से नही जोडते ! वे जाति के अदृश्य होने की बात भी मही करते और न ही वर्ग व्यवस्था से इसके स्थानापन्न होने (7८//३०८४९४॥/) की बात कस हैं।
जाति ख्यवस्था का भविष्य (गा0९ ण॑ ९४5७)
जावि व्यवस्था की पकड ढीली होने के कोई सकेद नहीं हैं। परिवर्तन केवल विभिन्न जातियों द्वात सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने तथा ऊपर उठने के रुख भें आया है। जाति व्यवस्था में परिवर्तन यद्यपि निस्दर और नियमित रूप से हो रहे हैं लेकिन यह (जाति व्यवस्था) अदूट बनी हुई है। विभिल जातियों में एक प्रकार को वर्ग चेतना अवेश कर रही है। अन्तसमूह (॥-/700ए८) को भावना से प्रभावित होकर जातियों अपनी व्यवस्था को अधिक दृढ़ता से पकड़े रहना चाहती हैं। आजकल, जातिया स्वय को राजनैतिक, सामाजिक, व आर्थिक उद्देश्यों के लिए सगठित होने का प्रयल कर रहो हैं। चुनाव जातिगत आधार पर लडे जाते हैं।
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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा, अखिल भारतीय माथुर सघ, अखिल भारतीय भार्गव सगठन जैसे जानि संगठन विकसित हो गये हैं । जाति व्यवस्था के भविष्य के विषय में विभिन्न दृष्टिकोण रखने वाले तीन प्रकार के प्रगतिशौल हिन्दू मिलते हैं। 0) ऐसे लोग जो जाति को अहितकारी (८५7) समझते हैं और चाहते हैं कि यह समाप्त हो जानी चाहिए। (७) ऐसे लोग जो सोचते हैं कि जाति व्यवस्था का पतन हो गया है। वे चाहते हैं कि परम्परागत चारों व्यवस्थाओं की पुनश्थापना के प्रयल होने चाहिए। इस विचार के सबसे बडे प्रतिषादक महात्मा गान्धी ये (रह खाबाब 499 479-88) । 60) ऐसे लोग जो चाहते हैं कि जाति व्यवस्था जारी रहे लेकिन इसकी पुनश्थापना बिल्कुल भिल स्थितियों में हो। ये लोग सास्कृतिक एकता वाली और आर्थिक समानता वाली विभिन्न उप जातियों को मिला देना चाहते हैं। धीरे-धीरे वे जातियाँ जो लगभग समानता के स्तर पर होंगी एक हो जायेंगी और अन्त में एक जाति विहोन समाज की स्थापना हो जायेगी । ये लोग इस प्रक्रिया को मन्द गति से चाहते हैं क्योंकि इससे लोगों को शिक्षित होने का समय मिल जायेगा और वे उन जातियों/बर्गों के वाछित अनुकूलन के साथ परिचित राय बना सकेगें जो अपने पुराने रीति रिवाजों में परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हैं। (देखें, घूर्ये, एजे टयाइन्बी (७ ॥ प्र०शा0९८) टी एचमार्शल, (पप्न ॥४७४508॥), पी कोडान्डा राव (? ॥०१०७॥०0७ 7२9०), आदि, जैसे विद्वानों ने इन तीनों विचार-सम्प्रदार्यों का मूल्याकन किया। गान्धी जी द्वारा दिए गए प्रथम विचार पर चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि यह अव्यवहारिक है क्योंकि लीगों को चार श्रेणियों में से किसी एक श्रेणी में रखने के लिए केवल उनका व्यवसाय ही है जो वे आज करते हैं। वर्तमान समाज में व्यवसाय विशिष्ट और विविध होते है और एक ही परिवार के लोग इतने भिन् व्यवसायों में लगे होते हैं कि उन्हें किसी एक श्रेणी की सदस्यता प्रदान करना असम्भव होगा। दूसरे, यदि यह कथन (जावियों को प्रथम दीन व्यवस्थाओं/श्रेणियों में से किसी एक में शामिल करना) सम्भव होता भी, अस्पृश्य जातियों का क्या होगा ? गान्धी जी ने अस्पृश्यता के विरोधी होने के कारण, स्वाभाविक रूप से इन के लिए सम्मानजनक प्रस्थिति का प्रस्ताव किया। लेकिन उन्हें कहा स्थान प्रदान किया जाये ? जिस किसी भी व्यवस्था श्रेणी में उन्हें सम्मिलित करने का प्रयास किया जायेगा, उसी व्यवस्था/श्रेणी के लोग अत्यधिक विरोध करेंगें। तृतीय, यह मान लें कि चार व्यवस्थाओं/श्रेणियो में जातियों का वर्गीकरण सम्भव हो भी जाये, क्या हम इन घार व्यवस्थाओं में विवाह की स्वोकृति दें देंगे या प्रतिबन्ध लगाएगे ? दोनों ही पद्धतिया अपनी समस्याओं को जन्म देंगो। अत यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि समाज के चार प्रकार के विभाजन पर वापसी अव्यवहारिक है। यदि यह कार्य कर भी लिया जाये तो इससे कोई लाभ होने वाला नही है। दूसरे विचार पर चर्चा पर कि जातियों को उपजातियों के साथ बडी जावियों में
एकीकृत करके धीरे-धीरे मिटाया जाये, विद्वानों ने कह्य है कि इस बिन्दु को रखने का अर्थ है वास्तविक समस्या की उपेक्षा कजा। उनका कहना है कि यह विधि मुम्बई में कई दशकों तक चलाई गई लेकिन परिणाम घातक हुए। एक बडा समूह बनाने के लिए सम्मिलित हुई उपजातिया बडे निरुत्साह से बाहरीपन के आन्तरिक भाव को धारण किए रही। नये समूह अन्य जातियों के विरुद्ध लडाकू रुख अपनाया, विशेष रूप से उन जातियों के विरुद्ध जिनकी
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उम्ते थोडा ऊचा या नीचा माना जाता था। अब विद्वानों का कहना था कि इस श्रकार जाति भक्ति की भावना या जातिवाद पैदा होवा हे और यदि हम दूसरा दृष्टिकोण अपनाणो तो जादिवाद का कम होना अति कठिन हो जायेगा तथा राष्ट्रीय चेवना के पूर्ण विकाप्त के लिए अस्वस्थ वातावरण पैदा हो जायेगा।
कुछ विद्वानों ने दीसरे विचार का समर्थन किया है कि जाति प्रथा को तुरन्त समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उनका विचार है कि हमें जातिवाद के विरुद्ध लडना है बथा उसे समूल नष्ट करना चाहिए। घूर्ये इस विचार का पक्षथर था। लेकिन उप्तने यह विचार 93 में व्यक्त किया था! तब से लगभग सात दशक व्यतोत हो गए है और भारतीय ममाज में बहुत परिवर्तन हो गए हैं (देश कौ आजादी सहित) और जातिवाद के विरुद्ध कई कामून भी लागू किए जा चुके हैं। उदाहरणार्थ, भारत का सविधान (950 में लागू किया गया) कहता है कि () जाति के आधार पर राज्य किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नही करेगा (सभी जातियों को समान अवसर), (॥) किसी भी नागरिक पर जाति के आधार पर किसी भी दुकान, रैस्ट्रा, सार्वजनिक कुओं और तालाबों हक प्रवेश या प्रयोग का प्रतिबन्ध नहीं होगा (नागरिक निर्यो्पताओं की समापष्णि), और (॥0) अस्पृश्पता के चलन का निषेध | इसी प्रकार किस्ती भी पेशे को अपनाने पर प्रतिबन्ध नहीं है। समानता कौ भावना तथा आजादी और भ्रावृत्व की भावना को प्रोत्साहित किया गया है जिसने जाति की जड़ों को काटा है। एक विशेष अधिकारी (आयुक्त) 95 में पिछड़ी जाति एवं पिछड़ी जनजाति की देखोख के लिए नियुक्त किया गया था । अब जनगणना में व्यक्ति की जाति को नही लिखा जाता । इन सब परिवर्तनों के बावजूद भी गत कई दशकों में, विशेष रूप से गत दो दशकों में जातिवाद और जाति की बुराइया समाप्त नहीं हुई है। आशीर्वाचम (4 7४2४ 5०८६7 04०, 957) का विचार था कि अतीत में जाति के कितने ही फायदे क्यों न रहे हों, आज यह प्रगति में बाधक है और हमें इसका डटकर विरोध करना है। 950 व 960 के दशक में डीएन मजूमदाए ने भी कहा था कि जिस प्रकार टूटी अगुली प्रतिस्थापित की जाती है न कि सायूर्ण हाथ, उसी हरह एक जाति का दूसरी जावि द्वाता शोषण और इसी तरह के हानिकारक सहवर्ती बुराइयों को समाप्त किया जाना चाहिए, न कि समूची जाति व्यवस्था को |
लगभ व35 वर्ष पहले (869 में) मैक्समूलर का विचार था कि भारत में जाति को समाप्त नही किया जा सकता। इस प्रकार का प्रयल मात्र भी कष्टकर व दुष्कए प्रयास होगा। धार्मिक सस्या के रूप में जाति समाप्त हो जायेगी परन्तु सामाजिक सस्था के रूप में यह जीवित रहेगी और इसमें सुधार भी होगा। पालिन कोलेण्डा (997) की राय है कि एएपपएएए आहि व्यदण्या, फिएऐे पेशेदए फिशशिश्वीजुल, एएपए जिर्षए, तय: शुद्धता और अशुदता के आघार पर क्रमबद्ध जातियाँ पायी जाती हैं, अदृश्य होने का सकेत दे रही है। कोलेण्डा यह अश्न भी उठाती है कि अब पेशेवर विशिष्टीकरण और शुद्धता वधा अशुद्धता की ध्यवस्था में (जिप्रस्े जादियों का एक दूसरे से क्रम व अलगाव का पता चलता थे गिरावट आयो है, क्या नयी जाति व्यवस्था के रूप में एक नया एकीकरण हो सकेगा ? उसका विचार है कि वास्तव में यह सम्भव नही है कि एक सामाजिक सरचना को जो हजारों चर्षो से लोगों के राजवीदिक, आधिक व धार्मिक जीवन को समृठित किए हुए हो, कुछ हो दक्षकों में बिल्कुल समाप्त कर दिया जाये | समाज वैज्ञानिक जो इस क्षेत्र में काम कर रहे हें,
