90६0०4६8007 500. ९ण०॥६५६, ७उररा (04 (था. इछतला$ एक शिखा 0879 9000 0॥9 0 ४४० ७४९९४ वा. (9 08. 808#0४४६8'5 7३०. $06480#8६ भारतीय समाज राम आहूजा -प रावत पब्लिकेशन्स जयपुर * नई दिल्ली * बैंगलोर * मुम्बई * हैदराबाद * गुवाहाटी छछ8ए 87033 639-2 (म7ंब्नते [ाप 87033-640-6 (9एथकग्ट0) 60 8०४०7 2000 स१८एश70८१, 2007 प० एगा रण ही 900 गाव/ 06 7९070१४९९१९ ०7 प्रगाआ्राए€व गया गाज शिया 0 099 भा) ग्राल्या5, लै९टफ्काार 07 प्राल्लीग्यात्बी, ॥॥लैएतसड़ एगएण०००फए8: ॥९८०9७8 0 9) गए. क्राण्णिमाठत हण8९ शादे वल्र्ड 9श्प्धा, जव00प ँृ्पया$च्रणा गा ऋशगायह 7० पी 97एकलड उ॥र९/७/वव 03 फिल्म रिशर्वा ई07 शिवा 200/॥९9॥075 $3एगा वैएफ , 5९८० 3, ]१ए७गीक चिबहुण, [एफ 302 004 धगवाओ) ए7०१९ 04] 265 748 / 7006 7 04] 265 748 ६ 79भीो ॥परणद्वाबएगफए005 छाए जातफआएह उबश्वाफ००5 ८०ण #(॥० 000 06 4858/24, 8॥88७ (२०90, 37987), पिटए एल 0 002 ए[०ग 0] 23263290 00 हा सेपाइुबॉगद वैलिहिय, संचैल:खेव कव प#परीपाय पु/एुछूढ फड़ रिग्क्रया (एप, [एफ फ़जा९त १६ फैक्ट एचगप्राह ए९55, लए छिशए विषय सूची (एणांशा।9) भूमिका लेखक की ओर से भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य (छाज्नण्ात्ग १००तएह5 [एड 9689 50029) # परम्पणगत हिन्दू सामाजिक संगठन % परम्पणगत हिन्दू समाज , आधाएपूद मत एवं सिद्धाल ५ ६५8 भारतीय समाज * भारतीय सस्कृति पर सास्कृतिक पुतर्जागरण, , इस्लाम और पश्चिम का प्रभाव % भारतीय प्रमाज में निलतरता तथा परिवर्तन के कारक साम्राजिक स्तरीकरण ($004॑ 4४ ०कषणा) ० जाति व्यवस्था और सामाजिक स्तेरीकरण ० जाति और वर्ण, उपजाति एवं वर्ग # जाति व्यवस्था में परिवर्तनः प्ररम्भ से मध्य और ब्रिटिशकाल तक-- इसके प्लास्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक पक्ष ०» वर्तमान भारत में जाति व्यवस्था « क्या जाति व्यवस्था परिवर्धिद हो रही है, कमजोर हो रही है,या विधटित ते रही है ? जाति का भविष्य ० जाति में गतिशोलंगा » जातिवाद * समानता और सामाजिक सरयना के प्रकण ०» जाति और राजनौति तय 33 विश्व सूची अनुसूचित जातियाँ, अष्पृश्यता और पिछड़ा वर्ग ् ($छ8०९ए६ऐ (४5६5, एजाण्ण्लाक्राएए आए 82८7जत (955९5) » अनुसूचित जातियाँ » अस्पृश्यता * इसका उन्मूलन एवं दलित चेतना ० अन्य पिछड़ो जातियों और वर्ग » कृषि और औद्योगिक वर्ग सरचना परिवार, विवाह और नातेदारी 92 (सा, निद्यागाउ26 जाते (०5४9) ७ परिवार व्यवस्था » विवाह व्यवस्था नातेदारी व्यवस्था » स्त्रियों की बदलती प्रस्थिति आर्थिक अर्थव्यवस्था 44 (80८07स्‍0ए0० $एघथा) # भारतीय अर्थव्यवस्था, निर्धनता एव मुद्रास्फौति » बाजार अर्थव्यवस्था और उदारीकरण नीति इसके सामाजिक परिणाम # यजमानी व्यवस्था » आर्थिक विकास इसके निर्धाएक और सामाजिक परिणाम » आर्थिक असमानताएँ » व्यावसायिक विविधीकरण और सामाजिक सरचना राजनैतिक व्यवस्था ॥78 (९०0०० $95 ८०) » ग़जनैतिक व्यवस्था अवधारणा और स्वरूप » परम्पपगद और आधुनिक पारतीय समाज में लोकताजिक राजनैतिक व्यवस्था और सरचना » गजनेतिक अभिजन भर्ती और सामाजिक परिवर्तन में उनको भूमिका » भारत में गजनैतिक दल » शक्ति का विकेन्द्रीकण और राजनैतिक भागीदारी शैक्षिक व्यवस्था 208 (8&47८#70०१० $95६७) » शिक्षा और समाज * शिक्षा के उद्देश्य » शिक्षा के परम्पणगत एवं आधुनिक सन्दर्भ विषय सूची ता ० शैक्षिक असमानता और सामाजिक गविशौलता ० शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकोकरण ० शिक्षा की समस्याएँ « शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति » महिलाओं, अनुसूचित जातियों , अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को शिक्षा « शैक्षिक पुनाठिन 8 धर्म ग््श (एड) » धर्म . अवधारणा और इसकी समाजशास््रोय सार्थकता # धर्म : जीवन प्रारूप # अन्तर्धामिक अन्तर्क्रिया और परिवर्तन # साम्पदायिकता ० धर्म निरपेक्षतावाद और धर्म निःपेक्षीकरण # घर्मीनिरपेश् समाज में धर्म जनजातीय समाज 265 (प्रंएथ $००6७) » भारत में जनजावीय समुदाय : सख्या एवं वितरण « जनजातीय सपुदार्यों को विशेषताएँ * जनजाति और जाति ० जनजातीय अध्ययन * जनजातीय शोषण एवं असतोष « जनजातीय समस्याएँ $ जनजातीय आन्दोलन # जनजातीय नेतृत्व * आदिवासी महिलाएँ « आदिवामी परिवर्तन , सरदात्मक भेदपराव और आदिवासी कल्याण और विकास «» पप्मस्कृतिग्रहण और जनजातीय संस्कृति में परिवर्तन # आदिवासियों का विस्थापन और पुनस्थापना * एकीकरण और आत्मसातकण थ्रामीण सामाजिक व्यवस्था 286 (रण 50९०४ 5:४८) # ग्रामीण समुदाय के सामाजिक-सॉस्‍्कृतिक आयाम च्छ | छ शा 8 4 42 43 विषय यूवी » कृषक वर्ग सरचना » शक्ति सरचना परम्पण और परिवर्दन » ग्रामीण निर्धनता एवं ऋणग्रस्तता « बन्धुआ मजदूर » भूमि सुधार . भ्रकृत्ति एव सामाजिक परिणाम # नियोजित ग्रामीण विकास » पचायती राज नगरीय सामाजिक संगठन 326 (एक्रक्क 5059 0एड058007) » नगरीय, नगरीकरण तथा नगरवाद की अवधारणाएँ » प्रामीण-मगरीय भेद जनसख्यात्मक वथा सामाजिक सास्कृतिक विशेषताएँ « प्रामीण-नगरीय अन्तर्क्रिया # क्या भारतीय समाज 'ग्रामीण' से 'नगरीय' होता जा रहा है ? नेगरय सामाजिक सगठन निसन्‍्तरता एवं परिवर्तन » नगगय समुदायों में स्तरीकरण और सामाजिक गतिशीलवा » भृजातीय विविधवा और सामुदायिक एकौकरण » नगरीय पडौस » नगरीय समाज की समस्याएँ « नगरों का वि-नगरीकरण और गाँवों का नगरीकरण जनसंख्या गतिकी 353 (?0फुण॑गए०० 09प्रक्षाए०5) » जनाकिकीय विश्लेषण * जनसख्या विस्फोट » जनसख्या वृद्धि एव नियत्रण को सैद्धान्तिक व्याख्यायें # जनसख्या नीति ० परिवार नियोजन # ज॑नसख्या विस्फोट नियत्रण के लिए सुझाए गए उपाय भ्रष्टाचार 385 (एणाएए7ण) * अवधारणा « भ्रष्टाचार, एक ऐतिहासिक परिमक्ष्य » लोकसेवकों में भ्रष्टाचार » राजनैतिक प्रशाचार और घोटाले » भ्रष्टाचार के कारण विषय सूची 44 5 6 « भ्रष्टाचार का प्रभाव ० वियान # भ्रष्टाचार को रोकने के लिए किए गए उपाय * राजनौतिजों और सार्वजनिक कम्पनियों के भ्रष्टाचार पर आयोग # भ्रष्टाचार से सघर्ष काला घन (890८ १0769) * अवधाण्णा « काले धन दा फैलाव ० कालाधन ठत्पन होने के कारण # आर्थिक प्रभाव # सामाजिक प्रभाव # नियत्रण के उपाय तस्करी ($ग्र7/877९) # अवधारणा ख प्रकृति # विस्ताए ७ संगठित तस्करी सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण (8००० (॥भ26 कात १॥00टाग्राइ॥07) ० भारत में सामाजिक परिवर्तन अवधारणा, उद्देश्य, दिशाएँ एवं प्रतिरोध ७ निमोजन तथा सामाजिक परिवर्तन # नियोजित परिवर्तन के कारक ० नगरीकरण और औद्योगोकरण ७ सामाजिक (सुधा) आन्दोलन ० सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाएँ. « आपुनिकौकरण : अवधारणा, निदर्शक, प्रकृति और समस्याएँ. संदर्भ ग्रंथ सूची (#96कभ्कए) 405 बा4 49 466 भूमिका यह पुस्तक मेरी पूर्ववर्ती पुस्तकों से कुछ हट कर है। यह विभिन व्यवस्थाओं के परम्पतगत व आधुनिक ढाँचे-सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, शैक्षिक, ग्रामोण नगरीय और जनजातीय-अस्तुत करदी है तथा कुछ महत्वपूर्ण समस्याओं य प्रकरणों का विवेचन करती है। परम्परागत उपागम समाजशास्त्र, इतिहास तथा अन्य समाज विज्ञानों के बीच सम्बन्ध स्थापित करते हुए सुस्थित मूल्यों और विचारघाराओं पर प्रकाश डालता है जबकि आप निक ढाँचा समकालोन परिवर्तनों, सामाजिक विकास एवं प्रगति की रफ़्वार में भी रुचि रखता है, जो सभी नये प्रश्नों को जन्म देते हैं। समाजशास्त्रीय ढाँचा 'क्या था', क्या है' तथा “क्या सम्मावना है! पर प्रकाश डालता है। प्रत्येक अध्याय समकालीन भिनवाएँ, उदीयमन तत्व और भावी परिमिक्ष्य प्रस्तुत करता है। इस प्रकार का उपागम अदीत से वर्तमान तक के परिवर्तन के प्रकरणों के परीक्षण में कार्यात्मक है। समाज में विभिन्‍न व्यवस्थाओं की कार्यशीलता के लिए गहन विश्लेषण और सैद्धान्तिक मूल्याकन वाच्छित है | वर्तमान भारतीय समाज को अब परम्परागत समाज नहीं माना जाता। इसे उमड़ते हुए आधुनिक समाज के रूप में देखा जाता है। लेकिन विभिन्‍न नियोजित उपायों से आधुनिक समाज में आए व्यवस्था परिवर्तन अपनाए गए उपायों के परिणामों के नकारात्मक पक्षों को श्री उजागर करते हैं| यदि आउक्षण नीवि आज कार्यात्मक हे और यदि दो या तीन दशकों बाद विकार्यात्मक सिद्ध होती है, तब क्या शक्तिशाली अभिजन इसमें परिवर्तन कर सकेंगे ? भदि समाज के कमजोर वर्ग, किस्रान वर्म, महिलाओं और युवाजनों द्वाव चलाए गए आन्दोलनों को गेका नहीं जाता, तो सामाजिक असन्दोष को यह सब कैसे उदव्यक्त कोंगे? इस प्रकार के प्रकरणों के मूल्याकन के लिए आवश्यक है कि इनको वर्तमान व उदीयमान दोनों समाजों के सर्दर्भ में प्रस्तुत किया जाये। इस पुस्तक में यद्यपि विभिन्‍न व्यवस््थाओं के सभी महत्वपूर्ण पक्षों के विश्लेषण एवं पुनरीक्षण का प्रयास किसा गया है, लेकिन इसका उद्देश्य वृहत्‌ और महत्वाकाक्षी विश्लेषण नहीं है। किसी नये सिद्धान्त को प्रस्तुत करे का भो इरादा नहीं रहा है बल्कि यह समझाने का प्रयास किया गया है कि भारतीय समाज में समय-समय पर क्‍या होता रहा है। वर्षों से मैंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं--अग्रेजी व हिन्दी दोनों ही में--जिनमें अपराध, झियों, और सामाजिक समस्याओं के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। यह पुस्तक प्तिमोगितात्मक परीक्षाओं के लिए प्रेरणादायक सामग्री के महत्व को अस्तुत करती है। अब- विभिन्‍न प्रकरणों का विश्लेषण विषय के विकास का बोध कराने का प्रयास है तथा विभिन्‍न जता भूमिका स्रोतों तक पहुँच को सुलभ बनाता है। उदीयमान समाजशासत्र को निस्‍न्‍तर परिवर्तन होते समाज के निरन्तर पूछताछ पर बल देना है। स्पष्ट है, यह हमारा दावा नहीं है कि कुछ बातें छूटी नहीं होंगी या कोई अध्याय कमजोर नही होगा। परन्तु व्यवस्थाओं के प्रमुख पर्षों का विस्तृत रूप से विवेचन करने का प्रयास किया गया है। मैने विविध दृष्टिको्णों को चर्चा की है, प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा विकसित प्रारूपों का विश्लेषण किया है, विविध सैद्धान्तिक व्याख्याओं का परीक्षण किया है तथा पुस्तक को अधिक विष॒द्‌ और विस्तृत बनाने के लिए अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध विद्वानों के योगदान के उदाहरण भी दिए हैं। मुझे विश्वास है कि छात्र इस पुस्तक को स्वागत योग्य योगदान के रूप में देखेंगे। स्नातकोत्तर स्तर पर समाजशास् का अध्ययन करे वाले छात्रों सहित विभिन श्रेणियों के छात्रों के दृष्टिकोण को दृष्टिगत करते हुए मैंने विविध प्रतियोगिवात्मक परीक्षाओं में विनिहित उन शीर्षकों पर भी चर्चा करे का प्रयल क्या है जिनको आमतौर पर छात्र साहित्य न मिलने के कारण छोड देते हैं। विस्तृव परिमिक्ष्य में विषय को भली-भांति समझने का उद्देश्य रहा है। अध्यायों को इस क्रमबद्ध रूप से व्यवस्थित किया गया है जैसा कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं व ग़ज्य प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रतियोगिद्ात्मक परीक्षाओं के लिए विषय सामप्री निश्चित की गई है। निर्धारित पाठ्यक्रम में जो कुछ पक्ष नहीं भी दिए गए हैं उन पर भी चर्चा छात्रों के हितों को घ्मान में रखते हुए को गई है। मैं आशा करता हूँ और आश्वस्त हूँ कि पुस्तक उनके लिए लाभकारी होगी जिनके लिए लिखी गई है क्योंकि यह विविध व्यवस्थाओं और प्रकरणों के वैज्ञातिक विश्लेषण और वाच्छित आँकड़े पठनीय विशद्‌ शैली में प्रदान करती है। राप आहूजा लेखक की ओर से बहुत समय से मैं एक ऐसी पुस्तक के लेखन पर विचार कर रहा था जिसमें भ्रास्तीय प्रशासनिक सेवाओं, राज्य प्रशासनिक सेवाओं, बैंक सेवाओं तथा नेट (घछ्ा) आदि प्रतियोगितात्सक परीक्षाओं में समाजशात्व विषय लेकर सम्मिलित होगे वाले छात्रों को इन परीक्षाओं के लिए आमतौर पर निर्धारित विभिन शौर्षकों का विश्लेषण तथा पर्याप्त और विस्तृत विवेचन उपलब्ध हो सके। यद्यपि मेरी दो पूर्ववर्ती पुस्तको--भारतीय सामाजिक व्यवस्था और भारत में सामाजिक समप्त्याए--में भी विविध प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं के लिए निर्धारित विषय निहित हैं, फिर भी कुछ ऐसे शीर्षक रह गए थे जिन पर विशेष रूप से इन पुस्तकों में चर्चा नही हो पाई थी, जैसे, आर्थिक व्यवस्था, ग्रजनैतिक व्यवस्था, धार्मिक व्यवस्था, ग्रामीण व्यवस्था, नारीय व्यवस्था, जनजातीय व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, आदि। वर्तमान पुस्तक का उद्देश्य शीर्षकों की विस्तृत व्याख्या के द्वाय इस खाई को पाठना है। पूर्ववर्ती पुस्तकों में विवेचित विषयों का पुनरीक्षण किया गया है तथा आधुनिकतम आँकड़ों से अद्यतन किया गया है। जो कुछ कमियां रह गई थी उनको भी ठीक करने का प्रयल किया गया है। में आशा करता हूं कि कैरियर परीक्षाओं में सम्मिलित होने वाले छात्र इस पुस्तक को काफी उपयोगी पार्येगे--कम से कम समाजशारू में निर्धारित दो पेपर में से एक पर। भारतीय विश्वविद्यालयों में समाजशात्र के स्वातकोत्तर छात्रों के लिए भी यह पुस्तक ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी सिद्ध होगी। इस पुस्तक को यह रूप देने के लिए मैं अपने सहयोगी डा केवलरमानी तथा अपने पुत्र डा मुकेश आहूजा को हार्दिक धन्यवाद देना चाहूँगा, विशेष रूप से आवश्यक पुस्तकों व पत्र पत्रिकाओं के जुटाने में जो उन्होंने सहायता की। मैं अपने पुत्र सजय आहूजा का भी पुस्तक को हस्तलिपि तैयार करने के लिए आभारी हूँ। अत में अपनी पली के प्रति भी आधभाएं हूँ जिसने मुझे निरन्तर समर्थन दिया व श्रोत्साहित किया। छात्रों, शिक्षकों, व अन्य पाठकों की ओर से सुझाव व टिप्पणिया भो आमत्रित करता हूँ द्राकि इस पुस्तक को और अधिक सुधार जा सके | प्रस्तुत पुस्तक का अग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद मेरे मित्र डा विप्र कुमार शर्मा ने किया है। मेरी पूर्ववर्ती दो पुस्तकों--भारतीय सामाजिक व्यवस्था और अपराधशात्र का भी डा हाफ लेखक की ओर से शर्मा ने ही सरल हिन्दी में अनुवाद किया था। सम्प्रति डा शर्मा अवकाश प्राप्त करने के बाद जयपुर में निवास करते हुए इसी प्रकार के लेखन कार्य से जुडे हुए हैं। में उनका अति आभार हूँ। राम आहूजा भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य (प्रांडाण॑त्या श०्तगाए5 ण॑ धह पातांशा 50009) परम्परागत हिन्दू सामाजिक संगठन (गरोन्नभंधाण्फञ प्लाचतए0 $0संक्ो 07:क्रा5स 0१) परम्परागत, आधुनिक और आधुनिकोत्तर समाज अवधारणाएँ (॥धा।काओं, ए०्तटशा जाते ए0५5(-॥90007 805९0॥0९5 : ९(०7:क) समाज का वर्गीकरण परम्परागत, आधुनिक और आधुनिकोत्तर समाजों में किया जा सकता है। फर्परागत समाज में व्यवहार सम्बन्धी प्रतिमानों और मूल्यों में धर्म (और जादू) पर बल दिया जाता है जिसमें वास्तविक या काल्पनिक अतीत से गहरे जुडाव अथवा निरन्‍्तरता का सकेत मिलता है। यह समाज पवित्र भोज, बलि, एव कर्मकाण्ड (5४४४६) आदि को स्वीकार करता है। मोटे तौर पर परम्परागत समाज वह होता है जिसमें () व्यक्ति की प्रस्थिति उसके जन्म से निर्धारित होती है और वह सामाजिक गतिशीलवा के लिए कोई प्रयल नहीं कप्ता (2) व्यक्ति का व्यवहार अतीत की गहराइयों से जुड़े मूल्यों, प्रतिमानों, रीतियों व परम्पणाओं से संचालित होता है, तथा लोगों के सामाजिक लोकाचार एव व्यवहार पीढी दर पीढी थोड़े से ही बदलते रहते हैं। (3) सामाजिक संगठन (समाज में व्यक्तियों और उप-समूहों के सामाजिक सम्बन्धों का स्थाई स्वरूप जो सामाजिक अन्तर्क्रिया में नियमितता (८8ण७70) तथा पूर्वाभास (97८00०080709) प्रदान करता है) श्रेणोक्रम (#ंध्य्यणार) पर आधारित होता है। (५) अन्तर्क्रिया में नातेदारी सम्बन्ध प्रमुख होते हैं और व्यक्ति अपनी पहचान प्राथमिक समूहों से करता है। 6) सामाजिक सम्बन्धों में पद की तुलना में स्वयं व्यक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाता है। 6) लोग रुढिवादी होते हैं। (7) अर्थ च्यवस्था साल होती है, अर्थात यात्रिक (00) अर्थ व्यवस्था कौ त्रधानता होती है, तथा निर्वाह स्तर से ऊपर आर्थिक उत्पादकता अपेक्षाकृत कम होती है। (8) पौराणिक व काल्पनिक विचार (न कि तर्क पर आधारित विचार) समाज में सददोपरि होते हैं। आधुनिकता परम्पयगद समाज से काफ़ो हटकर होती है। आधुनिक समाज विज्ञान और तर्क पर केद्धित होता है। स्टूअर्ट हाल (मश्वा 70 0549, 2८७॥०क व एधककदा उा। 7996, साथ ही [७0८ 0! 0०जर्णी, ४०००४०७५ 7997 , 40 भी देखें) के अनुसार आधुनिक समाज की विशेषताएं (जो कि इसे परम्परागत समाज से अलग करती है) यह हैं : 0) धर्म का पतन और धर्म निः्पेक्ष भौतिकवादी सस्कृति का उदय (धार्मिक विशेषता)। (2) सामन्तीय ([८069) अर्थ व्यवस्था के स्थान पर ऐसी अर्थ व्यवस्था जिसमें 2 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य आदान प्रदान के लिए मुद्रा प्रणाली माध्यम प्रदान करती है। यह (अर्थ व्यवस्था) बाजार के लिए बडे पैमाने पर वस्तुओं के उत्तादन और उपभोग पर, निजी सम्पत्ति के वृहत्‌ स्वामि पर, और लम्बी समय अवधि के लिए पूजी सप्रह पर आधारित होती है (आर्थिक विशेषता)। 6) ग़ज्य पर धर्म निरपेक्ष राजनैतिक सत्ता का प्रघुत्व वथा राजनैतिक मामलों पर धार्मिक प्रभाव का सीमित होना (राजनैतिक विशेषता)। (4) सरल श्रम विभाजन पर आपासि सामाजिक व्यवस्था का क्षय (८०७८) तथा नवीन श्रम विभाजन का विकास और नये वर्गों का उदय एवं खरो-पुरुष के बीच सम्बन्धों में परिवर्तन (सामाजिक विशेषता)। 6) नये राष्टं (जृजातीय अथवा राष्ट्रीय समुदायों) का निर्माण जिनके अपने उद्देश्यों के उपमुक्त अपनी परम्पराए तथा अपनी पहचान हो जैसे, फ्रान्स के द्वारा राजतत्र (00029) और कुलीनता (४7४(०८४०५) को अस्वीकार करना, ब्रिटेन का राजतत्र को प्रतीक रूप में अपनाना, यूंए, आर (मिश्र) द्वारा राजतत्र को अस्वीकार करना और लोकतत्र को स्वीकार करना, आदि (सास्कृतिक विशेषता)। (6) विश्व के प्रति वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण दृष्टिकोण का उदय (बौद्धिक विशेषता)। इस प्रकार जहा परम्परागत समाज की विशेषताओं में संस्कार, रीति रिवाज, सामूहिकता, सामुदायिक स्वामित्व, यथास्थिति तथा सरल श्रम विभाजन प्रमुख है, बही आधुनिक समाज की विशेषताओं में विज्ञान का उदय, वर्क और विवेक पर बल, प्रगति में विश्वास, विकास के लिए सरकार और राज्य को आवश्यक मानना, आर्थिक विकास और जटिल श्रम विभाजन, मानव को प्रकृति और पर्यावरण पर नियत्रण करने योग्य देखना, और जगत को द्वैदवाद (१७७॥७४७) या विशेषाभास के अर्थ में देखना, आदि प्रमुख हैं। आएनिकोहर (708-7700८४0) समाज (या अति आधुनिकता) आलोचबात्मक जागृति पर बल देता है तथा प्रकृति, पर्यावरण और मानवता पर अमुप्रयुक्त विज्ञान (899॥०6 ८८7०६) के विनाशक प्रभावों के प्रति चिन्तित है। यह प्रगति की दौड के अवाच्छित नकागलक परिणामों और जोखिम की ओर सकेत करता है। यह गद्टवाद (जिस पर आयुनिक समाज में बल दिया जाता है) मे वैश्वोकरण (&॥0७७॥5७७००) की भ्रक्रिया की ओर गविशील है। आर्थिक विकास को महत्त्व देने (जैसा कि आधुनिक समाज में होता है) की अपेक्षा यह पलक निकोत्तर समाज) सस्कृति को अधिक महत्व देता है। आधुनिक समाज (जो कि संसार को या विरोधाभास के अर्थ में देखता है) के विपपोत अतिआधुनिक समाज एकता, समानता और सबधन व जोड को महत्त्वपूर्ण मानता है। परम्परागत भारतीय समाज तीन परिप्रेक्ष्य (गभा।णाण। प्रशंगा 802ंथ9 ; प्रशःर€ एच5एथ्लात ९5) परम्पणगत समाज की उपरोक्त अवधारणा एवं विशेषताओं सहित, समाजशास्त्रीय परिेक्ष् में परम्पणगत समाज को किस अ्रकार देखा जा सकता है ? परम्पणगत भारतीय समाज को समाजशास्रोय आधार पर समझने के लिए वीन पश्मिक्ष्यों का उपयोग हो सकवा है प्रकार्यात्मक, मार्क्सवादी, और सामाजिक क्रिया परिम्ेक्ष् | प्रकार्यात्मक (दुर्खिम का) पश्रिक्ष् इस विच्यर पर आधारित है कि प्रमुख सामाजिक सस्थाए और उप-व्यवस्थाए (जैसे, नावेदारी, आर्थिक सस्थाए, आदि) मनुष्य की मूलभूव आवश्यकताओं (जैसे प्रजनन, उत्पादन, उपभोग) की पूर्वि करती हैं। मार्क्सवादी (कार्ल मार्वस) परिमेक्ष्य इस विचार पर आधारित है कि वर्ग भारतीय समाज का ऐविद्यसिक परिदृश्य 3 सपर्ष एक मूलभूत सामाजिक शक्ति है और समाज की कार्यात्मकत्ता सर्पपूर्ण हितों वाले वर्णों से प्रभावित होती है। सामाजिक क्रिया (मैक्स वेबर) का परिप्रेक्ष्य इस पर बल देता है कि व्यक्ति समाज को बनाते है और प्रभावित करदे हैं न कि समाज व्यक्तियों को तथा समाज व्यक्तियों के अनुभवों की सरचना मही करता बल्कि “व्यक्ति” स्वय ही सामाजिक अनुभवों की रचना में सहायता कप्ता है। प्रथम दो परिमरेक्ष्य सरचनात्मक हैं, अर्थात्‌ वे प्रमुख रूप से यह विचार करते हैं कि समाज व्यक्ति और समूह के व्यवहार को किस श्रकार प्रभावित करता है बजाय इसके कि व्यक्ति और समूह समाज की रचना किस श्रफार करते हैं (वास्तव में त्तीसग़ दृष्टिकोण भी सरचनात्मक ही माना गया है)। अत सरचनात्मक समाजशास्त्री इस विषय में रुचि लेगा कि धार्मिक विचार और मूल्य या विज्ञान और हर्क या जाति और वर्ग, या परिवार और नातेदारी, या यात्रिक और औद्योगिक अर्थ व्यवस्थाएँ, या व्यक्ति कौ सामाजिक-सरचनात्मक स्थिति किस प्रकार समाज द्वारा अपेक्षा किए जाने वाली भूमिकाओं के निर्वाह के लिए व्यक्ति के अवसरों को प्रभावित करते हैं। जहाँ प्रकार्थवाद सामाजिक व्यवहार पर सहमति दर्शाता है, चही मार्क्सवाद और सामाजिक क्रिया सबधी दृष्टिकोण समाज में संघर्ष पर बल देते हैं। माइक डोनेल (७० 0" 0०७९, ॥997 6) के अनुसार सस्चनात्मक पस्प्रिष्त्य के आधार पर जो प्रश्न और उनके उत्तर बनाए जा सकते हैं वे है () समाज का निर्माण किस प्रकार होता है ? (2) यह (समाज) कैसे कार्य करता है ? 6) समाज में कुछ समूह किस प्रकार अन्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होते हैं ? (६) सामाजिक परिवर्तन किन कारणों से होता है? 5) समाज क्‍या सहमति पर आधारित होता है या सघर्ष पर ? (6) व्यक्ति का समाज के साथ क्‍या सम्बन्ध है ? हम इन्ही प्रश्नों के आधार पर परम्परागत भारतीय समाज का विश्लेषण करेंगे। परम्परागत हिसू समाज . आधारभूत मत एवं सिद्धान्त (्स्‍रधाक्ष0ा॥ पझात्रत0 80009 ६ 825९ प्रकाश 0 005९5) () हिददू जीवन दर्शन. कर्म एवं थर्म (सबंध 8९ तु [४ अन्‍काब काव 2काकाब) परम्परागत भारतीय समाज से सम्बन्धित उपग्रेक्त प्रश्नों के उत्तर देने से पूर्व यह विचार करें कि वैदिक दर्शन में हिन्दुओं का जीवन के प्रति क्‍या दृष्टिकोण था ? मूल विचार यह था कि मनुष्य पूर्णछप से इच्छाओं का बना हुआ है। जैसी उसको इच्छाए होंगी वैसी उसको अन्तर्दृष्ट/विचारशीलता होगी (कृतु) जैसी उसकी विचारशीलता व समझ होगी वैसे ही उसके कर्म होंगे, और जैसे उसके कर्म होंगे वैसा उसका भाग्य बन जायेगा। अत यदि अपने जीवन काल में भनुष्य की कुछ इच्छाएँ पूर्ण होने से रह जातो हैं तो वह फिर जन्म लेगा, लेकिन यदि उसकी कोई इच्छा अपूर्ण नहीं रहती दब वह ब्रह्ममय (ईश्वर से एकाकार) हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में इच्छाओं के विवाश के लिए 'कृतु” (85८:७४०४) का दमन आवश्यक है। मनुष्य की इच्छा ही उप्ते इस ससार के जाल में फसाए रखती है अथवा वह जन्म मरण के बन्धन में फस्ता झहता है। अत कर्म ही पुनर्जन्म और इच्छाओं के बीच एक सयोजक है। इस्त 4 भारतीय समाज का ऐतिहापिक परिदृश्य प्रकार इच्छाओं से छुटकारा प्राप्त काने के बाद मनुष्य अमर हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है। यह कहना गलत होगा कि यही केवल एक मात्र हिन्दू दर्शन का दृष्टिकोण है। वास्तव में हिन्दू साहित्य में अन्तिम सत्य (पएए्रथ८ 7८०॥9) के अति अनेक दृष्टिकोण हैं। एक दृष्टिकोण इच्छाओं के त्याग के सम्बन्ध में गौता में दिया गया है। गौता में कर्म का दर्शन जीवन का नवीन दर्शन है। गीता में इच्छाओं से छुटकारा पाने (८३०४८४१००७) कौ अपेक्षा उनके शुद्ध उदात्तीकरण (६00॥77200/) पर बल दिया गया है और यह कर्म के सत्य स्वरूप को समझकर ही किया जा सकता है। (कापडिया, 972 - 3-4) हिन्दू दर्शन एक ओर वर्तमान कौ अतौद के साथ निरन्तरता में विश्वास करता है (जिसमें यह समाहित (१0०/८०) है) और दूसरी ओर वर्तमान को भविष्य में अभिव्यक्त करता है। परम्पणओं के प्रति हिन्दुओं के आदर करने के पीछे उद्देश्य है। इसके द्वार विचार में साम्य (॥070०६८०८/५) और समन्वय (77०४७) प्राप्त किया जाता है। विभिन अवस्थाए केवल विभिन्‍न काल छण्डों में बल देने (८४०७॥४७०७) में अन्तर दर्शाती हैं। उदाहरणार्य, सतयुग में सत्य ही धर्म था,त्रेतायुग में 'यज्ञ" (बलि), द्वापर युग में 'शन' और कलियुग में 'दान'। हिन्दू दर्शन कुछ आध्यात्मिक विचारों में भी विश्वास रखता है, जैसे, 309 “युण्य' 'धर्म', आदि । इन विचारों पर हम हिन्दुत्व के मूल विश्वास' के रूप में चर्चा ] हिन्दुत्व के मूल विश्वास व उसूल (छ9ह० पल्लाल$ ग॑ गा्रतपांडफ) हिन्दुत्व के मूल विश्वासों और सिद्धान्तों को केद्र बिन्दु बना कर क्या यह कहा जा सकता है कि हिल्‍्दुत्व समावता व समतावाद (८६४६॥७) में विश्वास करता है ? क्या कर्म और पुनर्जन्म के विचार सप्री हिन्दुओं के स्वीकार्य हैं ? क्या मोक्ष सभी का अन्तिम लक्ष्य है? क्या सहिष्णुता एवं अहिसा हिन्दुत्व के लक्षण हैं ? क्‍या सभी हिन्दू व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा में विलय में विश्वास करते हैं 2 योगेंद्र सिंह (973 - 37) का विचार है कि हिन्दुत्व के आदर्शात्मक सिद्धान्व (॥०780४० 977०७) विश्वासों, आदर्शों, अनुमति के तकों, उदारवाद, रचना और विनाश, सुखवाद (#८००४७०), उपयोगिताबाद (ए॥(द्7उत्ाडगा)._ तथा आध्यात्मिक सर्वातिशयता (8एएएगे॑ ह्ाउव्शाएंट्राट्शर गिं रा हैं। मोटे तौर पर हिन्दुत्व के मूल विश्वासों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता १, आध्यात्मिक विचार (ए७४०७७७:७) [8९७७) हिन्दुत्व कुछ आध्यात्मिक विचारों (ईश्वर के स्वभाव के विषय में तथा धार्मिक विश्वासों की स्थापना से सम्बन्धित सिद्धान्तों की श्रखला) में विश्वास रखता है, जैसे कि पुनर्जन्म, ओम की अमस्ता, पाप, पुण्य, कर्म, धर्म और मोक्ष। कर्म का सिद्धान्त एक हिन्दू को यह सिखाता है कि वह अपने उन कर्मों के कारण विशेष सामाजिक समूह (जाति/परिवाएं में जन्म लेता ऐ, जो उसने अपने पूर्व जन्म में किये थे। धर्म का विचार यह कहता है कि यदि वह इस जन्म भारतीय समाज का ऐविद्यसिक परिदृश्य 5 भें अच्छे कर्म करेगा तो अगले जन्म में वह उच्च सामाजिक समूह में जन्म लेगा। मोक्ष का विचार मनुष्य को स्मरण कराता है कि उसके पाप और पुण्य उसके जन्म मरण के चक्र से मुक्ति निर्धारण करेंगे। 2. अपक्द्रिता और पवित्रता (00097 जाते एछावरी३) हिन्दुत्व में अपवित्रता और पवित्रदा के विचार भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि पवित्रता और अप्रवित्रता के नियम अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्‍न हैं लेकिन हर जगह वे जीवन के बडे भाग में रहते हैं। उनका महत्व, सहभोजी (८०कमाए०८०५७) सम्बन्धों में, दूसरे समूह के सदस्यों के स्पर्श और शारीएिक सम्पर्कों में दूरो बनाए रखने में, अर्न्तजातीय विवाह में, तथा व्यक्ति के निजी जीवन के कई अवसरों (जेसे जन्म, मृत्यु, विवाह, मासिक ऋतु चक्र (06०४७७४४०४), प्रार्थना आदि) में अत्यधिक होठा है। अपवित्नता की अवधारणा जन्म से सम्बद्ध है न कि स्वच्छता से । पवित्रता के नियमों के उल्लंघन की गम्भीरता के आधार पर व्यक्ति को प्तरल या बृहत्‌ शुद्धीकरण सस्कार करने पडते हैं। ऐसे मामलों में जाति पचायत्र हो आवश्यक अनुशासनात्मक कदम उठाती है। 3, श्रेणीक्रम (प्राशत्ब०त्त)) हिन्दुओं में श्रेणीक्रम इन अर्थों में मिलता है. (४) वर्ण और जातियों में विभाजन; (8) व्यक्ति के चमत्कारी (८॥७75779॥0) गुर्णो में (जिनमें सर्वोच्च सद्गुण 'सत््व', अर्थात साधुओं और बाह्मणों से सम्बद तेजस्विता है, और उसके बाद रजो गुण अर्थात, कर्म (३०४०४) और शक्ति (900८४) के प्रति प्रतिबद्धता है, जैसा कि राजाओं और क्षत्रियों में मिलता है, और अन्त में 'तमस्‌' गुण हैं जो कि श्रेणीक्रम में निम्मतम हैं और जो आलस्य और पतित कार्यों में सलगन हैं) (०) जीवन लक्ष्यों से सम्बद्ध मूल्यों में, जैसे काम (अर्थात्‌ इन्द्रिय भोग और थौन सुख को तलाश में), अर्थ (अर्थात्‌ घनोपार्जन), धर्म (अर्थात्‌ धार्मिक, सास्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों में नैतिक कर्तव्यों का निर्वाह), और ग्रोक्ष (अर्थात्‌ जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति)। 4. मूर्ति पूजा [80 १४०5७) हिन्दू धर्म वी सबसे अधिक उल्लेखनोय विशेषता मूर्ति पूजा में विश्वास है। पूज्य-मूर्ति एक सी नहीं होती है बल्कि यह विभिन्न धर्म सम्परदाणयों में. भिन्‍न होती है। भत्येक घर्ण सम्प्रदाय को एक मूर्ति होती है (कृष्ण, राम, गणेश, शिव, हनुमान, आदि) जो अलग-अलग मन्दिएं में स्थापित होती है और सदस्य समय समय पर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इन मन्दिरों में स्लेच्छों (पुस्लिमों और अस्पृश्यों) के प्रवेश निषेध के पीछे मन्दिरों को अपवित्रता से बचाने का उद्देश्य था न कि अन्य घर्मो के साथ मन मुटाव। 5, ऐकेश्वरवादी लद्ण (शणाणायोर फाह्ाग्लंघ) हिल्‍्दुत्व को प्रमुख विशेषता है कि यह समान रूप से एकाश्मीय धर्म नहीं है बल्कि 6 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृरय लवीले धार्मिक पन्‍्थों का समन्वय है। यही लचीलापन इसकी शक्ति है जिसमें गैरःजाति और वैदिक समूहों के, धर्मशा्त्रों की अवड्ञा करते हुए भो, रहने वी अनुमति है। 6. सहिष्णुता (॥00:77८९) क्या हिन्दुत्व सहिष्णु है ? एक दृष्टिकोण तो यह है कि हिन्दुत्व एक धर्मनिरपेक्ष (६४०॥») और सहिण्ु दर्शन है क्योंकि यद्यपि यह अपने में अनेक मर्तों और उपासना पद्धतियों को समेटे हुए है लेकिन सभी हिन्दू सामान्य देववाओं को शपथ लेते हैं। सामाजिक समुदायों की पृथक्ता तथा इतकी धार्मिक विविध पहचान ने प्रत्येक समूह को पृथक अस्तित्व के साथ रहने को सम्भव कर दिया। झगडा केवल सरक्षण के लिए प्रतिस्पर्धा में हो सकता है। इससे हिन्दू धर्म में सहिष्णुता स्पष्ट हैं। लेकिन ऐसे विद्वानों का भी एक समूह है जो हिन्दुत्व में धार्मिक असहिष्णुता की बाव करता है। इन्होंने पन्थिक (६८०»7३००) प्रतिद्वद्धित और संर्षों के विषय में चर्चा को है। प्रारम्भ में शैव मतावलम्वियों ने वौद्धों और जैनियों का उत्तीडन किया। ईसा के पश्चात्‌ प्रथम सहस्ाबदि (प्रशी्याग्राएण) के मध्य में उत्तर भारत में मिहिर कुल और शशाहू द्वात बौद्ध मठों का विनाश किया गया और बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की गई। वैष्णव परिमेक्ष्य में मूल ग्रन्थों (०४४६) का पुनरलेंखन घार्मिक असहिष्णुता का एक और रूप है क्योंकि यह कार्य केवल जैन पस्रिश्य को ठीक करने के लिए किया गया था। सन्यासी समूहों में भी कुम्म मेले में प्रथम स्नान के प्रश्त पर दसनामियों और बैदग्ियों के बीच झगडा विदित है। इस प्रवार का विरोध हिन्दुओं का अन्य धर्म के लोगों से नहीं था बल्कि एक विशेष पन्य (5९०) के लोगों का दूसरे पन्‍्य के लोगों के प्रति था। 7. पृथक्कता ($ल्‍.क्बाईणा) हिन्दू धर्म कौ एक और विशेषता यह है कि यह सामाजिक सम्बन्धों में, तथा पूजा और धार्मिक विश्वा्सों में सामाजिक समुदायों (जातियों) के अलगाव का समर्थन करता है। पृथक्कता की प्रकृति वर्ण/जाति की स्थिति पर निर्भर करती है जिनकी रचना परम पुरुष के शरीर से (ब्राह्मण उसके मुख से, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से, वैश्य उसको जघा प्रदेश से, और शूद्र उसके चरणों से) ही हुई थी। इसके विशेध में तर्क यह दिया ज्ञाठा है कि इस प्रकार वी पृथक्क्ता में केवल कुछ ही पन्‍्थ और प्रतिष्ठित ब्राह्मण, जिनमें शकराचार्य प्रमुख थे, विश्वास करते थे। लेकिन यह तर्क सही नही है क्योंकि सप्री हिन्दू विश्वास करते हैं कि किसी विशेष समूह की सदस्यता जन्म से निर्धारित की जाती है न कि योग्यता से । तब भी यह कहा जाता है कि हिन्दुत्व में विविध पन्‍्य न पनपते और नष्ट हो जावे, यदि बौद्धिक श्रेष्ठ पर्दों का निर्धारण विशेष समूह में जन्म के आधार पर होता। 8. अहिंसा (४०४-श०णल्तत्) क्या हिन्दुत्व अहिंसा में विश्वास करता है ? एक सम्प्रदाय का मानना है कि हिन्दू अर्हिसक लोग हैं, लेकिन दूसग सम््रदाम मानता है कि धार्मिक हिंसा हिन्दूवाद के लिए अपरिवित भारतीय समाज का ऐतिहाप्तिक परिदृश्य 7 विचार नहीं है, गीता का त्याग पर बल देना निश्चित रूप से अहिंसा पर आधारित नहीं है। लेकिन ]7वी शत्ाब्दि में उप-महाद्वीप में बहुचर्चित भक्ति मार्ग निश्चित रूप से हिंसा के विरुद्ध था। यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व में अहिंसा का समावेश इसमें भक्ति और सस्कार (गण) पक्ष पर बल दिए जाने के बाद हो हुआ, या जब वैष्णव और शैव पन्‍्थों का उदम बआारहवी शताब्दि के बाद हुआ, या जब भ्क्ति-उदारवादी परम्पराएं [5वी व 6वी शतताब्दियों में पनमी जब कयोर, तुलसीदास जैसे सन्त उत्तर प्रदेश में, गुए नानक पजाब में, चैतन्य महाप्रभु मगाल में, मौरा बाई राजस्थान में, और तुकाराम तथा ग्मदास महाराष्ट्र में उदित हुए। इन सन्‍्तों ने न केवल अपनी भाषा में लोगों तक धार्मिक विश्वास पहुंचाए बल्कि उन्होंने रूढिवादिता को आलोचना करते हुए सस्कार-युक्त (709-70029) धार्मिक विश्वार्सों को सरल मानवीय मूल्यों में बदल दिया। (9) पुरुषार्थ . भारतीय सस्कृति के मूल्य (शात्एशीग्रापाज : ज्ञॉशर5 ता छत) एचंात्टो हिन्दू सस्कृति चार मूल्पों पर केद्धित है. काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष) यह चौहरी मूल्य व्यवस्था इस मान्यता पर आधारित है कि मानव को बहुत सी आवश्यकताएं होती हैं (देखें, 87 [(४७०|, छवाशूपर खा मवाक्ा (072, 02! 955 -8)। मनुष्य को भोजन और यौन सुख की, शक्ति और सम्पत्ति की तथा मानव समाज और जगत के साथ सम्बन्धों की अर्थात्‌ मानव समाज की आवश्यकता होती है। शागैरिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि काम है; शक्ति और सम्पत्ति की आवश्यकता की सन्तुष्टि अर्थ है, सामाजिक व्यवस्था की अप को सन्तुष्टि धर्म है; और जगत के साथ एकाकार होने की आवश्यकता की तृप्ति ही मोक्ष है। साधारण अर्थ में काम का अर्थ मत्र के निर्देशों के अन्तर्गत संचालित पाँच इच्धियों--दृष्टि (७9), श्रवण (#९थगाह), स्पर्श (00०), स्वाद (१३४०), और गन्ध (&गथ])-के द्वारा सुखद अनुभवों को इच्छा है। यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्‍या शारीरिक सुख प्राप्ति का प्रथल ठोक है ? इसका उत्तर है कि कष्ट और पीडा स्वय में बुरे हैं। आज जिस प्रकार हम सभी इस तथ्य से सहमत हैं कि लोगों को गरोबी और कष्ट का निवारण उनकी बीमारियों के इलाज और उनसे बचाव के द्वार, इनकी आर्थिक स्थिति सुधा कर, तथा उनके मकान और मनोर्जन, आदि के साधनों की सुविधा प्रदान कस्के किया जा सकता है, उप्ती प्रकार शागैस्कि झुख मनुष्य को यातनाओं को कम करता है। उदाहरणार्थ, स्वादिष्ट भोजन आनन्द देता है लेकिन यह अपच (70॥8०50०7) पैदा करता हे और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है और हम खग़ब स्वास्थ्य का दुख भोगते हैं। स्वास्थ्य का सु्ध लेने के लिए हम भोजन बन्द कर देते हैं। इस प्रकार प्रतिस्पर्धात्यक सुख के बीच चयन के सिद्धान्व के माध्यम से उसने एक दुख दूसरे सुख के द्वार समाप्त हो जाता है। जहा इद्धिय तृप्ति मस्तिष्क द्वारा निर्देशित नहीं चहा “काम” मानव स्तर का नहीं रहता। सानव समाज ने इद्धिय सुझों न्‍ है भारदीय समाज का ऐविद्प्तिक परिदाव अलग से वस्तुओं का विकाप्त किया है। हमने पाक कला, फैशन, भ्रमण स्थलों, बाग बगीचों, सगौत, कला, आदि का विकास किया है । यह सभी विकास “काम की तृप्ति में सहायक हैं। “काम' में यौन सुख भी निहित है क्योंकि यह शारीरिक सुख होता है। फ्रायड ने भी माना है कि सभी शारीरिक सुखों की परिणति यौन सुख में ही होती है। अत “काम' वह मूल्य है जिसकी तृप्ति इन्द्रियों द्वाश ही होदी है। अर्थ” प्रकृति और मनुष्य पर शक्ति प्राप्त करने के लिए मानव को एक आवश्यकता है। एवरेस्ट पर विजय और बाढ, अकाल और महामारी पर नियंत्रण प्रकृति पर विजय प्राप्त कप्ने की अभिव्यक्ति है। विज्ञान प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की इच्छा की अभिव्यक्ति है। धन, प्रकृति और मनुष्य पर अधिकार का रूप है। आज हम शक्ति की राजनीति वी बाद करते हैं। हिटलर और मसोलनी जैसे तानाशाओं के आदर्श इन्द्रिय सुख नहीं थे बल्कि भूमण्डल पर अधिकार करना था। 998 में पाँच परमाणु महाशक्तियों (अमेरिका, रुस, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रास) ने घोषणा की कि वे अपने परमाणु अस्रों को नष्ट नहीं करेंगे और फिर भी भारत पर सीटीबीटी पर हस्ताक्षर के लिए दबाव डालना, (जिसने केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य से मई 998 में पोखरन में परमाणु परीक्षण किया था) भूमण्डल पर उनके प्रभाव की इच्छा का ही चयोतक है। भारतीय सस्कृति में यह सब “अर्थ” में निहित है। “अर्थ' प्रकृति और मनुष्य पर शक्ति प्राप्त करने की इच्छा तथा धन की इच्छा, दोगें ही है। क्‍या यह इच्छा मूल्यवान है ? यदि हाँ, दो हम पूँजीवाद तथा शक्ति की राजनीति की निन्‍्दा क्यों करते हैं ? 'अर्थ' उस समय बुरा (८शा) हो जाता है जब यह मानव की विभिन्‍न मार्गों का तिसस्कार कर्ता है तथा जब यह औचित्य (8&॥/0005०८६४) से नियंत्रित नहीं होता, जैसे दूसरों के अधिकारों को या मानव की आवश्यकताओं को महत्त्व नहीं देता। अमेरिका, रुस, योरप आदि की विज्ञान और उद्योग में आधुनिक प्रगति 'अर्थ' के कारण ही हुई है। हम उनकी सभ्यता को भौतिकवादी कहते हैं क्‍योंकि वे लोग प्रकृति और मनुष्य पर विजय प्राप्त करने में मशगूल हैं। यदि “अर्थ” को अनियत्रित छोड दिया जाये तो यह अपनी हो उपलब्धियों का व्रिनाश कर सकता है और मानव जाति का सर्वनाश कर सकता है। पर्म के नैतिक व नीतिशाख्रीय सिद्धान्तों को मनुष्य के इन्द्रिय, आर्थिक, व राजनैतिक आकाशक्षाओं को नियन्त्रित करना चाहिए। धर्म उस एकौकरण (7/८६:7४००) के सिद्धान्त के लिए है जो व्यक्ति, समुदाय तथा समस्त जगठ के जीवनक्रम में निहित है। वह सब जो व्यक्ति और समाज की अखण्डवा को तोडता है वह “अधर्म” है। इस प्रकार 'धर्म' उन कर्तव्यों को बताता है जो व्यक्ति को पूरे करने चाहिए यदि समाज को विधटित नहीं होने देना है। जिस प्रकार विद्यालय/विश्वविद्यालय में शिक्षकों के लिए नियम (कक्षाए, लेना ,निश्चित समय में कोर्स पुणे करना, आदि) छात्रों के लिए नियम (कक्षाओं में बेठने, शुल्क भुगतान, परीक्षा में बैठने, आदि सबधी), और प्रशासकीय वा क्लर्क कर्मचारी वर्ग के लिए भी नियम (अभिलेखों का संरक्षण, परीक्षाओं का सचालन, आदि) होते हैं, तथा सभी के द्वारा नियमों का अनुपालन व्यवस्था स्थायित्व प्रदान करता है और विचलन से शैक्षिक सस्थाओं का पतन होने लगता है, उसी प्रकार समाज में प्रत्येक व्यक्ति को कुछ कर्तव्य करने होते हैं। रीतिया, परम्पराए और नियम इन कर्तव्यों को निर्देशित कस्ते है। मनु व रामानुजन जैसे विचारकों ने धर्मशास्त्र में इई भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य 9 कर्तव्यों का वर्णन किया है ताकि मानव सम्बन्ध नियमित रूप से चलते रहें। उन्होंने इन्हे हमारे अस्तित्व, आनन्द और उद्विकास के लिए मूल्यवाव भी समझा था। भारतीय सस्कृति में एस पी कनाल (5.9. छ०४० ०७ ०५) के अनुसार इन कर्तव्यों के पीछे जो व्यवस्थाएं हैं, वे हैं . (3) वर्णाश्रम धर्म या विशेष धर्म (9) प्ामारण या सामान्य धर्म । वर्णाश्रम कर्तव्य जीवन की चार अवस्थाओं में विभाजित हैं. विद्यार्थी जीवन, गृहस्थ जीवन, कर्मविरत जीवन और त्याग का जीवन (्यप््रण/707) | इनका सम्बन्ध पेशेवर भूमिकाओं से भी है। झाप्ररण धर्म का सकेत उन साधारण कर्तव्यों की ओर है जो जीवन की किसी एक अवस्था या पेशेवर भूमिकाओं से सम्बद्ध नहीं होते, जैसे चोरी से बचना (आस्वेके, क्रोध का दमन (अक्रोथ), क्षमा, पश्राणि मात्र को आहत करने से बचना (अहिस, और सत्य। ये कर्षव्य मनुष्य के मनुष्य के प्रति सामान्य कर्तव्य हैं। धर्म में सदगुण भी सम्मिलित हैं (कर्तव्य और सद्‌गुण भिन होते हैं। कर्तव्य कर्म के लिए है और सदगुण मस्तिष्क की आन्तरिक दशा को दर्शाता है। उदाहणार्थ, किसी व्यक्ति को अवैधानिक योन क्रिया से बचाना कर्तव्य है और यौन विचाएँ से मुक्त ररना सद॒गुण है। क्योंकि सदृगुण मन की पवित्रता है इसलिए गुणवान जीवन कर्त्तव्य को अवस्था से कही ऊपर है। अच्छा कार्य करने से अच्छा है अच्छा होना। कर्तव्य बिना यह सोचे किए जाते हैं कि क्या चीज उन्हें अच्छा बनाती है। सदगुण सही और गलत पर मनन करता है। कर्तव्य परम्परागत नैतिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जब कि सदगुण नैतिक विक्षाएँ का। माता-पिता को प्यार करने वाले १४ तथा उन्हें आर्थिक सहयोग देने वाले पुद्र दोनों में अन्तर है । बाद वाला पुत्र वही करता है जो समाज ने उसके लिए मावा-पिता के लिए कर्त्तव्य निर्धारित किए हैं जबकि पहला पुत्र दया के वे अनेक कार्य कर्ता है जो समाज द्वाण निर्धारित नहीं किए गये हैं। सदगुण गतिवान हैं जबकि कर्तव्य स्थिर हैं। लेकिन कत्तंव्य सदृगुणों का मार्ग प्रशस्तत करते हैं। धर्म समाज को एक सूत्र में बाँधे रखा है और सद्गुण हमारे मस्तिष्क में एकता भाव पैदा करे हैं। ओक्ष मुक्ति या स्वतत्रता की स्थिति बताता है। शकरा ने शुख्य अयोजन या अन्तिम लक्ष्य और गोग अयोजन या द्वैतियक लक्ष्यों में भेद किया है। किसी भी वस्तु के लिए इच्छा करना 'मुख्य प्रयोजन' होता है लेकिन किसी वस्तु को 'मुख्य प्रयोजन” के लिए प्राष्ति गौण प्रयोजन' होता है। आनन्द मुख्य प्रयोजन का विषय है जबकि किसी नौकरी के लिए प्रशिक्षण धनार्जन गौण प्रयोजन है। शकरण की मान्यता है कि आनन्द दो प्रकार का होठा है . अलुघ्वरन्य आनन्द तथा पएमण आजन्द। प्रथम आउन्द हारे श्र के माध्यप से प्राप्त रोता है जबकि दूसए आध्यात्मिक आनन्द है। मोक्ष, आत्मा की बह्य के साथ पहचान करना अथवा सम्पूर्ण सत्य की अनुभूति है। भारतीय सस्क्ृत्ति में मोक्ष प्राप्ति के लिए दो अवस्थाएं बताई गई है. अवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्य (अवस्था)। प्रवृत्ति अवस्था शारीरिक आवश्यकताओं की नियमित सन्तृष्टि की अवस्था है और इसमें सासारिक वाच्छित यस्‍्तुओं का आनन्द निहित है, जबकि निवृत्ति में ससार के भ्रवि वैराग्य भाव विकप्रित होता है। दोनों अवस्थाए निरन्‍्तर और एक दूसरे की पूरक हैं। (दिखें, 5 7 बाज, ०ए ८४, 955) 0 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य (४0) आश्रप जीव के आद्यों की प्राप्ति की अवस्याएँ (4ऑफबशवह 3408 का कट्बााएपू 06 इबंट्व5 ० ॥(6) आम्रम जीवन की अवस्पाएँ हैं जो जोवन के आदकों को प्राप्त करने के लिए पर्यावरण एव प्शिक्षण प्रदान करते हैं। आश्रम चार होते हैं। ब्रह्मचर्य (छात्र जीवन), गृहस्थ (पारिवारिक जीवन), वानप्रस्थ (कर्मविरत व अवकाश भ्राप्त जीवन), और सन्यास्त (त्याग का जीवन)। प्रथम दो अवस्थाएँ भवृत्ति मार्ग प्रदान करती हैं तथा दूसरी दो अवस्थाएँ निवृत्ति मार्ग के विकास में सहायक होती हैं। प्रत्येक अवस्था भें कुछ विशेष कर्तव्य होते हैं (विशेष घर्म)। यहाँ हम गृहस्थी, ब्रह्मचारी (विद्यार्थी) कर्मविरत व्यक्ति तथा सन्यासी व्यक्ति के कर्त्तव्यों की पृंधक चर्चा करेंगे। जिस प्रकार आश्रम जीवन विशिष्ट कर्तव्यों का आभास कढाते हैं, वर्ण जीवन में चार पेशे सबन्धी भूमिकाओं से सम्बन्धित कर्तव्य बताते हैं विद्वता सम्बन्धित पेशा, प्रशासन व रक्षा सम्बन्धित पेशे, उत्पादद और वितरण सम्बन्धित पेशे, तथा अकुशल श्रम सम्बन्धित पेशे । अत आश्रम व्यवस्था के साथ साथ हम वर्ण व्यवस्था का विश्लेषण भी करेंगे। ब्हाचर्य आश्रम यह सभी युवा लोगों के लिए शिक्षा गृहण करने की विशेष अवस्था है जिसके पश्चात ही वे जीवन में स्वत्त्रता पूर्वक कार्य करने योग्य बनते हैं। घर पर बालक शिक्षा प्राप्त करता है कि किस प्रकार वह भोजन करे, चले, बोले, कपडे पहने, और दूसरों की उपस्थिति में किस प्रकार व्यवहार करे। कुछ जातियों व समुदायों में वह यह भी सीखता है कि जमीन पर हल किस प्रकार चलाये जॉयें, जूते कैसे बनाये जायें, मिट्टी के बर्तन कैसे बनायें, लोहार, सुदार, बढई आदि के कार्य किस प्रकार किये जाँयें, आदि | लेकिन बह पढ़ना लिखना था अन्य व्यवसायिक प्रशिक्षण की शिक्षा प्राप्त नही करता। यह शिक्षा उसे गुरु से मिलती है। शिक्षा की इस अवधि में उसे कुछ आदर्शों का अनुपालन करना पडता है और बुछ विशेष पर्यावरण में रहना पडता है। अतीत में विद्यालय आवासीय होते थे जहा कुछ सस्कारों के बाद 8 से 72 वर्ष की आयु के बीच बालक को उस विद्यालय में प्रवेश कराया जाता था तथा उम्रको ज्ञान दिया जाता था, किसी शिल्प आदि में दीक्षा दी जाती थी, एवं सामान्य एवं शारीरिक शिक्षा तथा तर्क में प्रशिक्षण दिया जाता था। इस अवस्था के प्रमुख लक्षण थे शिक्षक का कुशल ज्ञान, गुरु शिष्य में साथी भाव (८०34९) कया शिक्षक की निष्ठा, और कुछ मूल्यों और आदर्शों के प्रति छात्रों को प्रतिबद्धता। इस अवस्था में छात्रों को जीवन का अनुशासन सिखाया जाठा था तथा उन्हें चार म्रतिज्ञाएँ लेनी पडती थी यौन प्रवृत्ति पर नियत्रण, भोजन और वर्र में सरलता (जिससे समानता, प्रावृभाव और स्वतत्रता का आभास हो सके) गुरु कौ आज्ञापालन के प्रति सम्मान (अनुशासन पैदा करने के लिए) तथा ज्ञान अर्जन के लिए परिश्रम करना, और दैवो शक्तियों के सहयोग के लिये प्रार्थना (म्रों का उच्चारण और ध्यान) कस्ना। अत पवित्रता, सरलठा, कठिन परिश्रम, ज्ञान के प्रति समर्पण और आध्यात्मिक सत्य छात्र जीवन के आदर्श होते थे। गृहस्थ आद्रभ जीवन की इस अवधि में 25 वर्ष के विद्यार्थी जीवन के बाद वे 25 वर्ष आते हैं जिनमें व्यक्ति समाज के प्रभावी सदस्य के रूप में सक्रिय भूमिका निभाता है। यह गृहस्थ तथा बैवाहिक जीवन होता है। आदर्श विवाह उसे समझा जाता था जो मोक्ष प्राप्ति के लिए किया जाता था तथा जो गृहस्थ के कर्चव्यों (जिन में बच्चों का लालन-पालन तथा पूर्वजों का श्राद्ध भी सम्मिलित होता था) के माध्यम से बौद्धिक सत्सग तथा अन्तिम भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य ॥॥॥ मुक्ति के लिए होता था। इस प्रकार हृदय की पवित्रता, परस्पर विश्वास, शील (७०४४४) और परस्पर प्रेम आदि सदगु्णों का विकाप्त करके विवाह को मात्र जैविक साहचर्य (छंग0ट्टांटघ 45६०थआ0णा) से ऊपर उठाया गया था। भारतीय सस्कृति विवाह को मात्र साहचर्य ही नहीं बल्कि पूर्णरूपेण एकाकार (७७६०।७८ ०८१८5) मानती है। विवाह री पुरुष को एक सूत्र में बाघता है जिसका आधा भाग स्री व आधा पुरुष होता है। यह एकीकरण केवल जीवन काल में ही समाप्त नहीं होता बल्कि यह तो जन्म जन्मान्तर तक चलता रहता है। इस प्रकार क्‍यों कि विवाह एकाकार होने के आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए होता है (जैविक व सामाजिक उद्देश्यों से प्रेरित समागम से भिल), इसलिए यह एक समझौता नहीं पहन्तु पवित्र बन्धन माना जाता है। दानप्रस्थ आश्रम . बच्चों के प्रति उत्तरदायित्वों के पूरा हो जाने के बाद माता-पिता से समाज कल्याण कार्य करने की अपेक्षा को जाती है ताकि वे मोह पाश में न फंसे रहें। उन्हें जंगल में नहीं जाना होता है और न ही मानव आवास एव घने बसे नगरों से दूर बल्कि गावों में हो रहना होता है। इस प्रकार तीसरी अवस्था का उद्देश्य कार्य और रूचि के नवीन स्तरों का विकास करना है, न कि किसी विशेष स्थान भें चले जाना मात्र। इसके पीछे यह भी भावना है कि दूरस्थ (गाँवों) के लोग भी अपनी समस्याओं के समाधान में इन लोगों के अनुभव का लाभ उठा सकें। राजा और शासक भी इन निवृत्ति प्राप्त लोगों के पास इसी उद्देश्य से जाते थे। वामप्रस्थी लोग सामाजिक समस्याओं के समाधान में अच्छे पथ प्रदर्शक होते थे। वृद्ध लोगों का कि त्ति प्राप्त करना 50 वर्ष की आप के बाद जो निश्चित आयु नही है बल्कि औसत आयु है जिसमें विविधता की अनुमति है) युवकों को अनुभव प्राप्त करने और जीवन को समृद्ध बनाने में योगदान करने का अवसर भी श्रदान करता है। वृद्धों द्वार सक्रिय जीवन से बहुत देर से निवृत्ति प्राप्त करने से युवाओं को नवीन कार्य क्षेत्र प्रारम्प करने का अवसर नहीं मिलता। वानग्रस्थ अवस्था में पति और पति के आपसी सम्बन्धों के डूटने की अपेक्षा भी नही की जाती | यह पति पलि के बिचारें पर निर्भर होता है। लेकिन उनसे पवित्र और विरक्त जीवन व्यतोत किए जाने की अपेक्षा की जाती है। तृतीय अवस्था का सास्कृतिक महत्व यह है कि शारीरिक सुख भोगने के बाद जब शरसैर अशकक्‍्त हो जाता है वो व्यक्ति को कुण्ठा एव गिग़वट की भावना सवाने लगठी है। तब वह कृत्रिम साधनों से शारीरिक सुख प्राप्त करने की इच्छा करने लगता है। निवृत्ति से व्यक्ति कुण्ठा से छुटकाग प्राप्त कर लेता है। जैविक इच्छाओं में कमी (यौन. आत्म अभिकथन) मानव कल्याण में रुचि से पूरी हो जाती है। सन्याय्त आश्रम जीवन विकास की अन्तिम अवस्था सन्यास है। यह वानप्रस्थ से दो अर्थों में भिन्न है--रुचियों के विकास में और भेरणा (00४4७४०॥) के विकास में | जहाँ गृहस्थ अवस्था में रुचि का प्रमुख केन्द्र परिवार और वानप्रस्थ अवस्था में सम्पूर्ण मानव समाज होता है वहा सन्यास अवस्था में सर्वव्यापी (७०५७६७) चेतना पर आधारित समस्त जगत (१७८१९) रुचि का केन्द्र होता है । जहा तक गृहस्थ अवस्था में प्रेणणा का सम्बन्ध है, व्यक्ति परिवार और उसके सदस्यों में रुचि लेने की भ्रेरणा आप्त करता है जबकि वानप्रस्थ में वह विशेष समूह, समुदाय यथा मानव प्माज में ही रुचि लेने के लिए प्रेरित होता है। दोनों हो अवस्थाओं में यदि आकाक्षाओं की पूर्वि हो जाती है तब गृहस्थी और वानप्रस्थी व2 भारतीय सम्राज का ऐतिहासिक परिदृश्य दोनों हो सुख का अनुभव करते हैं, यदि नहीं तो वे दुखी रहते हैं! जब प्रेरणा किसी लक्ष्य से सम्बन्धित होती है तब उसमें सफलता से सुख की तथा असफलवा से दुख की अनुभूति होती है | इस प्रकार के क्वार्यों को रुचिकर कार्य (0६९६४८१ 3०0०) अर्थात्‌ फल से प्रेणि कार्य कहा जाता है। इसके विपयेत, सन्‍्यास में कार्य रुचिविहीन कार्य होता है। सत्य बोलने का ही उदाहरण लें। एक व्यक्ति तब सत्य बोलता है जब उसे कोई लाभ हो और दूसए व्यक्ति तब भी सत्य बोलता है जब उसे हानि हो क्‍यों न उठानी पडे। व्यक्ति सत्य तब बोलता है जब इसको या तो कर्त्तव्य मानता है या फिर अन्तरात्मा की आज्ञा समझता है। इसमें वह न तो लाभ-हानि की गणना करता है और न ही अपने जीवन खोने की। केवल सन्यासी ही निस्वार्थ कार्य करने के लिये प्रेरित होता है जिसे फल की चिन्ता न इस जम्म में है और म बाद में। सन्‍्यासी की सरल पोशाक जीवन के उस आदर्श का प्रतीक होती है जिसके लिए वह जीवित है। सन्यासी अपने घर द्वार का समर्पण कर देता है क्योंकि वह वो समस्त जगत क्यो हो अपना घर मानता है। वह भय, इच्छा और घृणा से ऊपर उठ जता है। इस प्रकार सनन्‍्यास अकर्मण्यता का जीवन नहीं है बल्कि सक्रिय जीवन है जो प्रेरणा और बहुजन हिताय के सर्वोच्च शिखर तक उठ जाता है। यहा यह उल्लेखनीय है कि जीवन को ये चार अवस्थाए औसत व्यक्ति के लिए हैं। प्रतिभावान या असाधारण गुणों वाले व्यक्ति के लिए ये आवश्यक नहीं हैं। टैगोर और चार्ल्स डिकन्स जैसे लोग कभी भी स्कूल नहीं गए। शैली और वर्डसवर्थ जैसे लोग अधिक शिक्षित नही थे फिर भी वे महान कवि हुए। प्रतिभावान किसी भी अवस्था में लाप कर शिखर पर पहुच सकते है । (४0) वर्ण समाज की चतुर्पुखी व्यवस्था (िगाबवह वह #त्फ्र[गिव 0/4७ ण 5०00०) वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था से भिन्‍न है। जाति व्यवस्था के विषय में यह विश्वास कियां जाता है कि यह भारतीय सस्कृति पर बदनुमा दाग है क्योंकि इसने समाज को सर्घर्षमय कैम्पों में विभाजित कर दिया है, भारतीय जन को एक बडे भाग को कह्टों में धकेला है, और सामाजिक न्याय को कठिन बना दिया है। जाति व्यवस्था सामाजिक रूप से हानिकारक, राजनैतिक रूप से आत्मघाती, नैतिक रूप से घृणित और आर्थिक रूप से विनाशकारी सिंद हुई है। पसनतु वर्ण व्यवम्था लोगों का उनकी अभिरुचि, योग्यता और पेशों के आधार पर समूहों में विभाजन है। अभिरुचियों और योग्यताओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है (४) विद्त्ता के लिए, (७) प्रशासन और रक्षा के लिये, (०) उत्तादन और वितरण के लिए, और (6) अकुशल श्रम के लिए। प्रथम समूह के लोगों को ब्राह्मण कहा गया जो पूजा अर्चना, अध्यापन, औषधि, इत्यादि कार्यो में लगे, दूसरे समूह को क्षत्रिय कहा गया जो युद्ध, प्रशासन और शासन करते थे, तीमरे समूह को वैश्य कहा गया जो कृषि, व्यापार और वाणिज्य करने लगे, और चौथे समूह के लोगों को शूद्र कहा गया जो अन्य तीन सदस्यों के निर्देशन में अकुशल श्रम करने के लिए लगाए गए। ब्राह्मणों में आत्म नियत्रण, पवित्रता, शुद्धता, गम्भीरता, क्षमा, सरलता, बुद्धिमानी, सले और दार्शनिक अर्न॑॑दृष्टि के गुण होते हैं। क्षत्रियों में साहस, शक्ति, दृढ़ता, कुशल, भततोय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य 43 दानशोलता, और प्रशासकीय योग्यता जैसे गुण होते हैं। वैश्यों में कठिन परिश्रम, बुद्धि, और शीक्र निर्णय करने के णुण होते हैं। शूद्रों में प्रशिषण के अभाव में योग्यता एवं पात्रता की कमी रहती है इसलिए उन्हें दूसरों के निर्देशन में काम करना पडता है और उनको आधीनता और सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है। ब्राह्मणों के कर्तव्य (पर्म) हैं - पूजा अर्चना करना, सस्कार एवं यज्ञ आदि करवाना हथा अध्यापन। क्षत्रियों के कर्चव्य हैं: बाधाओं से सुरक्षित रखना, उन पर शासन करना, दुष्टों को दण्ड देना तथा राष्ट्र निर्माण में लगे संस्थानों को उदारता से सहयोग देना। वैश्यों के कर्त्तव्य हैं . कृषि कार्य करना, दूसयें से वस्तुए लेकर उन्हें सुरक्षित रखना और बेचना, पशुओं को पाला, तथा गरीब और जरुरतमदों की सहायता करना | शूद्रों के कर्तव्य हैं वे कार्य करमा जो अन्य लोग उनसे कराना चाहते हों। शूद्रों को वेदों को पढने की, वैदिक सस्कार करने को, >था मत्रों के उच्चारण की अनुमति नदी है कोई भी व्यक्ति या समूह इन योग्यताओं के आधार पर किसी भी वर्ण में स्थान भ्राप्त कर सकता था। इस प्रकार वर्ण की सदस्यता जन्म से नहीं वरन्‌ योग्यता से निर्धारित होती थी। एक शुद्र अपनी योग्यता से ब्राह्मण हो सकता था, एक ब्राह्मण वेद न पढने के कारण शूद्र हो सकता था, तथा इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपना वर्ण बदल सकते थे। भागवत गीता में भी उल्लेख है कि चारों वर्णों का गठन शुण' सिद्धान्त पर अर्थात्‌ स्वभाव से सबधित व अर्जिव लक्षणों के आधार पर और कर्म सिद्धान्त आर्थात्‌ पेशे के आपार पर किया गया है । परन्तु कुछ विद्वानों का मानना है कि वर्ण व्यवस्था उतनी ही कठोर थी जितनी आज जाति व्यवस्था है। प्रास्म्म वी कुछ धार्मिक पुस्तकों में उल्लिखित व्यपितयों के उत्थान के जो उदाहरण हैं (जैसे, वर्शिष्ठ जो वेश्या से जन्मे थे, व्यास मछुआएिन से जन्मे थे, पाराप्तर निम्न जन्म की कन्या से जम्मे थे) पे नियम न होकए केवल अपवाद (७५८८७७००७) ही थे । (५) जातिया (८29०5) प्रिद्धान्त रूप में जातियाँ जन्म के आधार पर लोगों को समूहों में विभकत करती हैं जिसमें कुछ लोगों को कुछ विशेषाधिकार दिये जाते हैं तथा अन्य को उन से वचित रखा जाता है। जातियों के अपने आचारतत्व, अपनी जीवन शेली, सही और गलत के प्रति अपनी घारणाएँ, और उनके रीति-रिवाज होते हैं। जाति में निहित अभिप्रेरक (7/४८) प्रजातीय (8८४) एवं नृजातीय (०४४४०) था। भारत को एक के बाद दूप्तरे प्रजादीय आक्रमणों का सामना करना पडा था। इतिहास के प्रारम्भ में भी, भारत में भिन्न-भिन्न प्रजातियों के लोग रहते थे दड्रविड, मगोल, व भेडौटरेरियन। बाद में अन्य प्रजातियों के लोग परिश्यन, युनानों, और सोथियन भारत में बस गए। जब अन्य देशों (ब्रिटेन, अमेरिका, आदि) को निर्मूलन (ल्वश्ग्राणा॥॥00), सपरिवर्तन (८००४६:झं०४) (जोवन-शैली परिवतन सहित) और मानव अधिकारों को चज्वना, (जैसे, कानून सरक्षण की मनाही) सबधी प्रजातीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था, भारत ने इनका सामना सामजस्थ के द्वार अर्थात्‌ इस प्रकार से परस्थर सामजस्थ से किया कि अत्येक प्रजातीय समूह जीवन का अपना प्रतिमान विकसित कए सवा। भ्राएम्भ में दो प्रवासी (9हा90/७) प्रजातीय समूह सामाजिक, वैवाहिक व सहभोजी सम्बन्धों के स्तर पर एवं विश्वास और रिवाजों के स्तर पर अधिक कठोर नही थे और भारत १4 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य के मूल निवासियों के साथ मेलजोल में काफी लघौले थे, लेकिन धीरे-धीरे अनेक समूहों ने अपने पेशे व जीवन-शैली बदल दिये और नये नाम धारण कर लिए। यही समूह जातिया कहलाए और उनकी सख्या में वृद्धि होती गई। प्रत्येक जाति ने अपने जीवन के तरीकों और विशेषताओं की सुरक्षित रखने के लिए दूसरों के साथ अन्तक्रिया में सामाजिक तथा आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए। इस प्रकार नयी-नयी जातियों तथा उपजातियों का उदय हुआ। गुप्त काल (300 » 0 से 500 & 0 ) तक जाति व्यवस्था बहुत कठोर हो गई तथा अन्य सभी जातियों के ऊपर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित हो गया। इसी जातिगत कठोरता, ब्राह्मणों के वर्चस्व और निम्न हिन्दू जातियों पर विविध प्रतिबन्धों पर आक्रमण शुरू हुए--प्रथम वो बुद्ध के द्वाग, तत्पश्चात भक्ति आन्दोलन के प्रास्म्भ होने से अनेक भक्तों के द्वात। लेकिन जाति व्यवस्था बीसवी सदी के प्रारम्भ तक कठोर बनी रही, जब तक अग्रेजों ने औद्योगीकरण, 'शहरीकरण, एव शिक्षा प्रसार को प्रक्रिया आरम्भ को तथा रामकृष्ण, विवेकानन्द, गाधी, आदि महान पुरुषों ने सामाजिक विचारधाराओं द्वारा जाति व्यवस्था पर आक्रमण करना शुरु किया। आज जाति के बन्धन ढीले पडते जा रहे हैं यद्यपि यह नही कहा जा सकता कि जाति व्यवस्था समाप्त हो रही है या भविष्य में समाप्त हो जायेगी । अब जब जाति व्यवस्था ग़जनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और अनुसूचित जातिया, जनजातिया व अन्य पिछड़ी जातिया जो कि हमारे देश की कुल जनसख्या के अच्छे प्रतिशत में हैं (77%), कुछ विशेषाधिकारों का लाभ लेने लगी हैं (जैसे, नौकरियों, शिक्षा सस्थाओं, विधायिकाओं में आरक्षण, वथा छात्रवृत्तिया, आयु सीमा में छूट आदि प्राप्त कर रहे हैं) और इस प्रकार स्वार्थी प्रवृत्ति का 283 हो रहा है, इस सबसे ऐसा प्रतोत होता है कि जाति व्यवस्था हमारे देश में जारी गी। थुगो से भारतीय समाज भारतीय सस्कृतिं पर सास्कृतिक पुनर्जागरण बौद्धयर्म, इस्लाप और पश्चिम का प्रभाव (पाताज्षा 802) [700शञश 06 82865 : ॥ए३८६ ण 0पॉए०४। शफक्तां5५आ८९, ॥ए१0॥50, 4599, थाएं धो १४७६५ ठग वठक्षा एजापएर) आदि हिन्दू वैदिक दर्शन पर बौद्ध और जैन धर्मों का प्रभाव था। यद्यपि दोनों ही पृथक धर्मों के रूप में विकसित हुए थे लेकिन उनकी जडें हिन्दू परम्पराओं में भी काफी गहरे जमी थी। जैन लोगों को शहरी वाणिज्य समुदाय का सरक्षण प्राप्त था जबकि बौद्धों को राजकुमाएँ का संरक्षण था। दोनों ही निम्न्तसता के मूल्य, पूर्व निर्धारण, (०त८७॥०७), पुनर्जन्म, आवागमन (पग्रणक्म80००) पर बले देते थे ओर श्रेणीक्रम (86८:8०09)) तथा वर्ण और जाति व्यवस्था में विश्वास की आलोचना करते थे। दोनों ही मन्दियों में बलि प्रथा के निषेध और अहिंसा पर बल देते थे। बौद्ध धर्म की सदस्यता सभी जातियों और लिंगों के लिए खुली थी। बौद्ध धर्म निर्वाण के माध्यम से आत्मा की मुक्ति पर केद्धित था, जबकि जैन धर्म आत्म सयम के माध्यम से नैतिक गुर्णो की भावना के विकास के द्वाय आत्मा की मुक्ति वी बात करता था। सक्षेप में कहा जा सकता है कि बौद्ध और जैन धर्मों का ईश्वर सबधी नास्तिक दृष्टिकोण है जबकि हिन्दुत्व आस्तिकवाद पर आधारित है। एक भकार से बौद्ध और जैनियों वे हिन्दू धर्म को कुछ विशेषताओं का विरोध किया, जैसे कठोर औपचारिकतावाद भारवीय समाय का ऐतिहासिक परिदृश्य हा] (पंहांप.. 07्रक्षााणो, बर्बसतापूर्ण सस्कार (ज्ामरांधव। ग्रोएशीशा), औ्रैणीक्रम पर आधारित मूल्य व्यवस्था, ब्राह्मणों का वर्बस्व, और धार्मिक कट्टस्वाद! हिन्दू मूल्यों और विश्वा्सों पर शंकराचार्य (नवी शवाब्दि), गमानुजाचार्य 0007-37 अर्थात्‌ ।[वी व 2वी शर्ताब्द), और मराधवाचार्य (4 दी शर्ब्दि! के उपदेशों का भी प्रभाव पडा डिन्होंने देश के भिन्‍न-भिन कोनों में ऐकेश्वरवाद (कघ०४०(॥८६छ७) के प्रसार के लिए में की स्थापना की। रामानुजावार्य ने वैष्णव सम्प्रदाय को स्थापता की और जैन, शैव तथा निप्त जाति के व्यक्तियों को भी अपना अनुयायी बना लिया। दक्षिण भारठ के लिंगायत सम्प्रदाय ने अनेक गैर ब्राह्मणों को मात्र (८ुए/एक४०9) शिव की पूजा अर्चना के लिए परिवर्तित कर लिया। पद्धहवी और सोलहवीं शर्ताब्दि के बीच भक्ति सप्नदाय का उदय हुआ जिसने हिन्दू धर्म में कुछ नवीन मूल्यों का प्रचार काने का प्रयास किया । कबीर (440-528), गुर नानक (469-538), ग्रमानन्द (चौदहवी और पद्धहवी शवाब्दि), तुकाग़म और रामदास आदि सन्तों जे हिन्दू धर्म में समतावादी (८९०४३॥०४४आ॥) एवं गैस्श्रेणीक्रामफ मूल्य व्यवस्या पर बल दिया। उन्होंने हिन्दू परम्पराओं की उदारता तथा इस्लाम के साथ समन्वय के लिए भी प्रयल किए। मध्य युग में इस्लाम ने हिन्दू आदशों को प्रभावित किया। यद्यपि मुसलमानों के आक्रमण भारत पर दसवो शताब्दि में हो शुरु हो गए थे लेकिन पन्द्रहवी शवाब्दि से इस्लामी संस्कृति का हिन्दू महान परम्पणओं पर प्रभाव प्रकट होने लगा। इस्लाम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करा। यह धर्म एकेश्वववादो और गैए श्रेणीबद्ध है, अर्थात्‌ यह समानता में विश्वास रखता है। यद्यपि हिन्दू और इस्लाम दोनों ही धर्म सम्पूर्णता (४०७0) के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं लेकिन हिन्दू धर्म में यह सम्पूर्णता श्रेणोक्रम से सम्बद्ध है जबकि इस्लाम में यह सम्पूर्णता श्रेणीक्रमता से भिल है। योगेद्ध सिंह 0973 67) ने हिन्दू परम्पंणओं पर इस्लाम के प्रभावों का तीत चएणों में विवेचन किया है इस्लामिक शासन काल में (206-88), ब्रिटिश शासम काल में (अगरहवीं, उन्नीसरवी और स्वतत्रत्ता आन्दोलन काल में (930 से देश के विपाजन तक)। इस्लामी शासन काल में कुछ मुस्लिम शासकीं ने हिन्दू मन्दिरों को नष्ट काने, इस्लाम वा प्रचार करमे और हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की मीति अपनाई। इस काल में यद्यपि हिन्दू और मुसलमानों के बीच तनाव और सघर्ष हुए परन्तु साथ में अनुकूलन (8039(४0०प), परम्पणओं का सास्कृतिक समन्वय (5क्ञा०आ5) और हिन्दू मुसलमानों के सांस्कृतिक सहअस्तित्व (००-८४४८४८८) को भी प्रोत्साहन मिला। सूफोवाद ने भी हिन्दुओं को प्रभावित किया। इसमें विशगी (७४००४८) व्यक्तिगत नैतिकता, भौतिकवाद की क्षण भगुरता (8909 40 5807 0:४८) वधा आत्म बलिदान पर बल दिया जाता है। गैर-सस्कारवाद (००ा-मराप्फणा) वधा निरपेश्ष (७६४००) ऐकेश्वववाद भी जो कि सूफी सन्तों और दार्शनिकों द्वारा बताया गया था, हिन्दू जन मानस को अच्छा लगा। योगेन्र सिंह ने सकेत दिया है कि कुछ मुस्लिम शासकों एवं विद्वानों ने हिन्दू परम्पणओं के कुछ पक्षों को इस्लाम धर्म के साथ मिलाने का भी प्रयल किया। उदाहरणार्थ, अकबर ने दीन-ए इलाही नामक एक जये समन्वित प्रन्य (7४८७० ८ए/) को प्रार्प किया जो कि हिस्दू, इस्लाम, जैन तथा 6 भारतीय समाज का ऐतिहासिक प्रिदृरय पारसी धर्म का मिश्रण था। दारा सिंह ने इस्लाम के साथ उपनिषदीय (ए.8ण४४80०0) ऐकेश्वरवाद के समन्वय (5५॥/8८७७) की वकालत को। प्रसिद्ध विद्वान अमीर खुसरों ने मुसलमानों को हिन्दू परम्पणओं की व्याख्या व टिप्पणी दो। सोलहवीं और सत्रहवी शताब्दि में अनेक मुसलमान कवियों और लेखकों ने हिन्दी में लिखा। फिर भी, इस्लामी धार्मिक और राजनैतिक अभिजात वर्ग न केवल महत्वपूर्ण प्रशासकीय, न्यायिक और राजनैतिक पदों पर आसीन थे बल्कि वे इस्लाम की निरन्‍्तरवा और विस्तार में भी विश्वास करते थे। ब्रिटिश शासन काल में स्थिति बदल गई और मुसलमान अभिजात वर्ग की शक्ति और स्थिति कमजोर होने लगी। अत, महान्‌ इस्लामी परम्पण अपने प्रारम्भिक जोश और विश्वास को कायम न रख सको। अठारहवो शर्ताब्दि में इस्लाम को पूर्ववर्ती उदार प्रवृत्तियों समाप्त होने लगी और उनके स्थान पर कट्टरवाद तथा पुनरुद्धार इसके प्रमुख आधार बन गए। हिन्दू परम्परा लोकाचार में अनुकूलिनी (3५०70७४०) की अपेक्षा अधिक प्रतिक्रियावादी हो गयी और सास्कृतिक परिवर्तन की दौड में पोछे रह गयी। दूसरी ओर इस्लामी परम्पराएँ अधिक राजनोतिकृत हो गयीं, लेकिन उनीसवी शववाब्दि में ठदार और कट्टर इस्लामी परम्पणओं वा की पर (7०क्राट/09) शुरु हो गया। इन दो सास्कृतिक शक्तियों के बौच खौचतान से उत्पनन राजतिक सास्कृतिक घटना मे पृथक इस्लामी राष्ट्र (पाकिस्तान) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। भारत में ब्रिटिश शासन की अवधि में, योगेन्द्र सिंह 973 43) के अनुसार हिन्दुल में दो प्रकार के सुधार आन्दोलनों का उदय हुआ। प्रथम, वे सुधार जो वेदों के प्रारम्भिक आदर्शों के अनुसार हिन्दू धर्म में मूल्यों और सास्कृतिक प्रथाओं में परिवर्तन चाहते थे और दूसरे वे जो नवीन व परम्पणगत मूल्यों और सास्कृतिक प्रतिमानों के समन्वय लाने की परिकल्पना करते थे। प्रथम श्रेणी के अं में स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण (836-86), विवेकानन्द (863 902), और महात्मा गान्यी प्रमुख थे जबकि दूसरी श्रेणी के सुधारकों में राजा गममोहनराय, और नेहरु थे। दयानन्द, विवेकानन्द और गान्धी जी ने हिन्दू धर्म के मूलभूत सास्कृतिक प्रसगों को अस्वीकार नहीं किया था। उन सभी ने वर्ण व्यवस्था, श्रेणीक्रम सिद्धान्व, कर्म योग अथवा निरपेक्ष (8७४०४८०) सामाजिक क्रिया को स्वीकार किया था। सभी ने जाति को सस्कारगव निर्योग्यताओं (00॥5४० 0:४)0८5) को हिन्दू परम्पण में गलतफहमी पर आधारित समझा और उनके निषेध के लिए प्रयल किए। यद्नपि स्वामी दयानन्द ने गैर हिन्दू सास्कृतिक मूल्यों और धार्मिक विश्वासों को अस्वीकार करे वी वकालत की लेकिन विवेकानन्द और गान्धी ने ऐसे निषेध पर बल नहीं दिया। यह सब दर्शाता है कि किस प्रकार हिन्दू धर्म, हिन्दू विश्वास और मूल्य समय-समय पर बदलते रहे हैं और भारतीय सस्कृति में धार्शिक सास्कृतिक परिवर्तन होता रहा है। भारत भें पश्चिम और आधुनिकीकरण का प्रभाव (परएन८ ण॑ धर १६5६ आठ ऐै0तशाकांस्थाएा 9 ॥0793) अलातास (५]४७७, 972 व2/) के अनुसार भारत पर पश्चिम के प्रभाव की पाँच चरणों में चर्चा को जा सकती है। प्रथम चरण सिकन्दर के आक्रमण से सम्बद्ध है जो भावी शताब्दियों के वाणिज्य और व्यापार सम्बन्धों के कारण शान््रिपूर्ण आदानअदान में बदल श्रारवीय समाज का ऐविद्ासिक परिदृश्य ९ गया। दूसग चरण पद्महवी शव्ाब्दि के अन्त (498 ४.0.) से प्रारम्भ हुआ जब दास्कोडिगामा अपने जहाजों के साथ कालोकट में आया। कुछ हो वर्षों में पुर्तगालियों ने गोआ पर अधिकार कर लिया। लेकिन इन पशिचमो लोगों का प्रभाव सोमित ही रहा। तीसरा चरण अठारहवी शताब्दि के प्रारम्भ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन की स्थापना से प्रारम्भ हुआ और बाद में अठारहवी रावाब्दि के मध्य तक ब्रिटिश शासन भाखत में स्थापित हो गया। भरत में पश्चिमी सस्कृति के विस्तार का यह प्रथम चरण था! चौथा चरण उनौसवी शताब्दि के आरम्भ से औद्योगिक क्रान्ति के कारण प्रारम्भ हुआ। अग्रेजों द्वाप कच्चे माल के स्रोत के रूप भें भारत के आर्थिक शोषण के साथ सास्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी पश्चिमी आधिपत्य का विस्तार प्रारम्प हुआ पाँचवा चरण 7947 में देश कौ राजनैतिक स्वाधीनता के पश्चात से प्रारम्भ हुआ। हमारे समाज पर सस्कृहि और सामाजिक व्यवस्था के सदर्भ में पश्चिमी सस्कृति का प्रभाव क्‍या हुआ है ? इस प्रभाव का सक्षेप में इस भ्रकार दर्णन किया जा सकता है : 0) बैंकिंग अणाली सार्वजनिक प्रशासन, मिलिट्री सगठन, आधुनिक औषधियों, कानून आदि जैसी पश्चिमी सस्थाओं का हमोरे देश में प्रारम्भ हुआ। (2) पश्चिमी शिक्षा ने देश के लोगों का दृष्टिकोण विस्तृत किया जिन्होंने अपने अधिकारों और आजादी की बातें करना शुरू कर दिया। नवीन मूल्यों और वर्कसगत व धर्मनिपेक्ष भावना का प्रारम्भ तथा व्यक्तिवादिता, समानवा, और न्याय को विचारधाराओं का महत्व बढने लगा। 8) वैज्ञानिक नवाचारों कौ स्वीकृति ने रहन-सहन के स्तर को उठाने और लोगों को भौतिक कल्याण प्रदान करने की आबांक्षाओं को बढावा दिया। ६). कई सुधार आन्दोलन भी शुरु हुए। अनेक पाम्परवादी विश्वाप्तों और समाज के लिए विकार्यवादी प्रथाओं को त्याग दिया गया तथा व्यवहार के अनेक नये प्रत्तिमानों को प्रार्म्म किया गया। ७) हमारी औद्योगिकौ, कृषि, उद्यमकर्ता (६॥७४८७८८४८ए४४) और उद्योग का आधुनिक्ौकरण किया गया जिससे हमारे देश का आर्थिक कल्याण मारम्ध हुआ। 6) स़जनेतिक मूल्यों के श्रेणोक्रम का पुनर्गठन किया गया है। लोकतात्रिक सरकार के स्वरूप को स्वीकार करते हुए सभी देशो (४०४0४८) राज्य, जो कि साम्राज्यवादी (900270॥०) सरकार के आपीन थे, भारतोय राज्य में मिला दिये गए हैं और जमीदाएें तथा सामन्तों की सत्ता और अधिपत्य समाप्त कर दिए गए हैं। (0) विवाह, परिवार और जाति जैप्ती सस्याओं में स्तरचनात्मक परिवर्तन आया है जिससे सामाजिक जीवन, पर्म, आदि में नये प्रकार के सम्बन्धों का उदय हुआ है। (8) सचार के आधुमिक साधनों के प्रारम्भ हो जाने से, जैसे रेलवे व बस से यात्रा, डाक सेवा, समुद्री व हवाई यात्रा, प्रेस, रेडियो और दूरदर्शन, आदि आदमी के जीवन के कई पक्ष प्रभावित हुए हैं। ७) राष्ट्रीया की भावगा का उदय हुआ है। (0) मध्यम वर्ग के उदय से समाज के प्रबल (00900 मूल्यों में परिवर्तन आया है। 8 प्रारतीय सम्राज का ऐतिहासिक परिदृश्य अलातास (»]89७) ने हमाय सस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में चार प्रकार के परिवर्तनों के सदर्भ में पश्चिमी सस्कृति के प्रभाव का वर्णन किया है : समाप्ति वाले (०॥क7७0४०).. परिवर्तन, सयोज्य व योगात्मक (000४०) परिवर्तन, समर्थक (&णए7०४४०) परिवर्तन एवं सश्लेषणात्मक (5;7820०) परिवर्तन। सम्राष्ति वाले परिवर्तन वे परिवर्तन हैं जो सास्कृतिक विशेषताओं, व्यवहार के स्वरूपों, मूल्यों, विश्वार्सो, मस्थाओं, आदि के समाप्ति के कारण होते हैं। उदाहरण स्वरूप, हम युद्ध में अख्न श्तों में कुल परिवर्तन, सती प्रथा उन्मूलन, आदि के उदाहरण ले सकते हैं। सयोज्य परिवर्तन जीवन के विविध पशों में नवौत सास्कृतिक विशेषताओं, सस्थाओं, व्यवहार के स्वरूपों और विश्वासों/प्रथाओं को अपनाने को सदमित करते हैं। ये (400/00४७) लोगों की सस्कृत्ि में पहले नहीं थी। हिन्दू समाज में तलाक का प्रारम्भ, पिता की समत्ति में पुत्री को हिस्सा देना, पचायतों में चुनाव प्रक्रिया लागू करना, आदि इस प्रकार के परिवर्तनों के कुछ उदाहरण हैं। समर्थक परिवर्तन वे हैं जो पश्चिमी प्रभाव के सम्पर्क में आने से पहले समाज में विद्यामन मूल्यों, विश्वास्ों और व्यवहार के स्वरूपों को सुदृढ करते हैं। इस्त प्रकार के परिवर्दन का एक उदाहरण ऋण लेनदेन में हुण्डी प्रथा का प्रयोग है। सश्लेषणात्मक परिवर्तन विद्यमान तततों तथा अपनाएं गए तत्त्वों से मिलकर नए स्वरूपों की रचना करते हैं। इसका सबसे सरल उदाहरण आवासीय रूप से एकाकी किन्तु कार्यात्मक रूप से सयुकत परिवार है जो माता पिता तथा सहादसों के प्रति सामाजिक कर्तव्यों को आज भी निभाए जा रहे हैं। सश्लेषणातमक परिवर्तन के दो और उदाहरण हैं दहेज प्रथा का जारी रहना किन्तु दहेज की रकम के लेने व १४: पर प्रतिबन्ध के साथ, तथा जोवन साथी के चुनाव में माता पिता तथा बच्चों का सम्बद्ध ना । पश्चिमी प्रभाव के कारण परिवर्तनों का वर्गीकरण केवल विश्लेषणात्मक उद्देश्यों के लिए है। व्यवहार में इन दोनों को एक दूसो से अलग करना सम्भव नहीं है। एक ही प्रकार के परिवर्तन के भीतर अन्य प्रकार के परिवर्तनों के तत्त्त देखे जा सकते हैं | उदाहरण के लिए वस्र उद्योग के प्रारम्भ होने में समर्थक तत्व भी इस अर्थ में निहित हैं कि यह कपडे के उत्पादन में सुविधाजनक होता है, लेकिन साथ हो साथ, क्योंकि इसने हाथकरपा उद्योग वो पीछे धकेल दिया तो इसमें समाप्ति वाले (#एघ॥0४८) परिवर्तनों के तत्वों का समावेश भी कहा जा सकता हैं। काणगार व्यवस्था में खुली जेल या प्राचीर-विहीन (एआ- ०5 काणगार परिवर्तन का एक और उदाहरण है जिसमें प्ीन विभिन प्रकार के तत्व हैं। शिक्षा व्यवस्था में परितर्वनों में भी इसी प्रकार अन्य परिवर्तनों के तत्वों का समावेश है। बैंकिंग अणाली, परिवार व्यवस्था, विवाह व्यवस्था, आदि में भी इसी भ्रकार परिवर्तन के विविध तत्वों का समावेश दिखाई देता है। अब मुख्य प्रश्न है. भारत पश्चिमी प्रभाव के सम्पर्क के बाद कहाँ पहुँचा है? क्या भारत ने प्रगति की है ? क्या इसने लोगों के कल्याण में कोई योगदान किया है ? कया इस प्रश्न का निरपेक्ष रूप से उत्तर दे पाना सम्भव है ? क्‍या निरपेक्षवाद दा दार्शनिक पक्षपाठ को इस प्रकार के विश्लेषण करते समय अलग रखा जा सकता है ? कुछ विद्वान अनुभव करते हैं कि ड्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत के समक्ष अनेक समस्याएं थीं, जैसे आर्थिक पिछडेपन की प्मस्या, बडी सख्या में लोगों के गयैबी रेखा से नीचे रहने की समस्या, भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य 9 मेगेजगारी, जोवन के हर क्षेत्र में धर्म का वर्चस्व, ग्रामीण ऋणग्रस्तता, जाति संघर्ष, साम्प्रदायिक असामजस्य, पूजी की कमी, प्रौद्योगिकी क्षमता वाले दीक्षित कर्मियों को कमो, मानव एवं भौतिक ससाधनों को मतिशील बनाने के साधनों की अपूर्णता, आदि । पश्चिमी प्रभाव ने इन समस्याओं के वैकल्पिक समाधान प्रदान किए हैं। लेकिन कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि इन प्मस्याओं के समाधान में पश्चिमी प्रभाव मे भास्त को कोई सहायता नही दी। यदि कुछ समस्याओं का समाधान हुआ भी है दो अनेक नवीन समस्याएँ जन्मी हैं। भारत उनका सामना पश्चिमी मॉडल के आधार पर नही कर रहा है। भारत अपने स्वदेशी मॉडल द्वारा ही कर रहा है। देश की स्वतंत्रता के पश्वात ही औद्योगिक विकास का उदय हुआ, शिक्षा का विस्तार हुआ, प्रामोण रोजगार के अवसर पिलने लगे, जनसख्या नियंत्रण का प्रयास होने लगा, इत्यादि! इस प्रकार पश्चिमी शासन से मुक्ति से, न कि पश्चिम के सम्पर्क से, आधुनिकीकरण सम्भव हुआ। सत्य तो यह है कि जीवन के कुछ क्षेत्रों में पश्चिम के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार करना पडेगा। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, आधुनिक प्रौद्योगिकी, श्राकृतिक आपदाओं से निबटने के आधुनिक तरीके, देश को बाहरी खतरों से सुरक्षा प्रदान करने की आधुनिक विधिया, आदि भारत के इतिहास में पश्चिम के निर्विवाद योगदान माने जायेंगे। लेकिन भारत जनमानस के उत्यान में अपनी परम्पशगत सस्थाओं , विश्वासों, और प्रधाओं का भी भयोग कर रहा है। इस प्रकार पश्चिमी प्रभाव और विभिन व्यवस्थाओं के आधुनिकीकण के बाद भी, भारत, भारत ही रहेगा। भारतीय सस्कृति जीवन्त और आने वाली कई दशाब्दियों तक चलही रहेगी। आज का हिन्दू दर्शन प्रारम्भिक हिन्दू दर्शन से भिन है। नव हिन्दूवाद, जिसे 'अभिषदीय हिन्दूवाद' (5990॥29/०6 स000/5४) भी कहा जाता है, विस्तार और अकन (5८४) में पूर्वहूपेण स्वदेशी है। यह किसी नवीन पथ को उपज नहीं है बल्कि यह एक नवीन धार्षिक स्वरूप है जो पूर्व के सभी पन्धों को एक सूद्र में पियेने के श्रथल में लगा है। इस “अभिषदीय हिन्दृवाद” की रचना धार्मिक उद्देश्यों कौ अपेक्षा राजनैतिक उद्देश्यों के लिए अधिक है, अत इसको 'राजनैतिक हिन्दूवाद' भी कहा जाता है। ईसाई और मुस्लिम हिन्दुओं को 'अन्य' (४८ ०0८४७ मानते थे जैसे कि हिन्दू उन्हें 'म्लेच्छ' मानते थे। अनिवार्यत नंद हिन्दूधाद उनीसवी और बीसवी शताब्दियों में अपरिहार्य (४28700900८) अथवा टालने बाला नहीं था। बीसवी शतार्दि के नव हिन्दूवादी आन्दोलनों को विशेषरूष से स्वतव्॒ता के बह, एज़लैलिक एए दे दियए, गएण, जिसे, अब, थी, इस रूप ऐें, हिल्टूल्ल वो, स्वीकाए किया जा, है। ऐमिला थापर (985 27) के अनुसार वर्तमान में पाया जाने वाला अभिषदीय हिन्दूवाद इसी परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है और आज इसी अभिषदीय हिन्दूवाद को स्वदेशी भारतीय धर्म का उत्ततधिकाएआप्त एक मात्र दावेदार के रूप में आपे बढाया जा रहा है । इस “अभिषदीय हिन्दूवाद' को धार्मिक अभिव्यक्तियों (०८5०१) की नयी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए म्रामीण अमीर व्यक्तियों और शहरी मध्यम वर्गीय लोगों के राजनीति में ऐकेश्वस्वादी हिद्दुत्व में लाने के लिए अधिक प्रयोग किया जा रहा है। नये सशोधित हिन्दुवाद के भेष में बडी सख्या में लोगों को अनुयायी बनाने में और उन की 20 आरतोय यमाज का ऐतिहासिक प्रतिरव आवाज को उठने में प्रयल किये जा रहे हैं। अभिषदीय हिन्दूवाद के आगरहों (999०० में राजमैतिक उद्देश्य सदैव निहित रहता है। रोमिला थापर (एणाण७ 7900», 3985 2(-22) तथा कुछ अन्य विद्वानों ने इस म॒व हिन्दूवाद के निम्नलिखित मूल तत्त्व (90504) बताये हैं 0) 0) 8) ७) अभिषदीय हिन्दूवाद का अधिकार आघार ब्राह्मण कालीन मूल मन्थ-गौता और चेदान्त विचार--है। यह धर्मशास्रों के कुछ पक्षों को स्वीकार करता है और एक आधुनिक सुधरा हुआ धर्म प्रस्तुत करने का प्रयल करता है। यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व” का आदर्श अर्जित परम्पप और इस पस्म्पण के सक्रिय पुनर्निर्माण के मेल पर आपारित है, या यह भी कहा जा सकदा है कि हिन्दुत्व” एक सरचिव विश्वास व्यवस्था, (६४४८४ए7०८१ ७८४४6 5956०) है जिसमें अतीत की व्याख्या व टौका टिप्पणी, वर्तमान का विश्लेषण, तथा भविष्य के व्यवहार के लिए मार्ग दर्शक विचारों का सम्रह निहित है। 'इसकी मान्यता है कि गैर-जावि धार्मिक पन्‍्य के लोगों को शक्तिशाली लोगों के धर्म को स्वीकार करना पड़ता है लेकिन उनका आधीन बनकर रहना पड़ता है | समाज की निचली श्रेणी के लोग नये धार्मिक आन्दोलनों के माध्यम से उच्च गतिशीलवा के लिए प्रयल कर सकते हैं। यह धर्म परिवर्तन (97052ए४४००) में विश्वास करता है क्योंकि इसका दावा है कि हिन्दुओं पर युनानियों, तुर्कों, मुगलों और अग्रेजों द्वारा हजायें वर्षों तक अत्याचार किए गए थे। इसी प्रसम में वे धर्म परिवर्तन, मन्दिरों को नष्ट करने, मूर्तियों को तोडे जाने, मन्दिरों की सम्पत्ति को जब्त करने, आदि को इसी में सम्मिलित करते हैं। इसलिए वे मठों, आश्रमों, मन्दिरों, रथ यात्राओं की रचना को न्याय सगत ठहरते हैं और मुसलमानों तथा ईसाइयों को हिन्दू बनाने को तर्क संगत मानते हैं। मीनाक्षीपुरम (982) में, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात (998) में, दक्षिण भारत (999) में धर्मान्तरण कैम्पों का गठन हिन्दू धर्म के मूल मतानुयायियों ((0४0व0८०४/४७) द्वार समर्थित एव रक्षित था। गत बीस वर्षों में, विश्व हिन्दू परिषद का दावा है कि उन्होंने लगभग 47,000 मुसलमानों को परिवर्तित किया जो कि लगभग 8,000 परिवारों से सम्बन्धित थे (मुख्यत मेहराव, और रावत सम्पदार्यों के जो कि परम्पणगत प्रधाओं को मानते थे, जैसे मुर्दे को दफनाना, निकाह सस्कार करना, हलाल करके खाना, मूर्ति पूजा की निन्‍्दा करना, ईद, शबे ए-बारात, आदि त्यौहार मनाना), और राजस्थान में चार जिलों (अजमेर, पाली, उदयपुर, और भौलवाडा), तथा गुजग़त और दक्षिण भारत के 2000 ईसाइयों का भी धर्मान्तरण किया। यह समानतावाद का समर्थन नहीं करता। यह सामाजिक व आर्थिक असमानता को मान्यता प्रदान करता है और श्रेणीक्रम सरचना स्वीकार करता है। इसके विपरीत इस्लाम जैसे धर्म सिद्धा्तत समानतावादी हैं। बौद्ध जैसे अन्य धर्म समानता का जीवन के नैतिक क्षेत्र में निषेध करते हैं। हिन्दूबाद का जन्म और उद्विकास ऐसे काल में हुआ जब असमानताओं को जीवन का एक संत्य माना जाता था, और घर्म का सामाजिक कार्य इस (असमानदा) में परिवर्तन करना नहीं था बल्कि उन लोगों के भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिविश्य द्र ७) 6) ५) लिए इस सत्य को सुधारना था जो इस (असमानता) को कठोर व अपधर्षी (2एः्ब४5०) मानते थे। यह पार्मिक अभिव्यक्ति (प्र्मा/८४७0०॥) को विविधता (गाणाफ॥ता/) को जरूरी नही मानता। यह कुछ चुनिन्दा सस्कारों, विश्वा्सों और प्रथाओं को आवश्यक प्रानता है इसलिए उन्हें अधिक महत्व दिया जाता है। यह परम्पशागत स्थिति से छूटने की स्थिति है। छाँटने का कार्य कौन करे, किन खोतों से यह कार्य किया जाये और किस्त उद्देश्य के लिए किया जाये, ये सब विचारणीय महत्व के बिन्दु हैं। अभिषदीय हिन्दूवाद के लिए बढ़ते हुए महत्त्व का एक कारक है हिन्दुओं का अन्य देशों में फैलना) भाप्त के बाहर रहने वाले हिन्दू सास्कृतिक असुशक्षा की भावना से पीड़ित रहते हैं क्योंकि वे ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, खाड़ी देशों, यूरोप या उत्तरी अमेरिका जैसे इस्लामी या ईसाई समारजों में अल्पसख्यक समुदाय के रूप में होते हैं । यह अल्पसख्यक समुदाय (हिन्दू) बहुधा हिन्दुत्व के ऐसे स्वरूप को पसन्द करता है जिसको वे हिन्दू स्कूलों के माध्यम से अपने बच्चों को सिखा सकें और जो उनके नये उद्यम का प्रमर्थन करे। अन्य देशों में बसे ये अल्पसख्यक समुदाय और उनका वित्तीय समर्थन अभिषदीय हिन्दूवाद के धर्मापदेशकों और सस्थाओं के लिए. आधार प्रदान कोगा। इस विस्तार का महत्व न केवल नव-हिन्दूवाद को भारत में रहने वाले और बाहर बसे सर्थकों के बीच, सामाजिक कडी का स्पष्ट प्रदर्शन है बल्कि उस बढती हुई सन्निकटता का भी जिससे संघ, परिषद और समाज विदेशों में सभाए कस्ते और उनका समर्थन प्राप्त करते हैं और घनी व्यक्तियों के 'मत परिवर्तन (००एएथअंण) में सफलता प्राप्त कर रहे हैं। अभिषदीय हिन्दूवाद ने भारतीय राष्ट्रवाद की एक नवीन अवधारणा जस्तुत कौ है जिसे “हिन्दू राष्ट्रवाद' को सज्ञा दी गई है। इस अवधारणा के अनुसार हिन्दू बहुसख्या में होने के माते, और अतीत में जो कुछ भो महान्‌ और वौरता के कार्य हुए उनके उत्तराधिकारी होने के नाते, अन्य लोगों पर आधिपत्य रखने, अधिकार दर्शाने और उन्हें अपने आधीन समझने के लिए अधिकृत मानते हैं। यह कहा जाता है कि कोई भी, गैर-हिन्दुओं सहित, भारतीय हो सकता है बशर्ते कि वह हिन्दू देवताओं को स्वीकार करे और गैर-हिन्दुओं को विदेशी माने। हिन्दू अन्य गैरहिन्दुओं की अपेक्षा अधिक देश भक्त हैं। गैर हिन्दुओं को अपनी राष्ट्रवादी विश्वसनीयवा सिद्ध करने के लिए बहुसख्यक समुदाय के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करना चाहिए और पूजा के उन स्थलों को गिराने में देश भक्ति का कर्तव्य मानकर हिन्दुओं के साथ मिलना चाहिए, जो स्थल गैर-हिन्दुओं के द्वारा हिन्दू मन्दियें पर स्थापित कर दिए गये थे । हिन्दू राष्ट्रवाद उन गैर्हिन्दू लोगों के लिए हिन्दुओं के क्रोध का सामना करने की घमको है जो उपरोक्त लीक पर चलने मे मना करने हैं। ये अतिवादी धार्मिक नेता जो हिन्दुत्व और हिन्दू ग्रष्ट॑णद को बात करते हैं न्यायपालिका में विश्वास नहीं रखते और स्थापित मस्थाओं के प्रति सम्पान नहों करते। वे घानते हैं कि 'लोक शक्ति' रा शक्ति से अधिक महान है। ७) नच हिन्दूबाद या हिन्दुत्व के अगेता (छाणए०एव्मा>) सापेक्ष धर्म निरपेक्षता 22 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य (०४४८. 5६८एगाडण) की बात करते हैं। वे मुसलमानों के परिषोषण (एथगएशणाढ) वी ओर उन्हें सरक्षण दिये जाने तथा अल्प सज्यकों को एज्य द्वात विशेषाधिकार दिये जाने को “मिथ्या धर्म निसपेक्षवाद' (5९७००-5९८एवरयंधाओ मानते हैं। “सापेक्ष धर्म निरपेक्षता' उतके अनुसार समान आचारसहिता, अधिकारों और उत्तरदायित्वों से बन्धे सभी धार्मिक समुदायों को एक साथ आने की कल्पना है! इस प्रकार वे चाहवे हैं कि सरकार द्वारा एक नागरिक सहिता (शा ०००६) लागू की जाये जो भारत के सभी नागरिकों पर धर्म और जाति भेद भाव के बिना समान रूप से लागू हो। वे केवल हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, या पारसियों के लिए अलग-अलग, विवाह सम्बन्धी तथा सम्पत्ति सम्बन्धी नियमों को लागू कराना नहीं चाहते। उनका विश्वास है कि साम्प्रदायिक सघर्षों के लिए यह एक आदर्श लोक्तात्रिक समाधान होगा। वे यह नहीं मानते कि इससे अल्प सख्यक समुदायों वी धार्मिक व सास्कृतिक पहवान बहुसख्यक समुदाय में निमगन (६प्रण्णटाहुल) हो जायेगी। अपेक्षाकृत उनका विश्वास है कि इस प्रकार को नीति (समान सहिता) सभी सम्पदायों में प्रचलित अन्ध विश्वार्सों, सडे गले रिवाजों तथा तर्कहीन व पिछड़ेपन की प्रथाओं को समाप्त कर देगी और एक वैज्ञानिक सोच का विकास करेगी जो धर्म निरपेक्ष राज्यों के लिए मोड का पत्थर होना चाहिए। जिन भावनाओं का उदय हो रहा है वह यह हैं कि अभिषदीय हिन्दूवाद, जो स्वदेशी हिन्दूवाद की पुनर्स्थापना का दावा कर रहा है, वास्तव में स्वय को स्थापित कर रहा है। यह तो केवल समय ही बतायेगा कि यह नव हिन्दूवाद या 'हिन्दुत्व” या हिन्दूवाद का पुनर्पष्टीकरण (:0्ा्टाएए८(७७०४) अर्थार्त 'हिन्दू राष्ट्रवाद' का आदर्श भारतीय राजनीति के धर्म निरपेक्ष स्वरूप को कहा तक प्रभावित करेगा। इसी प्रकार, केवल समय ही यह निर्धारित करेगा कि वे धार्मिक विचारधाराए जो जन साधारण पर अपना वर्चस्व स्थापित करेंगी, भारत के लोगों के हितों और आकाक्षाओं पर खंगी उतरेगी या फिर सामाजिक व्याधि की दशाए पैदा करेंगी जो समाज में घृणा व द्वेष उत्पल करेंगी। भारतीय समाज भे निरन्‍्तरता तथा परिवर्तन के कारक (ट०ए5 (०एराणएांए बाते एफ: 70 वर $8०लल॑एछ) ऐसे अनेक कारक हैं जो भारतीय समाज में निरन्‍्तरदा बनाए रखने तथा परिवर्दन के लिए उत्तरदायी हैं। परिवर्तन एकीकरण (/॥/८८४७०००) और अनुकूलन के माध्यम से आ सकता है। अनुकूलन तब होता है जब विद्यमान सस्थाएँ नयी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एफए से सापवस्ण करें| एबीकरण दब होदा है जब कोई समाज नये रत्तों को पाएण के और इनको अपना हिस्सा बना ले। उन अनेक कारकें में से जिन्होंने हमारे समाज को अनुकूलन या एकीकरण के लिए प्रेरित किया है या इसमें बाधक बने हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं राजनैतिक स्वतत्रतरा और लोकताद्रिक मूल्यों का चलन, औद्योगोकरण, नगग्ैकरण, शिक्षा प्रसार, चैधानिक उपाय, जाति प्रथा में सामाजिक परिवर्तन, और सापाजिक आन्दोलन ठथा सामाजिक चेतना (जैसे, परिवारवाद, वैश्वीक्रण, और जातिवाद विरोध)। भ्रात्तीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य 23 राजनैतिक स्वतत्रता और लोकतात्रिक मूल्यों का प्रारम्भ (तर ९॥शभाप्य व्रऐशुशातेतारष 90 ॥7007तीणा ण॒ एशा०्टआ९ रंश॥