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सभी कहते है कि जाति व्यवस्था जीवित है।
यह सत्य है कि जाति व्यवस्था भौतिक व आध्यात्मिक उलति श्राप्त करे में या सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में बाधक है। जब तक यह विनाशकारी व्यवस्था चलही रहेगी, हम अपने सामाजिक लक्ष्य प्राप्त नही कर सकठे । अठ जितनी जल्दी इसकी मृत्यु कौ घण्टी बजे, उतने ही ऊचे हमारी प्रगति के अवसर हो जायेंगे। फिर भी यह एक सत्य है कि इस व्यवस्था को समाप्त करना इतना सरल नहीं है।
नर्मदेश्वर प्रसाद द्वारा तीन क्षेत्रों के अध्ययन में--औद्योगिक, गैर-औद्योगिक, और प्रामीण--कुछ उत्तरदाताओं (225) से जाति व्यवस्था को कमजोर करने वाले कुछ उपाय आप्त हुए। यह थे शिक्षा और सभी व्यक्तियों के लिए समान अवस्तर 69%), अन्तर्जातीय विवाह 85 3%), अस्पृश्यता निवारण (2 2%), और समानता के आधार पर लोगों से व्यवहार (3 4%) । लेकिन क्या ये उपाय वास्तव में जाति प्रथा को समाप्त करे या कमजोर बनाने में सहायक होंगे ? शायद नही। सर्वोच्च न्यायालय ने भी नवम्बर 992 में मण्डल आयोग की रिपोर्ट के क्रियान्वयन कयने के निर्णय में यह माना था कि मात्र जाति ही आरक्षण का आधार होगी।
जाति के कौन से गुण और कार्य समकालीन समाज में जाति को जारी रखे हुए हैं? आज दो कार्य महत्वपूर्ण मालूम पड़ते हैं () यह शक्ति प्राप्ति करने के लिए अवसर प्रदान करती है और (४) यह सामाजिक गतिशीलता को सम्भव बनाती है (यदि हम श्रीनिवास के जाति के सस्कृतिकरण के विचारों को स्वीकार कर लें) आधुनिक समाज में गतिशोलता--व्यावसायिक, आर्थिक और सामाजिक-शिक्षा, प्रशिक्षण, भौतिक ससाघनों, उपलब्ध भाई भतीजावादी तन्त्र, व्यक्तिगत प्रभाव, सामाजिक परिष्करण (&क्िध्याक्रा), और साथ ही जाति क्रम (070) जैसे कारणों पर निर्भर करती है। अत यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जाति व्यवस्था आगामी वर्षों और दशकों में भी यथार्थ बनो रहेगी।
जाति में गतिशीलता (४०७9 त एञ०)
समाज वैज्ञानिकों ने भारतीय सामाजिक यथार्थ वा वर्ग, जाति, जनजाति, धर्म, और भाषायी समूहों के सदर्भ में विश्लेषण किया है। यही श्रेणिया समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया में अन्तर्ृष्टि प्राप्त करने के लिए भ्रयोग को जाती रहो हैं। पहले जब यह माना जाता था कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज को बन्द व्यवस्था के रूप में बनाए रखती है, अब यह कहा जाता है कि अन्वर्विवाह, श्रेणीक्रम, और अशुद्धता की भावना का व्िकोण दूट रहा है (7.5 5ैगाहं। 902 23) सामाजिक गतिशीलता की समस्या सामाजिक स्तरीकरण की समस्या से सीधे जुडी हुई है। योगेद्र सिंह 974 403) का मत है कि परम्परा-आधुनिकता द्विभाजन (०7८॥०(०७७) ने सामाजिक गविशीलता के अध्ययन में चस्रिक्ष्यों (१८:४७०८८०४४४७) में असमजस (००४५७००) पैदा किया है। इस प्रकार की असमजस की स्थिति पश्चिमी विद्वानों में देखो गई थी। इससे यह माना गया कि परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था में गतिशीलवा थी ही नही जिसे स्तरीक्रण को बन्द व्यवस्था का नाम दिया गया था। यह दर्शाता है कि ये विद्वान वैचारिक पूर्वाग्रह से तस्त थे। एमएन श्रीनिवास (98 : 8-35)
सामाजिक स्तरीकरण 55
मरे कहा है कि जब परम्पतत्मक भारतीय समाज स्थिए (६४००१) ज्क्षण बाला था फिर प्री इसने स्थानीय श्रेणीक्रम में जातियों को ऊर्भूवोन्मुखो (77४४0) तथा अधोमुझखी (00ज्याध्षआत) गतिशीलवा को नहीं रोका। सुरजीत सिन्हा (957) ने भी सकेत किया है कि कई कबीले विजय तथा शक्ति प्राप्ति के बल पर क्षत्रियदा का दावा करके शाही स्थिति तक पहुँच गए।
सिलवस्वर्ग (॥६८:०७८६, 968 : 428) ने विशग (इयण्नालंगा०) के माध्यम से भारत में सामाजिक गतिशीलता को चर्चा की है। आश्रमों की योजना में सन्यास्त व विशण द्विजरों (9०८0०॥) के लिए निर्धारित था। व्यवहार में निम्न जाति के सदस्य भी सामाजिक श्रेणी में अपने स्थान की चचनाओं से बचने के लिए सन्यास्ती हो जाया कात़े थे।
डाल में ही एक प्रक्रिया के रूप में सामाजिक गहिशीलता अधिक सक्रिय हो गई है। एपएनश्रीनिवास ने सम्कृतिकरणण व पश्चिमीकए के माध्यम से इसकी व्याख्या की है। पैकिम मेरियट, डयूमान्ट और रजनी कोठारी ने भी सामाजिक गतिशीलता को विभिन्न स्वरों पर देखा ! एक ओर तो निम्न जादियों के सदस्य जावि श्रेणीक्रम में अपनी सामाजिक प्रस्थिति को उठाने का प्रयल करते हैं, दूसतो ओर, जाति एक समूह के रूप में राजनैतिक शक्ति द्वारा था जातियों के ग़जनैतीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से गतिशीलता प्राप्त करने का प्रथल करती है। अत हम विविध स्तरों पर जादि गतिशीलता का अध्ययन कॉगे () युद्ध के माध्यम से (४) शासकों की सेवा द्वारा (॥) विविध स्व॒रों पर जनगणना द्वारा (0) सामाजिक प्रक्रिया के क्रियान्वयन के माध्यम से, और (५) राजनीति के प्रयोग से ।
युद्ध के माध्यम से गतिशीलता (भ०छ॥9 ॥ाणाहं। १४7९)
एम एन श्रीनिवास और पालिन कोलेण्डा मे मुग़ल काल में युद्ध के माध्यम से होने वाली जाति की गतिशोलता की चर्चा की है! कोलेण्डा ने कहा है कि उसीसवी शवार्दि के पूर्वार्ध में प्रिटिश एकौकरण तक जाति में ऊचा उठने का सबसे प्रभावी तरीका कम घनत्व वाली जनसख्या क्षेत्र में या खाली भूमि में शान्तरिपूर्ण अधिकार करके विजय द्वाय्य सीमाओं पर अधिकार करना था। केएम पनीकर (इतिहासकार) ने कह्य है कि “ईसा पूर्व पाचवी शत्ताब्दि से प्रत्येक परिचित शाही परिवार गैर-श्षत्रिय परिवार से सम्बद्ध था” | कोलेण्डा (998 97) ने कहा है कि प्राचीन भास्त में शासक क्षत्रिय थे, यघ्षपि कृषक जाति के भी कुछ शासक थे जिन्होंने किसी क्षेद्र पप अधिकार कप्के अपना शज्य स्थापित कर लिया। शासक बनने के बाद कृषक विजेताओं ने क्षत्रिय होने का दादा किया ! इस श्रकार कृषक विजेता क्षत्रिय क्रम तक उठ गए।
एम एन श्रीनिवास ने मुगल काल में शिवाजी का उदाहरण दिया है। शिवाजी के पिता बीजापुर के मुस्लिम शासक के जागोरदार थे। शिवाजी ने मुगल शाप्तत को उखाड़ फेंका और अरब सागर से बगाल की खाडी तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। उनकी जाति मग़ठा, शूद्र वर्ण की मानी जातो थी इसलिए शिवाजी धार्मिक सस्कार द्वार क्षत्रिप बन गए। शिवाजी के वर्ण प्रस्थित्रि में उठने के साथ ही उनकी मग़ठा जाति भी क्षत्रिय क्रम में आ गई ($न्ंचराए०5, 7968 : 'िआा०7 7968 . 2-73, [०६॥73, 968 : 97) ।
56 सामाजिक स्तरकरण
शासको को सेवा के माध्यम से गतिशोलदा (०छा्ना॥ क्राए०एण्ट $९-थंग्रडठ रिएलर)
जिन जातियों के सदस्य हिन्दू या गैर हिन्दू शासकों की नौकरी करते थे, उच्च वर्णक्रम प्राप्त कर लेते थे। उदाहरणार्थ, गुजराव के पातीदार जो शूद्र वर्ण का एक कृपक समूह था, शिवाजी के मराठा वशजों गायकवाड्डों का समर्थन करते थे, जो मध्य गुजरात पर शासन करते थे। क्रमश, क्षत्रिय होने का दावा करते हुए उन्होंने अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए (50० 964) । एक दूसरा उदाहरण है कायस्थों का जो लेखाकार जाति के थे (जो मुद्रण के आविष्कार से पहले पेशेवर पत्र लेखक होते थे या जो लेखों की नकल करते थे या आलेखों को रखते थे)। कायस्थों ने पहले तो अपने को मुगलों के लिए और फिर ब्रिटिश शासकों के लिए लाभकारी बनाया। बारहवी शवाब्दि में जब वे निम्न जाति के थे, उन्नीसवी तक उत्तर भारत में ये लोग द्विज श्रेणी तक उठ गए, यद्यपि पूर्व में बगाल में वे शूद्र ही रहे (९०7१७, पा शाश्टएटा?8, 7968 422 23) | बर्टन स्टीन (8फ्राणा 860, 98), एक इतिहासकार, ने भी कहा है कि मध्ययुगीन दक्षिण भारत में परिवार मुस्लिम शासकों से सान्िध्य (४४5०००॥०७) में ऊपर उठे। गतिशीलता की इकाई जाति न होकर परिवार या परिवारों का एक समूह होता था। श्रीनिवास ने सुझाव दिया है कि इस प्रकार की पारिवारिक ऊर्ध्व गतिशीलठा का परिणाम बडी जाति में से एक नयी जाति की रचना में हुआ।
ब्रिटिश शास्नन काल में जनगणना आयुक्तों द्वारा (जातियों को) उच्च प्रस्थिति प्रदान किया जाना
(855ए॥्राए प्राह्ठाश 5६805 (0 ९७५९५) 0७ ए९ (शाड05 (0०ग्रह्मांडड्रणाश5 का छा फलाएब एशस्००)
89] से 93 तक जनगणना में जाति पहचान लिखते समय अनेक मध्यम और निम्न जातियों ने स्वय को द्विंज वर्ण के रूप में पजीकृत कराने का प्रयास किया। 90] के जनगणना आयुक्त ने सभी जातियों को क्रम देने का कार्य किया। सैकड्डों जातियों ने उच्च वर्ण शीर्षक का दावा करते हुए उच्च क्रम सुनिश्चित किया। उदाहरणार्थ, बगाल के कृषक कुर्मा क्षत्रिय होना चाहते थे, तथा तेली वैश्य बनना चाहते थे। प्रत्येक दावे के साथ इतिहास और कथाओं से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे। दावों का मूल्याकन करने के लिए जिला समितियों स्थापित वी गई थीं। कुछ दावे मान लिए गए और कुछ अस्वीकृत कर दिए गए।
सस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से जाति गतिशीलता
(०5६ १0जए 70 5००2) ए70ए९५५९६ 6( $855८८(२४७०७ घाएे रटाफस307॥)
ब्राह्मण, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में जाति प्रथा इतनी कठोर हो गई थी कि आनुवाशिक सदस्यता, अन्तर्विवाह, व्यावसायिक गतिशीलता से इन्कार, तथा सहभोजी और सामाजिक प्तिबन्धों के माध्यम से सदस्यों को हमेशा एक निश्चित प्रस्थिति का लाभ मिलता रहा। परन्तु उन्तीसवी शताब्दि के तीसरे दशक से आगे जाति प्रथा कठोर नही रह सकी क्योंकि
सामाजिक स्तवरीकरण ठा
औद्योगीकरण, नगरीकरण, शिक्षा का प्रसार, कुछ वैधानिक उपायों का क्रियान्वपन और अनेक समाज सुधारकों के सामाजिक आन्दोलनों की अ्रक्रियाएं प्रारम्भ हो चुकी थी। एमएन श्रीनिवास ने 952 में सस्कृतिकरण और नगरीकरण प्रक्रिया के माध्यम से जातियों में प्रस्थिति गतिशीलता को समझाया है। उसका मानना था कि एक निम्न जाति शाकाहाए बन कर और मद्यनिषेध अपना कर एक दो पीढी में श्रेणीक्रम में उच्च प्थिति तक पहुचने में समर्थ होतो थी। ऐसी जादिया ब्राह्मणों के सस््कार, रीवि रिवाज और विश्वास अपना लेती थी और अपने अशुद्ध समझे जाने वाले संस्काएँ को त्याग देती थी।
प्रारभ्भ में श्रीनिवास ने निम्न जातियों द्वारा ब्राह्मण जीवन शैली का अनुकरण करने को चेष्ठा कम्ने को बात कही लेकिन बाद में उसने किस्तो उच्च वर्ण की महत्त्वपूर्ण जाति से अनुकरण की बात कही। लिंच [[ाणा, 4959 28) ने इसे 'अभिजात्य अनुकरण' (८॥८ ००7०३४००४) कहा है। बारनेट (897०0 ने बाह्मणों और ्षत्रियों के जीवन शैली को बणबरों करने को 'गजस्ती मॉडल (॥0/09 77002) कहा है। इस प्रकार ऊर्घ्गामी (००४०) पतिशील जाति ने सस्कृतिकरण या “अभिजात अनुकरण' या 'गजसी अतुकएण के माध्यम से अपनी प्रस्थिति में सुधार करने का प्रयल किया। परन्तु एमएन श्रीनिवास (962 58) ने कह है कि अस्पृश्य लोग कभी भी शूद्रों की सीमा रेखा पार नही कर सके हैं और न ही ऊँची जाति को प्रस्थिति प्राप्त कर सके हैं।
सस्कृतिकएण की प्रक्रिया में कुछ उल्लेखनीय तथ्य इस प्रकार हैं. () सस्कृतिकर्ण को प्रक्रिया आथिक और ग़जनेतिक आधिपत्य से जुड़ी है, अर्थात् सांस्कृतिक प्रभुत्व की प्रक्रिया में प्रभुत्ववाली स्थानीय जाति की भूमिका पर बल दिया गया है। इस प्रकार यद्यपि प्रारम्भ में निम्न जातियों ने ब्राह्मणों का अनुकरण किया लेकिन बाद में स्थानोय प्रभुत्व वाली जातियों की (गैर ब्रा्प जाति) नकल की जाने लगी। (2) सस्कृतिकरण उन जातियों में हुआ जिन्हें राजनैतिक व आर्थिक शक्तिया प्राप्त थी लेकिन सास्कारिक क्रम (कर्मकाडीय) (हएश ग्थयाधगा?) में वे उच्च क्रम पर नहीं थी, अर्थात् उनकी संस्कारिक तथा राजनैतिक-आर्थिक स्थितियों में फासला था। 8) आर्थिक सुधार सस्कृतिकरण को आवश्यक पूर्व शर्त नही है) ६4) सस्कृतिकण्ण एक दोहरी प्रक्रिया है। एक जाति ने न फेवल अपने से ऊची जाति से कुछ लिया बल्कि इसने कुछ दिया भी । 6) गतिशीलता को इकाई समूह है न कि व्यक्ति या परिवार। (6) स्वतत्रता के बाद सस्कृतिकरण को प्रक्रिया कमजोर हो गई ऐ। अब लम्बवंतू (४८॥०४) गतिशीलरा पर बल है न कि समदल (#७770४०॥) पर। (7) सस्कृतिकरण सामाजिक परिवर्वन की व्याख्या मुख्य रूप से सास्कृतिक अर्थ में करता है न कि सरचनात्मक अर्थ में। (8) सस्कृतिकरण किसी समूह के लिए स्वत हो उपलब्धि नहीं दिलावा। समूह को दो उच्च प्रस्थिति प्राप्त करने के लिए अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करनी होती है। (9) निम्न जातियों द्वार अशुद्ध व मलिन पेशा बदलना, मदिणपान बन्द करा, गाय का मास खाना बन्द करता, सुसस्कृत रोति-रिवाज अपनाना तथा विश्वासों और देवों देवताओं को मानना आवश्यक रूप से ऊपर उठना नहीं है। इन क्रियाकलापों का लक्ष्य गतिशीलगा नहीं हो सकता!
सप्कृतिकरण को सम्भव बनाने वाले कारक हैं . औद्योगीकरण, व्यावसायिक गतिशीलता, सचार के विकसित साधन, शिक्षा का प्रसार, पश्चिमी प्रौद्योगिको, और निम्न
58 सामाजिक स्वर्करण
जातियों में मलिन पेशे त्यागने, खराब रिवाजों को तथा सामाजिक प्रथाओं को त्यागने की जामृति। स्वय श्रीनिवास के अनुसार सस्कृतिकरण के विस्तार में प्रमुख सहायक कारक हे मंत्रोच्चाएण (हक्ण75) के साथ से कर्मकाण्डी कार्यों का अलग होना जिसने ब्राह्मण संस्वारं के प्रसार को सुविधाजनक बनाया।
सस्कृतिकरण के साथ ही, पश्चिमीकरण की प्रक्रिया ने भी सामाजिक गतिशीलवा को सम्भव बनाया है। पश्चिमीकरण गैर-पश्चिमी समाज की विचारधारा, मूल्यों, सस्थाओं और प्रौद्योगिकी में परिवर्तन की प्रक्रिया है जो लम्बे समय तक पश्चिमी समाज के साथ सास्कृदिक सम्पर्कों का परिणाम है ($07/085 962 55) | पश्चिमौकरण को प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें प्रौद्योगिकी और तर्क सगतता पर जोर दिया जाता है। डेतियल लख्नर, हैरोल्ड गूल्ड, पमिलटन सिंगर और योगेद्ध सिंह जैसे विद्वान पश्विमोकरण की अपेक्षा आधुनिकीकरण को वरीयता देते हैं। लेकिन श्रीनिवास इस शब्द (आधुनिकीकरण) को 'वस्तुपरक' (&७शुंध०ध०) मानता है (5८एा००७, 88, 986 2)।
सामाजिक गतिशीलता की व्याख्या करने के लिए सस्कृतिकरण को प्रक्रिया के प्रयोग के विरुद्ध निम्नलिखित आलोचनाए की गई हैं ()) देश के कुछ भागों में (जैसे पजाब और पहले का मिन्ध) जातियों द्वार जो कुछ भी नकल किया गया वह सस्कृति परम्पण नहीं थी बल्कि इस्लामी परम्पा थी। सिखवाद का उदय इस्लामी सुफीवाद और रहस्यवादी (00)४४०७०) आन्दोलनों की हिन्दू परम्पपओं के समन्वय से हुआ। 0) सस्कृतिकरण गैर सास्कृतिक परम्पराओं के अनुकूलन (७09080०४) का विवरण देने में असफल रहता है (१४०.४००१४७ 87780, 973 )। 0) श्रीनिवास को प्रक्रिया (सस्कृतिक्रण की) केवल भारतीय समाज में (जहा जाति व्यवस्था मौजूद है) सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करती है। यह अन्य समार्जों के लिये लाभप्रद नहीं है।
'राजमैतोकरण के माध्यम से जाति गतिशोलता (९०५९ >ैण्ञाए एत्ठ्ण्टा एगा्ष॑तंइवए0ा)
अनेक जातियों ने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये या अपनी स्थिति को सुधारने के लिए राजनीति का सहाय लिया है ! एलीनर जेलियट (&॥८३६४० 7.00०0 के अनुसार राजनीति का लाभ सरकारी लापों को श्राप्त करने और राजनीतिक सस्थाओं और विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं * महाराष्ट्र के महार, गुजरात के क्षत्रिय, तमिलनाडू के नादर, और आन्ध प्रदेश के रेड्डी और क्म्मा लोग।
महाराष्ट्र के महायें ने, जो राज्य कौ कुल जनसख्या के 0 प्रतिशत हैं (राज्य में कुल 3 प्रतिशत अनुसूचित जादि जनसख्या का) प्रासम्प में सामाजिक पतन की दशाओं में काम किया, लेकिन आखिरकार अपनो सामाजिक दशा को सुधारने के लिए राजनीति का सहाय लिया। अम्बेडकर ने उन्हें राजनैतिक शक्ति के रूप में सगठित किया और अनुसूचित जाति का एक महाप्षघ बनाया जो अन्त में सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक समानता के उद्देश्यों को आप्त करने हेतु शजनेतिक साधन के रूप में प्रयोग किया गया। महांर, जिनें अस्पृश्य समझा जाता था, चौकीदार, सन्देशवाहक, सडकों को सफ़ाई, दूसरे गाँवों का मृत्यु