९5) गजनैतिक स्वतत्रता से सभी व्यक्तियों को यह अवसर प्राप्त हुआ है कि वे अपनी पहचान, स्थिति, प्रतिबद्धता, और इच्छाओं में निहित हितों और मूल्योन्युख चेवना और अचेतना के चारों और रहकर स्वयं का विकास कर सकें। आज व्यक्ति अपनी व्यक्तिवादिवा को लेकर अधिक परेशान है। वे समूह जो पीढियों तक स्वतंत्र सामाजिक अन्तर्क्रिया से बचित रहे थे अब वे भी सामाजिक ढाँचे में भेदभाव पूर्ण विशेषाधिकार प्राप्त करके ऊंचा उठने का आग्रह कत्ते हैं। वे क्षेत्र जो ब्रिटिश शासकों की नीतियों के कारण आर्थिक रूप से पिछड रहे थे, अब विकास योजनाओं में अपना हिस्सा चाहते हैं। कुछ नृजातीय (॥०) समूह अपनी सास्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए राजनैतिक स्वतत्रता चाहते हैं। धार्मिक समूह अपने सदस्यों को कुछ मूल्य और उप-सांस्कृतिक प्रतिमानों को सिखाने की आजादी चाहते हैं। इन सभी आकाक्षाओं और मांगों ने गत पाय दशाब्दियों में हमारे देश में आधुनिकौकरण की प्रक्रिया और सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति को प्रभावित किया है। शजनैतिक स्वतत्रदा ने सामन्‍्तों जमीदारी प्रथा, जागीरदारी और राजाओं के राज्यों का उन्मूलन करके हमारे समाज की संरचना और इसकी अधिकार प्रणाली में भारी परिवर्तन करते का मार्ग भशप्त किया है। इसने हमारे प्रामोण समाज के आर्थिक और सामाजिक आधार में क्रान्ति लाने का काम किया है जिसके परिणाम आज भारत के प्रत्येक गाँव में देखे जा सकते हैं। किराये पर भूमि लेने वाले काश्तकार अब इतने स्वाधीन हैं कि वे शक्तिशाली ग्रामीण मध्यम वर्ग के रूप में उभरे हैं। राजनैतिक परिक्षेत्र में इस वर्ग की महत्त्वपूर्ण और अ्रभावशाली आवाज है। देश में हरित क्रान्ति मुख्यत, इसी वर्ग को देन रही है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक लचौलापन, ब्राह्मणीय पस्म्परओं के प्रति सहिष्णु उदासीनता, सास्कृतिक एवं भूमि सम्बन्धी आव्दोलनों के निसतर भागोदागे, और कलहप्रिय उपयोगितावाद (फ0हपशटा०0४ ४४॥४४०॥४४) ने इस वा को देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की है। यही समूह आज देश के शक्तिशाली पिछड़े वर्ग के आन्दोलन का नेतृत्व कर रहा है। राजनैतिक स्वतत्रता ने राष्ट्र के लिए औद्योगिक, प्रौद्योगिकोय/वैज्ञानिक दथा प्रबन्धकीय विकास को सम्भव बनाया हे। एक अत्यन्त सुदृढ प्रौद्योगिक और वैज्ञामिक मानव शक्ति को उत्पनन किया गया है। योगेन्द्र सिंह (994 22) ने भी कहा है कि एक नये वर्ग, जो स्वतत्रता पूर्व के मध्यम वर्ग की विशेषताओं से बिल्कुल भिन्न है, का उदय हुआ है। इस वर्ग का कही अधिक विस्तृत सामाजिक आधार है जो निम्न और मध्यम जातियों और समाज के ऐसे ही स्तरों से सम्दद है। शहरो क्षेशें में नये उद्चपी और पेशेब९ वर्ण और घाँवों के धनवान कृषक वर्ग भार के मध्यम वर्ग में आते हैं जो अनुमानत भारत की कुल जनसख्या के एक चोथाई के लगभग हैं। देश की जीडीपी (0 9 7) में सेवारत क्षेत्र के भ्रतिशव में निएनर वृद्धि हुई है जो दर्शाता है कि समाज की रचना और आर्थिक सरचना में किस सीमा तक परिवर्तन आया है। उपनिवेशवाद ने भारतीय समाज की औद्योगिक नीव को थ्षीण व दुर्दल बना दिया था और स्वतत्रता के बाद देश आज औद्योगिक प्रगति के मामले में तेरहवें 4 भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदय स्थान पर आ गया है। ये उपलब्धिया इसके सामाजिक जीवन के आधारभूत क्षेत्रों में योजनाबद्ध विकास का परिणाम हैं। नगरीकरण (0व्रत5॥व0ज) नगगैकरण एक और कारक है जिसने परिवार व समाज को प्रभावित किया है। गठ कुछ दशाब्दियों में हमारे देश की शहरों जनसख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। मध्य अठारहवीं श्वाब्दि में भारत में करीब 0 प्रतिशत जनसख्या शहरों में रहने वालों की थी। उन्मीसवीं शवाब्दि के दौरान भारत के शहरवासियों की सख्या सौ वर्षों में दस गुनी हो गई, बौसवीं शताब्दि में जब समूचे देश की जनसख्या 90। में 23 करोड 80 लाख से बढकर 9 में 84 कंग्रेड 63 लाख हो गई, शहरी जनसख्या में बहुत अधिक वृद्धि हुईं। 95। में शहरी जनसंख्या कुल जनसख्या कौ ]7 29 प्रतिशद थी, जो 96] में बढकर 7 97 प्रतिशत,97 में 99] प्रतिशत, 987 में 23 34 प्रतिशत और 99 में 2573 प्रतिशत हो गई। 7% में शहरी जनसख्या की दस वर्षीय विकास दर 264। प्रतिशत थी जो 97 में बढ़कर 38 23 प्रतिशत, 98 में 46 4 प्रतिशत और 99। में 36 9 प्रतिशत रही । सही अर्थो में भारत वी शहरी जनसख्या 96 में 78 करोड थी जो 99। में 2.7 करोड हो गई। (#/०:90007 7१०॥६ 840०, 998 24) शहरी क्षेत्रों में परिवार, नातेदायी, जाति व विवाह आदि व्यवस्थाएँ ग्रामीण क्षेत्रों से म केवल रचना में भिन्‍न होती हैं बल्कि विचारधाय और कार्यप्रणाली में भी भिनल हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है कि शहरी क्षेत्र में एकल परिवार, गैरःशहरी एकल परिवार से कुछ छोय होता है, और नगरवासी ग्रामवासियों की अपेक्षा एकल परिवार को अधिक पसन्द करता है। एमएसगोरे (0968) ने उल्लेख किया है कि शहरी परिवार अपनी अभिरुचियों, भूमिवा दृष्टिकोण और व्यवहार में सयुक्त परिवार के प्रहिमानों से भिन होते हैं। उदाहरण के लिए, निर्णय करने के क्षेत्र में, ग्रामीण परिवारों के विपरेत शहरी परिवारों में बच्चों के विषय में वरिष्ठ पुरुषों को अपेक्षा माता पिता ही निर्णय लेते हैं, उनकी सख्या अपेक्षाकृत इसी रुझान के ग्रामीण लोगों में कम होती है। परन्तु आईपी देसाई (964) इस विचार से सहमत नहीं है कि नगरीकरण सयुक्त परिवार व्यवस्था को तोडने का काम करता है। सयुक्ता (0४७८५४) पर नगयीकरण के प्रभाव का विश्लेषण करते हुए उन्होंने परम्परागत सयुक्तता और शहरी क्षेत्र में परिवार के रहने को अवधि में महत्वपूर्ण सम्बन्ध पाया। उनकी परिकल्पना थो कि शहरी क्षेत्र में परिवार का लम्बे समय तक रहना सयुक्तत्ा की मात्रा को कम करेगा। परन्तु उन्होंने पाया कि सयुकतता “बहुत पुणने' (८७ ०6) (शहरों में 50 वर्षों से अधिक समय से रह रहे) ठथा “पुराने (०४०) परिवारों (शहर में 25 से 50 वर्ष की अवधि से रह रहे) में नये” परिवारों 25 या इससे कम वर्षों से शहरों में रह रहे) की अपेक्षा अधिक विद्यमान है। ल्युइस वर्थ (005 9४०४, 938) का भी मानना है कि शहर परम्परात्मक प्रकार के पारिवारिक जीवन के लिए प्रेरणादायक नहीं होता। उनके अनुसार परिवार (सामाजिक जीवन की एक इकाई के रूप में) गांव के वृहद्‌ नातेदारी समूह के लक्षण से मुक्त हो जाता है तथा परिवार के सदस्य अपने पेशे, शिक्षा और धार्मिक, मनोरजन और राजनैतिक जीवन में भारतीय समाज का ऐविलासिक परिदृश्य 25 अपनी अलग रुचियों के अनुसार लगे रहते हैं। अन्य अनेक सामाजिक व्यवस्थाओं में भी शहरों में परिवर्तन परिलक्षित होते हैं । शहरी क्षेत्रों में नातेदारो सम्बन्ध इतने निकट के नहीं होते जितने ग्रामीण क्षेत्रों में । शहरों में जब केवल प्राथमिक व द्वैतियक नातेदार ही निकट सम्पर्क रखते हैं, गांवों में तृतीयक व दूर के नातेदार भी सम्बन्ध बनाए रखते हैं। शहरों में जाति व्यवस़्या इतनी कठोर नही है जितनी गाँवों में। शहरों में जाति अब अबल सामाजिक पहचान नहीं है जिसके माध्यम पे लोग अपनी सामाजिक अनाक्निया को अभिव्यक्त कों। लेकिन गाँवों में लोग अभी भी अपने सामाजिक, राजनैतिक और सास्कृतिक लक्ष्यों को जाति के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं। शहरों में जाति पंचायतें जाति संघों में प्रतिस्थापित होती जा रही हैं। वे सघ अब सजातीय विवाह के प्रति मानों प्रदूषण और शुद्धता, या जाति विवादों के समाधान, आदि के प्रयास सबधी दबाव डालने की भूमिका नही निभाते बल्कि इन जाति संघों ने अपना कार्यात्मक व संघीय क्षेत्र विस्तृत कर लिया है। इस कार्य श्रणाली में लगभग 300 जातियां सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। हमारा विचार है कि विभिन्‍न सामाजिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन में नगरौंकरण की भुला अहम्‌ रही है। शहरी रहन-सहम मे संयुक्त परिवार के स्वरूप को कमजोर किया है एकल परिवारों को मजबूत। शहर नये व्यवसायों तथा उच्च शिक्षा के लिए निरन्‍्ता अवसर प्रदान करते हैं। जो परम्पणगत पारिवारिक व्यवसाय छोडकर नये अपनाते हैं वे परम्परागत पेशे अपनाने वाले लोगों की अपेक्षा अपनी अभिरुचि में अधिक बदलाव प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार शररी क्षेत्रों में शिक्षित लोग संयुक्त परिवार के प्रतिमानों के पक्ष गें कम होते हैं! यह कहा जा सकता है कि अभिरुचि में परिवर्दन का शहर में रहने को अवधि से सीधा सम्बन्ध है। शहर स्ियों को भी लाभकारी रोजगार के अवप्नर प्रदान करते हैं और सत्र घन अर्जन करने लगती है तो वह कई क्षेत्रों में स्वतत्रता भ्राप्त कर लेती है। वह पति के परिवारोन्युख होने से अधिक से अधिक बचने का प्रयल करती है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे समाज में परिवार के स्वरूप में शहरी रहन-सहन ने कुछ भिन्‍ताए पैदा की हैं। औद्योगीकरण (प60503॥73607) भारत में औद्योगीकरण को प्रक्रिया का जारम्म उन्नीसवी शताब्दि के अन्तिम 25 वर्षों और 20वीं शर्वाब्दि के पूर्वार्ध में प्रारम्भ हुआ। नवीन उद्योगों के चारों ओए शहरों का विकास ४083 । औछ्योगोकरण से पूर्व हमारे यहा () कृषि आधारित मुद्राविहीन अर्थ व्यवस्था थी, (॥) प्रौद्योगिकी का ऐसा स्तर था जहां घरेलू इकाई भी आर्थिक आदान-प्रदान की इकाई थी, (प) पिवा-पुत्र तथा भाई-भाइयों के बीच पेशों में अन्तर नहीं होता था (४४) ऐसी मूल्य व्यवस्था थी जहा बजुर्गों को प्रभुता और परम्पणओं को पचित्रता दोनों ही “विवेक (0०४४५) के सिद्धान्न के विपतीत माने जाते थे। लेकिन औद्योगोकरण से आमतौर घर हमारे समाज में और विशेष रूप से परिवार में आधिक और सामाजिक व सास्कृतिक परिवर्तन आये। आयिक क्षेत्र में इसका परिणाम है काम में विशिष्टोकरण, व्यावसायिक गतिश्ोलता, अर्थव्यवस्था का मुद्रीकण, तथा नातेदारी व व्यावसायिक साचना में बिखराव। सामाजिक क्षेत्र में इसका परिणाम है : मामीण क्षेत्रों से लोगों का शहरी क्षेत्रों में प्रत्रजन, शिक्षा का विस्तार और एक हे 26 भ्रारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य सुदृढद केद्रीय राजनैतिक सरचना। सास्कृतिक क्षेत्र में शहरीकरण से विश्वासों में धर्म निरपेक्षता सम्भव हुई है। पारिवारिक सगठन पर औद्योगीकरण के तीन महत्तवपूर्ण प्रभाव ड् है - श्रथम, परिवार जो उत्पादन की प्रमुख इकाई था अब उपभोक्ता इकाई में बदल गया है। एकीकृत आधिक उद्यम में परिवार के सभी सदस्यों के एक साथ काम करने के बजाय, परिवार के कुछ पुरुष सदस्य परिवार के लिए रोजी रोटो कमाने हेतु घर से बाहर जाते हैं। इसने न केवल सयुक्त परिवार के परम्परागव सरचना को बल्कि सदस्यों के बीच सम्बन्धों को भी प्रभावित किया है। दूसरे, फैक्ट्री रोजगार ने युवा प्रोढों को अपने परिवारों पर सोधी निर्भरता से मुक्त कर दिया है। उनके पासिश्रमिक ने क्योंकि उन्हें आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बना दिया है, अत घर के मुखिया का प्रभुत्व और भी कम हो गया है। शहरों में कई मामलों में पुरुषों के साथ उनकी पतियों ने भी काम करना व धनार्जन शुरु कर दिया है। इसने एक सीमा तक अन्तगारिवारिक सम्बन्धों को प्रभावित किया है। अन्तिम, बच्चे अब आधधथिक परिसम्पत्ति (७४४४(७) ने होकर दायित्व (॥809॥025) बन गए हैं। यद्यपि कुछ मामलों में बाल श्रम के उपयोग व दुरूपयोग बढ गए हैं, कानून बच्चों को काम की अनुमति नहीं देता। इसी के साथ शैक्षिक आवश्यकताए इतनी बढ गई है कि बच्चों को लम्बे समय तक अपने माता-पिता पर निर्भर रहना पडता है। शहरों में आवासोय व्यवस्था महंगी है और बालकों का रख रखाव भी। इस प्रकार औद्योगीकरण के कारण घर और काम अलग अलग हो गए हैं। कुछ समाजशास्त्रियों ने औद्योगीकषण के कारण एकल परिवारों के उद्भव (८णथह०॥००) के सिद्धान्त को चुनौती दी है। यह चुनौती अनुभवजन्य अध्ययनों और विश्व के भिन-भिन भागों में परियार व्यवस्था की विविधता पर तैयार किए गए दस्तावेजों (१०८णाधरथ्णाआा०0) पर आधारित है। एमएसए राव, एमएस गोरे तथा मिल्टन सिंगर जैसे विद्वानों के अध्ययनों ने यह बताया है कि सयुकतवता व्यापारी समुदाय में अधिक प्रचलित है और इसे अधिक अच्छा माना जाता है और कई एकल परिवार विस्तृत नातेदायी बन्धन बनाए रखते है । पश्चिमी औद्योगिक जगत में अनेक आधुनिक अनुसधानकर्त्ताओं ने भी अवैयक्तिक विस्तृत जगद और परिवार के बीच नातेदारों की समर्थक भूमिका और उनके बीच सयोजक के कार्य पर बल दिया है (५७७ !970) | सामाजिक इतिहासकारों ने भी दर्शाया है कि औद्योगीकरण से पूर्व भी यूगेप और अमेरिका में एक सास्कृतिक प्रतिमान के रूप में एकल परिवार प्रचलित था। परन्तु यह उल्लेखनीय है कि नातेदारों की समर्थक भूमिका (४0900॥४९ 706) में अनिवार्यता का वह लक्षण नही है जो भारतीय एकल परिवार के दायित्वों (00॥820075) में पाया जाता है। एकल परिवार के नवयुवक आज भी प्राथमिक नाहेदाएं (जैसे, मादा पिता, सहोदर) के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह स्वेच्छा से करते हैं। निकट स्वजन (॥0) से एकता और परिवार के साथ एकता-भाव का निर्वाह भी करते हैं, यद्यपि वे अलग-अलग मकानों में रहते है (,0०४४ 90८, 974 . 377) इन सभी परिवर्तनों ने हमारे परिवार व्यवस्था में परिवर्तन किया है। जहा आमीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर जनसख्या को गतिशीलठा से अधिकार शक्ति मे कमी आई है, धर्म निरपेक्षवाद मे ऐसो मूल्य व्यवस्था का विकास किया है जो व्यक्तिगत प्रेरणा और उत्तरदायित पर बल देती है। व्यक्ति अब प्रतिबन्धात्मक पारिवारिक नियत्रण के बिना काम करता है। भारतीय समाज का ऐतिहासिक फ्रिदृस्य 27 पहले जब व्यक्ति परिवार में काम करता था और सभी सदस्य उसके काम में उसको सहायता करते थे, तब परिवार के सदस्यों में अधिक घनिष्टता होती थी, लेकिन क्‍योंकि अब वह परिवार से दूर उद्योग/आफिस में काम कण्ता है, अत सम्बन्धों को घनिष्ठता पर प्रतिकूल अभाव पडा है। परिवार के सम्बन्धों पर औद्योगीकरण का अभाव एरिवार की आत्मनिर्भरता से भी तथा परिवार के प्रति रूचि में परिवर्तन से भी स्पष्ट होता है। इस प्रकार औद्योगीकाण ने एक नये प्रकार के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति में योगदान दिया है जिसमें सयुक्त परिवार का प्रभुतापूर्ण सगठन जो प्रारम्भ में था अब कठिन हो गया है। औद्योगीकरण के प्रभाव के कारण समुदायों की सामाजिक रूपोखा (फाणी५) अन्तर्क्रियाओं के अनेक पहलुओं को प्रस्तुत करती है, जैसे विभिनन क्षेत्रों, समुदायों व सामाजिक श्रेणियों के मध्य सम्पर्क (॥7:०8८७) व अन्वक्रियाएँ। यह लोगों के एक थेत्र से दूसरे में प्रवजन से भौ प्रदर्शित होता है जिसने द्विभाषावाद (॥॥॥80/79७9४) को बढावा दिया है। 99। की भारत जनगणना ने द्विमाषावाद को लगभग 5 भ्रतिशत बताया है जबकि समुदायों के सर्वेक्षण में इसका 60 प्रतिशत तक अनुमान किया गया है। सांस्कृतिक शेत्रों में भी समानता एवं अन्तृक्निया सास्कृतिक लक्षणों में प्रदरशिव होती है। यह क्षेत्रों (रण) और सीमाओं ((०४४॥0म८७) से परे भी बडी सख्या में समुदायों के लिए भी सत्य ऐै। इस प्रकार के सास्कृतिक लक्षण न केवल सस्कारों और सस्थात्मक प्रधाओं से बल्कि पेशों की प्रौद्योगिकी दक्षताओं और श्रम विभाजन से भी सम्बन्ध हैं। अनेक समुदाय अपने परम्परागत पेशे से हट गए हैं और सरकार द्वारा प्रायोजित विकास कार्यक्रमों के प्रति तीव्र जागृति दर्शाते हैं। उच्च आकाक्षाओं के साथ इस भ्रकार की जागृति सामाजिक व्यवस्था में एक प्रकार का तनाव और सपर्ष पैदा कप्दो है जो हमारे सामाजिक जीवन के अमेक क्षेत्रों में परिलक्षित होती (देखें, जएड:पएब इगएाः "काठ्टया 8009. 50थ00णा गे होता" ह,53600989769 पाए कात #फऊा: 0795 05999 (०९) 7॥6 एछाकाट रेटव८०८०८ 995 22-23) शिक्षा में विस्तार (0९85९ 40 रिशा८७०णा) आधुनिक युग में भारतोय समाज ने अपनी शिक्षा व्यवस्था में विस्तार किया है क्योंकि इसे अधिक साक्षर लोग चाहिए। यद्यपि साक्षस्ता का प्रतिशत 95 के 36 प्रतिशत से बढकर 999 में 60 प्रतिशत हो गया है तथापि 33 कप्रेड लोग अभी भी साक्षर बनाने हैं। पुरुष साक्षरता दर अब 70 प्रतिशत पर पहुँच गई है और र्री साथरता दर (4999 के अन्त एक) 50 प्रतिशत हो गई है। राज्यों में साक्षरता दर केरल, मिजोर्म, गोआ, दिल्‍ली में 75 प्रतिशत से ऊूपर तथा 5 था 6 केन्द्र शासित प्रदेशों में 70 भ्रतिशद से उमर पहुच गई है। 6 राज्यों में साक्षरता 50 से 65 प्रतिशत तक हो गया है। अनुसूचित जातियों में शिक्षित प्रतिशत 37 अ्रतिशत तथा अनुसूचित जनजातियों में 30 प्रतिशत (!99]) तक पहुँच गया है। स्कूलों और कालेजों में पढने वाले छात्रों की सख्या (स्नातक स्तर तक केवल) 97 में 5 48 करोड से बढकर 99] में 846 करोड हो गई है (#/&फ्0#6 7दहिंग् ##द्वव, 998 42-47)। शिक्षा ने न केवल लोगों की अभिवृत्तियों, विश्वासों, मूल्यों और विचारघागओं में परिवर्तन किया है बल्कि वैयक्तिकता (्रताधवठण४&गा) की भावनाओं को भी भडकाया है। 28 भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य बढती हुई शिक्षा न केवल सी पुरुषों के जीवन-दर्शन में परिवर्तन करती है बल्कि खियों के जौवन में रोजगार के नये क्षेत्र भी प्रदान करतो है। आर्थिक स्वतत्रता प्राप्त करने के बाद जरिया पारिवारिक मामालों में अधिक दखल (४०४०८) चाहती हैं और किसी के भी प्रभुत्व को अस्वीकार करती हैं. यह दर्शाढा है कि किप्त प्रकार शिक्षा परिवार में सम्बन्धों में परिवर्दन करती है और अन्तत सरचनात्मक परिवर्तन भी आते हैं। आई पो देसाई और एलिन डी रास ने भो शिक्षा और परिवार के पारस्परिक भ्रभाव के विषय में चर्चा की है। आई पीदेसाई ने सयुक्त परिवार के विरूद्ध शिक्षा की कार्यप्रणाली के दो तरीके बताए हैं. एक, व्यक्तिवाद पर बल देकर शिक्षा लोगों के सामने ऐसे प्रकार के परिवार की रूपरेखा प्रस्तुत करती है जो विद्यमान सयुक्त परिवार की रूपरेखा के विपरीत है, और दूसरा, लोगों को ऐसे व्यवसायों के लिए तैयार करती है जो उनके मूल स्थानों में नही पाये जाते जिसके फलस्वरूप वे पैदूक परिवार से अलप हो जाते हैं और ऐसे क्षेओरों में रहते हैं जहा उनको अपनी शैक्षिक योग्यता के अनुरूप व्यवसाय मिल जाता है। समय के दौरान ये लोग अपने माता पिदा के परिवार से सम्पर्क कम कर देते हैं और रहने (निवास) तथा विचार के ऐसे नये दरीके विकसित कर लेते हैं जो सयुक्त परिवार के लिए घातक पसनु एकल परिवार के लिए साधक होते हैं। लेकिन देसाई मे महुआ (१४७४४४०) के अपने हो अध्ययन में आश्चर्य से यह पाया कि शैक्षिक स्तर की वृद्धि के साथ साथ सयुकतता में भी वृद्धि हुई और एकलता में कमी आई। देसाई का मठ है कि केवल कुछ लोग ही समाचार पत्र या सामान्य और लोकप्रिय पुस्तकें खरीदते हैं। लोगों के विश्वास और विचार समाचार पत्रों, पत्रिकाओं या विशेष रूप से अग्रेजी की पुस्तकें या सामान्य रूप से पश्चिमी शिक्षा प्रणाली से सीधे प्रभावित नही होते। शिक्षा का जो कुछ भी भ्र्नाव लोगों पर होता है वह मव अभिजात वर्ग तथा घर और स्कूल के वातावरण से ही हो सकता है। अत परिवार के मुखिया का या सारे घर का शिक्षा स्तर नये और भिन्न विचारों और विश्वासों के प्रभाव का सकेत नही होता। यह नये विधारों वाले व्यक्तियों के साथ सम्पर्क पर निर्भर करता है (वही 07)। हमें देसाई के कथन में कोई तर्क नहीं दिखाई देता। यह सत्य है कि परिवार से बाहर व्यक्ति के सम्पर्कों के प्रकार व्यक्ति की अभिरुचियों और विश्वासों को प्रभावित करते हैं लेकिन उसका अपना ही प्रभाव होता है। दूसरी ओर, परिदार के सदस्यों, का शैक्षिक स्तर व्यक्ति के विचारों और विश्वासों में परिवर्तन का एक अलग ही महत्त्वपूर्ण कारक होता है। इसलिए यह नहीं माना जा सकठा, जैसा कि देसाई मानते हैं,कि परिवार के सदस्यों का शिक्षा का स्वर परिवार के सगठन और सरचना में परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण कारक नहीं है। इसी प्रकार देसाई का यह निष्कर्ष कि शिक्षा के स्तर में वृद्धि के साथ सयुक्तता में वृद्धि और एकलता में कमी होती है, भी सत्य प्रतीत नहीं होता। सम्भवत उनके निष्कर्ष परिवार के शिक्षा स्तर का पद लगाने के लिए उनके अध्ययन में गलत विधि का प्रयोग के के कारण हों। उन्होंने परिवार की शिक्षा का औसत, परिवार के “न पढने वाले” सदस्यों (अर्थात्‌ वे वयस्क और बडे बच्चे जो और अधिक शिक्षा नहीं प्राप्त कर सकते) के स्कूल जाने के औसत वर्षों की सख्या के आधार पर लिया। इन सभी सदस्यों द्वार स्कूल के वर्षों की औसत सख्या को सदस्यों की सख्या से भाग दे कर परिवार कौ शिक्षा का औसत निकाला भारतीय समाण का ऐतिहासिक परिदृश्य 29 गया। परिवार के शिक्षा स्तर का पता लगाने की यह विधि निश्चय ही प्रश्न-चिन्ह लगाने योग्य है। यदि उन्होंने अन्य विद्वानों द्वाश आमतौर पर प्रयोग किए जाने वाली विधि का प्रयोग किया होता, तब उन्हें भिन्‍न परिणाम मिलते। केवल तर्क के लिए यदि यह मान भी लिया जाये कि परिवार के शिक्षा स्तर का पता लगाने की उनको विधि सही थी तो स्नातक शिक्षा प्राप्त परिवारों में सभी एकल परिवार क्‍यों थे और एक भी परिवार सयुक्त क्यों नहीं था 2 यदि अधिक शिक्षा सयुक्तता की वरीयता दर्शाती ऐ, तब स्तातक परिवाएं में मैट्रिक या गैस्मैट्रिक परिवारों कौ अपेक्षा सयुक्त परिवारों को अधिक सख्या होती। इन तकों के आधार पर परिवार सरचना और शिक्षा के बीच सम्बन्धों के प्रकार के विषय में देसाई के विचार से हम सहमत नहीं हैं। हमारो मान्यता है कि शिक्षा में वृद्धि एकलता के विचार को बढावा देतो है न कि सयुक्तता को। गस 964) ने कहा है कि मौजूदा व्यवसाय ऐसे हैं कि उन्हें विशिष्ट शिक्षा-दीक्षा और कुशलता की आवश्यकता अपने से ऊचा उठाने के लिए बेटों को उच्च शिक्षा दिलाने हेतु सदेव महत्वाकाक्षी एहते हैं, विशेष रूप से शहरों में प्रध्यम और उच्च परिवासें में | कुछ गरीब माता-पिता इतने महत्वाकाक्षी होते हैं कि वे किसी भी कष्ट, बलिदान और मुसीबत को कौमत पर अपने बेटों को उच्चतम शिक्षा दिलाने को प्रयलशील रहते हैं। कभी कभी तो वे स्वय को ही प्रमुख आवश्यकताओं और सुविधाओं से वचित रखते हैं। ऐसे मामलों में यदि दुर्भाग्यवश उनके बेटे परीक्षा में असफल हो जायें या एक योग्यता स्तर तक न पहुँच पाएँ, तो उनके माता-पिता निराश हो जाते हैं। कुछ ऐसे मामलों में वे अपने बच्चों को भला-बुग भी कहना शुरू कर देते हैं। कभी-कभी यह इतना अधिक हो जाता है कि उनके लड़कों की सफलता भ्राप्त करने की योग्यता और इच्छा ही समाप्त हो जाती है और वे परिवार से नाता वोड लेते हैं। दूससे ओर कुछ ऐसे मादा-पिता भी होते हैं जो अपनी गयैबी के कारण अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति अति महत्वाकाक्षी नहीं होते लेकिन उनके बच्चे अत्यधिक भहत्वाकाध्ी होते हैं। इसलिए ये (बच्चे) अपने माता-पिता को छोडकए भिन्‍न शहरों या कस्बों में शिक्षा श्राप्त करने चले जाते हैं। आर्थिक रूप से अपनी सहायता स्वय करने के लिए वे ट्यूशन या नौकरी कर लेते हैं। इस प्रकार ये बच्चे धीरे-धीरे अपने परिवारों से नाता तोड लेते हैं। शादी के बाद भी वे शहरों में हो रहना जारी रखदे हैं। इस प्रकार से शिक्षा उनके परिवार को प्रभावित करती है (वही, 208-237) | स्त्रियों के मामले में भी शिक्षित लडकियों का दृष्टिकोण अपने पत्ि, बच्चों व परिवार के प्रति बदल जाता है और वे अपनी रूढिवादी सास से भिड जाती हैं और पृथक घर में रहने पर जोर देती हैं। यह सब परिवार के स्वरूप पर शिक्षा के अभाव को दर्शाता है। जैसे जैसे शिक्षा का स्तर उठता है, एकल परिवाण के पश्षथर लोगों का प्रतिशत भी बढ़ता है तथा सयुक्त परिवार में रहने कौ इच्छा वाले लोगों का अ्तिशत घटता जाता हैं। वैधानिक उपाय (<टाज8652 'शट्ब॥उ) वैधानिक उपायों का भी समाज पर प्रभाव पड़ता है। बाल विवाह का निषेघ और बाल विवाह प्रतिबन्ध अधिनियम, 4929, (976 में सशोधित) तथा हिन्दू विवाह अधिनियम, 955 ने शिक्षा के लिए उपलब्ध अवधि बढ़ा दी है तथा विवाह के बाद नये वातावरण में 30 भारतीय समाज का ऐविहासिक प्रिदृरय दम्पत्तियों के अनुकूलन में कार्यात्मक योगदान दिया है। साथी के चुनाव में स्वतत्रता और विशेष विवाह अधिनियम, 954 के आधार पर एक आयु के बाद माता पिता को अगुप्त्ति के बिना किसी भी जाति व धर्म में विवाह करना, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 856 के अनुसार विधवा पुनर्विवाह की अनुमति, हिन्दू विवाह अधिनियम, 955 के आधार पर किसी भी समय विवाह विच्छेद, तथा हिन्दू उत्ताधिकार अधिनियम, 956 के अनुसार पिठा की सम्त्ति में से पुत्री को हिस्सा देना जैसे कामूनों ने न केवल व्यक्तिगत सम्बन्धों में ओर परिवार रचना में सुधार किया है बल्कि सयुक्त परिवार में स्थायित्व भी प्रदान किया है। उत्तराधिकार अधिनियम, 956, हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 856, सदी पथा निषेध अधिनियम, 987, दहेज निषेध अधिनियम, 96), अनैतिक धन्या निरोधक अधनियम, 956 (छाग' फिर से नाम दिया गया) तथा स्त्रियों के अभद्र प्रदर्शन (निषेध) अधिनियम, 986, आदि इन सभी अधिनियमों ने समाज में स्त्रियों के स्वर की उठाने और उनके अति हिंसा और उनका शोषण रोकने में योगदान किया है। नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम, 955, अस्पृश्यता अधिनियम, 955 तथा अनुसूचित जाति और जन जाति (अत्याचार के विरुद्ध निरोधक) अधिनियम, 989 ने समाज के कमजोर वर्गों का शोषण रोक दिया है। इन अधिनियमों के अलावा, बन्धुआ मजदूर प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 976, बाल श्रम (निषेष और नियमतीकरण) अधिनियम, 986, मानवाधिकार सरक्षण अधिनियम, 993, समान पारिश्रमिक (7८एणा०ा90079) अधिनियम, 976, मुस्लिम महिला (तलाक से सरक्षण का अधिकार अधिनियम 986, ने समाज के अनेक पीडित श्रेणियों को राहत पहुँचायी है। जाति व्यवस्था में परिवर्तन (एफशआह९ 0 (४५8९ 8३9९0) जा खा में होने वाले परिवर्तनों को चर्चा अध्याय 2 (“सामाजिक स्वरीकरण”) में वी गयी है। सामाजिक आदोलन और सामाजिक चेतना (80069 '05रगाशा5$ शत $50ठ6॑9ा #ज्षत्नत्शा९५5५) विभिन्‍न प्रकार के आन्दोलनों ने विभिन्‍न प्रकार के समूहों में अधिकारों के प्रति चेतना जागृत की है। जनजातियों, किसानों, स्त्रियों, और पिछडी जातियों के आन्दोलनों कौ चर्चा “सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण” अध्याय 6 में की गयी है ! यहा हम विशेष रूप से तोन आन्दोलनों--नारीवाद (विशपर5ण), वैश्वीकरण (हात्कबाय्क्ा००ऐ, और जाति विरोधी (३७०७ ८४४८5४७--की चर्चा करेंगे। नारीवाद (णांपरॉंडण) 3950 तक हमारे समाज में नारी हर प्रकार से पुरुषों के आधीन थी। समाज में उसका अधीनस्थ और द्वैतियक स्थान था। आज स्त्रियां अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गई हैं। वे समानता के अवसर चाहती हैं और अपनी पहचान अलग से चाहती है। यद्यपि उच्च स्थिति पदों में स्रियों के अनुपात में कुछ वृद्धि हुई है, फिर भी स्त्रियों के श्रति हिंसा की दर भारतीय सपाज का ऐविद्ापिक परिदृस्य ञञ बढ रही है। नारोवादी आन्दोलन रियों को अपनी इच्छा की भूमिका निर्वाह के अवसर चाहते हैं। इसमें आश्चर्य नहों कि सामाजिक वैज्ञानिकों, बुद्धेजीवियों और पत्रकारों ने लिग-निसपेक्ष हिल 2 नशा भ्ापा में बोलना शुरू कर दिया हे। रियों की प्राथमिकताएँ, हिल पितृतनत्र के विषय सभी सामाजिक-प्जनैतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गए है। मारीवादी आच्दोलनों ने यह भाव (5०छपशा८०0) विकसित किया है कि राजनैतिक ओर सार्वजनिक जीवन को मुख्य थारा बहुसख्यकों के मूल्यों और अनुभवों से बहुत दूर हो गई है। मारवादी चाप “व्यक्तिगत ग्रजनैतिक है” (॥८८४०७० ७ [०॥ए८०) केवल वैचारिक अभिव्यक्ति नही है बल्कि यह तो सामाजिक परिवर्तन के लिए एक कार्यक्रम है। वैश्वीकारण (ठकत्रा5त०ा) वैश्वीकरण एक सामाजिक भ्रक्रिया है जिसमें सामाजिक और सास्कृतिक प्रबन्धों में भौगोलिक बन्धन कम हो जाते हैं और जिसमें लोग अधिकाधिक जाएृव हो जाते हैं कि वे (भौगोलिक बन्यन) कम होते जा रहे हैं (॥/ज००॥ ५४४८६, १0905 3)। इस प्रकार वैश्वीकरण कौ प्रक्रिया में भौतिक दूगे और बाघाएं सामाजिक और सास्कृतिक मामलों में सचाए और विनिमय में कम महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। पचास वर्ष पूर्व ग्रामों से नगरों की ओर गतिशौलवा होती थी, फिर यह शहर और शहर के बीच अधिक हो गई, क्षेत्र से क्षेत्र के बीच बढ़ गई, और अब यह एक देश से दूसरे देश के बीच अधिक हो गई है। हर आदमी जानता है कि आज लोगों दथा वस्तुओं को अतीद वी अपेक्षा अधिक देजी से लाया ले जाया जा सकता है और शब्द तथा सन्देश सारे दुनिया में मिनटों व क्षणों में भेजे जा सकते हैं। पचास वर्ष पूर्व वाणिज्य व्यापार सम्बन्धी सन्देश, या सामाजिक सस्कृति और यहा तक कि राजनैतिक सन्देश भी काफी प्रयल और कई सप्ताह में पहुचते थे, लेकिन आज कुछ हो मिनट लगते हैं। इस प्रकार आर्थिक जीवन, गजनीति, और सस्कृति में समकालीन जीवन में भूमण्डलीबृत आयाम स्पष्ट दिखाई देता है। विविध स्तर पर बढतो हुई अन्तर्क्रिया के साथ हो हए स्तर पर प्रतिक्रिया जल्‍दी ही होने लगती है। स्थानीय, राज्य, राष्ट्रीय एवं अनर्राष्ट्रीय स्तरों पर परस्पर सहयोग ने कार्यवाही और पहचान को प्रभावित किया है। भारत में लोगों के बीच वैश्वीकरण के परिणाम अब आर्थिक, राजनैतिक और सास्कृतिक क्षेत्रों भें देखे जाते हैं। आर्थिक प्रभाव व्यापार के रास्तों, व्यापार विकास, आर्थिक स्वतत्रता, विश्व में पूजी के विघ्तृत फैलाव, आदि में दृष्टिगोचर हो रहे है। राजनैतिक परिणाम यह है कि ब्लाक-विप्तृत अर्न्द्त्कतें सश्याए (छो06:-ए्ाते८ फाटा-(0फटएात्तलएए १750/70078) सार्वभौमिक शक्ति और उपस्थिति के साथ विकसित हुई हैं। 'यट्ट-पज्या (7०॥०7-98/6) अब जौवन को बडी समस्याओं के लिए बहुत छोटे रूप में देखे जाते हैं। *ग्रष्ट-णज्यों' ने बड़ी समस्याओं का प्रभावशाली ढंग से सुलझाने के लिए बडो इकाइयों की खातिर कुछ शक्ति कम कर दी है। सक्षेप में, आधुनिक 'राष्ट्रटाज्य' को शक्ति कम हो गई है, भूषण्डलीय संस्थाओं का विकास हुआ है और एक “अतिरिक्त राष्ट्रीय "ज्य' (5एए73-॥007०] 582) का उदय हुआ है। सास्कृतिक परिणाम यह हुआ है कि विश्व स्तर पर एक सामान्य (०००४४०४) सस्कृति का विकास हुआ है। यहा सस्कृति को अधिक सामान्य अर्थों में ग्रयोग किया गया है। इसका अर्थ “जीवन के तरीके' (४ब३ ० रा) से 32 भारतीय समाज का ऐविहासिक परिदृश्य लगाया गया है। इसमें न केवल आर्थिक, राजनैदिक व सामाजिक ग्रतिमान बल्कि अवकाश (खाली प्रमय) (ा5ण८) और उपभोग (००८ण्णएएणा) भी निहित हैं। फेदरस्टोन (#८४४८०४००८) ने सास्कृतिक वैश्वीकरण का उदाहरण देते हुए भूमण्डलीय वित्तीय बाजार के विकास का उदाहरण दिया है जिसमें प्रमुख कर्मी अनेक व्यापारों और जीवन शैली के अतिमानों और मूल्यों में हिस्सा लेते हैं जैसे, खाली समय और काम में सन्दर्भों के अन्तर्राष्टीय स्वरूप की काम में लाना। उपभोग के कुछ अन्य क्षेत्रों, जैसे 'फास्टफूड' 'विश्व' कारों का भी भूमण्डलीकरण हो चला है। पस्तु सास्कृतिक भूमण्डलीकरण का अर्थ यह नहीं है कि सास्कृतिक अन्तर है ही नहीं (देखें, (७ 0" 7०07८, ०.9 था, 596-97) । जातिवाद विरोध (#॥्रप (9लंडण) जाति शोषण और जातिवाद के विगेध और जाति समानता त्रथा निम्न जाति के लोगों को विशेष अधिकार देने के पश्ष में आन्दोलन हुए हैं। यह आन्दोलन सास्कृतिक तथा सरचनात्मक आयार्मों, दोनों में हुए हैं। सास्कृतिक रूप में, जाति प्रतिबन्धों पर प्रहार करके और सामाजिक आन्दोलनों के यथार्थ को तथा सामाजिक गतिशोलता को स्वीकारते हुए उन्होंने जाति-पूर्वाअहों का विरोध किया है। जातिवाद विगेघ सरचनात्मक पक्ष सस्थाओं के भोतर शक्तिहीनता को बात पर ध्यान आकर्षित करता है, जैसे व्यापार, नौकरी, शिक्षा, विधान, आदि। उपसहार में यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन की शक्तियों का, जिनका सामना आज का भारत कर रहा है, केवल प्रकार्यात्मक पक्ष ही नही है बल्कि उनका विकार्यात्मक (०॥ए८ा०००) पक्ष भी है। जादि, नृजातीय और स्वार्थी समूहों की राजनीति पर आधारित, सास्कृतिक, राजनैतिक व सामाजिक तनाव जो आज व्याप्त हैं, स्वतत्रद्य के बाद से ही इस प्रक्रिया के अग रहे हैं। आज परिवर्तन का सास्कृतिक पक्ष न केवल दलितों, घार्मिक अल्प सख्यकों और स्त्रियों द्वारा नवीन पहवान की खोज में परिलक्षित हो रहे हैं बल्कि मीडिया द्वार उनकी समस्याओं को उजागर किया जाना महत्त्वपूर्ण हो गया है। जैसे जैसे विकास कार्यक्रम गति पकडते हैं, बैसे सामाजिक असमानठाओं का उतना ही तौब होता आवश्यक हो जाता है। इन मामलों पर मीडिया की रिपोर्ट के साथ ही असमानवाओं की अभिव्यक्ति खतरनाक रूप से परिवर्तन की दिशा धारण कर लेवी है जिसका परिणाम विविध अ्रकार की चम्म परिणितियों (७ताटाा57७) में होता है। 2 सामाजिक स्तरीकरण ($०लंडो 8|त्य्रपंरिस्था0एा) जाति व्यवस्था और सामाजिक स्तरीकरण (९३६९ 8॥छशा। भा0 5029 5060०) समाज इस प्रकार श्रेणीक्रम समूहों में विभाजित हैं कि यधपरि विविध समूह परस्पर सम्बन्धों में असमान समझे जाते हैं लेकिन एक ही 85 हू के सदस्य समान माने जाते हैं। सामाजिक स्त॒रीकएण के दो प्रमुख आधार जाति और वर्ण है,लेकिन कुछ अन्य मान्य आधार आयु, लिंग, प्रजादीय/नृजातीय भी हैं। सामाजिक स्तरीकरण साप्राजिक विभेदीकरण से भिन्‍म है। “विभेदीकरण व्यापक अर्थ में प्रयोग होता है क्योंकि यह तुलना के उद्देश्य से व्यक्तियों और समूहों को एक दूसरे से अलग और स्पष्ट करता है । उदाहण्णार्थ वर्ग के भीतर ही आय (उच्च, मध्यम और निम्न) व्यवसाय (उच्च स्थिति वाला और निम्न स्थिति वाला) और शिक्षा (उच्च स्वर, मध्य स्तर और निम्न स्तर, तुलना और विभेदोकरण का आधार प्रदान करते हैं। स्तगीकरण तब होता है जब भेद श्रेणीबद्ध क्रम में अंकिव किए जाते हैं। जाति : एक इकाई (समूह) और व्यवस्था के रूप मे ((०७६ ३ #७ 8 एग्ां[ (हुए00फ) 9एते 8 599 0ग्र) भारत पें जाति और वर्ग श्रेणीबद्ध क्रम के आधार के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। परन्तु जाति को, जो धार्मिक विश्वास में आवद्ध है, स्तरीकरण के साप्ताजिक, आर्थिक और धार्मिक उद्देश्यों के लिए महत्वपूर्ण आधाए माना जादा है। 'जाति/ एक आनुवाशिक सामाजिक समूह है जो अपने सदस्यों को सामाजिक गठिशौलता (यानी सामाजिक प्रस्थिति बदलने) कौ अनुमति प्रदान नही करती | इसमें जन्म के अनुसार प्रस्थिति अथवा श्रेणी निर्धारित होती हे जो व्यक्ति के व्यवसाय, विवाह, और सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करती है। जाति एक इकाई (समूह) और व्यवस्था दोनों ही रूप में अयोग होती है। इकाई के रूप में जाति एक 'बन्द-क्रम (८०६८०) प्रस्थिति समूह' होती है, अर्थात्‌ एक ऐसा समूह जिसमें सदस्यों को प्रस्थिति, उनका पेशा, जीवनसाथी के चयन का क्षेत्र, तथा दूसरों के साथ अन्तक्रिया, आदि निश्चित होते हैं। व्यवस्था के रूप में, जाति का अर्थ 'प्रतिबन्धों कौ सामूहिकता, (००१८८४पं/)) से होता है, जैसे सदस्यता परिवर्तन, व्यवसाय, विवाह और सहभोज तथा सामाजिक सम्बन्ध आदि पर प्रतिबन्ध | इस सन्दर्भ में एक पूर्वधारणा यह है कि कोई भी जाति पृथक नहीं रह सकती अथवा प्रत्येक जाति दूसरे जातियों से आर्थिक, ठ4 सामाजिक स्तर्ीकरण राजनैतिक और सस्वार सम्बन्धों (709॥50८ 7297००७) के जाल में जुडो हुई है। जाति. म्ाचनात्यक और सास्कृतिक अवधारणाएँ (९०5४४ : $एलाए आए (एज! (०7०5) जाति को सरचनात्मक तथा सास्कृतिक सदभों में देखा जाता है। सरचनात्मक आधार पर यह अन्त सम्बद्ध प्रस्थितियों, विविध निषेधों के आधार पर जातियों के बोच प्रतिमानित (7०(०:०८०) अन्त्क्रिया, और सामाजिक सम्बन्धों के एक स्थाई स्वरूप (॥306 5८0) कौ ओर सकेत करतों है। सास्कृतिक आधार पर इसको मूल्यों, विश्वासों और प्रथाओं वी व्यवस्था के रूप में देखा जाता है! अधिकतर विद्वानों ने जाति को एकात्मकता (50069) के रूप में देखा है,न कि मूल्यों और अभिवृत्तियों की सामूहिंकता के रूप में | जाति व्यवस्था को सरचना ऐसी है कि इसमें प्रस्थितियों, भूमिकाओं और सामाजिक प्रत्तिमानों के सदर्भ में प्रत्येक जाति के सदस्यों की, और प्रत्येक जाति को एक ममूह के रूप में भी, एक परसर सम्बन्ध अधिवारों और दायित्वें| की सुर्गाठत व्यवस्था (छ६80७९० ७४७७७) मिलती है। सरचनात्मक अर्थ में बृगिल (800९८, 958 9) ने जाति को “आनुवाशिक रूप से विशिष्ट (६9६८०॥५००) और श्रेणीक्रम में व्यवस्थित (८-ब्लांट्थीए ग्रा308०0) समूह कहा है, जबकि व्यवस्था के रूप में उन्होंने इसके तीन लक्षणों की व्याख्या बी है : श्रेणीक्रम, आनुवाशिक विशिष्टीकरण, और विकर्षण (-धएणं००) | अन्तिम लक्षण वी व्याख्या करते हुए उसने दावा किया है कि विभिन्‍न जातिया परस्पर आरक्षण (#एथ्ट) वी अपेक्षा प्रतिकर्षण (#धकृथ्ट) करती हैं। यह विकर्षण अन्तर्विवाह, सहभोज निषेषों, और सामाजिक सम्पर्कों में प्रकट होते हैं। परन्तु यह व्याख्या सत्य नहीं है। जातियों के बीच प्रतिकर्षण न तो दिखाई देता है और न ही देखा जा सकता है क्योंकि उन्हें (जातियों को) एक दूसरे की आवश्यकता होती है। कैथलोन गफ़ (696८७ 000, ए [,28०0, 960: ) जाति को पदक्रम जन्म प्रस्थिति (80:28 ७॥0-990०७) समूह कहती है जो प्राय अन्तर्विवाही (८०००६०००७७) होते हैं और एक व्यवसाय से जुडाव रखते हैं"। सेनार्ट (5०००, 930) ने जाति को एक “ऐसा बन्द सघ (०»0०:४००४) कहा है जो आनुवाशिक दूसरी जातियों के माथ एक से पेशे से सम्बन्धित, तथा एक परिषद्‌ (००७७०) से सचालित होता है जो अपने सदस्यों पर दण्ड द्वारा नियत्रण रखता है।” इस परिभाषा में “बद संघ” पर प्रश्न चिन्ह लगाया गया है। इसके अतिरिक्त, सभो जातियों में परिषद (पंचायत) नही होती | बेली (89॥८9) और श्रीनिवास ने जाति को 'सरचना' के रूप में माना है और जाति की परिभाषा नहीं दी है। एनकेदत्त (च६ 00॥, 937. 3-4) ने जावि व्यवस्था का वर्णन करदे हुए इसके द्वारा विवाह, खानपान, व्यवसाय व आनुवाशिक सदस्यता में परिवर्तन पर प्रतिबन्ध की चर्चा को है। इसके साथ उसने जातियों के श्रेणीक्रम में वर्गीकरण की बात भी कही है। ओपलर भारिप्त (0डञौद्व 'जैणागा5, 7950.. 284) मानता है कि जादि की छोटी सी परिभाषा सन्तोषजनक नहीं है,इसलिए जाति के लक्षण बताना ही अधिक प्रभावी है। उसने जाति व्यव था के तौन मुख लक्षण बतारे हैं आनुवाशिक सदस्यता, अन्तर्विवाह, तथा सामाजिक अन्तक्रिया को नियमित करने वाले प्रतिमान। (50ए९४४, 957 * 2-9) भी जाति व्यवस्था की ऐसी हो विशेषताए बताई है। आनुवाशिक सदस्यता के अतिरिकत, सामाजिक स्तरोकरण 35 जाति पचायत, श्रेणीक्रम, और अन्वर्विवाह जैसे लक्षण बताते हुए उसने भोजन व सामाजिक अन्तक्रिया पर प्रतिबन्ध, व्यवसाय के असीमित चयन की कमी, और नागरिक (घी) तथा धार्मिक निर्योग्यवाओं की ओर भी सकेव किया है। विक्टा डिसूजा (जलता ]0'80729,7969 * 72) ने जाति व्यवस्था की परिभाषा के सन्दर्भ में कहा है कि “जाति व्यवस्था उन आनुवाशिक सपूहों का प्रस्थिति श्रेणीक्रम (#शण् प्र अण७) को सरचना पें एकीकरण (70267०0०॥) है जो आपस्ती सबधों में हो विपमागी (द60207075) परन्तु आतरिक रूप से वे समरूप (#०7१०९०४०७) हैं। यह अवधारणा जाति व्यवस्था को समाज में आनुवांशिक समूहों के बौच श्रेष्ठ या आधीन सम्बन्ध बताती है तथा उन दशाओं का वर्णन भो करतो है जिनमें ऐसे सम्बन्ध स्थापित होते हैं। योगेद्ध सिंह 0974 39) मानते हैं कि सरवनात्मक रूप से जाति व्यवस्था दो अ्रवृत्तिया (ध0८०८ं८७) एक साथ प्रदर्शित करती है : एक खण्डों में विभकत ($६हपा०णाव) और दूसरी समन्वित (०९०यंट) | खण्डित यथार्थ के रूप में प्रत्येक जाति या उप-जाति परस्पर विकर्षण (70॥ए० 7०७9७)$079), सामाजिक दूरी व सामाजिक असमानता को दर्शाती है, किन्तु एक समन्वित व्यवस्था के रूप में जाति खण्ड (६०७७९८८७) जजमानी प्रथा के माध्यम से पारस्परिकता के सिद्धान्त द्वारा आपस में जुडे हुए होते हैं। बेली (820८9) ने जाति स्तरैकरण के सन्दर्भ में कहा है कि यह “बन्द सम्रन्वित स्तरीकरण” है और इसके विपरीत वर्ग “खण्डित स्तरीकरण” है। जाति व्यवस्था में सामाजिक खण्ड (जातिया व उपजातिया) सहयोग के माध्यम से अन्तर्क्रिया काते हैं और वर्ग व्यवस्था में प्रतियोगिता के माध्यम से करते हैं। जाति - अध्ययन के तीन पश्िध्षय (09७६ ; 7६९ एश5००/१६५ ८ 800)) भारत में जाति व्यवस्था का अध्ययन तोन परिभरक्ष्यों में किया गया है * भारतशाज्रीय (0०0०/०झ८०), सामाजिक-मानवशास््रोय, और समाजशाख्लीय। भारतशास्त्रीय विद्वानों ने जाति को धर्मप्रथ सबधी (5८४.५07४) दृष्टिकोण से, मानवशारित्रयों ने सस्कृति दृष्टिकोण से, और समाजशास्त्रियों ने सामाजिक स्तगीकरण की दृष्टि से देखा है। भाराख्रीय परिप्रेक्ष्य में जाति व्यवस्था की उत्पत्ति, उद्देश्य और भविष्य आदि के अध्ययन के लिए धर्मगरन्थों को आधार बनाया गया है। जिन्होंने इस परिमेक्ष्य का प्रयोग किया है उनका मानना है कि वर्णों को उत्पति बह्मा के शरीर से हुईं और जातिया वर्ण व्यवप्तधा में विखडित इकाइया (ह5०ए४ ७मजे हैं जिनका विकास अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरूप हुआ। यद्यपि विविध जातियों द्वारा माने जाने वाले रीति रिवाज 200.00 80 में लिखी गयी स्मृत्ियों में विहित (97०5०:9००) हैं परन्तु क्षेत्रीय, भाषायी, नृजातीय (८४४०0 और फ्रिकापरस्त (5८८४ांब्य) भिलताए धीरे-धीरे जाति सम्बन्धों को प्रभावित करती रही | भाग्तशारियों के अनुसार जातियों की उत्पत्ति श्रम विभाजन के उद्देश्य से हुई। धीरे-धीरे जातिया अधिक कठोर होती गईं तथा सदस्यता और व्यवसाय आनुवाशिक हो गए। जाति व्यवस्था में कठोरता कर्म” और “धर्म” में विश्वास का परिणाम है जिसका अर्थ है कि धर्म हो जाति परम्पराओं व नीतियों के लिए प्रेरक शक्ति (गरणारभाणड एफ) था। भाएशाप्तों यह भी कहते हैं कि क्योंकि जातिया दैवोय (0:४४6) हैं, अत वे भविष्य 36 सामाजिक स्तरकरण में भी जारी रहेंगी (/&एा9, 972 59) | स्ास्कृतिक परिमिक्ष्य को मानवश्ास्तियों ने (व्णाणा, उरााहछ, ॥#70&0८7) तीन दिशाओं में विभक्त किया है सरचनात्मक, सस्थात्मक तथा सम्बन्धात्मक। सरचनात्मक दृष्टिकोण जाति व्यवस्था को उत्पत्ति, विकास और सरचना में परिवर्तन को म्रक्रिया पर केन्द्रित है । संस्थात्मक (750(700४०)) दृष्टिकोण (7८४ ॥099) के अनुसार जाति व्यवस्था केवल भारत में ही पाई जाने वाली अनोखी व्यवस्था नही है, बल्कि यह अमरीका आदि में भौ पाई जाती है। सम्बन्धात्मक (८७७०७) दृष्टिकोण के अनुसार जाति स्थितियाँ सैन्य बलों, व्यापार, फैक्टरी, प्रबन्धन, राजनीति, आदि में भी देखी जा सकती है। इन संगठनों में जाति व्यवस्था तब कमजोर होती है जब गतिशीलठा सामान्य होठी है और तब टृढ होती है जब इसमें रुकावट हो । समाजशास्रीय दृष्टिकोण जाति व्यवस्था को सामाजिक असमानत्ा के रूप में देखता है। समाज के कुछ सरचनात्मक पक्ष होते हैं जो सदस्यों को विविध सामाजिक स्थितियों में विभाजित कर देते हैं। तीन विविध प्रस्निक्ष्यों के सन्दर्भ का यह अर्थ नहीं है कि समाजशास्त्री, भारतशास्त्रियों और मानवशारिबयों की भाँति जाति व्यवस्था की उत्पत्ति एव विकास में रुचि नहीं रखते, या कि मानवशाश्तियों को समाजशाझ्लियों की भाँति जाति व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण के परिणाम के रूप में स्वीकार्य नही है। जाति और वर्ण, उपजाति और वर्ग (७6 ब0व धान, 5909-९७६&९ 9॥6 (0॥355) जाति और वर्ण (८5९ क्ा्व 74) जाति और वर्ण दो भिन्‍न अवधारणाएँ हैं। सामाजिक सगठन का हिन्दू सिद्धान्त वर्णाश्रम संगठन के सन्दर्भ में ही है, जहाँ वर्ण और आश्रम संगठन दो अलग संगठनों के रूप में माने जादे हैं। आश्रम सगठन ससार में व्यक्ति के व्यवहार को जीवन की विविध अवस्थाओं में इंगित करता है, जबकि वर्ण सगठन उस कार्य से सम्बद्ध है जो व्यक्ति समाज में अपनी स्थिति (9090०४) के अनुकूल तथा अपने जन्मज्यत स्वभाव व अपनी प्रवृत्तियों और भरकृति के अनुसार करेगा। यद्यपि ऋग्वेद में दो वर्णों का ही उल्लेख है--आर्य और दास--और समाज के विभाजन का उल्लेख तीन क्रमों में है-- ब्रहम्‌ (पुरोहित), क्षत्र (योद्धा) और विस (सामान्यजन)-लेकिन चौथे क्रम अर्थात शृद्र का कही भी उल्लेख नहीं है, यद्यपि आर्यों द्वा घृणा किए जाने वाले समूहों का सन्दर्भ आता है, जैसे अयोग्य, चाण्डाल, और निषाद, आदि। ये चार क्रम अन्तव चार वर्ण हो गए। वैदिक काल में उच्च या निम्न वर्ण जैसा कुछ नहीं था। समाज का चार वर्णों में विभाजन-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र श्रम विभाजन पर आधारित था। प्रत्येक वर्ण के सदस्य अलग-अलग कार्य करते थे (क्रमश पुजारी का, शासक व योद्धा का, व्यापार का और सेवाओं का), विभिन देवी देवताओं की पूजा करते थे और विविष-सस्कारों का पालन करते थे, लेकिन सह-भोज या सामाजिक सम्बन्धों या एक वर्ण से दूसरे वर्ण में परिवर्तन पर कोई भ्रतिबन्ध नहीं थे। बाद में, जैसे-जैसे हम वैदिक काल (000-000 ४80) से ब्राह्मण काल 050 8८ से 700 ४70 ) तक चलते है, ये चारों वर्ण सामाजिक स्तरीकरण अञऊ श्रेणीक्रम में व्यवस्थित होते चले गए और ब्राह्मण सर्वोच्च शिखर पर एहे। एक दृष्टिकोण के अनुसार वर्ण का अर्थ होता है रण, और शायद इस्ोलिए समाज का विभाजन गेरे और काले राग के आधाए पर हो गया। हट्न (8७००, 963 .66) का विश्वास है कि यह सम्भव है कि यह एग-भेद काफी भात्रा में प्रजाति (9००) से सम्बद्ध है। होकार्ट (प्र०८आ॥,॥950 46) के अनुप्तार रा का सास्कारिक (कर्मकाडी) (70४0०) महत्त्व है न कि प्रजातीय (#ब्टाओ) । वर्णों की उत्पत्ति की भांति ही जातियों की उत्पत्ति को भी रिजले, घूर्ये, मजमूदार, आदि जैसे विद्वानों द्वारा प्रजातीय अर्थों में व्याख्या की गई है किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि जातिया वर्णों के उप-भाग (&09-ठाश७075) हैं। जातियों की उत्पत्ति का बर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। जातियों का श्रेणीक्रम और जाति की गतिशीलता वर्ण के सदर्भ में ही प्रयोग होने लगी। इस प्रकार वर्ण ने एक ऐसी छपरेखा (57:४०: अस्तुत कर दी जिसमें जाति के प्रति सभी भारतीय विचार और सभी प्रतिक्रियाएं उसी में सम्मिलित हो गईं (पर50, 963 96) । श्रीनिवास में 962.69) भी यह कहा है कि वर्ण मे एक सामान्य साम्राजिक भाषा प्रदान की है जो सम्पूर्ण भारत के लिए सही है, अर्थात्‌ इसने एक सरल और स्पष्ट योजना अदान कर के सामान्य ख्री पुरुषों को जाति श्रथा समझने और अपनाने के योग्य बना दिया है जो भारत के सभी भागों में लागू है। उसने यह भी माना है कि वर्ण व्यवस्था का महत्व इस बात में निहित है कि इसने अखिल भारतीय स्तर पर एक ढाचा (770) प्रदान किया है जिसमें निम्न जातियों ने सदैव उच्च जातियों के रीति रिवाजों को अपना कर अपनी प्रस्थिति को ऊवा काने का प्रयल किया है। इससे समस्त हिन्दू समाज में समान सस्कृति के विस्तार में सहायता मिली है। जाति और उप जाति (2७७(६ 70 800-09४९) जाति और उपजाति के बीच अन्तर स्पष्ट नही है क्योंकि दोनों के समान लक्षण हैं। एक उपनजाति जावि का हो उप विभाजन है। 'ब्राह्मण' वर्ण और जाति दोनों में हो पदासीन हैं। कान्यकुब्ज, सग्यूपातैण और गौड ब्राह्मण जाति के उदाहरण हैं, और श्रीमाली, पुरोहित और पुष्कर्ण ब्राह्मण उपजातियों के उदाहरण हैं, जबकि भारद्वाज, गौतम और कश्यप ब्राह्मण गोत्र हैं। जातिया और उप-जातिया अन्तर्विवाहों समूह हैं लेकिन गोत्र बढिविवाही समूह हैं। उप-जातियों की उत्पत्ति के विषय में दो दृष्टिकोण हैं : प्रथम कि उनका एक ही समूह के विखण्डन से उदय हुआ, और दूसग कि उनका उदय स्वतत्र समूहों के रूप में हुआ (५ (2. %9965 960 : १०ह०७४ 204, 4968, [73एज॥ ॥(३४९, 7958, (४३णाश, 8 7, 968 :44) । घूर्ये के अनुसार (957 34) उपरजातियों का जातियों में प्रभेद निम्न कारकों के आधार पर किया गया - क्षेत्रीय पृथकता, मिश्रित उत्पत्ति, व्यावसायिक श्रेष्ठता, व्यावसायिक अविधि (६८४ँ५०८) में अन्तर, रीति रिकाज़ों में असमानता, और उपनाम का अपनना। रिजले (95), हृद्नन 96 : 55) और मजूपदार (958 -357) ने उपजाति को मुख्य जाति से अपनी भ्रस्थिति को उठाने के लिए टूटने का परिणाम कहा है। बो आर चौहान (968 45) ने माना है कि विखण्डन के कारण उपजाति का जन्म प्रव्रजन, रिवाजों के परिवर्तन, राजनैतिक 38 सामाजिक स्त्करण लिर्षयों आदि कारवों के प्रकाश में समझाया जा सकता है | क्रिकपैटिक (एमंलकुअमंप 92) ने कहा है कि उपजातियों, जो जातियों से विखण्डित समूह हैं, प्रास्म्प में प्रदजन (प्मह्टाआाणा) तथा सामाजिक व राजनैतिक कारकों के परिणाम स्वरूप अख्ित्व में आई लेकिन आज वे कसी घृणित जाति में ममृद्ध व्यक्तियों द्वारा अपने निम्न जातीय भाइयों से अलग होकर नये नाम से सामाजिक पैमाने में अपने को ठठाने और अपने को किसो उच्च जाति से सम्बद्ध करने के प्रयलों के फलस्वरूप अस्तित्व में आ रही हैं। आदर बेतेई (#जअ८ छलथा।८) (965) ने एक जाति द्वार अनेक उपजातियों को अपने अर्न्तगत मिलाने तथा जाति के बार्यों में विविध घुवना (50१७ एए७7७) को प्रकाशित किया है। आज जातियों और उप जातियों के विविध कार्य (97८00॥) और क्रियाकलाप (००/श॥८३) हैं। उपजातियों ड्वाग किए जाने वाले तीन कार्य हैं. विवाहों का नियंत्रण करा, सहभोज मम्बन्धों का प्रतिबन्ध, और एक वृहत समाज के भोतर ही रहन-सहन के अर्थ में साम्प्रदायिक जीवन या व्यवह्वर को सचालित करना। जातियों के तीन कार्य हैं * प्रस्थिति प्रदाव करना, नागरिक और धार्मिक अधिकारों की सीमाओं को समाप्त करना, और व्यवप्ताय का निर्धारण करना। इन विशेषताओं के सन्दर्भ में घूर्ये 0957 -9) ने माना है कि "हमें उपजातियों को ही वास्तविक जातियों बी मान्तया देनी चाहिए” । एमी मेयर (१७४३, 960 5]) ने भी जाति से उपजाति को मान्यता देने की आवश्यक्ता के विषय में कहा है। उसने घूरें के जाति के सन्दर्भ को समाज के लिए सार्थक और उपजाति को व्यक्ति के सन्दर्ष में सार्थक माना है। एक ही जाहिं के भीतर सदस्यों के सन्दर्भ में उसने माना है कि उपजाति उनके लिए अधिक सार्थक है, जबकि अन्य जाति के सदस्यों के सन्दर्भ में उसका विचार है कि जाति पहचान का मुख्य बिन्दु है। इस प्रकार उसका विचार है कि एक दूसरे से अधिक सथार्थ नं बन कर जाति और उपजाति सह अस्तित्व बनाये रख सकती हैं। जाति व्यवस्था को इकाई क्‍या है 2 क्‍या यह जाति है था उपजाति 2? श्रीनिवास (952 24) वा मत है कि 'उपजाति' ही जाति व्यवस्था की “वास्तविक” इकाई है। परनु अपने अध्ययन में (कर्नाटक राज्य के मैसूर प्रदेश में रामपुर गाँव में) उसने जाहि को ही केन्द्र-बिन्दु माना था। मेयर (9608) के अनुसार क्षेत्रीय (८09) स्तर पर उपजातिं अन्तर्जादीय तथा अन्त जातीय सम्बन्धों की इबाई हो सकती है। लेकिन गाँव के भीतर अना्जार्तीय सम्बन्ध उपजाति के बजाय जातियों के सदर्भ में देखे जाते हैं। इरावती कवें (938 33) उपजातियों को विश्लेषण की 'अन्तिम इकाइया' मानती हैं। घूर्ये (950 : 20) की मान्यता है कि आमत्तौर पर जाति ही अधिकतर समाज के द्वारा मान्यता प्राप्त होती है लेकिन एक विशेष जाति या व्यक्तियों द्वार उपजाति ही अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए हमें उपजाति को ही जाति संस्था के समाजशास्द्रीय रूप में सही दृष्टिकोण जाते के लिए यान्यवा देनी चाहिए। स्टीवेन्सन (8$00६४०७००, 7954) के अनुसार जावि और उपजाति की अवधारणाओं में भ्रम रोने के कारण अच्छा दो यह है कि इन दोनों के बीच के अलए दी उपेक्षा कर दी जाये। लेकिन ऐसा नहीं क्या जा सकता क्योंकि दोनों के कार्य अलग-अतग हैं। सामाजिक स्तरोकरण 3प्र जाति और वाई (0४5६ गात (759) जाति और वर्ग, मैक्स वेबए के अनुसार, दोनों हो 'प्रस्थिति-सपूह' हैं। प्रस्थिति समूह उन व्यक्तियों का समूह है जिनकी एक जैसी जीवन शैली होती है और जो एक हो प्रकार की चेतना अभिव्यक्त करते हैं। जहा जाति को एक निर्धारित सास्कारिक (॥ए8॥500) प्रष्थिति वाला आनुवाशिक समूह समझा जाता है वही सामाजिक वर्ग ऐसे लोगों की श्रेणी होती है जिनकी अपने सम्प्रदाय या समाज में अन्य खण्डों (६८४८४) के साथ सम्बन्धों के अर्थ में समान सामाजिक-आर्थिक भस्थिति होती है। व्यक्ति और परिवार जो एक सामाजिक वर्ग जनाते हैं शैक्षिक, आर्थिक और प्रत्तिष्ठा प्रस्थिति में सापेक्ष रूप से समान होते हैं। वे जो एक ही सामाजिक वर्ग के रूप में वर्भीकृत हैं उनको जीवन के एक-समान अवसर प्राप्त होते हैं। कुछ समाजशास्त्री सामाजिक वर्गों को प्रकृति में प्रमुख रूप से आर्थिक मानते हैं जबकि कुछ अन्य विद्वान दूसरे कारकों पर बल देते हैं, जैसे अतिष्ठा, जीवन शैलो, अभिवृत्तियाँ, आदि। जाति व्यवस्था की विशेषता सचिव असमानता' (८४क्रण३४६८ ॥7८५००!४३) है, लेकिन वर्ग व्यवस्था कौ विशेषता 'विकीर्ण ((५७८६००) असमानवा, है। एक वर्ग के सदस्यों कौ समाज में अन्य वर्णों के साथ एक समान सापाजिक-आर्थिक प्रस्थिति होती है, जदकि जाति के सदस्य अन्य जातियों के साथ उच्च या निम्न प्रस्थिति अनुभव करते है। जाति भारत में पाई जाने वालो अनोखी व्यवस्था है ([.८४०७ ७7७ 70ल्‍20०४0 लेकिन वर्ग विश्वध्यापी सार्व भौमिक घटना है । जाति गाव में एक सक्रिय राजनेतिक शक्ति के रूप में काम करती है न कि वर्ग के रूप में | आद्रे बेतेई ने दक्षिण भारत में श्रीपुरम में जाति और वर्ग के अध्ययन में पाया कि साम्प्रदायिक और राजबैतिक कार्यवाही के लिए वर्ग आघार मही होता। इस सन्दर्भ में लीच ([960) ने कहा है कि जब जाति आर्थिक और राजनैतिक कार्य करती है और दूसरी जातियों के साथ प्रतिस्पर्षा करती है तो यह जाति सिद्धान्तों की पण्वाह नहीं करती । गफ़ और रिचर्ड फाक्स (50ए.॥ 2४0 ॥20080 ए09) ने भी यही स्थिति मानी है। परन्तु एमएन श्रीनिवास (972 7) लौच के साथ इस बिन्दु पर सहमत नही है। उनकी मान्यता है कि जातियों के भीतर प्रतिस्पर्धा को जाति सिद्धान्तों कौ परवाह न करना नहीं कहा जा सकता। यह सत्य है कि जातियों एक दूसरे पर निर्भर हैं (यजमानी ज्धा) लेकिन इस अन्तर्तिभर्ता के साथ जातिया यजमैतिक और आर्थिक शक्ति वा सास्कारिक प्रस्थिति प्त करने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करती हैं। जाति और वर्ग के बौच एक और अन्तर पह है कि जाति की समन्वित (०290०) विशेषता होती है लेकिन वर्ण खण्डों (४८४४४८४॥७) में बैंटा होता है। जाति व्यवस्था में उच्च जातिया निम्न जातियों की सेवाओं के लिए आपस में स्पा करतो हैं लेकिन वर्ग व्यवस्था में निम्म वर्ग उच्च वर्ग का सरक्षण प्राप्त करने के लिए परस्पर अिस्पर्धा करते हैं (८७०७ 960 : 5-6) | जाति व्यवस्था में किसी जाति की प्रस्थिति आधिक व राजनैतिक विशेषाधिकारों से निर्धारित नहीं होती बल्कि सता की कर्मकाडी (#एथ) वैधानिकता से होठी है, अर्थात्‌ जाति व्यवस्था में कर्मकाड़ी प्रतिमान शक्ति और घन के प्रतिमानों को परिधि में रही होते हैं (0७%०४९ । उदाहरणार्थ, यद्यपि ब्राह्मणों के पास आर्थिक या राजनैतिक शक्ति नही होती, फिर भी जाति श्रेणीक्रम में उनका स्थान सर्वोपरि होटा है। वर्ण व्यवस्था में कर्मकाडी प्रतिमानों (छाएव मण्या७) का कोई की सामाजिक स्तरकाण महत्व नही होता बल्कि शक्ति और घन ही व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धाण करते हैं। बेल ड्यूमात्ट के कथन प्ले सहमत नहीं है कि आर्थिक मूल्यों के बजाय धार्मिक विचार प्रत्येक जाति के क्रम को स्थापित करते हैं। वे कहते हैं कि यदि हम इस कथन को स्वीकार वर तें तो इसका अथ होगा कि आधिक ससाधर्नों पर नियत्रण में परिवर्तन क्रम (६8900 में पत्िर्दी किये बिता हो सकते हैं। यह केवल आशिक सत्य है। ब्राह्मणों और अस्पृश्यों के लिए या सत्य हो सकता है लेकिन मध्य जातियों के लिए नहीं। बिस्सीपाण (99०9) में अपने अध्यपन में 957 264-65) उसने पाया कि धन में परिवर्तन से क्रम (६200 में परिवर्त आ जावा है। अन्त में, सामाजिक गतिशीलता जाति व्यवस्था में सम्भ्रव नही है लेकिन वर्ग व्यवस्था में प्रस्थिति परिवर्दन सम्भव है। डीएन मजूमदार (958) ने इस सन्दर्भ में जाति को बन्द वर्ग के रूप में समझाया है। एमएन श्रीनिवास ने इस विचार को स्वीकार नहीं किया है। वह मानवा है (962 42) कि गतिशीलठा केवल स्स्कृतीकरण और पश्चिमौकरण को प्रक्रियओं से ही सम्भव है। आन्द्रे बेतेई (965) ने भी कहा है कि कोई भी सामाजिक व्यवस्था पूर्णः्पेण बन्द नहीं होती। वैकल्पिक समन्वय के लिए थोडा ही भले हो लेकिन विस्तार की गुजाइयश होती है। गैर-हिुओ में जाति व्यवस्था (089९ 5)#0ा। #ण०णाड़ ि०्घनी॥05) क्या जाति विशिष्ट (|&70९४/आ75॥0) या सार्वभौमिक (एग्ाए८75थ5७८) घटना है. ? वया यह अनोखी व्यवस्था केवल भारत में ही पाई जाती है या यह अन्य देशों में भी पाई जाती है ? मुख्य विचार यह है कि जाति को जब सास्कृतिक घटना (विचारधारा या मूल्य व्यवस्था) के रूप में देखा जाता है दो यह केवल भारद में ही पाई जादी है और जब सरचनात्मक घटना के रुप में देखा जाता है तो यह अन्य समाजों में भी पाई जाती है। स्वदत्रता से पूर्व जनगणना आयुक्तों ने भारत में (वर्तमान पाकिस्तान सहित) जाति को तरह की अनर्विदाही समूझें और गैर-हिन्दुओं में व्यावसायिक विशिष्टीकरण होने की रिपोर्ट दी थी। एनके बोस के अनुसार (949 957) हिन्दुत्व से परिवर्तित मुघ्लिम लोग भी जाति आरूप में अन्तर्विवाह और आनुवाशिक परम्परागत व्यवसाय को हो अपनाए हुए थे क्योंकि वे इसमें आर्थिक सुरक्षा का अनुभव करते थे। 956 और 965 के बीच आरणुप्ता द्वारा 4956 में (त्ती पश्चिमी उनरप्रदेश के एक गाव के मुस्लिमों में), जी अनसारी द्वाग 960 में (१॥४७॥७॥ (०७६८५ ॥ 0 ?), अहमद द्वार 962 में (00 |शफ्राक्ता एक्राक ४ 09), एम के सिद्दीकी द्वाय 970 में (29७6 4० वैवफाफाड ण॑ एब्रोट्णाशे, गुहय द्वाय 97 में (एफ! छलाहुआा ध०कावा5), साग्रे द्वात 959 में (छा 787७, आईपी पिंह द्वारा 958 में (सिखों परी, शिफरा स्ट्राहिजोणर (5७८४० 58८20ए७7) गे 4959 मैं (८७७ परी, और मैकिम मेरियट (४८6८ प्ब्ा०0) द्वारा 4960 के दशक में किए गये अध्ययनों से गैरूहिन्दुओं में जाति प्रथा के प्रचलन का सकेव मिलता है (देखें $णश्ुर८ जाग, “(बञ्नद ग 7647, 0558 एटफुणा ता 4 आशा मै रिक्षक्ाएँ: मा इठबागंग्छ गाव उत्दव अवधीएंग्ढए, 974... 243) । डयूमान्ट, लीच, पोकाक, और यो एनमदान ने भारतोय सभ्यता के बाहर के लोगों का अध्ययन किया और उममें जाति सामाजिक स्तरीकरण बा की सामाजिक सरचना के लक्षण पाये। लीच ने अपने अध्ययन (87८८४ ता (४४6 व इ0ण9 वग08, 00)0॥ भाव 'ए०धा। १४८६: 72059, 960) में श्रीलंका में बौद्धों में तथा पाकिस्तान में स्वाद (५७४७) के मुसलमानों में जातियां देखी। रयूक नाइट (स८फटा८ ए्णाह॥, 7987) और बेरीमैन (छल्माथ्याक्षा, 966) में भी यूगोप और अमरीका में प्रजावोय स्वरीकरण में जाति व्यवस्था की कुछ विशेषताएं और जापान में अस्पृश्य जातियों को सन्दर्भित किया है। स्तरीकरण के जाति और प्रजाति व्यवस्था की तुलना के बावजूद भी यह कहना अधिक सही होगा कि सरबनात्मक तथा सास्कृतिक दृष्टि दोनों से जाति प्रथा उन क्षेत्रों तक हो सीमित है जहां भारतीय सभ्यता के कुछ तत्व पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों की जनसज्या अनेक अन्तर्विवारी सामाजिक इकाइयों में विभकत है जो वर्ण नमूने के क्षेत्रीय प्रहिदर्श को अपनाए हुए श्रेणीक्रम में अन्तर्क्रिया करते हैं । योगेद्र मिह ($०७०ण०छ्ए ० 8०८ 5४४ ८३४00, 4 ६0९५ ण॒॑ हठट्काती का 92०08 क्षाव 5०द्वव .448॥7०79००9७१, ५०. 4, 7974 , 336) ते सैद्धान्तिक रचना के दो स्तरों के बीच अन्तर करते हुए जाति के प्रति चार दृष्टिकोणों का सन्दर्भ दिया है . सास्कृतिक व सरचनात्मक तथा सार्वभौमिक व विशिष्टीकरण। ये चार दृष्टिकोण हैं सास्कृत्रिक-सार्व भौमिक, सास्कृतिक-विशिष्टीकरण, सरचनात्मक-सार्व भौमिक और सरचनात्मक- विशिष्टीकरण। लोच (3960) ने जब जादि के सरचनात्मक विशिष्टीकृत दृष्टिकोण का प्रयोग करते हुए माना है कि जाति प्रथा भारतीय समाज तक ही सौमित है, अन्य लोग जो जाति को सरचनात्मक सार्वभौमिक दृष्टिकोण से देखते है, मातते हैं कि भारत में जाति, सामाजिक स्तरीकरण के बन्द स्वरूप की एक सामान्य घटना है। घूर्ये (957,096) जैसे समाजशालियों का तीसरा दृष्टिकोण भी है जो जाति को सास्कृतिक सार्वभौमिक पटना मानते हुए, (विशेष रूप से उस श्रेणीक्रम में जो व्यक्तियों या समूझें के क्रम को निश्चित करने का आधार बनाता है) कहते हैं कि जाति जैसा स्तरौकरण का आधार अधिकतर परम्परागत समाजों के रूप में भारत में जाति प्रस्थिति आधारित सामाजिक स्तरकरण कौ सामान्य व्यवस्था का एक विशेष स्वरूप है। पूर्व में मैक्स वेबर द्वाश बनाया गया यह दृष्टिकोण समकालीन समाजशाज्त्र में भी प्रचलित है। जाति पर चौथा विचार सास्कृतिक-विशिष्टीकरण विचार है। डयूमान्ट (00७5 ए00०४, 986, 96) मानता है कि जाति केवल भारत में ही पाई जाती है। योगेद्र छिंह (974 “37) ने जापि के ससचनात्मक विशिष्टीकृत विचार को मानते हुए कहा है कि सस्थात्मक अस्रमानता और इसके सास्कृतिक थे आधिक अवयब (०एणवाशंण्क) चाप्तव में थे काएक हैं जो भार में सामाजिक स्तरीकरण की अनोखी व्यवस्था के रूप में बनाए हुए हैं। सरचनात्मक दृष्टि से जाति व्यवस्था में चार मुद्दे 55४८७) विशेष महत्त्व के हैं. 6) जाति क्रम (शायाए) निर्धारण में इकाई अवयवों (का ००एए०४८४/३) से सम्बद्ध (जैसे, वर्ण, जाति, उपजाति), (0) जाति विलय (78००) और विखण्डन (&$709) के तरीके, जाति सघ निर्माण, जाति महासघ या सस्कृतीकरण द्वारा नयी डपयाति बनाते से सम्बद, (0) सामाजिक गतिशोलता की भक्रिया में जाति अ्रभुत्व व सर्ष से सम्बद्ध, और (७) जाति व्यवस्था में सामाजिक गतिशीलहा के विस्तार से सम्बद्ध। इन सन्दभों में जाति केवल भारत में हो पाई जातो है। 42 सामाजिक स्तर्वकरण जाति व्यवस्था में परिवर्तन प्रारण्प से मध्य और ब्रिटिशकाल तक-- इसके सास्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक पश्ष (एएश्मार्श गा 0 ए 0४5४९ $7ञधा : फिणा सि्राए 00 शिर्तेल्त शत फणाओं एशा०्तेडनांड सिने, ९८०ए००फांट द्याऐे 5००9 #5ए९टा5) जाति व्यवस्था जैसी आज है यह अनेक शताब्दियों में विकसित हुईं है। प्राचीन काल में (६,०00 8 0 से 700 & 7, अर्थात्‌ वैदिक, ब्राह्मण, मौर्य तथा मौर्योत्तर काल में (या सागा, कुषाण और गुप्त काल), इसके कार्य और सरचना मध्य काल (राजपूत और मुस्लिम काल अर्थात्‌ 700 » 9 से 707 » 9 तक) और ब्रिटिश काल (अर्थात्‌ 7757-947 # 9) से काफी भिन्‍न थी। वैदिक काल (500 8,0.-322 8.0.) जाति व्यवस्था के प्रचलन से सम्बद्ध दो विचार हैं। एक सम्प्रदाय (पर७७8, 863, एुशा, राह /900 0006 ४०५० 940, छे ९ ॥(90०, 979) का मानना है कि जाति व्यवस्था पहले से ही विद्यमान थी और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, जाति के तीन भाग थे जिन्हें ऋवेद काल के समाज ने स्पष्ट मान्यता प्रदान की थी। परन्तु शूद्र जाति विद्यमान नहीं थी। दूसरा सश्नदाय (फ८०, 882 और 6#79८, 932) मानता है कि ये तीन जातिया नही वरन्‌ वर्ण थे जो आनुवाशिक न होकर लचीले थे। ब्राह्मण काल में, जो ब्राह्मण और उपनिषदों के बाद का काल था, चार वर्णों की श्रेणीक्रम व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी और आगे आने वाले समय में भी चलती रही। धर्म की आड में ब्राह्मण लोग विशेषाधिकार्यें का आनन्द लेते रहे जिसने उन्हें अनेक प्रतिबन्ध लगाने योग्य बनाया। यद्यपि ब्राह्मण और क्षत्रिय एक दूसरे पर श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए परस्पर सघर्षरत रहे लेकिन क्षत्रियों ने वैश्यों तथा शूद्रों के ऊपर अपनी शक्ति बढा ली) विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सामाजिक सम्बन्धों के विषय पर सहिताओं और ब्राह्मणों में, जाति भिन्‍्नताए स्पष्ट होती गयी। रामायण और महांभातत (००९७) काल के पिछडे भाग में पुजारी कार्य आनुवशिक हो गया और अपरिहार्य रूप से ब्राह्मणों ने रक्त की पविद्रता और अन्य लोगों पर अपनी श्रेष्ठता प्राप्त करने पर ध्यान देना शुरु कर दिया। उन्होंने गृह सूत्र 700-300 8 0) तथा धर्म सूबर 600-300 80) के माध्यम से सामाजिक व्यवहार और सम्बन्धों को सहिता बना दो। अत यह कहा जा सकता है कि जाति प्रथा का प्रारम्भ-बिन्दु परावैदिक काल (800-500 80) और महाकाव्य (रामायण-महाभारत) काल 600-200 8 ८) था। क्योंकि सामाजिक स्तरीकरण का आषार श्रम विभाजन था, इसलिए अपने मौलिक स्वरूप में यह जाति व्यवस्था की अपेक्षा वर्ग व्यवस्था अधिक थो। प्रजाति कारक, व्यावसायिक पूर्वाप्रह, कर्म का दर्शन, और शुद्धता तथा अशुद्धता की धार्मिक अवधारणा सभी ने जाति व्यवस्था की रचना में योगदान दिया। मौर्य काल 622 8 ८ से 84 8 ८. तक) में सम्पूर्ण भारत एक शासक के आंघीन प्रथम बार राजनैतिक रूप से एक हुआ। राजनैतिक एकता ने देश की सास्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया। कौटिल्य के लेख इस काल मे जाति प्रथा के सामाजिक सगठन और कार्य प्रणाली पर प्रकाश डालते हैं। कौटिल्य (शूद्र शासक चद्ध गुप्ठ मौर्य का एक ब्राह्मण मरी) ने सामाजिक स्तरीकरण 43 ग्राह्मणों द्वा शूद्ों पर लगाए गए कई प्रतिमन्धों को हटाने का प्रयल किया और घोषणा की [के शाही कानून पर्म के काबून से ऊपर होंगे। चद्रगुप्त मौर्य के पौत्र अशोक के शासन काल में बाह्मणों के अधिकारों और विशेषाधिकारों को एक और आघात लगा। अशोक की धार्मिक नौति सहिष्णुता और सार्वभौमिक भ्रातृत्व पर आधापित थी जो जाति बन्धनों को नहीं मानव्री थीं। इन सभी उपायों के कारण जाति प्रथा इस काल में एक कठोर सस्था के रूप में विकसित न हो सकी। मौर्योतर काल में ब्राह्मण धर्म और जाति व्यवस्था को विकास के पुनर्जागरण के लिए फिर से प्रोत्साहन दिया गया । ब्राह्मणों ने मनुस्मृति (85 छ0) में अपने लिए विशेषाधिकार्यें का प्रावधान किया और शूद्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लूगा दिए। मनु स्मृति में शूद्रों के लिए ब्राह्मणों का अपमान करने पर कठोर दण्ड का प्रावधान किया गया (जीभ काटना, मुह में कौल ठोकना, कानों में गर्म तेल डालना, आदि)। अत, इस भ्रकार के प्रावधानों से कानून में समानता पूरी श़रह नष्ट कर दी गई और जाति प्रथा कठोर मार्ग पर चल पडो और इसने एक नवीन सरचना धारण कर ली। गुप्त काल (जो सुंग काल के बाद आया, 300 8 7.-500 ४.0 ) हिन्दू जागरण का काल था। इस काल में ब्राह्मणबाद भारत का नृजातीय (७१००) पर्म हो गया और जाति प्रथा को अधिक प्रोत्साहन मिला। पस्न्‍्तु यह बहुत कठोर नहीं हुआ। विवाह के नियम लचौले थे और अत्तर्विवाह तथा अर्न्तपोज के उदाहरण मिलते थे। शूद्रों को व्यापार, शिल्पी और कृषक व्यवस्ताय अपनाने की स्वीकृति थो। लेकिन इस काल में अस्पृश्यता लपभग उद्नी ही थी जितनी कि आज है। शुद्र लोग मुख्य आवासीय शेत्रों से बाहर हो रहते थे। गुप्तोत्तर काल में (हर्षवर्धन और अन्य, 606-700 # 7.) भी जाति प्रथा की वही सरचना जासे रहो जो गुप्त काल में थो। इस काल को सामाजिक, धार्मिक और आधधिक दशाओं का विशद चर्णन चोनी विद्वान छ्ेनसाँग के लेखों में उपलब्ध है जो 630 # 0. में भार आया था और 23 वर्ष तक यहा रहा। वह लिखता है कि जाति सामाजिक ढाँचे पर हावो थी, ब्राह्मणघाद का आधिपत्य था, और अशुद्ध पेशेवर लोगों (भगी, कप्ताई, आदि) को नगर कौ चाए दीवाे के बाहर रहना होता था। मध्य युग में राजपूत काल (700 से 7200 & 0) और मुस्लिम काल (206 & 0 से 7707 # 0 ) शामिल हैं। यजपूत् काल में हिन्दुओं का सास्कृतिक जीवन म्रारभभ काल के जीवन से बिल्कुल भिन्‍न था। राजनैतिक कारकों के कारण भारतीय सामाजिक व्यवस्था नहीं बदली। ब्राह्मणों ने स्व्य को विशेषाधिकार दे रखे थे। शकरचार्य द्वाय स्थापित मंठ विलासो जीवन के केन्द्र बन गए थे। देवदासो प्रथा ने मच्दिरों भें वेश्यावृत्त को विकसित किया, जिसते नैतिक आचार सहिता कमजोर हो गई ६ राजपूरों की अपने चश्ों, के प्रति निष्ठा ने उन्हें देश के प्रति राष्ट्र भक्ति से उदासौन बना लिया। नयी जातियों और उपजातियों का जन्म हुआ जो अपने ही हितों में इतने सलग्न हो गए कि इसका देश के सामाजिक और राजनैतिक जीवन पर चुश प्रभाव पड़ा। परिणामत , विदेशों मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण शुरु कर दिया। 75 # 9 में भारत में महमूद गौरी द्वारा मुस्लिम साम्राज्य की नौव रखी गई और उसके बाद मुगल आक्रमण होते रहे। मुस्लिम काल (206 से 707 # 0) में जाति प्रथा और अधिक कठोर हो णई क्योंकि मुस्लिम हिन्दुओं के लचौलेपन में समाहित मही हुए। उनका घर्म ऐकेश्वरवादी होने के कारण अनेकेश्वरवाद से समझौता न कर सका, ब्व सामाजिक सरोकरप मुमलमानों ने भारत पर क्योंकि घार्किक जेहाद बोल दिया और लोगों को इस्लाम में परिवर्दित करे व्य प्रयल क्या, ग्राह्ममों ने हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन से बचाने का उत्तरदायित्व सम्भालते हुए, हिन्दुओं पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए और जाति व्यवस्था को कठोर बना दिया! यद्यपि कुछ भक्तों ने-जैसे रामानुज, कबीर, गुरु खनक, चैतन्य, तुवायम, तुलसीदास, जमम॒देव, आदि इस ब्लल में भक्ति की राह दिखाई जो मूर्विपूजा और जावि की निन्‍्दा कखे थे, लोगों में समानता का उपदेश देवे ये, अति कमंकाप्ड तथा पुजारी वर्ग के आधिपत्य वा विशेध करते थे, फिर भी भक्त मार्ग जाति व्यवस्था को ठोड न सका। ब्राह्मणों का हिन्दुओं पर नेतृत्व जारी रह क्योंकि मन्दिर न केवल घार्मिक कृत्यों के लिए प्रयोग होते थे बल्कि सामाजिक, राजनैतिक व सास्कृतिक त्र्ियाक्‍लापों के लिए भी ॥ ब्राह्मणों ने यह घोषणा कखे हुए कि वे सभी हिन्दू जो मुसलमानों के लिए या उनके साथ द्मम करेंगे, वे मलेच्छ समझे जायेंगे, बाति भेद को और कठोर व गहरा वना दिया। इम भ्रकार लोहार, सुनार, नाई, धोदो, खाठी, और ऐसे ही लोग निम्न जाति के समझे जाने लगे। पुराण फ्रि से लिखे गए और जावि व्यवस्था वो और कठोर बनाने के उद्देश्य से नये आदेशों का प्रावधान किया गया। प्रारम्भिक व्रिटिश कान (या पूर्व औद्योगिक युग) में देश के भौविक विकास, बाहर दुनिया से सम्पर्क, सरकार की सामाजिक-आर्थिक नौतियों और कुछ वैधानिक उपायों द्वाय हमारे धार्मिक सिद्धान्तों, सामाजिक प्रधाओं ठथा समाज की जाति सरचना में भी परिवर्तन आया। जाति पचायतों की न्यायिक शक्निया दौवानी तथा फौजदारों न्यायालयों को दे दी गई। 850 का जाति निर्योग्यदा निवारण ()&89065 ए८ण०७ट। ४८) अधिनियम, 856 का विधवा पुनर्विवाह अधिनियम और 872 का विशेष विवाह अधिनियम ने धो जाति प्रथा पर प्रहार क्यिा। जाति प्रथा की दृढठा को एक और आघात तब लगा जब दुछ सामाजिक उपायों से अस्पृश्यों को कुछ निर्योग्योग्रए समाप्त कर दीं गई। पस्नु ब्रिटिश सरब्गर ने इन उपायों को विशुद्ध प्रशासनिक कारणों से किया था न कि इसलिये कि सरकार जाति प्रथा समा झरना चाहती थी। घूर्ये (968 90) ने भी ऐसे ही विचार व्यक्द किए हैं। ममाव सुधारवों के कुछ सामाजिक आन्दोलनों ने भी जाति व्यवस्था पर प्रह्मर क्या। राड्धा राममोहन गाय द्वाय चलाये गये “ब्रह्म सझाज आन्दोलन' ने जाति बन्यनों को अस्वीकार कर दिया और मनुष्य के सार्वभौमीकरण तथा भ्रादृत्व के लिए कार्य किया। न्यायमूर्ति रानाडे द्वार समर्थित 'प्रार्था सभा आन्दोलन' ने भी अन्वर्जादीय विवाह, अर्न्चभोज, तथा विधवा पुनर्विवाह आदि समाज सुधारों को ओर ध्यान केन्द्रित क्या। स्वामी दयातन्द सरस्वती द्वार स्थायित “आर्य समाज आन्दोलन” तथा “समकृष्य मिशन आन्दोलन' ने भी जाति के विरुद्ध आवाज उठाई और इसके उन्मूलन क्त उपदेश दिया। दक्षित् भारद के लिंगायत आन्दोतन ने लोगों को ज्यति व्यवस्था छोडन का उपदेश दिया। यद्यपि ये सभी प्रहर इस कल में (अर्घात्‌ 20वीं ज्ञवब्दि के प्रधम 25 वष्ञों में) जाति व्यवस्था की कठोरताओं को समाप्त न वर सके, प्रि भी जाति के कुछ सरचनात्मक गुण निश्चित रूप से प्रभावित हुए। ऑद्योगिक अवधि, दिटिश काल में प्रथम विश्व युद्ध के बाद 970-25 से प्रस्म हुईं। औद्योगोक्रण और नगैक्रण (गावों से शहरों में लोगों व्म प्रव॒जन) की प्रक्रिया ने भी जाति सरचना को प्रभाविव क्या। औद्योगिक विकास ने लोगों को जीवन निर्वाह का नया साथन प्रदान क्या और पेशेवर गतिज्ञौलता सम्भव हो सकी ! नयो आवागमन की सुविधाओं पामाजिक ख्ेकरण बढ में भी शीघ्र संचार सम्भव बना दिया जिसने सभी जाति के करोडों लोगों को एक साथ ला दिया। भोजन संबंधी सबधों पर निषेध (०७००७) तब कमजोर पडने लगे जब विभिन्‍न जातियों के औद्योगिक श्रमिकों ने गांवों में अपने परिवारों को छोडकर शहरों में एक हो मकान में इक्टठा रहना शुरू कर दिया! नगरीकरण और शहरों के विकास ने जाति प्रथा की कार्य प्रणली को काफी बदल दिया। न केवल सहभोजी अवरोध कम हो गए हैं बल्कि ब्राह्मणों के अधिकारों पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगे हैं। किंगस्ले डेविस (08०४ 70295, 495) ने कहा है कि शहरों का अनजानापन, भीड़-भाड़, गतिशीलवा, घर्मनिरपेक्षत और परिवर्तशीलता जाति को क्रियात्मकता को लगभग असम्धव बना देती है। घूर्ये (96 * 202) भी शहरी जीवन के विकास के कारण जाति प्रथा को कठोरताओं में परिवर्वन को स्वीकाप़्ा है। एमएन. श्रीनिवास (962 - 85-86) का भी मानना है कि ब्राह्मणों के शहरों में प्रत्॒जन के कारण, गैस्ब्राह्मण पहले जैसा आदर भाव नहीं दर्शाते और अन्तर्जादीप खान-पान के निषेध कमजोर हो रहे हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जाति प्रधा की सरवना और कार्य प्रणाली और इसके संस्कार, आर्थिक व सामाजिक पक्ष ब्रिटिश काल के औद्योगिक चरण में काफी बदल गए। दर्दमान भारत में जाति व्यवस्था (0०5६ 8) #श॥्१र 9 77६5९आ 89) 947 में देश की सजनैतिक स्वतत्रता के बाद, औद्योगोकरण और नगरीकरण के अलावा अन्य कारणों ने भी जावि व्यवस्था को प्रभावित किया। ये हैं. विभिन्‍ल राज्यों का विलय, अनेक सामाजिक कानूनों का लागू होना, शिक्षा का विस्तार, सामाजिक-धार्मिक कु और आन्दोलन, पश्विमोकरण, आधुनिक पेशों का विकास, स्थान गतिशीलता, ओर बाजार अर्धव्यवस्था का विकास। वर्तमान काल में जाति कौ कार्यप्रणाली के बारे में मोटे तौर पर निम्नलिजित निष्कर्ष निकाले जा सकते है . * जाति व्यवस्था उन्पूलन की भ्रक्रिया में नही है बल्कि आधुनिक परिवर्तनों के साथ पर्याप्त सामजस्य कर रही है। * जाति का घार्मिक आधार दूट गया है। «» विधिष भ्रकार के प्रतिबन्ध लगाने की पुरानी प्तामाजिक प्रथाए समाप्त हो गई है। जाति अब नवीन मूल्यों वाली व्यक्तिगत स्वतत्रता पर अ्तिबन्ध नही लगा सकती। * अब जाति व्यक्ति के पेशेवर जीवन को निर्धारित नही करती यद्यपि उसकी सामाजिक प्रस्थिति आज भी उसकी जातीय सदस्यता पर निर्भर है। * ५२३ जावि/दलितों को समानता प्रदान करने के लिए गम्भीर प्रयल किये जा रहे | * अत्तर्जातीय सपर्ष बढ रहे हैं, परन्तु यह सघर्ष सास्कारिक प्रस्थिति के आधार को अपेक्षा शक्ति अर्जित करने के लिए अधिक हैं। * जातिवाद में बढ़ोत्तरी हुईं हैं। * में यजमानी प्रथा कमजोर पड गई है, इससे अन्दर्जादोय सम्बन्धों पर प्रभाव पडा । 46 सामाजिक स्तरीकरण ० गावों में किसी जाति का वर्चस्व अब उसको धार्मिक भ्रस्थिति पर निर्भर नही करता। ० जाति और राजनीति एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। » एक ओर कुछ जातियों के सगठन मजबूत हुए हैं तो दूसरा ओर अधिकतर जातियों ने अपनी सामूहिक एकता खो दी है और उत्तरदायित्व कौ भावना का हास हुआ है। ० जाति अब सामाजिक प्रगति व राष्ट्रीय विकास में बाघक नहीं है जाति व्यवस्था के बावजूद भी भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर है। क्या जाति व्यवस्था परिवर्तित हो रही है, कमजोर हो रही है, या विधटित हो रही है ? जाति का भविष्य ([5$ (७४९ $%95छा (आाएंणए, जेट्बपशाआए 07 छ57ध्ट्रामणट ? फाणा'€ ण॑ (856 $956॥) जाति प्रथा के भविष्य के विषय में तथा वर्तमान के सम्बन्ध में दो विचार हैं। एक विचार यह है कि जाति व्यवस्था तेजी से बदल रही है और कमजोर हो रही है, यद्यपि यह समाप्त नही हो रही है। इस सम्प्रदाय के डीएन मजमूदार, कुप्पूम्वामी, काली प्रमाद, गार्डनर मर्फी, पालीन कोलेन्डा, और मैक्स वेबर जैसे 950, 960 और 970 के दशक के विद्वान हैं, ओर आए के मुकर्जी, ई जे मिल्लर, और एमएन श्रीनिवास जैसे 970, 980 और 990 के दशक के विद्वान हैं। दूसरा विचार है कि जाति व्यवस्था इतनी तेजी से नही बदल रही है। परिवर्तन धीमी गति मे हो रहा है। इस सम्प्रदाय के प्रारम्भिक विद्वान घूर्ये, आई पी देसाई, नर्मदेश्वर प्रसाद और कापडिया जैमे और वर्तमान विद्वान डामले, डयूमान्ट, आत्द्रे बेतेइ, हैरोल्ड गूल्ट योगेद्ध सिह, एससी दुबे, और टीएन मदान जैसे है। डीएन मजूमदार ने “कैसे जाति प्रथा तेजी से बदली है” की व्याख्या करदे हुए जातियों के विलय और विखण्डन और जनजातियों के एकीकरण का सन्दर्भ दिया है। कुप्पूस्वामी (देखें, ड०लगंग्शब्बा आधालका, 56फाशाएटश. 792) और कालीप्रसाद ($905॥7 बहाहक्ृप्रशतत 6९कार 4 उापत) का. काशि-एव्रडऑर रिशाशकतप्रफ, प,0रपा०ए एग्राएथज्आाए, ॥.0टॉंए०७छ, 954 3) ने भी जाति व्यवस्था में कुछ मूलभूत परिवर्तनो का सकेत दिया है। काली प्रसाद के अपने निष्कर्ष ने कि 90 प्रतिशत उच्च जाति के लोगों ने निम्न जाति के लोगों को भोजन में अपना साथी स्वीकार कर लिया है, उसे यह कहने के लिए मार्ग प्रशस्त किया कि जाति विखण्डन अब तेजी से समाप्त हो रहा है। गार्डनर मर्फी ने ([8 छ८ शहद [| 3९७, 7953 65) जिसने 7950-52 के दौयन भार में सामाजिक तनाव पर अध्ययन किए थे, यह निष्कर्ष निकाला कि जाति व्यवस्था को का सामना करना पड रहा है। मैक्स वेबर (77759 ०४ 5००४०४०७/, 952) का विचार था कि सभी जाति सम्बन्ध छिल भिल हो गए हैं और बुद्धिजीवी विशिष्ट राष्ट्रवाद के अधिकर्ता हो गए है। आरके मुकर्जी (7#6 उ#ढ कब सदा ली कर सब खवद्ण (कफ 958) ने कहा है कि जाति प्रथा के आर्थिक पक्ष (व्यावसायिक विशिष्टीकरण में परिवर्तन) , और सामाजिक पक्ष (च्च जातियों के रीति रिवाजों को महण करना, अपवित्र/ अशुद्ध पेशों का त्याग) बहुत बदल गए हैं। उसने कहा कि यह परिवर्तन शहरी क्षेत्रों में विशेष हैं जहा सामानिक स्तरीकरण 47 सामाजिक मेलजोल और जादि सहभोज आदि के नियम अधिक ढीले पड गए हैं और निम्न जातियों की सामाजिक और धार्मिक निर्योग्यताएं समाप्त कर दी गई हैं। ईज़े मिल्लर (958) ने जाति प्रथा में परिवर्तन की बात करते हुए कहा है कि अतीत में जब अन्तर्जातीय सम्बन्धो में परम्पस से मान्य और स्पष्ट अधिकार, दायित्व और ज्रभुत्त और आधीनता के प्रतिमान विधमान थे, वर्तमान में अन्तर्जातीय सम्बन्धों का स्वरूप अत्यधिक बदल गग्रा है। भिल्लर के साथ ब्राइस्न रियान (89०6 7१५)७७) एसएन श्रीनिवास, एससीदुबे जैसे अनेक अन्य विद्वानों ने भी बताया है कि जाति व्यवस्था में परिवर्तन हो रहा है। एमएन श्रीनिवास (952 380 १985) ने माना है कि जातियों के बीच परस्पर अधिकार और कर्तव्य धणशायी हो रहे हैं। गांवों में व्यक्ति में जाति के प्रति वफादायी में बदलाव नोट किया जा रहा है। यह परिवर्तन मस्कृतीकरण और पश्चिमीकरण के कारण भी आया है। ब्राह्मणों से पहले अग्रेजों का स्थान हो गया था, पले ही वे गाय, आदि का मास खते थे, शराब पीते थे व पाइप से धूप्रपान करते थे। लेकिन लोग डरते थे,उनकी प्रशसा करते थे और उनका सम्मान करते थे। परिणाम यह हुआ कि नयी और धर्म निरपेक्ष जाति व्यवस्था परम्पणगत व्यवस्था पर हावी हो गई जिसमें अप्रेज नये क्षत्रियों को तरह उच्च शिखर पर आसीन हो गए। लेकिन दूसरी विवारधार के विद्वान (जो जाति अ्रथा में होने वाले परिवर्गन की धौमा और क्रमिक तथा यहाँ तक कि कुछ मामलों में ऊपरी व दिखाऊ बताते हैं) इन परिवर्तनों को समूची जाति व्यवस्था के लिए विघटनकारी नही मानते । ये विद्वान, यद्यपि जाति प्रथा के पूर्ण समापन की बात नही कहते, फिर भी उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि आज जाति बिल्कुल वैसी नहीं है जैसे अर्ध या पूर्ण शर्ताब्दि पूर्व थी। उदाहरणार्थ, एआर देसाई और दामले (9876, 798] : 66) ने कह्य है “जाति व्यवस्था के लक्षणों में परिवर्तन की विस्तृतता इतनी महान नही है जितनी समझो जाती है। इन परिवर्तनों ने समूची जाति व्यवस्था के आवश्यक लक्षणों को प्रभावित नहीं किया है।” घूर्ये 96, 209-20) का विचार था कि जाति व्यवस्था ने अपनी कुछ विशेषताओं को हटा दिया है। उसने कहा कि अब जाति व्यक्ति के पेशे को निर्धारित नहीं करतो लेकिन पुरानी व्यवस्था का अनुसरण करते हुए विवाह व्यवस्था में वही भावना जाए है । व्यक्ति को जीवन के महत्वपूर्ण अवसर पर अब भी जाति की सहायता पर ही निर्भर रहना पडता है, जैसे विवाह और मृत्यु, आदि। ठसने आगे कहा, “यद्यपि जाति न्याय करने वाली इकाई के रूप में अब काम नही करदी फिर भी व्यवित पर इसकी पकड कम नही हुई है। व्यक्ति आज भी जाति को गय से नियत्रित् होते है” (वही . 90) | उसका विश्वास था कि सामाजिक जीवन में जाति व्यवस्था वी ताकद अभी तक हमेशा की तप्ह मजबूत है (वहों 27)। नर्मदेश्वर प्रसाद (!956 240) ने जाति के कार्यों को दो स्तरों पर विश्लेषित किया है : सास्कारिक (702) (विवाह, भोज, आदि) और वैचारिक (620०0) (त्राह्मणों के प्रति अभिवृत्ति, चुनाव लड़ने के लिए एक हो जाना, आदि)। उसने पाया कि दोनों ही स्तरों पर पत्विर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों के बावजूद भी जाति प्रथा काफी सोमा तक वैसी ही है। व्यवस्था के भीतर तो परिवर्तन हो रहे हैं, किन्तु व्यवस्था से परे नहीं। कापडिया (७(०च९ ॥ प्रोक्षाहपता" जग उठ्दगंगलव्ल मपराकका, 5९छट्जऑटा 3962 : 75) ने चार विशेषताओं को केन्द्र मानकर जाति व्यवस्था की विशेषताओं के 48 सामाजिक स्वर्करण परिवर्तनों का अध्ययन करने का प्रयल विया जाति पचायतें, सहभोजी निषेध, सास्कारिक पवित्रता, और अन्तर्विवाह। जाति पचायतों को कार्य प्रणाली का विश्लेषण करते हुए उसने पाया कि जब जाति पचायते 860 और 790 के दशकों में शक्तिशाली थी, 960 के दशक में भी वे शक्तिशाली रही यद्यपि कानूनी रूप से उन्हें अपने सदस्यों को बहिष्कृत (७७-००गणाएण्शा०) कर परम्परागत अतिमानों को थोपने का अधिकार नहीं रह गया था। थे अपने सदस्यो के मन और व्यवहार को नियत्रित व सचालित करती रहती थीं। सहभोजी निषेधों की बात कस्ते हुए उसने पाया कि यद्यपि यह सत्य है कि आमीण क्षेत्रों तक में अर्न्वभोज (जहा सब जातियों के सदस्य पक्ति में बैठकर भोजन करते हैं--हरिजनों सहित) 960 के दशक में असाधारण बात नही थी लेकिन साथ ही इस बात के साक्ष्य भी हैं कि शहरी क्षेत्रों में भी इस प्रकार के निषेध मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे (बही 74) | उत्सवी शुद्धता (८४०मा०णा॥! एण70) में परिवर्तन के सन्दर्भ में कापडिया (वही 77) ने कहा कि अशुद्धता (709४०॥) की हिन्दू अवधारणा विषय-द्षेत्र (००७०) में विस्तृत थी और सदी के 20 वर्षों तक परिपालन (०७$८४४०८८) में भी अधिदेशाल्क (ए27०१/०५) थी। यह नियम आज भी (960 के दशक तक) ग्रामीण और नगरेततर क्षेत्रों (00) में उच्च जाठि परिवारों में पालन किए जाते हैं। लेकिन समग्र रूप से (0 (॥0 ७/॥0/6) कहा जा सकता है कि उनसे लगभग छुटकारा पा लिया गया है। अन्त में, अन्तर्विवाह के सन्दर्भ मे (वही 77) उसने कहा कि जाति के अन्तर्विवाही चरित्र में परिवर्षन स्पष्ट नही है। अन्दर्जातीय विवाहों की सख्या में वृद्धि देखी जा सकती है, विशेष रूप से गत 20 वर्षों मे। साथ ही जाति अन्तर्विवाह के मौजूद होने के साक्ष्य भी है।” इस प्रकार उसने निष्कर्ष रूप में कहा (वही 87) कि लोग जाति के विषय में कुछ भी कहें, जाति बन्धनों की स्वीकृति आज भी (960 के दशक तक) है। इस सा्ष्य में त्रुटि नही है कि जाति अन्तिम साँसें नही गिन रही है, यद्यपि इसमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए है। “आजकल जाति व्यवस्था का क्‍या हो रहा है” इस प्रश्न पर डयूमान्ट अपनी पुस्तक (काम, मेग्लाक्माशक्रातं्रता5, 97.. 277-8) में कहता है कि समकालीन (०ण्णाटागएणश्षा)) साहित्य में परिवर्तन को अतिशय के (०जए॒ष्टट:८0) ढंग से प्रस्तुत किया है। इतना निश्चित है कि जाति समाज एक समग्र रचना (छद्यश्ी! गण6छ०0 के रूप में परिवर्तित नहीं हुआ है। मात्र परिवर्तन जो हुआ है वह यह है कि जातियों की परम्परागत परस्पर निर्भरता के स्थान पर उन अथाह खण्डों (॥9००८४४७॥९ ए०८७) वृद्धि हुई है जो आत्म निर्भर हैं तथा एक दूसरे के साथ प्रदिस्पर्धा में भी हैं। डयूमान्ट ने इसको जाति का ठोस प्रमाणीकरण (हाफडाक्राधकरक्ा00 ० ९०४०) कहा है (8 पार श३8वशा' बालेल था 07एगोपवा 5700 (८0), उत्ददा उ#बरएवट्दाा00, 2792. 62) आब्े बेतेइ (976 6-65) ने भी जाति प्रथा में कुछ परिवर्तनों का हवाला दिया है। उदाहरणार्थ, सरचनात्मक दूरी में, जीवन शैली में, सहभोजी सम्बन्धों में, और अन्तर्विवाह आदि में। अतीत में जातियों के बीच सरचनात्मक दूरी न केवल विविध जोवन शैली अपना कर रखी जाती थी बल्कि विवाह, सहभोज और सामान्य सामाजिक परस्पर लेनदेन में विविध अकार के निषेधों द्वारा भी रखी जातो थी। आज एक ही उपजाति के दो उपविभागों के बीच सरचनात्मक दूरी इन दोनों में से किसी एक के बीच की अपेक्षा कम है। परम्परागत व्यवस्था सामाजिक स्तरोकरण 49 में विशेष जाति की विशिष्ट जीवन शैली में भी परिवर्तन आया है। परम्पणगत व्यवस्था में सहभोज की इकाई जाति मम्दद्धता के अर्थ में स्पष्ट रूप से कठोस्ता से परिभाषित कौ गई है। हाल के ही दशकों में इस इकाई का क्रमिक विस्तार हुआ ऐ। आज ब्राह्मण 'स्वच्छ' शूद्रों के साथ भोजन कर सकते हैं लेकिन आमतौर पए मलिन/अशुद्ध (0"ए०४८) जाति के सदस्यों के साथ मही। अन्तर्विवाह की इकाई का भी विस्ताए हुआ है यद्यपि थोडा हो। बेते३ के अनुसार जाति व्यवस्था में ये सभी परिवर्तन भौगोलिक गतिशौलता, पश्चिमी शिक्षा, नये पेशों के सृजन-जिनमें प्रवेश जाति के अलावा अन्य कारकों के आधार पर भी होता है, आधुनिकीरण की प्रक्रिया, और राजनैतिक कारकों के परिणाम हैं। परन्तु यह भी स्पष्ट है कि कुछ जातियों में अन्य को अपेक्षा आन्तरिक विभेद बहुत अधिक आ चुके हैं। वे जातिया जिन पर पश्चिमीकरण का प्रभाव सबसे अधिक पडा है वे हैं जो सबसे अधिक बदली हैं! ठदाहरणार्थ, ब्राह्मण, कायस्थ, नायर, आदि जातिया तथा सामान्य रूप से वे जातिया जिन्होंने पश्चिमी शिक्षा ग्रहण की है और मध्यम-वर्गोय पेशे अपनाए हैं और जो मुख्य रूप से वितरण (व500॥07) की दृष्टि से शहरी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक-वर्गीय जातियों ने अधिक समता बनाएं रखी है तथा उन पर परिवर्तन का प्रभाव कम हुआ है । हैरेल्ड गूल्ड (प्रक्षणत (3000, 988 . 58) ने कहा है कि सत्य कही इन स्थितियों के बीच स्थित है। जाति व्यवस्था पर औद्योगीकरण का प्रभाव अधिक हुआ है, अपेक्षाकृच घेबर के विचार के। लेकिन उप्त पैमाने पर जिस पए मार्क्स ने पूर्वातुभान किया था जाति विलोन नही हुई है। पारसस (850४, प्र 5०दववां 5)50%, 7952 . 85) ने इस यथार्थ (८७४9) की 'अनुकूलिनी सरचनाएँ" (४09900० शाए्ट!