सामाजिक स्तरकरण 59
सन्देश लाने ले जाने, आदि का काम करते थे। मन्दिए, स्कूल और कुए उनके लिए बन्द थे। बाद में (860 से बाद) उन्होंने फैक्ट्रियों, रेलों, गोदी, आदि में कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। ओ गाँवों में रहते थे उन्होंने पी परम्परागत निम्न व्यवसायों को छोडना शुरु कर दिया। कापी बडी सख्या में वे सेना में भी भर्ती हो गए। सैन्य सेवाओं ने उन्हें सामाजिक श्रेणीक्रम में ऊँचा उठने में ही मदद नही की बल्कि परिचमी सस्कृति के द्वार भी उनके लिए खुल गए। कुछ महार ईसाई बन गए जबकि कुछ ने कबोर व यमादि पथ अपना लिया, जो समानता के पक्षपर थे। 936 में अम्बेडकर के नेतृत्व में उनके मन्दिर प्रवेश प्रयास ने ग़जनैविक आन्दोलन का रूप ले लिया, हिन्दुत्व को पूर्णरूपेण अस्वीकार कर दिया। 937 में अम्बेडकर ने स्वतत्र लेबर पार्ट (8७०० 7०5) की स्थापना की जिसमें अधिकतर टिकिट महार लोगों को ही दिए गए। तब से रिपब्लिक पार्टी (२९७४० एआए) तथा 946, 95], 39% के चुनावों के माध्यम से पहारों ने महराष्टू को शजमीति में अपने को महत्वपूर्ण राजनैतिक बल के रूप में स्थापित कर लिया है।
रजनी कोठारी और रुशिकेश मार (छघ७आतव्आ जैग७, 973 , 70-00) मे गुजग़त के कुछ मध्यम और निम्न जाबियों तथा आर्थिक दृष्टि से पतित समुदायों के उदाहरण दिये हैं, जिन्होंने राजनैतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए 940 और १950 के दशकों में एक सामान्य सगठन महासघ के रूप में बनाया। काग्रेस के विरुद्ध चुनाव जोतने के बाद उम्हें क्षत्रियों में स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार राजनीति उनके लिए सुदृढ़ बन गई।
राबर्ट हाईप्रेव ((२कलत सडक 2५8 37, 973 02-26) ने तमिलनाडु में नादरों के बीच एकता और सामजत्य ओर इसकी एकीकृत पजनैतिक सस्कृति का परीक्षण किया। अन्य जातियों पर आर्थिक निर्भरता की समाप्ति तथा विस्तृद भौगोलिक क्षेत्र पर जाति बन्धनों के विस्तार ने इस जाति (नादरों) को एक नयी दृढ़ता प्रदान को जिसने उन्हें सामाजिक, आर्थिक, और ग़जनेतिक दृष्टि से उठा दिया। आर्थिक रूप से अपनी प्रस्थिति में सुधार करने के बाद उन्होंने क्षत्रिय पद का दावा किया। 92। की जनगणना में सभी नादसों ने स्वय को नाद६ क्षत्रिय घोषित कर दिया। आज नादए दक्षिण में आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से सबसे सफल समुदायों में से एक है।
ये सभी ठदाहरण प्रकट करते हैं कि निष्न जातियों ने किस प्रकार राजनीति का प्रयोग था ॥ प्रजनीतिक शक्ति, जावि एकता, और आखिरकार ममाज में उच्च स्थिति प्राप्त कर
॥।
केणलशर्मा (६॥.. इकछग्रा>, इ०ट्ल शबवव्टटका ह वीध्योग, १०7- 58-73) ने सामाजिक गतिशीलता के तीन दृष्टिकोों कौ ओर सकेत किया है सरचनात्मक ऐतिहासिक, मार्क्सवादी, और सस्कृतिवादी (ऐश॥००झ्ाव्य) अथवा भारतशाल्लीय (770 ०टा८४) । एआर., कामत (8२ ॥(००१०७) ने प्रथम दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए महागरष्ट में जाति गतिशोलवा की व्याख्या को है जिप्में उसने कहा है कि पुएने शहरी वर्चस्व वाले राजनैतिक नेतृत्व के स्थान पर नेठाओं को नयी व्यवस्था आ गई है जो उनत ग्रामीण तत्वों, विस्तृत राजनैतिक चेतना, और राजनैतिक लोकतंत्र में विश्वास रखते है। मार्क्स्वादी दृष्टिकोण का प्रयोध आविन्द दास (#फर्णत 095, ॥984 . 66-9) और ह5षान एव, प्रमाद (88089, ल. ९:४5७४, 979 : 48) ने बिहार में अन्तर्जादीय
60 सामाजिक स्वरशकाण
व वर्ग सघर्षों के विश्लेषण करने में किया है। सामाजिक गतिशीलदा की व्याख्या यजमानी अथा के पतन और आधुनिक व्यवसायों के उदय (उधछाग्ा&, 974), अस्पृश्यता और अशुद्धता शुद्धता सिद्धान्त के पतन (0703 986), और शिक्षा, सरक्षणात्मक भेदभाव की राज्य की नीति और सामाजिक आन्दोलनों के सदर्भ में भी की जा सकती है।
जातिवाद ((७शंत्रा0)
जातिवाद और साम्म्रदायिकतावाद तथा इनके साथ हिंसा की बढती प्रवृत्तियों ने विभिन जातियों मे आपसी सन्देह और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। जाति में उच्च पदासोन व्यक्ति नियुक्तियों और प्रोन््लति भें अपनी जाति या उपजाति के सदस्यों को वरीयता देते हैं। इससे जाति के प्रति निष्ठा इस सीमा तक बढ जाती है कि (0) एक जाति दूसरी जाति पर हावी होने का प्रयल करती है, (॥) उच्च जातिया निम्न जातियों का शोषण करती हैं, (00) चुनाव जाति आधार पर लडे और जीते जाते हैं, (४) समाज में अन्तर्जातीय संघर्ष बढ जाते हैं। यद्यपि जातिवाद, अन्तर्जातीय सघर्ष, और जातीय हिंसा की घटनाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक पाई जाती हैं, लेकिन शहरी क्षेत्रों में भी ये घटनाएँ होती रहती हैं।
स्वतत्र भारद में विभिन्न जातियों के बीच प्रतिस्पर्धा सामान्य स्थिति मालूम पडती है। लोगों के हाथों में राजनैतिक शक्ति आ जाने के कारण जातिया दबाव-समूह बन गई हैं और 'शक्ति के लिए स्पर्धारत हैं तथा अपने जाति बन्धुओं के लाभार्य शक्ति का प्रयोग कर रही हैं। ऐसे उदाहरण दिये जाते हैं जिनमें कुछ वर्ष पहले एक राज्य में एक बडी सख्या में पुलिस में यादवों को भर्ती किया गया क्योंकि राज्य में एक यादव व्यक्ति सर्वोच्च ग़जनैतिक पद पर आसीन था। 950 के दशक में एक राज्य में रेड्डी जाति के मुख्यमत्री ने बहुत से रेड्डी लोगों को मत्री बना दिया। एक राज्य में एक जैन अधिकारी ने जैनियों को और एक राजपूत अधिकारी ने राजपूर्तों को नियुक्तियों में वरीयता दी। यह प्रवृत्ति न केवल ओन्य जातियों के लिए घृणा में वृद्धि करती है बल्कि देश भें जाति सघर्षों को भी जन्म देती है॥ ऐसे संपर्ष उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, तमिलनाडू, कर्नाटक, गुजरात और महाराष्ट्र मे बहुत होते हैं। जब एक भौगोलिक क्षेत्र में कोई जाति दूसरी जाति से अधिक प्रभावशाली हो जाती है तब यह आर्थिक व गजनैतिक शक्ति प्राप्त कने का प्रयास करके प्रभुत्व वाली जाति बन जाती है। जब कोई जाति एक प्रकार का प्रभुत्व रखती है तब यह कालान्तर में अन्य प्रकार के प्रभाव भी प्राप्त कर लेती है।
जाविवाद अपने सदस्यों में ऐसी निष्ठा पैदा कर देता है कि वे अपने एकता को अपनी धांक जमाने या वचित जातियों के शोषण के लिए प्रयोग करने लगते हैं। इसके सबसे अच्छे उदाहरण बिहार में भूमिहारों, यादवों, कुर्मियों, और दलितों में पाए जाते है।
राजबीति में गत कुछ दशकों से जातिवाद चुनाव लडने के लिए उम्मीदवारों के चयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा है। वोट माँगने में भी इस कारक का अच्छी तरह नकदीकरण किया जा रहा है।
जून 962 में स्थापित राष्ट्रीय एकता समिति भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और साम्पदायिकता की समस्याओ को सुलझाने में सक्रिय है। 968 में राष्ट्रीय एकता समिति ने
सायाजिक स्तरीकरण ह्य
इन समस्याओं से निपटने के लिए अलग समितिया बनाई। इन सभो समितियों ने दिशा निर्देश, कानून व प्रशासनिक कार्यवाही आदि के लिए अनेक सुझाव दिये हैं। 970 तक ये सब कार्यवाही रुक गई। 980 में राष्ट्रीय एकता समिति की पुनश्थापना हुई और फिर 984 मं। इस बार भी तीन समितिया बनाई गई लेकिन वे भो कुछ ठोस कार्य न कर सकी। सितम्बर 7986 में राष्ट्रीय एकता को बढाने के लिए पांच सदस्यों की एक उपसमिति गठित की गई। फरवरी 3990 और फिर 998 और जुलाई 993 में एक औए स्वरूप इस समिति का निकला लेकिन आज तक (नवाबर, 2000) राष्ट्रीय सौहार्द बनाने और जातिवाद तथा साम्प्रदायिकता को ऐकने की दिशा में कोई हल नहीं निकल पाया है।
सपरानता और सामाजिक सरचना के प्रकरण (557९5 ण ए्चुए॥ शत 80०67 $770ठ77९)
सामाजिक असमानता का मुद्दा भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। किप्ती समाज के सामाजिक स्तरीकरण का अध्ययन, भले ही वह जाति या वर्ग पर आधारित हो, अधिकतर अममानता को समझने से ही सम्बद्ध है!