णा८७ केहका विशेषता बवायी है। इन अनुकूलिनी सरचनाओं ने म्रतिस्पर्धात्मक दवाबों में घिरे लोगों के सरचनात्मक तनावों (६:४८४४०९०० $:श४४) को कम किया हैं। हैरोल्ड गूल्ड की मान्यता है कि भारत भें जाति की यह विशेषता (अनुकूलिनी सरचना की) न केवल शहरों में स्पष्ट है बल्कि गाँवों में भो है जहा जाति अभो भी सुरक्षा, एकता ओर लोगों के समूहों के लिए वरीयता व्यवहार को बनाये हुए है। हैरोल्ड गुल्ड के अनुसार (988 62-764) आधुनिक होते हुए भारतीय समाज में अनुकूलिनी सरचनाओं की तरह कार्य करने वाली जातिया (जो उनका भविष्य स्थाई एवं सुरक्षित बनाती है) का तीन स्वरों पर पर्मेक्षण किया जा सकता है . राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक । राजनेतिक स्तर पर गावों और शहरों दोनों में जाति साम्प्रदाधिकता और राजनैतिक गुरबाजी आपस में जुडी हैं। ससदीष लोकतन्त्र (जो भुप्त मतदान से जुडा है) में लोगों को संख्या, सम्ताघनों एवं उन लाभों ((६४००:७) (जो चुनाव में जीतने के उपरान्त पद प्राप्त कहने से प्राप्त होते हैं) के जोड-तोड (छग्रफापेंआ07) को महत्व मिला है। लोकतात्रिक ग़जनीति क्योंकि हित-समूहों में पद और सत्ता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों में एक प्रतिस्प्धों है, यह स्वाभाविक है कि भारतीय समाज में स्वार्थ समूहों की रचना विखण्डन (००४०४०) और एकता (६6०89) (जो जातियों और नृवशीय समुदायों को विभाजित करवी है) दोनों ही रेखाकित होंगी । जादिवाद राजनैतिक मुद्दों और निर्णयों को प्रभावित करता है, जाति निवेदनों (399००) के बाद धार्मिक निवेदन किये जाते हैं। यह वष्य भाखत में हिन्दू और मुस्लिम ग़जनेतिक कार्यविधि से प्रभावित होता है। इसमें आश्चर्य नहीं कि जाति न सामाजिक स्वरकरण का सभी राजनैतिक स्तरों पर शोषण किया जायेगा। आर्थिक स्तर पर यद्यपि यह सत्य है कि श्रमिकों व पारिश्रमिक लेने वालों की आर्थिक गतिशीलता, पुरस्कार वितरण, और श्रमिकों की भर्ती, उनकी कार्य गुणवत्ता के आधार पर निर्धारित होते हैं, और विभिन जातियों के लोग आधुनिक पेशे अपनाते हैं, लेकिन यह भी समान रूप से सत्य है कि विशेष रूप से गाँवों मे उनकी स्थिति प्रचलित जाति सरचना और अन्तर्जातीय सम्बन्धों पर ही निर्भर है। भारत में आज व्यक्तियों के लिए जो आर्थिक समस्या है वह है 'कमी' (८४०७) की-धन की, नौकरी की और अवसरों की--जिससे उस नयी आशिक व्यवस्था में भाग ले सकें जो कि धीरे धीरे बन रही है और स्पष्ट रूप से धन और शक्ति का प्रमुख साधन हैं ! इस प्रकार जाति के वे पक्ष जो आधुनिक व्यावसायिक व्यवस्था में शक्ति और पद के सम्भावित दावेदारों के लिए अति लाभदायक होते हैं, जातिवाद और भाई-भतीजावाद (छ८एणाड्ए) ही है। सामाजिक स्तर पर जीवन शैली निर्धारण में तथा उस क्रम स्थिति निर्धारण में जिममें विवाह निश्चित होने हैं, जातियोँ अभी भी महत्त्वपूर्ण हैं। यद्यपि जातियों के पुराने सस्काए और पेशेवर कार्य तेजी से अदृश्य हो रहे हैं, फिर भी जाति में अन्तर्विवाह अभी भी सुरक्षित हैं। जाति सरचना को शुद्धता का विचार विद्यमान रखा गया है तथा आधुनिक सामाजिक सूचीक्रम की आवश्यकताओं के अनुकूल बना लिया गया है। यह भी नोट करने योग्य है कि भारत के अभिजात्य श्रेणी के लोग (०॥॥६) बहुत ज्यादा उच्च जातियों के हैं, जब कि निन जाति व दास श्रेणी के लोग जातियों का सामौष्य विरोध सुध्म रूप से प्रदर्शित करते हैं। योगेंद्र सिंह (974 324 327) ने भारत में जाति प्रथा के भविष्य के सम्बन्ध में तीन परिकल्पनाओं की चर्चा की है (६) उत्पादन की विधि सबंधी परिकल्पना, (7) जाति लचोलापन परिकल्पना, और (79) सरचनात्मक अनुकूलिनी परिकल्पना । उत्पादन को विधि (एा006 ०0 ए700प८00०) संबंधी परिकल्पना, जो किगस्ले डेविस, मार्क्सवादी (एआरदेसाई) और गैर मार्क्सवादी दोनो प्रकार के समाजशासियों द्वारा समर्थित है, के अनुसार जाति का पतन हो रहा है। किंगस्ले डेविस के अनुसार जाति के पतन के साक्ष्य (0) सहभोजी निषेधों मे ध्यान देने योग्य ढीलापन और भोजन के निषेधों के उल्लंघन की सहन करना, (2) अन्तर्विवाह (हरा्ट-..४४०४७८०) की बाधाओं की उपेक्षा करने की बढती अवृत्ति या अन्तर्जातीय विवाहो की बढ़ती सख्या, 8) पेशेवर गतिशौलता में वृद्धि, (4) जाति पचायतों का बिल्कुल कमजोर होना ७) यजमानी प्रथा का कमजोर पडना, (8) निम्न जातियों पर उच्च जातियों के प्रभुत्व और प्रभाव का कम होना, ()) अस्पृश्यता का धीरे-धीरे समापन, और (४) सामाजिक गतिशीलता का विकास। किंगस्ले डेविस (ढग्राइ०० 08७9) ने औद्योगीकरण के प्रभाव में अनुकूलिगी परिवर्तनों (302975७ ८ाश्याट८७) के माध्यम से जाति के वर्ग में परिवर्तन होने की सम्भावना व्यक्त की है, यद्यपि ऐसे परिवर्तनों को विवेचना करने के लिए वह मार्क्सवादी विवारघाए का प्रयोग मही करता। दूसरी ओर एआरदेसाई यद्यपि यही विचार रखते हैं (जाति का वर्ग में परिवर्तित होन) लेकिन उसने अपने तकों को मार्क्सवादी सिद्धान्त पर आधारित किया है। उसके अनुसार जाति कृषि सामन्‍्ती (८009) व्यवस्था पर आधारित सम्पत्ति के स्वामित्र और उत्पादन कौ शक्तियों की सामाजिक अभिव्यक्ति है। वह मानता है कि (90 सामाजिक स्तर्नेकरण डा -8-92) कुछ दर्जन जातिया ही आर्थिक संसाधनों, राजनैतिक शक्ति, और उपलब्ध शैक्षिक तथा सांस्कृतिक सुविधाओं का एकाधिकार (क्राणा०एण०) रखती हैं। आर्थिक ढाँचे में मूल परिवर्तन अपनाए बिना जादि श्रेणीक्रम और जाति व्यवस्था को समाप्त करना सम्भव नही होगा। “जाति की लचौलेपन' सबधी परिकल्पना (मूल स्थिति को पुन आ्राप्त करना) के अनुसाए, औद्योगीकरण, प्रौद्योगीगी का विकास, पश्चिमीकरण, और अन्य लोकतांत्रिक सस्थात्मक विस्तार, जाति कार्यों की प्रक्रिया को प्रतिबन्धित करने कौ अपेक्षा अधिक सक्रिय और विस्तृत करते हैं। ये सब कारक जाति के क्रमों (/&7/:8) के विलय में और सगठनात्मक गतिशीलता तथा सुव्यवस्थीकरण (7200४»9/०) में योगदान देते हैं। एमएस. श्रीनिवास (964) कहता है कि जहा मध्ययुगोन भारत में जाति गतिशोलता विखण्डन (85507) पर आधारित थी, वही आधुनिक भारत में जाति प्रखण्डों (६६०००८०४७) के विलय का मच सक्रिय हो गया है। इस प्रक्रिया में नि-सन्देह जाति की प्रकृदि में कुछ परिवर्तन होता है किन्तु यह मानना सही नही होगा, जैसा बेली (8७॥८७) मानता है,कि जातिया अपने लक्षण ही बदल देती हैं। जाति व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होदा। आने बेतेइ ने जाति के लचीलेपन की परिकल्पना का समर्थन किया है । उसने जाति की तरह हो नये सरचना स्वरूपों (पेशेवर तथा व्यावसायिक समूह) की चर्चा की है। बेतेइ का कहना है (965) कि “राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन से प्रस्थिति समूहों (जातियों) के समाप्त होने की सम्भावना 8५ । भविष्य के प्रस्थिति समूह निस्सन्देह जाति व्यवस्था के चिन्ह अपने साथ अवश्य ले जायेंगे।" “जाति के लचीलेपन सबभी परिकल्पना' के विरुद्ध सरचनात्मक अतुकूलिनी (शा0एा८0 2प9008007) परिकल्पना है। इस परिकल्पना (6०८४ * 960, 8०४9 ; १963, भ्र०हधावाब आगए। . 969, एशुरं ए०ण७०० 970) के अनुसार जाति सपपों, जाति महासधों और जाति एकता की रचना के माध्यम से जातिया अपना मूल चणि समाप्त करती हैं और वर्ग-प्रकार का स्वरूप धाएण कर लेती हैं। इस विचार के प्रतिपादक इन परिवर्तनों को परिवर्तन के अपरिहार्य अवस्थाओं (सो ४98०) से नही जोडते ! वे जाति के अदृश्य होने की बात भी मही करते और न ही वर्ग व्यवस्था से इसके स्थानापन्‍न होने (7८//३०८४९४॥/) की बात कस हैं। जाति ख्यवस्था का भविष्य (गा0९ ण॑ ९४5७) जावि व्यवस्था की पकड ढीली होने के कोई सकेद नहीं हैं। परिवर्तन केवल विभिन्‍न जातियों द्वात सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने तथा ऊपर उठने के रुख भें आया है। जाति व्यवस्था में परिवर्तन यद्यपि निस्दर और नियमित रूप से हो रहे हैं लेकिन यह (जाति व्यवस्था) अदूट बनी हुई है। विभिल जातियों में एक प्रकार को वर्ग चेतना अवेश कर रही है। अन्तसमूह (॥-/700ए८) को भावना से प्रभावित होकर जातियों अपनी व्यवस्था को अधिक दृढ़ता से पकड़े रहना चाहती हैं। आजकल, जातिया स्वय को राजनैतिक, सामाजिक, व आर्थिक उद्देश्यों के लिए सगठित होने का प्रयल कर रहो हैं। चुनाव जातिगत आधार पर लडे जाते हैं। 52 सामाजिक स्तरीकरण अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा, अखिल भारतीय माथुर सघ, अखिल भारतीय भार्गव सगठन जैसे जानि संगठन विकसित हो गये हैं । जाति व्यवस्था के भविष्य के विषय में विभिन्‍न दृष्टिकोण रखने वाले तीन प्रकार के प्रगतिशौल हिन्दू मिलते हैं। 0) ऐसे लोग जो जाति को अहितकारी (८५7) समझते हैं और चाहते हैं कि यह समाप्त हो जानी चाहिए। (७) ऐसे लोग जो सोचते हैं कि जाति व्यवस्था का पतन हो गया है। वे चाहते हैं कि परम्परागत चारों व्यवस्थाओं की पुनश्थापना के प्रयल होने चाहिए। इस विचार के सबसे बडे प्रतिषादक महात्मा गान्धी ये (रह खाबाब 499 479-88) । 60) ऐसे लोग जो चाहते हैं कि जाति व्यवस्था जारी रहे लेकिन इसकी पुनश्थापना बिल्कुल भिल स्थितियों में हो। ये लोग सास्कृतिक एकता वाली और आर्थिक समानता वाली विभिन्‍न उप जातियों को मिला देना चाहते हैं। धीरे-धीरे वे जातियाँ जो लगभग समानता के स्तर पर होंगी एक हो जायेंगी और अन्त में एक जाति विहोन समाज की स्थापना हो जायेगी । ये लोग इस प्रक्रिया को मन्द गति से चाहते हैं क्योंकि इससे लोगों को शिक्षित होने का समय मिल जायेगा और वे उन जातियों/बर्गों के वाछित अनुकूलन के साथ परिचित राय बना सकेगें जो अपने पुराने रीति रिवाजों में परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हैं। (देखें, घूर्ये, एजे टयाइन्बी (७ ॥ प्र०शा0९८) टी एचमार्शल, (पप्न ॥४७४508॥), पी कोडान्डा राव (? ॥०१०७॥०0७ 7२9०), आदि, जैसे विद्वानों ने इन तीनों विचार-सम्प्रदार्यों का मूल्याकन किया। गान्धी जी द्वारा दिए गए प्रथम विचार पर चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि यह अव्यवहारिक है क्योंकि लीगों को चार श्रेणियों में से किसी एक श्रेणी में रखने के लिए केवल उनका व्यवसाय ही है जो वे आज करते हैं। वर्तमान समाज में व्यवसाय विशिष्ट और विविध होते है और एक ही परिवार के लोग इतने भिन्‍ व्यवसायों में लगे होते हैं कि उन्हें किसी एक श्रेणी की सदस्यता प्रदान करना असम्भव होगा। दूसरे, यदि यह कथन (जावियों को प्रथम दीन व्यवस्थाओं/श्रेणियों में से किसी एक में शामिल करना) सम्भव होता भी, अस्पृश्य जातियों का क्‍या होगा ? गान्धी जी ने अस्पृश्यता के विरोधी होने के कारण, स्वाभाविक रूप से इन के लिए सम्मानजनक प्रस्थिति का प्रस्ताव किया। लेकिन उन्हें कहा स्थान प्रदान किया जाये ? जिस किसी भी व्यवस्था श्रेणी में उन्हें सम्मिलित करने का प्रयास किया जायेगा, उसी व्यवस्था/श्रेणी के लोग अत्यधिक विरोध करेंगें। तृतीय, यह मान लें कि चार व्यवस्थाओं/श्रेणियो में जातियों का वर्गीकरण सम्भव हो भी जाये, क्या हम इन घार व्यवस्थाओं में विवाह की स्वोकृति दें देंगे या प्रतिबन्ध लगाएगे ? दोनों ही पद्धतिया अपनी समस्याओं को जन्म देंगो। अत यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि समाज के चार प्रकार के विभाजन पर वापसी अव्यवहारिक है। यदि यह कार्य कर भी लिया जाये तो इससे कोई लाभ होने वाला नही है। दूसरे विचार पर चर्चा पर कि जातियों को उपजातियों के साथ बडी जावियों में एकीकृत करके धीरे-धीरे मिटाया जाये, विद्वानों ने कह्य है कि इस बिन्दु को रखने का अर्थ है वास्तविक समस्या की उपेक्षा कजा। उनका कहना है कि यह विधि मुम्बई में कई दशकों तक चलाई गई लेकिन परिणाम घातक हुए। एक बडा समूह बनाने के लिए सम्मिलित हुई उपजातिया बडे निरुत्साह से बाहरीपन के आन्तरिक भाव को धारण किए रही। नये समूह अन्य जातियों के विरुद्ध लडाकू रुख अपनाया, विशेष रूप से उन जातियों के विरुद्ध जिनकी सामाजिक स्तरकरण 53 उम्ते थोडा ऊचा या नीचा माना जाता था। अब विद्वानों का कहना था कि इस श्रकार जाति भक्ति की भावना या जातिवाद पैदा होवा हे और यदि हम दूसरा दृष्टिकोण अपनाणो तो जादिवाद का कम होना अति कठिन हो जायेगा तथा राष्ट्रीय चेवना के पूर्ण विकाप्त के लिए अस्वस्थ वातावरण पैदा हो जायेगा। कुछ विद्वानों ने दीसरे विचार का समर्थन किया है कि जाति प्रथा को तुरन्त समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उनका विचार है कि हमें जातिवाद के विरुद्ध लडना है बथा उसे समूल नष्ट करना चाहिए। घूर्ये इस विचार का पक्षथर था। लेकिन उप्तने यह विचार 93 में व्यक्त किया था! तब से लगभग सात दशक व्यतोत हो गए है और भारतीय ममाज में बहुत परिवर्तन हो गए हैं (देश कौ आजादी सहित) और जातिवाद के विरुद्ध कई कामून भी लागू किए जा चुके हैं। उदाहरणार्थ, भारत का सविधान (950 में लागू किया गया) कहता है कि () जाति के आधार पर राज्य किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नही करेगा (सभी जातियों को समान अवसर), (॥) किसी भी नागरिक पर जाति के आधार पर किसी भी दुकान, रैस्ट्रा, सार्वजनिक कुओं और तालाबों हक प्रवेश या प्रयोग का प्रतिबन्ध नहीं होगा (नागरिक निर्यो्पताओं की समापष्णि), और (॥0) अस्पृश्पता के चलन का निषेध | इसी प्रकार किस्ती भी पेशे को अपनाने पर प्रतिबन्ध नहीं है। समानता कौ भावना तथा आजादी और भ्रावृत्व की भावना को प्रोत्साहित किया गया है जिसने जाति की जड़ों को काटा है। एक विशेष अधिकारी (आयुक्त) 95 में पिछड़ी जाति एवं पिछड़ी जनजाति की देखोख के लिए नियुक्त किया गया था । अब जनगणना में व्यक्ति की जाति को नही लिखा जाता । इन सब परिवर्तनों के बावजूद भी गत कई दशकों में, विशेष रूप से गत दो दशकों में जातिवाद और जाति की बुराइया समाप्त नहीं हुई है। आशीर्वाचम (4 7४2४ 5०८६7 04०, 957) का विचार था कि अतीत में जाति के कितने ही फायदे क्यों न रहे हों, आज यह प्रगति में बाधक है और हमें इसका डटकर विरोध करना है। 950 व 960 के दशक में डीएन मजूमदाए ने भी कहा था कि जिस प्रकार टूटी अगुली प्रतिस्थापित की जाती है न कि सायूर्ण हाथ, उसी हरह एक जाति का दूसरी जावि द्वाता शोषण और इसी तरह के हानिकारक सहवर्ती बुराइयों को समाप्त किया जाना चाहिए, न कि समूची जाति व्यवस्था को | लगभ व35 वर्ष पहले (869 में) मैक्समूलर का विचार था कि भारत में जाति को समाप्त नही किया जा सकता। इस प्रकार का प्रयल मात्र भी कष्टकर व दुष्कए प्रयास होगा। धार्मिक सस्या के रूप में जाति समाप्त हो जायेगी परन्तु सामाजिक सस्था के रूप में यह जीवित रहेगी और इसमें सुधार भी होगा। पालिन कोलेण्डा (997) की राय है कि एएपपएएए आहि व्यदण्या, फिएऐे पेशेदए फिशशिश्वीजुल, एएपए जिर्षए, तय: शुद्धता और अशुदता के आघार पर क्रमबद्ध जातियाँ पायी जाती हैं, अदृश्य होने का सकेत दे रही है। कोलेण्डा यह अश्न भी उठाती है कि अब पेशेवर विशिष्टीकरण और शुद्धता वधा अशुद्धता की ध्यवस्था में (जिप्रस्े जादियों का एक दूसरे से क्रम व अलगाव का पता चलता थे गिरावट आयो है, क्या नयी जाति व्यवस्था के रूप में एक नया एकीकरण हो सकेगा ? उसका विचार है कि वास्तव में यह सम्भव नही है कि एक सामाजिक सरचना को जो हजारों चर्षो से लोगों के राजवीदिक, आधिक व धार्मिक जीवन को समृठित किए हुए हो, कुछ हो दक्षकों में बिल्कुल समाप्त कर दिया जाये | समाज वैज्ञानिक जो इस क्षेत्र में काम कर रहे हें, 54 सामाजिक स्तर्ीकरण सभी कहते है कि जाति व्यवस्था जीवित है। यह सत्य है कि जाति व्यवस्था भौतिक व आध्यात्मिक उलति श्राप्त करे में या सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में बाधक है। जब तक यह विनाशकारी व्यवस्था चलही रहेगी, हम अपने सामाजिक लक्ष्य प्राप्त नही कर सकठे । अठ जितनी जल्दी इसकी मृत्यु कौ घण्टी बजे, उतने ही ऊचे हमारी प्रगति के अवसर हो जायेंगे। फिर भी यह एक सत्य है कि इस व्यवस्था को समाप्त करना इतना सरल नहीं है। नर्मदेश्वर प्रसाद द्वारा तीन क्षेत्रों के अध्ययन में--औद्योगिक, गैर-औद्योगिक, और प्रामीण--कुछ उत्तरदाताओं (225) से जाति व्यवस्था को कमजोर करने वाले कुछ उपाय आप्त हुए। यह थे शिक्षा और सभी व्यक्तियों के लिए समान अवस्तर 69%), अन्तर्जातीय विवाह 85 3%), अस्पृश्यता निवारण (2 2%), और समानता के आधार पर लोगों से व्यवहार (3 4%) । लेकिन क्‍या ये उपाय वास्तव में जाति प्रथा को समाप्त करे या कमजोर बनाने में सहायक होंगे ? शायद नही। सर्वोच्च न्यायालय ने भी नवम्बर 992 में मण्डल आयोग की रिपोर्ट के क्रियान्वयन कयने के निर्णय में यह माना था कि मात्र जाति ही आरक्षण का आधार होगी। जाति के कौन से गुण और कार्य समकालीन समाज में जाति को जारी रखे हुए हैं? आज दो कार्य महत्वपूर्ण मालूम पड़ते हैं () यह शक्ति प्राप्ति करने के लिए अवसर प्रदान करती है और (४) यह सामाजिक गतिशीलता को सम्भव बनाती है (यदि हम श्रीनिवास के जाति के सस्कृतिकरण के विचारों को स्वीकार कर लें) आधुनिक समाज में गतिशोलता--व्यावसायिक, आर्थिक और सामाजिक-शिक्षा, प्रशिक्षण, भौतिक ससाघनों, उपलब्ध भाई भतीजावादी तन्त्र, व्यक्तिगत प्रभाव, सामाजिक परिष्करण (&क्िध्याक्रा), और साथ ही जाति क्रम (070) जैसे कारणों पर निर्भर करती है। अत यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जाति व्यवस्था आगामी वर्षों और दशकों में भी यथार्थ बनो रहेगी। जाति में गतिशीलता (४०७9 त एञ०) समाज वैज्ञानिकों ने भारतीय सामाजिक यथार्थ वा वर्ग, जाति, जनजाति, धर्म, और भाषायी समूहों के सदर्भ में विश्लेषण किया है। यही श्रेणिया समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया में अन्तर्ृष्टि प्राप्त करने के लिए भ्रयोग को जाती रहो हैं। पहले जब यह माना जाता था कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज को बन्द व्यवस्था के रूप में बनाए रखती है, अब यह कहा जाता है कि अन्वर्विवाह, श्रेणीक्रम, और अशुद्धता की भावना का व्िकोण दूट रहा है (7.5 5ैगाहं। 902 23) सामाजिक गतिशीलता की समस्या सामाजिक स्तरीकरण की समस्या से सीधे जुडी हुई है। योगेद्र सिंह 974 403) का मत है कि परम्परा-आधुनिकता द्विभाजन (०7८॥०(०७७) ने सामाजिक गविशीलता के अध्ययन में चस्रिक्ष्यों (१८:४७०८८०४४४७) में असमजस (००४५७००) पैदा किया है। इस प्रकार की असमजस की स्थिति पश्चिमी विद्वानों में देखो गई थी। इससे यह माना गया कि परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था में गतिशीलवा थी ही नही जिसे स्तरीक्रण को बन्द व्यवस्था का नाम दिया गया था। यह दर्शाता है कि ये विद्वान वैचारिक पूर्वाग्रह से तस्त थे। एमएन श्रीनिवास (98 : 8-35) सामाजिक स्तरीकरण 55 मरे कहा है कि जब परम्पतत्मक भारतीय समाज स्थिए (६४००१) ज्क्षण बाला था फिर प्री इसने स्थानीय श्रेणीक्रम में जातियों को ऊर्भूवोन्मुखो (77४४0) तथा अधोमुझखी (00ज्याध्षआत) गतिशीलवा को नहीं रोका। सुरजीत सिन्हा (957) ने भी सकेत किया है कि कई कबीले विजय तथा शक्ति प्राप्ति के बल पर क्षत्रियदा का दावा करके शाही स्थिति तक पहुँच गए। सिलवस्वर्ग (॥६८:०७८६, 968 : 428) ने विशग (इयण्नालंगा०) के माध्यम से भारत में सामाजिक गतिशीलता को चर्चा की है। आश्रमों की योजना में सन्यास्त व विशण द्विजरों (9०८0०॥) के लिए निर्धारित था। व्यवहार में निम्न जाति के सदस्य भी सामाजिक श्रेणी में अपने स्थान की चचनाओं से बचने के लिए सन्यास्ती हो जाया कात़े थे। डाल में ही एक प्रक्रिया के रूप में सामाजिक गहिशीलता अधिक सक्रिय हो गई है। एपएनश्रीनिवास ने सम्कृतिकरणण व पश्चिमीकए के माध्यम से इसकी व्याख्या की है। पैकिम मेरियट, डयूमान्ट और रजनी कोठारी ने भी सामाजिक गतिशीलता को विभिन्‍न स्वरों पर देखा ! एक ओर तो निम्न जादियों के सदस्य जावि श्रेणीक्रम में अपनी सामाजिक प्रस्थिति को उठाने का प्रयल करते हैं, दूसतो ओर, जाति एक समूह के रूप में राजनैतिक शक्ति द्वारा था जातियों के ग़जनैतीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से गतिशीलता प्राप्त करने का प्रथल करती है। अत हम विविध स्तरों पर जादि गतिशीलता का अध्ययन कॉगे () युद्ध के माध्यम से (४) शासकों की सेवा द्वारा (॥) विविध स्व॒रों पर जनगणना द्वारा (0) सामाजिक प्रक्रिया के क्रियान्वयन के माध्यम से, और (५) राजनीति के प्रयोग से । युद्ध के माध्यम से गतिशीलता (भ०छ॥9 ॥ाणाहं। १४7९) एम एन श्रीनिवास और पालिन कोलेण्डा मे मुग़ल काल में युद्ध के माध्यम से होने वाली जाति की गतिशोलता की चर्चा की है! कोलेण्डा ने कहा है कि उसीसवी शवार्दि के पूर्वार्ध में प्रिटिश एकौकरण तक जाति में ऊचा उठने का सबसे प्रभावी तरीका कम घनत्व वाली जनसख्या क्षेत्र में या खाली भूमि में शान्तरिपूर्ण अधिकार करके विजय द्वाय्य सीमाओं पर अधिकार करना था। केएम पनीकर (इतिहासकार) ने कह्य है कि “ईसा पूर्व पाचवी शत्ताब्दि से प्रत्येक परिचित शाही परिवार गैर-श्षत्रिय परिवार से सम्बद्ध था” | कोलेण्डा (998 97) ने कहा है कि प्राचीन भास्त में शासक क्षत्रिय थे, यघ्षपि कृषक जाति के भी कुछ शासक थे जिन्होंने किसी क्षेद्र पप अधिकार कप्के अपना शज्य स्थापित कर लिया। शासक बनने के बाद कृषक विजेताओं ने क्षत्रिय होने का दादा किया ! इस श्रकार कृषक विजेता क्षत्रिय क्रम तक उठ गए। एम एन श्रीनिवास ने मुगल काल में शिवाजी का उदाहरण दिया है। शिवाजी के पिता बीजापुर के मुस्लिम शासक के जागोरदार थे। शिवाजी ने मुगल शाप्तत को उखाड़ फेंका और अरब सागर से बगाल की खाडी तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। उनकी जाति मग़ठा, शूद्र वर्ण की मानी जातो थी इसलिए शिवाजी धार्मिक सस्कार द्वार क्षत्रिप बन गए। शिवाजी के वर्ण प्रस्थित्रि में उठने के साथ ही उनकी मग़ठा जाति भी क्षत्रिय क्रम में आ गई ($न्ंचराए०5, 7968 : 'िआा०7 7968 . 2-73, [०६॥73, 968 : 97) । 56 सामाजिक स्तरकरण शासको को सेवा के माध्यम से गतिशोलदा (०छा्ना॥ क्राए०एण्ट $९-थंग्रडठ रिएलर) जिन जातियों के सदस्य हिन्दू या गैर हिन्दू शासकों की नौकरी करते थे, उच्च वर्णक्रम प्राप्त कर लेते थे। उदाहरणार्थ, गुजराव के पातीदार जो शूद्र वर्ण का एक कृपक समूह था, शिवाजी के मराठा वशजों गायकवाड्डों का समर्थन करते थे, जो मध्य गुजरात पर शासन करते थे। क्रमश, क्षत्रिय होने का दावा करते हुए उन्होंने अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए (50० 964) । एक दूसरा उदाहरण है कायस्थों का जो लेखाकार जाति के थे (जो मुद्रण के आविष्कार से पहले पेशेवर पत्र लेखक होते थे या जो लेखों की नकल करते थे या आलेखों को रखते थे)। कायस्थों ने पहले तो अपने को मुगलों के लिए और फिर ब्रिटिश शासकों के लिए लाभकारी बनाया। बारहवी शवाब्दि में जब वे निम्न जाति के थे, उन्‍नीसवी तक उत्तर भारत में ये लोग द्विज श्रेणी तक उठ गए, यद्यपि पूर्व में बगाल में वे शूद्र ही रहे (९०7१७, पा शाश्टएटा?8, 7968 422 23) | बर्टन स्टीन (8फ्राणा 860, 98), एक इतिहासकार, ने भी कहा है कि मध्ययुगीन दक्षिण भारत में परिवार मुस्लिम शासकों से सान्िध्य (४४5०००॥०७) में ऊपर उठे। गतिशीलता की इकाई जाति न होकर परिवार या परिवारों का एक समूह होता था। श्रीनिवास ने सुझाव दिया है कि इस प्रकार की पारिवारिक ऊर्ध्व गतिशीलठा का परिणाम बडी जाति में से एक नयी जाति की रचना में हुआ। ब्रिटिश शास्नन काल में जनगणना आयुक्तों द्वारा (जातियों को) उच्च प्रस्थिति प्रदान किया जाना (855ए॥्राए प्राह्ठाश 5६805 (0 ९७५९५) 0७ ए९ (शाड05 (0०ग्रह्मांडड्रणाश5 का छा फलाएब एशस्‍००) 89] से 93 तक जनगणना में जाति पहचान लिखते समय अनेक मध्यम और निम्न जातियों ने स्वय को द्विंज वर्ण के रूप में पजीकृत कराने का प्रयास किया। 90] के जनगणना आयुक्‍त ने सभी जातियों को क्रम देने का कार्य किया। सैकड्डों जातियों ने उच्च वर्ण शीर्षक का दावा करते हुए उच्च क्रम सुनिश्चित किया। उदाहरणार्थ, बगाल के कृषक कुर्मा क्षत्रिय होना चाहते थे, तथा तेली वैश्य बनना चाहते थे। प्रत्येक दावे के साथ इतिहास और कथाओं से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे। दावों का मूल्याकन करने के लिए जिला समितियों स्थापित वी गई थीं। कुछ दावे मान लिए गए और कुछ अस्वीकृत कर दिए गए। सस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से जाति गतिशीलता (०5६ १0जए 70 5००2) ए70ए९५५९६ 6( $855८८(२४७०७ घाएे रटाफस307॥) ब्राह्मण, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में जाति प्रथा इतनी कठोर हो गई थी कि आनुवाशिक सदस्यता, अन्तर्विवाह, व्यावसायिक गतिशीलता से इन्कार, तथा सहभोजी और सामाजिक प्तिबन्धों के माध्यम से सदस्यों को हमेशा एक निश्चित प्रस्थिति का लाभ मिलता रहा। परन्तु उन्तीसवी शताब्दि के तीसरे दशक से आगे जाति प्रथा कठोर नही रह सकी क्‍योंकि सामाजिक स्तवरीकरण ठा औद्योगीकरण, नगरीकरण, शिक्षा का प्रसार, कुछ वैधानिक उपायों का क्रियान्वपन और अनेक समाज सुधारकों के सामाजिक आन्दोलनों की अ्रक्रियाएं प्रारम्भ हो चुकी थी। एमएन श्रीनिवास ने 952 में सस्कृतिकरण और नगरीकरण प्रक्रिया के माध्यम से जातियों में प्रस्थिति गतिशीलता को समझाया है। उसका मानना था कि एक निम्न जाति शाकाहाए बन कर और मद्यनिषेध अपना कर एक दो पीढी में श्रेणीक्रम में उच्च प्थिति तक पहुचने में समर्थ होतो थी। ऐसी जादिया ब्राह्मणों के सस्‍्कार, रीवि रिवाज और विश्वास अपना लेती थी और अपने अशुद्ध समझे जाने वाले संस्काएँ को त्याग देती थी। प्रारभ्भ में श्रीनिवास ने निम्न जातियों द्वारा ब्राह्मण जीवन शैली का अनुकरण करने को चेष्ठा कम्ने को बात कही लेकिन बाद में उसने किस्तो उच्च वर्ण की महत्त्वपूर्ण जाति से अनुकरण की बात कही। लिंच [[ाणा, 4959 28) ने इसे 'अभिजात्य अनुकरण' (८॥८ ००7०३४००४) कहा है। बारनेट (897०0 ने बाह्मणों और ्षत्रियों के जीवन शैली को बणबरों करने को 'गजस्ती मॉडल (॥0/09 77002) कहा है। इस प्रकार ऊर्घ्गामी (००४०) पतिशील जाति ने सस्कृतिकरण या “अभिजात अनुकरण' या 'गजसी अतुकएण के माध्यम से अपनी प्रस्थिति में सुधार करने का प्रयल किया। परन्तु एमएन श्रीनिवास (962 58) ने कह है कि अस्पृश्य लोग कभी भी शूद्रों की सीमा रेखा पार नही कर सके हैं और न ही ऊँची जाति को प्रस्थिति प्राप्त कर सके हैं। सस्कृतिकएण की प्रक्रिया में कुछ उल्लेखनीय तथ्य इस प्रकार हैं. () सस्कृतिकर्ण को प्रक्रिया आथिक और ग़जनेतिक आधिपत्य से जुड़ी है, अर्थात्‌ सांस्कृतिक प्रभुत्व की प्रक्रिया में प्रभुत्ववाली स्थानीय जाति की भूमिका पर बल दिया गया है। इस प्रकार यद्यपि प्रारम्भ में निम्न जातियों ने ब्राह्मणों का अनुकरण किया लेकिन बाद में स्थानोय प्रभुत्व वाली जातियों की (गैर ब्रा्प जाति) नकल की जाने लगी। (2) सस्कृतिकरण उन जातियों में हुआ जिन्हें राजनैतिक व आर्थिक शक्तिया प्राप्त थी लेकिन सास्कारिक क्रम (कर्मकाडीय) (हएश ग्थयाधगा?) में वे उच्च क्रम पर नहीं थी, अर्थात्‌ उनकी संस्कारिक तथा राजनैतिक-आर्थिक स्थितियों में फासला था। 8) आर्थिक सुधार सस्कृतिकरण को आवश्यक पूर्व शर्त नही है) ६4) सस्कृतिकण्ण एक दोहरी प्रक्रिया है। एक जाति ने न फेवल अपने से ऊची जाति से कुछ लिया बल्कि इसने कुछ दिया भी । 6) गतिशीलता को इकाई समूह है न कि व्यक्ति या परिवार। (6) स्वतत्रता के बाद सस्कृतिकरण को प्रक्रिया कमजोर हो गई ऐ। अब लम्बवंतू (४८॥०४) गतिशीलरा पर बल है न कि समदल (#७770४०॥) पर। (7) सस्कृतिकरण सामाजिक परिवर्वन की व्याख्या मुख्य रूप से सास्कृतिक अर्थ में करता है न कि सरचनात्मक अर्थ में। (8) सस्कृतिकरण किसी समूह के लिए स्वत हो उपलब्धि नहीं दिलावा। समूह को दो उच्च प्रस्थिति प्राप्त करने के लिए अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करनी होती है। (9) निम्न जातियों द्वार अशुद्ध व मलिन पेशा बदलना, मदिणपान बन्द करा, गाय का मास खाना बन्द करता, सुसस्कृत रोति-रिवाज अपनाना तथा विश्वासों और देवों देवताओं को मानना आवश्यक रूप से ऊपर उठना नहीं है। इन क्रियाकलापों का लक्ष्य गतिशीलगा नहीं हो सकता! सप्कृतिकरण को सम्भव बनाने वाले कारक हैं . औद्योगीकरण, व्यावसायिक गतिशीलता, सचार के विकसित साधन, शिक्षा का प्रसार, पश्चिमी प्रौद्योगिको, और निम्न 58 सामाजिक स्वर्करण जातियों में मलिन पेशे त्यागने, खराब रिवाजों को तथा सामाजिक प्रथाओं को त्यागने की जामृति। स्वय श्रीनिवास के अनुसार सस्कृतिकरण के विस्तार में प्रमुख सहायक कारक हे मंत्रोच्चाएण (हक्ण75) के साथ से कर्मकाण्डी कार्यों का अलग होना जिसने ब्राह्मण संस्वारं के प्रसार को सुविधाजनक बनाया। सस्कृतिकरण के साथ ही, पश्चिमीकरण की प्रक्रिया ने भी सामाजिक गतिशीलवा को सम्भव बनाया है। पश्चिमीकरण गैर-पश्चिमी समाज की विचारधारा, मूल्यों, सस्थाओं और प्रौद्योगिकी में परिवर्तन की प्रक्रिया है जो लम्बे समय तक पश्चिमी समाज के साथ सास्कृदिक सम्पर्कों का परिणाम है ($07/085 962 55) | पश्चिमौकरण को प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें प्रौद्योगिकी और तर्क सगतता पर जोर दिया जाता है। डेतियल लख्नर, हैरोल्ड गूल्ड, पमिलटन सिंगर और योगेद्ध सिंह जैसे विद्वान पश्विमोकरण की अपेक्षा आधुनिकीकरण को वरीयता देते हैं। लेकिन श्रीनिवास इस शब्द (आधुनिकीकरण) को 'वस्तुपरक' (&७शुंध०ध०) मानता है (5८एा००७, 88, 986 2)। सामाजिक गतिशीलता की व्याख्या करने के लिए सस्कृतिकरण को प्रक्रिया के प्रयोग के विरुद्ध निम्नलिखित आलोचनाए की गई हैं ()) देश के कुछ भागों में (जैसे पजाब और पहले का मिन्ध) जातियों द्वार जो कुछ भी नकल किया गया वह सस्कृति परम्पण नहीं थी बल्कि इस्लामी परम्पा थी। सिखवाद का उदय इस्लामी सुफीवाद और रहस्यवादी (00)४४०७०) आन्दोलनों की हिन्दू परम्पपओं के समन्वय से हुआ। 0) सस्कृतिकरण गैर सास्कृतिक परम्पराओं के अनुकूलन (७09080०४) का विवरण देने में असफल रहता है (१४०.४००१४७ 87780, 973 )। 0) श्रीनिवास को प्रक्रिया (सस्कृतिक्रण की) केवल भारतीय समाज में (जहा जाति व्यवस्था मौजूद है) सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करती है। यह अन्य समार्जों के लिये लाभप्रद नहीं है। 'राजमैतोकरण के माध्यम से जाति गतिशोलता (९०५९ >ैण्ञाए एत्ठ्ण्टा एगा्ष॑तंइवए0ा) अनेक जातियों ने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये या अपनी स्थिति को सुधारने के लिए राजनीति का सहाय लिया है ! एलीनर जेलियट (&॥८३६४० 7.00०0 के अनुसार राजनीति का लाभ सरकारी लापों को श्राप्त करने और राजनीतिक सस्थाओं और विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं * महाराष्ट्र के महार, गुजरात के क्षत्रिय, तमिलनाडू के नादर, और आन्ध प्रदेश के रेड्डी और क्म्मा लोग। महाराष्ट्र के महायें ने, जो राज्य कौ कुल जनसख्या के 0 प्रतिशत हैं (राज्य में कुल 3 प्रतिशत अनुसूचित जादि जनसख्या का) प्रासम्प में सामाजिक पतन की दशाओं में काम किया, लेकिन आखिरकार अपनो सामाजिक दशा को सुधारने के लिए राजनीति का सहाय लिया। अम्बेडकर ने उन्हें राजनैतिक शक्ति के रूप में सगठित किया और अनुसूचित जाति का एक महाप्षघ बनाया जो अन्त में सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक समानता के उद्देश्यों को आप्त करने हेतु शजनेतिक साधन के रूप में प्रयोग किया गया। महांर, जिनें अस्पृश्य समझा जाता था, चौकीदार, सन्देशवाहक, सडकों को सफ़ाई, दूसरे गाँवों का मृत्यु सामाजिक स्तरकरण 59 सन्देश लाने ले जाने, आदि का काम करते थे। मन्दिए, स्कूल और कुए उनके लिए बन्द थे। बाद में (860 से बाद) उन्होंने फैक्ट्रियों, रेलों, गोदी, आदि में कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। ओ गाँवों में रहते थे उन्होंने पी परम्परागत निम्न व्यवसायों को छोडना शुरु कर दिया। कापी बडी सख्या में वे सेना में भी भर्ती हो गए। सैन्य सेवाओं ने उन्हें सामाजिक श्रेणीक्रम में ऊँचा उठने में ही मदद नही की बल्कि परिचमी सस्कृति के द्वार भी उनके लिए खुल गए। कुछ महार ईसाई बन गए जबकि कुछ ने कबोर व यमादि पथ अपना लिया, जो समानता के पक्षपर थे। 936 में अम्बेडकर के नेतृत्व में उनके मन्दिर प्रवेश प्रयास ने ग़जनैविक आन्दोलन का रूप ले लिया, हिन्दुत्व को पूर्णरूपेण अस्वीकार कर दिया। 937 में अम्बेडकर ने स्वतत्र लेबर पार्ट (8७०० 7०5) की स्थापना की जिसमें अधिकतर टिकिट महार लोगों को ही दिए गए। तब से रिपब्लिक पार्टी (२९७४० एआए) तथा 946, 95], 39% के चुनावों के माध्यम से पहारों ने महराष्टू को शजमीति में अपने को महत्वपूर्ण राजनैतिक बल के रूप में स्थापित कर लिया है। रजनी कोठारी और रुशिकेश मार (छघ७आतव्आ जैग७, 973 , 70-00) मे गुजग़त के कुछ मध्यम और निम्न जाबियों तथा आर्थिक दृष्टि से पतित समुदायों के उदाहरण दिये हैं, जिन्होंने राजनैतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए 940 और १950 के दशकों में एक सामान्य सगठन महासघ के रूप में बनाया। काग्रेस के विरुद्ध चुनाव जोतने के बाद उम्हें क्षत्रियों में स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार राजनीति उनके लिए सुदृढ़ बन गई। राबर्ट हाईप्रेव ((२कलत सडक 2५8 37, 973 02-26) ने तमिलनाडु में नादरों के बीच एकता और सामजत्य ओर इसकी एकीकृत पजनैतिक सस्कृति का परीक्षण किया। अन्य जातियों पर आर्थिक निर्भरता की समाप्ति तथा विस्तृद भौगोलिक क्षेत्र पर जाति बन्धनों के विस्तार ने इस जाति (नादरों) को एक नयी दृढ़ता प्रदान को जिसने उन्हें सामाजिक, आर्थिक, और ग़जनेतिक दृष्टि से उठा दिया। आर्थिक रूप से अपनी प्रस्थिति में सुधार करने के बाद उन्होंने क्षत्रिय पद का दावा किया। 92। की जनगणना में सभी नादसों ने स्वय को नाद६ क्षत्रिय घोषित कर दिया। आज नादए दक्षिण में आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से सबसे सफल समुदायों में से एक है। ये सभी ठदाहरण प्रकट करते हैं कि निष्न जातियों ने किस प्रकार राजनीति का प्रयोग था ॥ प्रजनीतिक शक्ति, जावि एकता, और आखिरकार ममाज में उच्च स्थिति प्राप्त कर ॥। केणलशर्मा (६॥.. इकछग्रा>, इ०ट्ल शबवव्टटका ह वीध्योग, १०7- 58-73) ने सामाजिक गतिशीलता के तीन दृष्टिकोों कौ ओर सकेत किया है सरचनात्मक ऐतिहासिक, मार्क्सवादी, और सस्कृतिवादी (ऐश॥००झ्ाव्य) अथवा भारतशाल्लीय (770 ०टा८४) । एआर., कामत (8२ ॥(००१०७) ने प्रथम दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए महागरष्ट में जाति गतिशोलवा की व्याख्या को है जिप्में उसने कहा है कि पुएने शहरी वर्चस्व वाले राजनैतिक नेतृत्व के स्थान पर नेठाओं को नयी व्यवस्था आ गई है जो उनत ग्रामीण तत्वों, विस्तृत राजनैतिक चेतना, और राजनैतिक लोकतंत्र में विश्वास रखते है। मार्क्स्वादी दृष्टिकोण का प्रयोध आविन्द दास (#फर्णत 095, ॥984 . 66-9) और ह5षान एव, प्रमाद (88089, ल. ९:४5७४, 979 : 48) ने बिहार में अन्तर्जादीय 60 सामाजिक स्वरशकाण व वर्ग सघर्षों के विश्लेषण करने में किया है। सामाजिक गतिशीलदा की व्याख्या यजमानी अथा के पतन और आधुनिक व्यवसायों के उदय (उधछाग्ा&, 974), अस्पृश्यता और अशुद्धता शुद्धता सिद्धान्त के पतन (0703 986), और शिक्षा, सरक्षणात्मक भेदभाव की राज्य की नीति और सामाजिक आन्दोलनों के सदर्भ में भी की जा सकती है। जातिवाद ((७शंत्रा0) जातिवाद और साम्म्रदायिकतावाद तथा इनके साथ हिंसा की बढती प्रवृत्तियों ने विभिन जातियों मे आपसी सन्देह और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। जाति में उच्च पदासोन व्यक्ति नियुक्तियों और प्रोन्‍्लति भें अपनी जाति या उपजाति के सदस्यों को वरीयता देते हैं। इससे जाति के प्रति निष्ठा इस सीमा तक बढ जाती है कि (0) एक जाति दूसरी जाति पर हावी होने का प्रयल करती है, (॥) उच्च जातिया निम्न जातियों का शोषण करती हैं, (00) चुनाव जाति आधार पर लडे और जीते जाते हैं, (४) समाज में अन्तर्जातीय संघर्ष बढ जाते हैं। यद्यपि जातिवाद, अन्तर्जातीय सघर्ष, और जातीय हिंसा की घटनाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक पाई जाती हैं, लेकिन शहरी क्षेत्रों में भी ये घटनाएँ होती रहती हैं। स्वतत्र भारद में विभिन्‍न जातियों के बीच प्रतिस्पर्धा सामान्य स्थिति मालूम पडती है। लोगों के हाथों में राजनैतिक शक्ति आ जाने के कारण जातिया दबाव-समूह बन गई हैं और 'शक्ति के लिए स्पर्धारत हैं तथा अपने जाति बन्धुओं के लाभार्य शक्ति का प्रयोग कर रही हैं। ऐसे उदाहरण दिये जाते हैं जिनमें कुछ वर्ष पहले एक राज्य में एक बडी सख्या में पुलिस में यादवों को भर्ती किया गया क्योंकि राज्य में एक यादव व्यक्ति सर्वोच्च ग़जनैतिक पद पर आसीन था। 950 के दशक में एक राज्य में रेड्डी जाति के मुख्यमत्री ने बहुत से रेड्डी लोगों को मत्री बना दिया। एक राज्य में एक जैन अधिकारी ने जैनियों को और एक राजपूत अधिकारी ने राजपूर्तों को नियुक्तियों में वरीयता दी। यह प्रवृत्ति न केवल ओन्य जातियों के लिए घृणा में वृद्धि करती है बल्कि देश भें जाति सघर्षों को भी जन्म देती है॥ ऐसे संपर्ष उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, तमिलनाडू, कर्नाटक, गुजरात और महाराष्ट्र मे बहुत होते हैं। जब एक भौगोलिक क्षेत्र में कोई जाति दूसरी जाति से अधिक प्रभावशाली हो जाती है तब यह आर्थिक व गजनैतिक शक्ति प्राप्त कने का प्रयास करके प्रभुत्व वाली जाति बन जाती है। जब कोई जाति एक प्रकार का प्रभुत्व रखती है तब यह कालान्तर में अन्य प्रकार के प्रभाव भी प्राप्त कर लेती है। जाविवाद अपने सदस्यों में ऐसी निष्ठा पैदा कर देता है कि वे अपने एकता को अपनी धांक जमाने या वचित जातियों के शोषण के लिए प्रयोग करने लगते हैं। इसके सबसे अच्छे उदाहरण बिहार में भूमिहारों, यादवों, कुर्मियों, और दलितों में पाए जाते है। राजबीति में गत कुछ दशकों से जातिवाद चुनाव लडने के लिए उम्मीदवारों के चयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा है। वोट माँगने में भी इस कारक का अच्छी तरह नकदीकरण किया जा रहा है। जून 962 में स्थापित राष्ट्रीय एकता समिति भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और साम्पदायिकता की समस्याओ को सुलझाने में सक्रिय है। 968 में राष्ट्रीय एकता समिति ने सायाजिक स्तरीकरण ह्य इन समस्याओं से निपटने के लिए अलग समितिया बनाई। इन सभो समितियों ने दिशा निर्देश, कानून व प्रशासनिक कार्यवाही आदि के लिए अनेक सुझाव दिये हैं। 970 तक ये सब कार्यवाही रुक गई। 980 में राष्ट्रीय एकता समिति की पुनश्थापना हुई और फिर 984 मं। इस बार भी तीन समितिया बनाई गई लेकिन वे भो कुछ ठोस कार्य न कर सकी। सितम्बर 7986 में राष्ट्रीय एकता को बढाने के लिए पांच सदस्यों की एक उपसमिति गठित की गई। फरवरी 3990 और फिर 998 और जुलाई 993 में एक औए स्वरूप इस समिति का निकला लेकिन आज तक (नवाबर, 2000) राष्ट्रीय सौहार्द बनाने और जातिवाद तथा साम्प्रदायिकता को ऐकने की दिशा में कोई हल नहीं निकल पाया है। सपरानता और सामाजिक सरचना के प्रकरण (557९5 ण ए्चुए॥ शत 80०67 $770ठ77९) सामाजिक असमानता का मुद्दा भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण समस्‍या है। किप्ती समाज के सामाजिक स्तरीकरण का अध्ययन, भले ही वह जाति या वर्ग पर आधारित हो, अधिकतर अममानता को समझने से ही सम्बद्ध है! ल्यूइस डयूमान्ट (00५५ 009070) एक फ्रासीसी समाजशाल्री ने एक भिन आधार पर जाति व्यवस्था में असमनता को व्याख्या की है। उसकी मान्यता है कि श्रेणीक्रम, न कि असमानता, समानता का विलोम है। उसने जाति्था में श्रेणीक्रम को शुद्धता और अशुद्धवा के अों में समझाया है, जो कि उसके अनुसार जाति व्यवस्था का मूल सिद्धान्त है। उसके अनुसार 'श्रेणीक्रम' में अशुद्धता पर शुद्धता की श्रेष्ठता, अशुद्धता से शुद्धता की पृथकवा, तथा श्रम विभाजन में शुद्ध व्यवसायों की अशुद्ध व्यवसायों से पृथकवा निहित है। इस प्रकार वह (४) दो विशेधियों (०००४/९७) वी “श्रेणीक्रमता' में सहअस्तित्त (००-८5 ८८०) की, (0) भ्रेणीक्रम के प्राकृतिक असमानताओं से या शक्ति वितरण से बिल्कुल स्वतत्र होने की, (०) जातियी के क्रम (8) का धार्मिक प्रकृति का होना और (0) श्रेणीक्रम घेरने वालों (ह॥00ग्रा055८४) ७ घिरे वालों (०४००४७३७८०) के बीच का सामबन्ध होने की बात कर्ता है। डयूमान्ट को जाति की विचारधार और जाति व्यवस्था में श्रेणीक्रम की घारणा पश्चिमी विद्वानों (रिजले, मेयर, मेरियट, आदि) के विचारों से बिल्कुल भिन्‍न है जिन्होंने इसको व्याख्या पश्चिमी अवधारणाओं के प्रकाश में की है, जैसे, व्यक्तिवाद, समतावाद, आदि । वह श्रैणीक्रम को वर्ण मिद्धान्त से जोइवा है, जिसमें क्रमोकरण ((7803000) सम्मिलित है, लेकिन शक्ति और सत्ता दोनों से भिना है। हिन्दू समाज में राजा का पुजारी के आधोन होना धार्मिक ससस्‍्कार से क्रम है। डयूमान्ट मानता है कि श्रेणीक्रम के पेरे में वर्ण विभाजन और जादि व्यवस्था दोनों ही हैं। इस प्रकार वह जाति के भीतर व जातियों के बीच व्यवहार और अन्त्क्रिया में दैचारिक उन्मुखता को महत्व देता है। वह यह भी मानता है कि श्रम का परम्पशगत विधाजन (यजपानी प्रथा), विवाह का नियमित होना, और सामाजिक सम्पर्क आधिक व सामाजिक तर्क की अपेक्षा श्रेषीक्रम या धार्मिक मूल्यों पर आधारित होते हैं। टीएनमदान (4.3. १४३४एंगा - “07 पर ऐिगणार ण॑ (क्वाए गा पाता प्रा (एमाएफपालए क्‍0 खि&दण 3०८०/०७/ ९०.5, 97), देखें, उसो का लेख, [एव एफ्का9 (९१), उन्‍्दद् उ#ब्धुमवए०ा, 7997 74-83) ने डूयमान्द के भ्रस्थितिं और 62 सामाजिक स्तरीकाण शक्ति के बीच असम्बद्धता (ठाज्ञुण००४०४) के विचार के विपरीत प्रश्व उठाया है। वह कहता है कि प्रस्थिति (ब्राह्मण) के आगे शक्ति (राजा) की आधीनता समझदारी में कठिनाई पैदा करती है। यह दृष्टिकोण चतुराई पूर्ण है लेकिन समझ में सन्तोषप्रद नहीं है। असमानता के विश्लेषण में हमारी मान्यता यह है कि उस असमानत्ा का जो सदियों के आर्थिक ठहराव (६98747००७) के कारण पैदा हुई जिससे वर्गों के बीच जीवन अवस्ों में अन्तर पैदा हुआ, और उस असमानता का जो परम्परागत मूल्यों, सामाजिक प्रथाओं, और जाति प्रथा द्वाय लगाए गए प्रतिबन्धों के कारण उत्पन हुई, दोनों के अध्ययन के लिए समाजशास्तीय विश्लेषण की आवश्यकता है। ऐतिहासिक दृष्टि से असमानता के समाजशासत्रीय बोध (ए४०८४०॥५४४७) को ओर पहला कदम तब उठा जब लोगों कौ अस्तित्व कौ दशाओं में असमानतओं की ओर ध्यान जाने लगा। जौवन के प्रति हिंदू दृष्टिकोण इस असमानता को भिल-भिन जातियों में व्यक्ति के विभिन क्रमों में जन्म लेने से सम्बद्ध है जिसके कारण व्यक्ति की अयोग्यवाओं, अभिरुचियों और आकाशक्षाओं में अन्त होता है। रुसो (00055०३७) ने राजनैतिक असमानताओं की बात कही है, जैसे घन, सम्मान और शक्ति जो कि परिपाटो पर आधारित होती है और व्यक्तियों की सहमति से अधिकृत होती है। यद्यपि लोग इन परिषाटियों (००॥४८०७४०॥७) को त्यागने के लिए और नयी परिषाटिया स्थापित करने के लिए स्वतत्र होते हैं, फिर भी यह स्पष्ट नही है कि असमानताए, जिनसे मनुष्य पीडित हैं, किस प्रकार इतने लम्बे समय से चली आ रही हैं। जब हमने अपने समाज में मनुष्यों के बीच असमानताओं की तुलना अन्य समाजों से करनी शुरु की, तब से स्तरीकरण के स्वरूप और गतिशीलता की दर की तुलना करने के लिए-पहले औद्योगिक समाजों मे फिर कृपक समाजों में--समाजशासख्रीय दृष्टिकोण का प्रयोग किया गया। परम्पय्गत भारतीय समाज में श्रेणोक्रम और सामाजिक असमानवाओं का आपाःर शुद्धता और अशुद्धता का विचार ही था! आधुनिक औद्योगिक समाज में असमानताओं का आधार 'उपलब्धि' है जो “खुली और स्वच्छ प्रतिस्पर्धा' का परिणाम है। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ बताते हैं कि हमार समाज चार क्यों और एक प्रकार के पारस्परिक सम्बन्धों में व्यवस्थित अनेक जातियों में विभक्त था। जब तक जातियों का सम्बन्ध धर्म से जोडा जाता रहा तब तक लोगों ने परस्थिति श्रेणोक्रम स्वीकार किया! यह जुडाव बीसवी शत्ाब्दि के 920 और 930 कौ दशकों तक जारी रहा। पश्चिमी सस्कृति से सम्पर्क, शिक्षा का प्रसार और औद्योगीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया ने लोगों के विचार बदल दिए। उन्होंने मानवरचित असमानताओं की चर्चा शुरु कर दी। देश की राजनैतिक आजादी ने उन्हें असमानताओं के प्रश्न को उठाने और सामाजिक न्याय मागने का अवसर प्रदान किया। केलकर, मण्डल, आदि जैसे आयोगों की सिफारिशों तथा जाति व समुदाय के आधार पर वोट मागने की राजनीतिक क्रियाओं ने उन्हें समानता के अवसर को माग करने दथा सामाजिक अन्याय को दूर कले की माग करने की अधिक श्रेएणा प्रदान की । इसमें आश्चर्य नहीं कि उपेक्षित जादि ओर वर्ग वो नौकरियों, विधायिकाओं, और शैक्षिक सस्थाओं, आदि में सामाजिक न्याय के माम पर आरक्षण मिलने लगा। जियों को भी इस न्याय के मिलने में सफलठा मिली जबकि कुछ राज्यों में पचायतों में ल्ियों के लिए 20% स्थान आरक्षित कर दिए गए और दिसम्बर, 998 के मध्य में और फिर दिसम्बर 999 में रियों के लिए 33% स्थान आरक्षित रखने के लिए साप्ानिक स्तरीकरण 63 एक विधेयक ससद में अस्तुत किया गया। लेकिन जाति, वर्ग और समुदाय के आधार पर सामाजिक असमानताओं को समाप्त कले के प्रयासों ने कुछ जातियों और समुदायों में कुण्ठा उप्तन कर दी है जिनका परिणाम अनेक आन्दोलनों और हिश्वात्मक कार्यवाहियों के रूप में हुआ है। इस प्रकार शिक्षित च्यक्तियों और स्वार्थी राजनीतिज्ञों के विचारों कौ अतिवादी प्रतिक्रियाए कुछ अधिक चिन्ताजनक हैं। इसमें सन्देह नहीं कि सामाजिक और सास्कृतिक जोवन मे विकास के मार्ग में काफी परिवर्तन कर दिए हैं। इन बुपइसों को दूर करने के लिए कई सुझाव भी दिए गए हैं। सामाजिक क्रमीकरण को कम करने पर विचारों और मूल्यों का केवल एक सामान्य स्वरूप ही सामाजिक असमानताओं को कम कर सकता है और लोगों की विभिन श्रेणियों का न्याय प्रदान कर सकता है। आद्रे बेतेइ (02409॥9 #ए०णह शा, 977 * 49) ने शक्ति (70९) और असमानव़ा के बीच सम्बन्धों की चर्चा की है। शक्ति अप्मानता बनाए रखती है तथा यह असमानवा का रूप भी बदल देती है। जाति व्यवस्था में मनुष्यों के बीच असमानता केवल इसलिए ही स्वीकार नही की गई थी क्योंकि यह विश्वास था कि लोगों को विविष गुण प्रदत हैं, बल्कि इसलिए भी क्‍योंकि जातियों को शक्ति के साधन के रूप में देखा जाता था। जैसे ही ब्रिटिश लोगों द्वात सघालित शक्ति के नवीन साथनों ने श्रेणीक्रम और जाति की शक्ति (न्यायालय द्वाग़ जाति पचायतें की शक्ति छोन लेने के बाद) से अपना समर्थन वापस लिया, अीक्रम स्वय हो दूटने लगा। वर्ग व्यवस्था में जिनके पास भूमि या सम्पत्ति होती है, वही व्यक्ति भूमिहीनों और सामत्तिहीनों पर हावो रहते हैं) शक्ति असमानताओं के समाजशास्त्रोय विश्लेषण में दो बातों पर ध्यान दिया जाता है , एक, दूसरों पर कुछ लोगों का शक्ति वर्चस्व और दो, उनके पास नियमों की व्याख्या करने, परिवर्तन करने और बनाने की शक्ति जिनसे उतके सहित, सभी बंध जाते हैं। साथ ही, इस विश्लेषण में शक्ति का विस्तार भी महत्वपूर्ण है। एक हो व्यक्ति या समूह सपाज के हर क्षेत्र में समान रूप से शक्ति नही रखता। हम यह भी पूछते हैं कि कहा तक वे विभिन्‍न व्यक्ति जी एक या अनेक केत्रों में शक्ति रखते हैं और उसका प्रयोग करते हैं, एक सम्बद्ध (००॥८५६८) समूह के रूप में रहते हैं जो शेष समाज में स्पष्ट रूप से चिन्हित होता है बिहार में शक्ति की असमानता ने जाति सेना और जाति सहार को जन्म दिया है। प्रस्थिति और शक्ति में असमानताओं को चर्चा के बाद सामाजिक अस्तित्व (९४५६७८९) की सामान्य दशाओं (ए७8७:०॥ ८००४०७००७) में अस्रमानताओं का सन्दर्भ भो आवश्यक है। बहुत बडी सख्या में लोग असमानता को वर्गों में समाज के विभाजन और घन के अप्तमान वितरण के सत्दर्भ में देखते हैं। ओद्योगिक समाज का दो अणियों--पूजीवादी और समाजवादी-में विभाजन का जन्म सामाजिक यर्ग से ही हुआ है। पूजीवादी समाज सम्पत्ति के निजी स्वामित्व के माध्यम से संगठित होते हैं और इन समाजों में वर्ग की उपस्थिति को मुक्त रूप से स्वीकाग़ जाद्य है, जबकि समाजवादी समायों में इसे सशर्त स्वीकाय जाता है। क्या समाजवादी रुमाजों में निजो सम्पत्ति के उन्मूलन से वार्ग अदृश्य हो गए हैं ? आद्रे बेतेइ (वही . 75) मानता है कि क्योंकि रूस और अन्य ' समाजवादी देशों में अभी भी असमानावाएं विधमान हैं तो यह निश्चित है कि अप्मानता 64 सामाजिक स्तग्नेकरण से कही अधिक विस्तृत धारणा है। अस्थिति, शक्ति और आय के सदर्भ में सामाजिक असमानवाओं की बात करते हुए एक अश्न उठाया जा सकता है. क्‍या समतावादी (८४ए०गंथ) समाज सम्भव है ? क्या यह अतीत में भी था ? क्‍या भविष्य में इसका उदय हो सकता है ? यद्यपि हमारे सभी आधुनिक समाज समानता के वायदे पर बने हैं, फिर भी समतावादी समाज को सम्मावना अतीत नही होती। बेतेइ ने (वही 53) यह भी कहा है कि जब तक मूल्याकव और सगठन सामाजिक जीवन के अभिन्न अग बने रहगे, असमानता की समस्या का अस्तित्व भी जाए रहेगा। हम समठावादी समाज को दो स्तरों पर सोच सकते हैं एक, जिसमें विभिन्‍न स्थितियों में एक ही शक्ति और प्रतिष्ठा हो, और दो, जिसमें सभी सदस्य शक्ति कौ ओर प्रतिष्ठा की सभी स्थितियों का लाभ लेते हों। लगभग सभी लोगों द्वार यह स्वीकार किया गया है कि भविष्य में ऐसे समाजों के होने को कल्पना मात्र भी भ्रमात्मक है। जाति ओर राजनीति (08५९ 0 शणात्७) जाति और राजनीति के बीच सम्बन्ध का दो स्तर पर विश्लेषण किया गया है * एक, जाति राजनीति को किस प्रकार प्रभावित करती है, और दो, राजनीति किस प्रकार जाति को प्रभावित 48 है। सर्वप्रथम हम इस सम्बन्ध को राजनीति में जाति की जागृति (चेतना) के अर्थ मे । | चेतना (6 #क्षताशा९55) राजनीति में भिन्‍तर जातियों कौ चेतना और रुचि को चार कारकों के प्रकाश में अध्ययन किया जा सकता है राजनीति में जाति कौ रुचि, जाति का ग़जनैतिक ज्ञान व ग़जनैतिक चेतना राजनैतिक दलों से जातियों की पहचान, और राजनैतिक मामलों पर जातियों का प्रभाव। इन चारों पक्षों का अध्ययन अनील भट्ट ने 970 के दशक में चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, गुजरात पश्चिमी बगाल, और आम्धर प्रदेश) में विभिन पृष्ठभूमियों के उच्च, मध्यम व निम्न जावियें के ]73 व्यक्तियों पर किया। सभो जातियों को एक साथ लेने पर राजनीतिक रूचि के विश्लेषण करते हुए उसने पाया कि लगभग 25 प्रतिशत जातियों की राजनीति में बहुल रूचि 45 प्रतिशत को सामान्य रुचि, और 30 प्रतिशव को कोई रूचि नहीं थी। देश में प्रमुु राजनीतिक समस्याओं और राजनीतिक आग्रेपों की चेतना के सम्बन्ध में उसने पाया विं मध्यम और निम्न जातियों की अपेक्षा उच्च जातियों में अधिक रूचि थी। जाति प्रस्थिति औः राजनीतिक दलों के स्गथ पहचान के बीच उसने कोई सम्बन्ध नहीं पाया। अत में उसने पाय क्ि कुछ जातिया ही राजनीतिक दृष्टि मे, ्रणहशील, दें. नए, फेत्पर, कुछ, दी, ग्ों, में, मष्यः और निम्न जातियों का प्रधुत्व है। सम्बन्ध टावर एश॑भा०णाज़ंए) रजनी कोठारी (970) ने जादि और राजनोति के बीच सम्बन्धों का इस विषय का विश्लेषः करके परीक्षण किया कि जातियों के वोटों के कारण ग़जनोति व्यवस्था पर क्या अभाव पड0 प्रामाणिक खर्नेकरण 65 है। उसने पाया कि तीन कारक--शिक्षा, सरकारी सरक्षण, और धीरे-धीरे विस्तृत मताधिकार (8-2 वर्ष के युवा भी मददान प्रक्रिया मे शामिल है)। जाति व्यवस्था में प्रवेश कर गए हैं जिसके कारण इनसे राजप्ैतिक व्यवस्था प्रभावित्र हुई है। नये नेतृत्व तथा नमी सष्याओं द्वाप प्रदत शक्ति के पद, प्रशासनिक सरक्षण और आ्थिक अवसरों ने जातियों को राजनीति में घसीदा। जाति के राजनीति में सलान होने के दो परिणाम हुए - जाति व्यवस्था ने राजनैतिक गतिशीलता के लिए नेतृत्व को सरचनात्मक और वैचारिक आधार उपलब्ध कराया और दूसरा नेतृत्व स्थानीय राय को छूट देने और आर्थिक तथा राजनैतिक उद्देश्यों के लिए जातियों को सगठित करने के लिए बाध्य हो गया। एजनीवि में जाति के प्रयोग का विश्लेषण रजबी कोठारी ((क्का& ॥7 खिवीक्षा 7०0८७, 973) ने दो अवस्थाओं (६98०७) में किया। प्रथम अवस्था में बुद्धिजीवी और उच्चताबद्ध (॥80 ८१४८॥०४८४) जातियों (जैसे, आन्चर अदेश में रेड्डी, गुजग़त में पट्टीदार, कर्नाटक में लिंगामत, बिहार में भूमिहर, और राजस्थान में राजपूत) और ऊची आगरेही (आ68 »८॥१॥) जातवियों (जैसे, बिहार में कायस्थ, राजस्थान में जाट) के बीच बैर भाव (३/०६०आं5४ए) तथा क्रोध या विरोध (॥६5७४।गाव्ण) सम्मिलित है। दूसरी अवस्था में स्र्धारत (००॥७८७ा९) जातियों (उच्चताबद्ध व आग्रेही) के भीतर ही गुटबाजी और विखण्डीकरण ((४606०/७४४०४) तथा बहुजावीय और बहु-गुटोय गठजोड़ (४॥9प्राधग७) का विकास सम्मिलित है। निम्न जातियों को भी उच्च जाति के नेताओं का समर्थन करने और एक भुद को मजबूत करने के लिए लाया जाता है | प्रथम अवस्था में जाति के केबल तीन अबयव (८०॥॥७०॥८॥/७) शामिल हैं . जाति की शक्ति सरचना, आर्थिक लाभों का पित्ताण, और जाति चेतना। लेकिन दूसरी अवस्था में जाति के अन्य अवयव जैसे जाति चेतना, असामी (लाया) निष्ठा, आदि शामिल हैं। कोठारी ने प्रथम अवस्था में तीन उप-अवस्थाए बताई हैं। पहली उप-अवस्था में पहले तो शक्ति और लाभों के लिए सपर्ष उच्चताबद्ध जातियों (८॥##८॥८॥८6 ८४६८४) (अथवा उन जातियों वक जो आधिक और राजनैतिक रूप से तो अत्यधिक प्रभाव डालती थी लेकिन सख्या की दृष्टि से नहीं) तक ही सीमित रहता है। दूसरी उप-अवस्या में आरोहित (8५८०८४०३७) जातिया (अर्थात्‌ असन्ह॒ष्ट व उच्च भूमिका आकाक्षी जातिया) भी शक्ति के लिए स्पर्धा करना शुरु कर देती हैं। तीसरी उप-भवस्था में उच्चताबद्ध व आगेहित जातियों के बीच न केवल प्रतिस्पर्धा होतो है (शक्ति और लापों के लिए) बल्कि इन जातियों के भीतर भो होतो है। दूसरी अवस्था में, जिसे गुटवाजी और विखण्डनबाजी की अवस्था भी कहा जाता है, नेतृत्व में दरार पडने लगती है तथा बहु-जातीय एव बहु-गुरीय मठजोड भी हो जाते हैं। इससे राजनीदि में विजषेषी जाति नेताओं की समस्या भी उसने हो जाती है। ये नेता जनता को भी शामिल कर लेते हैं बर्योकि वे लिदा) विघ्तृत क्षेत्र में अपना प्रभाव जम्ताना चाहते हैं। दस्त अवस्था में नेतृत्व में भी परिवर्तन होता है। कोठापे ने जाति और एजनौति के बोच सम्बन्ध पर तीसरी अवस्था की बात भो कही है। प्रथम अवस्था भें जय उच्चताबद्ध (८७४८0) जातिया पहले राजनोविकृत होतो हैं और आगेहित उच्चता प्राप्त (४६८८४०९:७/) जातिया अपेक्षाकृत उपेक्षा के भाव से क्रोध अभिव्यक्त करती हें (नेसे महायाष्ट में द्राह्मनों की उच्चदाबद्ध जाविया और मणठों की उच्चता प्राप्त जातिया) दूघरी अवस्था में स्पर्धी जातियों के भौवर गुटबाडी का उदय होने लगा है 7] सामाजिक स्तरीकरण और निम्न जातियों को भी समर्थन के लिए लाया जाता है और तीसरी अवस्था में जाति के अतिरिक्व अन्य प्रकार की पहचान महत्वपूर्ण हो जाती है। यह बढती शिक्षा, शहरीकरण और आधुनिक उपलब्धि उन्मुखता को अपनाने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार बहु-आयामी (००४५-०ए७०७) निष्ठाओं का उदय होता है। जातियों के विलय की प्रक्रिया डी एम के पार्टी तमिलनाडु और महाराष्ट्र में रिपब्लोकन पार्दी (ए८ए०७॥८४७ एक) ने दर्शायी है (महार और अन्य अस्पृश्य जातियों कौ)। ४ गजनीतिक दृष्टि से शक्तिशाली है लेकिन दूसरी ने अभी अधिक शक्ति प्राप्त नही की है। इन दिलों ग्राम स्तर पर पंचायतों में चुनाव अक्सर एक दूसरे के वोट काटने (००४५-८७(७४९) पर आधारित होकर लडे जाते हैं। अब बहुत बडी सख्या में भूमिहीन जातिया वोट शक्ति रखती हैं, अत वे परम्पणगत शक्तिशाली जाति को चुनौती देती हैं जिसके पास भूमि नियत्रण के कारण शक्ति होती है। बल (विश 6०:॥727॥) जातियाँ तथा उच्चता प्राप्त (४६०८००५॥५) जातिया अक्सर क्षेत्र के प्रमुख दलों से बँधी होती हैं, और दलीय सगठन के माध्यम से ही उर्ध्व (५०४०0) गतिशौलता होती रहती है। अत आज इस प्रकार एक ओर जाति केवल बाह्य राजनेतिक समर्थन आपार (छहलफऑएए एणाह८॥॥ 50ए7०( ७०६८) खो देठी है और दूसरी ओर यह राजनीति को अत्यधिक प्रभावित करती है। जाति और राजनीति के बीच वर्तमान सम्बन्धों से कोठारी चार निष्कर्ष निकलता है () राजनौति में नये अभिजात समूह का उदय हुआ है जो विभिन्‍न जातियों से आया है लेकिन एक सामान्य घर्मनिस्पेक्ष दृष्टिकोण में भाग लेता है और कुछ मूल्यों के सन्दर्भ में समरस (#ण7०2८॥९०७७) भी है। ) जातियों ने नवीन सगठनात्मक स्वरूप धारण कर लिया है। इस पकार () अब विविथ स्तरों पर जादि सप कार्य कर रहे हैं (विश्वविद्यालयों, होस्टलों, क्लबों, सरकारी कार्यालयों आदि में) (0) जाति सम्मेलन विस्तृत आधार वाले हो गए हैं (0) जाति महासघों का उदय हुआ है। 6) जातियों ने गुटोय आधार पर प्रभावित करना शुरु कर दिया है। ये गुट न केबल राजनैतिक समूहों को विभाजित करते हैं बल्कि सामाजिक समूहों को भी। (4) जाति परिचयों (0&77297००७) ने चुन्मव व्यवस्था को एक नयी सार्थकता (:९०४३॥८९०) प्रदान की है। न केवल बडी जातिया राजनोति को प्रभावित करती हैं बल्कि छोटी जातिया भी वोट मागते समय महत्वपूर्ण हो गई हैं। जाति और मतदान व्यवहार (0४३6 806 जगत एश्ाइ्नशंगणा) मतदान जातियों को अपना प्रभाव दर्शाने का एक अवसर प्रदान करता है। रजनी कीठारी 0970), लिण्डजे गार्डनर, मिल्लर (950), को (६८४, 955), कैम्पबेल (960) और नारमन पामर ()४०४७७॥ 72७००, 976) जाति को मतदान निर्धारक मानते हैं। जिस अ्कार ब्रिटेन में मतदान वर्ग-निर्धारक है, अमग्ेका में भ्रद्मति 73८८) निर्धारक है, भारत में सामाजिक स्तरीकरण हा यह जातिननिर्धाएक है। जो जातियाँ श्रेणीक्रम में सबसे नौचे हैं उनके लिए मताधिकार एक शक्तिशाली क्रियाकलाप का कार्य करता है। जाति का सामाजिक और आर्थिक स्तर जितना निम्न होगा, उनके वोद का महत्व उतना ही अधिक होगा। कोठारी, मेयर, वर्मा, भामश्री, समाशिरे राऊ, कोहन, आदि के अनेक अध्ययनों ने दर्शाया है कि जातियां अपना प्रभाव डालती हैं और उन्होंने सौंदेबाजी की शक्ति भी विकसित कर ली है क्योंकि उनके पास मतदान की शक्ति है। आदे बेतेड (देखें, ६0/४०॥ : 973-20) ने भी कहा है कि जाति की निष्ठाओं का मतदान में शोषण किया जादा है। जाति को काटते हुए नये गठबन्धन भी बनाए जाते हैं। रडाल्फ (?ए6०9) का विचार है कि जाति सर्घो ने जाति को एक नयी स्फूर्ति प्रदान की है और लोकतत्र ने भारत में जाति को नयी महत्त्वपूर्ण भूमिका के योग्य बनाया है। डो एलसेठ (0, $लरा, #्लाहमार खाब॑ सिजधला ॥शिट३), विपण्याए 970 47) ने 4967 में एक अध्ययन किया जिसमें उसने भारत के भिनन-भिन चुनाव कषत्रों के 2287 व्यक्तियों का साक्षात्कार किया और पाया कि विभिन्‍न कारकों में से जाति नेताओं को सलाह पर मतदान व्यवहार 0 शतिशत मामलों में, परिवार के हिसाब से 46 प्रतिशत मामलों में, और मतदाताओं के अपने निर्णय से 49 प्रतिशत मामलों में निर्धारित हुआ था । 40 मतिशत मामलों में निर्धारक कारक का पता नही लग सका। उसी वर्ष (/967) पूना में 000 मतदाताओं में सचालित अध्ययन ने दर्शाया कि जाति ने 58 प्रतिशत मामलों में प्रभावित किया। 996, 998 और 3999 के लोक सभा चुनावों के साथ ही दिसम्बर, 7998 में हुए चार गज्यों में और फरवरी 2000 में हुए चार गज्यों में विधान सभा चुनावों में जाति मतदान के महत्वपूर्ण कारकों में सिद्ध हुई है। पसनु हैरोल्ड गूल्ड (8८0#ठ्वार दाद #०॥0८व ॥7०४७, 4७8०७ 977) इस विचार का है कि जाति ने भारत में गजनीति का निर्धारक कारक होना कम कर दिया है। राजनैतिक अभिजन ग्जनैतिक दल और जाति गतिशीलता (एगल्ा डर, एगाधतत ऐपल जात (७७६ ा्ा59007) जाति राजनैतिक अभिजन' प्रस्थिति का एक निर्धास्क कास्क बन गई है। सिप्सीकर, सच्चिदानन्द, राम आहूजा, एसके लाल, आदि विद्ठानों द्वारा 'रजनैतिक अभिजन' पर किए गए सप्री अध्ययनों ने सकेत दिया है कि अभिजन वर्ग के उदय में उच्च जातियों को मध्यम और निम्न जातियों पर अधिक लाभ मिलता है। आजादी से पूर्व सामान्यत उच्च जाति समूह ही आजादी के सर्र्ष में सत कांग्रेस पार्टी में राजदीठिक मच के केद्धीय स्थान में थे, लेकिन आजादी के बाद मध्यम और निम्न जातियों के व्यक्ति भरी राजनैतिक शत क्षेत्र में प्रवेश कर गए। आरक्षण नीति ने निम्न जातियों के व्यक्तियों को नेता के रूप में उभरे के योग्य बनाया उबकि मध्यम जातियों के अभिजन अपनी विकसित शिक्षा और सामाजिक-आधिक प्रस्थिति के काएण उपर कर आए। इस प्रकार जादि प्रथा ने, जिस्तका केवल संस्कार सम्बन्धी पार्मिक कार्य था (व्यवसाय और सामाजिक पस्थिति निर्धारण सहित), लोगों के राजनैतिक स्यवहार निर्धारण को संचालित करने को भूमिका भी अपना ली। गावों में भी जाति न सायता के रूप में उभसे में महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। कार्यालयों, 7 सचिवालयों आदि में जैन लॉबी,... , . याद्मण लाबी, यादव लॉबो, 68 सामाजिक स्तरकरण रेड्डी लॉबी, आदि के विषय में सुनते हैं। यदि कार्यकर्त्ता सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में जातिवादी के रूप में कार्य करने लगें तो ऱजनैतिक जीवन में वे कैसे गैर-जातिवादो के रूप में कार्य कर सकते हैं ? हमारे राजनैदिक अभिजन धर्म निरपेक्षता की बात कर सकते हैं और जाति तथा जातिवादी राजनीति की निन्‍्दा भी कर सकते हैं, किन्तु व्यवहार में वे जाति के दबाव में ही काम करते हैं, क्योंकि नेता के रूप में उनकी अपने उदय की पृष्ठभूमि जाति की ही होती है। राजनैतिक दल भी जाति समर्थन को क्रियाशील बनाते हैं। वास्तव में आज 0000) जनता को गतिशील बनाने की समस्याए वही है जो आज से चार दशक पूर्व थीं! जिस प्रवार 4930 तथा 940 के दशकों में समाज सुधारक विश्वास करते थे कि जन जागृति के बिना राजनैतिक क्रियाकलापों के लिए उनका सगठन सम्भव नहीं था, उसी प्रकार आज भी राजनीतिज्ञ जाति के नेताओं से समर्थन प्राप्त करने का प्रयल करते हैं और साथ ही अपने उद्देश्यों की आप्ति के लिए राजनैतिक साधनों को अपने लाभ के लिए प्रयोग में लाते हैं। कुछ विद्वानों ने गत तोन या चार दशकों में विविध राज्यों में राजनैतिक दलों द्वारा जातियों वी 'गतिशीलता का अध्ययन किया था। उदाहरण के लिए रिचर्ड सीसन (शाजाआत 55800) ने देखें, [(00ा, टलाह का वादा 20॥065.. 973.. 775-227) जाति समर्थन के सन्दर्भ में ।960 के दशक में राजस्थान में एक जिले (नागौर में काम्रेस पार्टी के विकास का विश्लेषण किया, रामाशिरे राय (२8॥३४॥89 ९0५, 5०७ [(णाव, ०० ०. 28-55) ने 960 के दशक में बिहार में जातीय आधार पर एक राजनैतिक पार्टो में प्रवेश का अध्ययन किया, आने बेतेइ (देखें, [९08७७७, 09 (४. 259-297) ने 970 के दशक में तमिलनाइ में जाति प्रथा के माध्यम से राजनैतिक दलों की शक्तियों में परिवर्तन का अध्ययन किया, अनिल भट्ट देखें, (०७७७७, 09 ८६ 299-339) ने गुजरात मे जाति की राजनैतिक गतिशीलता का अध्ययन किया, डोनाल्ड रोजन्थाल (000८० 7२०४०७॥/०) ने दो नाएं (उत्तर अदेश में आगरा व महारष्ट्‌ में पूना) तथा हैरोल्ड गूल्ड ने 990 में उत्तर प्रदेश में जातियों की गजनैतिक गतिशीलता का अध्ययन किया। इन सभी अध्ययनों ने दर्शाया कि राजनैतिक दल अपनी कार्यशोलता के लिए जातियों को गठिशील बनाते हैं और चुनाव जीते में उनका समर्थन लेते हैं। राजनीति मे जाति के प्रयोग के विषय मे लोगो की धारणा (ए6०क९५ शाप्व्कुप0 वं्र छर 056 0 (३५6 9 एगा॥०) राजनीति में जातियों के प्रयोग के विषय में लोग क्या सोचते हैं ? विचारों के आधार पर लोगों को हम तीन समूहों में वर्गीकृत कर सकते हैं. एक, वे जो इस भूमिका पर अफसोस करते हैं और सोचते हैं कि राजनीति जाति और जातिवाद से मुक्त रहनी चाहिए, दूसरे, वे जो सोचते हैं कि राजनीतिक सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करने की स्वतत्र क्षमता रहीं रखते, और तीसरे वे जो जाति या राजनीति या दोनों को ही स्वायत्तता (49000००॥) की दावा करते हैं। रजनी कोठारे (973 -4-7) प्रथम दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। वह कहते कि राजनीति कुछ उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शक्ति अर्जित करने के लिए होती है और साम्राजिक स्तरीकरण 69 शवित जाति के समर्थन द्वारा स्थिति मजबूत करके प्राप्त की जाती है। भारत में क्योंकि सामाजिक व्यवस्था जाति सरचना के चारों ओर सगठित है इसलिए जाति और राजनीति कभी भी पृथक नहीं की जा सकती | अतः राजनीति में जातिवाद वास्तव में जाति का राजनीतिकरण है। दूसरे विचार के सन्दर्भ में राजनीति को स्थिति को ऊँचा उठाने या मजबूत करने के लिए एक साधन के रूप में माना जाता है। इस आधार पर राजनीति समाज की संरचना को प्रभाविव नही करती । रजनी कोठारी ने इस विचार की भो आलोचना की है। ते कहते हैं कि जाति और राजनीति का एक दूसो पर हमेशा प्रभाव रहता है। तौसे दृष्टिकोण में प्रगतिशील आर्थशाल््री, भास्तशास्त्री वथा राजनैतिक व मानवशास्त्री शामिल हैं। वे जाति को सुरक्षित रखना चाहते है तथा जाति को राजनीति तथा राजनीति को जाति से मुक्त रखना चाहते हैं। कौठारी ने इस दृष्टिकोण की भी आलोचना की है और कहा है कि ये सभी विद्वान यह देखने में असमर्थ रहे हैं कि राजनैतिक व्यवस्था और जाति व्यवस्था के बीच कभी भी पूर्ण धुवीकरण नही रहा। एआरदेसाई, कापडिया, घूययें का भी यही विचार थां। राजनीति ने जाति का प्रयोग किया है और सामाजिक-राजनैतिक उद्देश्यों के लिए यह प्रयोग होता रहेगा। 3 अनुसूचित जातियाँ, अस्पृश्यता और पिछड़ा वर्ग (इत्तात्तता०० (03५९५, एआा००णानणी।|।। भाते छ9९ए१एश्चाए (955९६) अपुसूचित जातियोँ (508९6४॥९७ (:७5९७) जाति व्यवस्था में पायो जाने वाली असमानवा अपनी चरम सौमा को उन पूर्णरूपेण पृथक ४८४ ०६०४९०) जातियों के विकास में प्रदर्शित करती है, जिन्हें 'अस्पृश्य' जातियाँ कहा जाता रे । अनुसूचित जातियाँ, जो 'अस्पृश्यों' की बहुसख्या है, तकनोकी रूप से चार वर्ण योजना से बाहर है। इन जातियों को अधिकत सामाजिक व सास्कारिक अशुद्धि (घाएणा॥) से परिपूर्ण माना जाता था, तथा उनके धन्धे नियामक श्रेणीक्रम (7ण॥09/१6 ग्र्मअा) मैं मिम्नतम माने जाते थे। इससे शहरों और गाँवों में उनके पृथक आवास की परम्पप को बल पिला। अनुसूचित जातियों का कोई समरूप स्तृत (#0702९7८०७5 #/क्षणा) बना हुआ नहीं था। 935 में 'अनुसूचित' बनने से पूर्व इन जातियों को “बाह्य” (७४६८४०) जातिया, प्रतित ((८७7८५६००) जातिया, भग्न व्यक्ति (छा0६० गाथा), और विजातीय (०७(८०७९०७) कहा जाता था। गान्धी जी ने इन्हें 'हरिजन' (ईश्वर वी सन्तान) की सजा दी है। 93 की जनगणना में 'बाह्य' (७४८४०) जातियों की पहचान के लिए कुछ सामाजिक आधाए प्रयोग किया णया। इसो आधार भ्रमाप पर 39855 में इन जातियों की “अनुसूचित जातियों” के रूप मे सूचियाँ बनाई गई। इनमें से कुछ आधार प्रमाप (८ाक्षा॥) थे क्या ब्राह्मण इनके लिए पुरोहित का काम करते हैं, क्या नाई, दर्जी आदि को सेवाए उन्हें उपलब्ध होती है, क्या वे जातीय हिन्दुओं को पानी पिला सकते हैं, क्या वे हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश कर सकते हैं, क्या वे सार्वजनिक सुविधाओं--जैसे सडकों, कुँओं, स्कूलों आदि--का प्रयोग कए सकते हैं, क्या उनके स्पर्श या तिकटता से उच्च जातियाँ अशुद्ध (9000/०) होती हैं, क्या सामान्य व्यवहार में उच्च जाति के लोगों द्वारा उन्हें समान समझा जाता है, क्या वे घृणित पेशे में सलग्न हैं, आदि। 935 में सभी अनुसूचित 227 जातियों में 5 कग्रेड 40 लाछ की जनसख्या सहित अनुपूचों बनाई गईं। 997 में यह सख्या बढकर 3 कग्रेड 82 लाख हो गई जो कि 99] मे देश की कुल जनसख्या का 63 प्रतिशव था। 999 में उनकी जनसख्या 4 करोड से कुछ अधिक अनुमानित थी। अनुमूचित जातियोँ, अद्नश्यता और पिछड़ा वर्ग है? | अनुसूचित जातियो के विरूद्ध निषेध (ए7ठप्रत्त॑ंं0०६ &हुझंत्र८ $0९१७९०१ (५४९८४) आरम्थिक काल से ही आजकल 'दलित' कहे जाने वाली अमुसूचित जातियों पर अनेक कठोर प्रतिबन्ध लगाए जाते थे,जैसे, उन्हें कमौज वे बनियान पहनना मना था, उन्हें आभूषण, चणतें, जूबे, और छाते का अयोग वर्जित था, घरों में केवल मिट्टी के बर्तन प्रयोग कर सकते थे, सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के बाद शहर में प्रवेश वर्जित था, और उन्हें उच्च जाति हिन्दुओं से कुछ कदारों की दूरी बनाए रखनी पड़ती थी। इस शकार उन्हें पूर्णरूमेण बाँध दिया गया था। अस्पृश्यता के वेश में जो अत्याचार उन पर किए जाते थे, वे आज भी जारी हैं। राज्य द्वार सुधारात्मक उपायों तथा कल्याण सेवाओं के बावजूद समाज की अदृश्य शक्तिया सामाजिक तोड-फोड करतो ही रहदो हैं। उदाररणार्थ, ऐसे मामलों की रिपोर्ट आती है जहा अद्यपि दलित विद्यालय में तो दाखिल किए जाते हैं लेकिन एक ही कक्षा में उन्हें एक कोने में पृथक बैन्चों पर बैठा कर पृथक कर दिया जाता है। यदि कार्यालय में सामूहिक भोज उच्च जातियों व अनुप्तूचित जाति के कर्मचारियों के लिए आयोजित किया जाता है तब ऐसे अवसरों पर उच्च जातियों के लोग “विशेष अवसर के नाम पर निम्न जाति के लोगों को पहले भोजन करते हैं और तब उन्हें आराम करने के लिए कह कर स्वय अलग से भोजन कत्ते हैं। ऐसे मामले भी हैं जहा छात्रावार्सो के निम्न कर्मचारी उच्च वर्ण हिन्दू छात्रों के बर्तन माफ करे हैं, लेकिन अनुसूचित जाति के झछाझें से अपने बर्तम स्वयं साफ करने को कहा जाता है। लाभग पाव वर्ष पूर्व जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में सम्मिलित भोजन गृह में अनुसूचित छात्रों द्वारा भोजन के मामले को लेकर हडताल हुई थो। 998 में, (सावले नाम के) एक छात्र को महाराष्ट्र में (परवान गाँव में) वर्षा के दौरान एक मन्दिर में शरण लेने के काएण मार दिया गया। अनुसूचित्र जाहियों के लोग कई राज्यों में कई गावों में अपनी महिलाओं का शोषण और अपमान सहन करते हैं। सिन्हा और सिन्हा (58॥8 शत $0॥9) ने 966 में पटना विश्वविद्यालय के 200 छात्रों के 'हरिजनों के प्रति दृष्टिकोण पर (80७४4 #0/०९5, 967) 69 प्रतिशत उत्तरदावाओं ने हरिजनों को पिछड़ा हुआ, 56 प्रतिशत मे चालाक व मककाए, 55 भ्रतिशत ने असस्कृत, 54 अत्िशत ने मूर्ख, 52 अ्रतिशत ने गन्दा, 52 अविशञत ने शराबी, 49 प्रतिशव में कुरूप (89) बताया। यह केवल यह इंगित करता है कि 35 वर्ष पूर्व अनुसूचित जातियों की क्‍या छवि समाज में प्रचलित थो। अनुप्तूचित जातियो के विछद्ध प्रवाइनाएँ (॥0ल॥९5 ##ुआ5 इतलाध्त॥९6 (45९8) अनुमूचित जातियों के प्रति अत्याचारों और नृशयताओं में वृद्धि हो रही है। प्रति दो घस्टे में एक दल्षित की पिटाई होती है, प्रतिदिन तीन दलित भहिलाए बलात्कार की शिकार होती हैं, दो दलितों का कत्ल, और दो दलिव घर जला दिए जाते हैं (८6 # 06०, 7998 : 84) अनुसूचित जातियों के विरुद् अपणों में वृद्धि इस तथ्य से ही स्पष्ट हो जाती है कि 955 में पुलिस द्वार पंजीकृत 80 अपराधी मामले 399! में 8,336, 995 में 32,990 और १999 भें 25,638 हो गए (वही. 8) अनुसूचित जावि के लोगों की जमोन हडप कर, उन्हें कम मजदूगे देकर और उन्हें बन्चुआ मजदूर बनाकर उनका शोषण किया जाता है । 72 अनुसूचित जातियों, अद्यृस्यद्ा और पिछड़ा वर्ग अनुसूचित जातियों के शोषण मे जादि सघर्षों तथा बिहार में विशेष रूप से जाति सेनाओं को जन्म दिया है। कुर्मियों को भूमि सेना, यादवों की लोक सेना, भूमिहारों कौ रणवौर सेना, और ब्रम्हर्षि सेना, ब्राह्मणों की गगा सेना, और राजपूतों की कुँवर सेना विद्यमान है। माओवादी समुदाय भी हैं जो कई जिलें में अ्रभावी हैं। एमसीसी केडर अधिकाशत यादवों, कोरियों, और पासवानों के है। वे क्योंकि सत्ता दल का समर्थन करते हैं अत उन्हें उनका सरक्षण प्राप्त है। बिहार में जून 97 और जून 2000 के बोच जाति के आधार पर 27 नरसहार हुए हैं जिन में से 3 बार दलितो के विरुद्ध नरसहार हुए थे। केवल जुलाई 996 और जून 2000 के मध्य ही आठ बार रणवीर सेना द्वार नरसहार हुए थे जिन में दिसम्बर 997 में सबसे अधिक 6 दलित मारे गये थे और उसके बाद जून 2000 में 35, मार्च 999 में 34 और शेष में 6 और 22 के बीच दलित मारे गये थे (द हिन्दुस्तान टाइम्स, जून 3, 2000)। इन हत्याओं का काएण क्षेत्र के भूमिहीन दलित किसानों तथा सवर्ण भूस्वामियों के बीच लम्बी बैर भावना थी। इस सकट को हल करने में ग़जनैतिक इच्छा शक्ति की कमी ही बिहार के लिए अभिशाप बन गई है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर राष्ट्रीय आयोग भौ दलितों के विरुद्ध बढते अपराधों की रिपोर्ट देता रहा है। केन्द्रीय सरकार ने इस प्रकार के शोषण को रोकने के लिए सभी के को निर्देश जारी किये हैं। इस सम्बन्ध में राज्यों द्वाव किए गए कुछ उपाय इस प्रकार * अनुसूचित जातियों से सम्बन्धित निम्न मजदूरी आदि विवादों की जानकारी राज्य सरकारों को देने के लिए व्यवस्था को चुस्त बनाना। » अनुसूचित जातियों को उनकी भूमि या उन्हें आवटित भूमि का स्वामित्व दिलाने में सहायता करना। * अनुसूचित जातियों को भूमि में अपराधिक घुसपैठ के मामलों में पुलिस अधिकारियों को विशेष रूप से निर्देश देना और इन जातियों के विरुद्ध अपराधिक मामलों को विशेष मामलों का दर्जा देना तथा उनके मुकदमे और समाधान का तुरन्त प्रबन्ध करना। ०» अनुसूचित जाति कृषि मजदूरों को वैधानिक न्यूनतम मजदूरी दिलवाने मे मदद करना। » अनुसूचित जातियों से सम्बन्धित मामलों को शीघ्र निपटाने के लिए विशेष अदालतें स्थापित करना। » अनुसूचित जातियों के विरुद्ध किए गए अपराधी मामलों को ठीक से पजीकृत करने, छातबीन करने, तथा शीघ्र अभियोग चलाने को सुनिश्चित करने के लिए डी आईजी पुलिस के आधीन विशेष कक्ष स्थापित करना। * अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए विविध पश्चों की देखभाल के लिए राज्य स्तरीय समितियों स्थापित करना। श्रीनिवास ने कहा है कि दलितों को लम्बे समय तक शोषण किए जाने के कारण वे अपनी अलग पहचान बनाने के लिए जागृद हो गए, उनका आत्म सम्मान जागा, उन्होंने आन्दोलन प्रारम्भ किए तथा उनमें सस्कृतिकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिला। जागृति एवं अनुसूचित जातियाँ, अस्पृरयता और पिछड़ा वर्ग प्र ठ आच्दोलनों का परिणाम यह हुआ कि : (0) देश के विभिन भागों में अनुसूचित जातियों का राजनैतिक समूह के रूप में उदय हुआ, (४) दलितों को सामाजिक निर्योग्यवाओं को समाप्त करने के लिए कदम उठने के लिए गाष्ट्रीय मेतृत्व पर दबाव पड़ने लगा, (॥) संवैधानिक चेतना सरक्षण की भाग होने लगी, (४४) विविध पृथववारी (3७८०७॥४०) आन्दोलन (अम्बेडकर द्वारा) तथा एकता सूचक (ान्धी द्वाए) आन्दोलन प्रारम्भ हुए, (४) दलितों द्वार प्रस्थिति गतिशीलता के प्रयास हुए | पृथक्कारी आन्दोलनों मे कई उपजात्रियों का एक जाति समूह में विलय द्वारा दलितों के समस्तरस्तरीय (#ठ526709) ०४८) जाति एकता को बढ़ावा दिया, उदाहरणार्थ, तमिलनाडु में दन्‍्य कुल क्षत्रिय समम, महाराष्ट्र में महारों को 52 उप-जातियों का एक समुदाय बनाना, उत्तर प्रदेश के चमारों ओर जाटवों का सघम, और उड्सा में पान्स का सगठन बनाना (देखें, छछणएणए॥ भाएं ऐेणवएणआ*" 7%5, $पा॥॥03 ए३/एडाताउ१ : 968, 7.ए)% . 968, 830८५" 963) । सुधारात्मक उपाय ($7/४॥055090९ १९७५07९5) दलितों की सामाजिक प्रस्थिति से असन्तुष्ट होकर अम्बेडकर ने 956 में बौद्धर्म में सामूहिक परिवर्तन के लिए एक मुहिम चलाई। 95 में उन्होंने दलितों की ग्रजनैतिक शाखा संगठित की जो रिपब्लिकन पार्यी (7७७ए७॥८०० 2४/9) के नाम से जानी जाती है। दलितों के ईसाई धर्म में परिवर्तत के भी अनेक मामले हैं। धर्म परिवर्तन के बाद क्योंकि अनुसूचित जातियों को सरकार द्वाए प्राप्त होने वाले लाभ बन्द रो गए, रिपब्लिकन पार्टी ने 3964 में नवनबौद्धों (४८०-8०००॥४६७) दलितों को विशेषाधिकार पुन दिलाने के लिए आन्दोलन चलाया। गान्यी जी ने हरिजन कल्याण का बीडा 924 में उठाया था। 922 में बनाये गये रचनात्मक कार्य के बारदोली कार्यक्रम में हरिजनों कौ सामाजिक निर्योग्यताओं को दूर करने के लिए हरिजन सेवक संघ का सगठन किया गया। रतत्ता प्राप्ति के पश्चात भारत के सविधान मे अनुसूचित जातिर्सों और जनजातियों को संरक्षण का प्रावधान किया। उठाए गए महत्त्वपूर्ण कदम यह हैं , () अस्पृश्यता निवारण (0) सामाजिक अन्याय और विविष प्रकार के शोषभों से सुरक्षा (0) सार्वजनिक प्रकृत्रि के पार्मिक संस्थानों को उनके लिए खोलना 60) कुंओं, दालाबों, दुकानों, रेस्टोरेन्ट तथा सडकों आदि तक उनकी पहुंच पर श्रतिबन्धों को समाप्त करना (४) उन्हें मुक्त रूप से घूमने तथा सम्पत्ति रखने का अधिकार देना, (७) उन्हें शिक्षा सस्थाओं में प्रवेश का अधिकार देना तथा राज्य कोष से सहायता प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करना, (५) गज्य सरकारों को सरकारी नौकरियों में उन्हें आरक्षण देने कौ अनुमति (५४) लोक सभा व विधान म्रभाओं में उन्हें विशेष प्रतिनिधित्व प्रदान कसा, (5) उनके हितों की रक्षा कस्ना था उनके कल्याण को प्रोत्साहन करने के लिए पृथक विशभाण दया मलाहकार समितियां स्थापित करना, (४) बलात्‌ मजदूरी पर प्रतिबन्ध, और (0) अनुसूचित क्षेत्रों के नियत्रण और प्रशासन के लिए विशेष प्रावधान करा । अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निगेधक) अधिनियम, 980 में निम्नलिखित दण्डनीय अपगघ बर्षित हैं . ब्व अतुयूचित जातियाँ, अस्पृरयवा और पिछड़ा वर्ग () किसी एससी/एमटी ($लाटव॥26 ८३५(६/$टा८तए८१ 07००) व्यक्ति को घृणित पदार्थ खाने को बाध्य करना। (2) एससी/एसटी व्यक्ति के घर में या पडौस में कूडा करकट, मृत पशु, आदि फैंकना जिससे उसका अपमान हो या हानि हो या वह क्रोधित हो जाये। 6) एससी/एसट्री व्यक्ति के शरीर से बलातू वस्त्र उतारना और उसे नग्न कला या उसका मुँह काला करके उसके सार्वजनिक स्थानों पर घुमाना। (४) एससी/एसटी व्यक्ति के स्वामित्व वाली भूमि या उसे आवंटित भूमि पर बलात कब्जा करना या उस पर खेती करना। () किसी एससी/एसटी व्यक्ति की भूमि/सम्पत्ति हडपना। 6) एससी/एसटो व्यक्ति को बेगार के लिए बाध्य करना या बन्धुआ मजदूर के खूप में उसका प्रयोग करना। (0). एससी/एसटी व्यक्ति को मताधिकार से रोकना या विशेष व्यक्ति को वोट देने के लिए बाध्य करना। (9) 2 व्यक्ति के विरुद्ध कोई भी ऐसा कार्य करना जो कष्टकारी या दण्डनीय । ७) एस्सी/एसटी व्यक्ति को अपमानित करना। (0) एससी/एसटी महिला को सताना। (0) एससी/एस टी महिला का यौन उत्पीडन। (2) एससी/एसटी व्यक्ति के प्रयोग वाले पीने के पानी को दूषित करना। (03) एससी/एसट्ी व्यक्ति को उसका घर, पडौस, या गाँव छोडने के लिए बाध्य कला। अनुसूचित जातियों के हों की रक्षार्थ एक व्यवस्था तत्र का सृजन एस सो/एसट्ी के लिए आयुक्त का पद सृजित करके तथा हाल ही में एससी और एसटी के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना द्वारा किया गया है। यह आयोग एससी और एसटी के विकास से सम्बन्धित मामलों व नीतियों पर सलाहकार समिति के रूप में कार्य करता है। अनुसूचित जातियों (और एस.टी व ओ बी सो) के कल्याण की देखभाल करने के लिए राज्य साकायें के पृथक विभाग हैं। इन लोगों के कल्याण कार्यों को प्रोत्साहित करने में अनेक स्वैच्छिक संगठन भी लगे हैं। अखिल भारतीय स्तर पर कार्यरत कुछ सगठन इस प्रकार हैं हरिजन सेवक सघ, हिन्दू स्वच्छकार सेवक सघ, नई दिल्लो। पचवर्षीय योजनाओं में एससी (और एसी) व्यक्तियों के कल्याण पर व्यय की जाने वाली धनराशि पर विशेष ध्यान दिया जाता है। विशेष कार्यक्रमों पर निवेश का आकार प्रथम योजना से नवी योजना तक बढा है। क्या इन सभी उपायों ने अनुसूचित जातियों के व्यक्तियों के उत्थान में योगदान दिया है ? ऐसा प्रदीव होता है कि सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से उनकी प्रस््थिति में थोडा ही सुधार हुआ है। सामाजिक दृष्टि से उन्होंने अपने अनेक बुरे रीति-रिवाज नहीं बदले हैं और उनकी स्थिति वहीं है, आर्थिक दृष्टि से 30 प्रतिशत से भी अधिक दलित गगैबी रेखा से नीचे रहते हैं और उनकी व्यावसायिक गतिशीलता उन्हें सामाजिक गतिशीलता को ओर नही ले जादी, शैक्षिक दृष्टि से वे अत्यन्त पिछडे हुए हैं, राजनैतिक दृष्टि से वे संगठित नही अनुसूचित जातियाँ, असृश्यता और पिछड़ वर्ग बड़ हैं और अपने अधिकारों को प्रकट करने के लिए स्थानोय शक्ति सरचना में वे बहुत कमजोर हैं। उनका अप्तन्दोष इस द्य से स्पष्ट है कि विश्व मानव अधिकार दिवस पर दिसम्बर १998 में उन्होंने दलित मानव अधिकार दिवस के रूप गें राष्ट्रीय आन्दोलन प्रारम्भ किया। इस आन्दोलन में तीन तथ्यों पर बल दिया गया था : स्पर्श करने व किए जाने का अधिकार, मंव-सहसाब्दि में अस्पृश्यता को अलविदा और जाति व्यवस्था की समाप्ति। आन्दोलन में एससी/एसटी (अत्याचार निरोधक) अधिनियम और अन्य नियमों के क्रियान्वयन, राष्ट्रीय एससो/एसटी आयोग को अधिनियम के क्रियान्वयन के उत्तरदायित्व को सचालित करने की जिम्मेदारी सौंपना, पचायत्री राज तथा अम्य संस्थाओं में सभी दलितों की भागीदारी को पूर्ण सरक्षण प्रदान करना, दलितों से ली गई समस्त भूमि को उन्हें वापस करना, और उनके भत व धर्म के भेदभाव के बिना उन्हें एससी समझा जाना (व बौद्धों और ईसाई परिवर्वितों सहित), आदि माँग रखी गई थी। चर्तमान प्रत्थिति (?7९5९॥ 5905) स्तरीकरण बद्ध जाति व्यवस्था में दलितों की दशा में कितना सुधार हुआ है ? यह कहा जाता है कि यद्यपि दलित परिवारों और व्यक्तियों में ऊध्वे सामाजिक गतिशीलता की कुछ प्रवृत्तिया दिखाई देतो हैं और कुछ दलित उच्च प्रशासनिक पर्दों पर आसीन भी हैं, फिर भी मोटे तौर पर दलितों मे प्रथम पांच दशकों में कम प्रगति दशोई है। इन लोगों के लिए बनाई गई अनेक कल्याणकारी योजनाओं के विषय में सास्कारिक औपचारिकता (प08॥&00 छि8508) है। वित्तीय प्रोत्माहनों और शैक्षिक आरक्षणों ने इन जातियों को बहुत कम वास्तविक लाभ पहुचाया है। 99] में देश की कुल जनसख्या के 6 48 प्रतिशत शक्ति के साथ तथा 5 प्रतिशत आरक्षण के सहित, सेवाओं में उनके लिए सुरक्षित स्थानों का लाभ दलित नहीं उठा सके हैं। यदि हम एसमौ/एस टो आयुक्त की रिपोर्ट तथा हाल ही में बने एससी और एसटी के राष्ट्रीय आयोग, जो साकारो कार्यालर्यों एवं सार्वजनिक सस्थानों की नीतियों के क्रियान्दयन का सयालन करता है, की रिपोर्ट तथा एकत्रित आकडों पर निर्भर करें, तो हम देखेंगे कि इनके लिए केद्धीय सरकारी विभागों, सार्वजनिक स्थानों और राष्ट्रीकृत बैक में 993 में आरक्षण समूह 'ए' के पदों के लिए 7 से 40 प्रतिशत, समूह 'बी' पदों के लिए 9 से 4 प्रतिशव, समूह 'सी' के लिए 3 से 9 प्रतिशत तथा 'डी' समूह के पदों के लिए 2 से 23 प्रविशव था देखें, छथाह्ु३४०, 5. ग्राएं शैशव३३ उग्यागें, “यण्णा० फफल्राधधा्षाणा 20 9 2णृण्ला। त॑ 5057 कर खबदा उतार ली 2776 46/ाआाब्रा०व, उ9-5०७ - 4998, ४ण >. 7५_ 3४० 3, 55) यद्यपि 955 से आगे निसन्देह सभो श्रेणियों के पदों में एससी सदस्यों को पर्तों को स्थिति में मुघार हुआ है लेकिन 'ए' और “बी' के पदों में सन्तोषजनक प्रगति नहीं हुई है, जबकि समूह 'डी' में कुल पद निर्धारित मात्रा से भी आगे निकल गये है और समूह 'सी' में वे निर्धारित मात्रा में निकट हैं (5 प्रतिशत)। 'ए' और “बी' समूह के सभी पदों की पूर्ण तिर्धारित मात्रा इसलिए नहीं भरी जा सकी क्योंकि येय (८॥७05) प्रत्याशी उपलब्ध नहीं होते। केद्ध व राज्य सरकारों के आधीन विधिल पर्दों के लिए आवेदन करने की योग्यता के लिए कुछ आधाए्पूव शैक्षिक बर6 अनुसूचित जातियाँ, अस्पूर्यवा और फिछटड्ा वर्ग योग्यता आवश्यक होती है। 99 में एससी पुरुषों की साक्षरवा दर 499 प्रतिशत, सियों में 23 76 प्रतिशत, और कुल 374 प्रतिशत थी (इसके विपरीत एसट्टी में क्रमश 4065, 8 39, और 296 प्रतिशत तथा सामान्य जनसख्या में यह दर क्रमश 64 3, 39.29 और 5227 प्रतिशत थी)। जब एससी प्रत्याशियों के पास आवश्यक मूल योग्यता नही होती और आरक्षण सुविधा का लाभ उठाने के लिए योग्य नही होते, तो समूह 'ए' और “बी' के पदों में उनके प्रतिनिधित्व की ऊंची दर की अपेक्षा करना तर्क सगठ नहीं है। विभिन चयन समितिया के सदस्यों के दर्ग पक्षपात की शिकायत करना भी समान रूप से हास्यास्पद है। नौकरियों में दलितों में से उच्च पदों की अपेक्षा गैर दकनौकी ठथा निम्न प्दों को भरना सरल ४४४२९७ है। सामाजिक विधानों का भी उनकी अयोग्यताओं को दूर करने में कम प्रभाव चडा है। अब प्रश्न उठते हैं क्‍या दलितों की अभी भी उपेक्षा हो रही या उन्हें अभी भी सताया जा रहा है ? क्‍या उनके लिए आरक्षण जारी रहना चाहिए ? उनकी शिक्षा वा ही उदाहरण लें । प्राथमिक, माध्यमिक तथा हाई स्कूल तक दलितों का नामांकन (&॥्णाग८०) लगभग ॥5 प्रतिशत है तथा उच्च माध्यमिक, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर लगभग 8 प्रतिशत है। शिक्षा में उनकी कृति निम्न स्तर की है। हाई स्कूल स्तर पर दलितों का पास औसत 53 प्रतिशत है। (इसके विपरीत सामान्य पास औसत 65 प्रतिशत है), स्नातक स्तर पर 35 प्रतिशत (इसके विपरीत सामान्य पास औसत 57 प्रतिशत है), और स्नातकोत्तर स्तर पर 60 प्रतिशत है (इसके विपरीत सामान्य उत्तीर्ण प्रतिशत 76 है)। व्यावसायिक (77०८६४०7०)) पाठ्यक्रमों में उनका प्रतिशत लगभग 35 है (इसके विपरीत सामान्य प्रतिशत 60 है)। उनको शिक्षा की निम्न गुणवत्ता व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश परीक्षा में उनके कार्य से स्पष्ट है। कुछ राज्यों में इतने कम दलित प्रत्याशी योग्य हो पाते हैं कि निम्नतम योग्यता अक भी नीचे रह जाते हैं। मध्य प्रदेश में 995 में दलित छात्र 6 प्रतिशत अक होने पर भी भर्ती किए गए (निर्धारित 35 प्रतिशत अकों के बावजूद)। 7995 में अनुसूचित जाति कोटा मे (स्ववत्रता सेनानी) एक प्रत्याशी जिसने 900 अकों में से 33 अक (अर्थात्‌ 3 66%) प्राप्द किये थे उस का नाम भी प्री-इन्जीनियरिंग छात्रों की योग्यता सूची में आ गया (उ॥6 मक्वंधगदा 7॥॥९5, त00९, 6, 995) । चिकित्मा क्षेत्र में जहा एससी अणी में न्यूनतम अक 48 8 प्रतिशत थे, वही सामान्य वर्ग में 73 प्रतिशत अक प्राप्त प्रत्याशी या तो प्रतीक्षा-सूची में थे या अस्वीकृत कर दिए गए ये (7॥6 कादताबा प्राश्ाट5, उपा० 29, 995)।॥ अस्पृश्यता इसका उन्पूलन एवं दलित घेतना (एच्रण्एक्ताब्शा।ए ; ॥05 ड्ग्रतास्थाण शात ऐशाह (0णाउलंणाइत्रट55) दलिव ([2205) भारत में अस्पृश्यता का बहुत पुराना इतिहास है, यद्यपि इसका जन्म और प्रचलन अस्पष्ट और अज्ञाव है। 930 के दशक के प्रारम्भ तक अवपीडित वर्ग (66097९६६८० ८855३), जैसा उस समय उन्हें जाना जाता था, की अधिकाशत (6७ 5) परिभाषा अशुद्धा अनुसूचित जातियों, अद्यूृश्यदा और प्रिछडा वर्ग ११५ (7०॥॥॥०७) की धार्मिक अवधारणा के अर्थ में थो। दलिव वर्ग को इस प्रकार परिभाषित किया गया था; *वे हिन्दू जातियाँ जिनके मम्पर्क में आने पर उच्च जाति के हिन्दुओं को शुद्धीकरण करना पड़े”, (.0)90 ]00ज्राप॥, "४०४८१००९ (४७० ए0ए/दढ” व शणीव # ाला३०, गाल एा०्प्रयाध्0ॉ०5 2 (०ाकफ०ए किवाब, 998- ॥7) | 793 की जनणणना में जनगणना आयुक्त हड्न (7 छ.प्तएाणा) ने दलित वर्षों की पहचान के लिए अनेक आधार सिद्धानों का प्रयोग किया। इनमें से एक विशेष आघार था कि क्‍या दलित जाति के लोगों को सडकों, कुँओं, और स्कूलों आदि के प्रयोग पर निषेध था। व्यवहार में यह परीक्षण कम से कम कार्यत्मक सिद्ध हुआ क्योंकि इन लोगों की इस प्रकार की सुविधाओं तक सीमित पहुँच थो। अन्य पशैक्षण धार्मिक व सामाजिक निर्योग्यताओं पर आधाए। थे, इन सिद्धान्तों ने भली प्रकार काम नही किया। अत 936 में अनुसूची लागू करे से पूर्व कुछ समायोजन किए गए। आज अनुसूचित जाति के लोगों की सख्या बहुत ऊंची चली गई है। प्रति 6 भातीयों में एक अनुसूचित जाति का है। प्रमुख पूर्व अस्पृश्य जातिया हैं - चमार, दुसघ, मुसहर, भुल्या, थोबो, पाप्ती, होम, भोगता, हललखोर और परल्यम | तमिलनाडु में पललन और चकिलिस, और अन्य राज्यों में महार, बल्शी, बौरी मेघवाल, राजबन्स मजबीसिक, आदि। इनकी सबसे अधिक सख्या उत्तर प्रदेश में (। प्रतिशत) और उसके बाद पश्चिम बगाल (2%), बिहाए (9%), तमिलनाडु (8%), आन्य.प्रदेश (8%), मध्य प्रदेश (7५७), महारा्र ७6%), और राजस्थान (5.5%) में है (॥/08/ककश 20प्रिट ॥48, 2७ एशगश। 998 35) । इस प्रकार, इन लोगों को लगभग दी तिहाई सख्या 6 राज्यों में केन्द्रित है। उनमें से लगभग 84% गायों में रहते हैं और कृपक, बटाईदार, सीमान्त किसान और कृषि मजदूर हैं। लगभग 42% श्रमिकों की श्रेणी में आते हैं ! कुल श्रमिकों में से केवल 4 प्रतिशव मैला ढोने का कार्य करते हैं, शेष जुलाहे (2%), मछुआरे (85%), कच्ची शरात्र निर्माता (7%), येकती और स्स्े बनाने वाले (55), धोबी (5%), काग्रैगर (%), मोची (%£), आदि का कार्य करते ३। यध्पि हमोरे संविधान ने और अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 955 ने अस्पृश्यता को अवैधानिक घोषिद कर दिया है, फिए भी क्योंकि हिन्दू अभी भी शुद्धव और अशुद्धता की चिन्ता में पड़े रहते हैं, इसलिए अश्यृश्यवा देश के सामाजिक और थार्मिक जीवन में से पूर्णरूपेण समाप्त नहीं हुई है। अत अस्पृश्यवा को दो सदर्भ में देखा जा सकता है. (0) उसे कलक (४७१७७) की दृष्टि से जिसके आधार पर कुछ लोगों पर आरोप होता है कि वे ससस्‍्कार सबधी अपवित्रता प्रसारित करते हैं, और () उस आवरण की दृष्टि जिस के आधार प्र माना जाता है कि अस्पृश्यता की अशुद्धता से समाज को बचाना है। दलितों का पतन (एलए्०809 ण ऐजआआ७) अस्ृश्यों को सामाजिक कलक इस सीमा तक माना जाता है कि उन्हें मन्दिरों में प्रवेश से रेका जाता है, ब्राह्मणों की सेवाओं से वचित रखा जाता है, और उच्च जातियों द्वार उन्हें हेय माना जाता है। वे अशुद्ध जन्महे हैं और अशुद्ध ही जोवन भी जोते हैं। समाज शुद्धता के विषय में इतना चिन्तिव रहता है कि ये अस्पृश्यों को स्थाई रूप से आर्थिक, सामाजिक और ब8 अनुसूचित जातियाँ, अस्पृश्यता और पिछड वा राजनैतिक आधीनता में ही रखते हैं। कलक, जो जाति के अनुसार जन्मजात होता है, जीवन पर्यन्‍्त चलता रहता है और किसी सस्कार द्वार समाप्त नहीं होता। व्यवहार के सम्बन्ध में परिभाषित किए जाने पर अस्पृश्यता उन प्रचलनों का स्वरूप है जो शेष समाज के द्वाग अस्पृश्यों से होने वाली अशुद्धता से स्वय को बचाने के लिए अपनाए जाते हैं। परन्तु धार्मिक अशुद्धता का यह चिन्तन अस्पृश्यों कौ भूमिका तक सीमित नही है बल्कि इस विचार ने उें शारीरिक पृथकता के द्वार आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से निम्न स्थिति में रखा है। समान्यद यह विश्वास किया जाता है कि अस्पृश्य समूह यह समझने लगे हैं कि उनको समस्या केवल अभावी राजनैतिक कार्यवाही से ही हल हो सकती है। हाल ही में ससद, विधान सभाओं, विभिन्‍न सेवाओं, शैक्षिक सस्थाओं में पर्दों के आरक्षण तथा सरकार द्वारा प्रदत्त अ्य विशेषाधिकारों के कारण, निम्न सास्कारिक प्रस्थिति के व्यक्ति के पास उच्च आर्थिक व राजनैतिक प्रस्थिति प्राप्त करने के अच्छे आसार हैं लेकिन उच्च सामाजिक प्रस्थिति एक व्यक्तिगत मामला बन जाता है। एलपी विद्यार्थी और सच्चीदानन्द जैसे समाजशास्लियों ने दलितों के सामाजिक परिवर्तन को उनकी जातिगत नि्योग्यताओं, उनके शैक्षिक प्रयरों, नवाचारों की स्वीकृति, राजनैतिक चेतना, आधुनिक मूल्यों के आन्तरीकरण, स्तियों की स्थिति, उनके नेतृत्व, दलित आन्दोलनों, आदि के सन्दर्भ में अध्ययन करने का प्रयास किया है। यद्यपि अनेक दलितों ने जाति आधारित परम्पणगत पेशों को त्याग दिया है लेकिन अभी भी काफो सख्या में वे गन्दे पेशों में लगे हुए हैं। गन्दे पेशों से परिवर्तन तथा विविधता मे न केवल अस्पृश्यया का कलक समाप्त कर दिया है बल्कि अनेक लोगों को वर्ग शतिशीलता में उठने के योग्य बनाया है। कुछ तो भूमि व मकान आदि सम्पत्ति के मातिक हैं। वे सरकार द्वार अनुसूचित जातियों को प्रदत्त अनेक आर्थिक लाषों को ले रहे हैं। प्रस्थिति सम्बन्धी निर्योग्यताए अब अधिकतर गाँवों तक ही सीमित हैं। सार्वजनिक 38 व मन्दिरों के प्रयोग के मामलों में भेदभाव अब इतने अधिक नही हैं जितने पहले थे। में उच्च पदों पर आसीन लोगों को सामाजिक अस्तर्व्यवहार में निर्योग्यता कम आडे आती है। अब व्यक्ति की राजनैतिक आर्थिक स्थिति तथा उसकी सामाजिक स्थिति के बीच एक प्रत्यक्ष सम्बन्ध नजर आता है। परन्तु कुछ मामलों में उनकी प्रदत्त (35८४७८०) अस्थिति उनकी अर्जित अस्थिति से अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध होती है, जैसे विवाह के मामले में। चिकित्सा, अभियात्रिकी, प्रशासन, प्रबन्धन, उच्च शिक्षा, न्याय और विधि, आदि आपुर्निक पेशों में हरिजनों के प्रवेश से उनके सहयोगी गुप्त रूप से ईर्ष्या करते हैं। ऐसा कुछ वो रूढिगत घृणा के कारण है और कुछ उनके पक्ष में किए जाने वाले सरक्षात्मक भेदभाव के कारण उत्पन ईर्ष्या और स्पर्धा के कारण। सच्चोदानन्द द्वाय बिहार में किये गये एक अध्ययन में (॥८ प80]बआा 8॥0०) अभिजात वर्ग ने भी इस प्रकार की ईर्ष्या की ओर सकेद फिणा है) एक बडी सख्या में हरिजन जन्मजात हीनता म्न्थि (फष्धिणा ८णाए़ाण् से पीड़ित होते हैं जो प्रत्येक ऐसे व्यवहार के प्रति सवेददशील बा देती है जो उनके विचार मे प्रेदभाव रजित हो। इसका अर्थ यह नही है कि ऐसा आरोपित भेदभाव सदैव किया जाता और आरोप सही है। हरिजनों को गतिहीनता को भी स्थान दिया है। यह ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में प्रव्रजन से, शिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं में प्रवेश, तथा राजनीति में प्रवेश मे अतुसूबित जातियों, अस्पृस्यता और पिछड़ा वर्ग १9 सम्भव हुआ है। यह इस बात का सकेत है कि किस प्रकार दलितों तथा अन्य लोगों के बीच की सरचतात्यक दूरी कम हुई है। सुधारात्यक उपाय (&फ़्शा0१०0५९ |९०६ए७६) सुधा दलितों में तीन ओर (४५८४७८७ से परिवर्तन आए हैं « 0) अस्पृश्य समूहों के सम्बन्ध में राज्य की नौति (2) समय-समय पर सुधार आन्दोलन, 6) संस्कृतिकरण और परश्चिमीकरण की प्रक्रिा! इन अधिकार विहीन समूहों को दशा में सुधाए की ओर स्वतत्रता के बाद ही संविधान निर्माताओं का घ्यान गया। रक्षाम्मरक भेदभाव (छ0(८०१४८ 05८यप्राभााक०7) उने तीन बरीकों में से एक है जिनके आधार पर सरकार दलितों को समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास करतो हैं| प्रथम, अनेक ऐसे संवैधानिक और अन्य कानूनी प्रावधान हैं जो अस्पृर्श्यों के प्रति भेदभाव समाप्त करते हैं और उन्हें अन्य नागरिकों के समान हो अधिकार प्रदान करे हैं। द्वितोय, कुछ लाभ क्रेवल पुर सूचित जाति के लोगों को ही उनके योप्य (०७४४७४०) बनाते हैं तथा अन्य लोगों को नहीं, जैसे, छात्रवृत्तिया, ऋण, एवं अनुदान, आदि। कुछ प्रमाण पत्रों को उन्हें प्रदान करना, जो उन्हें अनुसूचित श्रेणी का बताते है, उन्हें लाभों के प्राप्त करने योग्य तो बनाते है लेकिन गैर सदस्य उन लामों के लिए योग्य मही रहते। इस सरक्षात्मक विशेषता के कारण इस व्यवस्था को 'रक्षात्मक भेदभाव' कहा जाता है। हरिजनों के कल्याण एवं उत्थान से सम्बद्ध कुछ संवैधानिक प्रावधान थे जैप्ले, सार्वजनिक स्थानों (दुकानों, रेस्ट्रों, कुंओं, स्नान घाटों, सडकों आदि पर जाने से सम्बन्धित निर्योग्यताओं को समाप्ति, शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश की अस्वीकृति का निषेध, उनके लिए हिन्दू धार्मिक स्थलों में अ्रवेश कौ अनुमत्रि दिया जाना, उनके कल्याण के लिए सलाहकार समितियों का गठन, ससद व राज्य विधानिकाओं में विशेष प्रतिनिधित्व तथा सार्वजनिक सेवाओं में आए्षण, आदि । 955 के अस्पृश्यता अधिनियम में इन संवैधानिक प्रावधानों के उल्लधन पर दण्ड का प्रावधान क्रिया गया) दलितों के कल्याण के लिए चलाई गई केद्र द्वारा प्रायोजित कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं इस प्रकार हैं : विभिन प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं (0 $, 75) आदि के लिए कोचिंग एवं अशिक्षण देना, उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता, दलितों की ममस्याओं पर अनुसन्धान के लिए सस्याओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना, पचरवर्षीय गोजनाओं पें विकास के विशेष कार्यक्रम सम्मिलित करना, और सेवाओं तथा शैक्षिक सस्थाओं में आरक्षण प्रदान करना | अस्पृश्यता मूल्याकन के लिए 7965 में भारत सरकार द्वाय एक समिति नियुक्त को गईं। अनेक समाजशालियों (छड्माछव एज (955), 245 छधव्या (952), सैञञण0 [5३८६ (94), ##कर छलला८ट._ (7966), प्रकट (968), २३०छफजाप्रा5 (9%68), 5४0४४७० (॥972), राताबदा वश (792), ॥ए5०७ (96), .7 ए6,जआफं (१977), करत 520लए850300७ (१976)) द्वाए किए गए अध्ययन अस्मृश्यों के पक्ष में कुछ परिवर्तन दर्शाते हैं। अस्पृ्श्यों के शोषण को आध्थिक व सामाजिक विशेषता के कारण सामाजिक असमानता की स्थिति यद्यपि अब उस सीमा तक नहीं रहो जितनी आजादी से पूर्व थी, फिर भी अध्पृश्यता समाप्त गहों हो सको है। 97-72 0 अनुसूचित जातियाँ, अत्यृश्यता और परिछ्डा वा में बिहार में हरिजन अभिजात वर्ग का सच्चौदानन्द द्वारा किया गया अध्ययन भी दर्शाठ है कि यद्यपि आर्थिक क्षेत्र में उनकी स्थिति में सुधार आया है किन्तु उनके संस्कारों, सामाजिक व राजनैतिक क्षेत्र में नही। हस्जिनों की निर्योग्यताओं को समाप्त करने की दिशा में महात्मा फूले, नरसिंह मेहा, आदि सन्तों और समाज सुधारकों द्वारा बीसवी शताब्दी के तीसरे दशक में किये गऐ प्रयल भी इस विषय में रुचि को स्पष्ट करते हैं जिन्होंने उनकी दुर्दशा पर ध्यान दिया था। गान्यौ जी ने तीसो दशक में उनकी दशा सुधारने और अस्पृश्यता उन्मूलन में गहरी रुचि प्रकट वो थी। 932 में उन्होंने अस्पृश्यों के लिए पृथक चुनाव प्रक्रिया की मांग करे हुए बी आर अम्बेडकर का विरोध किया और यह तर्क देते हुए भूख हडताल की कि पृथक चुनाव प्रक्रिया उन्हें शूद्र जनसख्या में विलय के लिए प्रेरित करने की अपेक्षा अस्पृश्यों की श्रेणी को अनवरत बनाने में सहयोग करेगी। उन्होंने जाति हिन्दुओं और अस्पृश्यों के बीच सघर्षों वी आशका व्यक्त की। अम्बेडकर गान्यी जी के प्रभाव में आ गए और उन्होंने अस्पृशयों के लिए ससद में अत्यधिक सख्या में स्थानों के आरक्षण (कुल जनसख्या का 2.5%) की शा पर पृथक चुनाव की माँग को त्याग दिया। इस प्रकार उन्होंने पूना समझौते पर हस्ताक्षर के ब्रिटिश सरकार को यह विचार त्यागने के लिए मजबूर कर दिया। तब उन्होंने सम्पूर्ण देश का प्रमण किया और अस्पृश्यता छोडने पर बल दिया। सरकारी कार्यक्रमों और नौतियों से परिवर्तन लाने के प्रयलों के साथ ही इन लोगों के स्वय के प्रयलों से भी अस्पृश्यों को दशा में सुधार हुआ है। अस्पृश्यों में क्रान्तकारी विचाएें को अकुस्ति करने में धर्म ने भी प्रमुख भूमिका का निर्वाह किया है और ऐसे परिवर्तन के समर्थन तथा सगठन के लिए एक प्रतिदर्श प्रदान किया है। इस प्रकार का सबसे प्रभावी आन्दोलन अछूतों का बौद्ध धर्म में परिवर्तन है। यह एक ऐसी घटना है जिसका अनुपाा भास्त को जनगणना में परिलक्षित होता है जिसके अनुसार 95 में ,8,000 बौद्ध, /%! में 32 लाख, तथा 98। में 47 लाख बौद्ध आलेखों में है। अकेले महाराष्ट्र में हो यह बह जाता है कि 956 में बी आर अम्बेडकर के नेतृत्व में 3: लाख हस्जिन बौद्ध पर्म परिवर्तित हुए। अम्बेडकर ने स्वयं 4 अक्टूबर, 956 को नागपुर में बौद्ध धर्म को दक्ष ग्रहण की। अम्बेडकर का विचार था कि हिन्दुत्व से अलग होकर ही हरिजन अशुद्धता और अस्पृश्यता के अभिशाप से मुक्त हो सकते हैं। कुछ हरिजन ईसाई घर्म में भी परिवर्तित हुए, विशेष रूप से दक्षिण भारत में उलीसवीं शताब्दि के अन्तिम अर्द्ध शतक में। पूत्‌ क्रिश्वयन (एज (9मं#7809) केंए्ल निम्न-जातीय ईसाई हैं। सौरियन (५५730) ईसाई, जो स्वय उच्च जातियों से परिवर्तित हुए थे, के साथ व्यवहार में परहेज के हैं। एक अस्पृश्य जाति पुलायास (एण७») परिवर्तित ईसाई, केरल को सौरियन ईसाई चर्च में एकीकृद हो गए हैं। मध्य पेश में संदनामी आन्दोलन धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक आन्दोलन था। छत्तोसगढ क्षेत्र में ओ हरिजन सतनामी पन्थ में शामिल हो गए जो जातिभेद बिना मनुष्यों की समानता और सभी “सतनाम' में आस्था रखते थे। इस पन्य में हिन्दू देवी देवताओं की चूजा करना निषेध थी तथा शराब और तम्बाकू के सेवन तथा माँस के उपभोग का भी निषेध था। अबुयूचित जातियों, अस्पृरयता और पिछड़ा वर्ग हा गआपीण भारत में दलित (05 9 रिणण िवांशे ग्रामीण भार में दलित आधिक दृष्टि तथा हिन्दू समाज के गैर-हरिजन सदस्यों को दृष्टि दोनों से ही 'सीमाल (ए्थष्ठाएण) समूह' के रूप में है। ग्रामीण समाज में दलितों की दो अमुख विशेषताए हैं - () अधिकतर दलितों के पास न तो भूमि का स्वामित्व होता है और न ही वे आस्तामी (टाशाओ ही होते हैं (0) अधिकतए दलित पा तो दूसें को भूमि पर काम करके या कृषकों की भूमि से स्वयं को जोडकर अपनी आय अर्जित कत्ते हैं। दलित श्रमिकों का रोजगार कृषि उत्पादन और पारिश्रमिक भुगतान से निश्चित होता है। फसल काटने के समय उनकी माँग अधिक होती है। श्रमिकों की माग हब बढती है जब कृषि योग्य भूमि अधिक हो, सिंचाई अधिक हो, खाद अधिक हो, और पूँजी भी अधिक हो। ट्रेक्टर आदि आधुनिक यत्र कुशल श्रमिकों की माँग दो बढा देते है लेकिन आवश्यक व्यक्तियों की संख्या में कप्री हो जाती है। नियोजकों (भूस्वामियों) को दलितों और गैर दलितों दोनों में से हो श्रमिक उपलब्ध होते हैं| इस प्रकार मजदूर समजाति (४०४॥०४८४९८०७७) समूह के रूप में नहों है। गैर दलितों को सदा वरीयदा दी जाती है क्योंकि उन्हें अधिक परिअ्रमी माना जाता है। इस्त कारण परामीण क्षेत्रों में दलितों को 'सीमान्त' कहा जाता है। दलित चेतना (09॥6 ((णा5लं०ाञ्ालइ5) बड़ा प्रश्न यह है कि क्‍या दलित समाज की मुख्य धारा में समाहित हो सकेंगे ? युरों की दासता बेडियों को तभी समाप्त किया जा सकता है जब दलित स्वय को शिक्षित और कुशल बना लें और आधुनिक समाज में प्रभावी दग से स्पर्धा करें। मात्र कानून बनाने से उनकी निर्योग्यताए समाप्त नहीं होंगो। ससाथनों को ग्राप्त करने के लिए उनके स्वय के प्रयासों के साथ हो हिन्दुओं की अभिवृत्तियों में परिवर्तन भी अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए आवश्यक है। हम सच्चोदानन्द से सहमत हैं (976 72) जिसकी मान्यता है कि सरकार के सुधारात्मक प्रथलों, दलियों की बढदी चेतना, और हिन्दुओं के उदाए दृष्टिकोण जैसे कारकों के सामजस्य से समय के साथ-साथ उनकी निर्योग्यताए एवं भेदभाव समाप्त हो जायेंगे। राजनैतिक दृष्टि से दलित इस तथ्य को समझने लगे हैं कि राजनैतिक सदर्भ में उन्हें अपनी अधिक सख्या का लाभ उठाना है। हो सकता है कि वे राजनैतिक दल के रूप में एक न हो सकें, लेकिन प्रधुत्व वाली राजनैतिक पार्टियों, जैसे काप्रेस, या जनता दल या भाजपा, आदि का समर्थन कर के वे अपने समर्थन का मूल्य बसूल कर सकते हैं । लेकिन समस्या यह है कि यद्यपि शिक्षित दलित तो रजनीतिकरण का सबूत दर्शावे हैं लेकिन सामान्य दलित उनकी भ्रक्रिया से अभी भी अति हैं। अभिजात वर्ग तो अनुसरण और सहमति की एजनीति से दबाव और विशेध की गजनीति तक आ गए हैं, लेकिन अभी भी वे न तो साप्रान्य मच हो बना सके है और न हो परिवर्तनशोल छवि विकसित कर सके हैं। अय् फिछड़ी छातियाँ और वर्ष [09७ छ500्रथाते (9३७९5 जाएं 0955९६ (09098)] 99! में देश को कुल जनसख्या के 5 प्रतिशत (अस्पृश्यों को छोड़कर) व्यक्ति 3,742 82 अनुसूचिव जातियाँ, अस्पृश्यवा और पिछ्ड वा अन्य पिछडी जातियाँ और वर्ष के सदस्य थे। अगस्त 990 में (वोपी. सिह मत्रिमण्डल जनता दल सरकार द्वारा इन ओबो सी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई थो। यह मण्डल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर किया गया था जो दिसम्बर 980 में सार को सौंपी गई थी और 982 में ससद के दोनों सदनों में चर्चा के बाद परीक्षण के लिए सचिवों की एक समिति को दी गई थी। प्रधानमन््री वीपी सिंह द्वार इसकी सिफारिशों को स्वीकार करने की आकस्मिक घोषणा को अनेक लोगों ने राजनैतिक निर्णय कहां जो कि जातियों के चयन और इसके तौन निदर्शकों (सकेतर्को) (॥00280079) --सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक-के औचित्य और सत्यवा के सत्यापन के बिना ही लिया गया था। सामाजिक और आर्थिक निदर्शक में प्रत्येक के चार आधार माने गए, जबकि शैक्षिक निदर्शक में दीन आधार लिए गए। इस प्रकार कुल मिलाकर । विदर्शक थे। प्रत्येक निदर्शक को दिया जाने वाला महत्व एकतरफा और तर्कहीन ही था। सामाजिक निदर्शर्का को तीन अकों का महत दिया गया, शैक्षिक निदर्शक को दो अरकों का और आर्थिक निदर्शक को एक अक प्रदान किया गया। इस प्रकार कुल मूल्य के 22 अक रखे गए। जिन जातियों ने 50 प्रतिशव अंक प्राप्त किए (अर्थात्‌ । अक या अधिक) उन्हें 'पिछडों' की सूची में रखा गया। राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के मण्डल आयोग की रिपोर्ट के क्रियान्वित करने के निर्णय ने छात्रों में विस्तृत रूप में क्रोध को भडका दिया। समूचे देश में अनवर्त आन्दोलन भड़के उठे | सितम्बर और अक्टूबर, 990 के बीच 60 युवाओं ने सरकार के निर्णय के विरद्ध आत्म हत्या के प्रयास किए। परन्तु किसी भी राजनैतिक पार्टी ने खुलकर आरक्षण का विशेष नहीं किया। 99 में जब नरसिंहराव कौ काग्रेस सरकार ने सत्ता सम्भाली, इसने 25 सितम्ब, 99 को एक अधिसूचना जारी की कि केद्रीय सरकार की नागरिक सेवाओं में जो 27 प्रतिशत सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (5580) के लिए आरक्षित हैं, उममें से इन्ही वर्गों के गरीब खण्ड' को वरीयता (परश८८४८८) दी जायेगी। इसके साथ ही बन आर्थिक रूप से पिछडे वर्गों के लोगों के लिए, जो विद्यमान किसी भी आरक्षण योजना के अन्तर्गत नही आते, 0 प्रतिशत पद आरक्षित होंगे। मण्डल आयोग की रिपोर्ट को क्रियान्वित करने का मामला उच्चतम न्यायालय में ले जाया गया जिसने नवम्बर 992 के अपने निर्णय में पद आरक्षण सूत्र का समर्थन किया और पिछड़े वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत स्थानों के आरक्षण की पुष्टि की | परत न्यायालय ने अन्य आर्थिक रूप से पिछडे वर्गों के लिए 0 प्रतिशत खाली स्थानों को भर्ती के आरक्षण सम्बन्धी नरसिंह राव सरकर के निर्णय को रद्द कर दिया! उच्चतम न्यायालय निर्णय के प्रमुख बिन्दु थे () आरक्षण के लाभार्थियों की पहचान के लिए जाति को आधार मानना स्वीकार किया गया। 0) आरक्षणों की उच्च सीमा 50 प्रतिशत निश्चित कर दी गई। 8) सम्पल स्तर (८ा६०ण9५ ॥99) को आरक्षण की परिधि से हटा दिया गया। (0) वें आवैधिक (।८०४०॥८४) पर्दों में आरक्षण की सलाह नही दी गई। 6) प्रोलति में आरक्षण नहीं रखा गया। (6) केन्र सरकार पिछड़े वर्गों में से सामाजिक रूप से अग्रिम लोगों वो निकालने के लिए सामाजिक-आर्थिक आधार को विशेष रूप से बताएँ। (7) केद्ध व गज सरकारें पिछड़े वर्गों की सूची में सम्मिलित किए जाने के निवेदनों दथा अधिक सम्मिलित गा अुुययूचिव जावियों, अस्पृश्यवा और पिछडा वर्ग 83 कम सम्मिलित करने की शिकायतों कौ जाच करने के लिए स्थाई आयोग की स्थापना करे। मण्डल आयोग की सिफारिशों के पक्ष व विपक्ष में दोनों प्रकार के तर्क इस प्रकार हैं। पक्ष भे तर्क है () थे समाज के उन पिछड़े वर्गों का उत्थान करेगी मे सन्तुष्ट करेंगी जो अस्नुष्ट थे और युगों से अन्याय सहन कर रहे थे! (2) केन्द्र सरकार को सेवाओ में आरक्षण देश को कुल जनसख्या के 0 प्रतिशत होना था, इसलिए आरक्षण अधिकतर लोगों पर विपरीत प्रभाव नहीं डालेगा। (3) आरक्षण केवल जातियों पर आधारित नहीं है जेसा कि गलत रूप से समझा जाता है, जैसे बिहार में राजपूत सूची में नही है लेकिम गुजरात में राजपूत सूची में सम्मिलित हैं, उत्तर प्रदेश और बिहाए के यादव सूची में शामिल हैं जबकि हरियाणा के यादव नही हैं, गुजगत के पटेल सम्मिलित नही है जबकि बिहार के पटेल सूची में शामिल हैं। इस प्रकार विविध राज्यों में विशेष जाति की स्थिति आरक्षण का आधार है। ६) 52 प्रतिशत शक्ति के साथ राष्ट्र की पिछडे वर्गों कौ सख्या का सार्वजनिक क्षेत्र व सरकारी प्रथम श्रेणी की नौकरियों में केवल 4 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है। यह कमजोर वर्गों के साथ सशसा अन्याय है और इसका समाधान आवश्यक है। 65) यह तर्क कि इन लोगों को प्रशासनिक पदों को देना अकुशलता बढाएगा भ्रमात्मक है | ब्रिटिश लोगों ने भी इस तर्क के आधार पर भारतीयों को स्वतत्र करना अस्वीकार कर दिया था और उस समय हमने इस तर्क को ठुकरा दिया था, वही तर्क हम अब कैसे स्वीकार कं ? पिछडे समूहों को इस प्रकार के ठोस अवसर अनुभव भ्रदान करेंगे और उन्हें योग्य बनने का मौका देंगे | दलित जावियों और वर्गों की योग्यता अनित करने के स्प्ान अवसरों को नकारना कुछ नहीं है बल्कि उन पर प्रभुत्त जारी रखना है। मण्डल रिपोर्ट के विरुद्ध तर्क है. (0) 'पिछडेपन' को केवल “जाति' के आभार पर परिभाषित किया गया है, इससे जाति व्यवस्था में निहित भेदभाव व जाति पूर्वाप्रहों को बढावा मिलेगा। यह प्रावधान प्भी गदैबों को बिना जाति भेदभाव के मिलना चाहिए और केवल आधिक आधार पर हो होना चाहिए। (2) यद्यपि 'जाति' को परिभाषा को गईं है लेकित 'वर्ग' को नहीं, जबकि समाजशास्त्रोय दृष्टि से जाति ओर वर्ग दो अलग श्रेणिया हैं। प्रण्डल आयोग ने पिछडी' जातियों की तो ठैक से पहचान की किन्तु पिछडे वां की नहीं। (3) पिछडी जातियों की पहचान का आधार तुटिपूर्ण, काल्पनिक और गजनीति प्रेरित था। यह वैज्ञानिक आधार पर नहीं था। उदाहरण के लिए, अल्पायु विवाह का सामाजिक तिदर्शक किप्ती विशेष जाति या वर्ग से सम्बद्ध नही है। यह युर्गों पुरानी साम्राजिक बुराई है जो कि सभी जातियों औए चरणों में सामान्य रूप से प्रचलित है। यही बात अनेक निर्र्शकों के विषयों में कहो जा सकती है, जैसे स्रियों का काम, पिवा कौ शिक्षा, मां बाप की आय, पीने के पानी का स्रोत, आदि। (4) पिछड़ी जातियों को चिन्हित करे में राज्य सरकारें का परामर्श नही लिया गया था। जब मण्डल आयोग ने 3,742 जातियों को पिछडो जातियों के रूप में चिन्हिद किया, कालेकर प्मिति ने पहले, 2000 के लगभण जातियों को पिछड़ी के रूप में चिन्हित किया था। क्या कालेकर समिति की पहचान गलत थी ? इसी प्रकार केरल सरकार में 70 जातियों को पिछड़ी जातियों के रूप में चिन्हित किया जबकि मण्डल आयोग ने 208 जातियों को पिछड़ी जादियोँ चिन्हित किया। उडीसा ने तो एक भी जाति को पिछडा नहीं बताया किन्तु मण्डल आयोग ने राज्य ऐं “०* पिछ्डो जातियों कौ पहदान की । (5) जातियों 84 अनुश्यूचित जातियाँ, अस्यूस्यवा और पिछडा वर्ग कौ जनसख्या अभिव्यक्ति 938 की जनगणना आकड्डों के आधार पर की गई थी। इस प्रकार 7793। और 980 के बीच के परिवर्तनों की गणना नहीं को गई। आजादी बाद भूमि सुधारों ने तो विभिल जातियों के सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक प्रस्थिति को बदल ही दिया है। बिहार और उत्तर प्रदेश के यादव और कुर्मी इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। शहरी जनसख्या का प्रतिशत, जनसख्या का व्यावसायिक वितरण और उच्च शिक्षित लोगों कौ" सख्या वो 93। और 980 तथा 980 और 990 के बीच बहुत अधिक बदल गई थी। अत. जनसख्या आकडों का आधार अयथार्थ था। (6) मण्डल समिति कौ यह मान्यता गलद थी कि गैर हिन्दुओं में ओबीसी का अनुपात उसी क्रम में था जैसा कि हिन्दुओं में। () सामाजिक-शैध्िक क्षेत्र सर्वेक्षण के लिए प्रतिदर्श (89)0/0) प्रक्रिया ब्ुटिपूर्ण था क्योंकि इसमें प्रत्येक जिले में एक शहरी ब्लाक और दो ग्रामीण ब्ला्कों का चयन सम्मिलित था, यह अवैज्ञानिक और अभिनव (७/85८०) प्रतिदर्श है। (8) पिछडेपन के निर्धारण में आर्थिक आधार को दिया जाने वाला महत्त्व अपर्याप्त था क्योंकि 22 अकों में से केवल 4 अंक ही आर्थिक आधार को दिए गए थे। ७) मण्डल आयोग के अध्यक्ष स्वय पिछडी जाति के सदस्य थे और अपने राजनैतिक जीवन के दौरान पक्षपाद पूर्ण ह्फों के लिए विख्यात थे। उन्होंने निदर्शकों की पहचान तथा अक प्रदान कलेे में पश्षपातपूर्ण भूमिका अदा की थी, यहा तक कि आयोग ने भी स्वीकार किया था कि वर्गों का सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछडेपन का सूचौकरण कुछ एक तरफा रहा। (0) सविधान में उल्लेख है कि यदि किसी वर्ग को राज्य सेवाओं में पर्याप् प्रतिनिधित्व हो तो इसे पिछडों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। (0) मण्डल आयोग ने पिछड़ी जातियों के लिए 27% कोटा अलग-अलग जातियों के लिए बाटा नही था। अत इसका लाभ कुछ जातियों को ही मिलेगा जो पिछडी जातियों में भी प्रमुख हैं। कुछ प्रमुख जातियों में भी कुछ परिवार हो ऐसे होंगे जो अपने अभाग्य भाइयों की कीमत पर फलेंगे फूलेंगे। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू करे का तरीका बहुत जल्दबाजी का था जो कि तत्कालीन राजनैतिक संकट को टालने के लिए अपनाया गया था। कोई भी आर्थिक कटौती बिन्दु निश्चित नहीं किया गया था और न ही आरक्षण की निल्तसता की घोषणा की गई। इसमें आश्चर्य नहीं कि धारणाओं, प्रमों, ठोस आकडों की कमी, सूचना में खामियों, एक तरफ निर्णय, आत्मपप्कता, अप्णतिया और उच्च कोटि के तर्कहीन सामान्यौकरण, आदि ने युवावर्ग को आरक्षण नीति व आत्म-केदधित राजनैतिक अभिजात वर्ग के विरुद्ध लडने के लिए भडका दिया। ., आरक्षण नीति (९5९शाणा ?णा०) हमारे सविधान ने सभी नागरिकों के लिए न्याय और समान अवसरों की घोषणा की है। इसमें समान अवसरों का अर्थ समान लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा से लिया गया, न कि असमार्नों के बीच। हमोरे सामाजिक ढोंचे में अस्मानता को मानते हुए सविधान निर्माताओं ने वर्क दिया था कि कमजोर वर्गों को राज्य द्वारा स्थाई तौर पर ध्यान दिया जाना है। इस प्रकार राज्य पर यह विशेष दायित्व सौंपा गया कि समाज के कमजोर वर्ग को सरक्षण प्रदान को। तदनुसार, सविधान में समतावादो सामाजिक व्यवस्था बनाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए अनुसूचित जातियां, अस्पृश्यता और पिछडा वर्ग 85 विविध धागओं के अन्तर्गत संरक्षणात्मक भेदभाव का प्रावधान किया गया। इस प्रकार आपक्षित स्थानों सहित दलित वर्गों (505 और छा0) के लिए वरीयता व्यवहार (र्लट्षशा5॥| धरध्थागा८३/) राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक अभिजाव वर्ग का कोई महान कार्य नहीं समझा जाना चाहिए। वास्तव में, गजनीतिक सत्ता प्रशासन में उनकी भागोदारों देने की प्रामाजिक नौति और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से उनका उत्थान करना था। प्रारम्भ में आरक्षण का प्रतिशत (950 के सविधान में) अनुसूचित जातियों के लिए 2.5 प्रविशव था और अनुसूचित जनजातियों के लिए 5 प्रतिशत था, लेकिन 970 में यह प्रतिशत बढ़ाकर इन के लिए क्रमश, 5 और 7.5 कर दिया गया था। आरक्षण नौकरियों, विद्यालयों व विश्वविद्यालयों में प्रवेश में और केद्रीय तथा गज्य विधायिकाओं में प्रदान किया गया था। अन्त; यह छार्चजनिक प्रत्तिष्ठानों और राष्ट्रीयकृत बैंकों में भी प्रदान किया गया। सभी राज्य सरकाएं ने भी अपने नियंत्रण के आधीन सेवाओं में अनुसूचित जातियों (और जनजातियों) के लिए आरक्षण का प्रावधान करते हुए विधान बनाये ! साथ ही, प्रोलतियों में आरक्षण आदि अन्य प्रकार की छूट भी राज्य सरकारों द्वार प्रदान की गई। जनवरी 999 में न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्बन्धी गोपनीय फाइल में भारत के राष्ट्रपति की टिप्पणी, कि उच्च न्यायलयों एवं सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में महिलाओं, दलितों और जनजातियों जैसे समाज के कमजोर वर्गों के लिए विशेष कोटा निश्चित करने पर विचार किया जादय चाहिए, मे कामूनी क्षेत्र में काफ़ो हगामा मचाया और योग्यवातत्र (7९०॥॥0०४३०)) बनाम संएक्षणात्मक भेदभाव पर काफी बहस को प्रेरित किया | विवाद यह नहीं है कि क्या राष्ट्रपति को चयन प्रक्रिया में इस प्रकार परिवर्तन के सुझाव देने का संवैधानिक अधिकार है या नही। मुद्दा यह है कि यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश का यह 'र्क कि न्‍्यागिक नियुक्तियों में केवल योप्पवा हो महत्त्वपूर्ण है, तर्क सपद है तब यह अन्य क्षेत्रो->जैसे शिक्षा सस्याओं , विज्ञान प्रयोगशालाओं आदि--में भी क्‍यों नहीं लागू किया जा सकता 2? दूसरी ओर यदि राष्ट्रपति के दृष्टिकोण पें तर्क है कि आरक्षण को सैन्य बलों तथा मत्रिमण्डल के बनाने में भी क्‍यों नही लागू किया जा सकता ? राष्ट्रपति की टिप्पणिया कभी आकस्मिक नहीं होतीं। वे उनकी व्यक्तिगत ग़य नहीं होतीं। उनमें अधिकारिक मोहर लगी होती है। यदि न्यायाधीश और वरिष्ठ एडवोकेट न्यायत्त्र में योग्यता की प्रधानता में विश्वास रखे हैं वो क्या उच्चदम न्‍्यायलय ओ बोस के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को स्वीकार करने सम्बन्धी नवम्बर, 992 में दिए गए अपने पूर्व निर्णय का पुनरावलोकन करेगी ? एक ओर तो लगभग पचाप्त वर्षों से भी अधिक के अच्दराल में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्यान के लिए आरक्षण नौ को असफलता, और दूययी ओर आरक्षण की ग़जनीति अथवा राजनैतिक दलों द्वात ओबीसी, दलित इस्ताईमों और मुस्लिमों जैसे समूहों को अपने चगुल में फँसाने के लिए प्रयाप्त तथा दौर ओर ओबीसी श्रेणी में शामिल करने की कुछ जातियों को माँग (जैसे राजस्थान में जायें द्वाए) ने समाज और अर्थव्यव्पा दोनों के लिए गम्भौर चुनौतियां प्रस्तुत कर दी हैं। 50 अतिशव पर आरक्षण सौमा बन्द करने सम्बन्धी उच्चतम न्यायालय के निर्णय तथा बाद में आरक्षण को 69 प्रतिशत करने सम्बन्धी दमिलनाडु आएक्षण अधिनियम्त 0993) के पारित होने से तथा इस अधिनियम को न्‍्याषिक पुनगवलोकन से पो रखने के लिए रूविधान में 85 वें सशोधन द्वारा शामिल करने से एक 86 अतुयूचित जातियाँ, असृरवता और पिछड़ा वा के बाद दूसरी ग़ज्य सरकारों के इसी प्रकार के विधान बनाने के द्वार खुल गए हैं। इसी सन्दर्भ में आरक्षण के प्रकरण का महत्व अधिक हो गया है। अनेक लोगों द्वाए उठाया जा रहा प्रश्न अब यह है कि क्‍या अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए शिक्षा सस्थाओं, नौकरियों, लोकसभा और विधान सभाओं में आरक्षण जाते रहना चाहिए ? एक तर्क तो यह है कि यह तो सविधान के लागू होने के १0 वर्ष के अन्दर ही समाप्त हो जाना चाहिए था। प्रति दस वर्ष को इसकी अवधि बढाकर हम संविधान निर्माताओं की इच्छाओं के विरुद्ध जा रहे हैं। वास्तव में, यह योग्यता को अमान्य करना तथा अधिक योग्य को वचित रखना है। भारत में अनुसूचित जातिया और जनजानिया मिलकर कुल जनसख्या के 2456 प्रतिशत हैं (6 48% और 8 08% क्रमश), ओबी सी 57 प्रतिशत, आर्थिक रूप से कमजोर ॥0 प्रतिशत और मुस्लिम 2 प्रतिशत हैं। यह सब 97.56 प्रतिशत हो जाते हैं। जब लगभग समूचा देश ही पिछडा हुआ हो तब पिछडे वर्ग के किसी विशेष चर्ग के लिए विशेष उपायों को करना कितना न्याय सगत है? दूसरा हर्क यह है कि हपने कमजोर वर्ण की दशा सुधारने के लिए 50 वर्षों से प्रयल किया है। यदि आरक्षण से उनको दशा में वास्तव में अब तक कोई सुधार नही हुआ है वो इस प्रकार के निष्प्भावी प्रबन्ध को जारी क्‍यों रखा जाये ? आरक्षण के लाभ केवल 'समत्न स्तर (८८३५ 89/०) के लोगों के लिए हैं। तीसरा तर्क यह है कि यह (आरक्षण) नौति वोट के लिए भुनाई जा रही है। इसमें कोई एतराज नही होगा यदि अवसर की समानता की अवधारणा के अन्तर्गत हो आरक्षण प्रदान किया जाये। दूसरी ओर एक विचार यह भी है कि क्योंकि आरक्षण का लक्ष्य (दलितों के लिए) प्राप्त नही किया जा सका है, इसको कुछ और दशान्दियों तक जारी रखा जाना चाहिए। दूसग विचार यह है कि अब आरक्षण को धीरे घीरे समाप्त कले का समय आ भंया है। यह या तो सम्पन्न स्तर को समाप्त करके किया जा सकता है या आरक्षण प्रतिशत को समाप्ति के बिन्दु तक ले जाकर। वास्तव में, यह प्रक्रिया बहुत पहले शुरु कर दी जानी चाहिए थी। हमोे 8848 लिए यह अच्छा होता कि हम जाति विहोन समाज के साथ 2वी शर्वाब्दि में प्रवेश करते। हमारी मान्यता यह है कि यद्यपि सैद्धान्तिक रूप में आरक्षण की नौति को समाण करना चाहिए पस्नु व्यावहारिक रूप में इस समय समाप्त करना कठिन होगा। हम सरय बर्मन (२09 छ7णथा) के इस विचार (घर छर्ब ऑिवग 4ब 4 केटटकक्ाबं (कफ सक्षएए८८(ए९, ऐदाए एएए॥०४७०७5, घटछ 0च७, ॥992) से सहमत हैं कि कुछ वर्षों के लिए आरक्षण को अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबी सी के लिए बढा दिया जाना चाहिए। आरक्षण नोति को वैज्ञानिक एवं तर्कसगत बनाया जाना चाहिंए। प्रदत्त राजनैदिक और आर्थिक सज्यना भें जाति (या जन्म, या परिवार किसी के जीवन अवसरों को निर्धारिद नही कर सकती | यह माना जाता है कि दलिद (जनजाति और ओबीसी भी) एक समान समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन वास्तव में वे विषम समूही हैं इसलिए बीएस भार्गव और अविनाश सामल (85 छाकाहुन्एब ब्वाए 4िशाका। उग्ाव, 72 उपदीश। रग्फ्रावां थी ीफीविर 447#फ्राइ#07, फंटए एटा, उण्ए-5०ए(शाएटा 998 : 58) का अनुसरण करते हुए यह सुझाव दिये जा सकते हैं. (६) पिछडेपन के निर्धारण में जाति वी अनुयूचित जातियों, अस्पृश्यता और पिछड़ा वर्ग शा अपेक्षा आय को महत्व दिया जाना चाहिए, (9) क्रोमी सतह की अवधारणा अनुसूचित जातियों व जनजातियों पर भी लागू होनी चाहिए, (8) आरक्षण का लाभ केवल प्रथम पीढ़ो के लाभाधियों को मिलना चाहिए। उन प्रत्याशियों को जिनके माता पिता एक बार नौकरी में आरक्षण का लाघ ले चुके है, उन्हें यह सुविधा नहीं दी जारी चाहिए (9७ छा्वृत्ति में छूट अच्छी संघ्त्याओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के लिए हाई स्कूल और स्नातक पाठ्यक्रमों में अकों के निर्धारित प्रतिशत (५8%) से अधिक अक ग्राप्त करने वाले दलित (जनजावि और ओबोसी) छात्रों को हो दी जानो चाहिए। ये सपनो उपाय उन लोगों को लाभ देंगे जो सहायवा के योग हैं। कृषि और औद्योगिक वर्ग संरचना (#हाग्रपंडा 2०० एप्प] 045 500 ::ट) यद्यपि जाति और वर्ग एक दूसो से बिल्कुल भिल हैं लेकिन पर्ग स्तरीकरण जैविक सबंधी (गण रूप से जाति स्तरीकरण से सम्बद्ध है। वर्ग को सार्वभौमिक घटना माना जाता । औद्योगिक समाजों में जब अन्तर बुजजुआ और श्रमजीवी जनता के बीच किया जाता है, कृषि समाजों में यह भेद भू-स्वामी और भूमिहीन वर्ग के बोच किया जाता है। मार्क्स के इस दृष्टिकोण का जयोग करते हुए, यह कहा जा सकता है कि बुर्जुआ वर्ग उच्च आय का भोग करता है, उनकी शिक्षा का स्तर ऊचा होता है, और उनकी प्रतिष्ठा भी ऊंची होती है। सर्वहारा वर्ग की आय कम होती है, उनकी शिक्षा का स्तर निम्न व प्रतिष्ठा भी निम्न ही होती है। इन दो वर्गों के बीच मध्यम बुर्जुआ वर्ग की आय और प्रतिष्ठा भो मध्यम होती है और शिक्षा का स्वर श्रमिकों से कुछ ऊपए लेकिन बुर्जुआओं के स्तर से कम होता है। भारत में जाति पर अध्ययनों की तुलना में वर्ग के अध्ययन का साहित्य कम है। वर्ग स्तरौकाण का विश्लेषण माक्स॑वादी तथा गैस्मार्क्सवादी दोनों रूझानों वाले समाजशाञ्लियों ने किया है। जनगणना एजेन्सियों ने वर्ष श्रेणियों के विश्लेषण में सामान्यत. कृषि और गैर कृषि जीविकोपार्जन को सन्दर्भित किया है। कुछ समाजशार्त्रियों ने वर्ग सरचना के विश्लेषण में 'भालिक' और 'ियत' (30७), शब्दों का भी प्रयोग किया है। कृषि वर्ग सरचना (#हवष्यांभा एज55 8072) कुछ विद्वानों के अनुप्तार जाति स्तरीकण्ण प्रामीण तथा वर्ण स्तरोकरणण शहरी स्थिति से सम्बन्धिव है। योगेन्द्र सिंह (0558 $ए७८५ र८एणा, ४० 7, 974 - 358) ने माना है कि यह कथन भ्रन्तिपूर्ण है। यह साभाजिक ऐतिहासिक साक्ष्य पर आधारित नही है। कुछ पश्चिमी विद्वानों ने बताया है कि प्रारम्भिक भारत एक स्थिर समाज था जहा परिवर्तन को अपेक्षा निम्न्‍दत्वा प्रमुख गुण था, लेकिन स्थिर भारत को इस पश्रान्ति (230) पूर्ण परिकल्पना की कुछ विद्वानों ने [22 ॥0०४ (970), ;०६८ए००० अयहं (973), 8 (का (968); और ए०कर प॥2७० (972) ] आलोचना की है। अनेक वर्ण, जैसे पुजारी, सामन्तो मुखिया, व्यापारों, शिल्पो, कृषक, मजदूर, आदि भारत में भी थे। व्यापारियों की सामाजिक श्रेणीक्रम में निम्त स्थिति नहीं थी। उनकी गतिशौलता का आधार उनका आशिक सम्बन्ध होता था। उनकी जाति प्रस्थिति उनको वर्ग प्रस्थितिं से टकयही नहीं थी। योगेद्ग सिंह (0.9 ०४५, 974 :334) मानता है कि समय, धन और सम्पत्ति के बदलने पर ह8 अतुसूचित जातियाँ, अल्ृश्यता और पिछडा वर्ग अनेक जातियों की स्थिति ने सुघरी हुई प्रस्थिति को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, विशेष रूप से व्यापारी वर्ग में। 000 7 के बाद के समय में शहरों में व्यापारियों, शिल्पियों, आदि वर्गों का विकास हुआ। मुगल काल में भी, क्योंकि उत्पादन का एक बडा भाग बाजाएं में ले जाया जाता था, इसलिए शहरों और गाँवों दोनों के वर्ग सरचना की गतिशीलता जारी रही ! इसमें न केवल गांवों में कृषि वर्ग का अस्तित्व सम्मिलित था, बल्कि शहरों और झस्बों के व्यापारी, बिचौलिए, साहूकार, आदि भी शामिल थे। ब्रिटिश काल में वाणिज्य व्यापार की नीति ने शिल्पी (&॥5) वर्ग को प्रभावित किया और बडे पैमाने पर उनको शहरी क्षेत्रों में प्र्रजन के लिए प्रेरित किया। साथ ही, ब्रिटिश सरकार के बन्दरणाहों के प्रति पश्षपातपूर्ण रवैये, बडी सख्या में बडे शहरों की उपेधा कौ शैली, कर-नीति, और कई अन्य सामाजिक-आर्थिक नीतियों ने परम्पपगत भाखीय आर्थिक सरचना तथा वर्ग सरचना को भी पतन की ओर धकेल दिया । प्रामीण क्षेत्रों में भूमि बन्दौबस्त नीति ($७0९760 9000०) के कारण वर्ण सरचना भी प्रभावित हुई। इसी बीच ब्रिटिश नीतियों ने सामन्ती-कृषि वर्ग सरवना के उदय के लिए नई राहें पैदा कर दी। शहरों में एक नव-औद्योगिक और व्यापारी मध्यम वर्ग का जन्म हुआ। एक भीकर शाहअशासक वर्ग का भी उदय हुआ। ब्रिटिश शासन काल में जिस कृषि व्यवस्था का ग्रामीण क्षेत्रों में ठदय हुआ था वह या तो जमीन्दारों या रेयतवारी प्रकार के भूमि बन्दोबस्त पर आधारित था। जमीदाए प्रथा में तौन भ्रमुख कृषि वर्ग थे जमींदार, आसामी (८४४०७) और कृषि मजदूर। रैयतबाडो प्रथा में दो प्रमुख वर्ग थे रैयत-पू-स्वामी और रैयत कृषक । कृषि वर्ग सरचना की विशेषता भार में सर्वत्र सामन्ती प्रकृति की थी। जमीदार (भूमि स्वय न जोतने वाले भू-स्वामी) कर सम्रहाक थे। आस्रामी वास्तविक कृषक थे (जिनकी बहुधा भूमि पर जोत को अवधि निश्चित नहीं होती थी) और कृषि मजदूरों की स्थिति बन्धुआ मजदूरों जैसी होती थी। शासकों की शक्ति होने के साथ यह अति शोषणवादी व्यवस्था, कृषक असन्तोष, तथा आन्दोलनों के बावजूद, देश की राजनैतिक स्वतत्रता को प्राप्ति तक जाये रही। राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी किसानों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और देश के कई भागों में किसान आन्दोलन चले (8 | ए659, 706540/ ॥#०एशहटा5) । स्वतत्रता के बाद घूमि सुधार लागू किए गए और कृषि वर्ग सरचना का रूप-परिवर्दन शुरू हुआ। जमीदारी उन्पूलन व्यवस्था ने जमीदार्यो की शक्ति छीन ली। डेनियल थाजर (09णांध प्र/णए८7, 973) ने आजादी के बाद कृषि वर्गों के सन्दर्भ में दीन प्रमुख वर्गों की बात कही है. मालिक, किसान और मजदूर, जबकि कोटोस्की (00८७७, 4964) ने वर्गों को भू-स्वामी, धनी कृषक, भूमिहीन किसान, और कृषि मजदूर वर्गों में बॉटा है। गत दो दशशाब्दियों में कुछ अर्णशालियं ने भूस्वामियों के विभिन्‍न वर्गों की चर्चा की है, जैसे भू-स्वामी (0 से अधिक भूमि वाले), छोटे भू-स्वामी (2-0 हैक्टेयर भूमि वाले), सीमान्त भूस्वामी (2 हैक्टेयर से कम भू-स्वामी) और कृषि मजदूर। राम किशन मुकर्जी ने कृषि सरचना में तोन वर्गों का सन्दर्भ दिया है - भू-स्वामी और निरीक्षक (एएला४७०णशे किसान, आत्म निर्भर किसान और बटाई किसान, तथा कृषि मजदूर। नुसूचित जातियों, अद्यूरयता और पिछड़ा वर्ग 89 योगेद्र सिंह (08870 5एरचए रव्एणा, एणएा८ ॥, 7फ्र4, 343-344) ने बतत्रत! के बाद कृषि वर्ग संरचना में अनेक प्रवृत्तियों के उभरने की बात कही है। यह हैः )) भू सुधार आदेश स्वतत्रता सप्राम के बीच और उसके बाद भी प्रस्तुत किये गये थे और -सुधाएें के लिए शुरू किए गए वास्तविक उपायों के बीच बड़ी खाई है। 2) यह खाई जनितिय्ों कै वर्ग चरित्र और प्रशाप्तकौय अभिजात वर्ग के वर्ग चणि का परिणाम है। 3) नो किसानों को आर्थिक समृद्धि बढ़ी है लेकिन छोटे किसानों को आर्थिक दशा गिरी है । 4) सामन्ती प्रकार की आसामियत्र के स्थान पर पूंजीवादी प्रकार की लौज-श्रम या पारिश्रमिक जजदूर कृषि व्यवस्था के रूप में आ गई है। 5) चोटी एवं सतही स्तर के वर्गों के मौच अ्रसमानताए कम होने के बजाय बढ़ी हैं।6) कृषि मजदूरों को भूमि सुधारों के लाभ प्राप्त हों हुए हैं। ()) प्रा्मों में वर्तमान वर्ग रूपान्तरण की प्रमुख समाजशाल्ोय प्रक्रिया में अनेक प्राप्नाजिक छाग्ें का 'सर्वहारीकरण' (97002097972/००) और कुछ का बुर्जआकाण (४पा००४7९९०॑#८णणायां) भी सम्मिलित है। पीसी जोशो (९८, 40%, 497) ने कृषि र्ग ढाँचे में आने वालो प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में सकेत किया है. (॥) सामन्ती प्रकार की भासामियत में कमी और इसके स्थान पर अधिक शोषणकारी लीज़ प्रबन्ध (2) व्यापारेन्मुख नमीदारों का उदय। आख्दे बेतेइ ने परिवर्तनशील साम्राजिक स्तरौकपण के कारण “सामूहिक अप्तामनताओं से बिखरी हुई असमानताओं' को बात कही है। औद्योगिक वर्ग सरवना (07४ 0॥855 50ए७एए) औद्योगीकरण के मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं : ()) कृषि में सलग्न मजदूरों का प्रतिशत नौचे आया है जबकि व्यक्तिगत क्रियाओं में संलग्न मजदूरों का प्रतिशत बढा है; 0) सामाजिक गतिशीलवा को प्रक्रिया में यृद्धि हुई है, 6) मजदूर संघों ने औद्योगिक मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए लडने के लिए सगठित किया है; (4) औद्योगिक श्रमिक क्योंकि अपने प्रकार के समूहों और जावियों से निकट का निरन्तर सम्बन्ध बनाए रखते हैं, जाति स्तरीकरण वर्ग चित को प्रशावित नहीं कर सका है 6) परम्परागत तथा करिश्माई अभिजात वर्ग के स्थान पर पेशेवर अभिजात वर्ग आ गया है। मारिस डी. मारिस (४०5 ७ 'शएया5 (“पाढ क्ाशाहुलारल ता था ठग [#80ए णिल्ल था तिता॥ 9 0फशांत्वि ठणछ, उन्तग आाग्धुव्विव०४,99, 23-247) ने औद्योगिक श्रमिकों फे व्यवहार प्रतिदर्श के साबन्ध में दो विचार रखे हैं. एक विचार ते यह है कि उद्योगों के श्रमिकों की कमी के कारण नियोजकों को अपने कार्य बल के लिए, कठिनाई उठानी पड़ती थी और हर प्रकार को छूट अपने कर्मचारियों को देनी पडतो थी जिसके कारण कर्मचारियों पर उनको पकड़ ढीली हो जाती है और श्रमिक अक्सर अपने गाँवों को लौट जाते थे, दूसरा विचार श्रमिकों के शहरों भें गेजगार के लिए गाँवों में अधिकता से उपलब्धि का है। सरलता से श्रमिक उपलब्ध होने के काएण नियोजक श्रमिकों को निर्देयवा से गाली-गलोच कहते थे। क्योंकि फैक्ट्रियों में कार्य-दशाएँ असहाय होतो थीं, इसलिए वे अपने गांवों को जाने को बाध्य होते थे। इस प्रकार दोनों हो विचारों पें यह मात्रा गया कि श्रमिक अपने ग्रामौण सम्बन्ध को बनाए रखते थे जो कि औद्योगिक विकास के लिए श्रम आपूर्ति को सौमित कर देती थी। परिणामत सर्वहाण प्रकार के व्यवहार का विकाप्त नहीं हुआ। इससे अनुपस्थित की दर में 90 अतुयूचित जातियाँ, अद्यूश्यवा और पिछडा वर्ग वृद्धि और श्रम आवक में भी वृद्धि हुई और मजदूर सघों का विकास मन्द हो गया। उपरोक्त विशेषताओं के अतिरिक्त चार अन्य विशेषताएँ भी दृष्टिगोचर हुईं। प्रथम, उद्योगों में ह्लियों और चों का रोजगार सीमित था। लगभग 20 से 25 प्रतिशत श्रमन्‍बल ज्लियों का, और 5 आवशत बच्चों का था। ऐसा इसलिए था और १4 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कानूनन रोजगार नहीं दिया जा सकता था। द्विक्वीय, यद्षपि यह कहां जाता है कि उद्योग जाति के भ्रति उदासीन होता है क्योंकि कोई भी एक जाति पर्याप्त श्रम पूर्ति नही कर झकती और क्‍योंकि कर्मचाएे जाति सम्बन्धें! में रूचि महों लेते, फिए भी श्रमिक अपने नियोजकों को अस्पृश्यों की भर्ती नहीं करने देते थे। तृद्गीय, उद्योगों में अधिक सख्या में श्रमिक वे होते थे जिनका भूमि पर कोई महत्त्वपूर्ण दावा नहीं होता था। चतुर्थ, श्रमिक उसी जिले के नही होते थे जिसमें उद्योग स्थित होता था बल्कि विभिन्‍न जिलों और पडौसी राज्यों से भी भर्ती किए जाते थे। अत श्रम के उद्योग में प्रवेश पर कोई भौगोलिक बाघाए नहीं थी। ग्रामीण सामाजिक सरचना (सयुक्त परिवार प्रथा) भो नगरीय आर्थिक विस्तार के लिए आवश्यक जनसख्या के आने-जाने में कोई अवरोध नहीं थी! किसी भी उद्योग में कुत श्रमिकों के, एक अनुमान के अनुसार, लगभग 25 प्रतिशत स्थानीय होते हैं, 0 प्रतिशव उद्योग के स्थान के 00 किलोमीटर के भीतर से ही आते हैं, 50 प्रतिशत 00 से 750 किलोमीटर से और 5 प्रतिशत 750 किलोमीटर से भी दूर से। यह दर्शाता है कि उद्योगों में श्रमिक काफी लम्बी दूरी के स्थानों से आते हैं। ये सभी विशेषताएं भारत में उद्योग श्रम बल के वर्ग पक्ष की व्याख्या करती हैं। श्रमिक वर्ग का विश्लेषण करते हुए होल्मस्ट्राम (प्रणणन्रा०्य, 5०९, एोएल्शोप्ा 00०03, 994, 248-260) ने कहा है कि सप्ती श्रमिक सभी हितों में भाग नही लेते बल्कि वे तो केवल कुछ ही हितों में भाग लेते हैं। उसने यह भी कहा है कि सगठित और असगठित क्षेत्र के औद्योगिक श्रमिकों के बौच वर्ग रेखा खौचना आवश्यक है। जोशो (976) ने भी कहा है कि सगठित और असगठित क्षेत्र के औद्योगिक श्रमिक विरोधी हिलों बाले दो अलग-अलग वर्ग हैं। यह चार कारकों में अन्तर के आधार पर बताया जा सकता है पारिश्रमिक, दशाएं, सुरक्षा, और सामाजिक जगतू। प्रास्श्रिमिक (७०४०७) इस बात पर निर्भर है कि उद्योग बडा है 0000 से अधिक श्रमिकों वाला) या छोटा (250-000 श्रमिकों वाला) या बहुत छोटा है ७0 से भी कम श्रमिकों वाला)। 973 में पश्चिम बगाल ने उपगेक्त तीन प्रकार के उद्योगों के लिए विविध न्यूनतम पारिश्रमिक तय किए। बडे उद्योगों में छोटे उद्योगों की अपेक्षा काफी कम मजदूरी दी जाती है क्योंकि वे वेतनमान के अर्थशार्र, मजदूर सगठनों और श्रमिकों की मजबूत सौदेबाजी की स्थिति से प्रभावित रहते हैं। स्वाभाविक है कि श्रमिकों का हित उस उद्योग के प्रकार पर निर्भर करता है जिसमें वे काम करते हैं। कार्य दशाए (०7०8 ००००7४०७७) भी श्रमिकों के हितों को प्रभावित करतीं हैं। उन उद्योगों में काम करने वाले, जिनमें अच्छी दशाएं (#छांणाड़ ००ग्रपा0075) होती हैं, सुरक्षा उपाय अधिक और दुर्घटनाए कम होती है, कम घ्वनि, और नौरसठा कम होती है, चकान कम होती है,कार्य समय कम होता है, कार्य-स्थान अधिक होता है, सूक्ष्म नियदरण और कम परेशानिया, अधिक सीखने का अवसर मिलदा है, कैण्टीन, शिशुगृह व सफाई के अनुसूचित जातियों, अस्पृश्यता और पिछड़ा वर्ग भ्र आदि होते हैं, वहां श्रमिकों के हित उन उद्योगों के श्रमिकों के हितों से भिन होते हैं जहा ये सब सुविधाएं उपलब्ध नही कराई जाती हैं। इसलिए वे दो भिनन प्रकार केः श्रमिक वर्ग के रूप में काम करते हैं। सुरक्षा और जीवन अवसर (5०८०घाए आए ८आध्य ०॥३7००७) भी दो अकार के श्रमिक वर्ग कौ ओर सकेत करते हैं। स्थाई श्रमिक के पास न केवल नौकरी होती है बल्कि अच्छा रोजगार भी जबकि अस्थाई श्रमिक अपनी नौकरी के लिए चिन्तित रहता है। स्थाई श्रमिक का कार्य जौवन का भविष्य होता है लेकिन अस्थाई श्रमिक तो वर्तमान में हो फेस कर रह जाता है। स्थाई श्रमिक अपने कार्य रोजगार में कुशलता सीखकर ओन्‍नति के अवसर प्राप्त करने की योजना बना सकता है जबकि अस्थाई श्रमिक डरा हुआ रहता है कि सघ (ध्रशा०म) बनाने पर कही उस्तकी नौकीी न चली जाये। अख्विम स्राग्जिक जगह भी श्रमिकों को दो वर्गों में विभाजित करता है। सामाजिक जगत का अर्थ है आधिक दशाओं में अन्तर, जीवन अवसर, परस्पर सहायता और निर्भरता, आदि। संगठित क्षेत्र में फैक्ट्री अमिक अधिक सगठित होते हैं और वे कम आक्रामक और कम तनाव में रहते हैं। उनके हित्त और विचारधाराएँ उन्हें “बाहरी व्यक्तियों' (०४००७) से 48५08 हैं। इस प्रकार सगठित क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिक विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग बनाते हैं। 4 परिवार, विवाह और नातेदारी (हरा, भैशव३2९ ४४ 579) परिवार व्यवस्था (ए०णा।५ $४धणोे परिवार * अवधारणा और प्रकार (#छ्णाए : 0०००हए 800 075) अ्जनन तथा जैविक इकाई के रूप में परिवार में सामाजिक स्वीकृति से यौन सम्बन्ध रखने वाले एक स््रो और एक पुरुष और उनकी सन्तान (चाहे वह प्राकृदिक हो या गोद लो हु) होते हैं। सामाजिक इकाई के रूप में परिवार को “दोनों लिंणों के व्यक्तियों का बह समूह कहा जाता है जो विदाह या रक्त या गोद लेने के अधिकर छे जुड़े हुए हों,जो आयु, लिंग और सम्बन्धों पर आधारित भूमिकाएँ अदा करते हों, और जो सामाजिक रूप से एकावी गृह (5080० ४005०/०(0) में रहते हों।” एलेन रॉस की परिवार की परिभाषा में पारिवारिक जीवन के भौगोलिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तत्व शामिल हैं | उसके अनुसार (09%) * 3), “परिचाए किसी विशेष प्रकार के बन्छुओं (६४020) के रूप में सामान्यत्र सम्बन्धित लोगों का समूह है जो एक ही गृह में रहते हैं और जिनको एकता उनके अधिकारों, कर्तओं तथा भावगाओं के रूप में निहित रहती है। रास ने परिवार की चार उप-सरचनाओं में भेद किया है. () परिस्थितिक (८००७८) उप-सरचना, अर्थात्‌ परिवार में सदस्यों और उनवी गृहस्थियों का जगह के अनुसार (5990) प्रबन्ध, या नातेदार किस प्रकार भौगोलिक दृ्टि से एक दूसरे के निकट रहते है। सरल शब्दों में यह पृष्ठ के आकार तथा परिवार के भार को बताता है, (0) अधिकारों और कर्तव्यों की उप सरचना, अर्थात्‌ गृह के भीतर श्रम विभाजन, (७) शक्ति और अधिकार की उप सरचना, अर्थात्‌ सदस्यों के कार्यों पर नियत्रा, और (४४) भावनाओं की उप-सरचता, अथांत्‌ विभिन सदस्यों के मीच सम्बन्ध, जैसे पति-पर्लि के बीच, माता पिता और सन्तान के बीच, और भाई-भाई या भाई-बहन या सहोदरतों के बीच के सम्बन्ध, आदि विभिल विद्वानों ने विभिन्न प्रकार के परिवार बताएँ. हैं। केपी चट्टोपाध्याय 096[ 75) ने तीन प्रकार के परिवार बताए हैं. सिम्पल या सरल (॥./८) परिवार (पुरुष, पर्लि, और अविवाहित बच्चें), यौगिक या कृमपाउन्ड सयुक्त (888 ०णात) परिवार (दो सरल परिवार, जैसे पुरुष, उसकी पलि, उनके अविवाहित बच्चे, ओर पति के मातानीता अविवाहित भाई बहिनें), और समिश्र गण कम्पोजिट (८७घए०४८) परिवार, (0०9) या भिन शाखाई (८णांअध्या») सयुक्त परिवार। अधिकार के आधार पर परिवाए विवाह और नावेदारी क्र परिवारों का वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है : पति प्रभुत्व वाला, पति प्रभुत्व वाला, समानवादी प्रभुत्व वाला (6६(४४॥/आ7270) वा स्वायत्त (३0०॥०म४०) परिवार। बर्नित्त और लॉक (छ््ट८5७ ४०१ 7.0८८, 963 ; 26) ने परिवारों को सदस्यों के व्यवहार के आधार पर पंस्थामक (॥॥॥700प४) और सहचारिता (००७.४॥०७»॥9) परिवारों में बर्गकृत किया है। सस्थात्मक परिवार में सदस्यों का व्यवहार जममव और अग्रेक रीतियों से नियमित किया जाता है, जबकि सहचारिता परिवार में पारस्परिक स्नेह और भग्ैक्य (००:७5००५७७) से व्यवहार का उदय होता है। नातेदारी बन्धनों के आधार पर पणिवाएँं का वर्गकरण दाम्पत्य अथवा वैवाहिक परिवार (०0णुए/) (जिसमें वैवाहिक बन्यनों को वरीयता दी जाती है) और रक्तमूलक परिवार (८००७००४०४८) (जिसमें रक्‍्त सम्बन्धों को वरगैयता दी जाती है) में किया गया है। जिमरमैन (947 : 20) ने इनका वर्गोकरण उन्यासी (४0४८०) (जहा सदस्यों को परिवार के प्रतिमानों का अनुपालन करना होता है और उनके व्यक्तिगत अधिकार नहीं होते) परमाणुवादी (॥0:॥5४०) (जिसमें परम्पणंगत लोकरीतियों का महत्व कम हो जाता हैं और प्रत्येक सदस्य अपनो इच्छा का कार्य कर सकता है), और परेलू (070८६४८) परिवार (जो कि प्रन्यास्ती परिवार तथा परमाणुवादी परिवार के मध्य प्रकार का होता है) के रूप में किया है! मैंने विखडित (550720) परिवार की सकल्पना की है जो संप्चवगा और कार्यो में एकल परिवार (70८८०) है और जो पैदृक (080४0) परिवार से पृथक किया हुआ होता है। संयुक्त परिवार : प्रकृति, स्वरूप और विशेषताएँ (गा किाजोी$ १ पिक्वण्र, 7.फुलड 9तत॑ (फ्ान्नलश5805) विभिन विद्वानों ने सयुक्त परिवार की विविध सकल्‍पनाएं की हे। जहां इरावती करवें संयुकतता में 'सह-निवासिता' (००-४८४०८॥००) को महाधपूर्ण मानती हैं, वही ऐगरेल्ड गूल्ड, ग्रमकृष्ण झ्र्जी, एस सी दुबे, बीएस कोहेन, तथा पाउलिन कोलेण्डा सह-निवासिता और सह-भोज को सथुक्तता के आवश्यक तत्व नही मानते | बेली (890०५) और टौएन. मदान निवास और सह-भोज के भेदभाव के बिना सम्पत्ति के संयुक्त स्वामित्व को महत्व देते हैं। आईपी देसाई दायित्वों (७०॥2३४००७) की पूर्व को महत्व देता है, भले ही निवास अलग हे और सम्त्ति का सयुक्त स्वामित्व न हो। इरावदी कवें के अनुसार (१983 - 24) परम्धणगद प्राचोन भारतीय परिवार (वैदिक ओर महाकाव्य युग) निवास, सम्पत्ति, और कार्यो (00०/०७) में सयुक्त था। उसने संयुक्त परिवार की पांच विशेषवाएँ बताई हैं. सह-निवास, सह-सोई, सह-सम्पत्ति, सह-परिवार पूजा, और कोई नातेदारी सम्बन्ध। इस आधार पर उसने सयुक्त परिवार की परिभाषा इस प्रकार को है “व्यक्तियों का समूह जो सामान्यत एक ही छत के नोचे रहते हैं, एक ही चूल्हे पर पका भोजन करते हैं, सम्पत्ति में समान हिस्सा रखते हैं, पारिवारिक पूजा अर्चना में समान रूप से भाग सेते हैं और एक दूसरे से किसी अकार के यन्यु (407८0) सम्बन्ध रखते हैं।” “सयुक्त प्प्पत्ति' शब्द (956 के हिन्दू उत्ताधिकार अधिनियम के अन्तर्गत) का अर्थ है कि तो पीढियों ठक सभो जोबित पुरुष और री सदस्य पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा रखते हैं। आईपी देसाई के अनुसार (955 47) समान निवास और रसोई संयुक्त परिवार के क्रय परिवार, विवाह और गातेदारी उतने महत्वपूर्ण आयाम नहीं हैं जितने कि अन्तरापारिवारिक सम्बन्ध हैं। वह भानता है कि जब नातेदारी (07४99) सम्बन्धी दो परिवार अलग-अलग रहते हों लेकिन एक हो व्यक्ति के आधीन कार्य करते हों, तब इसे सयुकत परिवार कहा जायेगा। इसे वह “प्रकार्यामक संयुक्त परिवार' कहता है। पारम्परिक सयुक्त परिवार वह उसे कहता है जिप्तमें तोद या अधिक पीढियाँ निहित हों। दो पौढ़ों परिवार को वह 'सीमान्त (89877) सयुक्त परिवाएँ कहता है। णमकृष्ण मुखर्जी 0962 352-98) पाँच प्रकार के सम्बन्ध बदाते हुए संयुक्त परिवार को परिभाषित करता है। ये सबंध है दाम्पत्य मूलक (८०४णष्टआं) सबंध, माता-पिता व सन्तान के सम्बन्ध, अन्तर-सहोदर सबध, समरेखीय (]77:3) सबध और विवाह सबधी (अ0शे) सबंध। उनके अनुसार “सयुक्त परिवार समान निवास (००-€अंतैथा) औए सह-भोजी (८००४४०/८7५०) नातेदारी समूह है जिसमें प्रथम तीन प्रकार के सम्बन्धों में से एक था एक से अधिक सम्बन्ध तथा इसके अलावा समरेखीय या वैवाहिक सम्बन्ध भी होते हैं" आईं पी देसाई ने पाच प्रकार के परिवार बताए हैं एकल, प्रकार्यात्मक रूप से सयुक्त, प्रकार्यत्मक तथा धन के आधार पर सयुक्त (सम्पत्ति के अर्थ में), सीमान्त संयुक्त, और पाएम्परिक संयुक्त । के एम कापंडिया 0959. 74) ने भी पाँच प्रकार के परिवार बताए हैं एकल परिवार (पति, पली और अविवाहित बच्चे), एकल परिवार विवाहित पुत्रों के साथ (जिसे आईपी देसाई सौमान्त सयुक्त और एलीन गॉस लघु सयुक्त परिवार कहते हैं) एकरेखीय (7०४) वशज सयुकत, भिनशाखीय सयुकत, और आश्रित व्यक्त के साथ वाला एकल परिवार (विधवा बहिन, आदि)। एलीन रॉस (966 34) ने चार प्रकार के परिवार बताए हैं चूहत्‌ सयुक्‍त, लघु सयुक्त, एकल, और आश्रितों सहिद सयुक्त। इन सभी प्रकार के परिवारों को एक साथ देखने पर सयुक्द परिवार की परिभाषा इस प्रकार से दी जा सकदी है. “वशावलि की विविधता से सम्बन्धित (ज्रपराराणए &८7००॥०७/००/७४ :०७७४८१) एकल परिवार जो निवाम और सह भोजी सबधों में सयुक्‍्त हों और जो एक ही व्यक्ति के आधीन कार्य करते हों”। एम एस गोरे 98 : 6-7) ने कहा है कि सयुकत परिवार को “समानाशी (००-७&०८४९३४७) वथा उनके आश्रितों के परिवार के रूप में देखना चाहिए, न कि एकल परिवारों के बहुत्व (जणेप्फाल) के रूप में। वह मानता है कि एक एकल परिवार में दाग्पत्थ मूलक (८०णशुण2०) सम्बन्धों पर बल दिया जाता है जबकि सयुक्त परिवार में सतानीय (8) और भ्रावृक (8८४०४) सम्बन्धों पर बल दिया जाता है। गोरे के अनुसार सयुक्त परिवार दीन भ्रकार के होते हैं. सतानोय (!3) संयुक्त परिवार, (माता पिता व उनके विवाहित बेटे अपनी सतति के साथ), भ्रातृक संयुक्त वी (दो विवाहित भाई और उनके बच्चे), और सतानीय तथा प्रातृक (मिश्रित) सुर परिवार। मैं उस एकल परिवार को 'विखण्डित' (85४०7८०) परिवार मानता हूँ जो अपने पिंठा के था विवाहित भाइयों के परिवार से अलग हो गया हो। यह चिखण्डित परिवार किसी प्रकार की नातेदागी से सम्बन्धित अन्य एकल परिवार पर निर्भर भी हो सकता है तो स्वत भी । दूसरी ओर मैंने नादेदारों (00) के प्रका( के सदर्भ में आयमिक, द्वैदियक, तृदीयक, और दूर का) सयुक्त परिवार का वर्गीकरण किया है। इस पकार, मैं निम्नलिखित पांच अकार के परिवार मानता हूँ पएरिवाए, विवाह और नहेदार क्र परिवार के प्रकार परम्पणत्मक विषण्डित पउजप उलअम | ] बडे विस्तार मध्यम विस्ताः लघु विस्तार स्वतनत्र परिवार आश्रित परिवार वाला नातेदाती वाला नावेदाती वाला नातेदारी परिवार (जिसमें परिवार (जिसमें. परिवार (जिसमें आवमिक, आधमिक, द्वैतियक जाथमिक और ट्वैतियक, तृतीयक और तृतोयक द्वैतवियक नावेदार ओऔरदूरके नातेदारहों) हों) रिखेदार हों) संयुक्त परिवार की पिशेषताएँ इस प्रकार दी जा सकती हैं ... इसकी सरचना सत्वादी (30७४०:/८७90) होती है, अर्थात्‌ निर्णय लेने को शक्ति परियार के मुखिया के हाथ में होती है (पितृस्ततात्मक)। सत्तावादी परिवार के विपरीत लोकतात्रिक परिवार में दक्षता और योयता के आधार पर सत्ता एक या दो व्यक्तियों के हाथ में रहती है। 2... इसका संगठन पारिवारिक (5४८०) होता है, अर्थात्‌ व्यक्ति-हित पूर्ण परिवाए के हितों के आधौन होते हैं या परिवार के लक्ष्य व्यक्तिगत लक्ष्य होते हैं। 3... सदस्यों की अस्थिति उतकी आबु व सम्बन्ध लातेदारी) से निर्षात्ति होती है; पुरुष की प्रस्थिति उसकी पलि से ऊंची होती है, दो पीढियों में उच्च पीढी के व्यक्ति को प्रस्थिति निवली पीढ़ी में व्यक्ति को प्रस्थिति से ऊँची होती है, समान पीढ़ी में, अधिक आयु के व्यक्ति को प्रश्थिति कम उप्र के व्यक्ति से ऊँची छोदी हैं, और एक रू को परस्थिति उसके पति को प्रस्थिति से निर्धारित को जातो है। 4... सवानीय (॥06(0) एवं शतृक सम्बन्धें को दाम्पत्य सम्बन्धों से बरयता जप होती है, 3 पति पति सम्बन्ध पिता/पुत्र सम्बन्ध से या भाई-भाई सम्बन्धों से निम्न होते । 5... परिवार संयुक्त उत्तदायित्व के आदर्स के आधार प्र कार्य करता है। यदि पिता अपनी पुत्री के विवाह के लिये ऋण लेता है तब उस ऋण के चुकामे का उत्तरदायित्व पुओनें का भो होता है। 6... सभी सदस्यों फ़ा समातर रूप से ध्यात दिया जाता हैं/ एक गरीब भाई के पुत्र को भी क् स्कूल में प्रवेश दिलाया जायेगा (घले ही महा हो) जिसमें घनी भाई के पुत्र |] 7... परिवार में अधिकार (ुरुषों पुरुषों के दौच, पुरुषों सिरियों के बीच, और हरियों खिियों के बीच) वख्ठित (6४००१) के विद्धान्त से निर्धारित होता है। यद्यपि सबसे बड़ा 98 परिवार, विवाह और नावेदारं अधिकार पर) राजस्थान में परिवारों के अध्ययन किए। दोनों ही अध्ययनों द्वारा यह सष्ट हुआ कि यद्यपि एकल परिवारों की सख्या अधिक है लेकिन यह, यह नहीं बताठा कि संयुक्त परिवार व्यवस्था गायब हो रही है। रामकृष्ण मुखर्जी ने 960-6! में पश्चिम बगाल में परिवार का अध्ययन किया था। उसने पाया कि (975 5-50), () आकार (&2०) परिवार की समुक्त या एकल मरचना का सकेत नहीं है। 4,20 परिवारों अपने सर्वेक्षण में उसने क्रशश 4.50 और 483 एकल और सयुकत परिवार का औसत आकार बताया । (2) सयुक्त परिवार का आकार बडा नहीं है क्योंकि 'मूल दम्पत्ति' (0० ०००फ८) सामान्यव 75 वर्ष से अधिक जीवित नही रहता। पति पली, प्रथम बार माता पिता तब बनते हैं जब पुरुष 25-29 वर्ष आयु समूह में तथा पली 20-24 वर्ष आयु समूह में होती है। वे प्रथम बार दादा दादी तब बनते हैं जब पुरुष 45-49 वर्ष आयु समूह और उसकी पली 40-44 वर्ष आयु समृह में होते हैं। वे परदादा पर दादी (87००४ 8ाभा0 007८०») प्रथम बार तब बनते हैं जब 'मूल दम्पत्ति' पुरुष 75-79 वर्ष आयु समूह में होता है और उसकी पली 70-74 वर्ष आयु समूह में होती है। उनका प्रथम पुत्र व उसकी पल्ली प्रथम बार तब माता पिता बनते हे जब वह 25-29 वर्ष आयु समूह में दया उसकी पली 20-24 वर्ष आयु समूह में होते हैं। परिवार में बहुशाखौय सम्बन्धों का विस्तार दो दूर के चच्ेरे भाईयों के बीच होता है। परिणामत एक सोमित पीढी विस्तार के भीतर ही सयुकत परिवारों का विस्तार होता है। 6) 8 विद्वानों (जैसे एससी दुबे, एमएस. ए एव, क्रोलेन्डा, आईपी देसाई, कापडिया, इरावती कवें, कुलकर्णी, टी एनमदान, ड्राइवर, सोवानी, मुखर्जी, बोस, श्रीवास्तव, आदि) द्वारा भारत में 5 राज्यों में 30 गाँवों और कस्यों में (4 657) पणिवारों पर किए गए अध्ययनों के विश्लेषण में मुखर्जी ने पाया कि एकल पखिों का प्रतिशत कुल परिवारों में 35 से 63 अतिशत के बीच था (वही . 38)। यह भारतीय समाज में सयुकत परिवार सगठन को मानने की केन्रीय भ्रवृत्त की ओर सकेव करता है। (0 सयुक्त परिवार में घीरे-धौरे दादा पीढ़ी के बाद के बहुशाखीय सम्बन्धों में दर आ रही है। परिवार में होने वाले सभी सरचनात्मक परिवर्तनों को एक साथ देखने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि 4.. विखण्डित परिवारों की सख्या बढ रही है पस्ठु अलग-अलग रहते हुए भी वे अपने पैतृक परिवाएं के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करते हैं। 2... परम्पणगत समुदायों (गावों) में सयुक्तता अधिक है और औद्योगोकरण, शहरीकर्ण और पश्वमीकरण से प्रभावित समुदायों में एकलता अधिक है। 3... (परम्परागत) सयुक्त परिवार का आकार छोटा हो गया है। 4 जब तक लोगों में पुराने सास्कृतिक मूल्य बने रहेंगे, सयुक्त परिवार (कार्यालरक प्रकार) हमारे समाज में चलता रहेगा। 5. “पस्परात्मक' से 'सक्रमण' (प७॥०७०) परिवार कौ ओर परिवर्तनों में स्थादीय निवास के प्रति प्रवृत्तिया, कार्यात्मक सयुक्तता, व्यक्तियों को समानता, स्तियों के लिए समान प्रस्थिति, अपनी आकाशक्षाओं को भ्राप्त करने के लिए प्रत्येक सदस्य के में वृद्धि, और परिवार मानदडों का कमजोर पडना शामिल हैं। परिवार, विवाह और नातेदारो 99 वे मूल्य क्‍या हैं जिन्होंने सयुक्त परिवार संगठन को पोषण दिया, स्थिर किया, और जोवन दिया वधा वे भूल्य क्या हैं जो अब भारत में सयुक्त परिवार को तोड़ने में लगे हैं ? वे महत्वपूर्ण मूल्य जिन्होंने समुक्त परिवार संरचना को जीवन्त बनाए रखा वे हैं. () पुत्रों का वंशगत लगाव, (2) कुछ भाइयों की आर्थिक रूप से जीने योग्य क्षमता कौ अथोग्यता, 8) वृद्धावस्था के पुरुषों और खियों का बहुत कम होना, (4) श्रम इकाई के आकार को सगठित कऋरने के लिए भोतिक प्रोत्साहन आवश्यक है क्योंकि वस्तुएँ एवं सेवाए उत्पन्न करने के लिए आवश्यक पूँजो का प्रमुख भाग इसी में होता है और लोगों को परिवार-श्रम पर निर्भर रहना पडता था। जो कारक अब सयुक्‍त परिवार को वोड रहे हें वे हैं. (0) परिवार में तनाव पैदा करने वाली भाइयों की आमदनी में अन्तर। आरम्भ में तो भाई एक दूसरे के साथ समायोजित हो जाते हैं पर जब वे वैवाहिक सबर्धों पर अधिक बल देते है तब उनमें तनाव बढ़ता है। (2) उम्र मूल दम्पत्ति (000 ८०७/०) की मृत्यु जो आर्थिक शक्ति लिए रहता है,तया उनके पुत्नो व॑ उनकी पलियों की अयोग्यवा, अक्षमता जिससे दे पैतृक दम्पति' की भूमिका निभा सके। (3) परिवास-श्रम पर निर्भर रहने का प्रोत्साहन, नकदी के बन्धन (८७६॥ 7८४४5) के उदय के कएण गायब हो रहा है। (4) सामाजिक सुरक्षा सबधी बचत की प्रथा तथा सेवानिवृत्ति के बाद भी लोगों की आमदनी कमाने के अवसर भी सयुक्त परिवार व्यवस्था को एकलीकरण की ओर ले जा रहे हैं। अनर्क्रियात्मक परिवर्तन ([0/रमलाणाओं (४०2९5) अन्तरा-पारिवारिक सम्बन्धों में परिवर्तन तौन स्तरों पर देखे जा सकते हैं. पति-पली के ध्षम्बन्ध, माता-पिता व सत्ान के सम्बन्ध, और बहु तथा सास-श्वसुर के सम्बन्ध भारतीय परिवार में प्रति-पत्मी के सम्बन्धों का मूल्यांकन, गूडे (50006. 7963), कापडिया (966), गोरे (968) और मेरे स्ट्रॉस (08799 $7805, 969) द्वारा किया गया है। ये अध्ययन ()) निर्णय करने में शक्ति का विभाजन (2) पलो की मुक्ति और (3) निकटता (८०६८॥८६७) में परिवर्तन का सकेत कठतवे हैं। परम्यशागत परिवार में परिवार सम्बन्धी निर्णय करने की प्रक्रिया में पली की कोई आवाज नहीं होती थी। लेकिन समकालीन समाज में परिवार व्यय, बजट बनाने में, बच्चों के अनुशासन में, वस्तुएँ खरीदने और उपहार देने में पली की भूमिका समान शक्ति वाली होती है॥ यद्यपि पति जो 'सापक/ (गछएणाशध्यओ) पूणिया अभी पी जाए है और पत्नी भी “अभिव्यक्ति! (७५०४०६७४६) की भूमिका निभा रहो है, लेकिन दोनों ही मामलों पर चर्चा कर लेते हैं और किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए एक दूसो को सलाह ले लेते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि पति-सत्तात्तक परिवार पली स्ात्मक या स्मसच्तात्मक परिवार में बदलता जा रहा है। आर्थिक भूमिका अहण करने और पली को शिक्षा ने पलियीं को सम्भावित रूप में समान बना दिया है। शक्ति का स्रोत 'सस्कृति' से 'सस्ताधन' (४६६०४०८) की ओर खिसक शया है। इसमें “ससाधन' का अर्थ है “कोई भी वस्तु, एक सादी दूसरे को सहायता करते हुए उप्तको आवश्यकताओं को पूर्वि हेतु या लक्ष्यों को प्राप्ति हेतु उपलब्ध करा दे ।” इस तरह से शक्ति सन्तुलन उस साथी के पक्ष में होगा जो विवाह सफलदा के लिए अधिक ससाधरनों को व00 परिवाद विवाह और गवेदाएी जुटा सकेगा। पति से पल्नी की ओर शक्त का झुकाव' पर मरे स्ट्रॉस का अध्ययन (975 4) 'साम्कृतिक मूल्य सिद्धान्त' की अपेक्षा 'ससाधन सिद्धान्त! पर आधारित सकल्पना का समर्थन करता है। उसने पाया कि मध्यम वर्गीय पति श्रमिक वर्ग पति की अपेक्षा अधिक 'प्भावी शक्ति' सखते हैं। इससे पद चलता है कि मध्यमवर्गाय परिवारों की तुलना में कार्यकारी वर्ग के परिवार अधिक 'पृथक भूमिका वाले” (०6 इव््ाव्टग८0) या *स्वायत्ततावादी” (४०0०0०7४८) होते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि श्रम वर्गीय परिवार में सभी प्रकार की कार्यवाहियों में पति पली की सयुक्त कार्यवाही होतो है। इसका यह अर्थ भी है कि मध्यमवर्गीय परिवारों में किसो भी समस्या समाधान में परिवार के व्यवहार के निर्देशन में पति पली दोनों ही अधिक सक्रिय भाग लेते हैं अपेक्षाकृत श्रमजीवी वर्गीय परिवारों के । इस प्रकार स्ट्रॉस का अध्ययन स्पष्ट करता है कि 'एकाकिता' (उृ०००४४ंए) और निम्न सामाजिक आर्थिक प्रस्थिति दोनों हो पति को शक्ति कम करने से सम्बद्ध हैं। “ससाधन' तत्व पर जोर देने का यह अर्थ नहीं है कि 'सस्कृति' (जिन्हें बेबर ने “परम्परागत सत्ता” कहा है) का महत्व समाप्त हो गया है। वास्तव में, 'दाम्पत्य बन्पनों' (८०७७७ ७०१०७) में दोनों री तत्व महत्वपूर्ण हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यद्पि एक औसत भारतीय परिवार पति प्रधान (१७५७७॥० तं०शा००॥) ही होता है लेकिन स्त्रियों की शक्ति का वैवारिक स्रोत (6०0०७८७ 5०७४०८७) व्यावहारिकता (7४०९ण००॥१$४॥) की स्थान ले रहा है। “दाप्पत्य सम्बन्धों' में परिवर्तन पली की बढ़दी “मुक्ति' (८ए४एल/आ०४) से भो स्पष्ट है। शहरी क्षेत्रों में पली का सामाजिक मुलाकावों (४9७) में पति के साथ जाना, पति के साथ या उसके पहले खाना खाना, रेखा और सिनेमा साथ-साथ जाना, आदि पल्नी को “साहचर्य' (८०ए्0०या००) भूमिका को दशशाते हैं। पति अब पली को हीन, अधीनस्थ (४८४७), अश्रेष्ठ, तुच्छ था क्रम विदेकी नहीं मानता बल्कि गध्भीर मामलें में भी उसको सलाह लेता है और उस पर विश्वास करता है। जहा तक व्यक्त का अपनी पल्ली तथा माँ से निकटता (०0६०४८७४) का सम्बन्ध है, विशेष रूप से शिक्षित पुरुष का, वह अब दोनों के समान रूप से निकट है (गोरे वही 80) मात्पिता और बच्चों के बीच के सम्बन्धों का चार आधार पर-सत्ता धारण कस्ने, समस्याओं को चर्चा कौ आजादी, बच्चों द्वात माता पिता का विद्येष, और दण्ड देने के ररीकों--के सदर्भ में मूल्याकन किया जा सकता है। परम्पणणत परिवर प्ें मुखिया/कुल पिता (92४४५८०) के हाथ में ही शक्ति और अधिकार रहते थे। वह पूर्ण शक्तिवान होता था और परिवार के बच्चों की शिक्षा, व्यवसाय, विवाह और जीवन (८८८) आदि के विषय में सभी निर्णय करता था (कैथलीन गफ़, ७ मैक्किम मैरियट, 955 44 और रुष एम्शन .949 94) | समकालीन परिवार में--न केवल एवाकी बल्कि सयुक्त परिवार में भी--दादा का अधिकार समाप्त हो गया है। अब अधिकार कुलपिता से माता पिता में निहित हो गए हैं जो बच्चों के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले उनसे पसमर्श अवश्य लेते हैं। रॉस (96 : 20 ने भी माना है कि दादा दादी अब उतने प्रभावशालो नहीं रहे जितनी अपेक्षा को जाती है। एमएस. गेरे ने भी पाया कि (968 १3]) अब माता पिता ही बच्चों के स्कूल भेजने के विषय में तथा व्यवसाय, विवाह आदि के विषय में निर्णय करते हैं| बच्चों परिवार, विवाह और नावेदारी व जे भी अपने माता-पिता के साथ समस्याओं की चर्चा करना आरम्भ कर दिया है। वे अपने माता पिता का विरोध भी कंप्ते हैं। कापडिया (96 : 323) और मागीर कोर्मेक ॥॥॥हआा० (०ाग००। 969) ने पी पाया कि बच्चे अब अधिक आजाद हैं। कुछ धानिक उपायों ने भी बच्चों को अपने अधिकार माँगने की शक्ति दी है। शायद इसी कारण से माता-पिता बच्चों को दण्ड देने के पुराने तरीके नहीं अपनाते। शारीरिक विधियों (पोटना) की अपेक्षा वे आर्थिक और मनावैज्ञानिक विधियाँ अधिक अपनाते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच इन सम्बन्धों के बावजूद बच्चा न केवल इन अधिकारों के विषय में सोचता है बल्कि अपने माता-पिता व्रथा सहोदरों के कल्याण के विषय में भी सोचता है। वे अपने बड़ों से डरते हैं और उनका आदर भी करते हैं। साम-शवपुर तक्षा बहू के बीच सम्बन्ध में भी परिवर्तन हुआ है। यद्यपि यह परिवर्तन सास और बहू (आजा, त तराहा।टि-॥-३ए बाप परणाहा्ना-4फ्) में इतना अधिक नही हुआ है जितना कि श्वमुर और बहू के सम्बन्धों में। शिक्षित बहू श्वसुर से पर्दा नहीं करती। वह न केवल पारिवारिक मामलों पर बल्कि राजनैतिक मामलों पर भी श्वसुर के साथ चर्चा करती है। सभी दीन प्रकार के सम्बन्धों (पति-पली, माता-पिता-बच्चे और सास-श्वसुर और बहू) को एक साथ देखने पर यह कहा जा सकता है कि : ()) युवा पोढो अब अधिक व्यक्तिवादी होने का दावा करी है। (2) रक्त मूलक (०णा57/2७॥7८००५) सम्बन्ध विवाह मूलक सम्बन्धों के सामने महत्व नहीं रखते। 8) 'सस्कृति' ओर “वैचारिक तत्वों” के साथ-साथ 'ससाथन तत्व' भी सम्बन्धों को प्रभावित करता है। भारतीय परिवार का भविष्य (एश्षातह 0 पावाक्षा ख्िीए) कनाव ओर अतुकूलन (5#6565 क्राबं 4टफ/बधरा) क्या समुक्त परिवार के विरुद्ध वर्क उपयुक्त और प्रासंगिक हैं ? क्या लोगों के मूल्य वास्तव में बदल रहे हैं ? क्या लोगों की मूल्य व्यवस्था में गुणवत्तात्मक परिवर्तन का कोई साक्ष्य है जो सयुक्त परिवार सरवना को पूर्ण रूपेण एकाकी परिवार की ओर ले जा रहा है? यदि हाँ, ते पूर्व के मूल्य समकालीन युग में अपना भ्रभाव क्यों खोते जा रहे हैं? भारतीय परिवार का भविष्य क्या है ? भात में परिवार पर कोई भी दृष्टिकोण या तो युवाओं के मतों का सर्वेक्षण या विविध परिवार ढाचों के आम लोगों को राय का सर्वेक्षण करके या शहरी व ग्रार्माण क्षेत्रों में विभिन्‍न वर्गों और जातियों के लोगों के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करके आधुनिकता में परम्परा' के वैचारिक पैमाने पर विकसित किया जाता है। क्या अब तक भारतीय परिवार पर किए गए अध्यपन यह दर्शाते हैं कि भविष्य में कुछ परिवर्तन होने जा रहे हैं ? आख में परिवार के भविष्य का प्रश्न दो पश्टों से सम्बद है. [)) संयुक्त परिवार का क्या भविष्य है ? (५) सस्या के रूप में परिवार का भविष्य क्या है ? जहाँ तक प्रथप प्रश्न का सम्बन्ध है, यह सकेव पहले ही दिया जा चुवा है (पूर्व पृष्ठों में) कि हमारे समाज में सपुक्त परिवए पूर्ण रूप से कभी भो एकाकी परिवार में नहीं बदलेगा । दोनों ही सरचनाएँ 02 परिवार, विवाह और नावेदारी (सयुक्त व एकाकी) जारी रहेंगी। केवल सयुक्तता का स्वरूप हो आवासीय से प्रकार्यात्मक में बदलेगा और सयुक्त परिवार का आकर ही दो या तीन पीढियों के बाद कम होगा जहा तक परिवार के सस्था के रूप में भविष्य का प्रश्न है, इसकी चर्चा परिवार को प्रभावित करने वाले चार तत्वों के आधार पर की जा सकती है (जो परस्पर अलग-थलग नहीं है) (७) प्रौद्योगिकीय क्रान्ति तथा ऐसी सुविधाओं ( जैसे बिजली, घरों में नलों का पानी, गैस, फ्रिज, टेलीफोन, बसें और अन्य वाहन) तक पहुच डिन्हों ने आम आदमी के जीवन को बदल दिया है और जीवन शैली को ऊँचा उठा दिया है। परिवार पर औद्योगिक एव प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों का भी प्रभाव पडा है, जैसे उत्पादन कार्य, परिवार अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भरता की अधिकता, व्यावसायिक और जनसख्या गतिशौीलता, नातेदारी बन्ध्नों का कमजोर पडना, आदि। (9) जनसख्या क्रान्ति कृषि से निर्माण व नौकरियों की ओर झुकाव, ग्रामीण से शहर क्षेत्रों भें प्रव॒जन, जन्म व मृत्यु दर में कमी, जीवन के औसत में वृद्धि और परिवार में बडे बूढों की उपलब्धता, विवाह में परिवर्तन--छोटी उम्र से बडी उम्र में--आदि, ने पुनर्समायोजन को समस्याओं को पैदा कर दिया है, शक्ति सरचना में परिवर्तन कर दिए हैं, और लघु परिवार को चाह पैदा कर दी है। (८) लोकव्ात्रिक क्रान्ति लोकतत्र के आदर्श अपने अधिकारों की माँग, पैतृक सत्ता से बच्चों का छुटकाग, लोकतात्रिक प्रक्रिया निर्णय करने में, और परिवारवाद से व्यक्तिवाद में परिवर्तन, आदि परिवार में महत्वपूर्ण परिवर्तन कहे जा सकते हैं (0) धर्म निरपरेश् ऋत्ति धार्मिक मूल्यों से तार्किक मूल्यों को ओर झुकाव हो रहा है। पति के प्रति पली के दृष्टिकोण में परिवर्तन, कुसमायोजन के आधार पर तलाक की माँग, वृद्धावस्था में माता पिता कौ देखभाल करने में बच्चों की उदासीनता, पारिवारिक पूजा, आदि में 20808 तार्किक सोच के परिणाम हैं तथा नैतिक व धार्मिक मानदण्डों से विचलन की स्थिति है। सक्षेप में कहा जा सकता है कि गत कुछ दशकों से हमें भारतीय परिवार में अनेक प्रमुख प्रवृत्तिया दिखाई दी हैं। ये इस प्रकार हें. (0) एकाकी परिवार का बढ़ता महत्व, (2) कुछ कार्यों का कुछ अन्य सस्थाओं को स्थानान्तरित होना (जैसे, शैक्षिक, मनोरजनात्मक, सरक्षात्मक, आदि) 6) परिवार के सदस्यों की आयु सरचना में मौलिक परिवर्तन, अर्थात्‌ देखभाल करने के लिए कम अनुपात में बच्चे और अनुपात में अधिक वृद्धों का जीवित रहना। इस तथ्य ने देखभाल तथा समर्थन के कार्य के परिवार से राज्य एव बीमा कम्पनियों को स्थानान्तरित करना आवश्यक बना दिया है। इसने परिवार की शक्ति सरचना को भी प्रभावित किया है। (3) शिक्षा व बढदी आर्थिक स्वतत्रवा के कारण स्त्रियों को अधिक स्वतत्रता 6) परिवार नियत्रण से बच्चों को आधीनता में कमी 6) युवाओं के मूल्यों में परिवर्तन। यद्यपि वे बडों का आदर करते हैं तथा उनका डर मानते हैं लेकिन वे अपने व्यक्तिगत हितों के लिए ही मादा पिता का सहाय चाहते हैं। (7) यौन के प्रति घारणाओं एव व्यवहार में उदारोकरण। (8) पूर्व यौवनारम्भ (#८००००॥७) अवस्था से उत्तर यौवन अवस्था में विवाह ७) छोटा होता परिवार का आकार। वर्तमान में भारतीय परिवार की ये विशेषताएँ यह दर्शादी हैं कि परिवार सरघना और बन्यर्नों में परिवर्तन हो रहे हैं। परिवार की ये प्रवृत्तियों निरन्तर त्रक्रिया हैं। ये रुकी नही हैं। फिर भी, यह विचार सम्पव है कि परिवार का स्वरूप भविष्य में या अगले 25-30 वर्षों में क्या होगा। हैरेल्ड परिवार, विवाह और नावेदायी /६॥ क्रिसरेन्सन का अनुसरण (प्रणव (007४६४८६७, 975 : 40) करते हुए 2[ वीं शताब्दि के प्रथम एक-दो दशर्की में भारतीय परिवार में निम्नलिखित सम्भावित परिवर्तनों को कल्पना की जा सकती है : ] परिवार निरन्तर बना रहेगा। यह प्रजनन व बच्चों के लालन-पालन की राज्य-नियंत्रित व्यवस्था (#98-0ण॥7०0॥९९ 595०0) से कभी भी बदला नही जायेगा। 2, इसका स्थायित्व बाहर से सामाजिक दबावों या नावेदारी वफादारी की अपेक्षा अन्दर वैमक्तिक सम्बन्धों पर अधिक निर्भर करेगा। 3. यह सामुदायिक समर्थन एव सेवाओं पर अधिक निर्भर करेगा। 4 चिकित्सा में विकास के साथ परिवार अपनी जैविक प्रक्रियाओं पर अधिक नियंत्रण रख सकेगा। (यौन कार्यों को प्रजनन कार्यों से अलग रखने का, बीमारी और पृत्यु पर नियत्रण रखने का, और सन्तति का लिंग निर्धारण का) 5 पुनर्विवाह और तलाक दर ऊंची हो जायेगी। 6... माता-पिता और दादा-दादी अपने बच्चों और पोज पीढो को सहाय देते रहेंगे, भले हो वे स्वय सेवा मुक्त हो जायें। 7. परिवार में स्रियों की शक्ति-सम्बन्धी स्थिति लाधकारी रोजगार के द्वार और भी सुघोगी। 8 सामान्य दृष्टि से परिवार समतावादी («५०थ॥/क्षागए) नहीं होगा बल्कि पतिअपान बनी रहेगा। प्रकार्वात्पक एवं गार्क्सवादी दृष्टिकोण (0#॥0/0थद्र/5/ द्ढ्ट त/कटका ऐजफश्टथा 27) परिवार के भविष्य को भ्रकार्यात्मक और मार्क्सदादी परिरेक्ष्य में भी देखा जा सकता है। प्रकार्यवादी विचारक परिवार को समाज का एक महत्वपूर्ण अग मानते हैं। वे उन कार्यों से सम्बन्ध रखते हैं जो परिवार पूण करता है--(यौन, ्रजननात्मक, सामाजीकरण, शैक्षिक और आधिक)। प्रथम दो कार्य सकेत देते हें कि जैविक दृष्टि से परिवार जरूरी है जबकि अन्य कार्य बताते हैं कि परिवार सामाजिक और सास्कृतिक दृष्टि से भी लाभदायक है। क्‍या अन्य संस्थाएँ परिवार के कार्यों को छीन सकती हैं ? यह तर्क दिया जाता है कि चाहे अन्य संस्थाएँ भी परिवार के कार्यों को करें, वे परिवार को इन कार्यों में केबल सहायता हो दे सकती हैं, न कि परिवार को इन कार्यों से पूर्णत वचित या मुक्त कर कही हैं। हाल के हो वर्षों में पणिवए के कार्यों में सुधए हुआ है | परिवार अन्य ठप-व्यवस्थाओं को कुछ देता भो है और उनसे कुछ लेता भी है। परिवार की भूमिका साधारण है। परिवार पर दूसरा दृष्टिकोण मार्क्सवादी है। मार्क्सवादी विद्धान परिवार को सारचनातमक एवं लिंग (8००) सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। वे परिवार में पुरुष अधानता को ऐतिहासिक सन्दर्भ में समझते हैं। उनकी परिकल्पना है कि मानव कै सामाजिक विकास सबधी घुमक्कड (707790:०) अवस्था में पुरुष केवल आपम्भ करने (7८) का काम करते ये और अलग से न तो कोई यौन वर्वस्व (४७00४ ए055८६६४2४८5) अथवा निजी सम्पति होते थी! धीरे-धीरे पुरुष कार्यकलापों का थ्षेत्र विशिष्ट होता गया और शिकार ]04 परिवार, विवाह और नावेदारी के साथ साथ उन्होंने मवेशी-जनन, खान खोदना और व्यापार का काम भी ले लिया। पुरुषों में क्योंकि थन व सम्पत्ति पर अधिक नियत्रण ग्राप्त कर लिया, वे उन साथनों की तलाश में लग गए ताकि ये चीजें उनके साथ बनी रहें और उनके बच्चों तक पहुचें। इसके लिए वे सुनिश्चित करना चाहते ये कि उनकी सन्तानें कौन हो ? इस प्रकार मुक्त यौन सम्बन्धों का स्थान एक विवाह प्रथा ने ले लिया। परिवार पुरुष प्रधान और पितृप्तत्तात्मक हो गया। श्रम विधाजन का आधार लिंय हो गया और र्रया आपोन हो गईं। इस प्रकार महिला उत्मीडन जैविक न होकर ऐतिहासिक समस्या बन गई । अत मार्क्सवादी परिवार जीवन पर वर्ग के प्रभाव की बात करते हैं, विशेष रूप से सामाजीकरण पर। वे श्रम विभाजन को लिग्रीय मानते हैं जो कि सामाजिक रचना है और जो प्रकार्यवादियों की प्रकृतिवादी धारणा के विपरीत है। नारीवादी मार्क्सवादी यह स्वीकार करदे हैं कि यौन, प्रजनन, सामजीकरण और आर्थिक क्रियाओं का होना आवश्यक है किन्तु उस प्रकार नहीं कि र्त्री-श्रम का शोषण हो और उन्हें शक्त्तिहीन बना दिया जाये। इस अकार वे (बहुवादी-नारीवादी मार्क्सवादी) विश्वास करते हैं कि भविष्य में भी परिवार जीवित रहेगा लेकिन परिवर्तन होंगे (व्यक्तिगत स्वतत्रता, र्हियों की राजनैतिक आवाज, आदि)। यह दृष्टिकोण राजनैतिक है और महिला मुक्ति इसकी आन्तरिक भावना है। दूसरे शब्दों में परिवार नही टूटेगा, यह केवल अपने को अनुकूलित कर लेगा। अन्तर पीढोय सघर्ष और युवा असन्तोष (व९--(शाल्ट्राक्पं (क्री बण्वे १०प्रक्त (7650) एक विशिष्ट (080८) सामाजिक श्रेणों के रूप में युवा अधिकतर एक आधुनिक घटना है। जीवन की यह अवस्था बचपन/किशोर और कार्य के बीच लम्बे और सदा विस्तृत होते काल के काएण पैदा होती है। प्रारम्भ में तो बच्चा अपने परिवार के काम को जल्दी शुरू कर दिया करता था, किन्तु अब कार्य विशिष्टता और कौशल के साथ काम मिलने के लिए उसको वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। प्रारम्भिक आधुनिक औद्योगिक अर्थ व्यवस्था में शिक्षित और अनुशासित श्रम आपूर्ति की आवश्यकता होती थी लेकिन आज कुशल श्रमिक की आवश्यकता है, अत इस माँग को पूरा करने के लिए विशिष्ट प्रकार की शिक्षा दी जाने लगी है और आधुनिक युवा अधिकतर इसी की उपज हैं। जिस प्रकार सर्वहारा फैक्ट्री व्यवस्था को उपज हैं, उसी प्रकार आधुनिक युवा शिक्षा व्यवस्श की आशिक उपज है। सर्वप्रथम तो शिक्षा उच्च एवं मध्यम वर्ग का विशेषाधिकार था, लेकिन अब निम्न वर्ग (52, 8; 08९ सहित) को भी शिक्षा प्राप्त करने का सार्वभौमिक और वैधानिक अधिकार है। इस प्रकार सभी युवकों ने एक सहभागी रुचि (७7८0 727८७) पैदा कर लो है। एस एन एजेनटाड (8 ध. 8॥६८०5730/) मानता है कि अन्तर्पीदीय अन्तर्क्रिया अनौपचारिक मित्र समूहों में अधिक मुक्त वातावरण में फलतो हैं। सार्वभौमिक शिक्षा की तरह यद्याप कम सीमा में, उद्योग में काम और आफिस में नौकरो ने भी अनेक युवकों को अपनी पहचान बनाने और सामूहिक अनुभव भ्राप्त करने का आधार प्रदान किया है। कभी-कभी युवक प्रभावी मानदप्डों के विरुद्ध खडे हो जाते हैं और सास्कृतिक दृष्टि से विचलित जीवन शैली अपमा लेते हैं। यह युवा समूह, जो अधिकतर शिक्षा के प्रसग में पैदा हुआ है, वर्ग, लिग (8०४0८) और परिवार विवाह और नातेदारी 05 व्यक्तिवादिता ((त/जंत0७॥७) का प्रभाव दर्शाता है। इस प्रकार 950 के दशक के बाद युवा संस्कृति (और उप सस्कृति) का उदय हुआ । राजनैतिक स्ववत्रता और लोकतात्िक मूल्यों भे युवा वर्ण को अधिक अधिकारों को माँगने का अवसर प्रदान किया है। उन्होंने नये मूल्यों का विकाप्त कर लिया है औए उन लोगों का विशेष करना शुरू कर दिया है जिन्हें वे अपने उद्देश्यों और भाकाशाओं की प्राप्ति में बाधक समझते हैं। इन सब ने अन्तर भीदीय प््घर्ष पैदा कर दिये हैं, जैसे परिवार में बच्चों और माता पिता के बोच संघर्ष, शिक्षा संस्थाओं में छात्रें और शिक्षकों के बीच स्पर्ष, कार्यालयों में पुरने और नये कर्मचारियों के बीच संघर्ष, आदि। 950 और 2000 के बोच मोडिया ओर आम जनता भो युवा वर्ग से ग्रस्त (०05९5६८०) प्रतीत होती है। युवा वर्ग को पुरानी पीढी के साथ संघर्ष और उनके विरुद्ध खडे होने के प्रेरक तत्वों में प्रमुख हैं. पश्चिमी सस्कृति का प्रभाव, मनौरजन के वाणिज्यिक साधनों से लिए गए मूल्य, बढ़ता खाली समय, तथा माता-पिता की अधिक समृद्धि और शक्ति। पश्चिमी सस्कृति ने व्यक्तिवाद और समानता के आधार पर आधारित उनके मूल्यों को बदल दिया है, वाणिज्यिक मनोरजन ने उन्हें यह अनुभव करा दिया है कि उनके लक्ष्यों की प्राप्ति में हिंसा और धमको का क्‍या महत्व हो सकता है, अशकालिक शिक्षा ने उन्हें इतना खाली समय दिया है कि जिन कार्यों को च्यस्‍्त जीवन में पूरा नही कर सकते थे वे अब कर सकते हैं तथा पैतृक समृद्धि और शक्ति ने उन्हें प्रभाव डालने की शक्ति प्रदान कर दी है। इन सभी बातों में एक पिल सस्कृति को जन्म दिया है जिससे अशान्ति और अन्तर-पीढो संघर्ष पैदा हुए हैं। लेकिन क्या हम यह कह सकते हैं कि भारत के युवा भो अन्य समार्जो को तरह ही अपने माता एवं बड़ों का विशेष करते हैं ? यह सत्य हे कि सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भाख में माता-पिता एवं बच्चों के बोच सम्बन्धों भें परिवर्तत आया है किन्तु ये अध्ययन यह भो दर्शाते हैं कि बच्चे अपने माता पिता का सम्मान करते हैं, अपने जीवन से काफी सन्तुष्ट है, ओर वे चाहवे हैं कि उनकी शिक्षा, विवाइ, आदि पर महत्वपूर्ण फैसले उनके मात्ता-पिता हो लें। परम्पएगत परिवार में पिता ही सर्वशक्तिमान होता था। बच्चों का अपने बडों की बात का जवाब देना या उनसे महस करना खशब ढणके माने जाते थे। उन्हें बडों के कार्यों या आदेशों पर प्रश्व नही पूछना होता था। यहा वक कि वे बच्चे जो दूर शहरों में चले जाते थे, सैद्धान्िक छूप से परिवार के सदस्य बने रहते थे। अठ बे पितृ नियंत्रण में हो रहते थे, यद्यपि वे उनके दैनिक मामलों पर नजर नहीं रख पाते थे। 96 में एमएसगोरे ते परिदार पर अपने अध्ययन में उत्तरदाताओं से पूछा कि परिवार में बच्चों के स्कूल भेजने, व्यवसाय, जीवन-साथो के चयन में प्रमुख निर्णय कौन लेता था ? उसने पाया (98 38) कि बहुत अधिक मामालों में बच्चे अपने निर्णय लेने के लिए स्ववत् नहों थे और योडी सख्या में ही बच्चे ऐसे मामलों को अपने हाथ में लेते थे। माएरिट कौरपैक 0969) ने अपने 500 विद्यार्थियों के अध्ययन में पाया कि आधे से ज्यादा (55%) उत्तर्दाता कभी-कभी (६०शा८धा7८5) अपने माता पिता का विरोध बरते थे, कुछ (3 (६४) (65) अक्सर (जात) विगेष करते थे, और एक तिहाई कभी विश्येध नहीं करते थे । आईप्ी देसाई ने पुणे में हाई स्कूल के विद्यार्थियों के अध्ययन में पाया कि माता-पिता एवं 06 परिवाद, विवाह और नावेदारी उनके पालकों (#705) के बीच गम्भीर तनाव थे। उसके सर्वेक्षण में 68 के लगभग उत्तरदाताओं ने बताया कि कई बार उन्होंने घर छोडने की इच्छा को थी। उनमें से [7 ने इसके कारण भी बताये थे। लगभग 64 प्रदिशत अलग होना चाहते थे क्योंकि उनके माता पिता का व्यवहार निरकुश, अपमानजनक, अनुपयुक्त और अन्यायपूर्ण था, 9 प्रविशत खराब पारिवारिक वातावरण के कारण तथा उससे उत्पन्न तनाव की वजह से चाहते थे, 0 अ्तिशत परिवार में झगडों के कारण और शेष 7 प्रतिशत अन्य कारणों से चाहते थे। पुरानो पीढी ठथा नयी पीढी के बीच सघर्षों के कारण इस प्रकार थे (॥) युवकों में यह भावना कि उनके बडे अपने प्रघुतापूर्ण अनुपयुक्त व अन्यायपूर्ण व्यवहार को उनके ऊपर थोपना चाहते थे 0) युवकों में बढ़ता हुआ यह विश्वास कि वे अपने माता पिता से सास्कृतिक दृष्टि से अधिक उनविशील हैं! 6) युवकों को यह भावना कि उनके बडों के सख्त मिजाज के कारण उनका व्यक्तिवाद दब जाता है। (3) युवकों की आकाक्षाए व आवश्यकताए उस रूप में पूर्ण नहीं होती जैसी वे उम्मीद करते हैं। ७) सामाजिक रीति-रिवाजों और धार्मिक विश्वासों के प्रति दृष्टिकोण में अन्दर। बीवी शाह (॥