ल्यूइस डयूमान्ट (00५५ 009070) एक फ्रासीसी समाजशाल्री ने एक भिन आधार पर जाति व्यवस्था में असमनता को व्याख्या की है। उसकी मान्यता है कि श्रेणीक्रम, न कि असमानता, समानता का विलोम है। उसने जाति्था में श्रेणीक्रम को शुद्धता और अशुद्धवा के अों में समझाया है, जो कि उसके अनुसार जाति व्यवस्था का मूल सिद्धान्त है। उसके अनुसार 'श्रेणीक्रम' में अशुद्धता पर शुद्धता की श्रेष्ठता, अशुद्धता से शुद्धता की पृथकवा, तथा श्रम विभाजन में शुद्ध व्यवसायों की अशुद्ध व्यवसायों से पृथकवा निहित है। इस प्रकार वह (४) दो विशेधियों (०००४/९७) वी “श्रेणीक्रमता' में सहअस्तित्त (००-८5 ८८०) की, (0) भ्रेणीक्रम के प्राकृतिक असमानताओं से या शक्ति वितरण से बिल्कुल स्वतत्र होने की, (०) जातियी के क्रम (8) का धार्मिक प्रकृति का होना और (0) श्रेणीक्रम घेरने वालों (ह॥00ग्रा055८४) ७ घिरे वालों (०४००४७३७८०) के बीच का सामबन्ध होने की बात कर्ता है। डयूमान्ट को जाति की विचारधार और जाति व्यवस्था में श्रेणीक्रम की घारणा पश्चिमी विद्वानों (रिजले, मेयर, मेरियट, आदि) के विचारों से बिल्कुल भिन्न है जिन्होंने इसको व्याख्या पश्चिमी अवधारणाओं के प्रकाश में की है, जैसे, व्यक्तिवाद, समतावाद, आदि । वह श्रैणीक्रम को वर्ण मिद्धान्त से जोइवा है, जिसमें क्रमोकरण ((7803000) सम्मिलित है, लेकिन शक्ति और सत्ता दोनों से भिना है। हिन्दू समाज में राजा का पुजारी के आधोन होना धार्मिक ससस््कार से क्रम है। डयूमान्ट मानता है कि श्रेणीक्रम के पेरे में वर्ण विभाजन और जादि व्यवस्था दोनों ही हैं। इस प्रकार वह जाति के भीतर व जातियों के बीच व्यवहार और अन्त्क्रिया में दैचारिक उन्मुखता को महत्व देता है। वह यह भी मानता है कि श्रम का परम्पशगत विधाजन (यजपानी प्रथा), विवाह का नियमित होना, और सामाजिक सम्पर्क आधिक व सामाजिक तर्क की अपेक्षा श्रेषीक्रम या धार्मिक मूल्यों पर आधारित होते हैं।
टीएनमदान (4.3. १४३४एंगा - “07 पर ऐिगणार ण॑ (क्वाए गा पाता प्रा (एमाएफपालए क्0 खि&दण 3०८०/०७/ ९०.5, 97), देखें, उसो का लेख, [एव एफ्का9 (९१), उन््दद् उ#ब्धुमवए०ा, 7997 74-83) ने डूयमान्द के भ्रस्थितिं और
62 सामाजिक स्तरीकाण
शक्ति के बीच असम्बद्धता (ठाज्ञुण००४०४) के विचार के विपरीत प्रश्व उठाया है। वह कहता है कि प्रस्थिति (ब्राह्मण) के आगे शक्ति (राजा) की आधीनता समझदारी में कठिनाई पैदा करती है। यह दृष्टिकोण चतुराई पूर्ण है लेकिन समझ में सन्तोषप्रद नहीं है। असमानता के विश्लेषण में हमारी मान्यता यह है कि उस असमानत्ा का जो सदियों के आर्थिक ठहराव (६98747००७) के कारण पैदा हुई जिससे वर्गों के बीच जीवन अवस्ों में अन्तर पैदा हुआ, और उस असमानता का जो परम्परागत मूल्यों, सामाजिक प्रथाओं, और जाति प्रथा द्वाय लगाए गए प्रतिबन्धों के कारण उत्पन हुई, दोनों के अध्ययन के लिए समाजशास्तीय विश्लेषण की आवश्यकता है। ऐतिहासिक दृष्टि से असमानता के समाजशासत्रीय बोध (ए४०८४०॥५४४७) को ओर पहला कदम तब उठा जब लोगों कौ अस्तित्व कौ दशाओं में असमानतओं की ओर ध्यान जाने लगा। जौवन के प्रति हिंदू दृष्टिकोण इस असमानता को भिल-भिन जातियों में व्यक्ति के विभिन क्रमों में जन्म लेने से सम्बद्ध है जिसके कारण व्यक्ति की अयोग्यवाओं, अभिरुचियों और आकाशक्षाओं में अन्त होता है। रुसो (00055०३७) ने राजनैतिक असमानताओं की बात कही है, जैसे घन, सम्मान और शक्ति जो कि परिपाटो पर आधारित होती है और व्यक्तियों की सहमति से अधिकृत होती है। यद्यपि लोग इन परिषाटियों (००॥४८०७४०॥७) को त्यागने के लिए और नयी परिषाटिया स्थापित करने के लिए स्वतत्र होते हैं, फिर भी यह स्पष्ट नही है कि असमानताए, जिनसे मनुष्य पीडित हैं, किस प्रकार इतने लम्बे समय से चली आ रही हैं। जब हमने अपने समाज में मनुष्यों के बीच असमानताओं की तुलना अन्य समाजों से करनी शुरु की, तब से स्तरीकरण के स्वरूप और गतिशीलता की दर की तुलना करने के लिए-पहले औद्योगिक समाजों मे फिर कृपक समाजों में--समाजशासख्रीय दृष्टिकोण का प्रयोग किया गया। परम्पय्गत भारतीय समाज में श्रेणोक्रम और सामाजिक असमानवाओं का आपाःर शुद्धता और अशुद्धता का विचार ही था! आधुनिक औद्योगिक समाज में असमानताओं का आधार 'उपलब्धि' है जो “खुली और स्वच्छ प्रतिस्पर्धा' का परिणाम है। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ बताते हैं कि हमार समाज चार क्यों और एक प्रकार के पारस्परिक सम्बन्धों में व्यवस्थित अनेक जातियों में विभक्त था। जब तक जातियों का सम्बन्ध धर्म से जोडा जाता रहा तब तक लोगों ने परस्थिति श्रेणोक्रम स्वीकार किया! यह जुडाव बीसवी शत्ाब्दि के 920 और 930 कौ दशकों तक जारी रहा। पश्चिमी सस्कृति से सम्पर्क, शिक्षा का प्रसार और औद्योगीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया ने लोगों के विचार बदल दिए। उन्होंने मानवरचित असमानताओं की चर्चा शुरु कर दी। देश की राजनैतिक आजादी ने उन्हें असमानताओं के प्रश्न को उठाने और सामाजिक न्याय मागने का अवसर प्रदान किया। केलकर, मण्डल, आदि जैसे आयोगों की सिफारिशों तथा जाति व समुदाय के आधार पर वोट मागने की राजनीतिक क्रियाओं ने उन्हें समानता के अवसर को माग करने दथा सामाजिक अन्याय को दूर कले की माग करने की अधिक श्रेएणा प्रदान की । इसमें आश्चर्य नहीं कि उपेक्षित जादि ओर वर्ग वो नौकरियों, विधायिकाओं, और शैक्षिक सस्थाओं, आदि में सामाजिक न्याय के माम पर आरक्षण मिलने लगा। जियों को भी इस न्याय के मिलने में सफलठा मिली जबकि कुछ राज्यों में पचायतों में ल्ियों के लिए 20% स्थान आरक्षित कर दिए गए और दिसम्बर, 998 के मध्य में और फिर दिसम्बर 999 में रियों के लिए 33% स्थान आरक्षित रखने के लिए
साप्ानिक स्तरीकरण 63
एक विधेयक ससद में अस्तुत किया गया।
लेकिन जाति, वर्ग और समुदाय के आधार पर सामाजिक असमानताओं को समाप्त कले के प्रयासों ने कुछ जातियों और समुदायों में कुण्ठा उप्तन कर दी है जिनका परिणाम अनेक आन्दोलनों और हिश्वात्मक कार्यवाहियों के रूप में हुआ है। इस प्रकार शिक्षित च्यक्तियों और स्वार्थी राजनीतिज्ञों के विचारों कौ अतिवादी प्रतिक्रियाए कुछ अधिक चिन्ताजनक हैं। इसमें सन्देह नहीं कि सामाजिक और सास्कृतिक जोवन मे विकास के मार्ग में काफी परिवर्तन कर दिए हैं। इन बुपइसों को दूर करने के लिए कई सुझाव भी दिए गए हैं। सामाजिक क्रमीकरण को कम करने पर विचारों और मूल्यों का केवल एक सामान्य स्वरूप ही सामाजिक असमानताओं को कम कर सकता है और लोगों की विभिन श्रेणियों का न्याय प्रदान कर सकता है।
आद्रे बेतेइ (02409॥9 #ए०णह शा, 977 * 49) ने शक्ति (70९) और असमानव़ा के बीच सम्बन्धों की चर्चा की है। शक्ति अप्मानता बनाए रखती है तथा यह असमानवा का रूप भी बदल देती है। जाति व्यवस्था में मनुष्यों के बीच असमानता केवल इसलिए ही स्वीकार नही की गई थी क्योंकि यह विश्वास था कि लोगों को विविष गुण प्रदत हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि जातियों को शक्ति के साधन के रूप में देखा जाता था। जैसे ही ब्रिटिश लोगों द्वात सघालित शक्ति के नवीन साथनों ने श्रेणीक्रम और जाति की शक्ति (न्यायालय द्वाग़ जाति पचायतें की शक्ति छोन लेने के बाद) से अपना समर्थन वापस लिया, अीक्रम स्वय हो दूटने लगा। वर्ग व्यवस्था में जिनके पास भूमि या सम्पत्ति होती है, वही व्यक्ति भूमिहीनों और सामत्तिहीनों पर हावो रहते हैं) शक्ति असमानताओं के समाजशास्त्रोय विश्लेषण में दो बातों पर ध्यान दिया जाता है , एक, दूसरों पर कुछ लोगों का शक्ति वर्चस्व और दो, उनके पास नियमों की व्याख्या करने, परिवर्तन करने और बनाने की शक्ति जिनसे उतके सहित, सभी बंध जाते हैं। साथ ही, इस विश्लेषण में शक्ति का विस्तार भी महत्वपूर्ण है। एक हो व्यक्ति या समूह सपाज के हर क्षेत्र में समान रूप से शक्ति नही रखता। हम यह भी पूछते हैं कि कहा तक वे विभिन्न व्यक्ति जी एक या अनेक केत्रों में शक्ति रखते हैं और उसका प्रयोग करते हैं, एक सम्बद्ध (००॥८५६८) समूह के रूप में रहते हैं जो शेष समाज में स्पष्ट रूप से चिन्हित होता है बिहार में शक्ति की असमानता ने जाति सेना और जाति सहार को जन्म दिया है।