964) का बडोदा विश्वविद्यालय के 200 छात्रों का अध्ययन दर्शाता है कि युवक अपने जीवन साथी के चुनाव में पूर्ण आजादी नहीं चाहते बल्कि चयन माता पिता से मिलकर करता चाहते हैं। लगभग तीन चोथाई छात्र (66 5%) अपना जोवन-साथी अपने माता पिता को सलाह से चुनना चाहते थे, एक तिहाई 2.5%) अपनी इच्छा को अधिक महत्व देना चाहते थे, और केवल 0 प्रतिशत यह चयन केवल माठा पिता की इच्छा से ही चाहते थे। मार्गरेट कोस्मैक ने भी पाया कि उसके उत्तरदाताओं (ग्रिन-पिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र) में से 65% चाहते थे कि विवाह मादा पिठा द्वाय बच्चों की सहमति से निश्चित किये जायें, 3 प्रतिशत माता पिता द्वाय बच्चों की सहमति के बिना, और 32 प्रतिशत अपनी इच्छा से चाहते थे। विमल शाह (975) ने गुजराद विश्वविद्यालय के विभिन जातियों के (लडके लडक्यों) हिन्दू स्नातक छात्रों में से 28 छात्रों पर किये गये अध्ययन में पाया कि 92 प्रतिशत लडकियाँ और 66 प्रतिशत लडके सुनिश्चित किये गये (#77872०0) विवाह में विश्वास करते थे। यह युवकों का परम्परागत प्रतिमानों के प्रति लगाव तथा उनसे कम विचलन की स्थिति को दर्शाता है। कुछ वैधानिक उपायों ने भी माय पिता व बच्चों के बीच सम्बन्धों में दरार पैदा वी है। माता-पिता अपने बच्चों को अपनी सम्पत्ति में से हिस्से से वचित नही कर सकते। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 956 के अनुसार बिना वसौयत किये (7॥६5४७७) मरने वाले हिन्दू पुरुष की सम्पत्ति का अधिकायन्तरण उसके विशिष्ट उत्तराधिकारियों (५9८०/०त धथाओ) को हो होगा। दूसरी ओर ऐसे मामले भी हें जहाँ बच्चे सम्पत्ति के मामलों में अपने माता पिता पर मुकदमा दर्ज कं देते हैं, उनकी उपेक्षा अवहेलना (उ८ट्ठाथ) करने के लिए उनवी आलोचना भी करते हैं जिसके कारण वे (बच्चे) मदिरापान, नशे की आदव आदि के शिकार हो जाते हैं और असुरक्षा की भावना से पोडित रहते हैं। आरोप यह है कि परिवार सामाजिक नियत्रण के अभिभावक के रूप में प्रभावी भूमिका निर्वाह में असफल हो रहा है। लेकिन यही आगेप पुलिस और स्कूलों के विरुद्ध भो लगाया जा रहा है। किशोर अपराध, युवा अपर, परिवार, विग्रह और नावेदारी ॥ नशे की लत, आदि के कारणों का वृहत्‌ समाज में पता लगाया जाना चाहिए, न कि एकीकरण के सघर्षों या परिवार को असफलताओं में | हम केवल यह मानते हैं कि गत कुछ दशकों के अनुमदि प्रधान एवं लोकतात्रिक आदर्श परिवार और समाज के भीतर दोनों जगह नियत्रण बनाए रखने के साधन के रूप में शारीरिक दण्ड को विश्वसनीयता में कमी आई है। समाज में कुछ तुलनात्मक विस्तृत परिवर्तनों के बिना परिवार के भीतर अनुशासन के अधिक पसण्मएत्मक स्वरूपों के विस्तृत पैमाने पर पूर्ववत्‌ होने की कल्पना करना कठिन है। विवाह व्यवस्था (#थ्रातंभ९ $750्) हिन्दू विवाह ; अवधारण| प्रकार और जीवन-साथी चयन (परए१० फैगियगंग8९ ; (०००९०३६ 707९5 जाए नर 56 6०लाॉण) सपमाजशास्त्रियों द्वात विवाह को झटी और पुरुष की भूमिकाओं की व्यवस्था के रूप में देखा जाता है जिनके सयोग को पत्रि पल्लीं के रूप में प्रमाज द्वाय मान्यता दी गई हो। इस व्यवस्था के रान्तुलन के लिए दो सहमोगियों के बीच अनुकूलन की आवश्यकवा होदी है ताकि एक (सहयोगी) को भूमिका अदायगी दूसो को भूमिका अपेक्षाओं से मेल खाती हो (गॉबर्ट ओ ब्लड, 960 ; 289)। भारतविधाशास्त्री हिन्दू दिवाह को एक सस्कार मानते हें जिसके धर्म (धार्मिक कर्तव्यों की पूर्कि, रति (यौन सन्तुष्टि) और अजा छजनन), तीन उद्देश्य हैं। धर्म के लिए किया गया विवाह धार्मिक विवाह कहलाता है, जबकि यौन सुख के लिए किया गया विवाह अश्ार्मिक विद्रह कहलाता है। वियाह को पवित्र माना जाता है जिसके अनेक कारण बताए गए हैं. (0) धर्म विवाह का सर्वोच्च उद्देश्य है, (५) विचाह समाऐह में कुछ सस्कार शामिल हैं (जैसे, हवन, कन्यादाव, पामिग्रहण, सप्त पदो, आदि) जिन्हें पवित्र माना जाता है, (॥) यह संस्कार पवित्र ब्राह्मणों द्वाा पवित्र वेद भन्थों से मत्रोच्चारण के साथ पवित्र अग्नि देव के समश्ष सम्पन्न होते हैं; (७) समोग (बन्धन) (स्त्री पुरुष के बीच) अदूट व अटल माना जाता है, (४) स्री को परविजद्या और पुरुष की बफ़ादारी पर बल दिया जाता है। आज भी विवाह की पवित्रता इस सत्य के बावजूद भी मानी जाती है कि विवाह सहचारिता (८०४०४०४०॥ेंआए) के लिए होता है,न कि कर्तव्यों के पालन के लिए, और जब यह अप्तफल हो वो यह वलाक द्वाण विच्छेदित मानी जाये। परस्पर विश्वास और साथी के प्रति बफ़दारी आज भी विवाह के आवश्यक तत्व माने जाते हैं। कापडिया (भारत में विवाह और परिवार, 966) ने भी कहा है, हिन्दू का पवित्र सस्‍्कार के रूप में आज भो जारी है, यह केवल नैतिकता को सतह पर उठ गया है।" सरल शब्दों में, हिन्दू सस्कृति में विवाह आध्यात्मिक अनुभूति (८359॥07) के लिए छी पुरुष के बीच आत्मिक बन्धन (5७70७ एा००) है। हिन्दू सस्कृति उपरोक्त ब्रह्म विवाह के अतिरिक्त अपेक्षाकृत कम और निल्‍्त आदर्शों धात्ते विदाह के साठ अन्य स्व्पों को भी मानती है। इनमें से चार विवाहों को अधार्मिक विवाह की सड्ञा दी जाती गयी है। 308 परिवार, विवाह और नावेदादी ये हैं ; गन्धर्व (समाज की मान्यता प्राप्ति से पूर्व हो यौन व्यवहार में प्रवेश), अमर (स्री को भगा ले जान), साक्षत्त (द्वी को घर से जबरदस्तो ले जाना) और प्रैशाच (सोई हुई स्री का नरो में या असन्तुलित मस्तिष्क की अवस्था में शौल भग करना)। शेष तीन जिन्हें धार्मिक माना गया है देव (स्री का विवाह किसी पुजाते, धनवान या बुद्धिमान व्यक्ति से जो कुलौन वर्ग का हो), ग्जापत्य (यौन तुष्टि और सन्तान के जैविक कार्यों के उद्देश्य से सम्पन्न विवाह), और आर्ष (बुद्धिमान व च॑सििवान व्यक्ति से विवाह (ऋषि) जो कि विवाह का इच्छुक न हो ताकि वह बुद्धिमान सन्ता? प्राप्त कर सके और अच्छा घरेलू वातावरण प्राप्त कर सके)। चार अधार्मिक विवाहों की 'विवाह' की मान्यता देने में प्रमुख कारण “आहत' र्री को 'सम्माननीय पल्नी' का दर्जा स्वीकृत करना था। हिन्दू समाज में जीवन साथी के चयन सम्बन्धी नियम अन्तर्विवाह, बहिविवाह और अनुलोम विवाह की अवधाण्णा में निहित हैं। अन्तर्विवाह सामाजिक कानून के अनुसार व्यक्ति को अपनी ही जाति या उपजाति में से जीवन साथी का चयन करना पड़ता है, बर्हिविवाह सगोत्र और सपिण्ड समूह से चयन का निषेध करता है (अर्थात्‌ चचेग, मेरा, फुफेश या मौसेरे सहोदश्ज सतति का विवाह नहीं होता) और अठुलोम विवाह के अगुप्तार उच्च जाति का लड़का निम्न जाति की लडकी से तथा लडकी इसके विपरीत, विवाह कर सकते हैं। प्रारम्भिक समाज में जाति अन्तर्विवाह क्रियात्मक था क्‍योंकि इससे जाति के व्यवसायिक भेद सुरक्षित रहते थे, जाति को एकता बनी रहती थी, और जाति की सदस्यता और शक्ति में कमी पर अकुश लगता था। पल्न्तु वर्दमान समाज में वैवाहिक अनुकूलन को सरल बनाने को छोडकर, यह (जाति अन्तर्विवाह) विकार्यात्मक हो गया है क्योंकि यह अन्तर्जातीय तनाव पैदा करता है जो देश की ग्जनैतिक एकता को दुष्प्रभावित करवा है, जीवर साथो के चयन क्षेत्र को सौमित व परिस्थितिपएक बना देता है तथा दहेज, बाल विवाह आदि की समस्याएं उत्पन्न करता है। वाल्वल्कर (४४॥५वा८्य) के अनुसार बर्हिविवाही निषेध (४0005) माता पिता और सन्तान उथा सहोदर्ऐे के बीच मुक्त वैवाहिक सम्बन्धों को प्रतिबन्धित करने के लिए बंगाए गये थे। काने ( पर्मशात्र का इतिहास, 930) ने माना है कि बहिविवाह प्रतिबन्ध वशातुक्रम से चलने वाले पारिवारिक दोषों को फैलने से रोकने के लिए और इस डर से कि कहीं गुप्त प्रेम प्रसगों को प्रोत्साहन न मिले, परिणामत नैतिकता का हास न हो, आदि के लिए लागए गए थे। यद्यपि आज ये तर्क स्वीकार नही किए जाते हैं क्योंकि वश का नाश उन गैर हिंदू समुदायों (मुसलमानों) में कही नहीं देखा जाता जो सहोदरज-सतति विवाह (०००४० प्राशध0१८७) करते हैं। कापडिया (966 27) ने कहा है कि सपिन्ड बहिर्विवाह का नियम एक प्रकार की पवित्र सिफारिश के रूप में था और आठवी शताब्दि के अन्त वर्क चलता रहा। आज, यद्यपि, यह नियम अधिकदर सभी हिन्दुओं द्वारा पालन किया जाता है फिर भी सहोदरज-सतर्ति के बोच विवाह भी हो जाते है। आज जोवन साथी के चयन के ठौन बिन्दु देखे जाते हैं, चयन कौन कर्ता है (959 (० 5८६०ा००), चयन का आधार क्या है, और चयन के ज्षेत्र क्या हैं? पहले जब जीवन साथी का चुनाव माता पिता द्वास किया जावा था, अब बच्चे सम्मिलित चयन में विश्वास करते हैं जिसमें माता पिठा व बच्चे शामिल हों, यद्यपि व्यक्तिगत चयन के मामले भी विर्ते परिगाए विवाह और बवेदारे 409 नहीं हैं (बच्चों के द्वाश स्वय चयन)। माता-पिता द्वारा साथी के चयन के आधार बच्चों के चयन के आधार से भिन होते हैं। माता-पिता द्वारा चयन में परिवार अत्थ्रिति, सस्कार, जाति, दहेज, आदि को महत्व दिया जाता है, जबकि बच्चे शिक्षा, चरित्र, शारीरिक रूप रग, दक्षताए एव गुणों को महत्व देते हैं। आज कल सम्मिलित चयन में परिवार की आवश्यकताओं, तथा जीवन साथी लागे वाले व्यक्ति के हितों को ध्यान में एखा जाता है। आश्चर्य नहीं कि बीज़ी. शाह, मारिट कोरमैक, विमल शाह, आदि जैसे विद्वानों के अध्ययनों ने दर्शाया कि बहुत सख्या में लड़कों और लकडियों भे बताया कि वे अपना जीवन साथी अपने माता-पिता की सलाह से चयन करना चाहते हैं। हिू विवाह व्यवस्था में परिवर्तन ((8था8९ ॥ घत्तारप 'रव्रारंधहुर $ए४छा) हिन्दू विवाह व्यवस्था में हुए परिवर्तनों का विश्लेषण सात क्षेत्रों में किया जा सकता है. विवाह का उद्देश्य, जीवन साथी के चयन कौ प्रक्रिया, विवाह का प्रकार, विवाह की आयु, विवाह के आर्थिक पक्ष (दहेज), विवाह कौ स्थिस्ता, और विधवा पुनर्विवाह। इनमें से हमने पूर्व पृष्ठों में दो क्षेत्रों अर्थात्‌ विवाह के उद्देश्य में परिवर्तन (धर्म' से 'साहवर्य' तक), और साथी के चयन में परिवर्तन (पक्ष, आधार, और चयन का छेत्र) पर पहले ही चर्चा की है। विवाह के स्वरूप में परिवर्तन से तात्पर्य है महुपली प्रथा से एक विवाह प्रथा में परिवर्तन, और विवाह आयु में परिवर्तन दर्शाता है पूर्व-यौबनारम्भ में विवाह से उत्तर यौवन काल में विवाह में आये परिवर्तन। शेष तीन परिवर्तनों की विवाह कानूनों का विश्लेषण कर के परखा जा सकता है। विवाह काबून (कत्रगांधह ।धट्ज०तणा) भारत में प्रचलित कानूनों का सम्बन्ध छह तथ्यों से हैं. (0) विवाह के समय आयु, () जीवन साथी चयन का क्षेत्र, 8) विवाह में पलियों की सख्या, () विवाह विच्छेट, ७) दहेज, और 6) पुनर्विवाह ! बाल विवाह निषेध अधिनियम, 929 (978 में सशोधित, विवाह के समय आयु से सम्बन्धित), विशेष विवाह अधिनियम, 954 (विवाह के समय आयु, माता पिता की पहमति के बिना बच्चों को विवाह को आजादो, द्विविवाह और विवाह विच्छेद से सम्बन्धित), हिन्दू विवाह अधिनियम, 955 (जो 986 में सशोधित किया गया और विवाह के समय आयु, माता पिता की सहमति से विवाह, तथा विवाह निरस्त होने की व्यवस्था से सम्बन्धित है), रहेज वितेष अधिनियम, ]960, और विधवा पुनर्विदाह अधिनियम, 856 प्रमुख है। विवाह की आयु से सप्वन्धित प्रथय तीन अधिनियमों 929, 4954 और 955) में लडकियों के लिए विवाह आयु 8 वर्ष और लडकों की आयु 27 वर्ष होने का प्रावधान किया गया है। इन अधिनियमों में अन्तर यह है कि 929 के (978 में संशोधित) अधिनियम में दिए गए आवधानों का उल्लंघन विवाह को निरस्त नहीं करता। इसमें केवल दूल्हे, उम्रके माता-पिता और पडित के लिए दण्ड का प्रावधान है (छी के लिए महीं)। केद्रीय सरकार अब राज्य सरकारों कौ अनुमति से नवम्बर 2000 में समद में बिल लाकर [929 के कादूत में सशोधन कर चार परिवर्तन लाने का सोच रही है - 6) राज्य सण्काएं द्वार बाल-विवाह रोकपाम अधिवारियों की नियुक्ति, (9) कावून के उल्लघन के लिए कठोर दष्ड, (थ) कानून के उल्लघन के कारण विवाद को ही अवैध मानना, और (४) जो ह0 परिवार, विवाह और ग्रावेदारी बाल-विवाह में उपस्थित हो उनके लिए ऐसे विवाह को सबधित अधिकारियों को रिपोर्ट कला (द हिन्दुस्तान टाइम्स, सितम्बर 72, 2000) । 955 का अधिनियम आयु प्रावधान के उल्लघन भर विवाह को निरस्त करना सम्भव बनाता है। इस अधिनियम में माता-पिता की सहमति से विवाह किया जाता है लेकिन 954 के अधिनियम में न्यायालय के माध्यम से सम्पन्न विवाह ही आते हैं, भले ही उनमें माता-पिता की सहमति हो या नहीं। ये दोनों हो अधिनियम (9584 व 955 का) द्विविवाह को प्रतिबन्धित करते हैं तथा विभिन्‍न आधारों पर तलाक की स्वीकृति देते हैं और निषिद्ध सम्बन्धों की परिधि में विवाह पर अतिबन्ध लगाते हैं जब तक रिवाज ऐसे विवाह की स्वीकृति न दे। 96 के दहेज विशेधी अधिनियम ने दहेज लेना और देना एक बडा अपराध माना है। विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 856 विधवा को पुनर्विवाह कौ स्वीकृति देता है लेकिन पहले पति की सम्पत्ति में से भरण पोषण के अधिकार से वचित करता है। हिन्दू उत्ताधिकार अधिनियम, 956 व्यक्ति की सम्पत्ति में से पुत्रियों को भी पु व भाइयों के बराबर हिस्सा प्रदान करता है। लेकिन क्‍या सामाजिक अधिनियम दहेज व बाल विवाह जैसी विवाह और परिवार से सम्बद्ध समस्याओं को समाप्त कर सकेंगे और ख्लियों के प्रति शोषण रोक कर उनकी प्रस्थिति को ऊँचा उठा सकेंगे ? हम स्वीकार करते हैं कि सामाजिक कानून समाज व सस्कृति को नयी दिशा देने, परिवर्तन लाने, तथा लोगों की सामाजिक आवश्यकताओं और सामाजिक राय के बीच खाई को भरे से बुराइयों को दूर करने के लिए आवश्यक हैं। 952 में डा राधाकृष्णन ने भी विवाह से सम्बन्धित विधेयक प्रस्तुत करने पर कहा था, “प्राचीन इतिहास आधुनिक समाज की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता ।” सामाजिक कानून का कार्य उस समाज के लिए कानून व्यवस्था को लगातार समयोजित रखना है जो कि निस्‍्ता बदलता रहता है। लेकिन क्या सरकार इन कानूनों के क्रियान्वयन में गम्भीर है ? इन सभी अधिनियमों में कमियों को कौन नहीं जानता ? कानून का उल्लघन करने वालों के विद कार्यवाही करने में पुलिस की उदासीनता और कोवाही को कौन नहीं जानता 7? यद्यपि सामाजिक कानून आवश्यक हैं लेकिन इन्हें लागू करने की इच्छा भी अधिक महत्वपूर्ण है! मुसलमानों में विवाह (१[8778986 708 'भएचञाए5) मुस्लिम समाज न केवल शिया और सुनियों में स्तरीकृत है बल्कि अशरफ (सैव्यद, शेख, पठान, आदि में), अजलब (मोमिन्स (जुलाहे), मन्सूरी (कपास साफ़ करने वाले), इब्राहीम (लाई) आदि) और अरजल (हलालखोर आदि) में भी। अशरफ लोग कुलीन जन्म के, अजतब निम्न-ज्स के और अरजल सबसे निम्न जन्म के होते हैं। ये सब समूह अन्तर्विवाहः (240 ९88300%) हैं और उनमें अन्तर विवाह को बुरा माना जाता है तथा हतोत्साहित किया जाता है। मुस्लिम विवाह, जिसे निकाह कहते हैं, हिन्दुओं के विवाह पवित्र बन्धन के विपरीत एक नागरिक सविदा (०शा ८००४०८) माना जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं : नियत्रण, बच्चों को जन्म देना और परिवार को चलाना, बच्चों का लालन पालन और जीवन को व्यवस्थित करना। एससी सरकार भी मानता है कि मुस्लिम विवाह धार्मिक कर्तव्य नही है। यह एक प्रकार की निष्ठा (6०४०४०४) या इबादत है। जग (953) यह कहते हुए परिवाट्‌ विवाह और गावेदारी | अधिक सही हैं कि निकाह मधपि संविदा है पप्तु साथ ही इबादव का कार्य भी है। लेकिन निश्चय ही यह सस्कार (5३८:छ7८०/) नहीं है। मुस्लिम विवाह की पाँच विशेषताएँ हैं. () प्रस्ताव और उसकी स्वीकृति, (0) विवाह सविदा करने की क्षमता, 69) समानता का सिद्धान्त, (0) वरीयता प्रथा, और (३) मेहर। अस्ताव मौलवी और दो मवाहों की उपस्थिति में दिवाह उत्सव से पूर्व दूल्हे द्वारा दुल्हिन के सामने किया जावा है। विवाह को “सही' (नियमित्र) मायने के लिए यह आवश्यक है कि प्रस्ताव और उसको स्वोकृति, दोनों एक ही बैठक में होनी चाहिए। ऐसा न करने पर विवाह 'फासिद' (अनियमतिं) हो जाता है, लेकिन 'बातिल” (अवैध) नहीं होता है। 'फासिद” विवाह "सही में बदला जा सकता है, लेकिन “बातिल” विवाह नहीं। 'फासिद” विवाह के निम्न उदाहरण हैं प्रस्ताव रखते समय और स्वीकृति के समय गवाहों की अनुपस्थिति, पुरुष का पाँचवा विवाह, इृदत को अवधि (पति की मृत्यु या तलाक के बाद तीन मासिक धर्म अवधि के लिए पृथक॒ता का समय) में स्त्री का विवाह नथा पति पली के बीच पर्म में अन्तर। “बाविल' विवाह के निन्‍्म उदाहरण हैं ऐसे व्यक्ति के साथ विवाह जो पूर्ति पूजज़ या औग्नि पूजक हो, बहुपति प्रथा, किसी समरक्त नातेदार (८०७७००५७८०॥5 ॥00) से विवाह (जैसे पिता कौ बिन, माँ की बहिन, अपनी बहिन या भाई, बहिन की लडकी, बेटे की बहू, आदि)। संविदा करने को क्षमता से अर्थ है बाल विवाह को मान्यता न देना या असन्तुलित मस्तिष्क वाले व्यक्ति के साथ विवाह को मान्यता न देना। शिया कानून अल्प वयस्फ के यली को उसके विवाह का सविदा करने को अधिकार देता है। अल्प वयस्क के सम्बन्धी 'फजूली' द्वार सविदा किया हुआ विवाह अल्प व्यस्क को यौन अवस्था भ्राप्त कर लेने के बाद विवाह को अनुसमर्थन करवा लेने का अधिकार देवा है। अतुसमर्थन कराने की प्रधा और अस्बीकृति का पिकल्प 'खैरल बालिग' कहलावा है। समानवा के सिद्धान्त का अर्थ है निन्‍्म प्रस्थिति के व्यक्ति के साथ विवाह न करना। ऐसे विवाह को हेय दृष्टि से देखा जावा है। इसी प्रकार भाग कर किया हुआ विवाह (किफा) भी मान्य नही होता। वरीयता श्रया का अर्य है पहले तो सपानान्तर (9//शी०) सहोदस्ज सतति (चेवेण, मौसेण) को वरीयता देना फिर विलिंग (०००७) सहोदरज सतदि (केवल ममेण, फुफेरा नहीं) को। लेकिन इन दिनों सहोदरज सतति से विवाह को हवोत्साहित किया जाता है। ग्रेह प्रथा का अर्थ है वह धन जो पत्नी विवाह के विवार से पति से लेने को अधिकारी होदी है। मेहर निश्चित' ( #ल्‍्थीट्वी) या उपयुक्त” (09८) हो सकती है। मेहर 'फौरो' (97०7५) (पति की मृत्यु या वलाक के समय देय) या 'विभेदी' (6८८४८०) हो सकती है। एक बार तो मुस्लिमों में 'मुता' (अस्थाई) विवाह की भी प्रथा थी लेकिन अब चह समाप्त कर दी गई है। मुस्लिम समाज में तलाक न्यायालप के हस्तछ्षेप से या बिना हस्तक्षेप के पी दिया जा सकता है। स्ली अपने पति को न्यायालय के माध्यम से हो तलाक दे सकवी है किन्तु पुरुष ड्वाप न्यायालय जाये बिदा भी पलो को तलाक दे सकता है और एक 'तुहरर को अवधि में (एक मासिक धर्म को अवधि अर्थात एक माह) एक ही घोषणा से तलाक दे सकता है (वलाक अह्सन), या दौन 'तुहए अकधियों में ठोव बार तलाक उद्घोष (9:090०ए४८८म८४/) के साथ ठलाक दे सकता है (तलाके हसन) या एक ही “तुहर' में तौन बाएं उद्धोष के ; व2 परिवाद विवाह और नवेदारी (तलाक-ए-उल्वित) दे सकता है। इन तीनों प्रकार के तलाक के अलावा तीन अन्य प्रकार के तलाक भी होते हैं. 'इला', जिहर', और 'लियन'। 'इला' में पति अल्लाह के नाम पर कसम खाता है कि वह अपनी पली से चार माह तक या निश्चित समय तक यौन सम्बन्ध स्थापित नहीं कोणा। इला' के बाद यदि वह वास्तव में यौन सम्बन्ध स्थापित नहीं करता है रब विवाह विच्छेदित मान लिया जाता है। 'जिहर' में पढि दो गवाहों को उपस्थिति में घोषणा करता है कि उसकी पली उसकी माँ के समान है। जिहर से विवाह विच्छेद नहीं होता बल्कि यह पली को अपने पति मे तलाक का आधार प्रदान करता है | 'लियन' में पति अपनी पल पर दुष्वरित्र होने का आरोप लगाता है। इससे पलो वो न्यायालय में जाकर दलाक लेने वा आघार मिलता है। पति पत्नी को परस्पर सहमति से किया तलाक “खुला' बहलादा है (जो कि पलौ की पहल पर होता है) या 'मुबारत' कहलाता है (पति मा पली की पहल पर)। तलाक के बाद पल्लो को अपने पति से भरण पोषण भत्ता प्राप्त करमे का अधिकार नहीं होवा। लगभग ॥5 वर्ष पूर्व उच्चतम न्यायालय ने एक महिला शाहबानों को भरण पोषण भत्ता स्वीकृत किया था। किन्तु इस निर्णय को मुस्लिम नेताओं ने चुनौती दो थी और इसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में हस्तक्षेप बदाया था, अंत सरकार को विधान में ही सशोधन करना पडा था। फरवरी 993 में, उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी एक हमीदन और उसके दो बच्चों को भरण पोषण भत्ता स्वीकृत किया था। अखिल भास्तीय मुस्लिम पर्सनल लॉ परिषद्‌ ने उच्च न्यायालय में एक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। ये सभी विशेषद्ञाएँ विवाह के उद्देश्यों और आदर्शों, विवाह की प्रकृति, विवाह और विवाह विच्छेद के सन्दर्भ में हिन्दू और मुस्लिम विवाह के बीच अन्तर दर्शाती हैं। अब यह माना जाता है कि मुसलमानों का बहुपली विवाह और बडी सख्या में तलाक देना सब गलव धारणा है। अब उन मुसलमान व्यवकितियों की सस्था जिनके पास दो या अधिक पल्या हैं, नगण्य है। कहा जाता है कि हिन्दुओं में द्विविवाह के मामले अधिक हैं। इसी प्रकार मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दुओं और सिकखों में तलाक अधिक होते हैं। भारतीय साख्यिकी सस्थान द्वारा संकलित ऑकडे दशशावे हैं कि गैर मुस्लिम 000 लोगों में से 72 के पास एक से अधिक पल्िया हैं जबकि मुसलमान 000 पुरुषों में 5 के पास ही एक से अधिक पलिया हैं (हिदुस्तान टाइम्स, जनू 27, 998) । पूर्व में र्हियों की प्रस्थिति पर गठित समिति की 975 में प्रकाशित एिपोर्ट ने भी दर्शाया है कि बहु विवाह का होना जनजातियों में सर्वाधिक है (525%), त्तपश्चात बौद्धों में ८ 97%), जैनों में 6 75%), हिन्दुओं में (68%) और मुसलमानों में 57%) (जोनत शौकत अलो, दी एम्परावस्मेन्ट ऑफ विमेत इस्लाग विद स्पेशल रेफरेन्स दू मैरियेज़ एण्ड डाइवोर्स, १995) समान नागरिक सहिता (एक एज्ा ए०्व्ले मुसलमानों में एक तरफा बहु विवाह तथा तलाक की इतनी आलोचना होती है कि अनेक लोग विवाह के मामले पर समान नागरिक सहिता की माँग करते हैं। मुसलमान लोग इसी विरोध कप्ते हैं क्योंकि वे न केवल इसे मुस्लिम पर्सनल लों में हस्तक्षेप मानते हैं बर्लिक परिवार; विवाह और जतेदारी व3 इसलिए भी क्योंकि समान सहिता की विषय सामग्री मुख्यत . हिन्दू अधिनियम से ही ली जायेगी। विकास अध्ययन सस्थान (दी हिन्दुस्तान याइम्स, जनवरी , 996) के द्वार 995 में अलीगढ़ में 395 व्यक्तियों ((87 हिन्दू और 208 मुसलमान) पर एक सर्वेक्षण किया गया था। कुल उत्तादाताओं में से लगभग 60 प्रतिशत ने अपनी धार्मिक पृष्ठभूमि के बावजूद समान सहिता के लिए अनिच्छा व्यक्त की । दूसरी ओर धार्मिक पृष्ठभूमि के आधार पर 74 अविशत हिन्दुओं और 9 अतिशव मुप्तलमानों ने समान सहिता कौ आवश्यकता व्यक्त की | समान सहिता के पक्ष में तर्क थे : (0) ग़्ठीय एकता ओर धर्म निरपेक्षता को प्रोत्साहन मिलेगा, (2) बढती साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा पर अकुश लगेगा, 0) नागरिक न्याय की प्रक्रिया को बल्ल मिलेगा, और (4) लिंग पूर्वापह कम होंगे और खियों में समानता की भावनाएं बनी रहेंगी । 34 मुसलमान जिन्होंने समान सहिठा का समर्थन किया पेशेवर और सफ़ेदपोश व्यक्ति थे (डाक्टर, वकील, कालेज शिक्षक, कार्यालय कर्मचारी व छात्र)। समान सहिता के विरुद्ध तर्क थे . (।) मुसलमान स्वय किसी परिवर्तन को आवश्कयता महसूस नहों करते, (2) शजनैतिक समूह अपने वोट बैंक बनाने के लिए लोगों की घार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं, 5) मुसलमान मानते हैं कि हिन्दू अपने सास्कृतिक मूल्य उन पर थोपना चाहते हैं क्योंकि समान सहिता के प्रावधान हिन्दू कानूनों से लिए गए हैं, (4) समान सहिता विभिन धार्मिक समूहों में विशेष रूप से अल्पम्नख्यकों में नाराजगी, असन्तोष, और असहिष्णुता पैदा कर देगी, (6) अधिकतर मुसलमान मानते हैं कि समान सहिता धर्म की स्वतत्रता के मौलिक अधिकार से इन्कार के समान होगी और “विविधता में एकता' की अवधारणा के विकास में बाघक होगी। हिन्दू इस धारणा से सहमत नहीं है। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि समान सहिता को धार्मिक परिमक्ष्य में न देखा जाये बल्कि बहु विवाह और मौखिक तलाक कौ बुग़इयों को रोकने के लिए देखा जाये, तव विभिल समुदायों के गैरःरुढिवादी धार्मिक वैताओं के साथ चर्चा कानून के बनाने में सहायक हो सकती है। ईप्चाइयो ये विवाह (॥॥०-से98९ 4पाणाड़ एकसंजशशा३) हिडू और मुसलमानों की तरह ईसाइयों में भी स्तरीकरण पाया जाता है। ईसाई लोग दो समूहों-श्रेटेस्टेरट और कैथोलिक-में विभाजित हैं। कैथोलिक पुन लेटिन और सीरियन ईसाइयों में बंटे हुए हैं। ये सभी समूह और उप समूह अन्तर्विवाही हैं। हिन्दू और मुसलमानों की व हो, इंसाइयों में भी विवाह का उद्देश्य है यौन सम्बन्धों के लिए सामाजिक स्वोकृति प्राप्त क्या तथा प्रजनन । साथ ही धर्म का भो ईसाई विवाह भें महत्वपूर्ण स्थान है। ईस्ताई विश्वास करते हैं कि विवाह ईश्वर को इच्छा के कारण होदा है और विवाह के बाद स्री पुरुष एक दूसो में समाहित हो जावे हैं। ईसाई विवाह के तीन उद्देश्य-प्जनन, कुमादीगमन ((/ए८॥०७) से बचाव (विवाह के बिना योन सम्बंध) तथा परस्पर सहायता और आरम-माने जाते हैं। विवाह साथी दीन तस्ह से चयन किए जाते हैं. माता पिता द्वारा, बच्चों द्वारा स्वय, और बच्चों तथा मावा पिता द्वारा सम्मिलित रूप से पस्नु 0 में से 9 मामलों में चयन तथा विवाह माव-पिता ड्ाय ही ठहराया जाता है। जोवन साथी चयन करते समय रक्त सम्बन्धों गाव परिवार, विवाह और नावेदाती से बचना तथा परिवार के सामाजिक स्तर, चरित्र, शिक्षा, शारीरिक गठन, आदि को महत्व दिया जाता है। ईसाइयों में “वरीयता प्राप्त व्यक्ति” जैसी मुसलमानों की दरह की कोई प्रथा नहीं है। मेंगनी रस्म के बाद, विवाह से पूर्व की जाने वाली औपचारिकताए हैं - चरित्र प्रमाण पत्र अस्तुति, निश्चित तिथि से तीन सप्ताह पूर्व गिज्जाघर में प्रार्थना पत्र अस्तुत कला। तब गिरजाघर का पादरी विवाह के विरुद्ध ऐतराज आमत्रित कप्ता है और जब कोई ऐतएज प्रा नही होता, विवाह तिथि निश्चित कर दी जाती है। विवाह गिएजाघर में सम्पन होता है और दम्पत्ति घोषणा करते है कि वे प्रभु ईशु के नाम पर दो गवाहों के समक्ष एक दूसरे को विवाहित साथी मानते हैं। ईसाई लोग बहुपली ठथा बहुपति प्रधा को अनुमति नही देते। भारदीय ईसाई विवाह अधिनियम, 872, जो तब से छ या सात बार सशोधित हो चुका है, विवाह के सभी पक्षों को अपनी परिधि में लिये हुए है। ईसाई लोग तलाक प्रथा भी मानते हैं, यययपिं गिरजाघर इसे अच्छा नहीं मानता है। भात्तीय तलाक अधिनियम, 869 उन दशाओं को सन्दर्भ करता है जिनमें तलाक लिया जा सकता है। इस अधनियम में विवाह विच्छेद, विवाह को निरस्त करना, न्यायिक पृथकत्व का हर्जाना और दाम्पत्य अधिकारों की पुन स्थापना शामितर है। ईसाइयों में दहेज या स्त्रीपन आदि की ज्था नहीं है। विधवा एुनर्विवाह न केवल स्वीकार किया जाता है बल्कि प्रोत्साहित भी किया जाता है। इस प्रकार ईसाई विवाह हिन्दू विवाह वी तरह पविंत्र बन्धन नहीं है बल्कि मुस्लिम विवाह की तरह ख्री पुरुष में एक सविदा है जिसमें साथी होने पर अधिक जोर दिया जाता है। यह आवश्यक है कि जब तक समान नागरिक संहिता लागू नहीं होती, ईसाइयों का तलाक अधिनियम, जो कि सवा सौ वर्ष पुयना है, सशोधित किया जाये और कुछ नये विधान पारित किये जायें। उदाहरणार्थ, तलाक के आपर बड़े सीमित और कठोर हैं। यहा तक कि पति पली के बीच इतना भेदभाव है कि पति वो तो केवल पली को व्यिचारिणी सिद्ध करना होता है जब कि पली को छुटकाण पाने के लिए अन्य वैवाहिक अपराध और माथ में पति का व्यभिचारों होना सिद्ध कला पड़ता है। व दोनों पक्ष (पति पत्नी) परस्पर सहमति के आधार पर तलाक चाहते हों और न्यायालय सनु| है, साथ साथ रहना अस्रम्भव है तब भी कोई छूट नहीं दी जा सकती अथवा तलाक नहीं दिया जाता। पत्नी पति की सम्पत्ति समझी जाती है क्‍योंकि दलाक अधिनियम के ग्रावधार पति को अपनी पली के साथ व्यभिचार करने वाले व्यक्ति के कारण हुए नुकसान वी का दावा करने का अधिवार देता है। तलाक अधिनियम को 953 में मद्रास उच्च न्यायातव में चुनौती दी गई थी और फिर 995 में सर्वोच्च न्यायालय में क्योंकि यह लिंग भेदशो पूर्ण था लेकिन याचिकाए खार्जि कर दी गई। ईसाई कानून, जैसा आज मौजूद है, कसम खाने, कपट नीति प्रयोग करने औए टकराव को प्रोत्साहित करता है। ईसाइयों कानून की जरूरत है जो समय की बदलती आवश्यकठाओं के अनुरूप हो। विधि आयोग े 960 में ईसाई विवाह एव वैवाहिक घागओं से सम्बद्ध विधेयक बनाया था लेकिन विधेरयर को सरकार ड्वाग इसे ससद में प्रस्तुत किए जाने के वायदे के बाद कालादीत (750 है जाने दिया गया। 983 में, आयोग ने पुन 869 अधिनियम में परिवर्तनों की सिफीरिश सेकिन व्यर्थ | 994 में सम्मिलित महिला कार्यक्रमों ने ईसाई विवाह एवं वैवाहिक ई* परिवार, विवाह ओर गतेदारी वा5 विधेयक का भसविदा ऐैयार किया और ईसाई भश्ण पोषण विधेयक की रूपरेखा भी तैयार की लेकिन उन्हें पारित काने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए। नातेदारी व्यवस्था (क्राफ 5990) जातेदाएे व्यवस्था मे क्षेत्रीय घिलताएँ. इसके सापाजिक-सास्कृतिक रत्व (एेश्कणाओ ३70४० 0 एहच्आाए 8९5९७ छाए [६ 562ं0-(तएए (077४३९$) विदाह अनुस्थापन परिवार और प्रजनन परिवार के बीच की कडी है। दो एकाकी परिवाएँ में व्यक्तिगव सदस्यता का यह सत्य ही नावेदारी प्रथा को जन्म देता है। नावेदारी को इस प्रकार परिभाषित किया गया हैं “परिवार से सम्बद्ध आधार पर सामाजिक सम्बन्ध” (थियोडोरसन 969 22) | वह सम्बन्ध जो या तो समरक्‍्तमूलक (००॥६४४४०॥०) या दम्पत्तिस्वजन (शी॥») आधारित हों, व्यक्तियों के अधिकार व कर्षव्यों का निर्धारण करते हैं। अत नावेदारी व्यवस्था का अर्थ है. “प्रस्थितियों और भूमिकाओं और सम्बन्धों की एक ऐसो सचरित व्यवस्था जिसमें नातेदार (प्राथमिक, द्वैतियक, तृतीयक व दूरस्थ) जटिल श्रखलाबद्ध बन्पनों दवा पससर बंधे रहते हैं।” नातेदारों के बीच सम्बन्धों को बताने वाला पारस्पसक व्यवहार ऐसे शब्दों से सरिप्त होता है जिनके द्वाए प्रत्येक नातेदार एक दूसरे को सम्बोन्धित करता है, अर्थात्‌ व्यक्तिगत नाम से या नातेदारी कौ शब्दावली से (पिताजी, दादाजी, बहिन जी) या व्यक्ति व नातेदारी शब्दावली के सम्मिलित नाम से (राम के पिता, रीता की माँ, आदि)। नातेदारी शब्द (सम्बोधन व सन्दर्भ के) जो या तो आएस्पिक (जिन्हें किन्ही अन्य शब्द में कम नहीं किया जा सकता, जैसे, माता, पिता, काका, चाचा, भाई, बहन, आदि) या यौगिक (जो प्रारम्भिक शब्द के गोग से बना हो, जेसे बहनोई, मोप्ता, आदि) या वर्षन्ात्मक (जो दो गा अधिक प्रारम्भिक शब्दों के मेल में बना हो, जैसे मौमेरी बहन, फुफेण भाई, आदि) और जिलें एकाकी (5०90६८) कह कर विभेदित किया जावा है (एक ही नातेदार पर लागू होता है जो कि पीढ़ी, लिंग और यश्-सम्बन्धों से जाने जाते हों, जैसे भाई, बहिन, पति, पली, आदि) या वर्गात्मक (०७४६७॥८०४०)) शब्द (दो या अधिक नातेदारी श्रेणी के लोगों पर लागू जैसे “सम्प्रावा' (०००5:४) पिता के भाइयों के पुत्रों और माता की बहिन के पुत्रों, दोनों के लिए प्रयुक्त)। क्योंकि वर्गात्यक शब्द एक या अधिक मूल आधार की अवहेलना करते हैं (जैसे लिंग, आयु, पीढ़ी, दाम्पत्य मूलक निकटता, सह सम्बद्धता, विभाजन, आदि) इसलिए नातेदाएँं के श्रेणियों की सख्या हझाएों से कुछ गिनी चुनो सख्या तक ही प्रोमित कर देते हैं। हिन्दुओं के सामाजिक समारोहों, सस्वायें और दैनिक जोवन में परिवार के बाद तातेदारी समूह ही महत्वपूर्ण भूमिका निभावे हैं। जीवन के सकटकाल में हो लोग केवल नतेदाएें को ओर नहीं देखते हैं, बल्कि अन्य नियमित अवसरों पर भी उनवी सहायता लेते हैं। परिवार के बाद पहल्वूर्ण नातेदार समूह हैं. वश और ग्रोत्रवश एक रक्‍्तमूलक एक पष्ठीय बशानुक्रम समूह ((णरा5आएए700% एशश३धाओ ए०5०६ा हाएणए) है जिमके सदस्य अपने को एक ज्ञात दथा वास्तविक सामान्य पूर्वज से सम्बद्ध मानते हैं। यह वशापुक्रम समूह पिवृवज्ञीय या मातृवशीय हो सकता है। यह एक बहिर्विवाही (८९०४७४०४७) इकाई बर6 परिवार, विवाह और नातेदारी होती है। वश के सदस्य आपस में भाई बहिन माने जाते हैं। वश बन्धन कुछ पीढियों बक ही रहदे हैं। एक वश परिवारों के बीच प्रमुख कडी माम्कारिक उत्सवों (जैसे, जनम, मत्यु, आदि) में सामान्य भागीदारी होती है। वश, य्ोज्ञ में चला जाता है (95565 70(0) जो कि यद्यपि एक पक्षीय समूह है लेकिन वश से बडा होता है। यह एक बर्हिविवाही समूह होता है। मातृवशीय नातेदार व्यक्ति के जीवन उतने ही महत्व के होते हैं जितने कि पिठृवशोय नावेदार। विभिन परिक्षेत्रो मे नातेदारी की विशेषताएँ, (एच्बॉए९5 ०६ छूज्5ऋआाए ७ छंतसलस्क+ 70४९5) उत्तर परिक्षेत्र (0१०७४९शफ 70शे नातेदारी की विशेषताएँ दक्षिण भारत में उत्तर तथा मध्य भारत से भिल होती हैं। नातेदारी व्यवस्था के सामाजिक सास्कृतिक तत्व (००-८।»८७) हैं. भागा, जाति (मैदानी और पहाडी) और क्षेत्र (7८९४००)। नातेदायी सम्बन्धों पर इन तीनों दत्वों के प्रभाव के बावजूद कुछ सामूहिक आधाएं पर नातेदारी संगठन पर बाद करना सम्भव है, जैसे जाति एवं परिक्षेत्रीय आधार पर। यद्यपि उत्तरी परिक्षेत्र भें नातेदारी व्यवहार क्षेत्र में और एक ही क्षेत्र में जाति से जाति में भिल है, फिर भी तुलनात्मक अध्ययन दर्शाता है कि एक “आदर्श! उत्तरी सरूप पर बात करना सम्भव है, विशेष रूप से अधिकत्तर जातियों के बीच--अधिकत्तर सामान्य रूप से जाने वाली अभिवृत्तियों तथा प्रथाओं के सन्दर्भ में । उत्तर परिक्षेत्र (200८) के नातेदारी सगठन के सन्दर्भ में इरावती करवे (!953 : ॥75) ने कुछ महत्वपूर्ण विशेषताए बतायी हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं. () अह (०४० मे कनिष्ट नादेदार उनके व्यक्तिगठ नाम से सम्बोधित किए जाते हैं जब कि वरिष्ठ व्यक्ति नातेदारी शब्दों से। (2) ऊपरी व निचली (७४०८७०७७४ 200 0०६०८००७७) पीढियों के सभी बच्चे अपने सहोदर समूह भाई बहिन (६७998 7००७) बयबर माने जे हैं और सहोदर समूह के सभी बच्चे स्वय के बच्चों के बराबर माने जाते हैं। (3) पीढियों की एकता का सिद्धान्त माना जाता है (उदाहरणार्थ, पर बाबा, और बाबा को वही सम्मान दिया जाता जो पिता को। (३) एक हो पौढी में वृद्ध और युवा नातेदार पृथक माने जाते हैं। 6) वीन पीढ़ियों के सदस्यों के व्यवहार सरूप और कर्तव्य कठोरता से पालन किए जादे हैं। 6) सस्कृत मूल के कुछ प्राचीन नातेदारी शब्दों के स्थान पर नये शब्द प्रयोग किए जाने लगे हैं, उदाहर्णार्थ पितामह के स्थान पर पिता, 'वक्‍ता' से बडे के लिए “जी” उपसर्ग लगाया जाता है (जैसे चाचा जी, ताऊ जी)। बगाल में “जी' के स्थान पर 'मोशार्य' उपसर्ग लगाया जावा है। (४) निकट नातेदारों के बीच विवाह की अनुमद्दि नहीं है। (8) विवाह के बाद लडकी वो अपने सास श्वसुर से (बादवीद में) आजादी (४९०) नहीं रहदी, बल्कि जब वह माँ बन जाती है तब वह सम्मान व शक्ति का पद प्राप्व कर लेदी है और तब उस पर लगे प्रतिबन्ध कम हो जाते हैं। 9) परिवार इसी प्रकार सरचित होता है कि बच्चे, माता-पिता, दादा-दादी या वो साथ रहते हैं या उनके प्रति नातेदारी दायित्व पूरे किए जाते हैं। (6) उस सयुक्‍त परिवार के अतिखित, जो व्यक्ति के लिए निकट सम्बन्धों की परिधि का मतिनिधित्व करता है, भी परिवार, विवाह और वेदारी प7 नावेदारी एक वृहत परिधि होती है जो उसके जीवन में महत्वपूर्ण होती है। यह बधुत्व, उसके पितृ-स्वजन या मततु-स्वजनों का प्रतिनिधित्व कप्ता है जो उप्तके साथ तब खडे रहते हैं और सहायता करते हैं जब तत्काल परिवार (सहायता में) कम पड जाता है। मध्य परिद्षेत्र (एलाएश 2णाोशे मध्य भारत के नातेदारों सगठन की विशेषताएँ उत्तर भारत से अधिक भिल नहीं हैं। मध्य भारत में नातेदारी की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं. 0) प्रत्पेक क्षेत्र में विवाह प्रथाए उत्तर के समान ही मानी जाती हें, अर्थात्‌ समरत्कता (००४५०७६०७7७) मुख्य विचार है जो विवाह में लागू रहता है ( (2) अनेक जातियों बहिर्विवाही कुलों (०5७) में विभाजित होदी हैं। कुछ जातियों में बहिर्विवाही कुल प्रतिलोम विवाही श्रेष्ठक्रम (#पएथह8भण००६ आर्क्रणा)) में व्यवस्थित होते हैं। 5) नातेदारी राब्दावलो विभिन्‍न नातेदारों के बीच घनिष्टता और निकटवा दर्शाती है। नातेदारों के बीच सम्बन्ध “न्योता उपहार रीति से सचालित होते हैं जिसके अनुप्तार प्राप्त नकद भेंट के बदले में बराबर को नकद भेंट दी जाती है। न्योता पजी (+८88५) बनाई जाती है और यह पीढियों तक सुरक्षित रखी जाती है। (4) गुजरात में, ममेरा प्रकार का सहोदरज विवाह (माँ के भाई से) और देवर विवाह (पति के भाई से विवाह) कुछ जातियों मे प्रचलित है। (5) गुजणत में नियत-कालिक (90700॥०) विवाह के रिवाज में बाल विवाह और अस्तमान विवाह को प्रोत्साहन दिया है। ऐसे विवाहों का प्रचलन वहाँ आज भी है। (6) महाराष्ट्र में नातेदासी सम्बन्धों पर उत्तरी व दक्षिणी दोनों परिक्षेत्रों का प्रभाव है। उदाहरणार्थ, मग़ठों का कुल (०७७४) सम्रठन राजपूों की तरह का है जो सीढी के रूप में व्यवस्थित होते हैं। कुलों को विभागों (00.:७०७७) में साठित किया जाता है और प्रत्येक भाग को इसमें सम्मिलित कुलों की सख्या के अनुसार नाम दिया जाता है, उदाहरणार्थ पच कुली, सत कुली, आदि । कुल अुलोम क्रम में व्यवस्थित होते हैं--सबसे ऊँचा पच कुली, फिर सतकुली, आदि। पचकुली आपस में विवाह कर सकते हैं या सतकुली कन्या ले सकते है, लेकिन अपनी पुत्री को पचकुली से बाहर नहीं देते। (7) मध्य परिक्षेत्र में कुछ जातियों में, जैसे मराठा और कुन्बीस (॥0070») में, वधु मूल्य का प्रचलन है यद्यपि दहेज अ्या भी उनमें पायी जाती है। (8) यद्यपि महाराष्ट में परिवार व्यवस्था पितृवशीय और पतिस्थानिक (एगगा०८) है लेकिन उत्तर भारत में विपरीत जहा पली गौने के बाद अपने पति के साथ स्थाई रूप से रहती है और यदाकदा हो अपने पिता के घर जाती हे, मगठा जाति में वह अपने पिठा के घर बार बार जाती है। एक बार वह अपने पिता के घर चली जाये तो उसे पति के घर लाना कठिन होता है। यह नातेदाएों पर दक्षिण का प्रभाव दर्शाता हे ७) यध्पि नातेदारी के शब्द अधिकतर उत्तर के समान ही हैं लेकिन कुछ शब्द दक्षिण के द्रविड मूल के भी है, उदाहणार्ष, भाई के लिए 'अना' या 'नाना' और साथ ही 'दादा' का भी प्रयोग होता है। इसी प्रवार बहिन के लिए “अवका' 'ताई' और 'माई'। (0) राजस्थात और मध्य प्रदेश में आदिवासियों में नातेदारी व्यवस्था जातिवादी हिन्दुओं से कुछ भिनम है। यह अन्दर नातेदाे रा »/ दिदाह नियर्मो, उत्त/धिवार ब्यवप्या, और कुल के दायिल्तों में देखने को मिलता । इस प्रकार यह क्द्य जा सकता है कि यद्यपि उत्तर और मध्य परिक्षे्रों में नावेदारी 8 परिवार; विवाह और नावेदारी सगठन लगभग एक सा ही है, फिर भी इसे उत्तर से दक्षिण को सक्रान्वि का क्षेत्र (टॉम ० 0७॥४0०7) कहा जा सकता है। महाराष्ट्र जैसा राज्य सास्कृतिक उधार (8००४०) और सास्कृतिक समन्वय (5५0८8) का क्षेत्र है (कर्वे, 4953 76)। दक्षिण परिक्षेत्र (40७ 707९) दक्षिण परिक्षेत्र एक जटिल नातेदारी व्यवस्था का सरूप प्रस्तुत करता है। यद्यपि अधिकक जातियों और समुदायों में परिवार के रूप मुख्यत पितृवशीय और पतिस्थानिक हैं (जैसे नम्बूदसी), परन्तु जनसख्या के ऐसे भाग भी हैं जो मातृवशीय और पलीस्थानिक हैं (जैसे, नायर)। काफी सख्या में ऐसे भी हैं जिसकी व्यवस्था में पितृवंशीय व मातृवंशीय दोनों संगठनों को विशेषताएँ मौजूद हैं (जैसे टोडा)। इसी प्रकार ऐसी जातियाँ/और जनजातियों प्री हैं जिनमें केवल बहुपली प्रथा ही है (जैसे असारी, नायर), तथापि ऐसे भी हैं जिनमें बहुपली प्रथा और बहुपति प्रथा दोनों प्रचलित हैं (जैसे टोडा)। फिर, बहुपति प्रधान पितृवशीय समूह भी हैं (जैसे अंसारी) और बहुपतिं प्रधान मातृवशीय समूह भी है (जैसे दियान, नाय0, और बहुपली प्रधान पितृवशीय समूह भी है (जैसे नम्बूदरी) लेकिन बहुपली प्रधान मातृवशीय समूह नहीं है। इसी प्रकार पितृवशीय सयुक्त परिवार और मातृवशीय सयुक्त परिवार भौ हैं। यह सब दक्षिण परिश्षेत्र में नातेदागी सगठन की विविधता को दर्शाता है। यहाँ हम कुछ सगठनों/सरूपों पर चर्चा करेंगे। रे मातृवशीय परिवार में स्त्रियों में एक दूसरे से नातेदारी सम्बन्ध पुत्री, माता, बहिन, मी, माँ की बहिन और बहिन की पुत्री के हैं। पुरुषों के साथ स्त्रियों के नावेदारी सम्बन्धों में पुरुष स्त्रियों के साथ भाई, पुत्र, पुत्री का पुत्र, और बहिन का पुत्र रूप में सम्बन्धित होते हैं। पुस्‍्षों का एक दूसरे के साथ नातेदारी सम्बन्ध भाई, माँ का भाई और बहिन का पुत्र का होता है। ये सभी नातेदारी सम्बन्ध रक्तमूलक आधार के हैं। इनमें से विवाह से कोई सम्बन्ध नहीं बी हैं। ऐसा इसलिए कि पति परिवार में कभी कभी आता है। अत हम देखते हैं कि (0) परिं और पली के बौच साथी की भावना का अभाव है और पिता तथा बच्चों के बीच निकटा का अभाव है, और (४) जहाँ तक पति कौ आय से जीवन यापन का सम्बन्ध है, खियों पूर्णरूपेण स्वतत्र हैं। इस प्रकार से कुछ दक्षिणी परिवार उत्तरी परिवाएं से भिन हैं। “तरवड' (१97७४७०) कहलाने वाला मातृवशीय सयुक्त् परिवार ट्रावन्कोर के मलाबार में नायरों (१३७४७) में दथा कुछ अन्य समूहों में पाए जाते हैं। “'तरवड' परिवारों को अमुख विशेषताएँ हैं. 0) तरवंड की सम्पत्ति इससे सम्बद्ध सभी पुरुषों और स्त्रियों की होती है। (2) अविवाहित पुत्र मों के तरबड के सदस्य होते हैं लेकिन विवाहित पुत्र अपनी पलियों के तरबड के सदस्य होते हैं। (3) परिवार में सबसे वृद्ध सदस्य तरवड सम्पत्ति का प्रबन्धर्क होता है जिसे कर्णवान (02003ए87) (उसकी पत्नी अम्माई (॥४ऋ०००७४७) कहलाती हैं) कहते हैं। ७) कर्णवान परिवार का पूर्ण शासक होता है। उसकी मृत्यु पर अगला वरिष्ठ सदस्य कर्णवान बन जाता है। वह अपने नाम से धन का नियोजन कर सकता है, सम्पत्ति वो गिरती रखे सकता है, धन ऋण के रूप में दे सकता है, भूमि को उपहार स्वरूप दे सकवा है, और आव और व्यय के लिए किसी सदस्य को जवाबदेय नही होता है। 6) जब तरवड बहुत बडे आकार का हो जाता है तब यह ठवाझी (8ए820) में विभकत कर दिया जाता है। स़्यों परिवार, विवाह और नातेदारी 379 के सम्बन्ध में दवाड्ी वह व्यक्तियों का समूह है जिसमें एक री, ठसके बच्चे और स्री वश के उसके सभी उत्तराधिकार शामिल होते हैं'। 972 से पूर्व और 92 के बाद के तरवड दो अलग-अलग लक्षणों वाले समूह हैं (») पहले की दरवड सम्पत्ति अविभाज्य (7099) होती थी लेकिन अब विभाज्य होती है; (0) पूर्व का कर्णवान तरवड का सम्पूर्ण शासक हो गया है, (०) पूर्व के तरवड के सदस्य तब तक घरण पोषण के अधिकारी नहीं थे जब तक कि वे परिवार के मकान में न रहते हों, लेकिन अब पैतृक मकान से बाहर रहने पर भी सदस्य भरण पोषण के हकदार होते हैं, (0) पहले, कर्णवान की पूर्वज-पूना सामान्य बा थी लेकिन अब नहीं है; (०) पहले एति पली के बीच के सम्बन्ध औपचारिक होते थे लेकिन अब यह सम्बन्ध अधिक अनौपचारिक, व्यक्तिगत, और अधिक घनिष्ट और निकट हो गए हैं, (0) पहले तरवड के किसी एक सदस्य के द्वार अर्जित सम्पत्ति उसकी मृत्यु के बाद तरवड को चली जाती थी लेकिन अब यह सम्पत्ति दे क। विधवा व बच्चों को चली जाती है और उनकी अनुपस्थिति में माँ और माँ कीमोंको। इस प्रकार नायर जाति का तखड, 92 के अधिनियम (ट्रावन्कोएे, 7920 के अधिनियम (कोचीन) 933 के क्रियान्वयन के बाद अब विखम्डित हो गया है। अब स्रो की सम्पत्ति उम्के पुत्र और पुत्रियों को जाती है और फिर उसके पिता और पति को। कापडिया (947 348) ने भी लिखा है कि यह सत्य है कि 90 प्रतिशत से अधिक विदू (॥0९०७७) (ध0 में एक ही ववाझी होवी है जो यह दर्शाता है कि गत कुछ दशकों में तरबड़ों का 'आणवीकरण' (॥00723007) बढ रहा है। कुल संगवन और विवाह के नियम (2680 0/क्ाटगारा हगव॑ 4क्षापहूएट 0028) जाति पाँच बहिर्विवाही कुलों में विभाजित रहतो है। कुल सगठन की प्रमुख विशेषताएँ हैं प्रत्येक फुल (जिसमें काफी परिवार होते हैं) का अपना नाम होता है जो किसी जानवर या पौधे या अन्य किसी वस्तु के नाम पर होता है। 2. एक व्यक्ति किप्ती भी कुल से पली का चयन कर सकता है, सिवाय अपने कुल के। परन्तु यह चयन रौद्धान्तिक है क्योंकि पुत्रियों के विनिमय (७६०४००७८) का नियम भी रहता है। 3 विवाह में कुल बहिर्विवाह (0 ८४०७आ०)) का नियम ही नहीं चलदा बल्कि पुत्रियों का परिवार विनिमय भी चलता है। 4 पुत्रियों के विनिमय नियम के कारण अनेक नातेदारों से सम्बन्धित शब्द एक में होते हैं, उदाहरण के लिए ननद के लिए प्रयोग दिया जाने वाला शब्द भाभी के लिए भो प्रयोग किया जाता है, साला के लिये प्रयुक्त शब्द बहनोई के लिए भौ, और ससुर शब्द भाभी के पिता के लिए भी भ्रयोग किया जाता है । 5 मातृपथ के पमानान्तर सहोदरजों (:7आ८ ८०७कन७०) के बौच विवाह अर्थात्‌ दो बहनों के बच्चों के बीच विवाह स्वीकृत नहीं होतः है। 6. साली (पली वी छोटो बटन से विवाट का प्रदलत है। एक हो परिवार में दो भाइयों 720 0 व] परिवार, विवाह और नावेदारी से दो बहिनों का विवाह हो सकठा है। दक्षिण में अधिमान्य विवाह (फल गागंणाट्) की प्रथा भी है। अनेक जातियों में प्रथम वरीयता बडी बहिन की पुत्री को दी जाती है, द्वितीय वरीयता पिता की बहिन की लडकों को, और तृतीय वरीयता माता के भाई को पुत्री को। पस्तु आजकल विलिंग सहोदरज सतति (८४055-०0057) विवाह, विशेषकर चाचा भतोजीं विंवाह को उन समूहों में जो या तो उतर भारतीयों के या पश्चिमी सस्कृति के सम्पर्क में आए हैं, चलन के बाहर और शर्म की बात माना जाता है । विवाह के लिए प्रचलित निषेध ((३७००७) हैं. एक व्यक्ति अपनी छोटी बहिन नौ पुत्री से विवाह नहीं कर सकता, एक विधवा अपने पति के बड़े या छोटे भाई से विवाह नही कर सकती (अर्थात देवर विवाह निषिद्ध है) और कोई व्यक्ति अपनी माँ की बहिन की पुत्री से विवाह नही कर सकवा। जैप्ता कि उत्तर में होता है विवाह पीढोगव विभाजन (एद्याधभाणाब ताशअं०७) के सिद्धान्त को अपेक्षा वास्तविक आयु अन्तर पर आधारित होता है। इसका एक उदाहरण यह है कि दक्षिण में दादा और पोती का विवाह सम्भव है। दक्षिण में विवाह और नातेदारी की एक और विशेषता यह है कि विवाह नावेदारी समूह को विस्तृत करने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि श्रत्येक विवाह पहले से ही मौजूद बन्धनों को और मजबूत बनाने के लिए किया जाता है। ऐसा विचार जो नातेदार पहले से ही काफी निकट थे उन्हें और निकट ला देता है। 'एक लडकी को उसी व्यक्ति से विवाह करना पडता है। जो उससे आयु में बड़े समूह से (जिसे ताम मम) (070 प्राण) कहा जाता है) और साथ ही माता पिता के समूह से छोटे समूह का हो, अर्थात्‌ लडकी अपने किसी भी बडे विलिंग सहोदरज सतति (८००५५ ०००७४) से विवाह कर सकदी है । लडके को “'ताम-पिन' (7-70) समूह में हौ विवाह करना होता है, जो दाम-मम ((997-ए्रएग०) समूह की सन्तान हो। उत्तर की शब्दावली में जैसे कन्या, बहू, पौहर, और ससुगल जैसे शब्दों में अभिव्यक्त भावनाएँ और प्रस्थिति का दोहरपन दक्षिण में नहीं मिलता। ऐसा इसलिए है क्योंकि दक्षिण में विवाह के बाद लडकी अजनबी घर में प्रवेश नहीं करती जैसा कि उत्तर में होता है। किसी लंडकी का पति या तो उसकी मादा के भाई का पुत्र या ऐसा ही कोई रिश्तेदार होता है। दक्षिण में विवाह लडकी के लिए अपने पिता के घर से पृथकल का प्रतीक नही है। लडकी अपने ससुर के घर में भी स्वच्छन्द होतो है। उत्तर और दक्षिण भारत की नतेदारी व्यवस्था की तुलया (६#एफएएएेड०० 20 #00509 ५325 उरी एल बज जज) 5 थम दक्षिण भारत के परिवार में जन्म के परिवार (जनक परिवार (वि! र्ण 0ंथ्ाधाणा) और जनन परिवार (क्षियाए ्ी जाए्कटव07) के बीच कोई स्पष्ट भेद नहीं है जैसा कि उत्तर के परिवार में होता है। व्यक्ति के जनक परिवार में कोई भी सदस्य (अर्थात पिता, माठा और बहिन के) विवाह (जनन) परिवार का सदल परिवाद विवाह और नावेदारी ॥ नहीं हो सकता लेकिन दक्षिण में यह सम्भव है। 2. उत्तर भारत में नातेदारी से सम्बन्धित अत्येक शब्द यह स्पष्ट करता है कि सन्दर्भित व्यक्ति रक्त सम्बन्धी है या विवाह से, लेकिन दक्षिण भारत में ऐसा नहीं है। 3. दक्षिण भारत में व्यक्ति के कुछ नावेदार होते हैं जो उसके केवल रक्त सम्बन्धी हैं और कुछ अन्य होते हैं जो एक साथ रक्त साबन्धी और विवाहोपप्नन्त के सम्बन्धी होते हैं। 4. दक्षिण भारत में नातेदारी का संगठन दो समूहों में आयु श्रेणियों के अनुसार होता है, अर्थात्‌ व्यक्ति से बडा (9-07) और छोटा (9-7४) के आधार पर होता है। 'ताम' का अर्थ स्वय, 'मम' का अर्थ पहले और 'पिन' का अर्थ बाद में होता है। 5. दक्षिण भार में नातेदारी साठन वर्षोक्रम में आयु (कााण०्हाल्ला 28%) के अनुसार अन्तर पर निर्भर करता है जब कि उत्तर में यह पीढ़ी विभाजन (हलाटएकषाठघर्व ताज्लं0०७) के सिद्धान्त पर निर्भर करता है। 6. दक्षिण भारत में विवाहित लडकियों के लिए व्यवहार के विशेष प्रतिमान मही होगे जबकि उत्तर भारत में उन पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए जाते हैं। 7. दष्चिण भाज़ में विवाह का अर्थ यह नही होता कि लडको पित्रा के घए से अलग हो गई, लेकिन उत्तर भारत में स्री अपने पिता के घर कभी-कभी ही जाती है। 8. उत्तर भात्त में विवाह नातेदारी समूह को विस्तृत करने के लिए होता है जबकि दक्षिण भारत में यह पहले से ही मौजूद बन्धनों को और मजबूत करने के लिए होता है। पूर्दी परिक्षेत (छ्वञसाए 206) पूर्वों पाता (उबहव्ता का) में मावेदारी सगठन भिन्न है। महा जातिवादी हिन्दुओं कौ तुलना में आदिवासी अधिक हैं (बंगाल, बिहार, आसाम, और उड़ीसा के भागों में)। प्रमुख जनजातियों हैं , खासी, विरहोड, मुण्डा और और्येव। इनमें नातेदारी सगठन का कोई प्रारूप नहीं है। मुण्डारी भाषी लोगों में पितृवशीय पतिस्थानिक परिवार होते हैं, परन्तु इस परिक्षेत्र में समुक्त परिवार बिरले ही मिलते हैं। विलिंग सहोदरब विवाह (७०७5 ०००७४) यदाकदा मिलते हैं यद्यपि वधू मूल्य आम बात है। स्री को 'दो के रूप में” सम्बोन्धित किया जाता है, जैसे (तुम दो)। नावेदारें शब्दावली सस्कृत एव द्रविड दोनों भाषाओं से ली गई है। खाप्ती और गाए लोगों में मातृवशोय सयुक्त परिवार मिलता है (जैसे दक्षिण में नायरों में)। विवाह के बाद पुरुष अपने माव्रा-पिता के साथ विरले हो रहवा है, वह एक अलग घर स्थापित करता । निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारत में नातेदारी संगठन जाति और भाषा से प्रभावित है। प्रस्थिति तथा जोवनयापन के लिए कठिन स्पर्धा के आज के युग में, एक व्यक्ति का परिवार और उसके परिवार उसके सहायक के रूप में अवश्य होने चाहिए। जावि एव भाषाई समूह समय-समय पर व्यक्ति को सहायता कर सकते हैं, लेकिन उसके कट्टर समर्थक, विश्वप्तौय एवं वफादार लोग केवल उसके परिवार हो हो सकते हैं । इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति को न केवल अपने नातेदाएं से सम्दन्य मजबूत रखने चाहिए बल्कि उसे अपने 22 परिवार, विवाह और नावेदारे नातेदारें के दायरे में विघ्ता: भी कजा चाहिए। सहोदरज विवाह, अधिमान्य विवाह (एर्थटाधयाव। 77206), विनिमय विवाह, और विवाह प्रतिमान जो जीवन साथी के चयन छेत्र को सोमित करते हे को बदलने की आवश्यक्वा है ताकि विवाह के द्वारा नावेदारे सम्बन्ध विस्तृत हों और व्यक्ति शक्ति अर्जिंद करने और प्रस्थिति उठाने में उनकी मदद ले सके और प्राप्त कर सके। स्त्रियों की बदलती प्रस्थिति (एफक्काष्ठॉणड्ट ५05५ ० १०फश) बदलती प्रस्थिति ((09७हाण्ट्ू 58005) आज पाल में स्त्रियों की प्रस्थिति-सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाम्य-आ्चोन और मध्य काल से अधिक ऊँची है। उन्हें अनेक अधिकार (सामाजिक और वैधानिक) प्राण है, उन्हें अधिक स्वतत्रता प्राप्त है, उनकी आवाज में अधिक शक्ति है, और वे सार्वजनिक मामलें| में अधिक भाग लेती हैं। किन्तु यह भी सत्य है कि उनके साथ अभी भी भेदभाव किया जाता है, उन्हें सताया जाता है, अपमानित किया जाता है, उन्हें आधोनता में रहना पड़ रहा है और उनका शोषण भी हो रहा हैं। प्राचीन भारत में (वैदिक व महाकाव्य युग में) स्त्रियों को अधिकतर पुरुषों के समान माना जाता था। उन्हें सम्मानित किया जाता था और पृथ्वी पर दैवी गुणों का प्रतीक समझ जाता था। उन्हें न केवल भृहस्‍््य जीवन का बल्कि समूचे सामाजिक सगठन का भी आधार माना जाता था। वास्तव में, ऐसे विद्वान भी हैं जिन्होंने धर्म ग्रन्थों से अनेक अश यह दशनि के लिए सन्दर्भित किए हैं कि स्तियों की प्रस्थिति निम्न थी। ये अश स्त्री को 'विश्वास के अयोग्य', 'पुरुष की शागैरिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने वाली तथा उनके लिए सत्तान देने वालो, 'सभी बुराइयों की जड', अधिकार को वस्तु', आदि बताया है। लेक्नि ये सप्री सन्दर्प प्रसगवश थे, अर्थात्‌ रिमी प्रसग में कहे गए थे। सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने कभी पर्दा नहीं क्या, उन्हें जीवन साथी के चुनाव को आजादी थी, शिक्षा प्राप्ति से वे वचित नहीं दीं, तथा घर में और बाहर स्वतत्र थीं। आर्थिक क्षेत्र में उन्हें माँ व पली के रूप में समपति में सीमित अंधिवार प्राप्त थे। पत्तु वे नौकरी नहीं करदी थीं और परिश्रमिक प्राप्त नहीं की थीं क्योंकि ऐसा करना उनके लिए आवश्यक नहीं था। गाजनैतिक क्षेत्र में उनकी प्रस्थिति तत्कालीन पजनेतिक व्यवस्था पर निर्भर करती थी। उन दिनों क्योंकि चुनी हुई सरकार नहीं होती थी, अद उन्हें न तो मताधिकार प्राप्त था और न हो उन्हें किसी गजनैतिक पद ग्राप् करने के अवसर प्राप्त थे। उन्हें सभाओं में प्रवेश की अनुमति नहीं थीं क्योंकि इनमें जुआ, शराब व अन्य उद्देश्य भी पूरे किए जाते थे। कौटिल्य ने (अर्थशाख) धनुष बाण से सुसज्जित स्त्री सैनिकीं का वर्णन किया है। थार्मिक क्षेत्र में उन्हें पूर्ण अधिकार प्राप्त थे और वे तियमिव रूप से धार्मिक समारोहों में भाग लेतो थीं। पौराणिक, ब्राह्मण, व मध्य काल में स्त्रियों की प्रस्थिति अनेक अतिबन्धों के लगाते के कारण निम्न हो गई थो। पूर्व योवनास्म्भ काल में ही विवाह होने लगे, विधवा पुनर्विवाह जिषिद्ध हो गया, पति को पली के लिए देवता का दर्जा दिया गया, शिक्षा पूर्ण रूम परिकर, विवाह और नतेदारी 423 अस्वीकृत कर दी गई, सती प्रथा शारम्भ हो गई, पर्दा प्रथा म्चलित हो गई, बहुपली विवाह सहन किया जाने लगा, किन्तु झ्लियो की बलि चढाने, प्रार्थना करे व धार्मिक पुस्तकें पढने की अनुमति नहीं दी गई। मुस्लिम काल में जाति प्रथा के कठोर प्रतिबन्धों को थोपने तथा सम्पूर्ण समाज पर बाह्मणी शुद्धता थोषे जाने के कारण उन पर अधिक भ्रतिबन्ध लागू किए गए। परनु भक्ति आन्दोलन के कारण स्थिति में कुछ परिवर्तन आया जिसके कारण स्त्रियों को कुछ साम्राजिक और धार्मिक आजादी मिलो | ब्रिटिश काल में लियों की प्रस्थिति में कुछ सुधार आया जिसके कुछ प्रमुख कारण थे शिक्षा का विस्तार, लडकियों की शिक्षा में ईसाई मिशनरियों की रुचि, सती जैसे सामाजिक बुगई का अन्त, कुछ कानूनी उपायों का क्रियान्वयन (जैसे विघदा पुनर्विबाह अधिनियम, 855, विशेष विवाह अधिनियम, 872, बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 929) और ग़जा राममोहत राय, जस्टिस रानाडे, ईश्वर चन्र विधासागर, महक कर्वे, स्वामी दबानन्द सरस्वती, ऐनो बेसेन्ट, व महात्मा गाधी जैसे कुछ जागरुक नेताओं द्वार कुछ सामाजिक आन्दोलन, तथां बग महिला समाज, भारत महिला परिषद (904), इण्डियर श्सोसियेशन (97), नेशनल काउन्सिल फॉर विमेन इन इण्डिया (१925) एवं अखिल भारतीय महिला काक्रेन्स 927), आदि जैसे कुछ सगठतों के प्रया्त। स्वतत्रता प्राप्ति के पश्चाव स्त्रियों की प्रस्थिति में परिवर्तन और गति आई क्योंकि कुछ नये कानून लागू किए गए (विशेष विवाह अधिनिमय 954, हिन्दू विवाह अधिनियम, 955, हिन्दू उत्ताधिकार अधिनियम, 7956 और दहेज विरेधी अधिनियम, 06१) । झियों के रोजगार से सम्बन्ध कानून थे फैक्ट्री अधिनियम, 948 में प्रावधान, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 948, और प्रसूति सुविधा अधिनियम, शिक्षा का प्रभाव, शिक्षित अभिजात वर्ग कौ स्त्रियों द्वाय नेतृत्व प्रदान किया जाना, रोजगार के बढवे अवसर, जाति प्रथा कौ कठोरताओं में परिवर्तन, आदि । महिलापण्क कार्यक्रमों में तालमेल की आवश्यकता औए कपनीर वर्ण के प्रति राष्ट्रीय नीति कौ आवश्यकता महसूस को जाने लगी है। विभिन क्षेत्रों में स्लियों के अधिकारों को रश्षा के लिए उपाय बताने के लिए ग़ज्य एव केन्द्र सरकार द्वारा अनेक आयोग नियुक्त किए गए है। केन्द्रीय सरकार द्वार दो ऐसे आयोग ॥97। और 99? में नियुक्त किए गए। जनवरी 992 में गठित महिलाओं के लिए राष्टीय आयोग को लियों से सम्बन्धित मामलों को देखने के लिए, स्त्रियों के प्रस्थिति के विषय में जाँच के लिए विभिन कामूनों का परीक्षण करने के लिए, उनको कमियों को इगित करने, स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा एव भेदभाव किए जाने के कारणों का मूल्याकन करने के लिए ओर सम्भव उपाय बताने के लिए निर्देशित किया गया था। खियों को वर्तमान प्रस्थिति का यूल्याकत हम क्सि प्रकार करें ? स्त्रियों की उच्च प्रस्थिति के सूचक क्या हैं ? कुछ पर्यवेक्षक स्त्रियों की बदलती प्रस्थिति को बलाक में वृद्ध तथा सी तलाक याविकाओं वे पुरुषों से अधिक सख्या, अन्वर्जातीय विवाहों में वृद्धि, स्डियों के प्रति अपणाधों में कमी, जैसे कारकों से जोडते हैं। लेकिन स्थियों कौ वास्तविक ऊंची प्रस्थिति कौ ओर सकेव करने वाले कारक हैं. स्त्रियों वा धुगतान प्राप्त वाले कार्यों में सलग्न होना और आर्थिक आजादी प्राप्त करना, स्त्रियों द्वा सम्भाले हुए विभिन्‍न विश्ागों में उच्च व24 परिवार, विवाह और बेदी और बेहतर पर्दो की सख्या में वृद्धि, महिला उद्यमियों और प्रबन्धकों की संख्या में वृद्धि, आदि, विधामिकाओं में ज्तरियों की सख्या में वृद्धि, विश्वविद्यालयों में पढने वाली लड़कियों की सख्या में वृद्धि, विद्यालयों और व्यावसायिक सस्थाओं में लडकियों की सख्या में वृद्धि, आदि। स्त्रियों की प्रस्थिति का विश्लेषण दो स्तरों पर किया जा सकता है; म्रामीण क्षेत्रों में और नगरीय क्षेत्रों में। शहरी क्षेत्रों में उनकी प्रस्थिति को तीन उप-स्तरों पर देखा जा सकता है धनी स्त्रियाँ, मध्यम वर्गीय स्त्रिया, और गरीब स्त्रियों। ग्रामीण क्षेत्रों में उन स्त्रियों वो प्रस्थिति में थोडा ही अन्तर होता है जो श्रमिक हैं और जो काम नहीं करतो हैं। लेकिन शहरी क्षेत्रों में मध्यम वर्गीय स्त्रियों की प्रस्थित अप्मजस्त की है। धनी और गरीब वर्गीय सियों की अपनी ही जीवन शैली रहती है लेकिन मध्यम वर्गोय ज़त्रियों के दृष्टिकोण और मूल्य कल । यह वर्ग भेद तौन सामान्तर (फअआभी८) नदियों के समान है जिनकी सोमाएँ सष् होती हैं। कुछ ही दशक पूर्व (950) तक शहरी मध्यम वर्गीय स्त्रियों की बडी स्पष्ट भूमिका होती थी। वे जानती थी कि उनसे क्‍या अपेक्षाएँ की जाती है और वे उनके अनुरूप कार्य करती थी। यह पूर्वाभासित जीवन शैली थी जिसमें चुनौती तो थी लेकिन थोडे ही प्रयललों से समाधान भी था और काफी संस्लता से वे अपनी भूमिकाओं के साथ समायोजन कर लेबी थी। आज अधिकतर स्त्रियाँ, अधिक शिक्षा और आय के साधनों के साथ, समायोजन में कठिनाई अनुभव करती हैं। पहले जब अधिकतर लडकियों की वरीयता (/7रं०गो)) सी समय पर विवाह कएा और पली, माँ, बहू की विभिन्‍न भूमिकाओं पर आधार जोवन व्यदीत करना होती थी,तब माता-पिता अपनी पुत्रियों का विवाह निश्चित करने के लिए अपने भावी दामाद की पारिवारिक पृष्ठभूमि के विषय में अधिक चिन्तित रहते थे। दहेज की मंग ऊँची होती थी। विवाह विच्छेद या तलाक या पृथकत्व को सामाजिक व वैधानिक मान्यता प्राप्त नही थी। छियों के समक्ष सिवाय विवाह को कामयाब बनाने के अन्य कोई विकल नहीं होता था। पति पली के बौच के सम्बन्ध पारस्परिक विश्वास पर आधारित होते थे जबकि पति पत्नी पर विश्वास करता था और धैर्य, नप्रता और समझादारी से उसके साथ समायोजन के प्रयल में उसकी प्रशमा और उसकी सहायता कर्ता था। परिवार का भऔरैणीक्रम भली भाँति परिभाषित होता था। श्वसुर 'बास' होता था और उसके शब्द ही काबून ये जिनका पालन किया जाता था। स्त्रियों सामाजिक प्रत्िमानों का सम्मान करतों थी! लेकिन आज गृहस्थी चलाना और बच्चों का पालन पोषण मध्यम वर्षीय स्त्रियों के लिए पूर्णकालिक कार्य नही रह गया है। वे हताशा से थनी वर्ग की होड में लगी हैं। आंब जीवन साथी के रूप में लडकियों के चयन के प्रमुख आधार हैं. उनकी शिक्षा और गोजगर योप्यदा। यह धनोपार्जन करने वाले द्पत्तियों का युग है। लड़कियों ने यह चुनौती स्वीकार कौ है। उन्होंने कोई क्षेत्र ऐसा नही छोडा है जहाँ केवल लडके ही विशिष्टता का दावा की सकते हों ! कार्यरत दम्पत्ति अपने शिशुओं को शिशु गृहों (क्रेश) में छोड जाते हैं और शा को उें ले लेते हैं। विवाह स्वेच्छा से ही देश से होने लगे हैं क्योंकि दा्पत्ति अपने जीव आफ को अधिक महत्त्व देने लगे हैं। यद्यपि “बिना विवाह साथ रहो" (४8 ॥0) सम्बन्ध अभी स्वीकार नही किये गये हैं परन्तु तलाक अब सामाजिक कलक नहीं है। विवाह की पर्सगर्ण परिवा; विवाह और नाेदारी 25 संस्था धीरे-धीरे अपनी पवित्रता खो रही है। पुगी सयुक्त परिवार प्रथा भी टूट रही है। इससे बच्चों के पालन पोषण पर पी प्रभाव पडा है। एकाकी परिवार में बच्चा अकेला होता है औए स्व केद्धित हो जाता है। प्राचीन मूल्यों के स्थान पर नचीन समठावादी च्यक्तिवादी और वार्किक मूल्य आ गए हैं। यद्यपि पुरुषों को गेजाना की दिनवर्या में भाग लेने के लिए तैयार किया जाना है लेकिन उन्हें यह अनुभव करा दिया गया है कि परिवार में उनका स्थान प्रभुत्त का नहीं रह गया है। अत आधुनिक मध्यम वर्गीय स्त्रियां अधिक निजीपन, अधिक अवसर, कार्य को स्वतत्रता और समान अधिकाए प्राप्त कर रहो हैं। उन्होंने बहुत सी जजोरें तोड दी हैं और प्रतिबन्धित प्रथाओं को नकार दिया है। स्त्रियाँ वास्तव में समाज में अपना सही स्थान बना रही हैं। यदि हमें समकालीन स्त्रियों का वर्णन करना है तो हम इन विशेषताओं को इमित कर सकते हें (देखें, 0७०७ 90898, 06०च४०७, 7999. 6-89) () स्त्रियों ने आधुनिकता और परम्परात्मकता के बीच सही सन्तुलन बना दिया है) 2) उन्होंने निश्वय रूप से यह सिद्ध करने का निर्णय कर लिया है कि वे पुरुष के बराबर है। 8) पहले जिन स्त्रियों की पहचान पुरुष से होती थी (वह या तो किसी की पुत्री या पी था मो के नाम से पहचानी जाती थो) ओर उनकी दशा उस उपग्रह की सो होती थी जो एक ही मह-पुरुष के इर्द-गि्द घूमती थी--आज वे स्वतत्र रूप से अपनी पहचान करवा सकती ! (4) अब उनके विश्वास रूढिवादी नहीं हैं, वे अपनी क्षमताओं व गुणों का लाभ उठा रही हैं और अपने लिए एक नया रास्ता बना रही हैं जो पहले समाज द्वारा उनके लिए निषिद्ध था। 6) उन्होंने पलो और माता कौ भूमिका निर्वाह करने के साथ-साथ अपने जीयन के उत्तरदायित्व उठाने व निर्णय स्वय लेने भी शुरु कर दिये हैं। उनकी अभिरुचियां और कुशलताएँ उनकी पुरानी दकियानूसी बाधाओं को धीरे-धीरे तोड रही हैं 6) स्त्रियों में अब स्वरूप परिवर्तन हो रहा है। 940 और 950 के दशकों की 'रूढिवादी' स्त्री से अब 960 ब 970 के दशकों की “नातीवादी प्रतिक्रिपावादी' ((८४गरण७ 7८8०॥००७५) स्त्री, ॥980 के दशक की 'उदारवादी' (॥9८») महिला, माँ, पली, 'कामकाजी' (0००7) चाली स्त्री, और 990 के दशक और 2000 के पूर्व वर्षों को धीरे-धीरे सशक्त स््रों बन रहो है जिनकी अपनी माँगें होदी हैं, जो अपने अधिकारों को भोग रहो हैं और जिन्हें अकेले भो किसी प्रकार का डर नहीं लगता। वे स्वीकार करती हैं. “मैं यही हूँ, यह मैं नहीं हूँ, और यह मुझे होता है" । (0 वे अपने निर्णय स्वय लेदों हैं तथा वे अब पैर पोंठने की चटाई समान नहीं हैं। वे किसों प्रकार का अन्याय सहन करने को तैयार नहीं है। वे स्वय सोच सकतो हैं, अपना जीवन स्वय बनाती हैं, और अपने बच्चों में भी महत्वपूर्ण मूल्यों का समावेश करती हैं। (8) नयी झ्वी पुरानी स्री का हो एक हिस्सा है। ७) वह आक्रामक, कठोर और दृढ होने में डरती नहीं है। साथ ही वह सुलभ, सज्जन, भावुक, ममता पूर्ण और समझदार में भी पीछे नहीं है। वह कामकाजी स्लो (८आप्थऊ। ऋण्णाथा) हो सकती है, साथ ही घर में माँ भी। वह अपने आम्रपास के लोगों-परिवार, मित्रों, दाम के सहयोगियों आदि के साथ स्नेह भी करती है, लेकिन व्यक्ति के रूप में स्वय से भी स्लेह करती है। (0) वह आकाधाओं, अपेश्ाओं एवं 220 से भी परिपूर्ण है, लेकिन असफल होने पर वह कमजोर रियो को हरह दबी नहीं ख्हो प26 परिवार, विवाह और नाेदारी हम नयी स्त्री के रूप में फ़ातिमा बी का उदाहरण दे सकते हैं। आन्ध्र प्रदेश के कर्नत जिले में कल्वा गाँव की तीन बच्चों की माँ और अशिक्षित साधारण पली ने चुनाव लड़ा और सरपच पद पर विजय रही। यूएनडीपी (ए )५7) 7) योजना की एक बैठक में अचानक उसकी उपस्थिति से उसे स्लियों के लिए काम करने और अपने गाँव के विकास के लिए काम कलने को प्रेरणा मिली। उसने एक स्कूल बनवाया, सडकें बनवाई, निरक्षरता से स्पा किया, पानी कौ टकी के उत्पादन से बिक्री को जिससे उसकी पचायव को एक लाख रुपये की आय हुई। उसको असन्तर्यष्टीय मान्यवा मिली और सयुक्त राष्ट्र सघ के महासचिव से पुरस्कार प्राप्त करने के लिए वह न्यूयार्क भी गई। समकालीन समाज में स्त्रियों को प्रस्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि (0) ससद, विधान मण्डलों, पचायतों, और नगर निगममों में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व अब अधिक है। स्री उद्यमियों, नौकरशाहों, व्यवसायियों, प्रबन्धकों और प्रशासनिक अधिकारियों की सज्या बढ़ गई है। (2) ग्रामीण स्त्रियाँ अभी भी पारम्परिक तथा अत्यधिक सस्कारिक व्यवहार में रूढिवादी हैं, लेकिन शहरी जिया जीवन की वास्तविक लडाई लड रहौ हैं। वास्तव में, शहरी क्षेत्रों मे निम्न मध्यमवर्गीय खतरियाँ हैं जो गृहिणी, शिक्षिकाओं, नसों, लिपिकों, आशुलिपिकों, टेलीफोन ऑपरेटरों के रूप में कार्य करती हैं और निम्न वर्गीय लिया भी हैं जो श्रमिकों, पोल, नौकरानियों, सफाई कर्मचारियों और कचरा बौनने वालों के रूप में काम करती हैं जिनके लिए जीवन अधिक नहीं बदला है। वे आज भी समाज में हीन हैं। आर्थिक दृष्टि से आज प्री पुरुषों से मुक्त नहीं हो पाई हैं। सामाजिक, नैतिक व मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी उनकी स्थिति पुरुषों के समरूप नहीं है। प्रौद्ावस्था में जब वे अपना जीवनक्रम शुरु करती हैं हो समाज के द्वारा उन्हें भिन्‍न परिमक्ष्य में देखा जाता है। क्योंकि बहुत कम खरियाँ ही खियोचित दायो से निकल पाती हैं और क्योंकि उन्हें ठोस रूप में पुरुष के बराबर होने के लिए आवश्यक मदद न तो समाज और न परिवार से ही मिल पाती है, इसलिए वे सफल भूमिका निर्वाहक के रूप में मान्यता प्राप्त नही कर पाती हैं। नारी अधिकारवाद और स्त्रियों के अधिकार (ए€क्रामरांझा क्रात एाह090 ०ण॑ ए०ाएक्ष) नाग अधिकारवाद आन्दोलन ज््ियों के अधिकारों और आधुनिक भूमिकाओं पर केद्ित है। नारी अधिकारवाद पर तौन वैचारिक प्रस्थापनाए (ए०00४॥०5) इस प्रकार हैं . उदाए (॥0८८७)) नारी अधिकारवाद, मार्क्सवादी नारी अधिकारबाद और उम्र (ब्काध्य) नारी अधिकारवाद | उदार नारे अधिकारवाद लिंग (8००१७7) समता में विश्वास करता है और एक लिंग के द्वारा दूसरो को आधीन बनाने की बात अस्वीकार करता है! खतियों को मात प्राणी को अपेक्षा यौन भोग की वस्तु समझने को भी अस्वीकार करता है। परन्तु यौन आपःर पर श्रम विभाजन को यह चुनौती नहीं देता। इसका मानना है कि झ्लिया पारिवारिक भूमिकाओं के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं और पुरुष बाहरी भूमिकाओं के लिए। मार्क्सवादी नारी अधिकारवाद ल्ियों की आधीनता को उत्पादन के साधनों के स्वामित्व (०४०४४) और निजी सम्पत्ति के उदय का परिणाम बतादा है। पुरुषों की दरह ही लियों के काम वा “उपयोगी” मूल्य है लेकिन 'विनियम' (&४८॥७॥४८) मूल्य नहीं है। इसलिए पुरुषों के पात खियों से अधिक शक्ति होती है और खतियों का उत्पीडन भुगतान रहित गृह कार्य के काए परिवार विवाह और नवेदारी १3 होता है। उग्र मारी अधिकारवाद यधपि लैंगिक समानता में विश्वास करता है, लेकिन परस्म्मशगत श्रम विभाजन को अस्वोकार करता है। इसकी मान्यता है कि लिंग आधारित जैविक कारकों का ही परिणाम नहीं हैं बल्कि सस्कृति की देन भी है। यह मुक्त और सामूहिक बाल देखभाल में विश्वास कण्ता है। इस्त प्रकार जब मार्क्सवादी नारी अंधिकारवादियों ने सिर्यों के उत्तीडन को निश्चयात्मक प्रारूप दिया वही उम्र नारी अधिकाखादियों में इसे मनोवाछित स्वरूप प्रदान किया है। ऐसे समाज में जिप्तमें [00 कशेड की कुल जनसंख्या में से लगभग आधी सिाँ अधशिक्षित हों (998 के प्रारम्भ में), राष्ट्रीय प्र्िदर्श सर्वेक्षण संगठन पर आधारित नवीनतर्म आँकड़ों के अमुसार (ब्लियों की निरक्षरता आंकड़े 997 में 39% से 997 में 49% से ऊपर चले गए) (दी हिन्दुस्तान टाइम्स, दिसाबर 26, 3998) विभिल सामाजिक कामूनों के माप्यम से सतरियों के लिए क्या अधिकार सुरक्षित किए गए हैं ? > भारतीय सविधान रि्रियों को समानता, स्वतत्रता, सम्पत्ति, शिक्षा, सवैधानिक उपायों तथा शोषण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है। राज्य भी छियों के हित्तों की रक्षार्थ विशेष कानून बनाते रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में ये कानून विविध पक्षों से सम्बद्ध हैं जैसे, विवाह (साथी के चयन, विवाह के समय आयु, बहु विवाह, तलाक, भरण पोषण भत्ता, दहेज, वेवाहिक अधिकारों का पर्यापन, और पुनर्विवाह), बच्चों का णोद लेना और गर्भपात आदि। आर्थिक काबून सम्पत्ति के अधिकार या उत्तराधिकार, समान मजदूरी, कार्य दशाए, प्रसृति लाभ एव रोजगार की सुरक्षा से सम्बद्ध हैं। ल्लियों को अदत्त राजनैतिक अधिकार हैं. स्री मताधिकार और विधायिबाओं के लिए पात्रवा (जाक्ष०॥७) | क्या लिया इन अधिकारों के श्रति जागरूक हैं ? क्‍या वे वास्तव में इन अभिकारों का उपयोग कर रही हैं ? लगभग एक दशक पूर्व गजस्थान में एक जिले के आठ गाँवों में 8-50 वर्ष आयु समूह कौ 753 रियो में मेरे द्वास किया गया अनुभवाश्रित अध्ययन दर्शावा है कि यधपि जागहुकता का स्तर चार तत्वों पर निर्भर करता है. झ्ली को व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, उसका साम्राजिक दातावरण, उसका अपना दृृष्टकोण और उसका आधिक आधार, फिर भी जागरुकता का स्तर बहुत कम है (आहूजा राइद्स ऑफ़ विगेन, ए फ्रेमितिस्ट पर्सप्ैक्टिव, 992) | परन्तु हम यह नहीं मानते कि अधिकारों के जागरुकता से स्लियों को प्रष्थिति स्वथशत्व उठ जाती है। बल्कि एक प्रश्न उठता है कि यदि पुरुष स्त्रियों के देय अधिकार उन्‍हें नहीं देते, क्योंकि या तो स्रिया यह सहन कर लेती हैं और विद्रोह नही करती, या क्योंकि सपपाजिक रियमों का उल्लंघन करने वालों को कोई दण्ड नहीं दिया जाता या क्योंकि अधिकारों कौ अस्वीकृति के लाभ कौमतों से अधिक हैं, तो पुस्षों द्वाए चालित अन्याय में चक्र को कैसे वोडा जाये ? स्त्रियों के हितों की रक्षा कैसे करें ? कौन सी नौतिया और कर्यक्रम पुरुषों को उदार बनाएगे ? इनके उपाय सामाजिक, वैधानिक और आर्थिक जीत होते हैं जियों के आन्दोलन और सरकार द्वारा उठाए गए कुछ कदम ऐसा आभास देते हैं कि कुछ ऐसे सास्कृतिक और सरवनात्मक परिवर्तेन लाए गए हैं कि रूयों को शिक्षा, रोजगार और गजनैदिक भागौदरी में पुरुषों के समान अवसर प्रदाव किए गए हैं, उनके शोषण में कमी आईं है और उन्हें ऐसे सभठनों के विकाप्त के लिए उन्मुख किया गया है जो ठनवी 728 परिवाद विवाह और नातेदर समस्याओं में गहये रुचि लेते हैं। लेक्नि सत्य यह है कि ये परिवर्तन मात्र दिखावा है औः व्यवहार में रियों को देय अधिकार नहीं मिल रहे हैं और वे आज भी पुरुष को आधोगा की शिकार बनी हुई हैं। अधिकारों के न देने के पीछे काप्णों में व्यक्निगत, आर्थिक व जनाक्की कारक है सकते हैं। व्यक्तिगत कारकों का सम्बन्ध उन पुरुषों की व्यक्तित्व को विशेषताओं से है जितको बुद्धि लब्धि ( 0) निनस होती है, जो अपरिपक्वता, हताशा और दुष्ठा से परोडित होते हैं, जो मद्यपायो (००४०॥८5) होते हैं और रूयों से अत्यधिक काल्पनिक अपेक्षर रखने हैं और चाहते हैं कि रूयों निष्किय और नप्न बनी रहें। जहा तक आर्थिक कारकों वी सम्बन्ध है, धनोपार्जन करने वाली झियों को अधिक और गैर-घनोपार्जव करने वाली लिए को कम अधिकार प्राप्त हैं, निम्म और मध्य आय वाले परिवारों की खरियों के अधिकारों को उपेक्षा उच्च आय परिवारों की रूयों से अधिक की जादी है, और धनोपार्जन करे वालो खित्रयों में जो गैर व्यावसायिक कार्यों या निम्न स्तरीय कार्यों में लगी हैं कम अधिकायं दा ओग करती हैं अपेक्षाकृत उनके जो व्यावसायिक कार्यों या उच्च स्तग्ैय कार्यों में लगे एटी हैं। अन्तिम, जहाँ तक जन मख्यात्मक कारकों का सम्बन्ध है उच्च जाति की महिलाओं को मध्यम और निम्न जाठीय रिरयों से कम अधिकर प्राप्त हेते हैं, वृद्ध पुरुष लियों को अधिकाए देते हैं अपेक्षाकृत युवा पुरुषों के, और महिलाओं द्वाग महिलाओं की अधिकारों द्वाए इकाए किए जाने के मामले कम हैं अपेक्षाकृत पुरुषों द्वाा छिपों को। हम ऐसे पुस्षों के भी उदाहरण दे सकते हैं जो ह्ियों को उनके अधिकारों से वचित रखते हैं। ये वे पुरुष होते हैं जो होनता भावना तथा स्व निम्न मूल्याकन से पीडित होते हैं, कम ससाघनों वाले होते हैं, अर्थात्‌ जिनके व्यक्नित्व अव्यस्थिव होते हैं, जिनका स्वभाव शक और अहब्मर वाला होता है, जो अपने बचपन में हिंसा के शिकार हो चुके हैं, और अपने परिवारों में तनावपूर्ण वातावरण का सामना करते हैं। जिन रूयों को अधिकारों से दचित रखा जाता है वे होती हैं जिनमें असहाय होने वी भावना होती है, जो होनता भावना से पीडिव होतो हैं, अपने स्व छवि (६७/-%०5४०) वो हीन-देखती हैं, जिनमें मामाजिक परिषक्वा को कमी होती है, और जो आर्थिक रूप से पराधीन होती हैं। हम छ प्रकार की पवन्चनाए (१८छ७ ० मह/७) बता सकते हैं धनोमुछी (:0807८)-०गा८वा८0), आनन्दोन्मुख (छ225७८-०्राध्णा८त), शकविति-उन्मुख (फछ* ०७८०(८०), उत्पीडित महिलाओं के व्यवहार के कारण ठत्यन्न (पाए दलएप कद, इन्कार करने वाले व्यक्ति की व्याधि परिणाम स्वरूप उतन्न (एबणणः३ ए०8णी००) तनावपूर्ण पारिवारिक स्थितियों का परिणाम। महिला मुवित के तीन प्राम्प (तात्ट १40065 [० एए०फला5 [९४6०७ समाज में सियों को स्थिति को ऊँचा उठाने के लिए उन्हें अल्पसख्य समूह के रूप में मातवे हुए दीन प्रतिदर्श (मॉडल) बताए गए है (#॥८० ०5, वुण्ण०6 09 ताल प्र्षभ॑ं॥ण०0०5, $म्तंगंण्ए.. उ्र्कार बाबे मेकफ्थ्दारठ, व98 : 399) येझल परिवार; विवाह और बतेदारी 429 प्रकार हैं : बहुद्नदी (शए८आ८ण) प्रारूप, आत्मम्रातकाण (&६छापां॥००) प्रारूप, और सकर (पांव) प्रारूप! बहुवादी प्रारूप के अनुसार छियों को अपने विशिष्ट गुणों को विकसित करना एवं बनाए रखना चाहिए, साथ ही उन परिस्थितियों को भी हटाना चाहिए जो उन्हें असमानता का सामना करने को बाध्य करती हैं। यह प्रारूप ऐसे भविष्य की सम्भावना का अनुमान करता है जिसमें सनी व पुएष अपने अन्तर बनाएं रखेंगे। ये अन्तर उनके बीच को प्रस्थिति और समानता के प्रप्तगों में खली पुरुष दोनों द्वारा स्वागत किए जायेंगे और वे इनका अम्मान भी करेंगे। इसका अर्थ यह है कि ख््ो पुरुष भिन होंगे किन्ु समान भी होगे। परन्तु कुछ विद्वानों ने इस प्रारूप को स्वीकार नही किया है क्योंकि वे सोचते हैं कि 'पृथक' व प्रमान' के आदर्श का व्यवहार में परिणाम होगा स्लियों पर अत्याचार और उनका शोषण। आत्मसातकरण प्रारूप का तर्क है कि स्लियों को समाज की मुख्य घाद में शामिल होना चाहिए। इस्तका अर्थ होगा समलिंग (७६७७) समाज, जिसमें रतिया पुरुषों के समान भूमिका निभाएंगो, अर्थात्‌ सियों विशिष्ट भूमिकाएँ निर्वाह की अपनी विशिष्ट विशेषताओं को खो देंगी। विद्वान तर्क देते हैं कि 'आत्मसावकरण' असम्धव हे क्योंकि पुरुष की जीवन शैली लियों की गृहिणी की भूमिका द्वाय पुरुषों कौ आवश्यकताओं की पूर्ति के को पृष्ठभूमि पर आधारित है। यदि स्लियों को पुरुष भूमिकाएँ अपनानी हैं दब भृहिणी के लिए एक अकार्यात्मक भूमिका का पता लगाना पडेगा और आत्मसातकरण दोनों को अस्वीकार करता है। यह इस विवार को अस्वीकार करवा है कि स्तियां परम्पशगत पुरुष भूमिकाए अपनाएँ और यह मानता है कि स्रो पुरुषों दोनों कौ परम्पगगत भूमिकाओं में परिवर्तन उनकी सामाजिक अस्मानता दूर करेगी । उपरोक्त प्रारूप स्त्रियों को मुक्ति पर, विशेष रूप से स्त्रियों की भूमिकाओं में परिवर्तन पर, भरकाश डालते हैं। पुरुषों के समान रूियों द्वाता भूमिकाए निभाए जने के विचार को हम व्यावहारिक मानते हैं लेकिन यह भी प्रानते हैं कि द्धियों द्वारा गृहिणी की भूमिका समाप्त किया जाना या स्ियों को गृह कार्य के लिए भुगतान करना व्यायहार्कि नही है। समाज के सभी क्षेत्रों में श्रम के लिए आधारित विभाजन को समाप्त नहीं किया जा सकता। हमें अपनी सस्कृति में हाल ही में उभर लिंग भूमिकाओं के विचार में क्रान्ति की आवश्यकता है। हम चाहते हैं कि री गण को व्यक्ति के रूप में देखा जाये, न कि लिग के रूप में । इसमें यह बात शामिल नही है कि यह परिवर्तन समलैंगिक और स्वरतिशोल (।८६७५७०) नाग प्म्बन्धों को सहन किया जायेगा। हम तो केवल यह चाहते हैं कि सास्कृतिक रूप से चली आ रही "एक स्री' को छवि द्वारा सीमित और दबी रहने के बजाय स्त्रियों के लिए सास्कृतिक स्ववंत्रता हो ताकि वे अपने लिए उपयुक्त व्यवहार और अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें। महिला मुक्ति आन्दोलनों से समाजशासत्र में एक अलग शाखा “्तियों का समाजशासत्र' का उदय हुआ है। समाजशास्र को यह शाखा कह दो प्रकरणों से सम्बन्धित ' (0) खतियों का मूल्याकन जो कि उतनो ही महत्वपूर्ण हे जितना पुरुषों का और (0) सामाजिक समस्या के रूप में छियों कौ समाज में आधीन स्थिति। स्रो और पुरुष दोनों ही संमाजशाप्तियों ने, जो सिर्यों के आदर्शों के लिए प्रतिबद्ध हें, भारत में सियों के अध्ययन को ओर घयात आकर्षित किया है। उनमें से कुछ ने महत्वपूर्ण अस्ताव रखे हैं, जैसे र्ियों को पस्परागद यूत्यों को त्यागने और आषुनिक मूल्यों को विकसित करने की आवश्यकवा, 430 ज९वार, ववाह आर नाव॑ंदाएं अपने “असहाय' होने के दृष्टिकोण को छोडना, अपने करियर के लिए श्रमिक कौ भूमिका को उतनी ही गम्भीरता से घारण करना जितना कि गृहिणी की भूमिका को, तथा विभिन भूल्यों को वरीयता देना, आदि। जब तक खरी अपनी “श्रमिक भूमिका" को श्रम बाजार में उतना ही महत्व नही देती जितना कि 'अभिव्यक्तिपूर्ण नारी भूमिका' को, तब तक स्त्रियों के थ्रति भेदभाव का अन्त नही होगा। स्त्रियों के प्रति हिंसा (श०णलालर #छुआ05 श्गार्०) स्त्रियों के प्रति हिंसा उस शक्ति बल (0८८) का द्योतक है जो चाहे गुप्त रूप से या अक्ट रूप से स्त्री से कुछ प्राप्त करने के लिये प्रयुक्त हो, जिसे वह अपनी इच्छा से न देना चाहे, और जो उसे शारीरिक आघात या भावात्मक आघात या दोनों पहुचाता हो। स्षियों के प्रति हिंसा को इस अकार वर्गीकृत किया जा सकता है. अपराधिक (८मंणाएर्श) हिंसा, (ताक, अपहरण, हत्या), घरेलू (0077८४४८) हिंसा (दहेज हत्या, पली की पिटाई, नातेदारों द्वारा यौन शोषण, विधवाओ और वृद्ध र्तयों से दुर्व्यवहार, बहू को यातना), और सामाजिक हिंसा (पली या बहू को कन्या भ्रूण हत्या (८००३८ ॥0८४००८) के लिए बाध्य करना, छेडछाड़, युवा विधवा को 'सती' होने के लिए बाध्य करा, री को सप्पत्ति में से हिस्सा देने से इनाए 'करना)। हिंसा की शिकार महिलाएँ कौन हैं ? 985 और 993 में लियों के प्रति हिंता पर किए गए एक अनुभवात्मक अध्ययन के आधार पर (दिखें ५0७७) ॥२४७0, (0706 8 फठला, 987 ७00 ५ए0६४८० 82५०७ (४००७०, 999) मैंने चार प्रकार की ज्ियों को इगित किया है जो हिंसा की अधिकतर शिकार होती हैं. () जो असहा०, अवप्ीडित (१९७:८५६८४), धूमिल स्व-छवि वाली (फएण्क 5७४॥-ए9०९९), और अपने को हीन समझे वाली हों या वे जो हिंसा कर्त्ताओं द्वारा भावात्मक रूप से शोषित हों, या जो परहित वादपरक 'शक्तिहीनता (&(7ए%5७६४८ (0%८४८४५४९५७) से पीडित हों , (2) जो तनावपूर्ण पारिवारिक स्थितियों में रहती हों या ऐसे परिवार में रहती हों जो सामान्य नहीं कहे जा सकते, अर्थात जो सरचनातक दृष्टि से पूर्ण नही कहे जा सकते, आर्थिक रूप से असुरक्षित हों, मेतिक रूप से विचलित हों और कार्यात्मक रूप से अपर्याप्त हों, 5) जिनमें सामाजिक परिवपक्वता कम हो या सामाजिक अन्तर्वैवक्तिक दक्षता की कमी हो और व्यावहारिकता की समस्याओं पीडित हों, (६) जिनके पति व्याधिपूर्ण व्यक्तित्व वाले हों या शराबी हों। हिंसा का प्रयोग करने वाले पुरुष कौन हैं ? सामान्यत ज्ियों पर अत्याचार थी आक्रमण वे लोग ही करते हैं जिन्हें वे जानती हैं ।' इग्लैंड में वारविक विश्वविधालंब किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 60 अदिशत खियों को अपने ही पर के सदस्यों द्वारा शापित (39५5८०७) किया जाता है और 40 प्रत्रिशत अजनबियों द्वार। भा में भी विभिन्‍न राज्यों में पुलिस के पास रिपोर्टों से पता चलता है कि 'घर” (जन पसिता0 जियों के लिए सुरक्षित नहीं है (इसका यह अर्थ भी नही है कि खिया अपने घर के बा अधिक सुरक्षित है)। पुरुष यह वर्क देते हैं कि आज पली रूप में ख्री से जितनी ओपक्षाए की जाती हैं उनमें वे परम्परागत मानदण्डों को नही मानती हैं। क्‍या इसका अर्थ यह माना जाये कि जो इस प्रकार के मानदण्डों का अनुपालन न करें और कुछ स्वतत्रता चाहें उन्हें हिसा की परिवार, विवाह और नातेदारी व3व आवश्यकता है, चाहे शारीरिक, मनोवैज्ञानिक या भावानात्मक जिससे वे उस अनुपालन को पूर्ण कर सकें ? क्‍या आज के युग में हम इस प्रकार के 'पितृतत्ात्मक मतैक्य! (7गप्ं॥शा॥। ००७८5) को स्वीकार कर सकते हैं ? जियों के विरुद्ध हिसा का अयोग करने वाले प्रहारकर्ता (धणक्ता72८5) सात प्रकार के हो सकते हैं | ये हैं . * जो अवपीडनशील/अवपात (6८7:८४अ०१७) से पीडित,हीन भावना वाला तथा निल्‍न स्वांकन (६०/-८४८०८०) से प्रस्त्र हों। ० 2 व्यक्तित्व अव्यवस्थित हो और जो मनोव्याधि (5/०0०9»॥9) से पीडित । ० जिनके पास संसाधनों, कुशलताओं और योग्यता को कमी हो और जिनका व्यक्तित्व सामाजिक रोगी (50००/#!पं८) का हो। ० जिनका स्वभाव प्रभुत्वशाली (9055८5४४०), शक्‍्की और स्वामित्व भाव वाला (३०फांशआ) होता है। ० जो परिवार जीवन में तनावपूर्ण स्थितिया झेलते हैं। ० जो बचपन में हिंसा के शिकार रह चुके हैं। ० जो शराब पीने के आदी हों। यदि हमें ज्यों के प्रति हिंसा के प्रकार विकप्तित करने हों तो हम छ प्रकार की हिंपा बता सकते हैं. * . पनोन्मुख (पराण००४-०7८॥॥८0) हिंसा। कमजोर पर ताकत आप्त करने के लिए (छ0फा-एग्र्प/८0) हिंसा। सुखप्राप्ति के उद्देश्य से की जाने वाली (ए४४७ए7९-०शशा।20) हिंसा। हिंसा प्रयोग करने वाले की व्याधि (9900०६५) के कारण ठपजी हिंसा। तनाबपूर्ण पारिवारिक स्थितियों के परिणाम स्वरूप हिंसा। शिकार हुए व्यक्त द्वार प्रेरित (७०७७४-०॥९८४८त) हिंसा। हिंसा के प्रेरक तत्व डियों के प्रति हिंसा के कौन से प्रेरक कारक हैं ? इन कारकों को तीन आधार पर समझाया जा सकता है : () वे स्थितियाँ जो हिंसात्मक व्यवहार पैदा करती हैं ; (9) पीडितों की विशेषताएं और (99) प्रहयर्र्वाओं (छ८पाण७टा७) की विशेषताएँ। दियों के प्रति हिंसा के चार कारक बताये जा सकते हैं . (5) पीडित के उकसाने पर (8) नशे में (७) स्लियों के प्रति आक्रामकता (४00४४४) और (०) परिस्थिति को मांग। पोड़िता का व्यवहार कभी-कपौ पीडिता अपने व्यवहार से अपने प्रति हिंसा करने के लिये व्यक्ति को उकसाती है जो कि अक्सर अचेठ में होदा है, अर्थात दह स्वय को शिकार होने की स्थिदि पैदा कादी 32 परिवाद विवाह और नातेदारी है। उत्पीडित खी अपराधी के हिंसात्मक व्यवहार को या वो उत्तल करती है या भडकादी है। पीडिठा के कार्य उस व्यक्ति को आक्रामक बना देते हैं जिससे उसके अपराधी इदे उसकी ओर निर्दिष्ट हो जाते हैं. बलात्कार, पली को पीटने, अपहरण, विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार और हत्याओं पर मेरे स्वय का सर्वेक्षण का केन्द्र पीडित ही थे, फिर भी कुछ अपराधियों और हमलावरों का भी साक्षात्कार लिया गया था। आश्चर्य कौ बात तो यह है कि कुछ ही लोगों में शर्म यां चिन्ता की अभिव्यक्ति की। अधिक सख्या में इस प्रकार के लोग किसी उद्बेगात्मक पोशनी या जिसे मनोवैज्ञानिक 'पोेशान पुरुषत्व' (०0७० 7028८७॥7/0) कहते हैं का अनुभव किया। पली से मारपीट करने वाले प्रह्मरकर्ताओं ने अपनी पली को पीठ पौछे बुराई करने वाली, उन व्यक्तियों से बात करने को आदत बिकें वे नापसन्द करते थे, उनके माता, भाइयों व बहनों के साथ बुरा व्यवहार करने, मर कौ उपेश करने, सम्बन्धियों से बुरी तरह बात करने, कुछ लोगों से गलत सम्बन्ध रखने, अपने ससुगल वालों का कहना मानने से इन्कार करने, उन्हें लडाई वाले स्वभाव से कऋुुद्ध करना, या उनके मामलों में अत्यधिक हस्तक्षेप करने का दोषी बताया। इसी प्रकार अपराधी हमले (बलात्कार) बाले मामलों में भी ऐसे बलात्काए थे जिन्होंने पीडिता के ही व्यवहार को यौन सम्बन्ध के लिए प्रत्यक्ष निमंत्रण बताया तथा कहा कि पीडिता ने ऐसा इशारा दिया कि यदि उसने जोर देकर कह तो बह उसे उपलब्ध रहेगी । वास्तव में पीडिता का ऐसे व्यवहार को निमत्रित करे का इरादा था या नही, या फिर यह अपराधी की अपनी समझ/दृष्टिकोण था जिसके काएण उसने उस र्री का शोषण किया। इस कार्य को स्त्री द्वारा 'अभिकृत कार्य! (४७ रण ००्णागर55०ा) नहीं तो “उपेक्षाकृत कार्य” (०9530०) कहा जा सकता है। इस प्रकार निष्क्रिय पीडिता हिंसा के कार्य में उतना ही योगदान करती है जितना सक्रिय पीडिता। हत्या के मामले में भो हमारे सामने ऐसे मामले आए जहा हमलावों के अनुसार, मानव हत्या की स्थिति बन गई, जब बहस और वाकयुद्ध में पीडिता ने ऐसे हालात बना दिए जिन्‍्होंते व्यक्ति पीडिता पर हमले के लिए प्रेरित किया। अपहरण के मामलों में भी कुछ अपर्हताओं ने सकेत दिया कि उनको पीडिता स्वय उनके साथ भागने के लिए और विवाह करने को तैयार थी लेकिन जब वे अपने माता-पिता की शिकायद पर पकड़ी गई,गे दवाब में उन पर पीडिता को भ्रगा ले जाने का अपराध लगाया। औसत में 30 म्रतिशत मामले स्वेच्छा से भागने के थे, 24 प्रतिशत दवाब में भागने के, 7 प्रतिशव सहायता से भागने के मामले थे (जिनमें पीडिताओं ने न तो दोषी व्यक्ति के साथ भागने की सहमति दी थी न ही विशेध किया बल्कि दोषी व्यक्ति के 'शक्ति' सम्बन्धों के कारण उप्तके साथ भाग गई), और 20 प्रतिशत तनावपूर्ण अपहरण के मामले ये जिनमें पीडिता प्रारम्भ में वो स्वेच्छ से अपना घर छोडने को तैयार हो गई लेकिन बाद में पछताई जब दोषी ने उसके साथ बलात्कार किया या उसके आभूषण बेच दिए या उसे होटल में छोडकर चला गया। इस विश्लेषण से हम पीडिताओं को 'सक्रिय', “निष्किय', और 'आकस्मिक' में चर्गकृत कर सकते हैं। कम से कम दो प्रकार कौ पीडिताएँ ऐसी स्थिति पैदा करती हैं किम अपराधी हालात का औए/या बाघ्यवा का शिकार हो जाग है और पीडिता के साथ इस पका का व्यवह्र करता है कि उस पर हिसाकर्ता या अपराधी का दोष लग जाता है। परिवार, विवाह और नावेदाए 433 हिसा में मद्यपान मद्यपान या नशा भी हिंसा का कारण होता है, अर्थात्‌ हिसा के कुछ मामले तब होते हैं जब आक्रमणकर्ता नशे में होता है और अत्यन्त उत्तेजना तथा असमन्तुलित मस्तिष्कावस्था में होता है और अपने कार्य के नतीजे के विषय में शायद ही सोचता है। उदाहरणार्थ, बलात्कार के कुछ मामलों में दोषियों ने पीडिता पर तब हमला किया जब उन्होने इतनी शराब पी ली थी कि भावात्मक उत्तेजना एवं नशे की स्थिति में थे। वे सामान्य नियत्रण खो चुके थे और उनकी आक्रामक कल्पना यौन इच्छा से मिलकर उप्र हो गई जिसके कारण उनका कदम इतना अनु्तदायित् पूर्ण रह। नशे से सम्बन्धित यौन अपराध समय, स्थान और परिस्थिति की उपेक्षा करने का उदाहरण हे। हिंसा और नशे के बीच इसी प्रकार के सम्बन्ध पली को पीटने और हत्या के मामलों में भी दिखाई पड़ते हैं। मेरे अपने अध्ययन में, मैंने देखा कि पली को पीटे जाने के साथ-साथ 37,7 प्रतिशत मामलों में नशा भी शामिल था (आहूजा ऋाइम अगेन्‍्स्ट विमेन, 987 . 30) | हिलबरमन और मन्सन (978 .460 7]) ने 93 प्रतिशत मामलों में ऐसा देखा। बोल्फगैंग (978) ने 67 प्रतिशत और टिकलेनवर्ग (973) ने 7 प्रतिशत मामलों में ऐसा पाया। हमें यह मानना चाहिए कि जब हम हिसा को मद्यपान से जोडते हैं तो हम रक्त में शराब को मात्रा नापने कौ अपेक्षा शशब के प्रयोग पर निर्भर करते हैं। वास्तव में रक्त में शराब के केद्धित हो जाने को हो मद्य के प्रभाव व पली को पीटने से सम्बद्ध किया जा सकता है। रक्त में अधि उच्च शराब को केन्द्रित हो जाने से व्यक्ति में दूसरों को हानि पहुचाने की क्षमता कम हो जाती है। यद्यपि हम यह मानते हैं कि रक्त में शराब का जमाव इतना होना चाहिए कि अपराधी एक सीमा तक ही स्वय पर नियत्रण ख़ाये ताकि वह अपने कृत्य के परिणाम न भूले। इसी प्रकार की अवस्था में व्यक्ति हिंसात्मक हो जाता है। भह स्पष्ट नही है कि बया शराब हिसात्मक व्यवहार को प्रेरित करता है या यह पहले से हो मौजूद आक्रामक प्रवृत्तियों के उत्सर्जक के रूप में मुख्यत कार्य करता है। बाद को सकल्पना शायद इस विचार से (ब्लूमर, 973 73-87) कि हिंसा के कुछ अपराधी किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा करने से पहले साहस जुटाने के लिए मद्यपान करते हैं। लेकिन मेरे अध्ययन में एक भी मामला ऐसा नही मिला जिसमें अपराधी ने अपने शिकार पर प्रह्मर करने से पूर्व शराब पी हो। यद्यपि हम ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं दे सकते हैं जिससे यह सिद्ध हो कि शग़्ब का पीवा ही हिंघा का व्यवहार कपता है। अनेक लोग मद्पान करते हैं फिर भी वे शायद हो कभी हिंसक होते हों। ल्लियों के विरुद्ध हिसा करने में शराब के प्रयोग को एक सहायक कारक ठो माना जा सकता है परन्तु अ्रमुख काएक नहीं। सरयों के प्रति घृणा जियों के श्रति व्यक्ति की घृणा भी उसे हिंसा के लिए ग्रेरित कादी है। ख्तरियों के विरुद्ध पिपोर्ट किए गए कुछ मामले इस प्रकार की प्रकृति के हैं कि किसो भी प्रकार का विवेक्पूर्ण 334 परिवाद विवाह और बेदी व्यवहार आक्रामक को तिर्दयी हिंसात्मक कार्य करने से नहीं बदल सकता। उनमें से कुछ तो जियों के प्रति इतनी गहरी धृणा से पीडित होते हैं कि उनके हिंसक कृत्य को प्रधानव लियों के अपमान करने कौ ओर ही निर्दिष्ट कर्ता है। यदि केवल स्थिति ही मात्र भेरक कारक होती है तो यह कहमा कठिन है कि हिंसक कृत्य आवश्यक क्यों होता है जबकि सत्य यह है कि अधिकतर अपराधी सामान्य व्यक्ति कहे जाते हैं। शायद प्रीडिता के अपमान करे की इच्छा कही बलवान है। परिस्थितगत योजना कभी-कभी हालात की मॉँग भी व्यक्ति को हिंसा प्रयोग के लिए भ्रेरित करती है। इस श्रेणी में उन मामलों को शामिल किया जा सकता है जहा हिसा का प्रयोग न तो पीडिता के व्यवहार के कारण और न ही अपराधी के विघटिव व्यक्तित्व के कारण होता है बल्कि अवसर के कारण होता है, जब ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाती है जिनके परिणाम स्वरूप हिंसा का प्रयोग होता है। उदाहरणार्थ, पली को पीटने के मामले में ऐसा हो सकता है कि धन के मामले में सर्घर्ष हो जाये और उस सपर्ष की परिस्थिति में पति पली पर हमला कर बैठे, या पति के माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार भो पति को अपनी पल्ौ को पौटने के लिए प्रेरित कर सकता है, या बलात्कार के मामले में कोई व्यक्ति अचानक अपने गाव के खेत में अपने पडौस को स्ली से मिलता है और बातचीत करने लगता है और अन्त में परिस्थिति का लाभ उठा कर उप्त ख्री से बलात्कार करता है, या पुरुष नियोजक अपनी स्त्री कर्मवारी की देर शाम तक फैक्ट्री/दफ्तर में अकेले पाकर उस से छेडछाड करता है, या एक लडकी अपने पिता के घर से भाग जाती है और एक ट्रक में लिफ्ट लेती है और ट्रक चालक मौके का फ़ायदा उठावी है और उस पर आक्रमण कर बैठता है। इन सभी मामलों में, अपराधियों में हिंसक कृत्य वी कोई पूर्व योजना नहीं बनाई थी, लेकिन जब उन्होंने प्रेरक/अपने पक्ष की स्थिति देखी उ्होंते हिंसा का प्रयोग कर दिया। इन हिंसक कृत्यों के अलावा ये अपराधी विचलित व्यवहाएपूर्ण जीवन व्यतीत नहीं कर रहे थे। व्यक्तित्व सबधी गुण अस्तिप, व्यक्तित्व के गुण भी व्यक्ति वो हिसक घ्यवहार में लिप्त होने को बाध्य करते है। हिंसा के लिए सवेदनशील व्यक्तियों के कुछ पहचाने जाने वाले .गुण हैं * अत्यधिक शा, कामुक, प्रभुत्व वाले, अविवेकी, अनैतिक, सरलता से भावाबेश में आने वाले, ईर्घातु, अधिकार जमाने वाले, और अन्यायी। बचपन में विकसित गुण आरौढावास्था में व्यवित आक्रामक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। आक्रमणकर्ता के हिंसक व्यवहार का परीक्षण कले के लिए यह देखना पडेगा कि उप्तका बचपन कि प्रकार के हिप्तक व्यवहार के बीच हुआ। उदाहरणार्थ, पली को पीटने के कुछ मामलों में, उन व्यक्तियों के बचपन, किशेए अवस्था और पूर्व प्रौढ्ावस्था के अनुभव द्शावे हैं कि वे सभी भावात्मक रूप से दुर्घई स्थितियों में क्रोध व हिसा से विपटना सीख चुके थे। दुखद पारिवारिक जीवन जिसमें शारीरिक यातना और गम्भीर भावात्मक अस्वीकृति प्रमुख रही हो, अधिकवर मामलों रे प्रखिद विवाह और गावेदारी 335 जीवनक्रम बन जाता है। कुछ आक्रमकों ने इस प्रकार की स्थितियों का सामना अपने परिवार में बचपन/किशोयवस्था में किया है जह्य उन्होंने अपने माता पिता को चौखते चिल्लाते और एक दूसरे से झडते देखा है और पिता द्वाण बच्चों को भी थोडी गलती पर पीटे जाते देखा है। अक्सर उनके पिता शग़व पोकर घर लौटते थे और पूरे घर में तोड-फोड़ और हगामा करते थे। हिंसक पर में बडे हुए व्यक्ति हिंसा को हो अपने व्यवहार में अपना लेते हैं जो श्रौद़ जीवन में आक्रामक व्यक्ति बन जाते हैं। अल्फो (४70, 4978), पोट्स, हैन्बर्गर और हालैण्ड (एण७5, घतत्याएथहुश क्षाप प्रणगठे, 4979), तथा फैगन, स्टीवर्ट और इलान्सेन (9800, $०ए७था है: ॥क्षाइथवा, 987) ने भी हिंसक व्यक्तियों और उनके बच्चों पर किए गए अपने अनुभवात्मक अध्ययनों में इसी प्रकार के सह-सम्बन्ध की ओर सकेत किया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि काफ़ी सख्य। में आक्रामक अभिशप्त बचपन और पारिवारिक हिंसा के शिकार रह चुके हैं क्योंकि बच्चे के रूप में हिंसक होने से प्रौढ जोवन में हिस्क प्रवृति को पनपने को पूर्ण सम्मावना रहती है। हिंसक व्यवहार की सैद्धान्तिक व्याख्या (ताध्कदांत्व फफगाबाणा ण॑ तल: छषछव्शंण्प) किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा आवश्यक रूप से 'किसी के द्वार! और 'किसी के विरुद्ध हिंसा' है। अत छवियों के विरुद्ध हिंसा को भी 'एक समूह द्वारा एक व्यक्ति के विरुद्ध हिसा' या 'एक पपृह के द्वार दूसरे व्यक्ति समूह के विरुद्ध हिंसा/ के विपरोत “एक व्यक्ति के द्वार दूसरे व्यक्ति के प्रति हिसा' के रूप में समझना चाहिए! व्यक्ति द्वारा को जाने वाली हिंसा में इसकी उत्पत्ति और स्वरूप व्यक्ति के स्वय में तथा उसके चारों ओर कौ रिथिति में निर्षासति किये जाने चाहिए। इस विचार में न केवल व्यक्ति का जन्मजात व्यवहार बल्कि उसके अर्जित व्यवहार को भी देखना होगा। हमाण 'सामाजिक बन्धन दृष्टिकोण' (50लंगा 80॥6 ७9०५०) दोगों प्रकार के व्यवहारों की तथा सामाजिक सरचनात्मक दशाओं की समीक्षा करता है। मेरी धारणा है कि लियों के प्रति हिंसा के कारणों को पाँच कारकों से सम्बद्ध करके देखा जाता चाहिए. (]) स्थिति कौ सरबना जिसमें हिंसा दा प्रयोग किया गया है,(2) स्थिति सम्बन्धित सुविधाएँ जो हिंसा के प्रयोग को व्यावह्यरक बनादी हैं, 5) वे प्रबल कारक जो हिंसा करवाते हैं, (६) हिंसा कले वाले अपशधी द्वा अनुभूत दबाव, (5) पीड़िता का हिसके अपराधी के साथ हिंसा होने से कापो पहले व्यदहमए। इन रभी काए्डों छा एक पमध्वादी (४०७४०) दृष्टिकोण हो सियों के प्रति हिंसा के प्रयोग के सही कारण बता सकेगा। पुरुषों द्वाा रूयों के प्रति हिंसा करने के विशेष रूप से तीन वारण मालूम पड़ते हैं (0) अपशधी का अभिशप्त बचपन का इविदास, जैसे कष्टश्रद पालन पोषण, मा बाप दा शारीरिक यातनाएँ दिया जाना, हथा सवेगात्मक उपेक्षा, 2) परिवार की तनावपूर्ण स्थितियाँ, और 0) प्रस्थिति जनित कुण्ठाएँ। प्रथम कारक बताता है कि अपयपी का विचलित व्यवहार अधिकतर उसने बचपन और किश्ञोर अवस्थाओं के दवाव भरे अनुमवों से सोखा होता है। यह विश्वित रूप से 'पीढोगव सिद्धाव' (इत्म७४०४००आ 77०००) कौ ओर सकेव करता है 436 परिवाद विवाह और वातेदाएँ कि हिसा और आवेश से भरे परिवारों में पालन पोषण होने पर यौवन एवं प्रौदावस्था में व्यक्ति के हिंसक होने की प्रवल सम्भावना होतो है। मेरे स्वय के अध्ययन से उपलब्ध दध्य कि एक बड़ी सख्या में अपराधी (78%) बचपन से ही हिंसा का शिकार रहे, यह आँकड़े “सामाजिक सीखने' (६0८४ ।८०प्राए्) के सिद्धान्त का भी समर्थन करते हैं जिसके अनुसार जीवन के किसी सर्पमयी स्थिति का सामना करने की एक विधि के रूप में विचलिद च्यवहार सौखा हुआ व्यवहार है । महिलाओं द्वार हिंसा को सहन करने की क्षमता को 'अर्निंत असहायता/विवशता सिद्धान्त (८7८0 गैटेटड्घाट55 +2382 तथा “पण्मणणत सामाजीकरण सिद्धान्त” के अर्थों से भी स्पष्ट किया जा सकता है। बाद के स्िद्धात (समाजीकरण)का सन्दर्भ स्त्रियों के इस परम्परागत मूल्यों के अनुसरण करने तथा सामाजीकरण की प्रक्रिया से या यौन भूमिका आदर्श (६८६० 30८००९४) को मजने से है कि पुरष स्त्री से श्रेष्ठ होता है और उसे पुरुष का विशेध करने का कोई अधिकार नहीं है। भ्रम सिद्धान्त के अनुसार स्त्रियों के जीवन में कुछ घटनाएँ ठो नियमित रूप से ही होती हैं जिनके कारण वे निरुत्साह/अवपात ग्लानि (6८97७5७०४) की भावनाएं, विवशता/लाचार (#८9।९५४०८४७७) का घाव, और कमजोर आत्मछवि (00 इ्यनिए॥8०) का विचार अर्जित कर लेती हैं और यह विश्वास कर लेगी हैं कि वे पुरुष के दुर्व्यवहार से बच नहीं सकती। इस प्रकार के समष्टिवादी (पक) उपागम का प्रयोग करते हुए मैने एक नया सैद्धान्तिक प्रारूप प्रस्तुत किया ई (देखें आहूजा, 'सोशोलोजिकल क्रिमोग्रोलोज , 99 . 95 - 95) ताकि छियों के प्रति हिंसा या छ्रियों के शोषण को समझा जा सके | मेय प्राय शोषित सखी के व्यक्तित्व के गुणों तथा उन सामाजिक परिस्थितियों में जिनमें वह रहतो है और काम कस्ती है के बीच सहलग्नता (॥०/०६०) पर के्दित हैं। यह प्रारूप मानदा है कि महिला का शोषण (बलात्कार, छेडछाड, मारपीट, दहेज उत्पीड़न, वेश्या बनाने के लिए अपरहण, आदि) सी के व्यक्तित्व (उसकी सहनशीलता व भौरुता की भावना) और उसकी परिस्थितियों के बीच अन्तक्रिया का प्रतिफल है। प्रत्येक ख्रौ विभिन्‍न विचाएें व आवीक्षओं से युक्त व्यकिनियों के पर्यावरण में रहती है। किसी भी स्त्री के स्वय के शोषण के साम्बनद में विचार इस बात पर निर्भर करेंगे कि उसकी स्वय को साहसपूर्ण इच्छा क्या है कया चुनौतियों का सामना करने में वह कितना प्रयास करती है। दूसरे शब्दों में किसो छो वी शोषण पाँच बातों पर निर्भर करता है. () सामाजिक पृष्ठभूमि (इसमें उसकी आयु, शिक्षा व प्रशिक्षण शामिल है), (0) समर्थन का स्तर (जो उसके माता पिता, ससुराल पश्च, सहेलियों और अन्य लोगों पर निर्भर करवा है) (50) दूसरों की अपेक्षाए (उसके पति, सास खसुए, बचे रिश्तेदार, कार्य सहयोगी, आदि सहित) (५) आर्थिक आधार (कि वह निम्न, मध्यम, या उसे आय वर्ग से है) और (५) उसवी स्व छवि (बह स्वय को दयालु, असहाय, कमजोर, साहर्ति और बलवान समझतो है)। मेरी परिकल्पना यह है कि व्यक्ति वी सरचनात्मक दशाएँ (परिवार सकट, शरनी सम्बन्धी कुण्छाएँ, अनुपयुक्त पालन पोषण, और जवन में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ) चिला और तनाव उत्प करती हैं जिनके कारण समायोजन में असफल रहता है तथा जो अन्य सर मे लगाव को भी प्रभावित करती है और वह कर्तव्यों और भूमिकाओं के निर्वाह में अकरत परिका; विवाह और ग्तेदारी व रहता है। परिणामस्वरूप उपजी कुण्ठाएँ दूसरों के प्रति (कमजोर लिंग और सिर्मों सहितो उसकी अभिवृत्ति निर्धारिद कोंगी। उसके व्यक्तिक्त के गुणों और पीड़िता की निरेधक शक्ति पर निर्भर करते हुए, व्यक्ति स्री के प्रति हिंसा का प्रयोग करेगा। इस प्रकार मेरा सिद्धान्त एक सयोगी दृष्टिकोण पर आधारित है जो सामाजिक कारकों को भी ध्यान में रखता है, जैसे पतिवार भें बाहर और भीतर से तनावपूर्ण स्थितियों, शोषित महिलाओं और अपराधियों के व्यक्तित्व के गुण, और सास्कृतिक वातावरण, जैसे मानदण्डीय दबाव और अनिर्चिताएँ। मुकेश आहूजा के अनुभवाश्रिव अष्ययन (#70/5, 990 437-38) के अनुसार हिंसा व 20% की शिकार ल्ियों के विषय में निम्नलिखित प्रमुख समाजशास््रीय तथ्य बताए जा सकते हैं : ... समस्याओं के स्रोत के रूप में सरचत/-सखियों की समस्याएँ जो हिंसा की शिकार होती हैं, सामाजिक सरचनाओं को प्रणाली से उपजती हैं जिनमें वे खत्रियाँ रहती हैं और काम करी हैं तथा पारिवारिक अन्तक्रिया के कारण उपजे तनाव और समर्थन व्यवस्था से उपजती हैं। 2... अधिकार आमहिता (8508०४) प्रसम्प्याएँ-हिंसा की शिकार होने के बाद शोषित खत्रियों को सामाजिक भूमिकाएँ तथा सम्बन्ध उनके अपने आत्मविश्वास और स्व-प्रेएणा पर कम और परिवार के मुखिया को इच्छा दथा सामाजिक दबावों पर अधिक निर्भर करती है, अर्थात्‌ पारम्परिक संस्कृति पोडिता को घर से बाहर अधिकाए आग्रहित सामाजिक कार्यों में भाग लेने को ह॒रोत्साहित करती है । 3... ससापत्र बचना एवं स्व-पीडा-च्च शिक्षा एव नौकरी जैसे ससाथन पीडिता स्री को स्व-छव को बढ़ा देते है जो दूसरों के साथ उसके सम्बन्धों को काफी बदल देते हैं ताकि वह परिवार व समाज दोनों में पुन्॒थापित बह समायोजित हो सके। 4... लगाव (4/॥४८४४९४/) - अधिकाश पीडित खिियाँ अपने एकाकीपन तथा निन्‍्दा की भावना को अपने को किमी वस्तु (जैसे व्यक्ति, समाज सेवा, घार्मिक कार्य, आदि) से लगाव द्वाद दूर कर लेती हैं। $ मरबनात्यक घुटन (प//0८४४०४)- वे कारक जो पीडित महिला को उसके जीवन के पुनर्नवीकरण (धया८श्या/), पुनर्विचाएं7८०८६७४४४), पुनश्नाप्ति (65077), पुरर्जविन (०भेष्ण?), वे पुनरफूर्ति (०भ//5»४०४) देने से रोकते हैं, वे उनके व्यक्तित्व में नही बल्कि सामाजिक मरचना में अधिक निहित होते हैं) 6. कि्रेह पर अकुश-ुछ युवा व स्वच्छन्द अ्रवृति की पीडित सतरियों की यह गुप्त इच्छा रहती है कि वे समायोजन के आधुनिक तरीके अपनाकर विद्रोह करें, लेकिन वे इसमें अपने पति, ससुगगल वालों, माता पिता, आदि के साथ सम्बन्ध टूटने तथा उनके द्वाप निन्दित किए जाने व अकेला छोड दिए जाने के भय से ऐसा नहों करती । 7... स्व मूल्याकव स्थिति-द्रवित भावनाओं वाली पीडित ख्िया दब कर जीवित रहती हैं लेकिन शक्तिशाली, सवेत, व चंसिवान छिया अपनी कार्य व्यस्तता से जीवन में अपना रास्ता स्वय बना लेती हैं। 338 परिवार, विवाह और नातेदागे 'निर्वैविक्तिकरण आधात तथा मानवीय दृष्टिकोण (९ ऐशुश5णाभीर३00व प्री4ए॥3 शाते प्रषण्याग्रांषआंट ॥एग्राण्य्या) महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि र्ियों को इस प्रकार अभिशप्त होने से कैसे बचाया जाये ? अथम, हम उस प्रकरण को लेते हैं जो पहले से हो अनेक महिला संगठनों तथा सरकार और निजी/सार्वजनिक सस्थाओं का घ्यान आकर्षित कर रहा है। इससे सरक्षण, समर्थन तथा पीडिदाओं को सलाह की आवश्कयताए पूर्ण होंगी। सबसे अधिक द प्रथम सभी खियों को शरण की आवश्यकता होती है। प्रभुत्वशील ससुप्ल वालों और शराबी पति के साथ रहने बाली खत्रिया अपने घरों को स्थाई या अस्थाई रूप से छोड देंगी यदि उन्हें शरण उपलब्ध हो जाये। ऐसी स्त्रियों कौ शरण प्रदान करने वाले स्वैच्छिक संगठनों को अपनी योजना वो सार्वजनिक करना होगा। यह भी ध्यान में रखना है कि वर्तमान में मौजूद महिला गृह भी अविवाहित/विवाहित त्नियों के लिए--आवश्यकतापूर्ण नही करते हैं। उनमें अक्सर अधिक भीड, वित्तीय समर्थन को कमो है और सुरक्षा नियमों के पालन में वे असफल हैं! थोडे समय के लिए स्त्रियों को आवास प्रदान करना, विशेष रूप से विवाहित ज्तियों को, जो कष्ट में हैं या हिंसा की शिकार हो चुकी हैं, जैसे बलात्कार, अपहरण, हत्या के प्रयास और उन्हें महिला सगठतनों द्वारा स्थाई स्थान दिलाने की सहायता, अनेक ख्तियों द्वारा भोगे गए कष्टों से छुटकारा दिलाने में योगदान करेगा। इस बात की शीघ्र आवश्यकता है कि विभिन प्रकार के थोड़े समय के अवसरों की तुलना की जाये और मूल्याकन किया जाये जो पीडित खियों तथा विधवाओं को प्रदान किया जाये। द्वितीय, रोजगार दूढने और बाल सुरक्षा सुविधाएं प्रदान करने में सहायता वा तुस्त दित्तीय सहयोग भी पीडित स््ियों की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए केन्द्रीय स्थानों पर सलाह केद्नों की स्थापना की जा सकती है जो महिला गूहों से दूर हो ताकि उन गृहों की निवासी स्लियों की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किए बिना अच्छी प्रकार उनका प्रचार किया जा सके। तृतीय, सस्ते और कम औपचारिक न्यायालयों की स्थापना भी उन स्तियों की मदद का एक कदम हो सकता है जो शोषण का शिकार हो चुकी हैं। यह सुझाव नहीं दिया जा रहां है कि यह न्यायालय केवल ब्लियों के मामलों में हो सुनवाई करेंगे। वर्तमान में हमारे यहा देश के कुछ राज्यों में परिवार न्यायालयों कौ व्यवस्था है। लेकिन यह न्यायालय मुख्य रूप से विच्छेद ग़ेकने से हो सम्बन्धित हैं। इन न्यायालयों के क्षेत्र को विस्तृत किया जा सकता है ताकि खतियों को सभी प्रकार की घरेलू और गैर घरेलू समस्याओं का निदान करें। सियों के मामलों में रुचि रखने वाले और ह्ञान रखने के कारण चुने हुए वकीलों, मेजिस्ट्रेयें और न्यायाधीशों सहित न्यायालयों की स्थापना एक सुधार का कदम होगा और इससे कानूरो पे में प्रवेश करने वाली महिलाओं की सख्या में वृद्धि होगी। अनेक स्त्रियों के लिए न्यायालय तथा काबूत कम डरावगा और अधिक सहामुभूतिपूर्ण तथा पहुच वाला होगा, यदि पुरुषों वा अधिपत्य उन पर कम है। महिला वकौल और न्यायाधीश कानूनों को अपनी व्याख्या और अपने सहयोगियों से भले ही भिनता न रखती हों लेकिन ख्रो पीडिताएं निश्चय हो परिवार, विवाह और नावेदारी 439 उनके सामने जाने में प्रसल होंगी, इस उम्मीद से कि उनकी सम्रस्‍्याओं को अच्छी तरह समझा जा सकेगा। हैं चहुर्य, ऐसे स्वैच्छिक संगठनों को मजबूत करा और उनकी संख्या बढाना भी आवश्यक है जो स्त्रियों को समस्याओं को उनके ससुराल वालों के साथ, या न्यायालयों में, या पुलिस के साथ या सम्बन्धित व्यक्तियों के साथ उठा सकें। ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि अकेली महिला कौ आवाज में कोई दम नहीं होता। वास्तव में यदि यह अपने अधिकागं की माग करने लगे या वह क्रान्तिकारी विचार रखती है या अपने विवार व्यक्त कराती है या कुण्ठा उत्सर्जन करती है तो उसे 'मुंहफट' (00७७०/८७) कहा जाता है। लेकिन यदि जियों का समूह मिल जाये और रिशयों के कष्टों के खिलाफ आवाज उठाए वो थे अपने विचारों को समझा सकती हैं और प्रभाव डाल सकती हैं। प्रांचवे, उन संगठनों का प्रवार किया जाना है जो रियों को निशुल्क कानूनी सहायता पहुचावे हैं ताकि स्लियां आदश्यकता पडने पर उनके पास जाकर सहायता प्राप्त कर सकें। अन्तिम, सियों के मामलों में उनके माता-पिता के दृष्टिकोण में परिवर्तन भी आवश्यक है। माता-पिता अपनी बेटियों--विवाहित या विधवा--को, जिन्हें अक्सर पौा जाता हैं या 4 किया जाता है, उनके पति के घर उनको इच्छा के विरुद्ध क्यों रहने को बाध्य करते ? जब माता-पिता को अपनी बेटियों की यातनाओं का पदा लगता है दब वे थोड़े समय के लिए उन्हें अपने पास ररने की अनुमति क्‍यों नहीं देते जब तक कि वे स्वथ इसका विरोध करने योग्य न हो जाँय्रे ? वे सामाजिक कलक के विषय में क्‍यों चिन्तित रहते हैं और अपने परिवार के लिए बेटी को क्‍यों बलि चढा देते हैं ? सिया अत्याचार के सामने क्यों दुकती हैं ? वे यह क्‍यों नहो महसूस करती कि उनमें अपनी और बच्चों की देखभाल करने की क्षमता है ? वे क्‍यों नही समझती कि उन को सदाए जाने से उन्हें भावनात्मक आधात लगगा है जो उनके बच्चों को भी प्रभावित करता है ? जियो को दृढ़ होना सौखना है और अपने लिए नयी भूमिकाओं को स्वीकार करना है। उन्हें डोवन के भ्रत्ि आशावादी दृष्टिकोण विकस्चित करा है। आरक्षण नीति (8९ ॥९5९४एशा०्क ए०0) हियों को विशेष छूट एवं विशेषाधिकार दिए जाने को मार्गें अधिकार के मामले हैं, न कि दान या मानव उपकार के। जब पवचायतों में रिरयों के लिए आरक्षण की घोषणा की गई थी, इुछ लोगों ने इप़का समर्थन किया और कुछ ने कहा था कि इस्रसे कलक (त्माडाया0्णो की भावना पैदा होगी। पचायत स्तर पर सविधान में (3 वा) सशोधन कर के ज्लियों के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित कर दिए गये थे। बाद में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कोरे में से इन लियों के लिए एक तिहाई स्थानों को सुरक्षित करने की पृथक घाण इसमें जोड़ दो गई थो। इसका अर्थ है कि मान लिया जाये कि एक स्थानीय निकाय में 00 स्थान हैं, उसमें से 23 स्थान दलित और जनजातियों के लिए आरक्षित कर दिए गए, तब इन 23 स्थानों में से 7 या 8 स्थान दलित और जनजातीय छियों के लिए आरक्षित रखे जायेंगे! झ्लियों के लिए आरक्षित 33 स्थानों में से हो 7 या 8 दलिव/जनजातोय छिलयों के स्थानों का समायोजन वदा परिवाद, विवाह और गतेदारी भी इन्ही में होगा ताकि स्त्रियों के लिए आरक्षित सामान्य श्रेणी के स्थान 33 से 26 रह जायेंगे। उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने पचायत स्तर पर पिछड़ी जाति को (050) ब्लियों के लिए भी स्थान आरक्षित कर दिए हैं। इसका अर्थ यह हि कि 33 आरक्षित स्थानों में से 7 दलित/जनजाति के लिए, 9 पिछडी जातियों के लिए ओर केवल 7 सामान्य श्रेणी को ञ्लियों के लिए होंगे। दिसम्बर, 998 में लोक सपा में ज्लियों के लिए 33 प्रतिशव स्थान आरक्षण से सम्बन्धित विधेयक के प्रस्तुत किए जाने से पूर्व यह दोन अन्य अवसरों पर भी प्रस्तुत किये जाने से रोका गया था , एक 996 में प्रधान मत्री देवगौडा के समय में, दूसय 997 में प्रधान मंत्री गुजगल के कार्यकाल में और एक 998 में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में। एक स्तर पर तो (इन्द्र कुमार गुजग़ल के कार्यकाल में) यह विधेयक गौठा मुखर्जी समिति को सौंपा गया था जिसने नवम्बर 996 में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में ्लियों के लिए एक तिहाई आरक्षण की सिफारिश को थी। महिला विधेयक जो अब नवम्बर 2000 मे ससद में विचार के लिए रखा जाने वाला है उसमें आरवधात है कि (३) विधायिकाओं में द्वियों के लिए 33% स्थान होंगे, (७) जाति के आधार पर आरक्षण का सुझाव इसमें नहीं होगा (अ्थीत यह दलिव/जनजाति/पिछडी जि की ढियों के लिए आरक्षण को अनुमति नहीं देगा), (८) इसमें चक्रोय व्यवस्था का सुझव है। आज जिस प्रश्न पर चर्चा की जानी है वह है कि कया स्त्रियों के लिए आरक्षण या सरक्षण नीति सियों को न्याय एवं समान अवसर निश्चित करने के लिए वर्कसगव और लाभकारी है ? विधेयक के पक्ष में तर्क यह हैं कि राजनौति में ख्रियों का प्रतिनिषित् ढिें की शक्ति बढाने में एक कदम होगा। लगभंग एक वर्ष पूर्व एक प्रशुख गाषट्रीय दैनिक ने एक शहरी मतदाताओं की राय प्रकाशित की थी जो दर्शाती थी कि महिला विधेयक के पथ में व्यापक समर्थन था। लेकिन बाद में विधेयक के विरुद्ध 0 अनुपात में कई लेख भी प्रकाशित हुए। ये लेख तब प्रकाशित होने शुरू हुए जब ससद के एक पिछड़ी जाति के सदस्य (एक ग़जनैतिक दल के अध्यक्ष) ने लोक सभा में बडे ही खग़ब तरीके से महिता संगठन की सदस्याओं के लिए 'परकटी' कहकर बयान दिया। महिला विधेयक के विरुद्ध अनेक तर्क दिए जाते हैं। पहला वर्क यह है कि राजनैकित दल केवल अपने मतदाताओं को सन करने और उनका वोट हार्सिल करने के लिए महि विधेयक का पश्च ले रहे हैं। महिलाओं का शक्तिशाली होने में उनकी गैर-गम्भौखा गो तथ्य से मिलती है कि उनके सगठनों के भीतर हो उन्होंने कोटा व्यवस्था लागू नही वी है (केबल कांग्रेस पार्टी को छोडकर, जिसने दिसम्बर 998 में ही ख्त्ियों के लिए 33 अतिर महिला आरक्षण लागू किया)। यहा ठक कि भाजपा (जो अगस्त 2000 नें भी सदमे विधेयक प्रस्तुत करने में असफल रही) ने भी 7995 दिसम्बर में लडे गए आम चुनाव में 47 स्थानों में से केवल 23 हो ख्तरियों को दिए, जिनमें से 73 लिया चुनी गई। भी कार्यकारिणों समिति में भी 75 सदस्यों में से रिया केवल आठ ही हैं। इसकी 650 सदा चाली राष्ट्रीय समिति में केवल 50 महिलाए हैं। काम्रेस की कार्यकारी समिति में 20 7 केवल 3 महिलाए हैं। कम्युनिस्ट पार्टी में 50 सदस्यों वाली राष्ट्रीय समिति में 2 महिला परिवार, विवाह और नावेदारी वा और 2। सदस्यों वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणों में 3 महिला सदस्य हें। टूपय तर्क है कि आरक्षण से अधिक उपलब्धि नहीं हो सकती। वास्तव में, यह विपरीत दिद्ञा में उत्पादक हो सकदी है। अच्छा तो यह है कि आरक्षण एक “दर्द निवारक' (/०॥०६७) है और कोई भी निर्णयात्मक परिवर्तन नहीं हो सकता जब दक कि इस प्रकार के उपायों के साथ सावनात्मक पतिवर्तन राष्ट्रीय उत्पादन सम्बन्ध के साथ न जुड़े हों। तौसश तर्क है कि हमारा देश पहले हो कई समूहों में विभाजित है। महिला आरक्षण जनसख्या को और भी विभाजित कर देगा। पिछडी जातियों और जनजातियों के लिए आश्क्षण सामाजिक दशाओं के अन्तर्गत केवल 5 वर्षों के लिए स्वोकार किए गए थे और तब से ग़जनैतिक वोट प्राप्ति के लिए अपने स्वार्थों वश इसे बढ़ाया जा रहा है। चौथा तर्क है कि यह ससद कौ कार्यवाही और दक्षद्वा को प्रभाविढ़ करेगा क्योंकि आज भी संसद की सप्नी महिला सदस्य सक्रिय नही हैं। महिला सासदों के ऐसे उदाहरण हैं जो पाँच वर्ष के कार्यकाल में एक बार भी नहीं बोली या केवल एक या दो बार ही बोली हों। यदि इस प्रकार की महिलाएँ बडी सख्या में ससद में आ जायें वो चर्चाओं का स्तर और उनकी गुणवत्ता कया होगी ? पंचायतों में भो बडी सख्या में महिला सरपच ऐसी हैं जहाँ निर्णय उनके पतियों द्वाश किए जाते हैं या उनके ही परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों द्वाग। अत. सम्तद में महिलाओं से क्या अपेक्षा को जा सकती है ? पाँचवों दर्क है कि जिस प्रकार आरक्षण नीति के कारण दलित, जनजातीय व पिछड़ी जातियों के अधिकारी उच्च प्रशासनिक पदों पर जाति और पर्म के आधार पर काम कर रहे है,सम्तद में भी महिला सासद केवल महिला समस्याओं में ही रुवि लेंगी। हमें ऐसे विधायक चाहिए जो राष्ट्रीय व अन्वर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय भागीदारी कों जिसके लिए वृहद्‌ ज्ञान और परिपक्व की पूर्व पृष्ठभूमि को आवश्यकता होती है। छठा तर्क है कि गत पाँच दशकों में हमाग अनुभव रहा है कि आरक्षण नीति ने अपेक्षित परिणाम नहीं दिए हैं। आदक्षित स्थानों पर चुने गए अत्याशी अपने चुनाव क्षेत्रों के लोगों के कष्ठों और आवश्कताओं को ठीक से प्रस्तुत भी नही कर पाए हैं। अन्तिम तर्क है कि आरक्षण तनावों और सघ्षों को जन्म देगा। महिला विधेयक का विरोध करने वाले कुछ नेताओं और राजनैतिक दलों की प्रमुख माँग यह है कि स्त्रियों के कोटे में ही सन्निहित पिछडी जातियों और अल्प सख्यक खतरों का कोट हो, अर्थात वे लिंग आधारित आरक्षण के साथ जाति आधारित आरक्षण भी चाहते हैं। अश्वर्य तो यह है कि इन नेताओं और दलों ने ससद में पुरुष ओबी सी आरक्षण नहीं मांगा क्योंकि वे जानते हैं कि यदि ऐसा हुआ दो ससद में ओबीसी सासदों की सख्या कम हो जायेगी, जिसका अर्थ होगा वर्तमान में 'महुजन समाज' की तुलना में शक्ति की कमी | इस प्रकार वे सदस्य जो महिला विधेयक में सुधार के पक्षधर हैं, न केवल लिंग भेदभाव में बल्कि जाति भेदभाव में भी रुचि लेते है। मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को मांग धर्म के आधार पर भेदभाव बढाने में और योगदान करेगी। क्‍या ये सभी भेदभाव (लिंग, जाति और धर्म) देश के पर्म निसपेक्ष स्वरूप को सुरक्षित रख सकेंगे २ जाति और पर्म के नाम पर र्यों का वर्गकरण समाज में उनको ओर पृथक करेगा 442 परिवाद विवाह और नावेदारी क्योंकि मुसलमान और ओवीसी महिला प्रतिनिधियों को सामान्य समस्या से कुछ लेना देगा नही होगा। वे भारत में महिलाओं को नेता होने की बजाय एक पन्थ की नेता होंगी। प्रमुख राजनैतिक दल 'कोटे के अन्दर कोटे' को अस्पष्ट रूप से देख रहे हैं क्योंकि वे केवल चुनावी फायदे पर हो केन्द्रित रहते हैं। वे इस बाव में कम से कम रुचि रखते हैं कि राजनीतिक प्रतियोगिताओं के जातीयकरण का सस्थात्मकौकरण हो जाये | वे तो केवल अपनी पुत्रियों, पलियों, और बहिनों को ससद में पहुँचाने का अवसर चाहे हैं। वर्तमान और अं के अनुभवों को भुलाया नहीं जा सकता है। दो राज्यों के दो पूर्व मुख्य मत्रियों ने अपनी पलियों को ही चुनाव लड़ने के लिए नामाकित करा दिया और उनमें से एक अपने पति के स्थान पर मुख्य मद्री बन भी गई और अभी भी (अक्टूबर, 2000 में) हैं। एक राज्य में एक काग्रेसी सासद को अपनी लोक सभा सीट छोडनी पडी और अपनी पली को उसी चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए नामाकित कराना पडा। श्वालियर के एक पसिद्ध परिवार में एक समय माँ, बेटा और बेटी कई वर्षों से लोकसभा सीटों पर काबिज थे। नवम्बर 999 में वन गज्यों में हुए विधान सभा चुनाव में अनेक सासदों ने अपनी पत्नियों और अन्य परिवार जनों को चुनाव लडाने के लिए नामाकित कराने के लिए बहुत जोड-दोड किए। तथाकपित “बशगत ग़जनीति” की अवधारणा के विरोधी स्वय परिवार प्रवन्धित राजनीति चला रहे हैं। फरवरी 2000 में भारत में चुनाव आयोग ने यह सुझाव दिया था कि अल्ेक गाजनैतिक दल महिलाओं को चुनावों में एक निश्चित प्रतिशत में खडी करें। इस पर आयोग नें अप्रैल 2000 में विभिन्‍न दलों की एक बैठक भी बुलायी थी परन्तु इस बैठक में सभी दरों मे इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। यह शायद इस कारण था कि उन्हें इम बात वा विश्वास नही था कि उनकी अधिसख्य महिला उम्मीदवार पुरुष प्रत्याशियों के सामने चुनाव जौत जायेंगी। अत वे अधिक महिलाओं को खड़ा करके खतरा' मोल लेना नहीं चाहदे। लोकसभा चुनाव के लिए महिला उम्मीदवारों कौ कुल सख्या पुरुषों को तुलना में बहुत कम रही है। 980 से पहले लोकसभा चुनावों में सारे देश में 400 महिलाएं भी उम्मीदवार नहीं थी। 980 में 42 ४,478 पुरुषों को तुलना में) और 996 में 599 (5,353 पुरुषों वी तुलना में) महिलाएं उम्मीदवार थी। लोकसभा के पिछले 3 चुनावों से पदा चलता है कि 543 सदस्यों के सदन में ज्यादा से ज्यादा (49) महिलाएँ 4999 में जीत कर आयी थी। पैसे विजयी महिलाओं की कुल औसत सख्या मात्र 33 रही है जो सदन की कुल सख्या वी केवल 6 प्रतिशत ही है। यह सख्या 952 में 22, 97 में 22, 97 में 9, 980 26, 984 में 44, 7989 में 27 व 999 में 49 थी । क्‍या इस सख्या को बढ़ाने का तरीकी आरक्षण ही है ? यदि हा तो जरूरी है कि आरक्षण विधेयक में कुछ परिवर्तन कर के उते पास कर दिया जाये। लोकतत्र की सस्था से एक नये भारत के निर्माण की अपेक्षा थी, लेकिन क्या वाच्छि परिणाम मिले ? इसकी असफ़लताओं के लिये संस्था स्वय को दोष नही दिया जाता चाँल बल्कि इस के काम करने का तरीका, जो सत्ताधिकारियों ने विकृत कर दिया है, को ठहराया जाना चाहिए। मध्यम वर्गोय और उच्च जातीय लोगों के स्वार्थी हिों के कारण हो हमारे देश में दोहरे विकास का स्वरूप बन गया है जिसमें सत्ता तक पहुंच बे फलफूल रहे हैं और त्रिम्न स्तर पर जनसख्या (सामाजिक व आर्थिक रूप से) को विकास के परिवार, विवाह और बतेदारी 743 सभी लाभों से वचित रखा जाता है। क्या महिलाओं के सीटों का आरक्षण और सप्तद में अधिक स्या में उनके प्रवेश से इन लोगों का असन्तोष दूर होगा और देश के गरीबों, अशिष्षितों और पिछड़े समुदायों को आशा प्रदान कोगा ? नुकसान में रहे हुए लोगों को सरक्षण और उठने के अवसर चाहिए लेकिन अवसर सामूहिक रूप से हमेशा के लिए विस्तृत नहीं किए जा सकते। प्रासम्म में अपनायी गयी योजनाओं पर निगाह रखने के लिए एक सतर्वाता दल का गठन किया जाये और जैसे ही यह पढ़ा लगे कि उन्हें आरक्षण को वैशाखो को अब आवश्यकता नहीं है, योजनाओं को वाप्ष ले लिया जाना घाहिए। महिला विधेयक ने भारतीय राजनीति और समाज में भावी दिशा के विषय में बहस शुरू कर दी है। कार्यकर्ताओं को विशुद्ध सीमित दृष्टिकोण से ही विधायिकाओं में स्थानों के आएश्ण के मापले को देखस चाहिए 2 ऐसा मालूम पडता है कि सना के गलियाएं में प्रदेश का लक्य प्रमुख होता जा रहा है। महिला मुक्ति जैसे सामाजिक महत्व के प्रकरणों को प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा छोड़ा जा रहा है। महिलाओं का शक्ति पाना स्वय नहीं होगा मदि पहले वो उन्हें लिंग के आधार पर और फिर धर्म और जाति के आधार पर पृथक कर दिया जाये। एक सुझाव यह है कि हमादा उद्देश्य महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थानों का आरक्षण नहीं होना चाहिए बल्कि राजनीति में उनकी भागोदारी सुनिश्चित करना होना चाहिए। आरक्षण नीति के विरुद्ध सैद्धान्तिक तर्क कुछ भी हों, लेकिन व्यवहार में सभी प्रजनैतिक दल इसका समर्थन करते रहेंगे वर्योकि इस प्रकरण से वे ़जनैतिक लाभ लेते छेंगे। इसलिए लोगों को आरक्षण का मुद्दा उठाने के बजाय गजनैतिक दलों और नेताओं के निहित स्वार्थों बनाम समाज में आम लोगों के तर्क पूर्ण हितों के प्रकरण को उठाना चाहिए। दूसरे, गुणवत्ता और कुशलता के मामले में कोई समझोठा नही होना चाहिए। योग्यवा की शर्तें ऐसो हो ताकि महिलाएं न केवल प्रस्थिति आप्त करने के लिए राजनीति में हिस्सेदार हों बल्कि समुदार की सेवा के लिए भो हों। 5 आर्थिक अर्थव्यवस्था (#९णाण्रांट 59507) भारतीय अर्थव्यवस्था, निर्धनता एवं मुद्रास्फीति (तंग िट्णाण्पाड़ ?०सॉए बगऐ जीआाणओ) अर्थव्यवस्था (20007) सन्‌ 999 में कारगिल युद्ध, उडीसा के तूफान से तबाही, अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पैट्रोलियम पदार्थों के बढ़ते मूल्य और सन्‌ 2000-20) के बजट में रक्षा के क्षेत्र में ।3 हजार करोड हुपये की वृद्धि, ब्याज दायिता में वृद्धि, सब्सिडी पर व्यय, आदि ने हमारी अर्थव्यवस्था पर काफी प्रभाव डाला है। अर्थव्यवस्था में निर्धनता और मुद्रास्फीति के प्रश्न भमुख महत्त्व के हैं। सन्‌ 4993-94 में कुल जनसख्या का 37 8 प्रतिशत या 32 03 करोड व्यक्ति 8727% ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 32 36% नगगय क्षेत्रों में) गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रहे ये (#क्ककृा/ल/ सर्द ॥द्ाव, 998 343)। 970 और 980 की दशाब्दियों में ग्रामीण निर्धनवा में तो्र कमी आयी थी। निर्धनता का प्रतिशत 973-74 में कुल ग्रामीण जनसख्या का 55 प्रतिशत से कम हो कर 4987-88 में 3909 तथा 989-90 में 34 प्रतिशत ही रह गया था। प्तु 990 की दशाब्दि में यह प्रतिशत कम होने की बजाय बढ गया। एनएस एस(४ $ $) के आवडों के अनुसार,998 में यह 42 प्रतिशत था (७982, !धगरल। 7, 2000 . 09) | यह वृद्धि (0) खाद्य कौ बढती हुई कोमत के कारण, (0) गावों में गेजगार के अवसर पैदा कले वी सभावनाएँ कम होने के कारण और (0) गावों में गैर कृषि आय का हिस्सा घटने के करण बताई जाती है। आज देश के 5 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं, सरकार द्वारा अर्मित प्रत्येक रुपये में से कपैब एक चौथाई भाग उपघार के ब्याज उताले में जा रहा है। 998-99 में यह रुपये का 24 प्रतिशत और 999-2000 में 27 प्रतिशत था (7%6 मबक्रादा वीक चिंगरी 2, 2000) । सकल घोलू उत्पाद (जीड़ी पी) का 7! प्रविशह केद्रीय व राज्य सरकारों दाग गैर योग्यता सब्सिडी पर (जैसे, जल आपूर्ति, उच्च शिक्षा, सिचाई, विद्युत, पैट्रोल, मिट्टी की तेल, आदि पर) खर्च किया जा रहा है। यह तथ्य देश में निर्धनता, आय, और समत्ति की दुखद स्थिति दर्शाते हैं। राष्ट्रीय धन और आय का कितना भाग गरीबी तथा बेरोजगारों दूँर करने के कार्यक्रमों पर खर्च किया जाये, इस विषय पर काफी चर्चा होती है। आर्थिक विकास की दर में केसे वृद्धि की जाये ? आधिक विषमताए किस प्रकार दूर की जायें ? सेवाओं और कल्याण योजनाओं पर कितना खर्च किया जाये ? कल्याण कार्यक्रमों की क्या आर्थिक अर्थव्यक्‍स्था बक5 भूमिका है 2? क्या यह गशेबों को न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करने वाला हो या फिर सभी के लिए गहन सुरक्षा व्यवस्था क्ते वाला ? क्‍या हमारे देश में सामाजिक विषमताएँ (फ८पृ७॥पधं८घ) आधिक विषमताओं का परिणाम हैं या आय विवाण में विभेदीकरण का ? इस अध्याय में हम इन्ही प्रश्नों में से कुछ का विश्लेषण करेंगे | निर्धनता (00थ ५) 'नर्धनता' और 'अस्मानता' एक से नहीं हैं। वह व्यक्ति जिसकी वार्षिक आय 5,000 रुपये है और ठसे एक पति और एक बच्चे का भएण पोषण करना हे, इतना निर्धन नही जितना कि वह व्यक्ति जिम्नकी वार्षिक आय 25,000 झुपये है और उसे पली और पाच-छ बच्चों के बड़े परिवार का भरण पोषण करना है। “आय” और 'घन' (%८३॥७७) भी दो अलग शब्द हैं। आय का अर्थ आर्थिक ससाधनों (/९5०००८८७ के प्रवाह (09) से है जबकि घन का अर्थे आर्थिक ससाधनें के कुल सचय (50००0 से है। वेतन, मजदूरी, किराया, ब्याज, पेन्शन, स्व रोजगार से आय और शेयर कम्पनियों मे प्राप्त लाभाश को 'आय' माना जाता है, जबकि अचल सम्पत्ति, स्वर्ण और बॉण्ड 'धन' कहलाता है। असमानता और निर्धनता को समझने के हू. निर्धनता, आय, धन और असमानवा जैसी अवधार्णाओं पर विचार करना आवश्यक । निर्ययता की अवधारणा (00पशक४ ण॑ ९०४४०) निर्षनता क्या है ? निर्धनता को या तो “निरक्षेप' (४0500) या 'सपेक्ष' (८४४४०) रूप में परिभाषित किया जा सकता है। “अस्तित्व (८४४!८४००) की मूल आवश्यकताओं में “अपर्वाप्तता' (॥0॥त८॥०) निप्पेश्ष निर्धनता है। व्यावहारिक रूप में इसका अर्थ आमतौर पर 'पर्याप्त भोजन, कपडाव़ मकान का अभाव' होता है। 'गऐैबी को ऐसा' की अवधारणा निर्धनता को निर्वाह (गुजाण) (६०७४७(८००८) के सर्प में समझती है, जिस का अर्थ है 'शारोरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए न्यूनदम आवश्यकता'। बर्सटीत हैनरी (छदशलंप्र ९०), 992) ने निर्षनता के चार आयाम (0:9८४5075) बताए हैं. () जोवनयापन के साथनों की कमी (2) सम्माधर्नों (घन, भूमि, ऋण) ठक पहुँचने को अक्षमता (737९८४४७॥॥७), 8) अमुरक्षा कौ भावना और कुण्ठाएं (4) ससाधनों की कमी के कारण दूसरों से सामाजिक सम्बन्धों को विकसित करने एवं बनाए रखने की अयोग्यता। निर्धनता को परिभाषित करने के लिए तीन सूत्र बहुधा प्रयोग किए जाते हैं. ()) जोवित रहने के लिए व्यक्ति को धनराशि को आवश्यकता, (2) प्रदत् (क्षएआ) समय और प्पान में प्रचलित “न्यूयदम जीविका स्तए (क्राणणशाणा। इशफेस्े्रटा०८ ॥८ए९) और एन-सहन के स्तर (कक ४४०00) से नीचे का जीवन, 8) समाज में बड़ो सख्या के लोगों के वचित व अभावग्रस्त (८90४८०) और निणश्रय (0८७/४!०) लोगों की और कुछ लोगों के समृद्ध जोबन स्थिति (9८ ए ऊ्रष्या-एल्ंगए) को तुलना। अन्तिम घारणा झररेशता और अप्तामानता के संदर्भ में निर्धनदा को स्पष्ट करी है। उहा प्रथम दो घापयाए निपेक्ष निर्धरता को आर्थिक अवधाएया के सद्दर्भ में हैं, वहीं ठौसरी घारणा इसवो सामाजिक अर्धापपा के रुप में अर्थात्‌ नीचे के स्वर के (800०७) लोगों द्वार कुल राष्ट्रीय आय से प46 आर्थिक अर्धव्वत्ता ब्राप्त भाग के अर्थ में देखती है। हम तीनों घाएणाओं को अलग-अलग समझने का प्रया् करेंगे। पहले दृष्टिकोण (जीविका के लिए न्यूनतम आय की आवश्यकता के अर्थ में) के अनुसार निर्धनता “शरीरक्रियात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति को असमर्थवा अर्थात्‌ अस्ित् (ह#एशण्य), रक्षा (६०9) और सुरक्षा की आवश्यकवा की असमर्थता है।” यह शरीरक्रियात्मक आवश्यकताएं सामाजिक आवश्यकताओं से (अथवा अह की लुष्टि (धह० ६2564०४०४) और स्वाभिमान), स्वायनहा (5905०४9) की आवश्यकता, स्वाधीनता कौ आवश्यकता, तथा स्व-वास्तविकीकरण (5७-३७७०४४०७॥०७) की आवश्यकता से) भिन हैं। शरीरक्रियात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भोजन और पोषक तत्व, आवास और स्वास्थ्य सुरक्षा न्यूनतम आवश्यकताए हैं। इसके लिए आवश्यकताओं के खरीदने और मौलिक सुविधाओं को उपलब्ध करने के लिए 'कम से कम' (प्राश्शणण्य) आय चाहिए (जो अलग-अलग समाज में भिन होती हे |) यहाँ निर्धनता को 'गरीबी रेखा' के सन्दर्भ में देखा गया है जिसका निर्धाएण स्वास्थ, दक्षता, बच्चों के लालन-पालन, सामाजिक सहप्रागिता और आत्म सम्मान को बनाए रखने कौ आवश्यकताओं के प्रचलित मानदण्डों से किया जाता है (8८८८८, 4966 436)। पर्लु व्यवहार में “गरीबी रेखा” का निर्धारण न्यूनतम वान्धदीय पोषण मानदण्डों से कैलोरी का उपभोग करने (वणगरा0०7०) #क्70%0 ० ८०7८५ ॥708/:८) के आघार पर किया जीव है। भारत में 'गरैबी रेखा' का निर्धारण प्रामीण क्षेत्रों में 200 कैलोरी प्रति दिन प्रति व्यवित (औद) के उपभोग तथा शहरी क्षेत्रों में 200 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के उपभोग के आधार पर होता है। इसके आधार पर प्रति व्यक्ति का मासिक उपभोग व्यय (००ा5०७७७०० ८५७८४०॥ए्०) निकाला जा सकता है। हमारे देश में न्यूनतम उपघोग व्यय 962 के योजना आयोग के पसििक्ष्य योजना विभाग (एलह्क८०४०७ एक्ाणाण्ट् :शडघ०४) की सिफारिशों तथा 96 के मूल्यों आधार पर गणना द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में पाँच सदस्यों के परिवार का व्यय 00 रुपये तथा शहरी क्षेत्रों में 725 रुपये था। यह प्रति व्यक्ति प्रतिमाह प्रामीण क्षेत्रों में 20 रुपये तथा शहर क्रो में 25 रुपये हुआ। सन्‌ 978-79 में यह ग्रामीण क्षेत्रों में 62.5 रुपये तथा शहरी कं में 708 रुपये आका गया था, जबकि 984-85 में पुनरीक्षित गरीबी रेखा' 98-62 के आधार पर ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति मासिक व्यय 07 रुपये तक और शहरी क्षेत्रों लिए 22 रुपये निर्धारित को गयी। (666, 990. 404) । 987-88 में यह गावों लिए प्रति व्यक्ति प्रति माह 3( 80 रुपये और शहर के लिए 52 १0 रुपये रखी गयी (॥८ मलबक्राद्य महल, हों (3, 4998) | 4993-94 में प्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह को 229 रुपये तथा शहरी क्षेत्र में 264 रुपये की आमदनी, भोजन तथा अन्य मूल आवश्यकठाओं की पूर्ति हेतु आवश्यक होती थी। (080०७ मिटएश३ 4 976 26) यदि एक परिवार में औसतन पाच सदस्य मान लिये जायें तब गांवों में प्रति परिवार अतिवर्ष 3,740 रुपये और शहरों में प्रति परिवार प्रति वर्ष 5,840 रुपये '्यूतदम पर्याणववा के लिए जरूरी होंगे। 4998-99 की कौमत के आपार पर गादवों में वार्षिक खपत 22,400 रुपये और शहरों में 25,620 रुपये होनो चाहिए। इसी आधार पर सरकार ने 990 दशक के आर्थिक अर्थव्यवस्था व्र्वा मध्य में प्रति परिवार प्रति वर्ष 5,000 रुपये से कम आय वाले परिवार को “गरीबी रेखा” से नोये का परिवार माना। यहा पर "न्यूनतम जीविका' (##गहम्शय 5एैआ5था०४) स्वर को हो केद्ध माना गया है जो 'न्यूजतम पर्यापाता (#कऋमतग/क्ष 20८६७३०)) स्तर तथा 'न्यूनतम आराम! (कराशायाह 0णशारणि। ) स्तर से भिन्‍ है। अमरोका में 963 में 2,500 डालर वार्षिक आय तथा चार सदस्यों वाला परिवार न्यूनतम जीविका स्तर के नीचे माना जाता था, 3%00 डालर वार्षिक आय वाला "न्यूनतम पर्याप्तता स्वर से नीचे वाला, तथा 5,500 डालर आय वाला परिवार न्यूनतम आगम स्तर से नीचे रहने वाला माना जाता था (0क्राआ, 964 : 440) | इस आधार पर (963 में) अमरीका में 0% परिवार 'न्यूनतम जीविका स्व॒र' वाले परिवार, 25% 'न्यूनतम पर्याप्तता स्तर' वाले परिवार तथा 38% “न्यूनतम आराम स्वर वाले परिवार थे। अमरीका में चार सदस्यों का परिवार,जो गरीबी स्तर का था, उसकी वार्षिक आय 982 में 8,450 डालर (४»84५७८०, 983 : 3), 986 में 0,989 डालर और 990 में 4,200 डालर थी। 998 में अमरका में प्रति व्यक्ति आय 29,080 डालर थी (एव 7०८८७, ४०) 0, 909 46) । एक औसत अमरीकन व्यक्ति एक औसत भारतीय से आठ गुनी आय अजित करता है। भारत में 993-94 में योजना आयोग द्वाग़ गरीब लोगों की सख्या (अर्थात वे लोग जो न्यूवतम जीविका स्वर से नीचे थे) कुल जनसख्या की 8% आँकी गई थी। मार्च 997 में लकडवाला समिति की रिपोर्ट स्वीकार करने के बाद योजना आयोग के अनुसार गरीबी रेखा के नोचे के लोगों का प्रतिशत 372 या 3203 करोड़ माना गया है। (706 कबाएादा वाह, 68! 26, 997) | परन्तु यह बात महत्त्वपूर्ण है कि निर्धन लोग समजाति समूह (॥0902थ॥0००5 7०09) नेही हैं। इन्हें चार उप-समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है, अकिंचन अथवा नियश्रय (१८६॥ए४४७) (जो 993-94 की कीमतों पर 737 रुपये से कम प्रति व्यक्ति प्रति माह व्यय कर रहे थे), अत्यधिक निर्धन (व््ःथ्णालुए ए00) (जो 6] रुपये से कम प्रति व्यक्ति मासिक व्यय कर रहे थे), बहुत तिर्थन (जो 20 रुपये से कम प्रति व्यक्ति मार्क व्यय कर रहे थे), और तिर्घर (जो 246 रु. से कम प्रति व्यक्ति माप्तिक व्यय कर रहे थे)। निर्षनता पर दूसरे विचार के अनुसार भौतिक पदार्थों और ससाषनों (छशक्षाक्ष 8००५५) की कप्मो के दृष्टिकोण से निर्धनता के तीन पक्ष हैं. 0) वे जो शारीरिक कष्ट को दूए रखने के लिए तथा भूख और छत की आवश्यकता पूर्वि के लिए अर्थात्‌ अस्तित्व (घर) के लिए आवश्यक हैं, (४) वे पदार्थ जो मानव स्वास्थ्य के लिए अर्थात्‌ पोषण (००म४०॥) प्राप्ति और बीमारी से बचाव के लिए आवश्यक हैं और (७) वे जो न्यूनतम जौविका स्तर बनाए रखने के लिए आवश्यक है। सरल शब्दों में इनका आशय न्यूनतम प्रोजन उपभोग, पर्याप्त मकान और कपड़ा, और स्वास्थ्य रख रखाव से है। ग्रॉंस और मिलर (00055 080 'ा]००, 946 63) ने तीन कारकों की दृष्टि से निर्षत को स्पष्ट करने का प्रयल किया है. आय (गुप्त और मत्यक्ष), सम्पति या भौतिक अप्तिया, और सेवाओं को उपलब्धता (शैक्षिक, चिकित्सकोय, मनोरजन सम्बन्धी) लेक्नि अन्य विद्वानों ने इस पस्िक्ष्य में निर्धनता वी अवधाए्णा वो भ्रामक माना है। उदाहरणार्थ, अमेरिक में 960 में गरीबी स्तर से नोचे जोवन व्यतीत करने वालों में से 576% के पास ॥48 आर्थिक अर्थव्यवस्था टेलीफोन, 79 2% के पास टीवी सेट, तथा 726% के पास कपडे धोने की मशीन थी। (व, 966 455) | अत सम्पत्ति या भौतिक साधनों का होना निर्धनता का विशिष्ट आधार नहीं हो सकते । इसी तरह निर्धनदा को आय के काए्क से नहीं जोडा जा सकता। यदि मूल्य स्तर में वृद्धि होती है तो लोग अपने परिवार के सदस्यों के लिए जीवन की आवश्यकताओं को जुटाने में समर्थ नहीं हो सकते। स्पष्टतया तब निर्धनता को समय और स्थान से जोडना पडदा है। तौसरे विचार के गजब पर निर्धनता “प्रत्येक समाज में उपयुक्त न्यूनतम जीविका स्तर से नीचे जीने की स्थिति” ई्‌ या “जीवन को आवश्यकताओं को खरीदने के लिए पन का अभाव हे, या “शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अत्यधिक कमी--भूख, कुपोषण, बीमारी और कपडा, मकान, चिकित्सा सुविधा को कमी-है”। आखिरी स्थिति का मापत समाज के निचली सतह पर रहने दालों के जीवन की जनसख्या के अन्य व्यक्तियों से तुलना कर के किया जाता है। इस प्रकार यह निरपेक्ष दशाओं (0णु०८७ए० ००००४४००७) की अपेक्षा सापेक्ष (धरणु०८४४७) परिभाषा का विषय है। निर्धनता का निर्धारण मौजूदा मानदण्डों से होता है। मिलर और रोबी (७67 #6 ०७४, 970 34-37) ने कहा है कि इस धाएणा में निर्धनता को असानद्ा के निकट माना जाता है। समाजशास््रीय दृष्टिकोण से यह परिभाषा उस प्रभाव के अर्थों में अधिक महत्त्वपूर्ण है जो गरीबों के जीवन अवसर और आय को असमानता का जीवन की स्थितियों पर पडा है। पूर्ण निर्धनता वो गरीबों के हाथ में धन देकर कम की जा सकती है या मिटाई जा सकदी है, लेकिन 'असमानता' को सापेक्ष सीमा रेखा से ऊपर उठा कर भी नहीं रोका जा सकता | जब तक आय के पैमाने कौ सतह पर लोग रहेंगे, वे किसी न किसी प्रकार निर्धन तो रहेंगे ही। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक हमारे समाज में सामाजिक स्तगैकरण मौजूद रहेगा। हारविंगटन (प्राश॥8000, 7958 83) ने गरीबी की परिभाषा वच्यनाओं (4८४४४॥०॥) के सन्दर्भ में की है। उसके अनुसार निर्धनता, भोजन, स्वास्थ्य, मकान, शिक्षा एवं मनोरजन के उन न्यूनतम स्तरों से वन्वित रहना है जो तत्कालौन प्रौद्यगिकी (८०/८४/०७०५ (6८४॥०]०४५), विश्वासों, और मूल्यों के अनुकूल हों। रीन (८०, १968 52 ने निर्भतदा में दीन देल्वों का पता लगाया है. जीविका (इए7४5७४००) असमानता, और बाह्यता (०४८:४४॥४७) ! जीविका अस्तित्व के अर्थ में स्वस्थ्य बनाए रखने और कार्य क्षमता के लिए तथा शारीरिक क्षमता बनाए रखने के लिए पर्याप्त ससाधनों की उपलब्धता पर जोर देती है। असमानता उन लोगों की आपस में तुलना करती है जो आमदनी के निम्नतम स्तर पर हैं और जो उसी समाज में विशेषाधिकार प्राप्त लोग (ज्ांधों५० एथ्ण०) हैं। निम्नतम स्वर के व्यक्तियों की वज्चनाएँ सापेक्ष (टवा४छ) हैं। बहता (८/थग्रआ79) निर्धनों पर गरीबी के पड़ने वाले प्रभाव के अलावा समाज के अन्य लोगों पर पडने वाले प्रभाव पर भी बल देती है। स्माजशास्त्रीय दृष्टिकोण से निर्धन लोग दुश्चक्नों (जछ०७ ७रप्ण८8) से भिरे रहो हैं। निर्षन होने का अर्थ है गरीब पडौस में रहना, अधिक व्यक्तियों का या ठो बिना काम के रहना था कम वेतन पर कार्य करना, बच्चों को स्कूल न भेज पाना, और लम्बे समय के लिए निर्धन बने रहना। गरीब रहने का अर्थ यह भी है कि अल्प भोजन खाता, कमजोर आर्थिक अर्थव्यवस्था 49 स्वास्थ्य, भारी शारीरिक काम करने योग्य न होना, तथा निम्न भुगतान का काम लेना, जो फिर गदैब को हमेशा के लिए गरीब ही बता रहते टेगा। इस प्रकार चक्र गरोबी से प्रारम्भ होकर गगैबी तक ही समाप्त होता है। अत इसमें कोई विस्मय नहीं कि थामस गाल्डविन (प्/णण% 020ए॥, 967.. 77) जैसे समाजशास्त्रियों ने असमानता या गरीबी की सामाजिक अवधाएणा को इतना महत्त्व दिया। निर्धनता के परिमापनर की अभिव्यवित (जि श्बआांगा त॑ लाषााशाशां ए 70:५9) निर्धनता के परिमापन क्‍या हैं ? प्रमुख परिमाप हैं कुपोषण (2,00 से 2,400 कैलोरी प्रतिदिन से नीचे), निम्न उपभोग व्यय, न्यूनतम आय (998-99 के मूल्य स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में 28 75 और नगसैय क्षेत्रों में 247 80 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिमाह से कम), पुरानी बीमारी या खगब स्वास्थ्य, अशिक्षा, बेगेजगाश्ें औ/या कम रोजगार, तथा मकानों की अस्वास्थकर दशाएँ । मोटे तौर पर किसी समाज की निर्धनता कौ अभिव्यक्ति, न्यून ससाधनों, निम्न राष्ट्रीय आय, निम्न प्रति व्यक्ति आय, आय विवरण में बडी विषपताएं (0७9979), कमजोर रक्षा, और इसी प्रकार के कारबों में होती है। विश्व बैंक द्वारा श्रायोजित अनुसधान में राजस्थान के एक जिले में निर्षनता के अध्ययन के आधार पर इस लेखक ने उन भर्रे (॥०५७५०४००७) के गरीबी से जुड़े लक्षण बताये हैं जिनमें रहने वाले लोग निर्धन होते हैं। इन लक्षणों में से कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं. उप्त पर में पूर्णकालिक मजदूरी अर्जित करने वाले का अभाव, बे घर जिनमें परिवार को मुखिया स््रो हो, वे घर जिनमें 8 वर्ष से कम आयु के 6 बच्चों से अधिक हों, वे घर जिनके मुखिया दैनिक मजदूरी पर निर्भर रहते हों, वे घर जिनमें प्राइमती से भी कम स्तर की शिक्षा प्राप्त सदस्य हों, वे घर जिनमें सदस्यों को कार्य का कोई अनुभव न हो, तथा दे घर जिनके सदस्य अशकालिक रोजगार में हों। भारत में निर्धतता का अनुपात व फैलाद (0लं4(००६ बगव 3]9800०९ ० ७ ला) 0 पाप) भारत में विकास में द्विभाजन (0/०॥४०१०४)) पाया जाता है। विश्व औद्योगिक उत्पादन में भा का 9 वां स्थान है, दथा कुल सकल राष्ट्रीय उत्पादन (6ा90) में 2 वां स्थान है, पर भो जनसझ्या का एक नडा घाग अत्यन्त निर्षन है। सयुक्त राष्ट्र सप के मानव विकास इस्ेक्स' ने (जिसके तोन सूचक है. जीवन अवधि, शैक्षिक उपलब्पि, तथा क्रय शक्ति वो मानता के सरदर्भ में वास्तविक (जीड़ो पी) भारद को 73 राष्ट्रों में से (सितम्बर 2000 में यह सख्या ]79 हो गयी) 34 वा स्थान दिया है। वास्तविक प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जोड़ोपी) के अर्थ में भारत को 4] वा स्थान दिया गया है, जबकि पाविस्तान वा 00 वा वधा चीन का 23 वो स्थान है (0:00. एटफटघण३ ॥4, 996) | स्वतंत्रता श्ाष्ति के बाद देश में सम्पूर्ण उत्पादन दर में महत्त्वपूर्ण वृद्धि देखो गई है। प्रति व्यक्ति आय में उत्तोत्त वृद्धि (लत हाफ) 980-8। में ,690 रुपये में 987.88 में 3,299 || आर्थिक अर्थव्यवस्था रुपये, 990-9] में 4,934 रुपये, 993-94 में 6,234 रुपये और 999-2000 में 9739 रुपये दर्ज की गयी। राजस्थान में यह 999-2000 में 7,4 रुपये, 998-99 में 7,694 रुपये और 997-98 में ),87 रुपये थो। यदि 7999-2000 को आधार वर्ष माना जाये वब यह आय 999-2000 में 8,900 रुपये (या 450 डालर) थी। (796 मणव्राद्ा पकल, 2प७॥ 6, 2000) | स्थिर मूल्यों (980-8) पर प्रति व्यक्ति आय॑ 992-93 में 2,226 रु॥993-94 में 2,282 रुपये और 994-95 में 2,362 रुपये आँकी गई थी (706 सफ्दं।आका 7076, /प६९०४ 22, 995) | यदि हम राष्ट्रीय मुद्रा के क्रय शक्ति समानता (एच०ा9न्राह 90७९7 एथा७५ ण ९९०) के अर्थों में 4998-99 में भारत में प्रति घ्यक्ति आय की गणना करें वो भारत की प्रति व्यक्त आय 870$ की) पीपी पी (९77) सुधार के साथ 2,000$ होगी। फिर भी अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय भारत की अपेक्षा 8 गुनी अधिक होगी | (#द/6 7042; १4४४ 0, 998 46) योजना आयोग के आकलन के अनुसार (मार्च 997 में लकडवाला समिति वी सिफारिशें स्वीकार करने के पूर्व) गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करने वाले लोगों का प्रतिशत 972-73 में 5 5% से घटकर 983-84 में 37 4%, 987-88 में 299% और 3993-94 में 8% हो गया। (7॥6 कऋवकादत 7्रक्रा्, 4०89४ 22, 995 वात #फरणा 5, 997)। परन्तु विशेषज्ञ समूह (छ.फ्ूला। (॥079-पि्माणाबं परा5प्राह एए॥० ए7९०८ आते ?०॥८9) के अनुमान के अनुसार यह प्रतिशत इससे काफी ऊचा था। 977-78 में 5 88%, 983-84 में 448 %, 987-88 में 393% और 993 9 में 334% था। (0॥॥0०६, परत 4, 996 26) यूएनडीपी ((धा07) के अनुसार 990 में भारत में गरौब लोगों की सख्या 4 करोड थी। (76 मदद परक्ना८, 0८0७, 4६०४६ 4, 7993) | विश्व बैंक और अर्थशास्त्रियों का दावा है कि गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की सख्या 40 करोड है। इसका अर्थ शा कि भारत में गरीबों की सख्या, बयलादेश और पाकिस्तान की कुल जनसख्या के बराबर है। योजना आयोग ने मार्च 977 में देश में मौजूदा गरीबी का आकलन करने के लिए लकडवाला समिति की क्रिया विधि अपनाने का निश्चय किया। लकडवाला समिति सितम्बर 989 में नियुक्त की गई थी, जिसने जुलाई 993 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। दीन वर्ष तक रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। 996 में योजगा आयोग ने अचानक इस पोर्ट को स्वीकार कर लिया और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों का अनुमान 993-94 में 8% से बढाकर 37 256 मान लिया। इस निर्णय से न केवल नवी पंचवर्षीय योजना के विकास कार्यक्रमों पर बल्कि आगे आने वाले वर्षों के कार्यक्रमों पर भी काफी प्रभाव पडा। भारत में लगभग 32 और 35 करोड के मध्य निर्धन लोगों में से (योजना आयोग के नये अनुमान के अनुसार) बिल्कुल दरिद्र लोग--जो कि समाज में बिल्कुल नीचे मदह के 0% में हैं--लगभग 5 6 करोड हैं। ये लोग बूढे, बीमार या अपाहिज नहीं हैं। उनके लिए रेजी ऐेटी ही उपलब्ध कय्ना नही है बल्कि उन्हें एक प्रकार की सामाजिक सुरक्षा भी मदन करानी है जिसमें कुछ नियमिद आय का प्रबन्ध भी सम्मिलित हो। इसका अर्थ यह हुआ कि 26 करोड (सस्कारी आकड़ों के अनुसार) और 30 करोड (अर्धशास्त्रियों के अनुसाऐं कें आर्थिक अर्थव्यवस्था पड़ा आमपास विविष निर्षन लोगों के लिए रोजगार के अवसर जुदाए जाने हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ये निर्धन लोग भूमिहीन खेतिहर मजदूर, आकस्सिक गैर खेतिहर मजदूर, (जैसे लोहार, बढई और चघमडे का काम करने वाले) हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में ये निर्धन लोग बिना सगठनों वाले औद्योगिक श्रमिक, शाक-सब्जों, फल-फूल बेचने वाले, चाय को दुकानों के नौकर, घोलू नौकर और ऐेजाना दिहाडी के मजदूर हैं। विगत कुछ वर्षों में सर्वेक्षणों के अनुसार आर्थिक विकास के साथ-साथ उच्च मध्यम, और मध्यम आय वर्ग के लोगों को सख्या में वृद्धि हुई है। 997-98 के मूल्यों के आधार पर 30,000 रुपये वार्षिक से कम आय वाले घरों की सख्या लगभग 50% है,३ लाख रुपये वार्षिक से अधिक आय वाले (उच्च वर्ग) 0.7% है और 30,000 से 3 लाख रुपये आय वर्ग (मध्यम वर्ग) के लोगों की सख्या कुल घरों की 40% है। आगामी 0 वर्षों में आशा को जाती है कि इन आय समूहों के अपेक्षाकृत आकार में काफ़ो परिवर्तन आने वाला है। 30,000 रुपये से कम वार्षिक आय वाले पर्रो को सख्या 4% रह जायेगी, 3 लाख रुपये पे अधिक आय वाले घनी घरों की सख्या 35%, और 30,000 रुपये से 3 लाख रुपये वार्षिक आप बाले मध्यम वर्गीय घरों की सख्या कुल घरों कौ लगभग 80% हो जायगी। (गार मा्रवा७दत 7/॥८5, #घह० 24, 998) | जब तक आय वितरण की असमानता कम नहीं की जाती तब तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को सख्या में कमी करने के अवसर भी कम हो रहेंगे। भारत में मूल्य ऊँचे उठे हैं और आय का दायर सकुचित हुआ है। वर्तमान में (] सितम्बर, 2000) मुद्गास्फोति वो दर 594%8 बताई गई है, जबकि 996-97 में यह दर 70% थी, ब्रिटेन में 27% थी, कनाडा में 8%, आस्ट्रेलिया में 08%, स्पेन में 20%, और स्वीडन में 02% थी (हल्माककार का हेगहत्वा शध्थिकु, उग्याण्णज 46-22/ 23.29, 9099. 46 थाए॑ वापह मक्रवफ्ाक्ष। गाए, 5वप्ाथग्गणटए ॥, 2000) । पुद्रा स्फीति में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वाले कारक हैं () माँग में अत्यधिक वृद्धि, पूर्ति लगभग समान था उसमें गिरावट या ठहराव । इसे “माँग का खिंचाव मुद्रास्फीति! (00820 एज एञ909॥) नाम से जाना जाता है। (2) मूल्यों में स्वतत्र वृद्धि ो मजदूर सघों के दबाव के काएण श्रमिकों को मजदूरी में वृद्धि का फल हो सकती है या उद्योगपतियों की अधिक लाप कमाने को इच्छा हो सकती है। कीमतों में इस प्रकार कौ वृद्धि या मुद्रास्फीति को "मूल्य दबाव' (00५-7४७७) मुद्रा स्फोति कहते हैं। 8) भारत जैसे विकासशील देशों में मुद्रास्फीति इसलिए भी हो जातो है क्योंकि विकास के प्रयल और सरचनात्मक कठोरताएं भी चलती रहती हैं। मूल दांचागत (री7-आएटएएओ) सस्थागत या अन्य तग्रियों उत्पादन गतिविधियों में रूकादट पैदा करदी हैं और अभाव पैदा कर देती हैं। इससे मूल्य बढते हैं और मुद्रास्फोति भो (3) घाटे को वित्त व्यवस्था (उल्नाता करकाणाणष्री घन वो अधिक्ता की छ्पिदि वो पैदा कर देतो है लेकिन साथ साथ वस्तुओं की पूर्ति में वृद्धि नहों कर्तों। इमसे मुद्रास्‍्प्नोति को स्थिति बन जातो है। 6) कभी-कभी विकासशील देझों को विज्रस के लिए प्रमुख वस्तुओं (८४० ००१५) का आयात करना पडा है। इन वम्तुओं के लिए अत्यधिक विदेशी मुद्रा खर्व करनी पड़ती है। प्रायोजनाओं (70८०७) के मूल्य बढ जाने 352 आर्थिक अर्थव्यवस्था हैं और मुद्रास्फीति स्वय बन जाती है। लोग सम्पत्ति, स्वर्ण दथा अन्य गैर उत्पादनीय प्रयोगों में पूजी निवेश करना पसन्द करते हैं। इससे निवेश योग्य पूजी का एक बडा भाग अल व्यस्त हो जाता है। यह विकास को रोकने का काम करता है और मुद्रास्पीति शक्तियों कर कार्य करने का आधार तैयार करता है। भारत ने उन तमाम समस्याओं का सामना किया है और अब भी कर रहा है, जिन्होंने देश में मुद्रास्फीति को बढाया है। बाजार अर्थव्यवस्था और उदारीकरण नीति . इसके सामाजिक परिणाम (एल एलणाणाल भाव [फशम्ीजांजा शांत: वी5 8०5 (श्पुष्शाल्थ्शे स्वतंत्रता के बाद भारत ने मिश्रित अआर्थ-व्यवस्था, अर्थात्‌ निजी उद्यमों में आशिक णज्य नियत्रण और आशिक स्वत्त्र स्पर्धा निति, का अनुसरण करने का निश्चय किया परनु 990 से 990 तक के 40 वर्षों के अनुभव ने केद्धीय सरकार को 990 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में, आर्थिक मामलों में सरचनात्मक परिवर्तन लाने, अर्थात्‌ समाजवाद से निजीकण्ण में परिवर्तन, और राष्ट्रीयकरण को सीमित करने को प्रेरित किया। फलस्वरूप, राज्य का प्रभु कम होना शुरू हो गया और उदारीकरण केद्रीय बिन्दु बन गया। 990 में पश्चिम में आक्रामक कार्यवाहियों के कारण तेल के मूल्यों में घृद्धि तथा विदेशी विनिमय कोष की घटी स्थिति ने भारत में गम्भीर आर्थिक सकट पैदा कर दिया। जब जनता दल की सरकार आई तब उनको इस सकट को अस्थाई रूप से हल करने के लिए बैंक आफ इन्लैण्ड के पास स्ण पिरवी रखना पडा। इस कारण लाइसेंस नीति का उदारीकरण करना आवश्यक हो गया। 990 97 में अन्तर्रष्टीय मुद्रा कोष से लिए गए कर्ज से उत्पन स्थितियों के दबाव में भी उदापैकरण आवश्यक हो गया। इसने निजी पूजी बाजार को देश की अर्थव्यवस्ा में महत्वपूर्ण घूमिका निभाने के अधिक अवसर प्रदान किए हैं। 990 के बाद उदारौकरण नीति अपनाने के बाद हमारे देश में कौन से आर्थिक सुधार प्राएम्म किए गए हैं ? इनमें से कुछ इस प्रकार है. (६०६ "फृथा॥क्षत धणा6 काएं लिधक्षा28. धौ.0990५9999,. 50070ता९ [.फैदाबाडआाणा.. | पल 9905 टग्ाकापट कब क 0८4 उप, वणए 8-24, 4998. 25-3) । लाइसेंस पद्धति के माध्यम से गुणात्मक आयात नियत्रण कम कर दिए गए हैं और लगभग सभी मुख वस्तुएँ और कच्चा माल आयात के लिए मुक्त कर दिए गए है। 2. टैक्स ढाँचा बदल दिया गया है जिसमें निम्न परिवर्तन शामिल हैं . कच्चे माल (## 7४६१8) में उत्पादन कर (७४०5८ (७७) में कटोदी, उत्पाद कर को दर में की, सीमा शुल्क तथा आय कर में कटौती, दथा सभी उत्पादनशील सम्पत्ति पर ससत्ति के की पूरी तरह समाप्ति। 3 वित्त क्षेत्र (सेक्टर! को अनेक उपायों से पुनर्सगठित किया गया है, जैसे आय मार से सम्बन्धित नवीन अतिमानों को लागू करके तथा अलाभकारी सम्पत्ति पर !5# अग्रिम राशि देने का प्रावधान करके । 4. औद्योगिक नीति में सुधार किया गया है जिप्में औद्योगिक क्षेत्र में अपयत वियनों री समाप्त करना शामिल है। आई्दिक अर्धव्यवस्था प53 5. विदेश विनिमय नीति का पुनरीक्षण किया गया है जिसने अनेक क्षेत्रों में विदेशी पूजी निवेश खोल दिया है। 6. मार्च 3, 2000 को सप्कार ने नयी आयात-निर्याव नीति लाए करते हुए 74 वस्तुओं के आयात पर कोटा पाबन्दी हटा दी, विशेष आयात लाइसेंस को समाप्त किया, तथा दो विशेष आर्थिक क्षेत्र (००) बनाने की घोषणा की जिनमें नियम-मुक्‍्त व्यापार हो सकेगा। उदाग्रेकरण नीति को लागू करने के नौ-दस वर्षों में हमने क्‍या प्राप्त किया 2? इसको हम निलन स्तरों पर व्याख्या कर सकते हैं . (8८४ 5807० थ्ात )४णताणाब्वा॥क, णः ०/. 497-29) 4, वृद्धि को दर (800 ण॑ (7०१0) सकल घेलू उत्पाद (जीड़ीपी) की वृद्धि-दर में वृद्धि हुई है। जबकि 970 के दशक में यह 3% थी॥980 के दशक में यह 4 से 5%, 994-95 में 7%, 995-96 में और 96-97 में बढकर 78% हो गई, लेकिन 97-98 में यह नीचे होकर 5% हो गई और फिर 98-99 में और 999-2000 में बढकर 58% हो गई। (कदव 70409; ॥(बला-999 * 43 श्षा0 उमर झंब्राबंक्राद्य वीजआञा6, जिएए्नए 25, 7999 70 फऋदाएशआ9 24, 2000) | 2, मुद्रास्फीति (री॥/णा) सामान्य मूल्य स्तर पर मुद्रासशेति नियन्त्रि हुईं है। जब 960 के दशक में यह (0% थी, 972-75 में बढ़कर 8 5% हो गई और 4979-82 में 55%, 990-93 में 36%, 994.95 में 09%, सितम्बर 998 में 88% और 2000 के सितम्बर माह के दूसो सप्ताह में 594% ही रह गई। 990 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में मुद्रास्फीति और 905.96 के परचात्‌ इस पर तेजी के साथ नियत्रण को कुछ सीमा तक अन्तर्राष्ट्रीय पैट्रोलियम मुल्यों में वृद्धि और बाद में इसकी पूर्ति पर सज्तों में शिथिलवां से स्पष्ट किया जा सकता है। उसके बाद दीन चार वर्षों तक मुद्रास्फीति में काफी गेक लगाई जा सकी है क्योंकि अर्थव्यवस्था में कुछ ओोप्त सरचनात्मक सुघार लाए गये। 3. राजस्व और व्यय (झ0शाएह बात छफल्तकाएएरे विभिन करों के ढोचों को तर्कमएत बन्ए दिये जाने के बाद भी न तो यजस्द को, आमद में बोई वृद्धि हुई और ने ही वित्तीय घाटे में कमी आई ऐ। वास्तव में, कर राजस्व में जोड़ी पी के अनुपात में 990-9! में लगभग % को गिरावट आईं (सुधायों से पूर्व) 095.% में सशर १0%8 और इसी के आसपास 999-2000 में | यजस्व घाटा पूरा नहीं किया जा सदा है। 4. औद्योगिक निद्यादन (70हातंज छचॉणियापणल्‍ले 990 के दशक में हुए आर्थिक शक्तियों के उदारौकरण के प्रभाव से ओद्योगिक उत्पादन में प54 आर्थिक अर्पव्यकाया कोई वृद्धि नहीं हुई है। सत्य तो यह है कि उत्पादन-वृद्धि में ऊपर की ओर खिसकाव में कमी रही है। 7996-97 में औद्योगिक क्षीणवा या मदी (८०८६४०७) की छाग्रा उभरने लगी। 994-95 में जो औद्योगिक उत्पादन बढ़कर 3% हो गया था, वही 996-97 में गिरका 67% और 998-99 में 35% ही रह गया। (#& 7०४०), १४४०४ 2, 999, 42, गाव गा कशवाछाबा पा, जटआएआर 25, 2999)। 5. निर्यात और विदेशी पूँजो का अन्तप्र्वाह (छछफुण-5 था० #00तंह्रा (8फॉ०9। |गीएण) 995-96 में आगे वाले वर्षों में निर्यात में कमी आई है। जब 993-94 और 995 9 की अवधि में निर्यात वृद्धि दर में 8 से 27% वृद्धि हुई, वहीं 996-97 में यह 2.% कम हुई और 997-98 में 44% की गिरावट आई (796 मद्धदछाक्य गा, सिवाय 25, 997, काढ/व 704०; 'नद्माक , 99 42) 996-97 से 999-2000 में विदेशी पु म बा काफ़ी बढ गया है 8200 करोड डालए) जो कि अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है। यह आशा को जा रहो थी कि उदागकरण नीति बाह्य वित्त और व्यापार में खुलापन लाएगी, देश को अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा के समक्ष खडा कर देगो और तकनीकी का आदान प्रदान, प्रबन्धन का ज्ञान, निर्यात विपणन में पहुँच और विविधतापूर्ण निवेशक आधार लाने के लाभ साथ में लाएगी। आर्थिक विशेषज्ञों का विचार है कि ये आशाएँ सीमित स्तर तक हो पूरी हो रही हैं। यह सत्य है कि देश के बाह्य वित्तीय विकल्पों में वृद्धि हुई है लेकिन विदेशी बाज तक पहुँच वाले देश के लिए निजी पूँजी प्रवाह के नवीदीकरण को मजबूत और परिवर्तनशल बनाना होगा। लेकिन भारत को बाह्य वित्त के नवीन तगैकों तथा विश्व घूजी बाजार में बढती हुई सत्यनिष्ठा की भावना से उत्पन चुनौतियों का सामना करना अभी सीखना है। यह कहा जा सकता है कि आज एक ओर तो शजस्व वसूलो कम है, वित्तीय घाटा बढ रहा (999-2000 में राजस्व घाटा एक लाख करोड रुपया बढाया गया था), और अन्य देशों से पूँजी की आमद अधिक नहीं बढी है, दूसरों ओर अनेक योजनाएँ, जैसे राजस्व आधार को बढाने के लिए प्रोत्साहनों को भरमार, मुद्रास्पीति दर में कमी, कर व्यय को कम करने के लिए राज्य सहायता (सब्सिडी) ढांचे में सुव्यवस्थीकरण, सार्वजनिक उपयोग की वस्तुओं जैसे बिजली, पानी के सीमान्त मूल्यों में सुधार, ढॉचागठ रुकावर्टों को हटना, घाटे में जा रहे सार्वजनिक उद्यमों का निजीकरण, तथा बीमा क्षेत्र के सुधार निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था को सुधारने का कार्य कर रहे हैं। फिर भी, गम्भीर अर्धशास्त्रियों और समाजशास््रियों ने पाएतीय अर्थव्यवस्था के कुछ महत्त्वपूर्ण पक्षों पर वास्तविक चिन्ता प्रकट की है, जैसे अत्यधिक निर्धनता, बेगेजगारी, सब्सिडी नीतियों, ऋणग्रस्तता, गुटीय राजनीति के प्रभाव, और गजनैतिक अस्थिरताए। कुछ लोगों ने तो उदारीकरण के गुणों तक को चुनौती दे डाली है और इसवो अमिश्रित वैश्वीकरण कहा है। अत 2000 के दशक में सम्पूर्ण आर्थिक अदर्शन वी की मूल्याकन का और उदारीकरण नीति के प्रभाव का परीक्षण करना आवश्यक |] आईएिक अर्थव्यवस्था व55 यजमानी व्यवस्था (पश6 तैशुंगाशां 999९४) अजमानी प्रथा परम्पणगत पेशेवर कर्तव्यों की एक व्यवस्था है। पुस्वन भारत में जातियाँ एक दूसेरे पर आर्थिक दृष्टि से निर्भर होतो थी। ग्रामीण व्यक्ति के परम्परागत विशिष्ट धम्धे के साथ उसकी जाति का प्रदत्त विशिष्टीकरण भी होता था। पेशे के विशिष्टीकरण के कारण ग्रामीण सभाज में सेवाओं का आदान-अदान चलता था। सेवक (लाला और सेवित (६७५८०) जातियों के बीच के सम्बंध सयिदा पर आपारित व्यक्तिगत, गेर व्यक्तिगत, अस्थाई या सोमित नही होते थे बल्कि जाति उन्मुखी (८४४६८-०ए८॥८०), दोर्घकालीन व विस्तृत रूप से समर्थन प्रदान करने वाले होते ये। मारो एवं भूमिहीन परिवारों के बीच, जो आपस्त में सेवाओं और वस्तुओं को पूर्ति करते हैं, सम्बन्ध दोर्घकालीन होते हैं, जिन्हे यजमानी प्रथा कहा जाता है। हैरोल्ड गूल्ड (प्रथा०व 600४, 987 . 38-39) भे यजमानी प्रथा को संरक्षकों (0/7079) एवं सेवादारों (#फ्फ्ञाश्ा$ रण $८५०८७) के बीच अन्तर्पारिवारिक (ए/ल्ाणथए॥॥) अन्तर्नावीय सम्बन्ध कहा है जो आपोनस्थ (डएथ्णवाआग०) एव आपीनकर्ता (७७०:५॥०८) के बीच होते हैं। सरक्षक लोग स्वच्छ (०|८७४) जाति के होते हैं जबकि रेवादार अस्वच्छ एवं निम्न जाति के। यह कहा जा सकता है कि यजमानी प्रथा वितरण (0070080॥) को व्यवस्था है जिसमें उच्च जाति के भूस्वामी परिवारों को विभिन्न निप जातियों, जैसे बढई (खाती), नाई, कुम्हार, लोहाए, पोबी, भगी (चुहरा), आदि के द्वारा सेवाएँ या उत्पाद उपलब्ध कराए जाते है। सेवादार जातियों को 'कमीन' कहा जाता है जबकि (००७०७ $ध५८०) को “यजमान' कहा जाता है। प्रदत सेवाओं के बदले सेयादाएं को नकद या वस्तु के रूप में (अनाज, चाण, कपडे, दूध, आदि) भुगतान किया जाता है। कं योगेन्द्र सिंह (973 -86) ने यजमानी व्यवस्था को एक ऐसी व्यवस्पा कहा है जो गाँवों में आधारित अन्तर्जातीय सम्बन्धों में आपसी आदान प्रदान पर आधारित सम्बन्धों से नियसित होती है। ईशवरन्‌ (966 4॥) ने यजमानी व्यवस्था के सन्दर्भ में (दर्षिण भारत में मैघूर में इसे “आया' पुकाय जाता है) कहा है कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें प्रत्येक जाति को सामुदायिक जीवन में समग्र रूप से एक भूमिका निभानी होती है। यह भूमिका आर्थिक, सामाजिक तथा नैतिक कार्य करने की होती है। मूल रूप मेँ 'यजमान' शब्द उस सेव्य (०॥८॥0 को सन्दर्भित करता था जिसके लिए द्राह्मण पुजारी कर्मकाण्ड (७०5) का सपादन करता था। बाद में यह शब्द उस मरध्षक के लिए प्रयोग किया जाने लगा जो विशिष्ट सेवाओं को प्राप्त करता हो | बौडमन (छ८0;०॥, 959 : 7) ने स्रकेत दिया है कि सेवा और वस्तुएँ उपलब्ध करने वालों को 'कमीन' के अदिरिक्त 'पुरजन', 'परपान' आदि नामों से भी विविध क्षेत्रों में जाना जाता है। पयपाती सम्बन्ध ([शुफरआं एश३ध०७७) कभी-फ्भी दो या अधिक जातियों के बौच कुछ वस्तुओं को पूर्ठि के आधार पर बने सम्बन्ध सविदात्मक (०००/८यल्ता) हो सकते हैं लेक्नि यजमानी नहीं। उदाहस्पार्थ, बुनक्र जिसको उमके द्वात निर्मित व बेचे जाने वाले कपड़े के लिए नकद भुगतान क्या जाता है, उसको 56 आर्थिक अर्थव्यवस्था फसल में रस्मी हिस्से का अधिकार नहीं है। वह कमीन नहीं है और खरीदने वाला उप्तवा 'यजमान नहीं है। 23 अजमानी सम्बन्धों में भी कुछ ऐसे उत्पाद या सेवाएँ हो सकदी हैं जो सविदित हों और जिनके लिए अलग से भुगतान किया जाता हो। उदाहरणार्थ, गाँव में रस्सी बनाने वाले यजमानी व्यवस्था के अन्तर्गत किसानों को सभी प्रकार की आवश्यक रस्सियाँ उपलब्ध करा सकते हैं किन्तु कुओं में प्रयोग की जाने वाली मोटी रस्सियों के लिए अलगु से भुगतान करना पडता है। यजमानी सम्बन्ध कर्मकाडी (7॥7थ) मामलों तथा सामाजिक समर्थन के साथ साथ आर्थिक आदान-म्रदात को भी निश्चित करते हैं। सेवादार जातियाँ संस्कार दथा अन्य कर्मकाडी कर्तव्यों का पालन यजमान के घर पर जन्म, विवाह और मृत्यु जैसे अवसरों पर करते हैं। डी एन मजूमदार (958) ने उत्तर अदेश के लखनऊ ज़िले के एक गाँव के ठाकुर परिवार (एजपूद जाति के) का उदाहरण दिया है जिसकी जीवनचक्रीय सस्कारों के लिए दम से अधिक जातियों द्वारा सेवा की जादी है। उदाहरण के लिए, बच्चे के जन्म पर दावद के समय ब्राह्मण नामकरण संस्कार' सम्पन्न करता है, स्वर्णकार नवजात शिशु के लिए स्वर् आभूषण उपलब्ध कराता है, घोबी गन्दे वस्त्र धोता है, नाई निमत्रण व सन्देश देता है, खाती वह पटला उपलब्ध कराता है जिस पर बच्चे को नामकरण के समय बिठाया जाता है, लोहा लोहे का कड़ा देवा है, कुम्हार कुठार देवा है जिसमें वैयार सब्जिया और पानी रखा जाता है, पासी भोजन के लिए पत्तलें उपलब्ध कराता है, और दावव के बाद भगी दावत स्थान कौ सफाई करता है। सभी को भेंट, भोजन, पैसा और कपडे प्रदान किए जाते हैं जो कि यजमात के प्रभाव और प्राप्तकर्ता की विनम्रता पर निर्भर करता है। कमीन लोग भी (निम्न जाति के) जो अपने यजमानों के लिए विशिष्ट सेवाएँ उपलब् कराते हैं दूसरों से सेवाएं और वस्तुएँ चाहते हैं। हैरोल्ड गूल्ड (प&00 00०0, 987 69-70) के अनुसार निम्न जाति के लोग या तो प्रत्यक्ष श्रम विनिमय द्वारा या नकद या वस्तु के रूप में भुगतान कर के अपने स्वय के लिए यजमानी प्रबन्ध कर लेते हैं। मष्म जातियों के लोग भी निम्न जातियों की तरह एक दूसो की सेवाओं का आदान-प्रदान या व नकद भुगतान या सेवाओं द्वारा भरपाई कर लेते हैं। कमीन लोग अपने यजमानों के लिए न केवल वस्तुएँ उपलब्ध करते हैं बल्कि वे कार्य भी करते हैं जो उनके यजमानों को दूषित (अपवित्र) करते हैं , उदाहरणार्थ, गन्दे कपड़ों का घोना (घोबी ड्वाए),बाल काटना (लाई द्वार), नवजात का जन्म कराना, (नाइन द्वाए), शौच ख्थात की सफाई (भगी द्वारा) और इसी प्रकार के कार्य | यद्यपि धोबी, नाई, लोहार, आदि स्वय विन जातियों में गिने जाते हैं तथापि वे हरिजनों के लिए “'कमीनों' की तरह सेवा नहीं करे न ही ब्राह्मण लोग इन लोगों को अपना यजमान मानते हैं। फिर भी जब निमल जाति परिवार समृद्ध होते हैं तब वे अपने दूषित पेशों को छोड देते हैं और अपने सेवा के लिए सस्कार विशेषज्ञों को प्राप्त करने का प्रयल करते हैं (और सफल भी होते हैं) यजमानी सम्बन्ध जातियों की अपेक्षा परिवातों में होते हैं। इस तरह शाजपूरों वी परिवार गाँव के लोहार जाति के एक परिवार से घातु उपकरणों को बनवाता है, न कि सी लोहारों से। लोहारों का यही विशेष परिवार शजपू्तों के उस परिवार को फसल में से हि आर्षिक अर्थव्यवस्था वा पाएगा, न कि सभी लोहार परिवार। दो-परिवारों के बोच (लोहार और राजपूत) का यह सम्बन्ध टिकाऊ होता है क्योंकि लोहार उसी राजपूत परिवार को सेवा करता है जिसमें उसके पिता और बाबा सेवा करते थे। राजपूत परिवार भी अपने उपकरण व उनकी मरम्मत उसी लोहार परिवार की सन्तानों से कराता है जिसके पूर्वज उस राजपूत परिवार के पूर्वजों से कराते थे। यदि कोई सम्बद परिवार समाप्त हो जाये तो उसके वश का कोई दूसरा परिवार स्थान ले लेता है। उदाहरण के लिए उपग्रेक्त मामले में यदि लोहार के परिवार में एक से अधिक पुत्र हों, जिनकी देखभाल राजपूत परिवार न कर सके तो इस दशा में वे ऐसे स्थानों में सहयोग लेने चले जाते हैं जिनमें लोहारों कौ कमी छोदी है। ओन्‍्सटीन (0:थाघट0, 962 * 30-4) ने माना है कि गाँव के अधिकारियों या गाँव के नौकरों के परिवार (जैसे चौकीदार) किसी विशेष परिवार की अपेक्षा सारे गाँव से यजमानी सम्बन्ध बनाए रखते हैं। इस प्रकार चौकीदार के परिवार को गाव के प्रत्येक भूस्ामी किसान परिवार से फसल में से योगदान मिलता है। गाँव के नौकर लोग (&८४थ॥७) भो गांव की भूमि का कस्-मुक्त प्रयोग कर सकते हैं। सेवादारों के कुछ परिवार, व्यक्तिगत परिवारों कौ अपेक्षा गाँव के किस्ली हिस्से से यजमानी सम्बन्ध रखते हैं। इन परिवारों को गाँव के उस हिस्से में रहने वाले सभी परिवारों की सेवा का हक होता है। 'यजमानी प्रथा के सन्दर्भ में कोलेन्डा (0०४08, 963 * 4-37) ने कहा है “हिन्दू यजमानी व्यवस्था भूमिकाओं और प्रतिमानों के जाल व एक व्यवस्था के रूप में जकडे हुए भारीय ग्राममों कौ एक सस्था या सामाजिक व्यवस्था है जो कि सामान्य सास्कृतिक मूल्यों द्वाता समर्थित व विधिमान्य होती है”। यजमानी व्यवस्था में विश्लेषण योग्य प्रश्न निम्न हैं रस व्यवस्था का कार्य क्‍या है 2? इस व्यवस्था में क्या शक्तियों व अधिकार वितसित हैं 2 'यजमानी व्यवस्था अन्य प्रधाओं से किस प्रकार सम्बन्धित है ? यजमानी व्यवस्था को बनाए रखने के पीछे प्रेणणा क्या है ? इस व्यवस्था में क्या परिवर्तन हुए हैं 2 प्रकार एवं भूषिकाएँ (ह0॥60005 श्वा8 70०5) यजम्ानी व्यवस्था के कार्यों का विश्लेषण काते हुए लोच (.62०४, 960) ने कहा हे कि यजमरानी व्यवस्था जातियों में आपसी आर्थिक निर्भरता और श्रम विभाजन को नियमित बनाए रखदी है। वाइजर (१४४४७, 967 35) के अनुप्तार यजमानी व्यवस्था भारतीय ग्रा्मों वो आस निर्भर समुदाय के रूप में बनाएं रखने में सहायक होदी है। गूल्ड 4987) ने कहा है कि यह (यजमानी व्यवस्था) सेवा कार्यों और शिल्प सेवाओं के बदले में कृषि उत्पादन का विवरण करती है। बीडिलमेन (छ०त८ए७7, 959) का मत है कि यह (यजमानी व्यवस्था) उच्च जादियों द्ते प्रतिष्ठा बनाए रखती है। यजपानो व्यवस्था में निहित भूमिका यजमानों और क्मौनों को हैं। कमीन जातियां अजमान जातियों के लिए कुछ पेशेवर, आध्थिक व सामाजिक सेवाएँ करतीं हें जिसके बदले में यजमान उन्हें विशिष्ट अवसर्यों या निश्चित अवधि के बाद भुगतान करते हैं, यद्यपि सभी जतियों इस आपसी लेनदेन में आवश्यक रूप से भाग नहीं लेठीं। उदाहस्णार्थ, तेली ऐमी जि है जो आमतौर पर विनिमय सेवाओं में महों होती। क्मीनों के यजमाव उनके अपने प58 आर्थिक अर्थव्यवस्था गाँव और अन्य गाँवों में भी होते हैं) एक कमोन अपने सेव्य के श्रति अधिकारों को दूमो कमीन को बेच सकता है। भूमिका सम्बन्धों में महत्त्वपूर्ण हैं. मुफ़्त भोजन, कपडे, आवास, लगान-मुक्त भूमि, आकस्मिक सहायता, मुकदमें में सहायता, तथा जीवन में संकट के समय यजमानों द्वारा कमीनों को सुरक्षा। यजमानी व्यवस्था सभी गाँवों में पारस्परिक (अन्योन्य) («८ए्०८४) नहीं है। कोलेन्डा (2000008, 963 -32) ने माना है कि शक्तिशाली जातियों भारत के अनेक गाँवों में इन सम्बन्धों में शक्ति सन्तुलन बनाए रखते हैं। योगद्ध सिंह (973 : 87) भी मानते हैं कि भारत के गाँव आर्थिक सस्थाओं, शक्ति सरचना और अन्तर्जातीय सम्बन्धों दी दृष्टि से बदल रहे हैं। आर्थिक परिवर्तन का प्रमुख स्रोत भूमि सुधार भी है जो बिचौलियों को समाप्ति, किराएदारी सुधार (८०००४ ?८०:घ७), चकबन्दी, भूमि पुनर्वितरण, सहकारे खेती का विकास, और भूदान द्वाय लागू किए गए हैं। इन सब उपायों से जातियों के बौच अन्तर्क्रिया, यजमानी व्यवस्था, दया ग्रामीण व्यवस्था पर प्रभाव पडा है। प्रतिमान एवं मूल्य (४०८ग्ा5 था| एबा0:5) देश के सभी क्षेत्रों में भुगतान का परम्परागत तरोका यह रहा है कि यह फसल के समय पर हो किया जाता है जब प्रत्येक भूस्वामी परिवार विविध कमीनों को नवीन उत्पादित अनाज में से कुछ हिस्सा देते हैं। परन्तु फसली भुगतान यजमान परिवार को प्राप्त होने वाले हिसे में से ही होता है। कमीन अपने यजमान पर मकान की जमीन के लिए, पशुओं के चणगाह स्थल के लिए, लकडी और उपले के लिए, औजारों के लिए तथा ऋण आदि के लिए निर्भर रहता है। इसके साथ साथ यजमान उसको कपडे और मस्कारों (६४७०७) के अवसरों पर पेंट आदि देता है और आडे वक्‍त पर ऋण भी प्रदान कर के सहायता करता है। वाइजर (५७६८४, 956) ने सत्रह विन्दु बताए हैं जो कमीन अपने यजमानों से प्राप्त करता है। हैरोल्ड गूल्ड (985 40 47) ने भी 954-55 में फैजाबाद (उत्तणदेश) जिले के गाँव शेरूपुर में यजमानी प्रथा के अध्ययन के दौय्न यजमानों बन्धर्तों में इन्हीं बिन्दु को महत्तपूर्ण पाया। इनमें से कुछ विचारणीय बिन्दु हैं. मुफ्त आवास स्थल, परिवार के लिए मुफ्त भोजन, मुफ्त उपले, बिना किराए का मकान, कर्ज सुविधाएँ, पूरक रोजगार के अवसण, उपकरणों एवं पशुओं का मुफ्त प्रयोग, मुफ्त खालें, मुकदमें में मदद, अन्तिम संस्कार के समय लकडी, और कच्चे माल का मुफ्त श्रयोग, आदि। हैरोल्ड गूल्ड ने पुस्जनों की सेवाओं के बदले यजमातों द्वार किए जाने वाले भुगतान की दर का भी अध्ययन किया। उदाहएणार्य, 954-55 में एक ब्राह्मण को फसल काटने के समय एक परिवार से 5 किलोग्राम अनाज मिलता था, कोरी (जुलाहा) को 45 किलो अनाज और 20 रुपये प्रति माह प्रति यजगात, कुम्हार, नाई और लोहार को 8 किलो अनाज प्रति परिवार भ्रति फसल, और धोबी को अति परिवार प्रति फसल 4 किलो अनाज मिलता था। सेवित गाँवों में सभी यजमानों से प्राप्त्एक कमीन परिवार की अनाज की आम का उदाहरण देते हुए हैरोल्ड गूल्ड कहते हैं कि अपने अध्ययन वाले गाँव में उन्होंने पाया कि (954-55 में) नाई को एक साल में लगभग 32 किलो अनाज प्राप्त हुआ। यह अत आर्थिक अर्थव्यवस्था 459 उसके 25 एकांकी परिवारों वाले 5 सयुक्त परिवारों से प्राप्त हुआ। यजमानी सम्बन्धों को अन्य भिन जातियों के साथ सम्बन्धों को लेकर गूल्ड ने देखा कि गाँव शेरूपुर में सभी यजमानों ने 2.099 किलो अनाज एक वई में सभी 'पुरजन' परिवारों को दिया। गांव में 228 लोगों के 43 परिवार थे, इनमें से केवल 9 परिवार ही यजमान थे (जो सेवाए लेते थे और अनाज देते थे)। इससे आर्थिक अच्चर्क्रिया के विस्तार का पता चलता है। कमजोर वर्ष में यजमान किसान अपने कमीनों को अधिक अन्न नहीं देता लेकिन जब उसकी फसल अच्छो होती है तब वह उन कमीनों को अधिक अनाज देने को बुग़ नही समझता, जिन्होंने उक्तकी अच्छी सेवा को हो। फ़िए भी, यदि कमीन यजमान के प्रति काम में लापरवाही करता है, जैसे कि उपकरणों की मरम्मत में या धोबी अधिक कपडे फाड लाए, तब यजमान उसे अधिक नहीं देता। इसी प्रकार कमीन भी उसी हिसाब से अपनी सेवाएँ देता है जैसा उसवो भुगतान मिलता है। एमए श्रीनिवास (955 ॥7-73) के अनुसार भी जो यजमान अनाज देते हैं वे अच्छे माने जाते हैं अपेक्षाकृत नकद भुगवान करने वालों के। यजमानों ओर कमीनों के बीच शक्ति आवटन के विषय में, बीडिलमैन (800८॥४४॥, 959) के अनुसार, सास्कारिक शुद्धि या अपवित्ञता महत्वपूर्ण नही है। निम्न जाति का व्यक्ति, भले हो वह पजमान हो, उच्च स्तर वाली जाति के कमीन से नौचा ही समझा जाता है। उच्च जाति कौ शक्ति भू-स्वामित्व तथा सम्पत्ति पर आधार होती है और कप्रोनों के पाप्त यह शक्ति नहीं होती। हेग्ेल्ड यूल्ड 0987. 73) में स्वीकार किया है, “मूल रूप से अन्तर एक तरफ भूस्वामी कृपक जातियों (जो सामाजिक व्यवस्था के अभिपति हैं) और दूपरी द्फ भूमिहीन शिल्पी व सेवक जातियों (जो उनके आधीन हैं) के मौच पाया जाता है। पोकाक (90८०००६, 963 .79) ने भी इसी प्रकार कहा है,“यदि यजमानी सम्बन्धों में व्यवस्था नही है, तो उनमें सगठन है। वे (सबंध) एक ही सस्था- उस क्षेत्र की प्रभुत्त बाली ((0फ्ंत90) जाति-के चार्से ओर व्यवस्थित हैं। यजमानों और कमौनों के लिए कर्तव्यों, अधिकारों, भुगतान तथा सुविधाओं से सम्बन्धित कुछ प्रतिमान हैं। यजमान को अपने कमीनों के प्रति सरक्षक भाव एखना पडता है देधा उनको पोणों को पूरा करना पडता है। कमीन को भी पुत्र की ठरह अपने पिता सम पजमान के प्रति व्यवहार करना पड़ता है। उसे अपने यजमान के गुटीय विवादों में उसका समर्पन करा पडता है। अजमानो प्रथा में दानशीलता और उदारता, धार्मिक कर्तव्य तथा असमानता ईश्वरीय देग समझी जाती है जो कि सास्कृविक मूल्य माने जाते हैं। पवित्र, अर्थ पवित्र और धर्म निषेक्ष हिन्दू साहित्य तथा मौखिक पस्णणँ यजमान-कमीन सम्बन्ध को अधिकृत व >गयासगत मानते हैं। जाति पचायत को गलती करने वाले यजमानों और कमोनों को दष्ड देने दो अधिकार होता है। साथ हो, मान्यताएँ यह अनुमति भी देतो हैं कि कमीन आवश्यक सैवाएं प्रदान न करे और यजमान क्‍मौन को लगान पर दी गई भूमि ले सकता है। उदाहपार्थ, यदि एक कुम्हार परिवार दूसरे के यजप्रानों में घुसपैठ का प्रयल करता है 58 कुम्हार अपनी जाहि पचायत में उप्त घुछपैठिये दो खदेड़ने वा निवेदन वस्ता है। पे गाँव के कुम्हार विश्वाप्त कावे हैं कि यजमान किस्तान उनके प्रति उदासी है तब वुम्हार 60 आर्थिक अर्थव्यवस्था लोग यजमान किसानों से नाता तोडने का प्रयल कर सकते हैं, जब तक कि किसान यजमान अपने बुरे व्यवहार को ठीक न कर लें। यजमानी व्यवस्था : एक शोषणीय व्यवस्था (गरुंपाभा। $१50॥ : #0 एडफराण॑:्बा।१ट $750ा0) क्या यजमानी व्यवस्था एक शोषणोय प्रथा है ? क्या यजमान कमोनों को थोडा सा अनाज या नकद या अन्य कुछ देकर उनका शोषण करते हैं ? बीडिलमैन (880८/४०७, 959) यजमानों को 'शोषक' और कमीन को “शोषित” मानते हैं दथा व्यवस्था को “सामन्ती” गुणों वाली मानते हैं। वह यजमानों प्रथा को उच्च जातीय हिन्दुओं के द्वारा नियन्रण, विधिमान्यौकरण, तथा शासन करने के लिए एक प्रमुख साधन के रूप में मानते हैं। इसी प्रकार ल्यूइस और बस्मौ (0४5 आ0 छेक77009, 956) के विचार से घी और प्रभावशाली यजमानों और निर्धन भूमिहीन कमीनों के बोच का अन्तर हो कमीनों के शोषण का कारण है और उन्हें शक्तिशाली और उच्च स्थान वाले लोगों के शासन में या आधीन रहने को बाध्य करता है। कुछ विद्वानों का मत है कि यजमानी प्रथा में कोई बाध्यता या प्रभुत्व वाली बात नही है। प्रथम, कमीन लोग अपनी शेजी रोटी के लिये यजमानों पर निर्भा नहीं रहते। वे अपनी वस्तुओं को बेचने और सेवाओं को उनको देने के लिए स्वत होते हैं जो उन्हें नकद भुगतान करते हैं। दूसरे, जब कमीन महसूस करते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ है तब वे अपनी जाति की पचायत करते हैं जो यजमानें को उनकी माँगों को पृ के के लिए बाध्य करते हैं। इसी प्रकार जब भूस्वामी यजमान ऐसा अनुभव करते हैं कि उतके किसी कमीन ने काम में कोताही की है या यजमान के पद और गरिमा को ठेस पहुंचाई है या चुनौती दी है, यजमान परिवार मिलकर उनके भुगतान शेक कर या अन्य भ्रकार से उन पर दबाव डाल सकते हैं। फिर भी किसी भी तरफ से सामूहिक कार्यवाही सम्पूर्ण जाति के हितों को प्रभावित नही करती। जातीय एकता यजमानी समूह के प्रति निष्ठा से कही ऊपर होती है। तृतीय, यजमान अपने कमीनों से पैतृक तरह से व्यवहाए करते हैं और उनके सकट में सहायता करते हैं। थे, यजमानी नियम इतने लचौले होते हैं कि उनका अर्थ किसी भी प्रकार से लगाया जा सकता है और सेवा प्रवन्धों में परिवर्तन किया जा सकता है। प्रत्येक यजमानी सम्बन्ध में निश्चित समय पर न्‍्यूनदम मापदण्ड बनाए रखे जाते हैं। अन्तिम, उच्च जाति के सदस्य दूषित व विशिष्ट कार्यों से बचना चाहते हैं। अत. उन्हें उन परिवारों पर निर्भर रहना पडता है जो उन्हें वॉँछनीय सेवाएँ व वस्तुएँ प्रदान कें। यजमानी आदानअदान आपसी लाभकारी समझते हुए वे अएने कमीनों को अनर्गल मॉगों को भी कभी-कभी सह करते हैं, जैसे कि कमोन अपने यजमानों का दबाव सहन करते हैं। अत यजमानी अया को शोषणात्मक समझना अतर्कसगत होगा। ग़व (9), कोलेन्डा (06०89, 963 * 2-29), ओरेन्सटीन (07ट८४(४७, 962) और हैपेल्ड गूल्ड (87०0 6०१, 7988 की भी यही मान्यता हे कि यजमानो व्यवस्था को निर्दयी शोषणात्मक कह कर निन्‍्दा कसा चौंकाने वाला शौप्रता में किया हुआ सामान्यौकरण है। हैरोल्ड गूल्ड (987 ; 76-77) कहा है कि यजमानी प्रथा का ऐसा विश्लेषण जो इसे सामन्तो व्यवस्था का हिस्सा मानता अविश्वसनीय है। इस प्रथा का महत्व किसी भी आर्थिक क्रिया के सामने कम है। यह ग्रयो आर्पिक अर्थव्यवस्था ॥