प्रस्थिति और शक्ति में असमानताओं को चर्चा के बाद सामाजिक अस्तित्व (९४५६७८९) की सामान्य दशाओं (ए७8७:०॥ ८००४०७००७) में अस्रमानताओं का सन्दर्भ भो आवश्यक है। बहुत बडी सख्या में लोग असमानता को वर्गों में समाज के विभाजन और घन के अप्तमान वितरण के सत्दर्भ में देखते हैं। ओद्योगिक समाज का दो अणियों--पूजीवादी और समाजवादी-में विभाजन का जन्म सामाजिक यर्ग से ही हुआ है। पूजीवादी समाज सम्पत्ति के निजी स्वामित्व के माध्यम से संगठित होते हैं और इन समाजों में वर्ग की उपस्थिति को मुक्त रूप से स्वीकाग़ जाद्य है, जबकि समाजवादी समायों में इसे सशर्त स्वीकाय जाता है। क्या समाजवादी रुमाजों में निजो सम्पत्ति के उन्मूलन से वार्ग अदृश्य हो गए हैं ? आद्रे बेतेइ (वही . 75) मानता है कि क्योंकि रूस और अन्य
' समाजवादी देशों में अभी भी असमानावाएं विधमान हैं तो यह निश्चित है कि अप्मानता
64 सामाजिक स्तग्नेकरण
से कही अधिक विस्तृत धारणा है।
अस्थिति, शक्ति और आय के सदर्भ में सामाजिक असमानवाओं की बात करते हुए एक अश्न उठाया जा सकता है. क्या समतावादी (८४ए०गंथ) समाज सम्भव है ? क्या यह अतीत में भी था ? क्या भविष्य में इसका उदय हो सकता है ? यद्यपि हमारे सभी आधुनिक समाज समानता के वायदे पर बने हैं, फिर भी समतावादी समाज को सम्मावना अतीत नही होती। बेतेइ ने (वही 53) यह भी कहा है कि जब तक मूल्याकव और सगठन सामाजिक जीवन के अभिन्न अग बने रहगे, असमानता की समस्या का अस्तित्व भी जाए रहेगा। हम समठावादी समाज को दो स्तरों पर सोच सकते हैं एक, जिसमें विभिन्न स्थितियों में एक ही शक्ति और प्रतिष्ठा हो, और दो, जिसमें सभी सदस्य शक्ति कौ ओर प्रतिष्ठा की सभी स्थितियों का लाभ लेते हों। लगभग सभी लोगों द्वार यह स्वीकार किया गया है कि भविष्य में ऐसे समाजों के होने को कल्पना मात्र भी भ्रमात्मक है।
जाति ओर राजनीति (08५९ 0 शणात्७)
जाति और राजनीति के बीच सम्बन्ध का दो स्तर पर विश्लेषण किया गया है * एक, जाति
राजनीति को किस प्रकार प्रभावित करती है, और दो, राजनीति किस प्रकार जाति को प्रभावित
48 है। सर्वप्रथम हम इस सम्बन्ध को राजनीति में जाति की जागृति (चेतना) के अर्थ मे ।
| चेतना (6 #क्षताशा९55)
राजनीति में भिन्तर जातियों कौ चेतना और रुचि को चार कारकों के प्रकाश में अध्ययन किया जा सकता है राजनीति में जाति कौ रुचि, जाति का ग़जनैतिक ज्ञान व ग़जनैतिक चेतना राजनैतिक दलों से जातियों की पहचान, और राजनैतिक मामलों पर जातियों का प्रभाव। इन चारों पक्षों का अध्ययन अनील भट्ट ने 970 के दशक में चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, गुजरात पश्चिमी बगाल, और आम्धर प्रदेश) में विभिन पृष्ठभूमियों के उच्च, मध्यम व निम्न जावियें के ]73 व्यक्तियों पर किया। सभो जातियों को एक साथ लेने पर राजनीतिक रूचि के विश्लेषण करते हुए उसने पाया कि लगभग 25 प्रतिशत जातियों की राजनीति में बहुल रूचि 45 प्रतिशत को सामान्य रुचि, और 30 प्रतिशव को कोई रूचि नहीं थी। देश में प्रमुु राजनीतिक समस्याओं और राजनीतिक आग्रेपों की चेतना के सम्बन्ध में उसने पाया विं मध्यम और निम्न जातियों की अपेक्षा उच्च जातियों में अधिक रूचि थी। जाति प्रस्थिति औः राजनीतिक दलों के स्गथ पहचान के बीच उसने कोई सम्बन्ध नहीं पाया। अत में उसने पाय क्ि कुछ जातिया ही राजनीतिक दृष्टि मे, ्रणहशील, दें. नए, फेत्पर, कुछ, दी, ग्ों, में, मष्यः और निम्न जातियों का प्रधुत्व है।
सम्बन्ध टावर एश॑भा०णाज़ंए)
रजनी कोठारी (970) ने जादि और राजनोति के बीच सम्बन्धों का इस विषय का विश्लेषः करके परीक्षण किया कि जातियों के वोटों के कारण ग़जनोति व्यवस्था पर क्या अभाव पड0
प्रामाणिक खर्नेकरण 65
है। उसने पाया कि तीन कारक--शिक्षा, सरकारी सरक्षण, और धीरे-धीरे विस्तृत मताधिकार (8-2 वर्ष के युवा भी मददान प्रक्रिया मे शामिल है)। जाति व्यवस्था में प्रवेश कर गए हैं जिसके कारण इनसे राजप्ैतिक व्यवस्था प्रभावित्र हुई है। नये नेतृत्व तथा नमी सष्याओं द्वाप प्रदत शक्ति के पद, प्रशासनिक सरक्षण और आ्थिक अवसरों ने जातियों को राजनीति में घसीदा। जाति के राजनीति में सलान होने के दो परिणाम हुए - जाति व्यवस्था ने राजनैतिक गतिशीलता के लिए नेतृत्व को सरचनात्मक और वैचारिक आधार उपलब्ध कराया और दूसरा नेतृत्व स्थानीय राय को छूट देने और आर्थिक तथा राजनैतिक उद्देश्यों के लिए जातियों को सगठित करने के लिए बाध्य हो गया। एजनीवि में जाति के प्रयोग का विश्लेषण रजबी कोठारी ((क्का& ॥7 खिवीक्षा 7०0८७, 973) ने दो अवस्थाओं (६98०७) में किया। प्रथम अवस्था में बुद्धिजीवी और उच्चताबद्ध (॥80 ८१४८॥०४८४) जातियों (जैसे, आन्चर अदेश में रेड्डी, गुजग़त में पट्टीदार, कर्नाटक में लिंगामत, बिहार में भूमिहर, और राजस्थान में राजपूत) और ऊची आगरेही (आ68 »८॥१॥) जातवियों (जैसे, बिहार में कायस्थ, राजस्थान में जाट) के बीच बैर भाव (३/०६०आं5४ए) तथा क्रोध या विरोध (॥६5७४।गाव्ण) सम्मिलित है। दूसरी अवस्था में स्र्धारत (००॥७८७ा९) जातियों (उच्चताबद्ध व आग्रेही) के भीतर ही गुटबाजी और विखण्डीकरण ((४606०/७४४०४) तथा बहुजावीय और बहु-गुटोय गठजोड़ (४॥9प्राधग७) का विकास सम्मिलित है। निम्न जातियों को भी उच्च जाति के नेताओं का समर्थन करने और एक भुद को मजबूत करने के लिए लाया जाता है | प्रथम अवस्था में जाति के केबल तीन अबयव (८०॥॥७०॥८॥/७) शामिल हैं . जाति की शक्ति सरचना, आर्थिक लाभों का पित्ताण, और जाति चेतना। लेकिन दूसरी अवस्था में जाति के अन्य अवयव जैसे जाति चेतना, असामी (लाया) निष्ठा, आदि शामिल हैं। कोठारी ने प्रथम अवस्था में तीन उप-अवस्थाए बताई हैं। पहली उप-अवस्था में पहले तो शक्ति और लाभों के लिए सपर्ष उच्चताबद्ध जातियों (८॥##८॥८॥८6 ८४६८४) (अथवा उन जातियों वक जो आधिक और राजनैतिक रूप से तो अत्यधिक प्रभाव डालती थी लेकिन सख्या की दृष्टि से नहीं) तक ही सीमित रहता है। दूसरी उप-अवस्या में आरोहित (8५८०८४०३७) जातिया (अर्थात् असन्ह॒ष्ट व उच्च भूमिका आकाक्षी जातिया) भी शक्ति के लिए स्पर्धा करना शुरु कर देती हैं। तीसरी उप-भवस्था में उच्चताबद्ध व आगेहित जातियों के बीच न केवल प्रतिस्पर्धा होतो है (शक्ति और लापों के लिए) बल्कि इन जातियों के भीतर भो होतो है। दूसरी अवस्था में, जिसे गुटवाजी और विखण्डनबाजी की अवस्था भी कहा जाता है, नेतृत्व में दरार पडने लगती है तथा बहु-जातीय एव बहु-गुरीय मठजोड भी हो जाते हैं। इससे राजनीदि में विजषेषी जाति नेताओं की समस्या भी उसने हो जाती है। ये नेता जनता को भी शामिल कर लेते हैं बर्योकि वे लिदा) विघ्तृत क्षेत्र में अपना प्रभाव जम्ताना चाहते हैं। दस्त अवस्था में नेतृत्व में भी परिवर्तन होता है। कोठापे ने जाति और एजनौति के बोच सम्बन्ध पर तीसरी अवस्था की बात भो कही है। प्रथम अवस्था भें जय उच्चताबद्ध (८७४८0) जातिया पहले राजनोविकृत होतो हैं और आगेहित उच्चता प्राप्त (४६८८४०९:७/) जातिया अपेक्षाकृत उपेक्षा के भाव से क्रोध अभिव्यक्त करती हें (नेसे महायाष्ट में द्राह्मनों की उच्चदाबद्ध जाविया और मणठों की उच्चता प्राप्त जातिया) दूघरी अवस्था में स्पर्धी जातियों के भौवर गुटबाडी का उदय होने लगा है
7] सामाजिक स्तरीकरण
और निम्न जातियों को भी समर्थन के लिए लाया जाता है और तीसरी अवस्था में जाति के
अतिरिक्व अन्य प्रकार की पहचान महत्वपूर्ण हो जाती है। यह बढती शिक्षा, शहरीकरण और
आधुनिक उपलब्धि उन्मुखता को अपनाने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार बहु-आयामी (००४५-०ए७०७) निष्ठाओं का उदय होता है।
जातियों के विलय की प्रक्रिया डी एम के पार्टी तमिलनाडु और महाराष्ट्र में रिपब्लोकन पार्दी (ए८ए०७॥८४७ एक) ने दर्शायी है (महार और अन्य अस्पृश्य जातियों कौ)।
४ गजनीतिक दृष्टि से शक्तिशाली है लेकिन दूसरी ने अभी अधिक शक्ति प्राप्त
नही की है। इन दिलों ग्राम स्तर पर पंचायतों में चुनाव अक्सर एक दूसरे के वोट काटने
(००४५-८७(७४९) पर आधारित होकर लडे जाते हैं। अब बहुत बडी सख्या में भूमिहीन
जातिया वोट शक्ति रखती हैं, अत वे परम्पणगत शक्तिशाली जाति को चुनौती देती हैं
जिसके पास भूमि नियत्रण के कारण शक्ति होती है। बल (विश 6०:॥727॥) जातियाँ तथा उच्चता प्राप्त (४६०८००५॥५) जातिया अक्सर क्षेत्र के प्रमुख दलों से बँधी होती हैं, और दलीय सगठन के माध्यम से ही उर्ध्व (५०४०0) गतिशौलता होती रहती है। अत आज इस प्रकार एक ओर जाति केवल बाह्य राजनेतिक समर्थन आपार (छहलफऑएए एणाह८॥॥ 50ए7०( ७०६८) खो देठी है और दूसरी ओर यह राजनीति को अत्यधिक प्रभावित करती है।
जाति और राजनीति के बीच वर्तमान सम्बन्धों से कोठारी चार निष्कर्ष निकलता है