6 किसी तर्कयुक्त आर्थिक प्रेरक (808५90075) के कारण टिकी हुई नहीं है बल्कि सामाजिक स्थिति तथा उस सामाजिक अन्तर्क्रिया के स्वछूपों को बनाए रखने में इसके महत्व को देखते हुए भी जो कि ग्रामीण हिन्दूवाद के सफल अभ्यास के लिए आवश्यक है, टिकौ हुई है। अजप्रान प्रमुख रूप से आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से समासता वाला (#०४8०७०७८००७) समूह नही है, बल्कि यह वो एक धार्मिक-आर्थिक समूह है जो भारतीय सभ्यता में विशेष रूप मे समाहित है। यजमानों और सेवादारों के बीच का बन्धन समान धार्मिव-आर्थिक सम्बन्धों का लाभ उठाना है, न कि समाज में धन व शक्ति के स्रोतों में समान सम्बन्धों का। अत यह स्वीकार किया जा सकदा है कि यजमानी प्रथा में यजमान को स्थिति न तो जमीदार वर्ग के साथ और न ही प्रभुत्व सम्पन जाति के साथ मिलती है और न ही यह विसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्यता पर निर्भर करती है, बल्कि यह तो भूमि के स्वामित्व, या किसी भी साधन से भूमि से प्राप्त उत्पादन पर निर्भर रहती है। मेयर (960), माथुर (958) और पोकाक (963) ने भी माना है कि कृषि भूमि तक पहुँच भारत में हमेशा जाति-मुक्त (०४७४८ ६०) रही है जिसका अर्थ है कि यजमान स्थिति कौ कुछ समानता बनाए रखने के सामान्य साधन श्रेणोक्रम (7८:४7८79) में किसी भी जाति के सदस्यों के लिए सदैव उपलब्ध रहे हैं। हेरोल्ड गूल्ड 0987 ॥77) का अनुसरण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यजमानीं को (सामाजिक वर्ग के रूप में) शोषक की दृष्टि से नही देखा जा सकता। ज्यादा से ज्यादा यह कहा जा सकता है कि यजमानों द्वारा कमीनों को दी जाने वाली राशि वर्तमान में कम है जिसके कारण वे अन्य साधनों से नकद आय दूढने के लिए बाध्य होते हैं। दूसरी ओर, यजमान की स्थिति (पुरानी सामाजिक व्यवस्था में भी) केवल पूमि के आपार पर कुलीनता तक कभी भी सीमित नही रही | दूसमे जाति के लोगों को भी पजमान बनने के अवसर प्राप्त थे। लेकिन यजमान होना और वर्तमान प्रभावशाली राजनैतिक व्यवस्था का हिस्सा होना स्वत साथ-साथ अन्तिम पड़ाव नही थे। राजनैतिक श्रेणोक्रम की सदस्यता उस शक्ति और भौतिकवा को प्राप्त करने का जिसे वह यजमान होकर प्राप्त कर 5१४ था, केवल एक सापन मात्र था। यह कोई एकान्तिक सापन (:ऋ०0घ४७ 765) धा। 'यजमान होने का अर्थ था एक रूदिवादी हिन्दू होना जिसका मूल्य व्यवस्था में कुछ विशेषज्ञों (सेवक जातियों) के साथ सम्पर्क बनाना आवश्यक था। जमीदार होने का मतलब होगा था शासक वर्ग का होना (व्ऋ०6 6006, 987 85)। यजमान कमीन का शोषक नहीं था यद्यपि जमीदाए 'शोषक' हो सकता था। 'यजमान' बनने को इच्छा होना "सामन्ती स्थिति' या 'कमजोरों के शोषण की ओर झुकाव' का होना नहों है मल्कि कुछ जिजों का पालन करने और अपवित्र जीदन से बचने को इच्छा है। यजमानी प्रथा में परिवर्तन (09065 [5 _भंपा2रण 5:587) यजमानी व्यवस्था का जाति व्यवस्था, पार्मिक व्यवस्था, भू-स्वामी व्यवस्था, नातेदारी व्यवस्था और गांव के राजनैतिक वर्तमान में इन सभी व्यवस्थाओं में आने वाले परिवर्तनों ने यजमानी व्यवस्था कौ कार्यप्रणाली को भी प्रभाविव किया है। विगत पाँच या छ दशाब्दियों में यजमानी अथा को प्रभावित करने वाले प्रमुख परिवर्तन इस प्रकार हैं. गांव के बुजुर्गों की 62 आर्थिक अर्थव्यवत्ता पंचायत को शक्तियों में कमी, कमीनों द्वाय की जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता पर फैक्टरी तथा औधोगीकरण का प्रभाव, जाति प्रथा की सख्तियों में शिथिलता, शिक्षा का प्रसार, मध्यम और निम्न जातियों के लोगों का भौतिक सुविधाओं और नौकरी की तलाश में शहरों की ओर अ्द्रजन, जागीरदारी प्रथा का उन्मूलन, भूमि सुधारों का लागू होना, शहरी क्षेत्रों में अच्छा रोजगार मिलना, आधुनिक यातायात की सुविधाओं के उपलब्ध होने के कारण बाजार के लेनेदेन में सुविधा, आदि। इन सभी कारकों के कारण अनेक गांवों में यजमानी प्रथा या वो कमजोर हो गई है या समाप्त हो गई है। शिल्पियों को अपनी चीजों के बदले में नकद मूल्य अधिक अच्छा लगता है। जिन किसानों के पास पैसा है वे बाजार से अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुएँ खरीदना अच्छा समझते हैं। प्रभुत्व वाली जातिया कमीनों से समर्थन लेने की अपेक्षा राजनैतिक सहायता लेना अच्छा मानते है। यह कोई आश्चर्य नही है कि वर्तमान में यजमानी प्रथा काफी कमजोर पड गई है। इशवती कर्वे और वाईबी डामले (963 :5-52) ने महाराष्ट्र के पाँच गाँवों में 4962 में किए गए सर्वेक्षण में दो-तिहाई उत्तरदाता 26 में से 222) और बोस और जोघा (965 8-23) ने 80% उत्तरदाता (29 में से !), (4963 में पश्चिम राजस्थान के बाड़मेर जिले में सर्वेक्षण में) यजमानी प्रथा के पक्ष में पाए। इसके मुख्य कारण थे आर्थिक लाभ, कर्मकाड सेवाओं की उपलब्धि, अपने गुटीय सो मे कुछ परिवारों या जातियों के भूस्वामियों का विश्वस्त सहयोग लेना, आपात काल में अपने सरक्षकों का सरक्षण प्राप्त करना, आदि । सत्य यह है कि हाल के वर्षों में यजमानी सम्बन्ध बहुत कमजोर हो गए हैं। अब गाँव की अर्थव्यवस्था यजमानी लेने-देन पर नहीं चलती। किलर भी इस मत के हैं कि इसमें सन्देह है कि यजमानी प्रथा भविष्य में रहेगी भी या नहीं। आर्थिक विकास इसके निर्धारकक और सामाजिक परिणाम (ए९णा०्जार ऐशफल०्फ॒ुणथा : 765 ऐश॑लशफाउउत्रांड 00 502८॑4॥ 0005९९०००९७) आर्थिक विकास के समाजशासत्रीय अध्ययन में समाजशाख्लीय औचित्य के कुछ प्रल इस प्रकार हैं आर्थिक विकास क्‍या है ? आर्थिक वृद्धि कैसे शुरू होती है ? आर्थिक विकास के लिए किस प्रकार के मूलभूत ढोंचे की आवश्यकदा होती है ? आर्थिक परिवर्तन के तिए पूर्व दशाएँ क्या होनी चाहिए और इनको किस प्रकार उत्पन्न किया जा सकता है ? क्या उव कारकों को जो आर्थिक विकास को गति प्रदान करते हैं पहचाना जा सकता है २ वेग आर्थिक विकास के बोच आने दाली सामाजिक दथा सास्कृतिक रुकावर्टों पर विजय अ्राप्त बी जा सकती है और इसकी गति में वृद्धि की जा सकती है ? आर्थिक विकास के सामान परिणाम क्‍या हो सकते हैं ? आध्थिक विकास के विकार्यात्मक (9्जिणा०ण४) प्षों कैसे रोका जा सकता है ? आर्थिक विकास क्या है (जशब4 45 ॥-८णा०्णाट ऐ९एश०्फ॒णाथा ?) विस्तृत अर्थों में, आर्थिक विकास को “किसी भी खोत से वास्तविक आय में प्रति वर्क वृद्धि” के रूप में देखा जा सकता है (२0७क। एक्ष०६, 964 : 889) । बैच (880 467) ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है : “अर्वव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं कें कर आईिक अर्थव्यवस्था 63 उत्पादन में वृद्धि ही आर्थिक विकास है ।” डैविड नोवाक (03फ्ञ0 ॥ए०४४०८, 964 - 5) मे आर्शिक विकास को एक पुणनी परिधाषा के सन्दर्भ में समझाया है “यह प्रति व्यक्ति बस्तुओं और सेवाओं के उपभोग में निरतर ठोस वृद्धि है।” आर्थिक वस्तुओं का ठोस उपभोग तभी सम्भव है जब आर्थिक वस्तुओं का ठोस रूप में उत्तादव हो और छोप्त उत्पादन आजकल अधिक तकनीकी उपयोग पर निर्भर करता है। सकुचित अर्थ में, यह कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास का अर्थ है : “आधिक वस्तुओं के उत्पादन और विवरण में निर्जाव शक्ति व अन्य तकनोकियों का विस्तृत प्रयोग” (२०७८४ एड, वही, 889) | इस अर्थ में व्यावहारिक दृष्टि से आर्थिक विकास केवल औद्योगीकरण ही है सही नहीं होगा क्योंकि उत्पादन में शक्ति और अन्य वकनीकियों के प्रयोग के साथ-साथ इसमें श्रम गतिशीलता, विस्तृत शिक्षा पद्धति, आदि भो शामिल हैं। जेफ और स्ट्वर्ट (86 20 56४४४) जिन्होंने विकास को आर्थिक उत्पादन के पुक्तीकाण (730079॥59000) के रूप में वर्णन किया है, उन्होंने विकप्तित और कम विकसित देशों में ट्विमाजन (0॥:00०7५) किया है, जिसका आधार हैं प्रति व्यक्ति आय तथा कुछ अन्य कारक, जैसे उच्च शिक्षा स्तर, लम्बी अवधि के जीवन की जन्म के समय आकाक्षा, निम्न उर्षरता ((७॥॥9), कृषि में सलग्न श्रम शर्क्त्रि का अनुपाव, और प्रति व्यक्ति बिजलौ का उच्च उत्पादन, आदि | इसके अतिरिक्त इस वर्कीकरण में हम एक वीसरों श्रेणो भी जोड सकते हैं--वे देश जो विकप्तित और कम विकसित देशों के बीच हैं, अर्थात्‌ विकासशील देश। प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, और पश्चिमी यूग्रेप के देश (इटली, फ्रास, जर्मनी, इग्लैण्ड) विकप्तित देश माने जाते हैं। दूसरो ओर, दक्षिण अफ्रीका, मेक्सिको और दक्षिणी तथा पूर्वी यूरोप के अधिकतर देश विकासशील देश है। भारत भी प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विकासशील देश है। जेफ और स्ट्ूवर्ट ने कहा है कि उपरोक्त सभी विशेषताओं (विकसित देशों कौ) को प्राप्त करने के लिए आर्थिक विकास के हर क्षेत्र में परिवर्तन आवश्यक हैं। परन्तु राबर्ट फैरिस का विश्वास है कि यह निष्कर्ष (कि आर्थिक विकास के लिए हए चीज को तुस्‍न्‍त श्राप्त कल न्याय सगत नही है। उसका मानना है कि यद्यपि इसका (आर्थिक विकास का) निकटतम माप भ्रति व्यक्ति कौ वास्तविकता आय में वृद्धि से लिया जा सकता है, लेकिन अन्य परिवर्तन आवश्यकदा के स्तर पर निर्भर करेंगे आर्थिक विकाप्त के तिर्धार्त तथा रुकावटे (एलधराणांपज्ा। णैं गत फिक्लाएंश5 [0 20०7०कांट एञाशाहरछ) किसी समाज की आर्थिक प्रगति में योगदान देने वाले काएक जो आमतौर पर माने जाते हैं, * प्राकृतिक ससाधन, पूजी सम्रह, प्रौद्योगिकी ऊर्जा (9०७०० के साधन, मानव शक्ति, श्रम शक्ति, जनसख्या की विशेषवाएँ और इसके आर्थिक सगठन, और साम्राजिक वाहावरण। पूवपिक्षाओं (7८८५०॥८७) वी बाव करत हुए सबर्ट फैरिस (954 - 890) ने कहा है कि आर्थिक विकास की महत्त्वपूर्ण पूवपिश्टाएं इस प्रकार हैं 6) मूल्य या विचारधाण (6०००७), (0) सस्थाएँ अथवा नियामक अन्धिया (80772406 ००फ्ाफ०६८५) यानी एक्मद से व्यवहार सवधी नियमों को स्वोकारना या व्यवहार के सामान्य रूप से अनुमोदित (+। आर्थिक अर्थव्यवत्ता प्रचलन का पालन करना, (0) संगठन (लीदिया), अर्थात्‌ क्या सरकार निजी या सार्वजनिक क्षेत्र को या दोनों को आगे बढाना चाहदी हैं, और (७) लाभ और प्रतिष्ठा सबधी प्रेरक अओव्साहन)। गुनाए मिरडल (50७ (छत) “एशियन ड्रामा” पुस्तक के तीन भागों में, जिसमें उन्होंने दक्षिण एशिया के देशों कौ गरीबी और विकास का विश्लेषण किया है, विकास को प्रभावित करने दाले छ महत्त्वपूर्ण कारक बताएं हैं (968 942) : पैदावार (00५ण०ऐ ब आय, उत्पादन की दशाएँ, जीवन के स्तर, कार्य के प्रति दृष्टिकोण, सस्थाएँ व राजनीति। प्रथम तीन आर्थिक कारकों के सन्दर्भ में हैं, अगले दो गैर-आर्थिक, और अन्तिम मिश्रित श्रेणी के सन्दर्भ में हैं। मिएडल का मानना है कि आर्थिक कारक निर्णायक व महत्त्वपूर्ण हैं। मोवाक (२०९४०, 964._ 56) मानते हैं कि कम विकास के प्रमुख कारक हैं * पूजी की कमी, निम्न औद्योगिक जनसख्या, और प्राकृतिक ससाधनों की कमी। दूसरी ओर आर्थिक विकास की पूव॑पिक्षाओं में पूजी, तकनीकी गुणवत्ता और प्राकृतिक ससाधन, आदि प्रमुख हैं। उनका मानना यह भी है कि कम विकसित क्षेत्रों म आर्थिक विकास में रुकावट डालने वाले कारक हैं. () नवीनता (॥70५80०४) कौ यथेष्ट की मात्रा में कमी, (७) कृषि सम्बन्धी सुधारों में कमी, (४) अनुशासन की कमी(5४) जनसख्या वृद्धि और (४) विदेशी विनिमय ((ठटाएए ०००)काए०) की कमी । जेकब वाइनर (3८७, ॥८७॥ ॥४८)॥०७७१, 963) ने आर्थिक विकास की छ रकावर्यं को सन्दर्मित किया है। यह हैं प्रतिकूल भौदिक वादावरण, कार्यरत जनसश्छ” की निम्न गुणवत्ता (09 १0०॥५9), तकनीकी ज्ञान की कमी, पूजी की कमी, जनसख्या में वीढ़ वृद्धि तथा कृषि भूमि सरचना में दोष। यूरोप में प्रोटेस्टेन्ट सुधारों के कारण पूँजीवाद के उदय एवं विकास का रास्ता, समाज और उसकी सस्थाओं के दृष्टिकोण में आए परिवर्दनों के कारण खुल गया। इसी आधार पर प्रोटेस्टेन्ट नैतिकता का विकास हुआ जो कि आर्थिक विकास के लिए अनुकूल था। यूगरेप की इस घटना के विषय में लिखते हुए मैक्स वेबर ने पूजीवादी समाज की उन संस्थाओं पर बल दिया है जो पश्चिम में आर्थिक विकास से जुडी हुई हैं। ये हैं. 6) निजी स्वामिल और उत्पादन के साधनों का नियत्रण, 0) रुकावर्टे तथा सरकार द्वारा मूल्य निर्धारण, 8) गणतीय (८००॥७॥/०) कानूनों का शासन जो लोगों को पूर्व में ही जानकारी देते हैं कि आधिक जीवन में किन नियमों के अन्तर्गत वे कार्य करें। (4) मजदूरी व काम करने के लिए लोगों को आजादी, 6) पारिश्रमिक (५४७९८७) और मूल्यों (97८०) की बाजार व्यवस्था के माध्म से आर्थिक जोवन का व्यापारीकरण (&0णागाध्यणाऑष््0) ताकि उत्पादन ससाधनों (97000८५९ 7९500८८७) को क्रियाशील बनाया जा सके और उन्हें ठीक से बा जा सके । (6) पूर्वानुमान (59४८७०७७०४) और जोखिम उठाना (#-अंण्पट्टो जो पहले के सामदी समाजों में काफी अतिरोधी थे। पएन्‍तु कुछ विद्वानों ने इस विचारपाण में दोष पारहें। आर में आर्थिक विकाप्त भे बाधाएँ, (00592९5 40 ६९णाणाषंट 0श९एश०फ़राग्रध्या गे एतां3) उपरोक्त तथ्य भारत में आधिक विकास में आने वाली बाधाओं को समझने में सहायक हैं। चॉमस शी (0785 5023, 5७४ 3८३७ 'नट्खाबण्त, 963) के अनुसार, भार में चार आईिक अर्थव्यवस्था घ65 प्रमुख बाघाएं इस प्रकार हैं : जाति, भूमि पट्टेधारी (570 ।दएएा८) का तरीका (फमाव्शा), जनसख्या वृद्धि, और सम्पत्ति कानून (जिससे भूमि के अधिक टुकडे होते हैं|) एआएदेसाई (959 : 30) द्वा बदाई गई आर्थिक विकास में मूल बाघाए हैं: (७) अतीत से हस्तान्तर्ति सामाजिक ढांचा और सस्थात्मक सरचना व मूल्य (अर्थात्‌ जाति प्रथा) और (0) निष्ठाओं का अनुलम्बन (एल्यअंजला००) | यद्यपि भारत में जाति प्रथा सिद्धान्त रूप में तथा सवैधानिक रूप से समाप्त कर दी गई है, लेकिन वास्तविक जीवन में इसका महत्व, आर्थिक विकास पर इसका प्रभाव, सम्पत्ति सम्बन्धों के आदर्शों और उपभोग के वरीकों पर इसका प्रभाव, तथा सामाजिक, राजनैतिक, सास्कृतिक और आर्थिक क्षेत्रों के शक्ति के ढाँचे की सस्थिति (०००॥807%00॥5) पर प्रभाव आज भी अच्छी तरह नहीं समझा गया है, इसलिए इसको गम्भीर रूप से नजर अन्दाज किया गया है। गतिशील आर्थिक विकास के लिए अति आवश्यक लोगों को गतिशौलता को जाति रोकती है। यह कुछ समूहों को कुछ पेशे अपनाने से रोकती है, तथा आर्थिक व्यवहार के कुछ आदर्शों और उपभोग के कुछ स्वरूपों को भी अपनाने से रोकती है। यह देखा गया है कि अर्थतत्र, प्रशासन और सास्कृतिक कार्यों में अधिकतर नियत्रण करने वाले पर्दों पर सम्पूर्ण भारत में कुछ जातियों द्वार हो एकाधिकार कर लिया गया है। वाछ्तव में, समूचे देश के लोगों के भाग्य का नियत्रण कुछ जाति के लोग हो करते हैं जिससे जाति संघ, क्षेत्रीय तनाव, व सामाजिक आशान्ति उत्पन होती है। यह अशान्ति विशेषाधिकार प्राप्त समूहों के मध्य तथा विशेषाधिकार से वचित लोगों और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के मध्य सघर्ष का कारण और कहु प्रतियोगितात्मक संघर्ष को बनाए रखती है। स्वस्थ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास पर इसका विपरीत प्रभाव पडता है। सयुकत परिवार व्यवस्था, जाति (जो सामाजिक तथा पेशेवर गतिशीलता को रोकती है), साम्पदायिकता, क्षेत्रबाद और भाषावाद भारत में आर्थिक विकास में बाधा उत्पन करने वाले कारदों के रूप में पहचाने गए हैं। यह भी माना जाने लगा है कि जाति प्रथा में परिषर्तनों से ही विकास सम्भव हुआ है। क्योंकि गुन्नार मिर्डल ने जाति और परिवार जैसी सस्याओं और उनके कार्यात्मक पक्ष को विकास्त के अपने विश्लेषण में महत्व नही दिया, अत आर्थिक विकास के उनके विश्लेषण को नकाग्रत्मक, बिखर हुआ (ताश्न॒तणा८त) और पेबनदार (एभंणाए कहां गया है। एक अन्य समाजशास्त्रीय अर्थ पिछडे किस्म की निष्ठाओं के दुगग़ह से है जिससे भारतीय लोग छोट-छोटे अह के साथ समूहों और दुकडों में बंद गए हैं और जिसके कारण अति उच्च विकसित राष्ट्रीय चेवना के विकास में बाघा पडी है। कुछ निष्ठाएँ जो भारत में (जाति निष्ठा के अलावा) अति दुगग्रही हैं, वे हैं. नातेदारी निष्ठा,क्षेत्रीय पहचान, और धार्मिक लगाव। इस प्रकार के विभाजन समाज में एकता को भावना और इसके सदस्यों के बोच पहचान को भावना के विकास में बाधक हैं। ऐसे चादावरण में जो नियामक (ग्रणग्राभट) दबाव रहता है, वह बाह्य परिस्थितियों में और सम्बन्धों में व्यक्ति के व्यवहार को बहुत प्रभावित करता है। एआएदेसताई (959, 3-32) का यह भी मानना है कि पुरानी सस्थाओं के साथ साध यह सकुचित मानसिकता (एमए८४४8 77८०/॥9) विम्त कई प्रकार से उपयुक्त 66 आर्थिक अर्थव्यवस्था आर्थिक विकास को बाधित करती है 6) इससे भाई भतीजावाद पनपदा है; (॥) इससे अनुत्पादक विनियोजन के तरीकों (9॥८ा॥५ फाएा०00लए8 #ए०४॥॥९0) और गलत उपभोग के तरीकों जैसे हानिकारक प्रचलनों (४ए! 072८0८८७) का विकास होता है; (0) इससे कार्य (४०7) कुशलता, पेशे (0८७४०४७) और साघनों के जुटाने के प्रति गलव दृष्टिकोण पैदा होता है (0७) यह उन लोकरीदियों (70८७ और मान्यताओं (&आ०7०75) के विकास में बाधा उत्पन करतो है जो आधुनिक समय में विकासशील अर्थव्यवस्था का मूल हैं, जैसे, कानून पर आधारित लोकरीतियाँ और मान्यताएँ, व्यक्तिल के प्रति सम्मान, और समान नागरिकता की अवधारणा। योगेन्द्र सिंह 973) के अनुसार भारत में आर्थिक विकास में बाथक कारक नि हैं (0), सर्वोत्कृष्टता (४॥/5८८४०८४०८) (जिसके अनुसार परम्परागत मूल्यों कौ वैधता को चुनोती नही दी जा सकती), (0) पूर्णतावाद अथवा समष्टिवाद (00॥59) (जिसके अनुसार व्यक्ति और समाज (या समूह) के बीच का सम्बन्ध ऐसा है कि व्यक्ति अपने अधिकारों और अपनी आकाक्षाओं को समाज के कल्याण के सामने गौण मानता है,। जिसका अर्थ यह भी है कि व्यक्ति के ऊपर सामूहिकता का वर्चस्व होता है), (00) श्रेणीक्रम (॥४००४४०१) (जाति, पेशा और सामाजिक स्थिति का वर्गीकरण) और (59) निमन्‍दरता (०७॥४णा)) (पुर्जन्म और कर्म में विश्वास)। आर्थिक विकास में अवस्थाएँ (५७8९४ ॥0 8८०॥०ग्रांट एलचणुणशा) गेस्टो (960 4) ने आर्थिक विकास की पाँच अवस्थाएँ बताई हैं। ये हैं . 0) पर्पणात समाज (9) उत्कर्प (8० ०) कौ पूर्व दशाएँ (फ९-००घ७ा0075), (7) उत्कर्प अवस्था, (४) तकनीकी परिषक्वता की प्रेरणा, और (५) उच्च जन उपभोग (885 0०7॥णए0णण) का युग। परम्पप्गत समाज मूल रूप से कृषि सबधी समाज होता है। इसके सदस्य भाग्यवादी, अन्ध विश्वासी और अपने समुदाय से बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ (6707200) होते है ऐसे समाज में निष्ठा की इकाइयाँ परिवार, गांव, जाति या धार्मिक समुदाय होती हैं। परम्परागत समुदाय (किसान) आत्म निर्भर नही होते परन्तु बाजार के लिए शहरों पर, पर्म के लिए दर्शन पर और यहाँ तक कि सरकारों पर निर्भर रहते हैं क्योंकि समुदाय के भीतर नेवूल का विकास कम रहता है। किसानों के लिए बाहर से निर्णय लिए जाते हैं। अक्सा वे यह भी नहीं जानते कि यह निर्णय कैसे और क्यों लिए गए। यधपि वे प्रयल करते हैं लेकिन इन निर्णयों के लेने में जो उनको बाहर से प्रभावित करते हैं उनकी कोई भागीदारी महीं होती। इससे न केवल जीवन के प्रति भाग्यवादी दृष्टिकोण उत्पन होता है बल्कि बाहर के लोगों के प्रति सन्देह और नये विचारों के प्रति सावधानी भी। बाह्य जगत के प्रति अविश्वास उहें उनके पड़ौसियों से नही जोडता। यह विस्तृत (८८0८०) परिवार अपने पडौसियों वी बेइमानी से बचने के लिए एक जुट हो जाता है। परम्परागत समाज में एकता की यह एक इकाई बन जाती है। परम्परागत समाज में सौमित साथनों के कारण, विशेष कर सीमित भूमि के कारण, उत्पादन सीमित रहता है। ४ तत्पश्चाद्‌ मन्द परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस अवस्था में उत्कर्प (४४ आर्थिक अर्धव्यवत्था कहा ०९) की पूर्व शर्तें विकसित हो जाती हैं। आमतौर पर ऐसी पूर्व शर्तें किसी उनत समाज द्वारा बाह्य हस्तक्षेप से उत्पन होती हैं। इस प्रकार के हस्तक्षेप नये विचार और भावनाए प्रेरित करते हैं और लोग यह विश्वास करने लग जाते हैं कि आर्थिक विकास अच्छा भी है और सम्भव भी। कुछ लोग शिक्षा की ओर अग्रसर होते हैं तो कुछ नये नेताओं का उदय होता है और व्यापार एवं व्यवसाय जैसे विनियोजन के कुछ नये क्षेत्र दिखाई देने लगते हैं। यह सब धोरे-धरे होता है क्योंकि स्थापित मूल्यों और परम्परागत सामाजिक ढाँचे में परिवर्तम विन होता है। संस्थाओं और मूल्यों में परिषर्वन प्रारम्भ होने से पहले सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक विकास के लिए कुछ पूर्व दशाएँ मौजूद होना आवश्यक हैं। ये हैं : उद्देश्य के पति जागृति, भविष्य पर दृष्टि, आवश्यकता का ज्ञान, विविध अवसरों और भूमिकाओं कौ आवश्यकता, स्वय उठाए गए कार्यों और बलिदानों के लिए भावात्मक तत्परता और उनकी बौद्धिक अ्शस्ता और गतिशील नेतृत्व का उदय | उत्कर्ष की अवस्था में विकास के विरुद्ध अवशेध को जीत लिया जाता है और विकास एक सामान्य स्थिति हो जाती है। पूँजी सग्रह होने लगती है, उद्योग और कृषि में तकनीकी विकास होने लगता है जो अर्थव्यवस्था के आधुनिकौकरण को एक अह कार्य मानने लगता है। नये उद्योग तेजी से पनपते हैं और लाभ को अधिक विस्तार के लिए पुनर्विनियोजित किया जाने लगता है। श्रमिकों की सख्या और उनके पारिश्रमिक में भी वृद्धि होने लगती है। उत्कर्प अवस्था के बाद विकास का लम्बा समय शुरू होता है। इस अवधि में आर्थिक क्रिया के द्वार आधुनिक तकनीकी को फैलाने की मुहिम शुरू होती है। नये उद्योग अपने विस्तार और उत्पादन को दर बढाने लगते हैं। परिपक्वता की ओर इस्त मुहिम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि पहले जो वस्तुएँ आयात की जाती थी अब ये देश में ही उत्पन्न की जाती हैं। उत्कर्ष अवस्था के लगभग 40 वर्षों बाद परिपक्वता अवस्था आदी है। अत्यधिक बडे पैमाने पर उपभोग के युग में टिकाऊ (007०७)७) उपभोक्ता वस्तुओं और प्लेवाओं की ओर झुकाव शुरू हो जाता है। अमेरिका इस अवस्था से उभा गया हे जब कि पश्चिमी यूरोप और जापान ने इसका लाप्न लेना शुरू किया है। क्योंकि कोई भी देश इस अवस्था से ऊपर नहीं उठा है तो यह कहना असम्भव है कि अगली अवस्था क्‍या होगी (वही, 0-7) । कया सापाजिक परिवर्तन आर्थिक विकास का पूर्वगामी या अनुगामी होता है (0065 80069) एआवनहृ९ ए7₹९९१९2 07 एिण09 €०0ा०0फांट एल०्फाला।) एक दृष्टिकोण यह है कि आर्थिक विकास के बिना सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन सम्भव नहीं है, जब कि दूसग दृष्टिकोण यह है कि समाज के भीतर सस्याओं में होने वाले परिवर्न आर्थिक विकास को सम्पव बनाते हैं। फ्रैन्किल (व72, 5९७ 369 ०0, 963) के अनुसार आर्थिक विकास एवं सापाजिक परिवर्तन एक दूसरे पर निर्भर हैं, अर्थात्‌ प्रत्येक एक का काएण है ते दूसत उसका परिणाम। यदि हम तकनीकी परिवर्षनों के प्रभावों को बाव करें तो हमें यह गलती करने से बचना होगा कि “किसी काम को करे के ज्ञान में परिवर्तनों को “उस काम को वास्तव में 468 आर्थिक अर्थव्यवस्था करने” के परिवर्तनों से अलग किया जा सकता है। यह विचार कि तकनीकी परिवर्तन एक बाहरी शक्ति है जो समाज में दिन प्रतिदिन के स्थापित क्रियाकलापों को बदलती रहतो है, गलव सोचने के तरीके से उत्पन्न होता है। इसमें यह प्रामक विश्वास भी शामिल है कि समाज के क्रियाकलाप दो विभिन सवर्गों (८०एएआए८०७) में चलते हें : प्रथम में जानने की प्रक्रिया आती है और दूसरे में ऐसे ज्ञान को व्यवहार में लागू करना आता है। यही बात आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन के विषय में भी कही जा सकती है कि प्रथम काएक दूसरे के लिए या दूसरा कारक प्रथम के लिए कारण बनवा है। जैसा कि पूर्व में बदाया जा चुका है, सामाजिक परिवर्दन न तो आर्थिक विकास्त से पहले न बाद में आता है। दोनों ही अन्तसर्म्बन्धिव हैं। उदाहरण के लिए जब कृषि से उद्योग में परिवर्तन होता है (सीमेन्ट उद्योग, चौनी उद्योग, कागज उद्योग या स्टील उद्योग) तो इससे नये रुझानों (390/00%») एवं कर्य की नई आदतों का भी विकास होता है। यदि एक उद्योग के प्रारम्भ को कुछ यात्रिक प्रक्रिया मान लें, जिसका कुछ सामाजिक परिणाम भी होगा, तो हम यह बात नहीं देख पायेंगे कि जिसको हम परिणाम मान रहे हैं वह तो निरन्तर परिवर्तन की प्रक्रिया स्वय ही है। इस प्रकार यदि उद्योग में श्रमिकों को स्वतत्र रूप से रहने के मकान हों या पोषण के स्तर में वे किस कमी से पीडित हों, या उन्हें शिक्षा या मगोरजन की कमी हो, (जो कि नये वातावण्ण में आवश्यक है) तब यह उद्योग में परिवर्तन की प्रक्रिया का परिणाम नहीं होंगे बल्कि इनको पूण करने में असफलता के कारण होंगे। उत्पादन में वृद्धि की सीधी प्रक्रिया में भी (जैसे, सोमेनट, चीनी, कागज या स्टील, आदि) अधिकतम कुशलता प्राप्त नही की जा सकती जब तर्क उन सभी सामाजिक व आर्थिक क्रियाकलापों, जिनसे यह कार्य सम्बन्धित हों, को भी विकसित न किया जाये। वास्तव में, उद्योग प्रारम्भ भी नहीं हो सकता है जब तक कि पूर्व दृष्टिकोणों, आदतों, सामाजिक सगठवों के स्वरूप आदि में परिवर्तन न हो। एक उदाहरण और लें जिसे मात्र तकनीकी परिवर्दन माना जाये। यह मारते कि भूमि और पशुपालक समुदाय (गाँव) को उत्पादकता में वृद्धि वाच्छित है जो कि मक्खन व दुघ उत्पादों को या तो बेचने के लिये या स्वय उपभोग के लिए कभी भी प्रयास रत नहीं ऐे। यह आशा की जाती है कि यह समुदाय न केवल इन उत्पादों का स्वय उपभोग करेगा बर्कि दुग्ध उत्पादों की बिक्री से अपनी आय में भी वृद्धि करेगा। पहले तो उत्पादन में नये वरौकों, यत्नों या उपयुक्त मशीनों को मात्र शुरू करने को ही समस्या प्रतीत होगी। लेकिन ड्समें सामाजिक विश्वार्सो और टिवाजों में वृहत परिवर्तन भी निहित है। यहाँ यह विचार कला होगा कि कौन से दूरगामी सामाजिक परिवर्तन करने होंगे ताकि दकनौकी परिवर्तनों को लागू किया जा सके। आय के खोत के रूप में पशुओं का उपयोग (भूमि हाने के अलावा), समुदाय के सामाजिक और आर्थिक ढाँचे ने मूल परिवर्तन का पूर्वाभास (छा०-४०ए/0४॥00) आवश्यक है। इसमें समुदाय के सदस्यों के परम्पणगत मूल्यों पर पुनर्विचार कला आवश्यक है। इस प्रकार यह परम्पणगत विश्वासों में परिवर्तन का पूर्वानुमान है कि भूमि पा कैसे और किसके द्वार कृषि की जानी है (डियों या पुरुषों द्वारा), स्वय के लिए कार्य चाले व्यक्तियों द्वारा या दूसरों के लिए कार्य करने वाले व्यक्तियों के द्वारा। इस प्रकार मं मंधीन अभिवृत्तियों एव व्यवहार के स्वरूपों के विकास का पूर्वानुमान भी करा है जो सामाजिक और आपसी सम्बन्धों को नियमित करेंगें। इसके अलावा इन लोगों के समूह के आर्थिक अर्थव्यवस्था 69 समानान्तर उदय (छोर ०्णटाह2०१४८९) का भी पूर्वानुमान लगाया जा सकवा है जो न केवल दुग्ध उलादों से सम्बद्ध होंगे बल्कि यातायात वितरण, विपणन (ए॥:०08), और विच् और उन वस्तुओं से भी जिनको नव उत्पादकों को खसैदना यडता है या बेचना पडता है। इसके लिए एक ऐसे राजनेतिक ढाँचे को भी आवश्यकता होगी-स्पानीय, प्रान्तीय, और राष्ट्रीय भी--जो इस प्रकार की पूरक आर्थिक क्रियाकलापों की स्थापना के उपयुक्त हो । यह उस समुदाय कौ अनुमति पर भी निर्भर करेगा जो सभी वैधानिक, राजनैतिक और प्रशासनिक सस्थाओं के विकाप्त के लिए वैयार होगा जो इस प्रकार की नवीन अन्तर्निर्भर अर्थव्यवस्था में लगे हुए लोगों के अधिकारों और कर्च॑व्यों के सामजस्य के लिए आवश्यक होगा। सामाजिक समायोजन की इस लम्बी सूची का उद्देश्य यह दर्शाना है कि वढ़ चाहे कुछ भी हो जिसे हम “तकमीकी परिवर्तन' की स्ञा दे रहे हैं, वास्तव में यह समस्त सामाजिक ढाँचे के विभिन क्षेत्रों में विकास्त के निर्धारक (4०७८४म०णह) और परस्पर निर्धारित पहलुओं में से एक है। यह निश्चित करने का प्रयल व्यर्थ है कि कौत सा परिवर्तन नवाचार (७0०४०॥०४) या कारण है और कौन सा प्रभाव है। फ्रैंकिल (2890/०) ने कहा है कि जब हम एक परिवर्तन को कारण और दूसरे को परिणाम मानते हैं तब हम परिवर्तन की प्रक्रिय का विभिन दृष्टिकोणों से माज परीक्षण कर रहे होते हैं। आर्थिक विकार की सामाजिक समस्याएँ, (80000969) ?7090795 ७॥ ९९090०0४८ 00#20क्राण्शा।) सरचनात्मक परिवर्तन के बिना आधिक विकास प्रम्भव नहीं है। एचड़ब्ल्यू सिंगर (प्र ५७ इजह, 5०० व०क 'भ०५घ्ब००, ०ए ०॥, 57) जैसे विद्वानों ने स्वोकाय है कि कम विकसित देशों के आर्थिक विकास के लिए औद्योगीकरण अदि आवश्यक है। निर्धन व कम विकसप्मित देशों में 60% से 80% तक जनसख्या कृषि पर निर्भर है। उनकी राष्ट्रीय आय वधा प्रदि व्यक्त आय बहुत कम है। ऐसे में इन देशों के आर्थिक विकास के लिए दो विकल्प हैं . () मौजूदा अबल कृषि शरचना के सुधार से (अर्थात कम उत्पादकता को मौजूदा डाँचे के अन्दर ही परिवर्तन द्वारा), (॥) समूचे ढाँचे को ही बदल कर (अर्थात्‌ कृषि से हटकर ओद्योगिक विकास के द्वार)। उपरोक्त दो विकल्पों के बीच चुनाव इससे निश्चित होना है कि दोनों में से कौन सा रास्ता चुनौतीयूर्ण है। दोनों पर ही बल देना सही रास्ता है। दो प्रश्न उठते हैं. () कृषि सुधार किस भकार सस्ते ढँग से किए जा सकते हैं ? (0) मौजूदा उद्योगों वो कैसे सुधाण जा सकता है ? कृषि सुधार, भूमि स्वामित्व व्यवस्था में परिवर्तन द्वार तथा स्रिचाई को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कगकर सम्पव है। ओद्योगिक आन्दोलन विस्तृत पुन उपकाण (दत्तटा5४ उ6-०पृणएचवल्‍्ग) और पुन अवस्थान (प्श०८००७०४) कर के सम्भव है | सिंगर (पर ९७ $शहछ, ०० ५०/, 358) ने आगे कहा है कि कृषि में औद्योगिक ढाँचे में परिवर्दन में औद्योगरैकरण के मूल्य (००४७) को तीन प्रकार से कम किया जा सकता है. (0) शहरीकरण से बचकर, जिसका अर्थ होगा उद्योग को गांव में लाना दाकि यातायाद, पाती, आदि की कम माय हो। इससे शहरों को जाने की प्रवृत्ति भी वम होगी, (0) कम पूँजी वाले उद्योगों पर हो बल देकर. और (४) ऐसी विधि का उपयोग करके जिसमें श्रम अधिक और पूँजी कम लगदी हो। इससे स्पष्ट है कि किस प्रकार मौजूदा 70 आर्थिक अर्थव्यवस्था दाँचे में सुधार करना और सरचनात्मक परिवर्तन का प्रयास सम्भव हो सकता है। बिलंबर्ट मूर (एशा0टा ॥४००८, 964) ने निम्नलिखित प्रकार से सामाजिक और आर्थिक ढाँचे यर उद्योग का प्रभाव बताया है. 6) कृषि से निर्माण (दाब्घएा4८०४७०) और सेवा (६७४४०८७) की ओर परिवर्तन, (0) पेशेवार विशिष्टीकरण, (४) श्रम का विभाजन, (0) विशिष्ट क्रियाकलापों का समयोजन, (५) श्रम गतिशौलवा, (५) बैकों का सृजन (ल४०४००), (शो) बाजार का विस्तार (८८७०7) (७०) उपभोग में परिवर्तन, और (5) सामाजिक सम्बन्धों के जाल (5८४०४ में परिवर्तन। एआरदेसाई (959 27) ने भारत में आर्थिक विकास को चार समाजशास्नीय समस्याए बताई हैं. ()) पुराने सामाजिक सगठन का बदला जाना और सामाजिक सम्बन्यों के नग्रे ताने बने का उदय, 0) पुरानी सामाजिक सस्थाओं में सुधार या तिलाजलि (१४८४०४०६) और नई प्रकार की सामाजिक सस्थाओं का विकास करना, ) सामाजिक नियत्रण के पुराने स्वरूपों को बदलना या हटाना और नये प्रकार की सामाजिक शक्ति का सृजन होना, और (4) सामाजिक परिवर्तन के पुराने स्रोतों का समापन या उन पर युनर्विचार और सामाजिक परिवर्तन के लिए नये उपायों और कारकों का निर्धारण। अग्रेजों ने भारत को अल्प विकप्तित ही रखा। जो कुछ भी थोडा औद्योगिक विकास हुआ था वह उनके पूँजीवादी आवश्यकठाओं के अनुरूप ही हुआ था। भारी उद्योगों को पनपने की अनुमति नहीं दी गई थी। जहाँ ब्रिटिश लोग भारत के आर्थिक विकास को रोक रहे थे, वही वे भारतीयों के सामाजिक सगठन, सामाजिक सस्थाओं और सामाजिक दृष्टिकोण को भी विकृत कर रहे थे। परम्पणगत आत्म विश्वासी ग्रामीण समुदाय जो ग्राम पंचायत, जाति और सयुक्त परिवार जैसी सस्थाओं के माध्यम से कार्यरत था, लगभग बुरी तरह दवा दिया गया। इसके स्थान पर नवीन सामाजिक रचना, नवीन सस्थात्मक आधार या नवीन दृष्टिकोणों को स्थापित नहीं किया गया। इनके अभाव में नयी कानूनी व्यवस्था के प्रारम्भ होने से तत्कालीन प्रचलित सामाजिक सम्बन्धों में विघटन होने लगा। सहयोग और सामंजस्य का पुराना सिद्धान्त प्रतियोगिता के सिद्धान्त द्वारा प्रतिस्थापित हो गए जिससे सामाजिक ढाँवे में एक हलचल मच गई। स्वतत्रता के पश्चात्‌ सरकार ने पचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से अर्थव्यवस्था कें पुनर्निमाण का कार्य प्रारम्भ किया। आर्थिक विकास ने एक ओर तो नकायत्मक लक्षणों बाली समाजशास्त्रीय समस्याओं (जैसे सामाजिक सम्बन्धों की समस्याएँ, सामाजिक सस्याओं समस्याएँ, सामाजिक नियत्रण और सामाजिक परिवर्तन को एजेन्सियाँ) को जन्म दिया और दूसरी ओर सकरात्मक प्रकृति कौ समाजशास्त्रीय समस्याओं को भी जन्म दिया। नकागर्सर्क प्रकार की समाजशार्चीय समस्याएँ पुरानी सामाजिक सस्थाओं के बने रहने का परिणाम है जैसे सत्तावादी (॥०४४०४७737) सयुक्त परिवार और परम्परागत-धार्मिक सस्याएँ। सामाजिक नियत्रण के स्वरूपों के कारण भी समस्याओं का उदय हुआ है, जैसे अन्यविश्वां को मान्यता, सत्तावादी मानदड, (च्राकरणराआाशा गणागा5), परिवार, जाति, धार्मिक तथा अन्य रीति-रिवाज सम्बन्धी मान्यवाए (लात०्माआज इब्एथा०७७)। इसके अतिरिक्त, ये समस्याएं पुराने सासारिक दृष्टिकोण के कारण भी उठीं जो कि मूल रूप धार्मिक, भाग्यवादी और गैर जनतात्रिक था। इसके अतिरिक्त, इन समस्याओं का उदय आर्पिक अर्धव्यवस्था का अशिष्षा, बेरोजगासे, भ्रष्टाचार, जातिवाद और गरीबी से भी हुआ। सकारात्मक प्रकार की समस्याएँ औद्योगीकरण, वाणिज्योकरण और मुद्रीकरण कप 8 को नोतियों से उत्पन हुईं। औद्योगीकरण ने पुराने श्रम विभाजन को उखाड दिया है और नव अनुशासन और नव जीवन शैली की आवश्यकता वाले नये व्यवसायिक स्वरूपों को जन्म दिया है। आपुनिकीकरण-भले ही कृषि में हो या उद्योग में--ने आदमी को उसकी सामाजिक इकाई की परम्परागत प्रक्रियाओं और विधियों से तथा उस कुशलता से जो वह अपने परिवार से सोखठा था, अलग कर दिया है। वाणिज्यीकरण (८०ए्रणटाक्॑ं॥)५३४४०) ने भी असख्य समस्याएँ पैदा कर दी हैं। अब किसान और उत्पादक ([7000०८४७) नहीं बल्कि भूस्वामी और उद्योगपति तथा प्रशासक शासक समूह बन गए हैं। गांवों में भी राजनैतिक शक्ति का केन्द्र उच्च जातौय बुजुर्गों से हट कर साहकारं, व्यापारियों , जमीदारों, और अधिकारियों में हो गया है। मुद्रीकरण (07००७७००) भी अनेक समस्‍्याएँ लिए हुए है। इसके कारण उमीन के मूल्यों में बडे उतार चढाव होने का भय हो गया है, खाने कौ वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुईं है, अत्यधिक धन विश्रम पैदा हो गया है, और गैर खाद्य पदार्थों पर अधिक व्यय का खत पैदा हो गया है। इन खतरों के अतिरिक्त घन की अर्थव्यवस्था के प्रारम्भ होने से परिवार के अन्दर व्यक्ति का परमाणुकण 5० विश पकय तथा पारिवारिक सम्बन्धों का विनाश प्रारम्भ हो गया है। इस प्रकार तौनों प्रक्रियाओं ( , वाणिज्योकरण और युद्रीकरण) ने अनेक समाजशास््रीय समस्याओं को जन्म दिया है। प्रा थें आर्थिक विकास, योजना और सामाजिक परिवर्तन (६0णात्रांट 006० कक्षा, शिकराणााड बात $०ल॥ (ग्राएश ग 7709) स्ववत्रता के पश्चात्‌ भारत में आर्थिक विकास को वास्तविक क्रान्तिकारी परिवर्तन कहा जा सकता है। यह तब होगा जब हम अग्रेजी शासन को अवधि के आर्थिक विकास की तुलना दो दशकों के नेहरू युग, इन्दिग गान्धी व राजीव गान्यी की अवधि के दो दशकों, लगभग प्राढे छ दर्ष के वीपी सिंह, चद्धशेखर और नरसिंहयव की सरकारों, संयुक्त मोर्चे की लगभग दो वर्ष कौ सरकार और भारतीय जदवा पार्टी व उसके घटक साझेदारों की लगभग दो वर्ष को सरकार की समयावधि में हुए आर्थिक विकास से करें। 747 और 947 के मध्य के दो सो वर्षों के ब्रिटिश शासन काल में आर्थिक विकास % से भी कम हुआ। विकास कौ यह दए इतनी कम थी कि इसने भारत को मात्र कच्चे माल की आपूर्ति करने वाला तथा पश्विमो निर्याहों के, पट आल्छा आए बताकर एड हिए.॥ भ्ए्टीण लोगों, के स्एग्ल्ति बात्ते औद्योगिक क्षेत्र का एक छोटा भाग ब्रिटिश एजेन्सियों द्वारा ही प्रबन्धित शा। कृषि अर्थव्यवस्था में किसान जमौदार, साहूकार व जागौरदाएं के चगुल में फंसा हुआ था। बचत और निवेश बहुत कमर थे। तकनीकी निम्न स्तर की थी। पिछड़े क्षेत्र के विकास्त के क्षेत्रीय सनुलन की अवधारणा ही नही थी। भारत के निर्माण के लिए विदेशों पूजो भी उपलब्ध नहीं थी। कम आय से कम बचत होतो है, जिससे निवेश भी कम होता है, जिससे कम वृद्धि और फिर बरी कम आमदनी होती है। उपनिवेशवादी युग में मरैबी के कुचक्र तथा अनन्त चक्र का सिद्धान् विल्कुल उपयुक्त बेठता था। स्वतत्रता के परचात्‌ नयी स्कार का दोहंण कार्य हो गया ठपनिवेशवादो 72 आर्थिक अर्थव्यवत्था अर्थव्यवस्था को खत्म करा और इसके स्थान पर आधुनिक, स्वाधीन और आलनिर्ष आर्थिक व्यवस्था का आधार खडा करना। देश की आधुनिक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय स्वरूप--समाज का समाजवादी स्वरूप--955 में काग्रेस के अवाडी अधिवेशन के तैहरू युग में) और 969 में बगलौर अधिवेशन (ईन्दिरा गराधी समय में) के घोषणा पत्र द्वार प्रदार किया गया। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि 950, 960, 970 और 980 के चार दशकों में नेहरू के समाजवादी आद्ों ने हमारी अर्थव्यवस्था को सुधार, यद्यपि एक ऐसी विचारधारा के लोग भी हैं जो नेहरू आदश्शों की ताइवान, हागकाग, सिंगापुर, दक्षिणी कोरिया के आर्थिक विकास से तुलना करते हैं और अब इसमें दोष बदाते हैं। अब हमोरे देश में लाखों की सख्या में आधुनिक औद्योगिक उद्यम हैं जबकि पहले मुझीभर ही थे। हमारे पाप तकनीकी और उद्यमी कुशलठाओं का भण्डार है, हमारे पास भिलाई और राउरकेला जे भव्य योजनाएँ और होराकुण्ड जैसे बडे बान्ध हैं, विकासशील विश्व में हमारी बचत वी दा ऊँची है, (/999-2000 में हमारी विकास की दर 5 8% वार्षिक थी), निर्यात में निर्तर वृद्ध हो रही है, अप्रवासी भारतोयों (धार) को जमा राशियों में बीस गुणा वृद्धि हुई है अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अद्वितीय विश्वसनीयता में वृद्धि हुई है, और गरीबी रेखा से जे जनसख्या में कमी हुई है 972-73 को 5% से 998-99 में 37% रह गई है, जैसा कि जलकडवाला समिति की सिफारिशों को स्वीकार करने के बाद सरकार ने दावा किया है)। यह भी सत्य है कि हम मुद्रास्फीति और अत्यधिक कर्ज की समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। व्यापए घाटे का शेष बहुत अधिक है और बजट घाटा तो अं में हैं। नरसिहराव वी सरकार ने 99.92 में समाजवादी स्वरूप की अवहेलना कौ और उदारीकरण, बाजारीकरण तथा निजीकरण के दर्शन पर आधारित पुनर्गठित नीतिं प्राप्ण की (जो अब नेहरूवादी पूंजीवाद कहा जाता है) जिसके विषय में काम्रेस सरकार ने दावा किया कि इस निति ने हमारे आर्थिक विकास में वृद्धि की। उस समय की सरकार मानती थी कि इस नये अरतिदर्श का मूल तत्व यह था कि यह राज्यों और निजी उद्यमियों दोनों को पो दिलाता था और बहु प्रजातत्र तथा मिश्रित अर्थ व्यवस्था दोनों के प्रति अदूट विश्वास वी बनाता था। सयुकत मोर्चा सरकारों तथा भारतीय जनवा पार्टी ने इस नीति को जारी एव अप्रेल, 992 में काप्रेस के तिरूपति अधिवेशन में एक नयी विचारधाय वाला प्र (2०087) अपनाया गया जो केद्ध के बायें से केद्ध के दायें की ओर (ली रण प्टाए/ 0 गहा। ० ०0८) परिवर्तन से सम्बद्ध था। यह नेहरू के नाम पर नेहरू वी की तरकीब थी। इसके मुख्य बिन्दु थे विभिन क्षेत्रों में राज्य सहायता में कदौती, (कृषि 7 सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी), लाइसेंस व परमिट राज की समाप्ति, प्रस्थान नीति (र्ण 70००) का समार्म्भ, बहुरा्टीय निगर्मो के लिए देश को मुक्त करना, आयाद नियवर्ों हटाना, और सार्वजनिक क्षेत्र को मात्र नौकरी दिलाने वाली एज़ेन्सो जिसमें काम न क नैतिकता होती है,न मानना। इस प्रकार सुर तो समाजवादी ही रहा पस्नु नीतियों में मे तत्व पूजीवादी बन गये। ऐसे विद्वान भी हैं जो यह विश्वास नही करते कि नव उदारवादी आर्थिक नीवि व में भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवन प्रदान करेगी। उनकी मान्यता है कि हर अर्थव्यवस्था को आयात को नियत्रिव करके, निर्याद को प्रोत्साहन देकर, कर व दि आर्थिक अर्थव्यवस्था ॥73 कर के, सार्वजनिक क्षेत्र को नौकरशाही से मुक्त करा कर, काले घन को उजागर करके, रक्ाखच्ों में कटौती करके, प्राकृतिक ससाधनों के दोहन की ओर अधिक ध्यान देकर, वस्तुओं के लिए वृहद्‌ बाजार सृजित करके, भूमि सुधाएं में क्रान्दिकारी सुधार करके, पुनर्जीवित किया जा सकता है। ये विद्वान यह भी मानते हैं कि देश को बाह्य कौ बजाय आन्वरिक उपायों पर निर्भर रहना चाहिए। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह माना जा सकता है कि आर्थिक विकास-नेहरू आद्शों एवं उदाय्वादी आदर्शों दोनों से--ने हमारी सामाजिक सरचना को वाच्छित दिशा में प्रभावित किया है। अपने समाज के मूल्याकन के लिए भले ही हम कोई प्रारूप अपना लें, विकासात्मक प्रारुप (विभिन्‍न अवस्थाओ में समाज के उद्विकास का आकलन करके) संघर्ष प्रारप (पततिस्पर्धा और शक्ति के लिए निरन्तर सघर्ष पर बल देकर), कार्यात्मक प्रारुप (सामाजिक ढांवे में प्रत्येक सस्थात्मक प्रचलन का सभी अन्य तत्वों पर परिणाम का विश्लेषण करके) आदि;:-यह दो स्पष्ट रहेगा कि सामाजिक सम्बन्धो के तन््र में, सामाजिक संस्थाओं में, सामाजिक व्यवस्थाओं में, सामाजिक ठाँचे में और सामाजिक प्रतिमानों में परिवर्तन हुआ है | अब भारत के लोग उतने रूढिवादी नहीं है जितने कि अर्ध शत्ताब्दि पूर्व हुआ करते थे। थे उन नैतिक आदर्शों और सामाजिक मूल्यों से दृढ़ता से चिपके हुए नही है जो अतीत से उनको प्राप्त हुए हैं। लोग व्यक्तिगत रूप से वैयक्तिक स्वतत्रता और सामूहिक सुरक्षा के लिए प्रयलशील हैं। उनके विचारों और दृष्टिकोण में भी परिवर्दन आया है। वे नये अनुभवो को प्राप्त कने की इच्छा रखते हैं। उनमें न केवल प्रौधोगिकी ज्ञान का अनुकरण करने की उत्सुकता है बल्कि अन्य समाजों से सास्कृतिक तत्वों के अनुकरण की भी है। उनमें नवाचाएं (४॥00300॥9) के प्रतिं भी रचनात्मक जिज्ञासा है। वे नवाचारों को स्वीकार काने और सामाजिक परिवर्तन के परिणामों से नही डरते हैं। वे गरीबी, भेकारी, भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति, भाई-भतीजावाद, आतकवाद, जातिवाद और श्षेत्रवाद की समस्याओं के समाधान में असफल होने के लिए उत्तरदायी शक्ति सम्पन्न अभिजात वर्ग का विशेध कर सकते हैं और उनके विरुद्ध आन्दोलित भी हो सकते हैं, तथापि वे जानते हैं कि भारत में सामाजिक व्यवस्था कभी भी असन्तुलित नहीं होगी। भारतीय सस्कृति, जिसमें विविधता है, न केवल जीवित रहेगी बल्कि विकप्तित भो होगी। आर्थिक विकास के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक सरचना और साप्ताजिक व्यवहार को विकास के बिन्दु एवं निर्देश प्रदान करता रहेगा--परम्पपागत एवं सक्रमणकालोन ([0द्म007) | आर्थिक असमानवाएँ (5000० धध्वृण्भ(९5) यह पहले ही बताया जा चुका है कि गरीबी और असमानदा एक नहीं है। एक धनी व्यापारी और एक आएम से रहने वाला कालेज/युनिवर्सिटो व्याख्याता भौतिक रूप से असमान लेकिन व्याज्याता गरीब नही है। सामाजिक असमानता का अर्थ है कि कुछ व्यक्तियों दा समूहों के पास दूसरों से अधिक भौतिक ससाधन हैं। गरोंबी में व्यक्ति या समूह के भौतिक संसाधनों में अपर्याप्तता निहित है। “गरीबी” कौ अवधाएणा के विषय में ययेष्ट अप्तहमति है। क्या आज के युग में टीवी अथवा रेडियो न रख सकता गगयेबो है? क्या इच्चे को अच्छे स्कूल में न भेज पाना गयैबी है ? कुछ लोग इन स्थितियों को गरौदी में पा4 आर्थिक अर्थव्यवस्था शामिल करते हैं, लेकिन अन्य लोग यह मान सकते हैं कि ऐसी स्थितिया गरोबी की अपेक्षा असमानता में शामिल की जानो चाहिए। भनी वर्ग द्वारा गरीबों के शोषण को अमीरें और गरीबों के बीच असमानता कम करके रोका जा सकता है जो कि पुन आधिक सुधारों के द्वार गरीबी कम करने पर निर्भर करता है। यदि आर्थिक सुधारों के द्वारा अर्थव्यवस्था में स्थाई व निरन्तर विकास होता है (जे कि वास्तविक मुख्य उद्देश्य है), तब गरीबों को दो प्रकार से लाभ हो सकता है। मय, अनुभव यह बताता है कि विकास (विशेष रूप से कृषि विकास) गरीबों की ओर ध्यान देवा है। दूसरे, स्थाई विकास ऐसा वातावरण है जो समग्र रूप से गरीबों को शक्तिशाली बनते के लिए अनुकूल होता है। रोजगार के अवसरों में विस्तार, शिक्षा प्रसार, व्यावस्तायिक गतिशीलता में वृद्धि और उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त कर लेने के कारण गरीबों वो अधीनस्थ रखने वालों पर गरीबों कौ निर्भरता कम सकटपूर्ण हो गई है। गरीब लोग राजनैतिक कार्यवाही के लिए भी गतिशील होंगे क्योंकि घृष्टतापूर्ण (४०६9020०) विचाए, उनका विशेध करने वाले समूहों में गरीबों के साथ समायोजन करने की प्रेरणा देता है। यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि अब तक के किए गए आर्थिक सुधारों से स्थाई विकास में निश्चित रूप से सहायता मिली है। फरवरी 2000 ई में ससद में प्रस्तुत किए गए आर्थिक सर्वेक्षण ने यह दर्शाया है कि यद्यपि विकास पर्याप्त नही हुआ है, लेकिन फिर भी आँकडें बताते हैं कि गत एक दशक में हमने अच्छी प्रगति की है। जीडीपी का विकार ऊपर उठ रहा है। उद्योग में भी विकास दर की वृद्धि हो रही है! 999-2000 में कृषि उत्पादन 40 लाख टन कम हुआ। निर्यात विकास में वृद्धि हुई है। इस प्रकार यद्यपि सुधार हो रहे हैं तथापि कई सहायक उपायों की आवश्यकता है ताकि प्रभाव अधिक सके । नीति निर्माण प्रक्रिया पर आधिपत्य जमाए समूहों को सकोर्ण हितों के पौछे दौडना बद करना होगा और अधिक विस्तृत समाज के लिए काम करना होगा। असमानता और गरबी के मोर्चे पर सफलता तभी मिल सकती है जब गगैब भी नीति निर्माता समूहों के साथ चने के लिए शक्तिशाली राजनैतिक आवाज बुलन्द कर लें। आय असमानता के कारण (०5९5 06 हञाएणा6 पाध्वुप॥आ) हमारे देश में आर्थिक विषमता के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कारण बताये जा सकते हैं 4... सरकारी नीति (60 0ए८४/ 7०00.) - आयकर उच्च शिखर 50% से 20% क्र दिया गया है। कर नीति को प्रगतिशौल ([7087८8४००) (अमीरों पर थोडा ऑर्षेक कर डालकर से प्रतिगामी (/87८5अ४७) के स्तर तक कर दिया गया है (कम समन लोगों को अपेक्षाकृत अधिक कर सीमा में लाक0। 2. उदारादी नीति (886 तर 7:00०्७7)- स्वतंत्र बाजार असमानता में वृद्धि करता है। 99। से नर्रसह राव सरकार द्वारा और बाद में चार गैर कप्रेसी सस्कां द्वार अपनाई गई उदारवादी नीति ने असमानता में अत्यक्ष योगदान किया है। 3... बढ़ती हुई बेरोजगारी (हब (4८० 00680 _ गत 2-3 दशकों में देश 3 बहुत कम औद्योगिक विकास हुआ है। के थेत्र में भी नौकरियों की कीं आर्थिक अर्थव्यवस्था पड अनुभव की गई है। इसने बेकारो, असुरक्षा और असमानता में वृद्धि की है। 4... उच्च वेवन प्राप्त कर्मचारियों के वेवन में वृद्धि (#०९कक>ह का ण मक्ञ-यवाव॑ &09॥0/265)- उच्च वेतन पाने वाले कर्मचारियों के वेतन (पचम वेतन आयोग की सिफारिशों के पूर्व और पश्चात्‌) में समप्र (३55०७०७) अर्थ में न्यू वेतन भोषी 080 के बेतन से कही अधिक वृद्धि हुई है। इससे भी असमानता में वृद्धि हुई । 'राज-सहायता (सब्सिडी) सरकार सब्सिडी पर इतना अधिक व्यय क्‍यों करे ? फरवरी 999.2000 में सरकार मे उर्वरकों, खाधाननों और रसोई गैस पर सब्सिडी में कटौती करके 2,000 करोड़ रुपये से भी अधिक को बचत की थी। यदि सरकार अपने घटक सझ्ेदाएों के दवाब के सामने न झुकती और आशिक रूप से सब्सिडी का सहारा न लेती तो लगभग 4000 करोड़ रुपये की बचत होती। वर्ष 2000-200! के बजट में भी सरकार ने जो मिट्टी के तेल, स्सोई गैस, गसायनिक खादों, चौनी और गेहूँ पर सब्सिडी घटाई, उसे वापस्त लेने पर सरकार पर बहुत दबाव रहा धा। आम जनता का कहना था कि मिट्टी के तेल और उर्वरक़ों पर सब्सिडी वापस लेनी चाहिए। सरकार की मान्यता है कि ऋण लेकर सब्सिडी बादना ठीक नहीं है। जनता का कहना है कि जम्बों मत्नीमण्डल न बना कर, भ्रष्टाचार को नियत्रित करके, मत्रियों की अनेक सुविधाएँ समाप्त करके, सरकारी कर्मचारियों को बोबस व अन्य कई भत्ते व रियायतें खत्म करके, विदेशी निवेशकों को अनेक प्रकार की छूट देने की प्रथा को खत्म करके रुपया बचाया जा सकता है। एक तरफ सरकार पूजी पर राज-सहायता देती है जिससे उद्योगपति अधिक मशौनें लगा कर श्रमिकों की सख्या कम करते हैं। उनके बेगेजगार होने पर सरकार उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ता गेहूँ, चावल, आदि मुहैया करादी है। अत पूजी पर सहायता देकर समस्या उत्पन की जातो है और फिर श्रमिकों को सब्सिडी के द्वाग समस्या का निवारण किया जाता है। ऐसी स्थिदि क्यों ? अत यह ही कहा जा सकता है कि हर प्रकार की सब्सिडी समाप्त करनां, कुछ उपयुक्त सार्थक सब्सिडी लगाना, रजशाही पर नियत्रण, अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर ले जायेगा। यह अनुमान है कि उच्च रिक्षा, खेल और कला पर गैर-योग्यता सब्सिडी में कयौदी करके, जल आपूर्ति व सफाई पर सब्पिडो कम करके, सिंचाई पर शुल्क में वृद्धि करके (वर्तमान में रयी और खग्ेफ की फसलों के लिए सिंचाई के पानी पर 75 रुपये से भी कम प्रत्रि हेक्टेयर की दर से शुल्क लिया जा रहा है) राज्य विद्युत बोर्ड के सब्मिडी को खत्म करके, सरकार लगभग 9,000 कंग्रेड रुपये तो दत्काल और 30,000 करोड रुपये चार वर्षों में बचा सकतो है (दाह 72०८४, 0०७, 45, 999 39) | उर्वरकों पर सब्सिडी जो 976-77 में 60 करोड रुपये थो वह 909-2000 में बढकर 43.250 करोड रुपये हो गयो (786 फशबखात्य गाक्ाठ, खैजा।ं 3, 2000)। कुछ राजनैतिक दलों का एतगज है कि गरीबी रेखा से मौचे गरीब लोग रसोई मैस का प्रयोग नहीं करते। सार्वजनिक वितरण प्रणाली दाग सस्ते दामों पर गगेबों को दिया जाने वाला खाद्यानर गरोबों तक केवल अल्प परिमाण में हो पहुचता है। पॉंच सबसे गरोब और विमारू (छ"#२ए) शज्य (बिहाए, मध्यअदेश, आसाम, राजप्यान और उच्चप्भदेश) पीड़ो एस व76 आर्थिक अर्थव्यवस्था (४09) आपूर्ति का मुश्किल से 0% ही अ्राप्त करते हैं। अत यह सबसे अच्छा अवसर है कि सब्सिडी में कटौती कर दी जाये और !,40,000 करोड रुपये या 4% जीडीपी जो सब्सिडी पर खर्च की जाती है, बच जाये और वित्तोय घादय कम कर लिया जाये। हमारे राजनैदिक नेवाओं को लोगों को केवल शिक्षित कसा है और उन्हें यह महसूस करा देना है कि देश के लिए यह अच्छा है और आवश्यक भी। केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों के ऋण बोझ के विषय में जानकारी घातक है। समग्र रूप से, कुल ऋण 997 98 में 34 हजार करोड रूपया से दुगना हो गया और इस्तो अवधि में ब्याज भुगतान राजस्व के 40% से वढकर 48% हो गया है। सब्सिडी, ब्याज के भुगतान और रक्षा व्यय कुल राजस्व क्या बहुत बडा प्रतिशत उपभोग कर लेते हैं (0५00०: एक्लाएगए५ व5, 999 40) सरल शब्दों में, सरकार जो कर्ज लेठी है प्रत्येक रुपये में से 24 पैसे उसके लिए ऋण सेवा में लग जाता है। सरकार अनेक अर्थशास्त्रियों के सुझावों पर गम्भोरता से विचार क्यों नहीं करती कि सरकार को आगे से ऋण लेने पर बिल्कुल रोक लगा देनी चाहिए ? जब वक सरकार वित्तीय घाटे और बोझिल ऋण को जोरशोर से कम नही करती, तब तक हमाग देश मुद्रास्फीति को रोक नहीं सकक्‍ता। राजनैतिक दलों को केवल लौह इच्छा शक्ति कौ आवश्यकता है। व्यावसायिक विविधीकरण आर सामाजिक सरचना (06एण्एुभाष्षबा ऐफशजञ्ञीस्जाण बात 5००3) 570चातर) आर्थिक विकास में व्यावस्नायिक विविधीकरण, कृषि का व्यापारीकरण और प्राथमिक पे ट्रैतियक और ज्रैतियक व्यवसायों में परिवर्तन शामिल हैं। व्यावसायिक वार, भाल में लोगों को तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है प्राथमिक व्यवसाय (जैसे कृषि, खत, द्वैतियक व्यवसाय (जैसे, व्यापार, निर्माण और यातायात), और ठृतीय व्यवसाय (जैसे, सेव)। आयु वार १5 से 59 वर्ष आयु समूह के लोग 'कार्यकारी' आयु समूह में आते हैं। भार में लगभग 38% लोग 0-4 आयु समूह में आते हैं, 55% व5-59 वर्ष आयु समूह में औए 7% 60 + वर्ष के हैं। 'कार्यकारी' आयु समूह के कुल लोगों (लगभग 46 करोड में गे 62% प्राथमिक व्यवसायों में, 4 9% द्वैतियक और 22 4% त्रैतियक व्यवसायों में लो (#/#फ्रणल्‍ढ" 77०६, ॥86०, 998.. 229) | 99। की कुल ग्रामीण जनसस्या वीं (अर्थात्‌ लगभग 628 करोड में से), 79% प्राथमिक, 0 3% द्वैतियक और 3 65% व्यवसायों में लगे हैं (वही 236) | कुल शहरी जनसख्या (लगभग 2 7 करोड) का 426 प्राथमिक, 32.3% द्वैदियक और 54 5% त्रेतियक व्यवसायों में लगे हैं (वही :23/) पी रूप से लगभग 44% ग्रामीण और 34% शहरी लोग “कार्यशक्ति' (ऋण: लि०्णे में ! पुरुष कार्य करने वालों की भागीदारी की दर शहा क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा का | जबकि महिला कार्यकारी शक्ति की दर ग्रामीण क्षेत्रों में 32% है, लेकिन शहरी के ह] केवल 5% है (#कफएशध कवि ०9 था ए 9)। 495-9 की अवधि टिया रोजगार का क्षेत्रवार (६६८5प्ज) वितरण बढावा है कि प्राथमिक क्षेत्र में 8% वो गिएक आई, और लाभ द्वैतियक और ज्रैतियक क्षेत्रों को बराबर का हुआ। ग्रामीण शत में पुर दे आर्थिक अर्थव्यवस्था १६ मामले में अभिक वितिधोकरण हुआ और महिलाओं के मामले में शहरी क्षेत्रों में । व्यावसायिक विविधौकरण परिवार, जावि, नातेदारी, आदि सस्थाओं को प्रभावित करा है। बेली (8८४८; 2257) का मातना है कि सयुक्त परिवार अपने सदस्यों के विविध हिर्तों को और आय की समानता को जीवित नहीं रख सकता। पसतु एपस्टीन (छाया) इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं है। वह मानवा है कि अर्थव्यवस्था के विविधीकरण की अपेक्षा स्थाई (६ए0०७४८॥८८) अर्थव्यवस्था से नकद (८४६) अर्थव्यवस्था में परिवर्तन संयुक्त परिवार के विघटन के लिए अधिक उत्तरदायी है। एमएस ए राव (७.5 8 7२७०, 968) में कहा कि सयुक्त परिवार समठन में नकद आय और विविध व्यवसायों में सगतता (एएताएगाजा। 202 नहीं है। टीएसमदान (ए$ ७४३७७, 968) ने माना है कि 'शहरीकाण और औवोगीकाण आवश्यक रूप में सयुक्त परिवार में विघटन पैदा नहीं करते हैं। लेकिन एम एसगोरे सयुक्त परिवार पर इनके प्रमाव को स्वीकार करते हैं। नर्मदेश्वर प्रसाद आदि अनेक समाजशार्ियों द्वारा जाति और नाठेदारी पर इनका प्रभाव स्वीकार गया है। एससी दुबे ने समाज के विकास और व्यावसायिक विविधीकरण पर शिक्षा के त्रभाव को बताया है। आस्कर लेविस (05८9 [.८७४७) ने भारत के विकासात्मक परिदृश्य का विश्लेषणात्मक विवरण दिया है। उन्होंने ग्राम-केन्द्रिव विकास और शहर-केन्द्रित विकास के बीच चयन (७४०:८०) भ्रस्तुत किया है और शहर-केन्द्रिव विकास की सम्भावनाओं पर गम्भीर परौक्षण के लिए जोर दिया है। जीमिएडल (5 !४५४०७) का एशियन ड्रामा (#क्क्षा /%09, 968 : 3 ५०॥००४८७) दक्षिणी एशिया में गरीबी का, आर्थिक विकास की समस्या के सस्थात्मक दृष्टिकोण द्वाए वर्णन कपदा है और व्यावासायिक विविधीकरण तथा अर्थव्यवस्था की विवेचना करता है। 6 राजनैतिक व्यवस्था (एगांगट्न $एशशाओ राजनैतिक व्यवस्था अवधारणा और स्वरूप (एगांट्व 59४७७ $+ (कल्‍्का आते 795९७) “व्यवस्था' विविध भागों का समन्वित समग्र रूप (प्राट््ा॥८0 ए।0/०) है। सामाजिक व्यवस्था' समन्वित कार्यकारी इकाइयों का एक समुच्चय (सेट) है जिसमें प्रयेक हाई समनुदेशित (४5छ720) भूमिका निभाती है। “राजनैतिक व्यवस्था' राजनैतिक सस्याओं (जैसे, सरकार), सो (राजनैतिक दल), और सगठनों का एकत्रीकरण (०णा८लांणा॥) है गो पूर्व निर्धारित उद्देश्यों और प्रतिमानों के आधार पर अपनी भूमिका का निर्वाह के हैं (जमे आन्तरिक व्यवस्था बनाए रखना, विदेशी सम्बन्धों को सचालित करना, ओर बाहरी ताक मे सुरक्षा प्रदान करना)। इसे राजनैतिक सस्थाओं व सो का एकप्रीकरण भी कहा गया है जो समाज को सत्ता से शासित करते हैं, विद्यमान सत्ता व्यवस्था के अनुरूप कार्य कले को बंध करते हैं, और जो कतिपय सिद्धान्तों और कार्यविधियों के आधार पर कार्य करे हैं आलमण्ड और कोलमन (पका गाव (.0॑च्काक्षा, रीगाध6 रु 20थ०ए8 /धक। 959 5) ने इसको “एक व्यवस्था जो समाज में राजनैदिक कार्य करती है” कह का परिभाषित किया है। मैक्स वेबर ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है. “ऐसा संगठन जोम़दा सीमा अर्थात्‌ राज्य के भीतर शक्ति के वैधानिक प्रयोग के एकाधिकार पर सफलतापूर्वक दाग करता है” | देखें, 6600 0 ॥७ा॥६ 'मठक मर” 78) आइजेन्टाड (7827) ने इसकी परिभाषा इस प्रकार की है “भूभागीय समाज का ऐसा सगठन जो समाज में शर्कि के अधिकारिक प्रयोग का तथा उसे नियमित करने का विधिमान्य एकाधिकार (08800 ए्ा०7०7०९) रखता हो ।”। राजनैतिक व्यवस्था के चार तत्व हैं. () वैधानिक बल प्रयोग 2) बाप (००णएाथाल्याइएटा555) 5) परस्पर निर्भरता और (4) सीमाओं (00006) ५ विद्यमानता। डैविड ईस्टन (04७० ए्च्नणा, 708 7० 59॥87, ॥9) तीन घटक (छाएजाछयए॥ बताए हैं 69 आह तीजिम़ों के स्ाध्यम से मुल्यों का (थ००७४०/) करता है 2) इसका आवंटन अधिकारिक (50॥0०7००४०) होता है 0 इसके अधिकारिक आवरटन पूरे समाज पर बाध्य होते हैं | आलमण्ड और कोलमन (० ० ॥7) ने राजनैतिक व्यवस्था की चार सामान्य विशेषताएँ बताई हैं : 6) सभी सास व्यवस्थाओं में राजनैतिक सरचनाएँ होती हैं (जैसे, प्रतिर्पेण (ध्य००) साम्रागि राजनैतिक व्यवस्था 79 सम्बन्ध, प्रतिमान, और अधिकार व कर्तव्य) 2) सभी राजनैतिक व्यवस्थाओं में कुछ प्रकार्य निभाये जाते हैं, यद्यपि उनकी शैली व बारम्बारता (॥८पुए००॥८८७) भिन्‍न होती है। 8) सभी राजनैतिक व्यवस्थाएँ बहुकार्यात्मक होती हैं (जैसे, नीतियों/भूमिकाओं (सरकार कीं) का मूल्याकन, लोगों में जागृति पैदा करना, जनता/समूहों/व्यवस्थाओं का नियंद्र० करना)। (4) सभी राजनेतिक व्यवस्थाएँ सास्कृतिक अ्थों में मिश्रित व्यवस्थाएँ होती है (अर्थात्‌, न तो कोई “पूर्ण आधुनिक” संस्कृति होतो है और न कोई “पूर्व आदि संस्कृति”। राजनैतिक व्यवस्था के प्रकायों के विषय में आलमण्ड और कोलमन ने तीन प्रकार्यों का वर्णन किया है - () प्रतिमानों का निर्धारण करके समाज को एक जुट बनाये रखना, उन्हें सर्वत्र व्यवहारिक बनाना, उनका क्रियान्वयन कराना, और उनका उल्लधन करने के लिए दण्ड देना (2) सामूहिक (पजनेतिक) उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक सामाजिक, आर्थिक, और धार्मिक व्यवस्थाओं में परिवर्तत लाना व अनुकूल बनाना (3) बाहरी खतरों से राजनेतिक व्यवस्था को दृढ़ता से सुरक्षा कना। आलमण्ड और कोलमन ने इन कार्यों की दूसो तरीके से भी व्याख्या की है। उन्होंने इनको “बाह्य कार्य" (०७७७४ (४०८०४००७) और 'अन्त कार्य (700 0४८॥०॥७) में वर्गीकृत किया है। “बाह्य कार्य' है कानून बनाना, उनको लागू करना, और उनका अधिनिर्णयन करना। अन्त कार्य हैं. राजनैतिक सामाजीकरण, रुचि जागरण (06४ ॥000॥००), रुचि समहण (क्रांथ्रण्ण: घटठ्ाण०्हभाणा), और राजनैतिक संवाद। आइजेन्टाड (2&£॥/800 ने राजनैतिक व्यवस्था के ग़जनैद्िक क्रियाकलापों को विक्षायी (८्रं४७0५७) (अर्थात्‌ समाज में विद्यमान व्यवस्था को बनाना), निर्णायक (९८०५४४००-गावण[) (अर्थात समाज के प्राधमिक उद्देश्यों का निर्धारण करना), और मशासनात्मक (80 ा(७) (अर्थात, विभिन्‍्त सामाजिक क्षेत्रों में प्रारम्भिक नियमों के क्रियान्वयन की व्यवस्था करता और समाज के विविध समूहों को विविध सेवाएँ उपलब्ध कएना)। शिल्स ($॥॥5) द्वारा गजनैतिक व्यवस्थाओं का प्रमुख रूप से वर्गकरण इस प्रकार किया गया है : 0) लोकतवानिक व्यवस्था, अर्थात्‌, नागरिकों के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से शाप्तितों को इच्छानुसार शासन। यद्यपि लोकतन््र बहुसख्यकों के शासन पर आपाएित है तथापि अल्पसख्यकों के अभिकार्रो की रक्षा करना भी लोकवान्निक व्यवस्था का आवश्यक पक्ष माना गया है। राजनेतिक लोकठन्र में कानून की दृष्टि में समानता, बोलने की, प्रेस को एवं एकत्र होने की स्वतज्रदा, और मानमानी गिरफ्तारी से बचाव भी महत्त्वपूर्ण है! (0) भर्वाधिकारी व्यवस्था (०॥७॥७००४) अर्थात ऐसी व्यवस्था जिसमें राज्य की शक्ति को स्थिर करने और स्वच्छन्दवापूर्वक कार्यक्रमों को चलाने के लिए आवश्यक समझे जाने वाले जीवन के सभी पश्ों को राज्य सचालित व नियमित करता है! समाज के भीतए हो व्यवित या उप समूहों की स्वायत्तता पर केद्रीयकृत सत्ता पर बल दिया जाता है। व्यवहार में, राज्य का प्रतिनिधित्व राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली शासक वर्ग या अभिजात द्वारा किया जाता है जो अन्य सभी हित समूहों (८८४ हःणण७) पर आधिपत्य जमाए रखता है। (9) अल्खदरीय व्यवस्था (०8आ८४०), अर्थात्‌ ऐसी व्यवस्था जिसमें एक छोटा समूह शाप्तन कर्ता है और बृहद्‌ समाज के ऊपर सर्वोच्च शक्ति रखते हुए शासन करा है। अइजेन्यड ने राजनैदिक व्यवस्था वो बहवादी (छाप्रशछत0, प्रभुवावादी 780 यजनैतिक यवता (७॥(४०7६४४5७), . सर्वाधिकारी ((000090), और पैतृक अधिकादादी (ए4ए77०709) श्रेणियों में रखा है। बहुवादी व्यवस्थाओं/राज्यों की विशेषता है कि उममें शक्तिशाली केद्र होता है, राजनैतिक स्वतत्रवा को विस्तृत अवसर मिलता हे और उसमें स्थाई विकास करने की क्षमता होती है। पैतृक अधिकारवादी राज्यों का द्वितीय महायुद्ध के बाद उदय हुआ। यह एक निजी शासन (ुछाइठाशं एण्ड) होता है जिसमें शासक के परम्परागत और आधुनिक भारतीय समाज मे लोकतान्रिक राजमैतिक व्यवस्था ओर सरचना (एशा०्कब्राार एगातदा 55अधा शा 40ण्थकर का परोक्नताए ता घात 00९9 [एव 8०080) विस्तृत अर्थ में, लोकतत्र न केवल राजनैतिक अवधारणा दर्शाता है बल्कि समाज की एक जौवन शैली भी दर्शात् है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को समाज की सरचनाओं और सस्याओं में निर्णय लेने के अवसर मिलना जो उनके जीवन को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से प्रभावित करते हैं। सकीर्णतम (६७७७०८०) अर्थ में, लोकतन्त्र शब्द राज्य के नागरिकों को राजनैतिक निर्णयों भागीदारी के अवसर मिलने से है। इस प्रकार लोकतन सगवादी (०१००॥(»7०४) समाज की स्थापना का प्रथल है। के विविध प्रकार हैं राजनैदिक, सामाजिक, आर्थिक, और वैतिक। को बाप पंया सामाजिक स्तरोकरण और पूर्वाग्हों को तोडना है! आर्थिक लोकतनन है आकार राज्य पर बल देता है और घन के केद्रीयकरण और आधधिक विषमताओं के विरुद्ध विद्रोह करता है। उत्षिक लोकतन्त्र का झुकाव प्रचलित अभिवृत्तियों के अनुस्थापन तथा सही और गलत व्यवहार को अवधारणा के साथ विचार करने की ओर है। लोकतन्त्र के पीछे मित्रभावना, प्रातृतव, और सद्व्यवहार का दर्शन काम करता है। प्राचीन भारत में लोकतत्र (एशच०ललबल चच #बलला पएण्का3) ऋग्वेद लोकतात्रिक सिद्धननों और आदझशों के पति इतना अधिक प्रद्िबद्ध है कि इसमें लोकदन को एक देवता (4८8) माना गया है और इसे 'समजन' कहा गया है। इस शब्द का अर्थ है लोगों की सामूहिक चेतना तथा राष्ट्रीय मन (००7०) जिसके प्रति व्यक्ति का मस्तिष्क अद्धानत होता है क्योंकि इसौ स्रोत से वह शवित्र प्राप्त करता है। 'समजन' को स्तुति गान (वेद) में लोगों से कहा गया है कि वे एक सभा में एकत्र हों एजनैतिक व्यवस्पा का (सगच्छप्व) और वर एक स्वर में बोलें (सम्वदष्वम्‌), मंत्र एक हो (सप्पन), चित्त एक हो (समचित्तम), एक हो नौंति हो (ममानमत्राह) और आशाओं व आबाक्षाओं में एक हों (आकूति)। इम प्रकार लोकतत्र अपने नागस्कों को आन्तरिक एकता व उनकी भावात्मक एकता पर निर्भर माना जाता था। लोक्ताच्रिक मिद्धान्द सार्वजनिक जीवन के विधिल क्षेत्रो-राजनैतिक, सामागिक और सास्कृतिक-ममें कार्य करते ये। वैदिक युग में लोकताच्रिक परम्पत युर्गों से भारतीय राजनीति की समूची वृद्धि को सचालित करती थी। जहा ग़ाजततर (7004०) था वहाँ यह सीमित (॥व॥८0) सवैधानिक रजत था जिससे राजतत्र का स्वरूप मूलरूप में लोकताखिक ही रहा। यह विकेद्धोकरण या स्थानीय स्वायत्तता (40७॥०४) ) पर निर्भर धा। लोग निम्नलिखित उपयुक्त सघ और समूह आरोही क्रम (४८७०णगाड ००७३) में स्वशामत में अपने अधिकाएं का प्रयोग काने के लिए बना लेते थे कुल (0), जाति (८७5०), श्रेणी (50॥0), पुर (ए03 ० शाह ९०, और घनपद (8० 52८) । अत्येक समूह के अपने नियम और कानून होते थे। प्रत्येक अपने स्तर पर स्वशासन लोकतन््र के लिए करता था। प्राचीन भारत में कुछ जनपद तो स्वेष्ठप में गणतत्र जैसे होते थे और कुछ में राजतनत्रीय सगठन होता था। लेकिन प्राय पत्येक में एक समिति आधुनिक ससद का पूर्व स्वरूप होती थी जिसमे ऊचे और नीचे लोग राज्य के मामलों पर निर्णय लेने के लिए उपस्थित होते थे। आरके मुकर्जी (॥२ ६ .॥0॥:८7]८८, (6/#फ्ठ ता 4वलला काबाग, छिववताए३ १४७५४ 8॥9930, 807099, 496।. 42) ने उल्लेख किया है. “राजतत्र के साथ-साथ नियमित गणतात्रिक प्रकार कौ राजनीति भी विकसप्मित हुई जिनकी झलक विविध साहित्यिक पुस्तकों-्राह्मण, बौद्ध और जैन-में मिलती है। महाभारत में भी कुछ गणसाज्यों का उल्लेख है जो 'सघटगण' कहलाते थे। पॉच गणराज्यों (॥८ए०७४८७॥ ए7००७) को अन्यक, वृष्णि, यादव, कुकुर और भोज कहा जाता धा। इनको मिला कर एक सध बना हुआ था जिसका अध्यक्ष सध मुख्य होता था। इसी तरह महाभारत में 'गण' (7८90७॥८७) का उल्लेख है जिसका शासन नेताओं की समिति 'गण मुखियाओं' द्वारा होता था। इन सभी गणों पें पूर्णरपेण लोकतान्रिक सविधान होता था। प्रत्येक में एक परिषद्‌ (४६5८॥७१७) होती थी। जैन और बौद्ध पूलम्रन्थों में भी अनेक पूर्व गण गज्यों और कुछ गण शाज्यों के परिसधों, जैसे 'व॒जि' जिसमें नौ मललको, नौ लिच्छिवी तथा काशी--कौशल के अठारह गणराज्य तथा अन्य राज्य शामिल थे, का उल्लेख पाया जाता है। यह उल्लेख भी किया गया है कि महावीर स्वामी की मृत्यु पर इसी वृजि परिसघ के 36 गण राज्यों द्वारा उनकी अल्येष्टि पर अमन प्रज्जवलित कर श्रद्धाजलि अर्पित वी गई थी । उन दिनों लिच्छिवी सुपरिचित गण राज्य था जिस पर 7707 राजाओं की समिति शासन करती थी जो सवैधानिक रूप से सम्राट होते थे। सख (६४७७) गणराज्य प्रसिद्ध है। इसी ने ससार को बुद्ध जैसा गहापुरुष दिया। इस गणग़रज्य में लगलग 80,000 घराने थे जो गणराज्य के अगर ये जिसमें एक अध्यक्ष या राजा सहित 500 सदस्यों की परिषद या ससद थी। बौद्ध युगीन कुछ असिद्ध गणराज्य थे वैशाली, पवा, मिथिला, आदि । परिषद्‌ विधानसभा का काम करती थी। उनके निर्णयों का क्रियात्वयन करने के लिए विविध प्रकार की न्यायपालिकाए वा कार्यपालिकाए भी होती 82 राजनैतिक व्यवस्था थी। केवल एक प्रमुख चुना ज्ञाता था जो परिषद/राज्य की अध्यक्षता करता था| उसे 'राजा' पदनाम दिया गया था। यह कहा जाता है कि प्राचीन भारत में लोग लोकतान्विक तरीके से रहते ये यद्यपि राजनैतिक लोकतन्त्र अपने पूर्व स्वरूप में विद्यमान नहीं था। राजतन््र भी लोकप्रिय था। छठी शत्ाब्दि के बाद लोक्तान्रिक सगठनों का पतन शुरू हो गया। ग्जा और सम्राट लोग युद्धों में व्यस्त रहने लगे। देश की एकता और अखण्डवा को बनाए रखने के लिए क्योंकि कोई शक्निशाली ग़जा नहीं था, परिणामत समूचे देश में बडी संख्या में राज्यों का उदय हो गया। आठवी शताब्दि में आगे मुसलमानों ने आक्रमण शुरू कर दिए, अन्त. बारहवी शताब्दि में उन्होंने अपना शासन स्थापित कर ही लिया। मुस्लिम शासक निरकुश (गा०्टाआ) थे। ब्रिटिश शासन लोकतन्त्र के विरुद्ध था। भारत सरकार के अधिनियम, 935 ने भारत में लोकतन्र शासन की नीव रखी। काग्रेस 935 से 937 तक दो वर्ष के लिए ही सत्ता में रही। 940 से 945 तक ब्रिटिश सरकार द्वितीय विश्वयुद्ध में ही फँसी रही। 946 से भारत को स्वतत्रता प्रदान कजे के प्रयास प्रारम्भ हुए और 5 अगस्त 947 को भारत स्वत हुआ। स्वतत्र भारत के सविधान में लोकदन््र क्लो हो देश में शासन का आधार बनाया गया। आधुनिक भारत में लोकतत्र (0शशा०लनट/ गम 0व००९ता वहा) आधुनिक भातत में लोक्तन्र कुछ सिद्धान्यों पर आधारित है. ()) कि प्रत्येक व्यक्ति वी अपनी सामर्थ्य, योग्यता और प्रतिष्ठा होती है, ८2) कि प्रत्येक व्यक्ति में दूसरें के साथ अपने जीवन को चलाने और सीखने की क्षमता है, 3) कि हर व्यक्ति को बहुसख्यकों के निर्णय को मानना चाहिए, ५) कि प्रत्येक व्यक्ति का निर्णय निर्धारण में हिस्सा होना चाहिए, 6) कि लोकतानिक कार्यवाही का नियत्रण और निर्देशन स्थिति में निहित है, न कि इसके बाहर, 6) कि जीवन की प्रक्रिया अन्तक्रियात्मक (आ(००३८०४६८) है और सभी व्यक्ति सामान्य रूप से माता प्राप्त उद्देश्यों के लिए कार्य करते हैं, ४) कि प्रजातन्र व्यक्तिगत अवसरों और व्यक्तिगत उत्तरदायित्वों पर टिका होता है। स्वतत्रता के पश्चात भारत ने लोकतत्रौय राजनैतिक व्यवस्था अपनाने का निश्वय क्या। इस व्यवस्था की दीन विशेषनाए हैं प्रथम, इसमें उच्च कोटि को स्वायत्तता होती ऐ, द्वितीय, आधिक कार्यकर्ता और धार्मिक सगठन शजगैदिक हस्तक्षेप से मुक्त रहते हैं, दृतीय, विभिनन व्यवस्थाओं की प्रतिस्पर्ण अखण्डदा के लिए खतरा नहीं होती बल्कि सहायक होती है। कुछ लोग मानते हैं कि इन्दिय गान्यों का शासन काल जनवरी 965 और अक्दूबा 984- (मोदरजी देसाई और चरणसिंह के तीन साल छोडक0 लोक्दाख्रिक नहीं था बत्कि अधिकारिक शासन काल रहा, जिसकी तीन विशेषताएँ थी - () इसमें प्रमुख सत्ताधीशों के अति आज्ञाकारी होना आवश्यक था, ८) इसमें सार्वजनिक आलोचना और सगठित विरोध वो दबाया जाता था (दो वर्ष के लिए आपातकाल की घोषणा से), 6) स्वायत्तशासी संगठनों पर इसको अधिक पकड थी । एजनैतिक व्यवस्था ॥83 लोकतत्र और बहुदलीय सगद्ठक सरकारे (एचग्रत्थब0) गा (०गायणा 5छतग्राद्या5) पास में केन्र में सपड्कक सरकारों का बनना मोशरजी शासन काल (मार्च 977 से शुरू हुआ, यद्यपि राज्य स्तर पर इनका प्रारम्भ ॥967 से हो हो गया था। केन्द्र में ॥)्रा और 999 के बीच आठ बार संघट्ठक मत्रिमण्डल बना। प्रथम बार मोरारजी देसाई का सयुक्त मत्रिमण्डल 857 दिन चला (मार्च 977 और जून 074 के बौच), चज़ सिह का 7 दिन (जुलाई 979 से जनवरी 980 तक), वी पी सिह का 344 दिन (दिसम्बर 9839 और नवम्बर 990 के मध्य), चन्द्र शेखर वा 224 दिन (नवम्बर 970 और जून 99] के म्रध्य), अटल बिहारी वाजपेयी का 3 दिन (मई 996), देवे गौडा का 325 दिन (जून 7996 और अप्रैल 997 के दीच), इन्द्र कुमार गुजणल का 333 दिन (अप्रैल 997 ओर पार्च 998 के बीच, और अटल बिहाये वाजपेयी दा ३94 दिन (मार्च 998 और अप्रैल !999 के मध्य)। अक्टूबर 999 में अटल बिहारी वाजपेयी द्वार बनाया गया सयुकत मत्रीमडल अभी 0000 मैं) चल रहा ऐ। इस प्रकार कोई भी सयुक्त मत्रिमण्डल पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा न कर सका। दो राष्ट्रीय मोर्चा मत्रिमण्डल 996 और 998 के म्रष्य, 3 दलो के प्रमर्थन से देवे गौडा और इन्द्र कुमार गुजराल के प्रधानमत्रित्व में बने और उन्हें काग्रेस से, जो उस समय बाह्य समर्थन दे पही थो गम्धीर समस्याओं का सामता करना पड़ा। जब काप्रेस ने सयुक्त मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया तव फरवरी 998 में आम चुनाव कराए गए, और भारतोय जनता पार्टी ने 8 प्रादेशिक दलों के सप्र्पन प्ले सत्रिपण्डल बनाया। यह भी 7 अप्रैल 999 के ससद में एक मत से हृण दिया गया। अक्टूबर 999 में लोकसभा चुनाव के उपरास्त एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी ने अन्य दलों के साथ मिलकर अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमत्री के नेतृत्व में सरकार वनायी जो अब भी चल रही है। प्रयुक्त शामन में बहुमछ्यक दल के लिए मित्र घटकों को प्म्हालना टेढी खीर है, भले ही उनके साथ तौन या चार सदस्य ही क्यो न हों। फरवरी 998 में सत्ता में आने के बाद भाजपा नियत्रित मरवार को कुछ भित्रों को धपकियों का सामना करना पड़ा। कप से जम चार क्षेत्रीय दलों ने (तमिलनाडु (एडी एम के), पश्चिम बगाल (ममता), पजाब (अकाली दल), और दृरियाणा (चौटाला से) समर्थन वापसी की धमकी से प्रकार को पोशान कर रखा। संयुक्त मत्रिमण्डल में तमिलनाडु की क्षेत्रीय दल के एक नेवा के विरुद्ध चार दर्जन के लगभग मामले उनके विरुद्ध न्यायालय में लम्वित थे। क्योंकि उनके दल के ससद में सदस्यों की संख्या अच्छी खाशी थी अत उन्होंने बारवार सरकार से “छुटकारा राशि! (४७०7ऐ के रूप में विभिन प्रबार के लाभ पाने के लिए अपने दल के समर्थन के लिए भुगावा शुरू कर दिया। अन्तत उन्होंने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। पलत 77 अप्रैल 999 को एक वोट से सरकार विश्वास मठ में पराडझित हो गई। पश्चिमी बगाल के भी एक क्षेत्रीय दल ने सरकाए पर बगाल पैकेज और केद्ीय मत्रिमण्डल में एक गत्री पद लेने का आमढ़ काके ससकए को दबाव में रख दिया था | अन्य क्षेत्रीय दर्लो की मोँगें भी कम हास्यास्पद नहों थी और केद्रीय सरकार को कई बार उन लोगो की दबाव बी नीति के सामने शुकता पडा। संयुक्त मज़िमण्डल में बहुप्त्यक दल की सरकार किस प्रकार अपने सहयोगियों की भमकियों के सामने स्थाई थनो रह सकती है ? वह किस पत्रकार देश के विकाश को योजनाएँ व84 राजनैतिक व्यवस्था बना सकती है और किस प्रकार अन्य विकसित देशों के साथ वाणिज्य और व्यापार दधा अन्य सम्बन्धों पर विचार विमर्श कर सकती है ? क्‍या सहयोगियों के छोटे से प्रकरण पर समर्थन वापसी की धमकी सरकार को डाँवाडोल नही कर देदी ? फिर, प्रत्येक राजनैतिक दल में अन्तर्कलह भी है। दल के भीतरधाती सदस्य भी सहयोगियों को ऐसे प्रकरण उठाने के लिए उकसाते रहते हैं जो सरकार को हमेशा परेशानो में डाल देते हैं। सद्यपि भारत में गजनीति अभी भी भ्रष्ट, अविवेवी व स्वार्थी व्यक्तियों की आश्रय स्थली नही है तथापि सार्वजनिक सेवाओं से सम्बद्ध गुणवत्ता के विषय में गर्व से कुछ भी नहीं कहा जा सकवा। आज भास्त में राजनीति शक्ति प्राप्द करने और ठसका प्रयोग कले के साधन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। स्वतत्रता के समय भारत के राजनीतिशों ने व्यविनगत तथा सम्रदायगत हितों से उठकर सामान्य जन की भलाई के लिए राजनीति को नैतिक आदर्शवाद के उच्च शिखर पर पहुचा दिया। वे जनता के लिए व राष्ट्र के लिए सत्ता चाहते थे, न कि व्यक्ति के लिए। आज व्यक्तिगत शक्ति और महत्वकाक्षा राजनीतिशों के शब्द कोष में राजनीतिक बीज शब्द (/८५ ४०:०७) हो गये हैं। सार्वजनिक एवं राष्ट्रीय हित व्यक्तिगत एवं सम्रदायगत (६६८४७००७) हितों के स्थान पर स्थापित हो गए हैं। वास्तविक राजनीति व्यवहार के लिए इसके घातक परिणाम हो रहे हैं। राजनैतिक दल आदर्शवाद और कार्यक्रम प्रतिबद्धता के आधार पर नही बल्कि क्षेत्रीय, साम्प्रदायिक एवं जातिवाद के आधार पर कार्य करते हैं। हाल में हो कई नेताओं ने राजनैदिक वास्तववाद (फामट्राए३057) के लिए आदर्शवाद को पीछे छोड दिया है, लेकिन वास्तव में सत्ता की भूख के कारण यह राजनैतिक अवसरवाद ही है। कुछ राजनैतिक दलों के राजनैतिक दॉवपेंच, जिन्होंने अवस्तरवाद को अपनी विशेषता बना लिया है, आदर्शवाद के प्रति अ-प्रतिबद्धता के ज्वलन्त उदाहरण हैं। व्यक्तिगत महत्वकाक्षा या शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रेरित अवसाद ने राजनैतिक आदरशों को दृढ़ विश्वास (०णाशक्रगा) की अपेक्षा सुविधा ("ाएटा0८००८) का विषय बना लिया है। यह हमारे राजनैतिक जीवन की गम्भीर व्याधि और आदर्शवाद की कमी दर्शाता है जो सयुक्त सरकारों के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित करता है। 996 से 999 के मध्य चार वर्ष की अवधि में ही पाँच सरकारों का सत्ता से बाहा झूर दिया जाना दर्शाता है कि सयुक्त सरकारें देश के लिए आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि मे हिंतकर नहीं हैं। आर्थिक दृष्टि से 998 के चुनाव में देश का 900 करोड रुपया खर्च हुआ था, और अत्यन्त रूढिगत अनुमान के अनुसार अक्टूबर 999 के मध्यावधि चुनाव में 000 करोड रुपया खर्च हुआ था। इसके अतिरिक्त बार-बार चुनाव आर्थिक विकास अवरुद्ध कल हैं, वित्त घाटे में वृद्धि होती है, व्यापार विश्वास को उल्टा प्रभावित करते हैं, शेयर बाजार में उछाल आवा है, और लोगों द्वाणा प्रयोग की जाने वाली वस्नुओं के मूल्यों में वृद्धि रोती है। राजनेतिक अस्थिरता विकास को अवरुद्ध करती है और विदेशों सम्बन्धों को प्रभाविव की है। गत पाँच चर्षों के अनुभव भी गलत सिद्ध हुए हैं कि सघीय राजनीति के लिए समुर्ती सरकारें आधिक तर्कसगत हैं। नज्यण यह होता है कि सरकार अस्थिर, विखण्डित राव राजनीति और गो पर नीति रुकावट भोगती है। अप्रैल 952 और अक्दूबर 999 के मध्य गठित 3 लोक सभाओं में से,7 पाँच वर्ष कौ अवधि पूरी कर सकी (अथम, दिंतैय, दृवीय, पाचदी, सातवीं, आठवी और दसवीं) चौथी लोक सभा (मार्च 967 में गठित) 3 वा याजनैतिक व्यवस्था 485 9 माह पूरे कर सकी, छठी लोकसभा (मार्च 977 में गठित) 2 चर्ष 6 माह पूरे कर सकी, नवीं लोक सभा (दिसम्बर 989 में गठित) । वर्ष तीन दिन ही पूरे कर सकी, 7वी लोक सपा (मई 996 में गठित) ॥ वर्ष सात माह ही पूरे कर सकी, और ]2 वी लोकसभा (मार्च 998 में गठित) ] वर्ष | माह ही पूय कर सकी । अक्टूबर 999 में गठित तेरहवी सयुक्त सरकार अभो (अक्टूबर, 2000 में) चल रही है। सयुक्त ससकारों की सफ्लता के लिए कुछ विकल्प सुझाए जाते हैं जो कि अब भारत के लिए अपरिहार्य हैं (आज्ञा है कि फरवरी 2000 में केन्द्रीय सरकार द्वारा सविधान समोक्षा के लिए बनाई गयी कमेटी भो इत दश्यों पर विधार करेगी)। ]. समद के लिए केवल राष्ट्रीय स्तर के दलों को ही चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाये और क्षेत्रीय दलों को यह अवप्तर न दिया जाये। वर्तमान में हमारे देश में 6 राष्ट्रीय दल हैं तथा 48 क्षेत्रीय मान्यता प्राप्त दल हैं। क्षेत्रीय दल अपने क्षेत्रीय आकाश्षाओं को भली भ्रकार से यह सफ्ते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय आकाक्षाएँ देश की अखण्डहा को हानि पहुचाते हैं। ससदीय चुनावों में केवल राष्ट्रीय दलों को ही अनुमति देना राजनैतिक अवसत्वादियों को कम तो करेगा, भले ही उनका सफाया न भी हो। कुछ दल (जैसे बहुजन समाज पार्टो) खुले आम कहते हैं कि वे देश में राजनैतिक अस्थिरता घाहते हें। इस भ्रकार के दलों को जिनके पास राष्ट्रीय विकास के कोई कार्यक्रम ही नहीं हैं, केसे केद्रीय सरकार या राज्य सरकारों को बागडोर सौंप दी जाये ? केवल ऐसे दलों को हो राष्ट्रीय दल माना जाये जो समूचे देश के कम से कम आधे राज्यों में चुनाव लें और कम से कम 5% थोट प्राप्त करें। वर्तमान में चुनाव आयोग उन दलों को राष्ट्रीय दल घोषित करता है जिन्होंने कम से कम चार राज्यों में प्रादेशिक दल या दर्जा हासिल किया हो | फिर भी, यदि कई क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय मोर्चा बना लें और एक सामान्य कार्यक्रम बना लें, तो ऐसे मोर्चे को ससद चुनाव लड़ने की अनुमति दी जा सकती है। 2. दूसरा विकल्प यह होना चाहिए कि सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले अपने प्रस्ताव में अगले प्रधानमत्री का नाम बताएँ ताकि विकल्प तैयार मिले | 3. तीसरा विवल्प हो सकता है कि भान जनादेश होने पर सदन को यह निर्देश हो कि वह अपना नेता या प्रधान मत्री चुन ले। यह सुज्ञाव अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय सरकार के लिए है। लेकिन क्या राष्ट्रीय सरकार व्यवहारिक (977०४८७)) है ? मेयी मान्यता है कि यह अयर्थाथवादी (४घ्व७७७॥०) है। सप्तदीय लोकत्र राजनैतिक दलों से चलता है। नेहरू कौ मृत्यु के बाद, या यों कहिये कि 97] के आम चुनाव के बाद, विशेष रूप से कापरेस पार्ग और हमारी ग़जनैतिक व्यवस्था आमतौर पर छिन भिन्‍न हो गई तथा स्थानीयवाद और गुटबाजी यरष्ट्रीय महत्व के मामलों पर हावी हो गए। इसमें सन्देह हे कि क्या राष्ट्रीय सप्कोरें इस व्याधि को ठीक कर सकती हैं 2 मेरा विश्वास है के क्षेत्रीय मसलों वी अपेक्षा राष्ट्रीय मामलों को जो बात उजागर कर सकती है वह है कि राजनैतिक दलों को मजबूत किया जाये। वे अपने आप को अधिक अतिनिधित्ववादी, उत्तरदायी एवं जवाबदेह बनाएँ। प्रधानमंत्री पद के लिए एक व्यक्ति की बात करना उस महत्तपूर्ण भूमिका की उपेक्षा कला होगा जो कि राजनैतिक दल सम्पूर्ण 486 सजनैतिक व्यवस्था राजनैतिक प्रक्रिया को समृद्ध एव स्थाई बनाने के लिए करते हैं। अच्छे सगठन के अधाव में एक श्रेष्ठ व्यक्ति भी एक व्यक्ति वन कर रह जायेगा) राजनैतिक दलों के माध्यम से राजनीति में अधिक सख्या में लोगों को हिस्सेदागे सफल लोकतत्र के लिए आवश्यक सामग्री है। वास्तव में, राजनैतिक दलों के विरुद्ध अनेक आलोचनाएँ होदी हैं। इनमें से कुछ हैं , वे भ्रष्टाचार और पश्षपात को भ्रोत्साहित करते हैं, स्वाों के आधार पर कार्य करते हैं,वे गुटवाजी और विभाजन करने वाले होते हैं, और प्राय राजनैतिक अस्थिरता उत्पन करते हैं। इन आलोचनाओं को स्वीकार करने पर भी, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि राजनैतिक दल सताधारी दल के कार्यक्रमों और नीतियों को नियत्रित करने सहित बुछ महत्तपूर्ण राजनैतिक कार्य कस्ते हैं। ग्टीय दल का नेता, चाहे कितना भी चमत्कारी क्यों न हो, वह शासकों और शासितरों के बीच को खाई को नहीं भर सकठा और जन समूह के कटें का निवारण नहीं कर सकता। केवल राष्ट्रीय हितों पर केंद्रीय राजनैतिक दल ही राजनैतिक स्थिरता सुनिश्चित कर सकते हैं। कुछ लोग सुझाव देदे हैं कि ससदोय लोकतत्र भारत के लिए उपयुक्त नहीं है और इसके स्थान पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली होनी चाहिए। मेरी मान्यता यह है कि थोडे समय का मूल्याकन करना गलत होगा, विशेष रूप से गत वर्षों में जो कुछ हुआ है। गौरतलब बाव यह है कि किसी भी राजनैतिक दल ने किसी भी समय भारतीय सविधान में निहित आदर्शवादिता पर प्रश्न नही उठाया और न ही ससदीय लोकतत्र की सस्या के औचित्य पए। सभी आठ सयुक्‍न सरकारों ने हमारे सविधान द्वाय स्थापित शासन सस्था की पवित्रता को सर्वोपरि रखा। अत्यधिक केद्रीयकृत राष्ट्रपति प्रकार कौ सरकार बनाने या एक या दो दलों की सरकार बनाने की अपेक्षा, ससदीय लोकतत्र हमारे देश के लिये उपयुक्त है! जैसा कि पहले कहा जा चुका है, राष्ट्रीय महत्व के तीन क्षेत्र हैं. विदेशों से सम्बन्ध, रक्षा नीति, और आर्थिक नीति। गत पांच दशकों ने यह स्पष्ट किया है कि कुछ समय की सरकारों और सयुक्त सरकारों के बाबजूद भी हमारी नीतियाँ निरन्‍्दर एवं लचोलेपन की विशेषता लिए हुए रहो हैं। निरन्‍्तेत़ा ने अन्वर्राष्रीय समुदाय में भारत की विश्वसनीयता की छवि को बनाए एखा । आन्तरिक आवश्यकताओं के लिए लचीलेपन के प्रति सवादशील होना आवश्यक है। यहाँ तक कि परमाणुशछोकरण (ए्रपलैटक ऋष्बएगआआा50ा) और प्रक्षेपास् (58०) विकास पर भो अधिकत्तर आम राय रही है। तब हम कैसे मान लें कि ससदीय लोकतत केवल इसलिए अस्वीकर कर दिया जाये क्योंकि संयुक्त सरकाएँ में कुछ अवसखादी दल के द्वारा बुछ राजनैतिक अस्थिरता पैदा की गई 2 भारत की जनता इतनी परिपक्व हो गई है कि वह ऐसे लोगों और राजनैतिक दलों को सत्ता से बाहर फेंक सकती है जो 5 स्वार्थों के लिए चुनाव लड़ते हैं, उन सरकार को ब्लैकमेल करते हैं जिनमें वे शामिल होदे हैं और लोक सभा के गणित को प्रभावित करते हैं। राजनैतिक अभिजन : भर्ती, ओर साथाजिक परिवर्तन थे उनकी भूमिका (एगा#स्श हरा।र ; एल्‍लणागालां छतते छिप 9 38० एमड्माएले अभिजन (अथवा सप्रातजन अथवा एलीट) कौन हैं ? सर्वाधिक अभिजन समाज में सर्वाधि प्रभावशाली और प्रतिष्ठावान स्तर (॥॥0००) है। 'अभिजन' में वे लोग आते हैं जो विसी यजनैतिक व्यवस्था हा केत्र में श्रेष्ठ नेता माने जाते हैं। इस प्रकार, राजनैतिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, व्यापारिक, कला आदि क्षेत्रों में अभिजन होते हैं। अनेक समाजशालियों (वाट, )व०८०, 0. जहा *२205, ॥.259थी, 'वऊआशील्फा, 308070८), ने इनकी अलग-अलग परिभाशए दी हैं। पेरे गेरियन्ट (ए9#7 06ग्ागा, 7 2, ला 6 #भीटा भा० एज, [.09000, 969) ने अधिजन को परिभाषा इस प्रकार दी हे * “कुछ अल्पसंख्यक जो विशिष्ट क्षेत्रों में समाज के मामलों में अद्वितौय प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं।” बैंक (9, डाल था 6 ॥((०८ 57६2, 966) ने अभिजन को “निर्णय करने वाले व्यक्ति जिनकी शक्ति समाज की अन्य किसी भी सख्या के नियत्रण से परे है” कहा है। नैडेल (पहतल, #ल्गाबागब! उप्दवां उदलाप्ट हापरीताम, 7956) का मानना है कि अभिजन वे लोग हैं “जिनका उनकी श्रेष्ठता के कारण समाज के भाग्य पर प्रभाव रहता है।” अभिजन समाज के मूल्यों एव अभिवृनियों को बनाने में महत्त्वपूर्ण प्रभाव ते हैं। सी राइट मिलस (९ फाह॥ १॥॥5, 80॥6 &/०, 956) ने उनका वर्णन करते हुए कहा है। “वे लोग जो भ्रमुख परिणामों वाले निर्णय करने हैं, जो अपनी इच्छाओं को साकार करने में समर्थ हैं, और जिनके पास दह सब कुछ है जो रखने योग्य है--भन, शक्ति और प्रतिष्ठा ।” मैं अभिजन को “एक प्रभुता सम्पन (00४७४॥आ0 समूह कहता हू जिसके पास वैशिष्टय (कज्ञवावफ़ धा८5७) और अनन्यता व अलगपन (८्ःटण्डाश्था८55) होती है! (80799, #0॥/6द 6. फद्राशक्षारा कार किए का मैश्िवशाउवादग" वा $बणाएगराक्ा03, "86 शा 05620शाटा”, (जाप्धफप 70 20, रिएछ 969 98! 24) । दूसरे, यह शब्द किसी एक व्यक्ति पर लागू नहीं होता बल्कि 'अनेक व्यक्तियों के समूह' पर लागू होता है, भले ही वह कितना भी छोटा हो। तीसरे, इस्त पहिचान योग्य सामूहिकिता के कुछ गुण और कुशलवाएँ होती हैं जो इनको न केवल श्रेष्ठता प्रदान करती है बल्कि निर्णय करने की शक्ति तथा दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति भी देती हैं। अन्त , अभिजन एक मापेक्ष /900७) शब्द है। एक समूह को अभिजन समूह के रूप में एक विशेष क्षेत्र में चिन्हित क्या जाता १ जिसमें वह 'प्रभावशाली' हो या 'शक्ति दर्शाने बाला हो या 'श्रेष्ठता' पर प्रभुत्व रखता हो । लेकिन अन्य समूहों में ये अभिजन “सामान्य सदस्य माने जा सकते हैं। इस आधार पर “राजनैतिक अभिजन' शब्द की परिभाषा इस प्रकार की जा सकतो है “राजनैतिक संस्कृति या ठोस राजनैतिक सरचना में निर्णय करने वालों के ऊपरी सतह का एक सपूर जिसका राजनैतिक शक्ति पर एकाधिकार हो, जो श्रमुख राजनैतिक नौतियों को प्रभावित करता हो, और राजनैतिक सत्ता के सभी महत्वपूर्ण पर्दों पर अधिकार रखता हो ।” यदि हम इस शब्द का विर्लेषण करें तो कहा जा सकता है कि राजनैदिक अभिनन में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित हैं (५) जो केन्द्रीय या राज्य विधान सभाओं में चुमे/नामाकित किए गये हों, (७) जो राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनैतिक दलों मे महत्वपूर्ण स्थान रखते हों, और (०) जो न तो सरकार और न ही राजनैतिक दलों में कोई औपचारिक पद रखते हों, लेकिन फिर भी राजनीति में महान प्रतिष्ठा या शक्ति वाले व्यक्ति समझे जाते हों बयोकि वे संताधारियों (एणए८८-९घ८:टा६४:०5) पर नियत्रण रखते हैं, जैसे गाधीजी, जयप्रकाश गाययत्र ! सी राइट मिल्स (956) ने राजनीतिक अभिजन (705८ 70०) रब्द का प्रयोग 88 याजनेतिक व्यवस्था किया है, जो सत्ता पर एकाधिकार रखते हों और देश पर शासन करते हों। परेटो (९४४७ 935) ने उन्हें शासक अधिजन' (6०:छग्रण्ट 2०) कहा है ; मार्क्स ऐखें, 800०70८, 506 ६४4 3०८८७, 964) ने उन्हें 'शासक वर्ग! (२एणड़ 259) कहा है, रीजमैन (२८5) मे उन्हें 'वीटो समूह' (५८४० 0700७) कहा है; और हन्टर (न णव प्राग्गाध) ने उन्हें 'शीर्षस्थ नेता' (00 7.280०:8) कहा है। मैंने बिहार में राजनैतिक अभिजन पर अपने अध्ययन में उन्हें "अल्पतन्रीय अभिजन” (0॥