() राजनौति में नये अभिजात समूह का उदय हुआ है जो विभिन्न जातियों से आया है लेकिन एक सामान्य घर्मनिस्पेक्ष दृष्टिकोण में भाग लेता है और कुछ मूल्यों के सन्दर्भ में समरस (#ण7०2८॥९०७७) भी है।
) जातियों ने नवीन सगठनात्मक स्वरूप धारण कर लिया है। इस पकार () अब विविथ स्तरों पर जादि सप कार्य कर रहे हैं (विश्वविद्यालयों, होस्टलों, क्लबों, सरकारी कार्यालयों आदि में) (0) जाति सम्मेलन विस्तृत आधार वाले हो गए हैं (0) जाति महासघों का उदय हुआ है।
6) जातियों ने गुटोय आधार पर प्रभावित करना शुरु कर दिया है। ये गुट न केबल राजनैतिक समूहों को विभाजित करते हैं बल्कि सामाजिक समूहों को भी।
(4) जाति परिचयों (0&77297००७) ने चुन्मव व्यवस्था को एक नयी सार्थकता (:९०४३॥८९०) प्रदान की है। न केवल बडी जातिया राजनोति को प्रभावित करती हैं बल्कि छोटी जातिया भी वोट मागते समय महत्वपूर्ण हो गई हैं।
जाति और मतदान व्यवहार (0४३6 806 जगत एश्ाइ्नशंगणा)
मतदान जातियों को अपना प्रभाव दर्शाने का एक अवसर प्रदान करता है। रजनी कीठारी 0970), लिण्डजे गार्डनर, मिल्लर (950), को (६८४, 955), कैम्पबेल (960) और नारमन पामर ()४०४७७॥ 72७००, 976) जाति को मतदान निर्धारक मानते हैं। जिस अ्कार ब्रिटेन में मतदान वर्ग-निर्धारक है, अमग्ेका में भ्रद्मति 73८८) निर्धारक है, भारत में
सामाजिक स्तरीकरण हा
यह जातिननिर्धाएक है। जो जातियाँ श्रेणीक्रम में सबसे नौचे हैं उनके लिए मताधिकार एक शक्तिशाली क्रियाकलाप का कार्य करता है। जाति का सामाजिक और आर्थिक स्तर जितना निम्न होगा, उनके वोद का महत्व उतना ही अधिक होगा। कोठारी, मेयर, वर्मा, भामश्री, समाशिरे राऊ, कोहन, आदि के अनेक अध्ययनों ने दर्शाया है कि जातियां अपना प्रभाव डालती हैं और उन्होंने सौंदेबाजी की शक्ति भी विकसित कर ली है क्योंकि उनके पास मतदान की शक्ति है। आदे बेतेड (देखें, ६0/४०॥ : 973-20) ने भी कहा है कि जाति की निष्ठाओं का मतदान में शोषण किया जादा है। जाति को काटते हुए नये गठबन्धन भी बनाए जाते हैं। रडाल्फ (?ए6०9) का विचार है कि जाति सर्घो ने जाति को एक नयी स्फूर्ति प्रदान की है और लोकतत्र ने भारत में जाति को नयी महत्त्वपूर्ण भूमिका के योग्य बनाया है। डो एलसेठ (0, $लरा, #्लाहमार खाब॑ सिजधला ॥शिट३), विपण्याए 970 47) ने 4967 में एक अध्ययन किया जिसमें उसने भारत के भिनन-भिन चुनाव कषत्रों के 2287 व्यक्तियों का साक्षात्कार किया और पाया कि विभिन्न कारकों में से जाति नेताओं को सलाह पर मतदान व्यवहार 0 शतिशत मामलों में, परिवार के हिसाब से 46 प्रतिशत मामलों में, और मतदाताओं के अपने निर्णय से 49 प्रतिशत मामलों में निर्धारित हुआ था । 40 मतिशत मामलों में निर्धारक कारक का पता नही लग सका। उसी वर्ष (/967) पूना में 000 मतदाताओं में सचालित अध्ययन ने दर्शाया कि जाति ने 58 प्रतिशत मामलों में प्रभावित किया। 996, 998 और 3999 के लोक सभा चुनावों के साथ ही दिसम्बर, 7998 में हुए चार गज्यों में और फरवरी 2000 में हुए चार गज्यों में विधान सभा चुनावों में जाति मतदान के महत्वपूर्ण कारकों में सिद्ध हुई है। पसनु हैरोल्ड गूल्ड (8८0#ठ्वार दाद #०॥0८व ॥7०४७, 4७8०७ 977) इस विचार का है कि जाति ने भारत में गजनीति का निर्धारक कारक होना कम कर दिया है।
राजनैतिक अभिजन ग्जनैतिक दल और जाति गतिशीलता (एगल्ा डर, एगाधतत ऐपल जात (७७६ ा्ा59007)
जाति राजनैतिक अभिजन' प्रस्थिति का एक निर्धास्क कास्क बन गई है। सिप्सीकर, सच्चिदानन्द, राम आहूजा, एसके लाल, आदि विद्ठानों द्वारा 'रजनैतिक अभिजन' पर किए गए सप्री अध्ययनों ने सकेत दिया है कि अभिजन वर्ग के उदय में उच्च जातियों को मध्यम और निम्न जातियों पर अधिक लाभ मिलता है। आजादी से पूर्व सामान्यत उच्च जाति समूह ही आजादी के सर्र्ष में सत कांग्रेस पार्टी में राजदीठिक मच के केद्धीय स्थान में थे, लेकिन आजादी के बाद मध्यम और निम्न जातियों के व्यक्ति भरी राजनैतिक शत क्षेत्र में प्रवेश कर गए। आरक्षण नीति ने निम्न जातियों के व्यक्तियों को नेता के रूप में उभरे के योग्य बनाया उबकि मध्यम जातियों के अभिजन अपनी विकसित शिक्षा और सामाजिक-आधिक प्रस्थिति के काएण उपर कर आए। इस प्रकार जादि प्रथा ने, जिस्तका केवल संस्कार सम्बन्धी पार्मिक कार्य था (व्यवसाय और सामाजिक पस्थिति निर्धारण सहित), लोगों के राजनैतिक स्यवहार निर्धारण को संचालित करने को भूमिका भी अपना ली। गावों में भी जाति न सायता के रूप में उभसे में महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। कार्यालयों, 7 सचिवालयों आदि में जैन लॉबी,... , . याद्मण लाबी, यादव लॉबो,
68 सामाजिक स्तरकरण
रेड्डी लॉबी, आदि के विषय में सुनते हैं। यदि कार्यकर्त्ता सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में जातिवादी के रूप में कार्य करने लगें तो ऱजनैतिक जीवन में वे कैसे गैर-जातिवादो के रूप में कार्य कर सकते हैं ? हमारे राजनैदिक अभिजन धर्म निरपेक्षता की बात कर सकते हैं और जाति तथा जातिवादी राजनीति की निन््दा भी कर सकते हैं, किन्तु व्यवहार में वे जाति के दबाव में ही काम करते हैं, क्योंकि नेता के रूप में उनकी अपने उदय की पृष्ठभूमि जाति की ही होती है। राजनैतिक दल भी जाति समर्थन को क्रियाशील बनाते हैं। वास्तव में आज 0000) जनता को गतिशील बनाने की समस्याए वही है जो आज से चार दशक पूर्व थीं! जिस प्रवार 4930 तथा 940 के दशकों में समाज सुधारक विश्वास करते थे कि जन जागृति के बिना राजनैतिक क्रियाकलापों के लिए उनका सगठन सम्भव नहीं था, उसी प्रकार आज भी राजनीतिज्ञ जाति के नेताओं से समर्थन प्राप्त करने का प्रयल करते हैं और साथ ही अपने उद्देश्यों की आप्ति के लिए राजनैतिक साधनों को अपने लाभ के लिए प्रयोग में लाते हैं। कुछ विद्वानों ने गत तोन या चार दशकों में विविध राज्यों में राजनैतिक दलों द्वारा जातियों वी 'गतिशीलता का अध्ययन किया था। उदाहरण के लिए रिचर्ड सीसन (शाजाआत 55800) ने देखें, [(00ा, टलाह का वादा 20॥065.. 973.. 775-227) जाति समर्थन के सन्दर्भ में ।960 के दशक में राजस्थान में एक जिले (नागौर में काम्रेस पार्टी के विकास का विश्लेषण किया, रामाशिरे राय (२8॥३४॥89 ९0५, 5०७ [(णाव, ०० ०. 28-55) ने 960 के दशक में बिहार में जातीय आधार पर एक राजनैतिक पार्टो में प्रवेश का अध्ययन किया, आने बेतेइ (देखें, [९08७७७, 09 (४. 259-297) ने 970 के दशक में तमिलनाइ में जाति प्रथा के माध्यम से राजनैतिक दलों की शक्तियों में परिवर्तन का अध्ययन किया, अनिल भट्ट देखें, (०७७७७, 09 ८६ 299-339) ने गुजरात मे जाति की राजनैतिक गतिशीलता का अध्ययन किया, डोनाल्ड रोजन्थाल (000८० 7२०४०७॥/०) ने दो नाएं (उत्तर अदेश में आगरा व महारष्ट् में पूना) तथा हैरोल्ड गूल्ड ने 990 में उत्तर प्रदेश में जातियों की गजनैतिक गतिशीलता का अध्ययन किया। इन सभी अध्ययनों ने दर्शाया कि राजनैतिक दल अपनी कार्यशोलता के लिए जातियों को गठिशील बनाते हैं और चुनाव जीते में उनका समर्थन लेते हैं।
राजनीति मे जाति के प्रयोग के विषय मे लोगो की धारणा (ए6०क९५ शाप्व्कुप0 वं्र छर 056 0 (३५6 9 एगा॥०)
राजनीति में जातियों के प्रयोग के विषय में लोग क्या सोचते हैं ? विचारों के आधार पर लोगों को हम तीन समूहों में वर्गीकृत कर सकते हैं. एक, वे जो इस भूमिका पर अफसोस करते हैं और सोचते हैं कि राजनीति जाति और जातिवाद से मुक्त रहनी चाहिए, दूसरे, वे जो सोचते हैं कि राजनीतिक सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करने की स्वतत्र क्षमता रहीं रखते, और तीसरे वे जो जाति या राजनीति या दोनों को ही स्वायत्तता (49000००॥) की दावा करते हैं। रजनी कोठारे (973 -4-7) प्रथम दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। वह कहते
कि राजनीति कुछ उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शक्ति अर्जित करने के लिए होती है और
साम्राजिक स्तरीकरण 69
शवित जाति के समर्थन द्वारा स्थिति मजबूत करके प्राप्त की जाती है। भारत में क्योंकि सामाजिक व्यवस्था जाति सरचना के चारों ओर सगठित है इसलिए जाति और राजनीति कभी भी पृथक नहीं की जा सकती | अतः राजनीति में जातिवाद वास्तव में जाति का राजनीतिकरण है। दूसरे विचार के सन्दर्भ में राजनीति को स्थिति को ऊँचा उठाने या मजबूत करने के लिए एक साधन के रूप में माना जाता है। इस आधार पर राजनीति समाज की संरचना को प्रभाविव नही करती । रजनी कोठारी ने इस विचार की भो आलोचना की है। ते कहते हैं कि जाति और राजनीति का एक दूसो पर हमेशा प्रभाव रहता है। तौसे दृष्टिकोण में प्रगतिशील आर्थशाल््री, भास्तशास्त्री वथा राजनैतिक व मानवशास्त्री शामिल हैं। वे जाति को सुरक्षित रखना चाहते है तथा जाति को राजनीति तथा राजनीति को जाति से मुक्त रखना चाहते हैं। कौठारी ने इस दृष्टिकोण की भी आलोचना की है और कहा है कि ये सभी विद्वान यह देखने में असमर्थ रहे हैं कि राजनैतिक व्यवस्था और जाति व्यवस्था के बीच कभी भी पूर्ण धुवीकरण नही रहा। एआरदेसाई, कापडिया, घूययें का भी यही विचार थां। राजनीति ने जाति का प्रयोग किया है और सामाजिक-राजनैतिक उद्देश्यों के लिए यह प्रयोग होता रहेगा।
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अनुसूचित जातियाँ, अस्पृश्यता और पिछड़ा वर्ग
(इत्तात्तता०० (03५९५, एआा००णानणी।|।। भाते छ9९ए१एश्चाए (955९६)
अपुसूचित जातियोँ (508९6४॥९७ (:७5९७)
जाति व्यवस्था में पायो जाने वाली असमानवा अपनी चरम सौमा को उन पूर्णरूपेण पृथक
४८४ ०६०४९०) जातियों के विकास में प्रदर्शित करती है, जिन्हें 'अस्पृश्य' जातियाँ कहा जाता रे । अनुसूचित जातियाँ, जो 'अस्पृश्यों' की बहुसख्या है, तकनोकी रूप से चार वर्ण योजना से बाहर है। इन जातियों को अधिकत सामाजिक व सास्कारिक अशुद्धि (घाएणा॥) से परिपूर्ण माना जाता था, तथा उनके धन्धे नियामक श्रेणीक्रम (7ण॥09/१6 ग्र्मअा) मैं मिम्नतम माने जाते थे। इससे शहरों और गाँवों में उनके पृथक आवास की परम्पप को बल पिला। अनुसूचित जातियों का कोई समरूप स्तृत (#0702९7८०७5 #/क्षणा) बना हुआ नहीं था। 935 में 'अनुसूचित' बनने से पूर्व इन जातियों को “बाह्य” (७४६८४०) जातिया, प्रतित ((८७7८५६००) जातिया, भग्न व्यक्ति (छा0६० गाथा), और विजातीय (०७(८०७९०७) कहा जाता था। गान्धी जी ने इन्हें 'हरिजन' (ईश्वर वी सन्तान) की सजा दी है। 93 की जनगणना में 'बाह्य' (७४८४०) जातियों की पहचान के लिए कुछ सामाजिक आधाए प्रयोग किया णया। इसो आधार भ्रमाप पर 39855 में इन जातियों की “अनुसूचित जातियों” के रूप मे सूचियाँ बनाई गई। इनमें से कुछ आधार प्रमाप (८ाक्षा॥) थे क्या ब्राह्मण इनके लिए पुरोहित का काम करते हैं, क्या नाई, दर्जी आदि को सेवाए उन्हें उपलब्ध होती है, क्या वे जातीय हिन्दुओं को पानी पिला सकते हैं, क्या वे हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश कर सकते हैं, क्या वे सार्वजनिक सुविधाओं--जैसे सडकों, कुँओं, स्कूलों आदि--का प्रयोग कए सकते हैं, क्या उनके स्पर्श या तिकटता से उच्च जातियाँ अशुद्ध (9000/०) होती हैं, क्या सामान्य व्यवहार में उच्च जाति के लोगों द्वारा उन्हें समान समझा जाता है, क्या वे घृणित पेशे में सलग्न हैं, आदि। 935 में सभी अनुसूचित 227 जातियों में 5 कग्रेड 40 लाछ की जनसख्या सहित अनुपूचों बनाई गईं। 997 में यह सख्या बढकर 3 कग्रेड 82 लाख हो गई जो कि 99] मे देश की कुल जनसख्या का 63 प्रतिशव था। 999 में उनकी जनसख्या 4 करोड से कुछ अधिक अनुमानित थी।
अनुमूचित जातियोँ, अद्नश्यता और पिछड़ा वर्ग है? |
अनुसूचित जातियो के विरूद्ध निषेध (ए7ठप्रत्त॑ंं0०६ &हुझंत्र८ $0९१७९०१ (५४९८४)
आरम्थिक काल से ही आजकल 'दलित' कहे जाने वाली अमुसूचित जातियों पर अनेक कठोर प्रतिबन्ध लगाए जाते थे,जैसे, उन्हें कमौज वे बनियान पहनना मना था, उन्हें आभूषण, चणतें, जूबे, और छाते का अयोग वर्जित था, घरों में केवल मिट्टी के बर्तन प्रयोग कर सकते थे, सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के बाद शहर में प्रवेश वर्जित था, और उन्हें उच्च जाति हिन्दुओं से कुछ कदारों की दूरी बनाए रखनी पड़ती थी। इस शकार उन्हें पूर्णरूमेण बाँध दिया गया था। अस्पृश्यता के वेश में जो अत्याचार उन पर किए जाते थे, वे आज भी जारी हैं। राज्य द्वार सुधारात्मक उपायों तथा कल्याण सेवाओं के बावजूद समाज की अदृश्य शक्तिया सामाजिक तोड-फोड करतो ही रहदो हैं। उदाररणार्थ, ऐसे मामलों की रिपोर्ट आती है जहा अद्यपि दलित विद्यालय में तो दाखिल किए जाते हैं लेकिन एक ही कक्षा में उन्हें एक कोने में पृथक बैन्चों पर बैठा कर पृथक कर दिया जाता है। यदि कार्यालय में सामूहिक भोज उच्च जातियों व अनुप्तूचित जाति के कर्मचारियों के लिए आयोजित किया जाता है तब ऐसे अवसरों पर उच्च जातियों के लोग “विशेष अवसर के नाम पर निम्न जाति के लोगों को पहले भोजन करते हैं और तब उन्हें आराम करने के लिए कह कर स्वय अलग से भोजन कत्ते हैं। ऐसे मामले भी हैं जहा छात्रावार्सो के निम्न कर्मचारी उच्च वर्ण हिन्दू छात्रों के बर्तन माफ करे हैं, लेकिन अनुसूचित जाति के झछाझें से अपने बर्तम स्वयं साफ करने को कहा जाता है। लाभग पाव वर्ष पूर्व जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में सम्मिलित भोजन गृह में अनुसूचित छात्रों द्वारा भोजन के मामले को लेकर हडताल हुई थो। 998 में, (सावले नाम के) एक छात्र को महाराष्ट्र में (परवान गाँव में) वर्षा के दौरान एक मन्दिर में शरण लेने के काएण मार दिया गया। अनुसूचित्र जाहियों के लोग कई राज्यों में कई गावों में अपनी महिलाओं का शोषण और अपमान सहन करते हैं। सिन्हा और सिन्हा (58॥8 शत $0॥9) ने 966 में पटना विश्वविद्यालय के 200 छात्रों के 'हरिजनों के प्रति दृष्टिकोण पर (80७४4 #0/०९5, 967) 69 प्रतिशत उत्तरदावाओं ने हरिजनों को पिछड़ा हुआ, 56 प्रतिशत मे चालाक व मककाए, 55 भ्रतिशत ने असस्कृत, 54 अत्िशत ने मूर्ख, 52 अ्रतिशत ने गन्दा, 52 अविशञत ने शराबी, 49 प्रतिशव में कुरूप (89) बताया। यह केवल यह इंगित करता है कि 35 वर्ष पूर्व अनुसूचित जातियों की क्या छवि समाज में प्रचलित थो।
अनुप्तूचित जातियो के विछद्ध प्रवाइनाएँ (॥0ल॥९5 ##ुआ5 इतलाध्त॥९6 (45९8)
अनुमूचित जातियों के प्रति अत्याचारों और नृशयताओं में वृद्धि हो रही है। प्रति दो घस्टे में एक दल्षित की पिटाई होती है, प्रतिदिन तीन दलित भहिलाए बलात्कार की शिकार होती हैं, दो दलितों का कत्ल, और दो दलिव घर जला दिए जाते हैं (८6 # 06०, 7998 : 84) अनुसूचित जातियों के विरुद् अपणों में वृद्धि इस तथ्य से ही स्पष्ट हो जाती है कि 955 में पुलिस द्वार पंजीकृत 80 अपराधी मामले 399! में 8,336, 995 में 32,990 और १999 भें 25,638 हो गए (वही. 8) अनुसूचित जावि के लोगों की जमोन हडप कर, उन्हें कम मजदूगे देकर और उन्हें बन्चुआ मजदूर बनाकर उनका शोषण किया जाता है ।
72 अनुसूचित जातियों, अद्यृस्यद्ा और पिछड़ा वर्ग
अनुसूचित जातियों के शोषण मे जादि सघर्षों तथा बिहार में विशेष रूप से जाति सेनाओं को जन्म दिया है। कुर्मियों को भूमि सेना, यादवों की लोक सेना, भूमिहारों कौ रणवौर सेना, और ब्रम्हर्षि सेना, ब्राह्मणों की गगा सेना, और राजपूतों की कुँवर सेना विद्यमान है। माओवादी समुदाय भी हैं जो कई जिलें में अ्रभावी हैं। एमसीसी केडर अधिकाशत यादवों, कोरियों, और पासवानों के है। वे क्योंकि सत्ता दल का समर्थन करते हैं अत उन्हें उनका सरक्षण प्राप्त है। बिहार में जून 97 और जून 2000 के बोच जाति के आधार पर 27 नरसहार हुए हैं जिन में से 3 बार दलितो के विरुद्ध नरसहार हुए थे। केवल जुलाई
996 और जून 2000 के मध्य ही आठ बार रणवीर सेना द्वार नरसहार हुए थे जिन में
दिसम्बर 997 में सबसे अधिक 6 दलित मारे गये थे और उसके बाद जून 2000 में 35,
मार्च 999 में 34 और शेष में 6 और 22 के बीच दलित मारे गये थे (द हिन्दुस्तान टाइम्स,
जून 3, 2000)। इन हत्याओं का काएण क्षेत्र के भूमिहीन दलित किसानों तथा सवर्ण भूस्वामियों के बीच लम्बी बैर भावना थी। इस सकट को हल करने में ग़जनैतिक इच्छा शक्ति की कमी ही बिहार के लिए अभिशाप बन गई है।
अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर राष्ट्रीय आयोग भौ दलितों के विरुद्ध बढते अपराधों की रिपोर्ट देता रहा है। केन्द्रीय सरकार ने इस प्रकार के शोषण को रोकने के लिए सभी के को निर्देश जारी किये हैं। इस सम्बन्ध में राज्यों द्वाव किए गए कुछ उपाय इस प्रकार
* अनुसूचित जातियों से सम्बन्धित निम्न मजदूरी आदि विवादों की जानकारी राज्य सरकारों को देने के लिए व्यवस्था को चुस्त बनाना।
» अनुसूचित जातियों को उनकी भूमि या उन्हें आवटित भूमि का स्वामित्व दिलाने में सहायता करना।
* अनुसूचित जातियों को भूमि में अपराधिक घुसपैठ के मामलों में पुलिस अधिकारियों को विशेष रूप से निर्देश देना और इन जातियों के विरुद्ध अपराधिक मामलों को विशेष मामलों का दर्जा देना तथा उनके मुकदमे और समाधान का तुरन्त प्रबन्ध करना।
०» अनुसूचित जाति कृषि मजदूरों को वैधानिक न्यूनतम मजदूरी दिलवाने मे मदद करना।