इक्वल्मं० 266) कहा है। मैंने यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया है जो सरचना के भीतर कार्यवार ((७४॥८४०॥०) समूहों को नियत्रित करते हैं और इसमें 'आधीन अभिजन' (5एछबप्धा &॥6) की राय कम से कम लेते हैं। स्वातत्रयोत्तर भारत में अध्िजन का प्रवेश और उनका बदलता स्वरूप (ए९'्रामशां गाए (आशाएं॥ओए (फड्शछलस ण॑ छाल पा ए965-0007९0९४८९ [709) "राजनैतिक अभिजन' की उपरोक्त परिभाषाओं के साथ अब हम स्वतत्रतता के बाद भाजत में राजनैतिक क्षेत्र में कार्यरत अभिजन का प्रवेश और बदलते स्वरूप (४४एा८) का परीक्षण करेंगे। राजनैतिक अभिजन का पाँच प्रावस्थाओं (598528) में वर्गकरण करके इस परिवर्तन का विश्लेषण किया जा सकता है (0) स्वतत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद की प्रावस्था (अर्थात, 947 से अप्रैल 952 तको +-जिसमें सरकार और जनता के बीच कोई सपघर्ष था ही नहीं और जिसमें मद्मपि जनता और सत्ताधारियो के हित एक जैसे और अविभाज्य (000अ90०) थे (अर्थीत, समाज का पुनर्निर्माण) परन्तु सत्ताघरी स्रात व्यक्ति देश विभाजन के बाद, शणार्थी पुनर्वास, साम्प्रदायिक शान्ति को बनाए रखना, और विभिन राज्यों के बीच सीमा क्षेत्ं के पुनर्वितरण पर विवादों के कारण उपजे कानून व्यवस्था की समस्याओं के समाधान में अधिक लगे हुए थे। (॥) एकीकरण प्रावस्था (००४५०॥०७७०॥ ए॥858) (अर्थात्‌ अप्रैल 952 से मार्च 962 तक या अप्रैल 952 और अप्रैल 957 के चुनावों में सासद, विधायक और पार्टी पदाधिकाए गणों के चुनाव तक)-जिसमें राजनैतिक अभिजन ने पचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से आर्थिक उत्थाव और सामाजिक विकास के लिए कार्य किया। (७0) अस्तव्यस्त ग्रावस्था (७७०७० 90856) (अर्थात अप्रैल 962 से मार्च 97 या अप्रैल 962 और मार्च 967 के विधान मण्डलों के चुनावों में चुने गये च्यक्ति)--जिसमें अनेक राज्यों में गैर कामेसी और सयुक्त सरकारों के सा में आने से अन्तर्रज्यीय व केन्ध-अदेश सम्बन्धों पर प्रभाव पडा। (00 प्राधिकाखादी प्रावस्था (॥एतमा्राव्धाडय एछ॥85७) (अर्थात, मार्च 97 में जवम्बर 989 तक या मार्च 497, मार्च 977, जनवरी 4980, दिसम्बर 28+ नवम्बर 989 के चुनावों में चुने हुए व्यक्ति)-जिसमें एक ही व्यक्ति को सर्वोच्च याष्ट्रीय नेतृत्व का स्थान दिया गया था--पहले इन्दिग गाघी को 6 वर्षों दक पर्च सजनैतिक व्यवस्था ]89 977 से जनवी, 980 तक कौ अवधि को छोडकए और फिर राजीव गान्धी को 5 वर्षों के लिए। सत्ताधारी नेता व्यक्तित्व पूजा में विश्वास करने लगे और व्यक्ति पूजा में हो सपाज के परिवर्तन और विकास की सभी योजनाए केद्धित टोकर रह गईं। (५) बहु-दलीय प्रावस्था (क्रा॥[॥2-]20 [॥75८) (अर्थात दिसम्बर 989 से वर्तमान 2000 तक) जिसमें से 5 वर्ष के नरसिंह राव के समय वो छोडकर शेष समय में अनेक गज़नैतिक दलों ने न्यूनतम सामान्य कार्यक्रम के आधार पर देश पर शासन करने के लिए हाथ मिला लिए। इस प्रावस्था में जो पार्टियाँ और मत्रिमण्डल शासन में रहे वे इस प्रकार थे वोपी सिंह मत्रिमण्डल 44 माह के लिए--दिसम्बर 989 से नवम्बर 990 तक, चन्द्रशेखर मत्रिमण्डल साढ़े सात माह के लिए--नवेम्बर 990 में जून 99 तक, पीची नरसिंह राव मत्रिमण्डल 5 वर्ष के लिए--जून 99 से मार्च 906 तक, अटल बिहारी वाजपेयी मत्रिमण्डल 3 दिन के लिए-मई 996 से मई 996 तक, सयुकत मोर्चा सरकारें देवशैडा कौ सएकार !॥ माह के लिए-जून 996 मे अप्रैल 997 तक, इद्ध कुमार गुजग़ाल सरकार एक वर्ष के लिए--अप्रैल 997 से मार्च 998 तक, अटल बिहारी वाजपेयी कौ भाजपा नेतृत्व वाली सरकार 3 माह के लिए--मार्च 998 से अप्रैल 999 तक, और वर्तमान अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनताब्रिक गठबंधम (राजग) मरकार--अक्दूबए 999 से वर्तमान तक। अधम प्रावस्था में अभिजन कौन थे ? ये वे लोग थे जिनकी आर्थिक पृष्ठभूमि सुदृढ़ थी (यद्यपि राजनीति उनकी रोजी रोटी छा धन्था नहीं ४), जो उच्च शिक्षा प्रात थे, अधिकतर उच्च जाति वाले थे, और साम्राजिक हितों के लिए प्रतिबद्ध थे। उनकी सामाजिक-राजनैतिक विचारधारा राष्ट्रवाद, उदारवाद एवं धार्मिक-सास्कृतिक सुधारों पर आधारित थी। स्वगत्र भारत में सत्ताधारियों की इस प्रथम पीढो ने अपने साहस, दृष्टि, और काम से नाम कमाया था और राजनैतिक सत्ता के उत्तराधिकारी के रूप में पद ग्रहण करने से चमत्कार (८४वयञ्य॥) अर्जित किया और पद पर बने रहकर इसे और अधिक चपत्कारी बनाया। दूसरी प्रावस्था में (मुदृढकरण) विशेष रूप से जो लोग 952 के चुनाव में चुने गए, राजनीति में केवल अशकालिक रुचि रखते थे। वे लोग आजादी के सपर्ष में भाग लेने के कारण कुछ राजनेतिक पद के रूप में अपना पुरस्कार चाहते थे। शुरू में इस अभिजन ने अपने दलीय ढांचे में अस्नन्तुलन पैदा किया, लेकिन राजनौति में सक्रिय सहभागिता के लिए उनका दबाव इतना मन्द गति का था कि वे जल्दी ही अपने दल की व्यवस्था में समाहित हो गए। वर्मश्चात 4957 का चुनाव आया जब तथाकथित राजनैतिक पीडिवों 0) का लम्बा प्रतिस्थापित प्रभुत्व (078-0890॥50०6 ४०॥॥8॥८०) टूट गया और राजनैतिक शक्ति अभिजन की नयी पीढी के हाथों में आ गयी। ये सश्रात व्यक्ति (एलीट) या तो धोडी बहुत भूमि के स्वामी थे या व्यापारी-व्यावसायिक व्यक्दि, छोटे उद्योगपति या सामाजिक कार्यकर्ता थे। ये इतने अधिक राजनीतिकृत नही हुए थे जितने कि इनके पुराने प्रतिमूर्ति थे। वे सोचते थे कि क्‍योंकि वे पुराने पेशेवर राजनीतिशों की निष्ठा पर विश्वास कर सकते थे, इसलिए उन्हें प्रत्यक्ष रूप से राजनीति से सम्बन्ध रखने को आवश्यकता नहीं थी। 3962 के बाद उन नये सप्नात व्यक्तियों (एलीट) ने एजनैतिक निर्णय करने की अक्रिया में प्रवेश : प्रा राजनैतिक व्यवस्था जो सामाजिक पैमाने में नीचे के सदर के थे, तथा जो मध्यम वर्गीय व्यावसायिकों, छोटे किसानों, औद्योगिक श्रमिकों, और यहाँ तक कि गुमनाम धार्मिक और सामाजिक प्थों के प्रतिनिधि थे। यद्यपि ये नये सप्नात व्यक्ति नोति निर्धारण में अधिक भूमिका निर्वाह करना चाहते थे, परन्तु पुराने अभिजनों ने अपने प्रभाव को जारी रखा। इस प्रकार नव अधिजन सहिष्णु (0]८०या) रहे एवं पुगने अभिजन उनके साथ समायोजन करने में ही लगे रहे। नये और पुरने दोनों अभिजनों ने स्थितियों में समायोजन के लिए तथा नये सम्बन्ध स्थापित करे के लिए अपने अपने मूल्यों का सशोधन किया। नये और पुराने अभिजनों के इस प्रकार वी अन्तक्रिया अभिजनों के शुद्ध प्रभाव सिद्धान्त के क्षीणत्व व मन्दन (0॥80॥) का सकेत देती है या यों कहा जाये कि पुणने अभिजन एक प्रकार की सौदेबाजी पर निर्भर हो गए। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 967 तक अभिजन के ढॉँचे में परिवर्तन 'शान्तपूर्ण' और मनद गति से हुआ तथा मार्क्स के शब्दों में कोई 'सघर्ष' नहीं हुआ। 967, 97], 972, 980, 984, 989, 99, 996 998 और अक्टूबर 999 के चुनावों में ऐसे अभिजन का उदय हुआ जिनमें से बहुत से लोगों के लिए राजनीति गेजी रेटी का साधन था। वे सत्ता के गलियारों (८005 ० ए०४८/) में नातेदारी,जाति और भाषा के बन्धनों का प्रयोग करके अपना रास्ता सरल करे में विश्वास करते ये (फरवरी 2000 के बिहार विधान सभा चुनाव में आठ ऐसे अपगाधी जेल में रहते हुए भी विधायक चुने गये जिन पर हत्या आदि के गम्भीर अपराधों के लिए मुकदमे चल रहे थें)। वे योजना के व्यावहारिक पक्ष से अनभिज्ञ थे और झूठे वायदे करके तथा आकर्षक नारे (अ०ह8७) गढ़ कर जनता का सहयोग लेना चाहते थे। वे लोकतात्रिक होने का दम्भ भरते थे, यहाँ तक कि उनके नारे भी लोकतात्रिक होते थे। किन्तु उनकी करनी और कथनी में अन्तर था। लोकता जीवनशैली के रूप में उनका स्वभाव उन के लिए विदेशी था। वैचारिक दृष्टि से 967-497, 97-989, और 989-2000 की प्रावस्थाओं में चार प्रकार के अभिजन कार्य कर रहे थे पण्पणवादी तर्कबुद्धिवादी (80002), अनुदारवादी और सश्लेपात्मक व समन्वयक (७,॥॥८४८७) । दूसरे और तीसरे प्रकार में उप श्रेणो भी थी (७) वे जो धर्म निरपेक्ष (5०८ए») किन्तु स्वार्थी राष्ट्रीय विचारधारा अर्दाशत करते थे और () वे जो नव धर्म निरपेक्ष और स्वार्थी सकीर्ण (94०८७) विचारधाएं प्रदर्शित करते थे। क्योंकि विभिन विचारधागाओं वाले ये अभिजन पार्टी में ही काम करे ये, उनकी वैचारिक भिनता ने पार्टी में विखण्डन पैदा किया जिसने पार्टो और अभिजन दोगों को ही विभिन स्व पर प्रभावित किया। नये राजनैतिक अभिजन, जो दिसम्बर 989, मई 996, मार्च 998 और अक्टूबर 999 के चुनावों में सत्य में लाए गए, को जनता के वोट इसलिए मिले क्योंकि जगा लगभग चार दशकों से शासन कर रही एक राजनैतिक दल व सरकार को उखाड़ फेंकगा चाहती थी और उन कमजोर सयुक्त मोर्चे के सरकारों को भी जो घटकों पर आधारि थी, ने कि इसलिए कि उनके विचार तर्कसगत और उदार ये, या क्योंकि उतीं आमूल-परिवर्तनवाद (90/20॥50) काफी गहराई तक समाया हुआ लगवा था। इसी काल से भाजपा सचालित अटल बिहाएे वाजपेयी की सरकार भी पहले मार्च 998 में और पर अक्टूबर 999 में सत्ता में आई। मार्च 4998 की सरकार अस्थिर सिद्ध हुई क्योंकि झके राजनैतिक व्यवस्था 7 ही 3 या 4 घटक दल निस्तर धमकी दिए चले जा रहे थे। अक्टूबर 990 की सरकार भी जनवरी 2000 में गुजग़त सरकार द्वाग सरकारी क्भचारियों को सा्ट्रीय स्वय सेवक दल की सदस्यता स्वीकार करने की अनुप्तति देने तथा फरवरी 2000 को केन्द्रीय बजट में सब्सिडी कम करने, तथा सितम्बर 2000 में बगाल में धारा 356 लागूकर शाज्य सरकार को गिराने सम्बन्धी मामलों को लेकर अपने कुछ घटकों के दबाव का साप्रना कर चुकी है। नये अभिजमनों को पुराने अ्रिजनों से तुलना करते हुए राजनैतिक अभिजनों कौ वर्तमान सरचना को विहिित करते के लिए हम कह सकते हैं कि प्रथम प्रावस्था के “तर्कबुद्धिमान प्रतिबद्ध राजनीतिज्ञों' के स्थान पर आगे कौ मप्रावस्थाओं में 'मध्यकोटिक (0॥८४४०८:८), प्रतिबद्धताहीन, व पश्चणाती' अधिजन आ गए। गत एक दशाब्दि के राजनैतिक अभिजनों में न केवल सरचनात्मक पृष्ठभूमि कौ विविधता है, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी वे विविध रूप दर्शाते हैं। उनके गजनैतिक सम्बन्ध (॥१8॥8॥07) उनकी वैयक्तिक प्रतिबद्धता की अपेक्षा विशिष्टापक वफादार (990८ए्ष5॥०) से अधिक निर्देशित होती है। पुणने अभिजन अपनी शक्ति का प्रयोग स्वततता से अथवा बुद्धिमान होगे के नाते करते थे जबकि आज के अभिजन स्वतत्र गजनेतिक शक्ति का प्रयोग करने में असमर्थ हैं। कुछ स्राव व्यक्तियों (एलीट) को छोडकर वर्तमान सप्रात व्यवित अधिकतर यथास्थिति (६४०५ ६४०) के विरुद्ध आवाज उठाने में विश्वास नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में सामाजिक अभियत्रण (४०८७० ८7६7 ०६॥॥6) का कार्य कतिपय क्रान्तिकारी अभिजनों के लिए अधिक कठिन हो जाता है जो वास्तव में आधुनिबीकरण के लिए प्रदियद्ध हैं और आधथिक परिवर्तनवाद, ग़ननेतिक लोक्तत्रवाद, और सामाजिक विकास में विश्वास कत्ते हैं। भारत में बदलते अभिजन के सन्दर्भ में योगेन्द्र सिंह ने कहा है. राजनेतिक अभिजनों में आजादी से पहले उच्च कोटि की सांस्कृतिक और स्थिवीय समससता (05 ॥०0०९००७/) विद्यमान थी | वे सभी उच्च जातियों के थे और उनकी अग्रेजी शिक्षा को, नगशैष, व मध्यम वॉर पृष्ठभूमि थी। शिखस्स्थ ((09) समूह विदेशी सस्कृति में रगे हुए थे ओर विदेशों में ही शिक्षित हुए थे , इसलिए उनकी आत्मछवि वाछ्धित भूमिकाओं (०५७८८४८५ 70८5) के अर्थों में विशेषता (590८४॥४) की अपेक्षा सामान्यज्ञ ((८0थ०॥50) हो थी। स्वतज्रता के दो दशकों के बाद अभिजन सरचना का स्वरूप काफी बदल गया है। वर्तमान राजनीतिक नेदृत्व में परिवर्तन के स्वरूप के सन्दर्भ में योगेद्ध सिंह ("० 4हदएटबक तु उबद।का ग्रिबद/8०७ 7773.. 37) ने कहा. है. (0) ग्रामीण आधार के राजनैतिक नेताओं का प्रभाव बढ रहा है (0) विभिन्‍न व्यवसायों से आये नेताओं के प्रभाव में थोडी कमी हो रही है (9) मध्यमवर्ग से सम्बद्ध व्यक्तियों कौ सख्या में महत्वपूर्ण वृद्धि हो रही है (0) राजनैतिक सामाजिक विचारधाराओं में क्षेत्रीय और स्वार्थपरक लक्ष्यों की अभिव्यक्ति अधिक हो रही है (४) उच्च जातियों के अभिजन के वर्चस्व में थोड़ी कमी आई है। योगेद्र सिंह ने 27 वर्ष पूर्व जो कुछ कहा था वह आज पी सत्य है। राजनैतिक अ्रिजन का उनकी अभिवृत्तियों के आधार पर प्ररूप एजणण्छ ज॑ एमप्रका एल हम एसने और नये अभिजन में उनका प्रकारीकरण करके तुलना कर सकते हैं, जिसका आधार 92 याजनैतिक व्यक्धा उनमें मूल्यों, विचारों, अभिवृत्तियों और समूचे समाज के विभेदक अभिविन्य (करलल्णाक्ष णाध्म/भ०१७ की सन्दर्भ हो सकता है। दूसरे शब्दों में उनके प्रकार "सार्वजनिक या सामूहिक' हित और उनके अपने व्यक्तिगत हित के आधार पर दिये डा सकते हैं। सार्वजनिक हित को आधुनिवोक्रण के लिए आवश्यक दश्या माना जाता है। उन हित (ए0॥०) को %" और निजी (०॥) हित को “$' सकेत मानकर हमें चार प्रकार के अभिरान मिलते है. 0)9-, ६- (0) 9-5+ (0) ए+5- और (0) ए+5+ | इव चर पका को हम क्रमश इन नामों से दर्शा मक्ते हैं उदामौन, (कर०ील्षध्यओ, डोड़ दोड कले वाले अथवा हस्तपरक (छथणएणआए0), प्रमविशेल (छाण्डाट्ब्लंप्छ) और विवेकरेल (ए०00०४॥५:) अभिजव इस वर्गीकर में प्रगति्योल और विवेकीशील दोनों हो जन हित के लिए कार्य करते हैं। इसमें प्रगतिशोल अभिजन विश्वास करते हैं कि प्रगति का चक्र हों को स्कावटों पर ध्यान दिए बिना स्वय हो चलता रहता है और यह मानव नियदरण से परे है, जबकि विवेकशील अभिजन विश्वास करते हैं कि प्रगि चेतन्य नियत्रण पर निर्भर होढी है। इसी वर्गक्स्ण को मानकर हम कह सकते हैं कि वर्तमान अभिजन अधिक उदासौन (95) और हस्तपरक व जुगाडू (9-,४+) हैं। इनको तुलना में पुराने अभिजन प्रगतिशोल (9+#-) और विवेक्शील (9+,5+) ये । हम यह भो मान सकते हैं कि वर्तमान अभिजन “अविवेजी विश्डितपरक' (ए78४००५ 5ए८०१८७) हैं ज्बकि अतीत के अभिवन विवेवशत सर्वहिदवादी (20009) परण्टाउ्ज) थे। राजनैतिक अगिजन का परिचालन (ए7च्णबमण्प ग॑ एगापव्त हा।दे विभिन प्रावस्थाओं में (स्वतत्रता के बाद) भारत में अभिजन का बदलवा स्वरूप॑ और उसे अवेश की भी परेटो के “अभिजन परिचालन” सिद्धान्त के सन्दर्भ में चर्चा को डा सकते है। यदि “अभिडन परिचालन” का सिद्धान्त गति को उस प्रक्रिया वो सत्दर्पित करा है शिरे रा अभिजन और अ-अभिजन (७०० ८॥७)के बोच परिचारित करते रहते हें वो ्र नैतिक अभिजन के अपने अध्ययन के आधार पर यह कहूँगा कि यह सिद्धान्त भर 4 समाज के रन्दर् में र्कपूर्ण नहों है। भ्यस्त में उच्च राजनैतिक स्तर (यद्टीय स्व0 पर ली अभिवन 'गैस्शामक' अभिजों में से प्रवेश नहों पाते हैं, बल्कि वे तिस्त राजनैतिक रू. (राज्य, जिला, या ब्लाक स्त)) पर कार्य करने वाले 'शासक अभिजन' से प्रवेश लेते हैं। रिलि राजनैतिक स्तर पर ये अभिजन उच्च राजनैतिक घयतल पर पदाधिकारी बनने से पत्ते यत विधान सभाओं या प्रदेशोय गबनेतिक दलों आदि में महत्त्वपूर्ण पद घारण किए हुए हे होते हैं। एक बार ये अभ्रिजन प्रदेशोय या जिला सदर से ऊपर उठ जायें, फिर वे पुणे रे पर वापस नहीं जाते बल्कि सक्रिय गजनोति में रहने तक वे उच्च राजनैदिक स्वर पर के है। पल्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि वे उस राजनैतिक स्तर में रुचि लेन के हक देते है जहा से श्रेणोत्रम में वे उसर उठे हैं। इसका अर्थ यह है कि अभियों है! 2388 2289 बल्कि ऊर्घ्वमुखी सचलन (एप प्णघ्टाणध्ण) होता है। झ्ि, सदस्य “शपसक मिद्धाल उच्र प्रक्रिया को सन्दर्षित करता है जिसमें स्राव सवह वी दस्य “शासक ऊभिबन समूह' के भीतर ही दूसरे व्यक्ति के स्थान पर आ जा है दो हैं राजनैतिक व्यवस्था 493 यह स्वीकार कर सकते हैं कि परेटों का सिद्धात्त तुमोरे समाज के सन्दर्भ में भी 'अभिजन सचलन' के राजनैतिक तथ्य को व्याख्या करता है। बाटोमोर (30009०८) का मानना है कि दोनों ही अवधारणाएँ परेटो के लेखों में पाई गई हैं, यद्यपि पहली अवधारणा अधिक प्रभावी है। मेंरे अध्ययन से राजनेतिक अभिजन का दो प्रकार का सवलन (परिचालन नहीं) स्पष्ट होता है, () वह सचलन जो शासक अभिजन समूह के वृहद (7७८४०) स्तर पर कार्य का रहे निम्न स्तर को श्रेणी से उच्च स्वर की श्रेणी में होता है (7) घह सचलन जो सूक्ष्म-मरचनात्मक स्तर पर कार्य कर रही उप-श्रेणी से वृहद सरचनात्मक स्तर पर कार्य कर रही ठप-श्रेणी में पाया जाता है। पहले प्रकार के सयलन में मैंने अल्पतत्रीय सप्रात व्यक्तियों (०॥8५४८०४८ ८४४८) और अप स्थित मप्रात व्यक्तियों (६0७]9८८॥ ९॥१८) के प्रध्य तथा उन्मूलनवादी सक्रियतावादी (730/०08 8०0५5घ5) और निष्किय सक्रियतावादो(छ25806 2८४७७) के मध्य सलचन पाया। सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने वाले सक्रियतावादी वृहद स्तर पर सक्रियतावादियों की श्रेणी में शामिल हो गए जिसके फलस्वरूप इस स्तर पर एकाधिकार शक्ति (00009 ० 9०७८) से सम्पन्म पहले से कार्य कर रहे सक्रियतावादी अपनी शवित से बचित हो गए। इस अभिजन गतिशीलता की इन शब्दों में व्याख्या कौ जा सकती है () नवीन राजनेतिक रुचियों का उदय, (॥) अधिक जोड-तोड के गुणों वाले नये स्रात व्यवितियों का उदय। इसलिए हमारे लिए सामाजिक ठतार या चढाव मे व्यक्तिगत तथा सरचनात्मक कारक दोनों हो महत्त्वपूर्ण हैं। शमपीटर (५०४०७०मए८८/) का भी विश्वास है कि व्यक्तिगत गुण व सामाजिक कारक दोनों ही 'अभिजन के परिचालन” में महत्त्वपूर्ण हैं। मार्क्सवादी विचारधारा, जो मूलरूप से “गैर-अभिजातीय' (7०7-०७४) है, के अनुसार अभिजन (विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति जो धन और सत्ता पर अधिकार रखते हैं) और गैर-अभिजन (वे व्यक्ति जिनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है) के बीच के सम्बन्ध सधर्ष पर ही आधारित हैं, जिसमें सत्ताधारी अभिजन व्यक्तियों को ठखाड कर उनका स्थान लेने का श्यास किया जाता है। प्रेरे अध्ययन ने यह बताया कि सत्ता में अभिजन व्यक्दियों को उखाड फेंकने दो प्रक्रिया और ठन पर सफलता प्राप्त करना हमेशा सघर्ष पर ही आधारित नही होता बल्कि इसमें जोड-तोड, सटनशीलता, सामजस्य, समझौता, और सौदेबाजों भी शामिल हैं। इसलिए यह माना जा सकता है कि भारत में राजनैतिक अभिजन के स्वरूप में होने वाले परिवर्तनों को समझने के लिए न तो परेटे का 'अभिजन परिचालन' सिद्धान्त और न हो कार्ल मार्क्स के “वर्ग सपर्ष' के सिद्धान्त से ही लिप्कर्ष निकाला जा सकता है। भारत में अभिजन के ही ढांचे और उनके प्रवेश के विश्लेषण के लिए हमें भिन्‍न विचारधारा का प्रयोग करना गा। राजनैतिक अभिन्न, सामाजिक परिवर्तन और आपुनिकोकरण (एगाहद्व 6, 5००9 ट।छएर आएं ऐचै९०ँघ॥ा5ब्रा००) समाज के आधुनिकीकरण में राजमैदिक सश्रात व्यक्तियों की भूमिका के विश्लेषण के लिए सश्नात व्यक्तियों को हम दो समूहों में विभाजित कर सकते हैं। डेविड एप्टर (0बजंत पथ) के मॉडल के अनुरूप () “विकास व्यवस्था” वाले अभिजन और (४) “अनुर्षण वक्व राजनैतिक व्यवत्या (ग्रथाधाव्गएथ) व्यवस्था” वाले अभिजन। पहले अभिजन उपलब्ध ससाधनों और राजनैतिक ऊर्जा (८॥०९८७) को गतिवान बना कर (7०)58) और उनका दोहन करके समाज का पुनर्निर्माण करने का प्रयल करते है। भौतिक प्रगति प्राप्त करने के लिए आधिक पिछडेपन पर उनका आक्रमण सस्थाओं और अभिरुचियों में परिवर्तन के माध्यम से होता है। राजनैतिक दल या सरकारी उपकरण उनके लिए आधुनिकीकरण के प्रमुख यत्रों का काम के हैं। वे या तो नई सस्थाओं की रचना करते हैं या फिर आर्थिक तथा सामाजिक विकास क्के मार्ग में अवगेधों को दूर करने के लिए पुणनी सस्थाओं को बदल देते हैं। हम कह सकते हैं कि “विकास व्यवस्था” वाले अभिजन आर्थिक व सामाजिक भ्रगति, चैचारिक प्रतिबद्धता और नीतियों के प्रति लगाव रखते हैं। “अनुणक्षण व्यवस्था” वाले अभिजन इसके विपरीत वे लोग है जो आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के अनुशशण एवं बने रहने (.7282५भ०॥ को उच्च प्राथमिकता देते हैं। वे प्रदिस्पर्षी राजनेविक एवं हित-समूहों के बीच समझौते विश्वास करते हैं। इस व्यवस्था के अभिजनों की विशेषताएँ हैं : बहु-स्वामीभकित (पाणप० बाण 2४0९४), युक्तियुक्त लचीलापन (उलाव्ल गी०ध्रणाण), समझौतों को स्वीकृति, और ट्रविता (0॥/5८४८४७) । इस प्रकार अनुरक्षण व्यवस्था में अभिजर के पास कार्य करने का क्षेत्र बहुत सीमित होता है और उनकी विकास नीतियों पर अनेक प्रकार के दबाव कार्य करते हैं। एप्टर (80७) के सूत्र को लेकर हम कह सकते हैं कि “विकास व्यवस्था” वाले अभिजन समाज के बन्दी हैं। भारत में वर्तमान राजनैतिक अभिजन अपने स्वार्थ के लिए अधिक कार्य बखे हैं। अत वे "विकास व्यवस्था” की अपेक्षा “अनुरक्षण व्यवस्था” से अधिक सम्बद्ध एं, फलस्वरूप वे राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक ढांचे का पुनर्निर्माण करने में असफल रहे है अथवा द्वुतगामी आर्थिक नीतियों और सामाजिक कार्यक्रमों को विकसित करने और उतकें क्रियाल्यन में सफल नहीं रहे हैं। मार्क्सवाद के लेनिनवाद चर के रूप में वे जनता वो परमाणु कौ तरह पृथक (2०ाज्आाटथ)/ 5८०आ»आं८०) च्यक्तियों से उन चेतन १ अभिकर्ता, जो पूर्ण सामाजिक परिवर्तन कर सकें, के रूप में बदलने में अस्त 4 हम इस देश में इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं यदि आजादी के बाद आर्थिक, सामाजिक, और सजनेतिक छेत्रो में निर्धारित लक्ष्यों को पहले जान लेते और हिए उस सीमा को खोजते जिस तक हमारे राजनैतिक अभिजन ने इन लक्ष्यों और आदरशों हर पहुंचने का अ्रयल किया है। आर्थिक क्षेत्र में हमारे लक्ष्य हैं ः विकसित प्रद्योगिवी (30ए०02१ (६०७००१) प्रचुर मात्रा में (॥७७४०8४) आर्थिक उत्पादन, गे की पा आ जो ऑलाहिय करना, व्यवसाय की स्वृतत्रता, या ७(000४८) न्याय, और गरीबी और निराश्रितता ३ की समार्णि। राजनैतिक क्षेत्र में हमारे लक्ष्य हैं लोकहव, सत्ता का कदर सदा जनता और सब 52242 00420 डे 80 हैं. समानता, गतिशोलता, धर्मनिरपेक्षता, व्यक्तिवार्टत' रे साजिक हित आज कर र जन्म के बजाय व्यक्तिगत योग्यताओं के माम लेक्नि कण हमने इन लक्ष्यों को प्राप्द कर लिया है ? यह बाद स्वीकार नहीं की राजनैतिक व्यवस्था १95 सकती कि केवल राजनैतिक अभिजन हो किसो समाज में विकास के स्वरूप तथा आधुनिकीकरण कौ प्रक्रिया का निर्धारण करते हैं। इसमें अनेक कारक हैं, जैसे समाज में विविध भस्याओं व सरचनाओं का स्वरूप, जनमानस का सामर्ध्य, ग़जनैतिक स्थिरता, सास्कृतिक विरासत, और राजनैतिक स्वरुप आदि जो कि राष्ट्र या प्रदेश के विकास और समृद्धि को प्रभावित करते हैं। तथापि राजनैतिक अभिजन योजना बनाने वाले और निर्णय करने वाले होने के नाते, देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हमने विविध क्षेत्रों में प्रणति की है। यह भी स्वीकारा जा सकता है कि हमारा बहुत सा विकास्त उन “सक्रियतावादियो' (#८ाण#5$) के कारण हुआ जो गत कुछ दशाब्दियों में देश में थे। लेकिन यह भी सत्य है कि यदि हमात देश अभी आधे रास्ते में ही पहुचा है तो कारण यह है कि राजनैतिक अभिजन हमारे समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में अनेक प्रकार से बाथक हो सिद्ध हुए हैं। उनके पश्षपात पूर्ण रवेये, परम्पणाओं के अन्धानुगमन, विकास के प्रति उदासीनता, उनके निजी स्वार्थ, राजनैतिक द्वन्द्, गुटबाजी, ओर उनमें भ्रष्टाचार ने निश्चित रूप से हमारे समाज में तकनीकौ-सामाजिक परिवर्तनों में बाधा उत्पन को है। क्या औमत भारतीय को ऐसे कार्यक्रमों और नीतियों का लाभ मिल सकवा है जा शक्तिशाली प्रधादी समूहों के एकाधिकास्पूर्ण व्यवहार से प्रेरित हों ? क्या एक देश दस रुपये से भी कम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय पर मजबूद उद्योग व कृषि बना सकता है ? क्‍या एक मम्ाज का आधुनिकीकरण उन सभ्नात व्यक्तियों के द्वारा किया जा सकता ऐ जिनके 'पमाकेदार' (०58) कार्यक्रमों में समितियों व आयोगों की नियुक्ति केवल सुझाव देने, और साथत और कार्य प्रणाली तैयार करने की है? शब्द और वायदे कभी भी किसी गदैब समाज व देश का जीवन स्तर ऊँचा नहीं उठा सकते। अभिजनों को तो विशेष उद्देश्यों के लिए विशिष्ट आन्दोलनों का गठन करना है। जनमत के साध खिलवाड नहीं होना चाहिए। अभियान (८आ॥72275) विज्ञापन शैली कौ नुमाइश पर आधारित नही होने चाहिए। सक्रान्त व्यक्ति किसी वस्तु का विक्रय नही कर रहे हैं , वे तो लोगों को सारे जीवन के लिए नये सपने दिखाने का प्रयल कर रहे हैं। इसके लिए एक अला तरह की अन्तर्दष्टि (७8६0) चाहिए। बाधाएँ (छ9सतश5) कुछ ऐसे अल्पजन सक्रियतावादी (०॥8४ल४८ 2लाधनन$) सप्नात वर्ग के लोग हैं जिनमें आधुनिकौकएण की अन्तर्दृष्ट है और जो विकास के लिए समर्थित हैं, लेबिन वे भी काम करने में आई कठिनाइयों और अनेक समस्याओं के कारण हमारे देश में बहुत कुछ नही कर पाए। उनके सामने जो प्रमुख समस्याएँ आती हैं, वे हैं. 0) विभाजित विचारधाणओं कौ समस्या जैसे, निष्क्रिय पार्टी पदाधिकारियों, पार्टी विद्रोहियों, एवं अप्रतिबद और उदासीन साधारण लोगों की तथा पार्टी सदस्यों, पार्टी के पहचानकर्ताओं और पार्टो के जन-विचारों (0८ 70200089) कौ समस्याएँ, (8) एक दूसरे को काटने कौ प्रवृत्ति (ए्र०७5०णागढ् सबधी विध्राति (००४०४०४) की समस्या और वैकल्पिक अधिमान्यवाएँ (गर्वाब्राण्ड ए/थ८१९०८८७), (मं) सत्ता में हिस्सा लेने के लिए सश्नाव व्यक्तियों में आन्तरिक कलह। 496 राजनैतिक व्यवस्या आजकल राष्ट्रीय रर पर कार्दख राजनैतिक दल सघापूर्त प्रतिबद्धताओं काले समूहों और समूहों का उमयट है। जब राजनैदिक व वेद्ारिक विविधताओं (कणए्टध्णवंथ्छे को निद्यने के लिए कोई समन मिलना कठिन हो जाता है ठो सूभो सतहो सदस्य या दो अरजनैतिक हो जाते हैं दे टेश व सज्य में ऊप केद्रीय शक्तियों (व्काप्रएकों 0ि०थो मे प्रेत्लहिद करने लगे हैं या पार्टी छोड़कर दूर पार्यो में शामिल हो जाते है, जो उन्हें ने हैं। उदाहर्य स्वरूप उन पदलोलुप (००४-६८०८००१) विधायओों जा सकता है जिननें से कई ने व्म से कम दो बार, कुछ ने दीन बार, और पाले बदले हैं। पद ल्वलुफ अभिजन और आदर्श-परक अम्रिजन के बोच खई हमेशा पहले ्रक्यर के अभिजन को ऐसे क्रियाक्लाओं में लगने को मजबूर मसामान्यव बाह्य विचारों से प्रेरित होते हैं। हम यह कह सकते हैं हि में दाये और बाये बने रहते हैं जब कि पदन्‍लोलुप अभिवत रहते हैं। यही केद्रवादी लोग हैं जो उनदा के बोच पार्टो को न केवल बदरनी देश के विकास और अधुनिकीकरद में भी रुकावट डालवे हैं। विरेषाभाम यह है कि उच्च और दिम्तर रूवह के अभिजन एक दूसरे को अद्पेित कखे रहते हें कि उन्हेंने पार्यो को परेझानो में डाल्य है या समाज के विकास में बाधा उपन को है। ऊपरी स्तर के अध्िजन निचले स्तर के अभिजन को जातिवाद, क्षेत्रवाद, पाषदी विभाजन, और माम्मदायिक्ता के लिए आप्रेपित करते हैं जबकि, निचले अभिवन शाप अप्रिजन पर भदेशिकदा, प्रद्टादार और देश की घोमी प्रगति का आप लगाते हैं। पह लेवल उन मन्बस्धों के स्वरूप को दो उच्च व दिस अभिजत के बोच है और उनके सदेहें को भी जो उनके बोच है, दरमादा है। डहन्डार (04207८००0०४) ने भी माना है कि परसर रून्देह ओर रूद्दा व्य अत्तमान विदर्य रिश्चित रूप से व्यवस्थित सामाजिक सपई के निर्धारित करने वाला कारज व ऊवा है! मैंने 'अर्फिजन न्यूक्लाइ(८॥6 7०८०) या “उच्च स्वग्ेय अभिवन! शब्द उसे लिर प्रयोग क्या है जो “अल्पदाटीय' (णड्टक८०८) अधिजन के रूप में राजनैटिक कार रखते हैं और निनम्दरय (0फधय-धाअण्ण) अभिजन उनके लिए बितके पश्धन (500) प्ट्या) अभिजन को टरह) निस्म है। “अल्पजादाय अधिवना से साइट िल्म (८ छह अद्ा3) की शासक वर्म' को अवधारया के विडल के रूप में विकसित की गई है दा ऊसन्देषजनक स्वरूपों (एफन्‍्गरडिवणा (६००८७) को इंगिव क्या जा सके उपर उतको करने में सैद्धातिक कठिताइयों नी देशो जा सके, यद्यपि रंढों अवधरमाए उस समूह क्से प्रभावों सजनैदिक स्पिवियों (800४ एणप्ंत्थ छ00०७) के सन्दर्ष में है। कि अल्पदार्दय (गाइआतएल) अधिजन और आपीन (हण्छुं३०६०) अभियन के लख सा + 3 अल्पवादीय अभिवन के उद्देश्य या दो इतने व्यव्निगठ (पद हथियात) दा इंदन समान्य (यथावत स्थिति बगए (080) के लिए बिता विवेकपूण अभिजन को प्रेरित बसे में मामाजिक विक्मम के रखने) या इसने क्रान्दिकरी 07% सीटें पिछडी बदियों कपू्य विज्लेषय के आर्ित करना) होते हैं कि वे आपीव _अमजल रहते हैं। आन अधिवन भो आददिक विश्स डर उपने इच्छा के व्यक्त करे में असमर्थ होते हैं और उन इच्छाओं राजनैतिक व्यवस्था प्ग्र की पूर्ति के लिए स्वय को सगठित कल में भी काफ़ी असमर्थ पाते हैं। परिणाम यह होता है कि राजनैतिक दृष्टि से अप्रभावी (छालीटल४०) इन अभिजन को अत्पजनीय अभिजन प्राय आर्थिक विकास, समाजवाद, सामाजिक न्याय, एकाथिकार को समाप्ति, आदि लक्ष्यों के रूप में वायदों और नारों से अपने वश्ञ में कर लेवे हैं, जबकि वे (अल्पजनीय अभिजन) स्वय अधिकरर अलोकतान्विक और एकाधिकारिक साधनों से कार्य करते रहते हैं। दिखाने के लिए अल्पजनीय अभिजन आदर्शवाद से प्रेरित रहते हैं, लेकिन व्यवहार में उनके आदर्श शायद ही की काम में आते हों। जब तक आधोन अभिजन चुप रहेंगे और अल्पजनीय अभिजन को अपने दमन के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरायेंगे वव वक छोटे व बड़े दोनों राजनैतिक समूह अल्पजनीय अभियन के आपोन बने रहेंगे और वे निम्न स्तरीय तथा नये प्रविष्ट नेताओं की राजनैतिक वेघानिकता (]८६७॥४४८)) की अवहेलना करते रहेंगे। प्रारत में स्थूल (००३४८००) स्तर पर आपधुनिकोकरण को समझने के लिए हमें सूक्ष्म (5ए८०) स्वर पर इसको रचना को स्थितियों में आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक विकास के स्वरूपों को परखना है और दो प्रिल स्तररों-राष्ट्रीय और राज्य-पर काम कर रहे अभिजनों के मध्य सबधों का भी परीक्षण करना है। यदि हम राज्य स्तर पर अल्पजनीय अभिजन द्वास स़जनैतिक मामलों में हिस्सा लेने वी डिआ में और राष्ट्रीब स्तर पर उनके एकाधिपत्य (80700) के स्तर (९४९) के बीच सबंध के देखें, तथा राष्ट्रीय स्तर को विस्तृत गजनेत्विक संदर्भ मानें और राज्य स्वर को लघु राजनैतिक सदर्भ मानें, हम कह सकते हैं कि विस्दृत गजनैतिक स्तर पर अभिजन के हिस्सा लेने का उच्च या निप्त स्तर लघु राजनैतिक पर उनके राजनीति में हिस्मा लेने के स्तर को निश्चित करता है। उच्च राष्ट्रीय स्तर पर एकाभिपत्य कौ प्रवृत्ति जितनी अधिक होगी उतनी हो लघु राजनैतिक आधार पर अभिजन कौ हिस्सेदारी कम होगी। इसका कारण यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर अभिजन में अधिक एकाधिकार प्रवृत्ति राज्य स्तर पर अल्पजातीय अभिजन दो अपने विचार स्वतत्रदापूर्वक ओर बेबाकी से अभिव्यक्त करने को ह॒दोत्साहित करती है। जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक शक्ति कुछ अल्पजनीय अभिजन के हाथों में केन्द्रित रहवी है, वहा शज्य स्तरीय गैर-एकाशिकारवादी गैर सक्रियतावादी अभगिजन में स्थानीय सामाजिक-राजनैतिक मामलों में हिस्सा लेने की इच्छा असन्तोष को बढ़ाती है। फलत* वे अपने राज्य में सक्रियतावादी अभिजन से समर्थन वापस लेने लगते हैं। इसमें निहित मान्यता (एप0८/))०६ 255077700०॥) यह है कि राज्य स्तर पर सक्रियतावादी अल्पजनीय अभिजन उन लोगों के होने की सम्भावना होदी है जो न केवल राज्य स्तग्ैय ग़जनीति में अह भूमिका निभाने की इच्छा रखते हैं बल्कि ग्रष्टीय राजनीति में भी। ऐसा होने पर राज्य स्तग्रेय अल्पजनीय राजनैतिक सक्रियतावादियों में राष्ट्रीय स्तर के अल्पजनोय अभिजन कौ आलोचना कम हो जाती है! यह इसलिए क्‍योंकि उन्हें मालूम रहता है कि केद्ध में एकाधिकारियों की आज्ञकरिता (८७ए७७॥०४८४) उन ग़जनैतिक भूमिकाओं के लिए अधिक सार्थक (हाल) होगी जो चे राष्ट्रीय स्तर पर निभाना चाहते हैं। सक्रियतावादियों को यह प्रवृत्ति 'सक्रियतावादियों में असन्तोष पैदा करती है जिसके काप्ण राज्य में सक्रियतावादी अभिजन से सहयोग करने को मना कर देते हैं। उदाहरण के लिए हम एक प्रकरण उध्दृत कर सकते हैं। 975 में आपातकालीन 798 राजनैतिक व्यवस्था अवधि के दौयन--राजनैठिक व गैर राजनैतिक अभिजन की क्‍या भूमिका थी जब देश के अनेक नेता जेलों में बन्द कर दिए गए थे, प्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिये गये थे, जीवन के सभी क्षेत्रों में असहमति रखने वाले लोगों को परेशान किया गया था, और साश देश भव और अनिश्चितना के कोहरे में घिर गया था। मैं तो यह कहूँगा कि अभिजन-राजनैतिज, बुद्धिजीयी, मौकरशाह और यहाँ तक कि न्यायपालिका के अभिजन भी बजाय इसके कि वे महत्वोन्मादी (गराध्#००३०/३०) नेताओं को और उनकी क्रूरता को तथा भ्रष्टाचार और जनता के प्रति उनकी अनेतिक भावनाओं का पर्दाफाश करते, अपने ही पूर्वाग्रहों का शिकार हो गए और अवचेतन मन में अपने सकीर्ण हिों के सरक्षक के रूप में एक हो व्यक्ति बेवा के समर्थक हो गये। आपातकाल के उन उन्‍्नीस महीनों के दौगन अभिजन भीड को तह चल रहे और राष्ट्र तवा सरकार वो अपनी गम्भीर सलाह देने की जिम्मेदारी से के रहते थे। यह कैसे हुआ कि आपातकाल का निर्णय ससद में सभो प्रकार के राजनैतिक निर्णाव कर्ताओ मे पारिद कर दिया ? क्‍या यह समझा जाये कि आपातकाल में सरकार ने जितनी कार्यव'हिया को तथा धौरे-धौरे व्यवस्थित ढग से लोकतत्र और सविधान का जो गला घोंठ बह वास्तव में सत्ता में निर्णय लेने वालों की सहमति से ही हुआ होगा ? क्‍या यह समझा जाये कि जब इस प्रकार की दुर्भावनागद (७«2॥0) स्थितियों में ससद में कानून पा हुए, तब सक्रियतावादी राजनैतिक अभिजन के पास उसका कोई उपाय नहीं था ? क्‍या हम यह समझें कि आपातकाल तथा उसके बाद जो एकाधिकारी प्रवृत्ति के कुछ लोग सत्ता में आए उनका उदृण्ड (॥७0979८0) व्यवहार सभी समर्पित राजनैतिक अभिजन कौ दृष्टि में न्याय सगत था ? मुद्दे की बात तो यह है कि जो राजनैतिक अभिजन सत्ता में थे वे विशाल पैमाने पर आए सकट में और समाज के हित में अपनी भूमिका के निर्वाह में असफल रहे थे। यह कहना भी अविवेकी न होगा कि नवम्बर 989, और फिर मई 996, फखरी 4998 और अक्टूबर 999 के राष्ट्रीय और राज्य स्तर के ऐतिहासिक चुनावों के बाद भी यद्यपि नव राजनैतिक अभिजन के देश के विकास का और प्रष्टाचार को मियने का अवशन मिला, फिर भी उन्होंने इस अवसर को बर्बाद कर दिया। जनता की अपेक्षाएँ तो यह थीं कि सत्ताधारी राजनैतिक अभिजन औद्योगिक एकाधिकार को रोकेंगे, विशेष समयावधि में निर्षगग को समाप्त कोंगे, जनसाघारण की भुगठान करने की शक्ति से अधिक मूल्य वृद्धि नहीं होने देंगे, जीने योग्य वितरण प्रणालो बनाएँगे, और प्रष्टाचारी नेताओं से छुटकाग़ पाने के लिए सस्थात्मक सरचना की स्थापना करेंगे, लेकिन जनता ने तो अब तक सामाजिक पतन और आर्थिक रूकावर्यों कौ अवधि को समाप्ति को शुरु होते भी नहीं देखा है। जो कुछ भी हमने पहले कहा है उस्तकी पुनरावृत्ति की जा सकती है : 7. विस्तृत राजनेदिक आधार पर एकाधिकारी प्रवृत्तियों के उच्च स्तर पर होने के फलस्वरूप राजनीति में निचले स्तर के अभिजन की हिस्सेदारी कम हो गई है और समाज के आधुनिकौकरण में उनकी रुचि में रुकावट पैदा हो गई है। 2. कुछ उच्च स्तरीय राजनैतिक अभिजन जो ग़जनैततिक ढाचे में महत्वपूर्ण स्थान रखते है और राजनैतिक शक्ति पर एकाधिकार रखते हैं (जिनकी अवधारणा अभिजन के रूप में को गई है) सन्निकट (७०६०-०४) नहीं है और उनमें राजनैतिक राजनैतिक व्यवस्था 99 शवित के रूप में कोई ससकतता (८०८१०) महीं है। 3 वर्तमान अपिजन छौ प्रमुख चिन्ता यह हे--उन सहित जो मार्च 998 में और फिर अक्टूबर 999 में सत्ता में आये--कि सत्ता हाप्चिल की जाये और सुरक्षित की जाये क्योंकि इसके अभाव में वे जनता के साथ निकट का सम्बन्ध स्थापित करने में असफल रहेंगे। 4. वर्तमान राजमैतिक सक्रियवावादी और राप्र्पित राजनैतिक अभिजन ने तो आधुनिकीकाण को अस्वीकार करने में विश्वास करते हैं और म ही परम्परागत व्यवस्था में बल्कि आधुनिकीकरण के विषय, दिशा और गति के नियमन और साथ ही परम्परावाद के कुछ तत्वों में भी विश्वास करते हैं। सक्षेप में, हम यह मानते हैं कि जब तक यर्तमान राजनैतिक अभिजन का व्यवहार--धृष्ट स्वार्थी लाभ की अपेक्षा देश के विकास सम्बन्धी मूल्यों से प्रेरित नहीं होगा, आधुनिकौकरण के लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेंगे और सामाजिक परिवर्तन के लिए सर्ष के रास्ते में रूकावट पैदा होती रहेगी। भारत भे राजनतिक दल (ए06वव्रा खाला६5 0 ॥009) लोकतानिक राजनेतिक व्यवस्था ऱजनेतिक दलों के बिना नहीं चल सकती। प्रत्येक राजनैतिक दल का अपना सरचनात्मक स्वरूप, सिद्धान्परफता (्ंधा/॥0०/), नेतृत्व का स्वरूप, और कार्यशैली होती है। राजनैतिक दल लोगों के वे सघ माने जाते हैं जिनके एक से विचार होते हैं और सरकार के कार्यों और नीवि सम्बन्धो सिद्धान्तों के प्रति एक से आदर्श होते हैं। ये आदर्श और कार्यक्रम चुनाव घोषणा पत्र में दर्शाए रहते हैं जिसके आधार पर माना जाता है कि निर्वाचक समूह योट का प्रयोग करता है। राजनैतिक दर्लो से चार प्रमुख कार्यों के किए जाने की अपेक्षा की जाती है. ()) देश के सामने आई समस्याओं का अनुमान लगाना और वैकल्पिक समाथान प्रस्तुत करना जिसके आधाए पर दल अपनी नीति बना सके | (2) इन समस्याओं के सम्बन्ध में निर्वाचक मण्डल को जानकारी देना तथा दल के द्वारा बताए गए समाधानों की उपयुक्तता के विषय में उन्हें आश्वस्त करना (3) अन्य दलों की नीतियों और कार्यक्रमों का आलोचनात्मक मूल्याकन करना, विशेषरूप से सत्ताथारी दल का, और उनमें कमियों तथा खामियों को इगित करना (4) शासन की निर्णय प्रणाली में लोगों को हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना। सिए्सीकर (5आश८», 964 3-36) के अनुसार दलोय व्यवस्था का उदय समाज के प्रकार पर निर्भर कोशा। उन्होंने समाज को चार समूहों में विभाजित किया है. () समगातीय (07708९7८005) अविक्सित समाज (2) समजातीय विकसित समाज 8) विषमजातीय अविक्‍्सित समाज (4) विषमजातीय विकसित समाज। समजातीय समाज वह समाज है जिसका एक धर्म, एक भाषा और एक प्रबल प्रजाति हो, जबकि विषमजातीय समाज बह समाज है जिसमें धर्म, भाषा, प्रजाति तथा जातियों आदि की विविधता हो । अविकसित समाज वह समाज है जिसमें आर्थिक विकाप्त का स्तर निम्न हो, उद्देश्य में एकलता (&प8णआग9) और लक्ष्य-प्राप्ति में अविलबदा (रह०८)) न हो। अथम प्रकार के समाज 200 एजनैतिक वयक्‍ाया का उदाहरण इटली है, दूसरे प्रकार का जर्मनी, चीन और रूस, तीसरे प्रकार का अमेरिका, और चाथे भ्रकार का भारत और पाकिस्तान। अन्तिम श्रकार के समाजों में विभिन्न विचारों वाले अनेक दल होते हैं। राजनैतिक दलों के प्रकार छ विविध आधारों पर पहचाने जा सकते हैं : () रुचि (7/८८४) के आधार पर इनका वर्गीकरण धार्मिक (जैसे अकाली दल) दया सास्कृतिक (जैसे दलित, भाजपा) आदि आधार पर किया जा सकता है, जबकि सिद्धान्तों के आधार पर इनको इस प्रकार कहा जा सकता है, जैसे साम्यवादी, समाजवादी, आदि। (2) सदस्यता के प्रकार के आधार पर इनकों जन आधारित (7755-985८0) (प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुल) और सवर्ग आधारित (०४०४८-७३५००) (जो विशिष्ट विचार धाम में विश्वास रखते हों उनके लिए खुला) में वर्गीकृत किया जा सकता है। 6) कार्यशैली (#ज़ट ण॑ तकुश्ञभां0्) के आधार पर उन्हें मुक्त (०/७४) (चर्चा का मुक्त मच) और अव्यक्त (869) (जहाँ निर्णय करना अभिजन तक हो सीमति है) माना जा सकता है (4) कार्यकर्ताओं की भर्ती के आषाए पर इतको निर्वाचक (००८४५८) और सहयोझ्चित (०००७५४०४८) में बाटा जा सकता है। ७) क्षेत्रीय (८7०४४) और कार्यात्मक ढाचे (णाला०्श आाप्रतरष्याण्ट्र) के आधार पर दो प्रकार के दल-एकात्मक (४४/»7)) (जहा शक्ति एक मात्र खोत में निहित हों) और संघीय (०4५४2) (जहाँ शक्ति विभाजित हो) हो सकते हैं 6) कार्यकलापों (४०४५॥४८७) के विस्तार के आधार पर दल सीमित या असीमित विस्तार वाले हो सकते हैं। कार्यस्तर के आधार पर भारत में दीन प्रकार के राजनैतिक दल पाये जाते हैं (७) जो राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करते हैं (जैसे, काम्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारदीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, (0) वे जो कुछ ही राज्यों में कार्य करते हैं (जैसे सुमता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी (०) वे जो एक ही राज्य में कार्य करते हैं (जैसे शिग्ेमणी अकाली दल, तेलगू देशम पार्टी, द्रविड मुनेत्र कषगम (0/५ा९), ए.आई एडी एमके, तमिल मनिला काम्रेस, नेशनल काम्फ्रेस्स, असम गण परिषद, मणिपुर पीपुल्स पार्टी, शिव सेना, भारतीय राष्ट्रीय लोक दल, राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चा, सिक्किम संप्राम परिषद, हरियाणा विकास पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रन्ट, केएल कांग्रेस, आदि! कुछ ऐसे दल भी हैं जिनें चुनाव आयोग की मान्यता तो अ्ाप्त है किन्तु किसी भी राज्य में सत्ता में नहीं हैं (जैसे मुस्तिम लीग, जनता पार्टी, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, तृणमूल काग्रेस, आदि)। हम यहाँ कुछ यजनैतिक दलों की रूप रेखा, कार्यक्रमों और नौतियों का वर्णन कर सकते हैं। कांग्रेस पार्टी जो राष्ट्रीय काग्रेस पार्टो के नाम से जानी जाती है, 885 में गठित हुई थी। लगभग 35 वर्ष तक (885 से 920 उक) इसने प्रभावी रूप से कार्य किया, 27 वर्ष तक (920 से 947) राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में और लगभग 40 वर्ष तक (997 996 तक) शासक पार्टी के रूप में--बीच में 4 साल दो माह छोडकर-जैसे मार्च [7 से जून 979 तक के 2 वर्ष 3 माह मोगणजो देसाई का शासन काल, जुलाई 7979 से जनवरी 4980 तक चरणसिंह का 6 माह का शासन काल, दिसम्बर 989 से नवम्बर 990 वर्क वीपोपसि|ंह का । माह का शासद काल, और नवम्बर 990 से जून 994 तक चब्धशेखर का सादे छ. माह का शासन काल) इस पार्टी में मष्यमागीय (व्याधा), वाममार्गीय (8७) और दावामार्गीय राजनैतिक व्यवस्था 20॥ (78705) विचारधागओं के नेताओं को सयुक्त भूमिका रही है। लोक गगाघर तिलक, जिनका प्रभुत्व 920 तक इस पार्टी पर रहा, मे इसको राष्ट्रीय सैन्य स्वभाव प्रदान किया जबकि गोखले ने सैनिक देशभक्त कौ अपेक्षा सुधारक का कार्य किया। बिपिन चन्द्र पाल क्रान्तिकारी विचारों के थे, मदन मोहन मालवीय, दादाभाई नौरेजी, और फीरोजशाह मेहता नरम विचारों वाले थे। 920 के बाद गान्यी युग प्रारम्भ हुआ जिसमें सत्याप्रह, अहिसा, सिविल अवज्ञा (लंज) (७०७८०/८४००) और अस्हयोग पर बल दिया गया। सुभाष चन्र बोस, जो सशश््र संघर्ष में विश्वास करते थे, ने 934 में काप्रेस पार्टी छोड दी, जबकि जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेन्र देव ने 30 और 40 के दशकों के बीच काग्रेस पार्टी छोडी और काम्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई | 937 के चुनावों में काप्रेस पार्टी । में से 8 राज्यों में विजयी हुई थी और 70% मत प्राप्त किए थे और दो वर्ष तक मत्रिमण्डल का उत्तरदायित्व सम्भाला था, किन्तु 942 में त्यामपत्र दे कर इस पार्टी ने भारत छोडो आन्दोलन छेड दिया और 947 में प्रथम शासक दल बना। नेहरू और इच्दिरा गान्यी के 33 वर्ष के शासन काल में इस पार्टी का ससदीय प्रभाग सगठनात्मक प्रभाग से अधिक शक्तिशाली रहा। इसको 60 के दशक के प्रारम्भ और मध्य में सकट का सामना करना पडा, अनेक राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पडा और 964 में काम्रेस (आई) और कांग्रेस (ओ) दो फाड़ हो गए। मार्च 2977 में केद्ध के चुनाव और 972 में राज्यों के चुनावों में काग्रेस ने बडी सख्या में वोट प्राप्त किए, लेकिन मार्च 977 में इन्दिरा गान्धी द्वार 975 में आपात काल की और परिवार नियोजत्र के विरुद्ध सजय गान्यी द्वाग़ उतपौडन के तरीकों के कारण पत्जय का सामना करना पडा। लेकिन यह पार्टी फिर बहुमत प्राप्त कर जनवरी 980 से नवम्बर 989 तक और फिर जूत 99] से मई 3996 तक सत्ता में बनी रही। इस पार्टी की धार्मिक नौति धर्म निरपेक्षता की रही है, राजनैतिक नीति सघीय (09७०) और आर्थिक नौति मिश्रित रही। इतने लम्बे समय तक इसके सत्ता में बने रहने का प्रमुख कारण विरोधी दलों में एकता को कमी था जबकि इसके सत्ता खोने के प्रमुख कारणों में से आन्तरिक कलह, गुटबाजी, भ्रष्ट छवि, नेताओं का जनता से विगुख रहना, केन्द्रीयकृति सत्ता, सत्ताधारियों की आलोशान जोवन शैली, सामाजिक समस्याओं जैसे गरीबी, बेकार मुद्रास्फीति, साम्रदायिक दगे, कश्मीर व पजाब कौ समस्याएं को समाप्त करने में अरुबि, केद्र-गज्यों के सम्बन्ध पर असगति (7000 ६7०), श्रशासन में अकुशलता, रा राज्य में विश्वास, पद प्राप्ति के लिए नेताओं की चापलूसी, तथा और भी कई कारण । भारतीय जनता पार्टी (877) घूल रूप से हिन्दू महासभा के नाम से जानी जातों थो जो हिन्दू गष्ट को घकालत करतो थी । वीर सावए्कर 937 में इसके अध्यक्ष बने | स्वतत्रता के बाद एक वैकल्पिक पार्टी की आवश्यकता को अनुभव किया गया क्योंकि कायेस पार्टी में कुछ हाथों में सत्ता के केन्द्रित होने की प्रवृत्ति बढने लगी थी। 950 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी मे भेहरू-लियाकत समझौते के मामले पर नेहरू मत्रिमण्डल छोड दिया (जिसके अनुसार, भारत सरकार को पाकिस्तान में रहने वाले अल्प सख्यकों के विषय में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं था) और हिन्दू महासभा में शामिल हो गए। 95) में हिन्दू महासभा को अखिल भारतीय जन सघ के नाम से और 952 में भारतीय जनसघ के माम से जाना जाने श्र गजनेतिक व्यवस्था लगा। इस पार्टी ने 9952 में सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव लडा और 3 सीटें जीती, 957 में चार, 962 में 4, 967 में 35 और 97 में 22 सीटें जोती। यह कहा जा सकता है कि जनसघ अपने चरम शिखर पर 967 के आम चुनाव में पहुंची जो कि बलग़ज मधोक के नेतृत्व में लडा गया था, जिसमें उन्होंने अकाली दल और समतापार्टी से समन्वय किया था और इस गठबन्धन ने लोकसभा में 00 सीटें जीतीं। जगसघ भो हरियाणा, उत्तमदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभर कर आईं। पजाब में जनसघ-अकालो दल गठबन्धन ने काग्रेस को उखाड फेंका जबकि राजस्थान में जनसंघ और स्वतत्र पार्टी ने मिलकर एक सीट की बहुसख्या प्राप्त की । इस प्रकार जनसघ कग्रेस कौ शक्तिशाली राष्ट्रीय लोकतात्रिक विकल्प के रूप में उदिद हुई। दिसम्बर 967 में दीन दयाल उपाध्याय बलगज मधोक के उत्तराधिकारी के रूप में जनसघ के अध्यक्ष बने, लेकिन मई 968 में उनकी हत्या हो गई। उनके बाद अटल बिहागी वाजपेयी पार्टी अध्यक्ष हुए। पार्टी (87) तब और भी अधिक लोकप्रिय हो गई जब लालकृष्ण आडवानी इसके अध्यक्ष बने, विशेषरूष से जब से उन्होंने मार्च-अप्रैल 990 में 35 दिन को रथयात्रा कौ। 95] में जबकि इस पार्टी में कुछ हजार ही सदस्य थे, 999 में इसके 20 लाख से भी अधिक सदस्य हो गये। इसकी सपौी राज्यों में इकाइया हैं,नागालैण्ड, अण्डमान निकोबार द्वीप समूह, और पाण्डिचेणे को छोडकर, यद्यपि कुछ राज्यों में सगठन अभी प्रारम्भिक अवस्था में है। 996 में भाजपा ने लोकसभा में 79 सीटें जीती जिससे मई 99 में वह केद्र में सरकार बना सकी और ]3 दिन सत्ता में रही। फरवरी 998 में इसने लोकसभा में 8] सीरे जीती और मार्च 998 में केन्द्र में सरकार बनाई जिसको 8 छोटी क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन प्राप्त था जो अप्रेल 999 तक सत्ता में रही। अक्टूबर 999 में लोकसभा चुवाव में 82 सीटें जीत कर यह (कुछ अन्य पार्टियों से मिलकर राष्ट्रीय जनतात्रिक गठबंधन के रूप में) सत्ता में आयी। पहले तो राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी इसके मत्रिमण्डल थे पस्तु अक्टूबर 999 के चुनावों में राजस्थान और उत्तरप्रदेश में यह सरकार न बना पायो। हिन्दूवाद कौ विचारधारा के कारण इसकी छवि काफ़ी प्रभावित हुई है। सघ परिवार वी अतिवादी-विश्व हिन्दू परिषद, बजरग दल, और राष्ट्रीय स्वयं सेवक सप' मुस्लिम-विरोधी, ईसाई मिशन विगेधी और कठोर हिन्दू विचारधाग वाले आक्रामक हिन्दूवादी धर्मान्य हैं तथा राम मन्दिर, गोवघ और समान नागरिक सहिता जैसे मामलें के प्रति प्रतिबद्ध हैं, का दबाव इस पार्टो के सरकार पर बना रहा है। कप्युनिस्ट पार्टी काफ़ी पुरानी पार्टी है और चामपन्थो रुझान वाली पार्दी है। पार्ट में ही अनेक वैचारिक, राजनैतिक और सगठनात्मक सधर्ष थे जिसके कारण 96व में पार्टी भागों में विभाजित हो गई--मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (बराकपा) और भारतोय का्पुनिष्ट पार्टी | सो पी आई (भकप) ने 962 के चीनी आक्रमण कौ आलोचना की और सत्ताधागे काग्रेस पार्टो को समर्थन किया जबकि सौपी आई(एम) तथा मार्क्सवादी पार्टी ने चीन का पर्व न में हु विभाजन विधिवत हो गया। मार्क्सवाद कम्युनिस्ट पार्ट [एश (00) 0४0 सरकार बनाई जो गत 23 वर्षों से ज्योति बसु के मुख्य मत्नित्व में सत्ता आरम्भ में दो सोवियत सरकार भारत-चीन सर्ष पर तटस्थ रहो, लेकिन बाद में यह राजनैतिक व्यवस्था 205 पूरे जोर-शोर से दीन के विरोध में हो गई और भार को अनारक्षित समर्थन दिया। इससे सीप्रीएसयू (८750) के भीतर ही उस इकाई को विश्वास प्रदान किया जो काग्रेस्त की पक्षयर थी और सीपीएसयू के विरुद्ध अन्य समूहों में नाराजगी पैदा कर दी। इस प्रकार पार्टी के दो भाग हो गए--सत्ताधारी दल के पश्चयाती और विशेधी वाली या राइट (88600) कम्पुनिस्ट और मार्क्सवादी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टो जो अब प्रमुख पार्टों हो गई है (फरवरी 998 चुनाव में 32 सासदों और अक्टूबर 999 में 33 सासदों सहित) जो कि पुरानी कम्युनिस्ट पार्टो होने का दावा करती है। 'राइट' (राष्रण) कम्युनिस्टों को चुनाव आयोग द्वाए भारतीय कम्युनिस्ट (टए) नाम दिया गया। इस पार्टी को फरवरी 998 के चुनावों में ससद में 9 स्थान ओर अक्टूबर 999 में 5 स्थान प्राप्त हुए। दोनों ही कम्युनिस्ट पार्टियों के मूल कार्यक्रम साम्राज्यवाद सामान्तवाद तथा पूजी एकाधिकार के विरुद्ध श्रमिक वर्ग के सघर्षों से जुड़े हैं। मार्क्सवादी कम्युमिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और दो बाद के समूह--फारवर्ड ब्लाक और मार्क्सवादी लेनिनवादी (माकपा-माले) के अलग चुनाव घोषणा पत्र हैं। कुछ अन्य पार्टियां भरी अस्तित्व में आई, लेकिन वे अब नहीं हैं। ये पार्टिया थी काग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (आचार्य नरेन्र देव, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अच्युत पसवर्षन को) जो गान्भी जी की अहिंसा की विशेधी थी (इसने 945 में 'काप्रेस” शब्द हटा दिया), आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा पार्टी में विलीन हो गई और प्रजा सोशलिएट पार्टी के नाम से जानी लगी (257) और फिर 964 में एसएसपी (55०) और 97 में सोशलिस्ट पार्टो (57) के नाम से | उसके बाद इसका अस्तित्व समाप्त हो गया। यही हाल (सीशजगोपालाचारी द्वाय स्थापित) स्ववत् पार्टी का 959 में हुआ। जनता पार्टी, जनमोर्चा और लोकदल गठबन्धन के बाद भारतीय क्रान्ति दल आया। संयुक्त मोर्चा में जनठा दल, काग्रेस (5), डीएमके, टौड़ी पी, और एजीपी पार्टिया शामिल थीं। दलों को अनेकता (#णधफाला। त॑ .्बा८छ) भारत के साथ अमुख परेशानी यह है कि यहाँ 980 से बहुत अधिक पार्टियों हो गई हैं। लोकदंत्र केवल दो हो पार्टियों से कुशलता से चल सकता है जो एक दूसरे के लिए सरकार का विकल्प की सम्भावना पस्तुत करती हों। सयुक्‍त मोर्चा का 3 पार्टियों का गठबन्धन (दैवगौडा द्वारा जून996 में, इन्द्रकुमार गुजगल द्वाण अग्रैल 997 में) और मार्च 998 में भाजपा नेतृत्व वाली 8 पार्टियों वी सयुक्त सरकार तथा अक्टूबर 999 में भाजपा नेतृत्व वालो 24 पार्टियों का राष्ट्रीय जनतात्रिक गठबधन। 998 के वाजपेयो शासन काल में वाजपेभी को अपने सयुक्त सहयोगियों के दयाव का सामना करना पडा जिसने अस्थिसा तथा प्रगति के रास्ते में रूकावट पैदा कौ। 3 महीनों में वाजपेयी सरकार पर जग सी बात पर समर्थन वापसी की धमकी एआई एड़ी एमके (#॥#7५0) पार्टी, तृणमूल कामेस पार्टो, अकाली दल, भारतीय राषट्रीय लोकदल (हरियाणा के ओमप्रकाश चौटाला का) और समता दल (बिहाएं द्वारा, सर्वविदित है। वर्तमान राजग में भी घटकों में अनबन शुरू हो गयी है। अमेरिका जैसे देश में केवल दो पार्टी व्यवस्था है क्योंकि वहा पार्टी व्हिप जैसी कोई चीज डएव राजनैतिक व्यवस्था नही है जो कि विधायकों के वोट डालने के स्वरूप को नियत्रित करा है! क्रियान्वयन कार्यवाही पर विधान के लिए अध्यक्ष के प्रस्ताव का उसी की पार्टी के अक्ती सद्या में सदस्य विरोध करते हैं जबकि दूसरी पार्टी के काफ़ी सख्या में सदस्य उसका समर्थन करते हैं। दो गाजनेतिक पार्टियों के बौच केद्रीय नियत्रण जैसो कोई स्थिति नहीं होती। यद्यपि यूरोप के कई देशों में यजनैतिक पार्टियों की अनेकता है और सयुक्त सरकारें भी हैं लेकित ये भारत की तरह सत्ताधायो सरकार को अप्रभावी तथा अस्थिर नहीं बनावी। ऐसा इसलिए है क्योंकि अभिकतर पार्टियां जो केद्रीय सयुक्त मत्रिमण्डल में शामिल होतीं हैं मूलख्प से स्वार्थी और सकोर्ण विचारों वाली हैं। उनके नेता मत्रिपद और अपने इच्छा के म्रालय को प्राप्त करने में अधिक रुचि रखते हैं जो राष्ट्रीय हितों के लिए सेवा करने की अपेक्षा उठहें अधिक धन शक्ति दिलाते हैं। अनेक सयुक्त सहयोगियों वाला मंत्रिमण्डल आन्तरिक व बाह्य दोनों नीतियों की खोज को जारी रखने के प्रयल के विषय में नहीं सोच सकता। इस प्रकार यद्यपि हम अपने देश में अनेक पार्टियों के होने के विरोधी नहीं हैं या एक राज्य तक सौमित क्षेत्रीय पार्यों के विरोध में भी नहीं है किन्तु महत्त्वपूर्ण बात यह है कि समुवत मत्रिमण्डल में शामिल होने के बाद क्षेत्रीय पार्शियों को गाषटीय दया क्षेत्रीय हितों वो अलग-अलग कर देना चाहिए और राष्ट्रीय हित को गम्भीरता से लेना चाहिए। क्षेत्रीय पार्टियों को राष्ट्रीय एकता के लिए घातक मानना तर्क संगत नहीं है। क्षेत्रीय पार्टियों आवश्यक हुप से अलगाववाद में विश्वास नही करती, वे तो केवल अपने क्षेत्रीय हितों की रक्षा कला चाहती हैं। एक अवस्था में तो तमिलनाडु में डीएम के. भारत से अलग होना चाहती थे, लेकिन जल्दी ही इसने अनुभव किया कि यह राज्य के हित में नही होगा और इसलिए अलग होने का विचार छोड दिया। क्षेत्रीय पार्टी हपी बनतो है जब यह महसूस करती है कि केंद्र में सत्ताघारो पार्टी द्वार उनके क्षेत्र की अनदेखों और उपेक्षा को जा रही है। क्षेत्रीय पार्टियों दशा क्षेत्रीय हितों पर बल देने को राष्ट्र विरोधी न कहना चाहिए और न कहा जा सकता है। भारत में अनेक राजनैतिक दलों की एक अनोखी विशेषता है कि वे अपना मूल भारदीय राष्ट्रीय काप्रेस में हो मानते हैं। इन विभाजित दलों के नेता जब कामेस पार्ट में अच्छा स्थान आआप्त न कर सके, वे अलग हो गए और एक अलग पार्टी का गठन कर लिया। कुछ नेता अपने सिद्धान्तों व आदर्शों के कारण अलग हुए (जैसे आचार्य नोन्द्र देव, लोहिया और जय प्रकाश नारायण)! कुछ दल बचे रह गए और कुछ नही । राजनीविशों में एक बडी प्रवृत्ति यह है कि वे आदर्शों व विचाएं के प्रति राजनैतिक पतिबद्धता नहीं दशवे बल्कि विशेष व्यक्तियों या नेताओं के प्रति अधिक दर्शति हैं। ऐसी पार्टिया जो आदर्शों की आपदा सरक्षण पर आधारित हैं, जोवित नहीं रहती। पार्टी तभी तक रहती है जब तक नेता और सक्रिय सदस्य सदस्यों पर कुछ कृपा करते रहें। यदि राजनैतिक कार्यकर्ताओं को अमुमरह ते मिले, वे नेता को समर्थन नही देते और दूसरी पार्टो में शामिल हो जाते हैं। गजनैतिक दलों को इस व्यवस्था ने भारत में राजगीति को देशू सेवा का पथ होने की अपेक्षा अयोग्य और अशिक्षित 52730 274% लिए अच्छे लाभ का घन्धा बना दिया है। हे रोजनेतिक पार्टियों की एक और विशेषदा यह है कि उनके सगठन में अत्यधिक कैद्यीयकप्ण है। उनमें से अधिकतर पार्टियों के सगठवात्मक चुनाव बहुत समय से नहीं हुए गजमैठिव व्यवस्था 205 हैं और सभी पदाधिकाएँ पार्टी नेता द्वात नामाकित कर दिए जाते हैं। इस प्रकार के अत्यधिक केद्रीयकृत तिगत्रण का घातक प्रभाव यह होता है कि कई राज्यों में मुख्यमश्री का चुनाव विधायकों द्वाय न होकर, केद्रीय नेतृत्व द्वारा थोप दिया जाता है। जिन लोगों को विभिन विधान सभा क्षेत्रों से चुनाय लडने के लिए टिकट दिया जाता है थे उस क्षेत्र के लोगों के द्रात न चुने जाकर बाहरो अधिकारियों के एकदरफा निर्णय द्वार थोपे गए लोग होते हैं। यद्यपि सिद्धान्त में पार्टी टिकट दिये जाने वाले लोगों के नाम स्थानीय समुदायों में से ही निकलते हैं लेकिन वे नाम जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर उच्च अधिकारियों द्वारा बदल दिए जाते हैं। हाल में हो चुनाव की प्रक्रिया में प्रष्टाचार विकसित हुआ है। यदि किसी भारतीय राजनैतिक पार्टी का मुख्य उद्देश्य सरक्षत्व का लाभ रखना है और अपने अनुयायी सदस्यों को लाभ पहुंचाना है तो इसका अर्थ यह है कि शक्ति का प्रत्येक केद्र इसके नियत्रण में होना चाहिए। इसके परिणामस्वरूप राजनैतिक सदा के सभी केद्रों पर अपना अधिकार चाहती हैं, जैसे पंचायत, पुलिस, विश्वविद्यालय, छात्र सगठन, स्थानीय निकाय, आदि। शक्ति के नियत्रण की इस इच्छा से जुडा, तस्करों और अपराधियों को भी टिकट देने का विचार भो है। बिहार में फरवरी 2000 के चुनाव में आठ ऐसे अपराधी विधायक चुने गये हैं। इस प्रकार राजनीति के अपराधीकरण ने एजनैतिक पार्टियों की कार्य प्रणाली पर भी प्रभाव डाला है। सम्भावित शक्ति पर नियत्रण बनाए स्खने की ग़जमैतिक पार्टियों कौ इच्छा ने राज्यों में रज्यपालों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली को भौ प्रभावित किया है जो अपनी पार्टियों से सम्बन्ध खत्म नहीं कस्ते बल्कि पार्टी विवादों में सक्रिय रूप से रुचि लेते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजग़त के पूर्व राज्यपालों तथा मार्च 2000 में बिहार के राज्यपाल का उदाहरण सरलता से दिया जा सकता है। भारतीय शजनैतिक पार्टियों की एक और विशेषता यह है कि जिस तरह से वे अपने कोष धन को एकत्र और व्यय करते हैं उसकी सार्वजनिक जवाबदेही उन पर नही है। उनके हिसाब का कभी भी लेखा परीक्षण नही होता । यह सर्वविदित तथ्य है कि घनी व्यक्तियों द्वारा सजनैतिक पार्टियों को दिया जाने वाला अशदान काले थन कोष में से ही दिया जाता । अशदाता सरकार पर उसकी कृषा आप्त करने के उद्देश्य से दवाब डालते हैं। चुनाव की । में वस्तुओं के मूल्यों, जैसे चौनों, सीमेन्ट, तेल, आदि में वृद्धि कुछ परिचित उदाहरण ॥ आज जो तथ्य ग़जनैतिक पार्टियों को सबसे अधिक प्रभावित किए हुए हैं, वे हैं चुने हुए सदस्यों का सरकार गठन के समय में एक राजनैतिक दल छोडकर दूसरे में चले जाना। यह न केवल केन्द्र में हुआ है बल्कि उच्तर प्रदेश, गुजग़त, हरियाणा, बिहार, राजस्थान आदि राज्यों में मी हुआ है। 985 का दल बदल विशेधी अधिनियम (#आ-एटउणा०्प #ैए) अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया। वास्तव में, इसने बडी पार्टियों को छोटी पार्टियों को वोड़ने में मदद की है। दल बदल का जोड-दोड करने के बाद 'सयुकत' (८एथाएंणा) मत्रिमण्डल गठन करना कभी-कभी बडे आकार के केबिनेट (00900 ८४८७ का गठन करने के लिए मार्ग प्रशस्त कर देता है। उत्तर प्रदेश में 997 में यहो हुआ जब मायावत्रो के 6 माह (प्राजपा के साथ) के शासत्र काल के बाद भाजपा मत्रिमण्डल का गठन हुआ था। 376 एजनैतिक व्यवस्था दल बदलाव की यहो रणनीति मई 996 में केद्ध में भाजपा सरकार द्वार अपनाई गई थी लेकिन उसे सफलता नहीं मिली और 3 दिन बाद उसे जाना पडा। बिहार में भी 999 में ऐसे हो जम्बो मन्त्रीनण०्डल का गठन किया गया था। दलीय व्यवस्था का यह विश्लेषण दर्शादा है कि किस प्रकार भारत में दलीय व्यवस्था का राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी और ईमानदार सरकार देने में लोकठात्रिक व्यवस्था वा हास हुआ है। हम बहु-दलीय व्यवस्था के उन्मूलन का सुझाव नहीं दे रहे हैं बल्कि हम केवल जंवाबदेटी व्यवस्था लागू करे पर जोर दे रहे हैं। यदि चुनाव व्यवस्था का पुनर्गठन किया जाये, तब राजनैतिक दलों के कार्य में सुधार हो सकता है जो अच्छी सरकार प्रदान कले में सहायक होगा। दलोय आधार पर पचायतों और स्थानीय निकायों चुनावों का निषेध, राजनैतिक दलों के वित्त कोष का लेखा परीक्षण प्रारम्भ करना, सस्थाओं को स्वायत्तता सुनिश्चित कराना तथा उन्हें राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना कुछ उपाय हो सकते हैं जो राजनैतिक दलों की कार्यप्रणाली को नियत्रित रख सकते हैं और हमारे राजनैतिक जीवन के स्तर में गिरावट को रोक सकते हैं। शक्ति का विकेद्रीडरण और राजनैतिक भागीदारी (ए6टशाएग्रा5क्षांग्रा ण॑ ए०कच' ॥प0 एगाएद्रा एडगफंसंफ्आंणा) वर्तमान लोकवात्रिक राजनैतिक व्यवस्था में हमारे यहाँ किस प्रकार की शक्ति सरचना है? क्‍या यह अनेकतावादी (फ़ाफ्ठआ50०) या अभिजन (७७४४४) शक्ति सरचना है? अनेकद्गवादी शक्ति सरचना को विशेषताएँ निम्न हैं : (0) विकेद्रीकृत सरचना, अर्थात्‌ शक्ति विभिन स्तरों पर विभाजित होती है, और निर्णय लेने की प्रकिया में बहुत बडी सख्या में लोग हिस्सा लेते हैं (7) परस्पर अल्तर्ति्भर व्यक्ति (0) सममित सम्बन्ध (5/एण८मं८ञ) (अर्थाव विभिन्‍न घटकों ((0०एए०४८7७) के बीच परस्पर अन्तर्क्रिया और पारस्परिक आदान-अदान (6०]77०८) होती है, भर्थाव ए, बी, सी (8, 8, 0) व्यक्ति एक्स, वाई, जेड (5९, ७, 2) व्यक्तियों के ऊपर शक्ति दर्शाते हैं और इसके विपरीत भी। (४) अनेक घटकों का व्यवस्था पर सकारण (८8०७०) अभीव होता है। इसके विपरीत, अभिजन वर्गीय शक्ति सरचना इस प्रकार है . ()) केन्द्रीकृत सरचना (अर्थात निर्णय लेने की शक्ति पर शिखर के कुछ लोगों का ही एकाधिकार होता है (0) तुलनात्मक रूप से स्वतत्र व्यक्ति (0) असीमित सम्बन्ध (अर्थात अभिपत्य और एकतरफी कार्यवाही) और (४४) इसके अनेक घटकों का व्यवस्था पर सकाएण प्रभाव पडता है। इससे हम भारत में शक्ति सरचना के प्रकार को पहचान सकते हैं। यह निरिचित ही अभिजन शक्ति सरचना है। वर्तमान में राजनैतिक नेताओं को राजनैतिक समर्पित नेता नहीं कहा जा सकता। यदि हम दो शब्दों--'भूमिका विशिष्टता' (0० %००॥०७) और “भूमिका विसरणता' (7०० गए5८०८$७) (अर्थात भूमिकाकर्ता आशिक रूप से राजनीति में और आशिक रूप से व्यापार, कृषि आदि में रुचि रखते हैं)-छा प्रयोग करें तो हम कह सकते है कि वर्तमान राजनैतिक नेताओं की राजनेदिक विचारधाण विशिष्ट (&7०८०१०) न होकर 'विसरिता' है। सजनैतिक व्यवत्पा 207 व्यक्ति की गजनेतिक भूमिका सकोर्ण अ्थों में देखा जाये तो राजनैतिक प्रतिबद्धता को बढा देदी है जबकि अस्पष्ट योग्यवा की आत्म छवि व्यक्ति की प्रजनीति के प्रति प्रतिबद्धता को सकुचित कर देती है। राजनैतिक अभिजन पर मेरे अपने अध्ययन में, मैने उत्तरदाताओं के ग़जनैतिक प्रतिबद्धता के स्तर को भूमिका विशिष्टदा' और “भूमिका चिसतणता' से सहसम्बद्ध करके विश्लेषण किया। यह पाया गया कि जो लोग अपने को केवल राजनीतज्ञ कौ विशेष भूमिका में देखते हैं उनमें प्रतिबद्धता का म्तर उन लोगों की अपेक्षा ऊचा था जो स्वय को विसरित भूमिका में देखते थे। यदि हमें वर्तमान राजनैदिक नेताओं की शजनैतिक हिस्सेदारी का वर्णन करना हो तो हम कह सकते हैं कि उनमें से अधिकवर राष्ट्रीय मामलों की अपेक्षा क्षेत्रीय मामलों से सम्बद्ध अपनी पहचान कराते हैं, राजनैतिक पदों के इच्छुक रहते हैं, शक्ति और आर्थिक लाभ अर्जित करने को लालायित रहते हैं। राजनीति में बहुत से महत्वपूर्ण व्यक्ति अब देश के अत्यन्त प्रष्ट व्यक्तियों के पर्याय बन गए हैं। य़जनीति परिवार का व्यापार बन गई है। यदि पिता भत्ता खो दे तो उसका पुत्र, पुत्री, पलि, बहिन, भाई, आदि पार्टी टिकट लेने के लिए व चुनाव लडने के लिए जोड-तोड करते हैं। हमारे स्वयसेवी राजनीतिज्ञों के बच्चे उस धन से विदेशों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जो उनके माता-पिता यहा जन सेवा” से बटोर रहे हैं| पूर्व प्रधान मत्रियों के बेटों, मुख्य मत्रियों के बेटों, राज्य मत्रियों के बेटों, राजनैतिक पार्टियों के अध्यक्षों के बेटों और यहा वक कि साम्दों के बेटों के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। हमारे एजनौतिज्ञों के प्रष्ट व्यवहार निन्दगीय और चौंकामे वाले हैं। आज का भारतीय राजनैतिक परिदृश्य बिल्कुल भिन्न होता यदि 97] के बाद हमारे राजनैतिक नेतागण सार्वजनिक जीवन के प्रति ही समर्पित भाव से लगे रहते। शक्ति के केडऔौयकरण ने इन अप्रविबद्ध राजनीतिशों को और अधिक शक्ति लोलुप बना दिया है। राष्ट्रीय व राज्य स्तर के राजनेतिक नेताओं के विरुद्ध दर्जनों घोटाले, जिनमें हजारों करोड रुपयों का गोलमाल होता है, आज के न्यायिक सक्रियतावादी युग में अदण्डित ही समाप्त हो जाते हैं। प्र शैक्षिक व्यवस्था (&माट्यांगान 5950) शिक्षा और समाज (छतएसबायणा छत 5०संल)) समाज और शिक्षा के बीच सम्बन्ध उदारवाद और सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा के क्षेत्र में अप उपलब्धियों, शिक्षा का कार्यात्मक दृष्टिकोण, और उच्च शिक्षा में सकट, आदि विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। शिक्षा आवश्यक ज्ञान और दक्षता प्रदान करती है जो व्यक्ति को समाज में आदर्श रूप में कार्य करने योग्य बनावी है। शिक्षा वैचारिक मान्यताओं से प्रेरित होती है जो समाज से ही ली जाती हैं किन्तु इसका कार्य सास्कृतिक विशसत हस्तादर में और समाज के द्वारा धारिव मूल्यों और आदरशों को प्रोत्साहित करने तक ही समाण नहीं होता। सोद्देश्य अनुस्थापन (फुष्णए05४८ 00208007) किए. जाने पर शिक्षा आधुनिक समाज के आधुनिकीकरण और पुनर्गठन के लिए शक्तिशाली साधन हो सकती है। शैद्िक सस्थाएँ शून्य में स्थित नही होती। वे समाज के अभिन्‍न और सवेदनशील अग है। कोई भी शैक्षिक व्यवस्था समाज के मूल्यों और प्रतिमानों से प्रभावित हुए बगैर नही चल सकती। भारत में स्वतत्रता से पूर्व शिक्षा से सम्बन्धित तीन विचार सम्प्रदाय प्रचलित ये (50. 90९, इखदाधरता कब 206/200/छ९, 967 282-83) : (0) प्रथम विचार सम्मदाय, स्व सस्कृति (॥७0४७७०) और पुनरुज्जीबनवादी (८४७॥४४८०) दृष्टिकोण वाला था जो अत्येक ठस वस्तु का निषेध करदा था जो विदेशी हो और समाज की प्राचीन विशसव में मान्य न हो। हिन्दू पुनरूज्जीवनवादियों ने प्राचीन भार के गुरुकुल व्यवस्था के प्रतिरूप में अनेक विधालय ओर उच्च शिक्षा की सस्याएँ स्थापित की। इन सस्थाओं ने जीवन की पवित्रता पर बल दिया और वैदिक साहित्य के अध्यापन पर ध्यान केद्धित किया। (छ) दूसरे विचार सम्भदाय का उद्देश्य शिक्षा का स्वदेशीकरण रहा। इस विशेषता वाली सस्याएँ जानबूझकर विदेशी मूल के आधुनिक ज्ञान का निषेध करने को उद्यत नहीं थीं। उनका प्रमुख देश शिक्षा को भारतीय दशाओं में अधिक सार्थक बनाना और इसे एक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान के का था। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ, जामिया मिलिया इस्लामिया इस प्रकार की कुछ सस्थाएँ थी। (४) तो विचार सम्प्रदाय ने लन्दन और ऑक्सफोर्ड-ब्रिटिश नमूने के शैक्षिक सस्थाओं की स्थापना पर ध्यान दिया। यह उद्देश्य मैकाले ने 7835 में अपने वक्तव्य में अभिव्यक्त किया है : हें एक ऐसा वर्ग पैदा करना चाहिए जो हमारे और करोड़ों लोगों के बीच जिन पर हम शासन हैं दुभाषिये (गत) का काम कर सके- ऐसे व्यवितयों का वर्ग जो रग रक्त से भारदीय हो, लेकिन रुचियों, विचारें, नैतिकता और बुद्धि में इग्लिश हो।” शैक्षिक व्यवस्था 209 स्वतत्र भारत ने सभी स्तरें पर शिक्षा भें अदूघुत विकास अनुभव किया-आथमिक, हायर सेकेन्डशी दथा कालेज व विश्वविद्यालय स्तरों पर। लेकिन परिमाणात्मक (पृथए७॥३५७) विकास ने गुणात्मक विकाप्त को प्रभावित किया। शिक्षा का स्वरूप आमतौर पर उपनिवेशवादी ही रहा। शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार करने के उपाय सुझाने के लिए बहुत समितियाँ नियुक्त की गईं, लेकिन पुराना स्वरूप बना रहा। यथास्थित्ि बनाए रखने कौ प्रवृत्ति काम करती रही। रात में, शिक्षा के छेत्र में सप्कारी दृष्टि और नीति का उद्देश्य है प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण, सेकेन्डरी शिक्षा का व्यवसायौकरण और उच्च शिक्षा का तर्कसगतीकरण। एक ओर अशिष्षा वो उखाड़ फेंकने तथा सभी के लिए शिक्षा की व्यवस्था (८१0८०॥०० (० 2!) की नीतियों यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई जा रही है कि 6 से 4 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चों (अर्थात देश कौ कुल जनसज्या का 24%) को स्कूल जाने का अवसर मिले और प्रभी प्रौद (998 में कुल जनसख्या के 40% अनुमानित) लिखना और पदना सीख सकें। दूसरी ओर शिक्ष की गुणवत्ता में भी सुधार के प्रयल किए जा रहे हैं। शिद्षा के उद्देश्य (0ए[ल्‍ए(६८5५ ता 800९5(06७) शिक्षा के तीन शाश्वत्‌ उद्देश्य इस प्रकार कहे गए हैं. ()) मनुष्य का स्वयं को और जगत को जानने का प्रपाप्त कतते रहना और स्वय को शिक्षा जगत से प्रभावशालो ढग से जोड़ना, (0) अतीत और भविष्य के बीव पुल का निर्माण, अर्थात अतोत फे एकत्रित परिणामों का विकासमान पोढ़ी (हाए्णाए ०448२ को सप्रेषण (72997) करना ताकि वह सास्कृतिक विरासत को आगे ले जा सके और भविष्य का निर्माण कर सके, 5) जहा ज़्क सम्भव हो, मानव प्रगति की प्रक्रिया को तेज करना । इन उद्देश्यों के अतिरिक्त शिक्षा के दीन और उद्देश्य भी माने जाते हैं। यह हैं. () व्यक्तिगत गुणों का समग्र विकास, जैसे बुद्धि दक्षता, इच्छाशक्ति, चरित्र, अभिरुद्िया, आदि, (७) मनुष्य को जीवन दशाओं के अर्थ में विकास, अर्थात, समाज और व्यवित दोनों का विकास | समाज के विकास का अर्थ केवल आर्थिक विकास से ही नहीं है वल्कि सामाजिक, सास्कृतिक और राजनैतिक विकास से भौ है। व्यक्ति के विकास में शिक्षा एक विवेकशील और आदर्श मस्तिष्क बनाने में सहायक होती है, और (०) शान्ति और समन्वय (॥8४॥09/) पैदा करना तया उसे सुदृढ़ करना। यहाँ शानि' को 'युद्ध के विलोम के रूप में नही देखा गया है बल्कि इसे सकारात्मक दृष्टि से देखा णया है जो अन्तर्पह्टीय छणझ् और सहयोग के प्रयल के स्द्देश्य से सुणल्वित कार्य को ॥ इसमें सभी लोगों के प्रति आदर भाव, उनकी सस्कृति, सभ्यता, मूल्यों और जीवन शैली के अदि सम्मान निहित है। सन्‌ 97 से यूनेस्को द्वारा स्थापित शिक्षा के विकास पर गठित अत्तर्गष्टीय आयोग की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा वी प्रमुख आवश्यकता है “जानना (0 ॥00७), हाम्तिल करना (६0 ए9०855०७७), बनना (॥0 ७०)” । यहा “होना” का अर्थ “व्यक्तित्व और इसके विकाप्त” से है। सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि आथमिक स्तर पर शिक्षा का उद्देश्य पढ़ना, लिखना, (3 7९४) सीखना है, माध्यमिक स्तर पर चज्ति निर्माण है, उच्च माध्यमिक स्तर पर समाज को समझना है, और कालेज/विश्वविद्यालय स्वर पए दक्षता ज्ञान श्राप्त करना है 20 शैक्षिक व्यव्या शिक्षा के परम्परागत एवं आधुनिक सन्दर्भ (प्रार प्रग्गचयााताओ गाते फह १0008त7॥ एक्काल्द्रा5 ण एतेशस्यांणा) अतीत भे ज़िक्षा (200 ८॥ाणा ॥7 हर छ55ा) प्रारम्भिक, और ब्रिटिश काल में शिक्षा को इन दो दृष्टिकोर्णो से देखना है : (७) ऐतिहासिक विकास के परिप्रेक्ष्य से और (७) दार्शनिक महत्त्व से। दूसरे दृष्टिकोण से, वेदिक काल में विद्यालय आवासौय होते थे जहा लगभग 8 वर्ष की आयु के बालक को गुरू को सौंप दिया जाता था, जहा उसको उपयोगितात्मक ज्ञान नही परन्तु आदर्श व्यवहार का ज्ञान दिया जाता था। ऐसा माना जाता था कि ज्ञान जीवन को अर्थ, (फ८३एंणह), यश (ह09) और चमक (७४४७) से भर देता है। गुर अपने शिष्य के जीवन में व्यक्तिगत रुचि लेता था। शिक्षा पूर्ण और विस्तृत थी। उदाहरण के लिए, शारीरिक शिक्षा आवश्यक थी तथा छात्रों को ह१ पुष्ट शरीर के बनाने की शिक्षा दी जाती थो। युद्ध कला की ट्रेनिंग दी जावी थी जि्ों धनुर्विद्या, घुडसवारी, रथ हाँकना, और दक्षता के अन्य क्षेत्र शामिल थे। विद्यालयी शिक्षा खए विज्ञन (?॥०४००४8)) से शुरू होती थी, तथा व्याकरण भी पढाया जाता था। इसके बाद तर्कशास्र (080०) का अध्ययन कगया जाता था जिसमें तर्क के नियम व सोचने को कला का ज्ञान होता था। तत्पश्चात्‌ कला और हस्त कौशल आदि सिखाया जाता था। अन्त, जीवन में अनुशासन सिखाया जाता था जिसका सम्बन्ध यौन शुद्धि, विचारों और कर्म दी पवित्रता से होता था। इसमें भोजन,परिधान की सादगी, समानता, प्रातृभाव और स्वत्वता पर बल, और गुरु का सम्मान सिखाया जाता था। इस प्रकार भाषा, तर्कशास्र, शिल्प, अनुशासत और चित निर्माण शिक्षा के मूल आधार होते ये (कर, 57, 04096 7 कद ८४॥07०, 955, 8-83) । ब्राह्मण युग में शिक्षा का प्रमुख विषय वैदिक साहित्य था। शिक्षा का मुख्य उद्देश वेदों का ज्ञान था। लेकिन शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वच्चित रखा गया था। शिक्षा योग्यवा एव रझ्ञान की अपेक्षा जाति के आधार पर दी जाती थी। सिययों को भी शिक्षा से बहिष्कृत रखा गया था। (90, 82)। मुस्लिम युग में शिक्षा के उद्देश्य बदल गए। इसमें लिखने पढने (3 7२७) की शिक्ष और घार्मिक प्रत्तिमानों में दीक्षा प्रमुख थे। उच्च शिक्षा विद्यालयों के माध्यम से दा व्यावसायिक एवं शिल्प सम्बन्धी दीक्षा जाति सरचना के भीदर ही दी जाती थी। सर्कृत अरबी या फाससी शिक्षा का माध्यम थी। अध्यापकों के पारिश्रमिक का भुगतान शासकों दए भूमि आवटन करके, शिष्यों के ऐच्छिक भेंटों के द्वारा, धनी नागरिकों द्वारा दिये जाने बाते भ्तों से, और भोजन, वख्र तथा अन्य वस्तुओं के रूप में किया जाता था। स्कूलों के पास अपने भवन नहीं होते थे। अनेक स्थानों पर तो स्कूल मन्दियें, मस्जिदों या अध्यापकों के पं पर ही चलाए जाते दे। मुस्लिम छात्रों के लिए अलग से ये मदरसे मौलवियों द्वाय और हिंद छात्रों के लिए ब्राह्मणों द्वाग चलाए जाते दे । व्यावसायिक दीक्षा बालकों को पिता, भाई आद के द्वारा दी जातो थो, दक्षता को इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी सप्रेषित किया जाता था लाभप्रद रेजगार भी प्रदान किया जाता था। शारीरिक शिक्षा, विचार शक्ति के विकास वीं किसी शिल्प को शिक्षा पर बल नहीं दिया जाता था। पवित्रता, सरलता, समानता छात्र शैध्षिक व्यवस्था ग्रा के आदर्श नही थे। पेशेवर भूमिका वी विशेषज्ञता ऐसी अवस्था में नही पहुची थो कि अलग से कोई वर्ग या जाति शिक्षा को विशेष कार्य के रूप में करते। शिक्षा अधिक व्यवहारिक घी। ब्रिटिश काल में शिक्षा का उद्देश्य अधिक सख्या में लिपिक पैदा करना था। शिक्षा शिक्षक केन्द्रित होने की अपेक्षा छात्र केन्द्रित अधिक थी। आज की तरह उन दिनों में शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति की स्वतत्रता, व्यक्ति की श्रेष्ठता, सभी लोगों के बीच समानता, व्यक्ति और समूह की आत्म निर्भरता ओर राष्ट्रीय एकता नही था। शिक्षा देने के कार्य में लगे ईसाई मिशनरी धर्म परिवर्तन के काम को अधिक पहल्व देते थे। स्कूलों और कालेजों में शिक्षा उत्पादक नही थी जो सामाजिक, क्षेत्रीय, और भाषायी अवरेधों को दोड सके | इसका उद्देश्य यह भी कभी नहीं रहा कि यह लोगों को तकनीकी ज्ञान मे दक्ष बनाए। अन्याय, असहिष्णुता और अन्धविश्वास के विरुद्ध सधर्ष पर भी ध्यान नहीं था। वर्नमान काल में शिक्षा (00८00 कक ९ एफ्छशा: ऐशश००) आज की शिक्षा शहरी, प्रतिस्पर्धात्मक उपभोक्ता समाज को श्रोत्साहित करने की ओर उन्मुख है। गठ पाँच दशकों में यदि हम उन बैज्ञमिकों, पेशेवर और वकनीकी विशेषज्ञों का मूल्याकन कं (जिनको शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से तैयार किया गया है और जिन्होंने राष्ट्रीय और अ्र्गप्रीय स्तर पर श्रेष्ठठा अर्जित की है, दो पता चलता है कि शिक्षा व्यवस्था ने ही उन्हें एक अच्छी सख्या में उपलब्ध कराया है। शिखसस्थ ((00) वैज्ञानिक, डाक्टर, इन्जीनियर अनुसधानकर्त्ा, प्रोफेसर आदि वे लोग नही है जो विदेशों में शिक्षित हुए बल्कि उनकी तो सामपूर्ण शिक्षा भारत में ही सम्पल हुई । यदि वे सभी विशेषज्ञ तथा वे सब लोग जो उच्चतम स्वर पर पहुचे हैं, हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से हो आए हैं, तो हम आज की शिक्षा व्यपस्था के सवाग्रत्मक पक्षों को किस प्रकार अस्वीकार कर सकते हैं? यद्यपि हम वर्तमान शिक्षा की पूर्णरूपेण आलोवना नहीं कर सकते, तथापि कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है, यदि हम वास्तव में अच्छे भविष्य को कामना करते हैं। प्रश्न अतीत का था वर्तमान का नहीं परन्तु भविष्य का है। हम किस प्रकार 2। वी सदी की सबसे ४68 ; तकनीकी ज्ञान की चुनौतियों का सामना करने के लिए विभिन क्षेत्रों में विशेषज्ञों करने जा रहे हैं ? प्रश्न यह नहीं है कि शिक्षा किस सीमा तक लोगों को ऐेजगार प्रदान करने में सफल या अप्तफल हुई है, बल्कि प्रश्न शिक्षा से गरीबों और वचित लोगों को आधुनिक तकनीकी ज्ञान दिये जाने का है। प्रश्न शिक्षा की गुणवत्ता का है। बढती हुई जनसख्या को एक दायित्व 08000) ) मानने की अपेक्षा इसको नियत्रण करने के प्रयास के साथ-साथ इसे परिसपत्ति (355०) और ताकत (६८४४0) समझा जाना चाहिए। यह केवल शिक्षा और मानव विकास से हो सकता है। युवकों को केवल डिग्री या प्रमाण पत्र देकर यह कह देना कि वह नियुक्ति के योग्य हो गया है, काफी नहीं है। हमें अपनी युवा पीढ़ी को विचारवान बनाना है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति को सोचने के लिये प्रोत्साहित नही करती। उसे एक निश्चित पाठ्यक्रम पढाया जावा है और अपेक्षा की जाती है कि वह परीक्षा में उप्तकी पुनरवृत्ति कर दे। यह व्यवस्था दोषपूर्ण है। युवाओं को अधिक से अधिक प्रश्न पूछने के लिए भ्रेरित किया जाना चाहिए जो उन्हें न केवल सोचने में मदद करेगा बल्कि ओो शैक्षिक व्यवस्था अध्यापकों को भी अधिक अध्ययन करने और सीखने के लिए बाध्य करेगा। इस प्रकार हमें परीक्षा प्रणाली बदलनी है। हमें छात्रों को पढाई को गम्भीरदा से लेने को बाध्य कला है। हमें उन्हें कक्षा छोड़ने, हडतालों में भाग लेने, छात्र गजनीति में भाग लेने, केवल चुनाव लड़ने के तर ही प्रवेश लेने और केवल अशकालिक रूप से किसी पाठ्यक्रम को लेने से दूर रखना है। यद्यपि यह संत्य है कि सभी स्तरों पर शैक्षिक सस्थाओं और छात्रों की सख्या में वृद्धि हुई है लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि शिक्षा की गुणवच्ा, छात्रों की रुचि, और अध्यापकों में समर्पण भाव में भो साथ साथ वृद्धि हुई है। 92 से 998 तक पूर्व प्राथमिक विद्यालयों को सख्या में 2। गुना (909 से 40,553) वृद्धि हुई है, प्राथमिक विद्यालयों में दुगनी 83 लाख से 607 लाख), मिडिल और सोनियर स्कूलों को संख्या में साढे दौर गुनी से भी अधिक वृद्धि हुई है (40,663 से 85 लाख), हायर सेकेण्डरी स्कूलों की सख्या में लगभग 6 गुती (7,257 से 07/00), और विश्वविद्यालयों की सख्या में (हीड विश्वविद्यालयों सहित) पाच गुनी (५5 से 228) वृद्धि हुई है (दवा कैरएह 74०६ ॥#2009, 998 १70 और दि हिल्‍्ुस्तान राइस, 2 मई 999) | 99। से 997 के बीच प्राथमिक शिक्षकों को सख्या में ढाई गुनी वृद्धि हुई है (4 लाख से 789 लाख) और हायर सेकेण्डरी स्कूल शिक्षकों की सख्या में 5 गुनी 296 लाख से 542 लाख) वृद्धि हुई है। आखिरी, 96॥ और 997 के बोच प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की सख्या में तीन गुनी 636.3] लाख से 03 94 लाख), हायर सेकेण्डरी स्कूलों में लगभग पाच गुनी 8463 लाख से 78 62 लाख), और स्नातक तथा स्नातकोत्तर कक्षाओं में लगभग साढ़े बारह गुन (28 लाख से 5373 लाख) वृद्धि हुई है (कक हठ४ह- 2१06 7740, 995, 80 80) | परन्तु सभो आयोगों और समितियों ने शिक्षा में कमियों और दोषों को इगित किया है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के तीन दोषों को इस प्रकार बताया जा सकता है : 0) वर्तमान शिक्षा व्यवस्था उस प्रकार का ह्ञान उत्पन नहीं करती जो हमारे बदले हुए समाज के लिए सार्थक हो, (2) वर्तमान शिक्षा ज्ञान की विशेष शाखा से सम्बद्ध प्रौद्योगिकी, रोजगार सम्भावनाओं गा निवेश माग के अर्थों में हमारे विकास को अवस्था में अनुपयुक्‍्त है, 8) १222९ प्रदान करने में भी शिक्षा असफल रही है जो समर्पित राजनीतिज्ञ, नौकरशाह, पदोगिकी विशेषज्ञ, तथा अन्य पेशेवर लोग तैयार कर सके ताकि हमारा राष्ट्र ऊचाइयों तक 288 के लिए इन लोगों की लाभकारी समर्थक सेवाओं की सद्व्यवस्थां पर निर्भर कर । भविष्य के लिए शिक्षा (0८३ ० तब प्ले माय समाज एक अज्ञात भविष्य की ओर अप्रसर हो रहा है। जो सकट आज हमारे समाज 20230 50005 (८५०८४८)) और प्रबलता (णथात्न0) में वृद्धि सम्भव है। शैक्षिक व्यवस्था 23 प्रबन्ध के क्षेत्र में भी। आज को शिक्षा व्यवस्था आज को सकपपूर्ण स्थिति को चुनौतियों का रचनात्मक ढंग से उत्तर देने के बजाय अधिक से अधिक पतन की ओर जा रही है। हमें निम्न आधार पए वरैयताओं को फिर से तय करने की जरुरत है। प्रथम, हम 'आत्म निर्भरता के लिए शिक्षा' सिद्धान्त को स्वीकार करें। माध्यमिक और उच्च शिक्षा से अधिक बल प्राथमिक और प्रौढ शिक्षा को देना चाहिए। द्वितीय, माष्यमिक और बालेज/विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा पर गम्भीर चिन्तन की आवश्यकता है। हृीय, शिक्षा के प्रबन्धन की समस्या प्रमुख है। वर्तमान में तो मौकरशाही शैली ही विद्यमान है। नौकरशाही शिक्षा के वातावएण में होने वाले परिवर्तनों के पति संवेदनशील और अत्युत्त देने वाले नही हैं। अल्प बजट, उच्च अनुशासनहीनता, प्रशासकीय खामियाँ और हस्तक्षेप, और ग्रजनैतिक दमाव शिक्षा के क्षेत्र में निर्णय लेने को कष्टमद बना देते हैं। इस प्रकार शिक्षा का प्रबन्धन नौकरशाही हस्तक्षेप और राजनीतिज्ञों के हस्तक्षेप से मुक्त होना चाहिए। चतुर्थ, शिक्षकों कौ जवाबदेही (३००००४५७७॥॥४) की समस्या गम्भीर है, विशेष रूप से उच्च शिक्षा में। ऐसे अनेक मामले प्रकाश में आए हैं जहा शिक्षक महीनों और यहा तक वर्षों कक्षाए नहीं लेते। वे नियमिद रूप से पुस्तकालय जाकर पत्र पत्रिकाए और आधुनिकतम पुस्तकें पढने में शायद ही रुचि रखते हैं। हमें शिक्षा के उद्देश्य को पुनर्स्थापित करना है और उपयुक्त शिक्षण विधियों का निश्चय करना है। फिर उन कारकों को नियमित करना है जो पा को बिगाड़े हुए हैं। शैश्षिक व्यवस्था में शिक्षकों पर नियत्रण महत्वपूर्ण एव आवश्यक । परचम, हमें छात्रों में अध्ययन के प्रति मम्भीरता पैदा काज़ी है। 'ज्ञान किसके लिए! सबसे कठिन प्रश्न है। ऐसा माना जाता है कि शिक्षा गतिशीलता में गुणात्मक वृद्धि करती है। यह स्थिति और विशेषाधिकार को शाश्वत बनाने का काम करती है | लेकिन क्‍या उच्च शिक्षा सभी छात्रों के लिए खुली होमी चाहिए ? अनेक छात्र कानून, कला, कॉमर्स पाठ्यक्रमों में केवल इसलिए प्रवेश लेते हैं क्योंकि उन्हें जीवन में व्यवस्थित रोने वक समय काटना होता है। क्या उन्हें प्रावेध्धक और पेशेवर पाठ्यक्रमों के लिए मार्ग निर्देशन नहीं किया जाना चाहिए ? क्या शिक्षा को उनके हित साधन के इर्दगिर्द नहीं घूमना चाहिए? छठी, हमें व्यावसायिक और पेशेवर शिक्षा को प्रोत्साहन देना है जिसकी खुले बाजार में माग है। यह मानना है कि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति एक विशेषज्ञ नही बन सकता लेकिन उसे अपने में ऐसो कुशलता विकसित करनी है जिससे वह जीवनयापन कर सके। हमें आगामी दो या होन दशकों के विषय में सोचना हे और कृषि के प्रकार, विकासशील उद्योगों के प्रकार, व्यापार और वाणिज्य तथा दौक्री और सेवा के नपे क्षेक्लें चर ध्यान देना है। यह हमें ऐसो शिक्षा व्यवस्था की स्थापना में सहायक होगा जो हमें अच्छे किसान, अच्छे कुशल श्रमिक, अच्छे मेकेनिक या जिस किसी कौ भी बाजार में माग हो, देगी। सकता प्रकण विविध विभागों में तालमेल का है, जैसे कृषि, उद्योग, श्रण, इलैक्ट्रोनिक्स, कानून, विज्ञान तथा अन्य, ताकि विश्वविद्यालय, आई आईटी और कालेज यह शव शैक्षिक व्यवस्था जान सकें कि किस प्रकार के कुशल लोगों की आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण शिक्षा होनी चाहिए जिससे व्यक्ति अपनी इच्छा के रोजगार के लिए तैयार किये जा सकें और नियोक्‍्ता को भी अपने से जुडने वाले अभ्यर्थी मिल सकें। आठवी समस्या सभी निरक्षर लोगों को साक्षर बनाने की है। 998 में उपलय अनुमानित आकडों के अनुसार यह मानते हुए कि भारत में साक्षरता दर 7994 को 52.2% से बढकर 998 में 60% हुई है,40 क्येड लोगों को अभो भी शिक्षित किया जाना है। यह एक महान कार्य है। यह सर्वविदित है कि सभी राज्यों में साक्षरता स्तर को ऊचा उठाने वी योजनाए चल रही हैं, फिर भी कहा जाता है कि निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अगर 25 वर्ष का समय चाहिए। छात्रों को 2 महीने की छुट्टियों की अवधि में निरक्षरों को पढने के लिए बाध्य कले जैसी मीदियों से शायद लक्ष्य अवधि को कम करे में मदद मिले। नवी समस्या प्राथमिक स्तर पर ही स्कूल छोड देने वाले छात्रों की सख्या में कमी करने की है। उपलब्ध आकडे दशते हैं कि 996 में स्कूल शिक्षा के विभिमन स्तरों पर पर्वा छोड़ने वाले लडके और लडकियों का प्रतिशत 38 से 4%8 था। 997-98 में, मागव ससाधन विकास मत्रालय के अनुसार यह सख्या लडकों की 38 23% और लडकियों की 4 34% थी जिन्होंने 5वी कक्षा तक पहुचने से पहले हो स्कूल छोड दिया। शेष में से आठवी कथ्षा तक आधे से अधिक 54 4%) स्कूल छोड देते हैं। उनमें से 50 72% लड़के और 58 6% लडकिया हैं। एक तिहाई से भी कम सेकेन्डरी स्कूल स्तर पास कर पके (उ॥6 प्ाव5०0॥ 7र॥॥०5, )७३५ 2, 3999) | इस समस्या को रोकने के उपाय किए जा सकते हैं। उसी लीक पर चलते रहना अच्छी बात नहीं है। यदि हम यह जान लें कि हम प्रगति नही कर रहे हैं तो हमें अपनी नीतिया, कार्यक्रम और प्रतिदर्श बदलने होंगे और ने परैक्षण करने होंगे। दसवा विषय वर्तमान परीक्षा प्रणाली का है। एक तरह से तो परीक्षाएं मजाक बन का रह गई हैं। वर्तमान व्यवस्था में छात्र गाइडें व सस्ती पुस्तकें पढ़ कर परीक्षा उत्तीर्ण का सरल समझते हैं। कक्षा में बैठना उनकी दृष्टि में समय की बर्बादी है। शिक्षक भी लेक्वर तैयार करने, पुस्तकें व पत्र पत्रिका पढने और अधुनातम अनुसन्धान परिणामों वी जातक हासिल कले मे कम से कम कष्ट उठाना चाहते है। परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओं के तय पृष्ठ को पढने का उनके पास समय ही नही है। उनकी चिन्दा केवल यही रहती है कि हें भिन भिन्न विश्वविद्यालयों से अधिक से अधिक उत्तर पुस्तिकाए जोंचने को मिलें और उे अधिक से अधिक पारिश्रमिक प्राप्त हो। क्‍या हम वर्तमान व्यवस्था के साथ चलते ऐें ? इसे अधिक लचीला और मुक्त बनाना होगा जिसमें रचनात्मक सोच पर बल दिया जावे। अत्त में, उच्च शिक्षा को ठोक करने का प्रश्न है। क्या प्रत्येक छात्र को जो बेर चाहता है प्रवेश दिया जाये ? उच्च शिक्षा, सस्ती क्‍यों हो ? एक कक्षा में 00 से 80 छ्ों को प्रवेश क्यों दिया जाये ? किस सीमा तक शिक्षा में अनुदान (आऐडाक) मदर जाये ? कया हमें व्यावसायिक शिक्षा के लिए ही अनुदान देने चाहिये या कला व वार्गिय में भी? यह बे प्रश्न हैं जिन्हें सतातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के पुनर्गठन से, छा वी बेहतर कार्य परिणामों से, शिक्षकों को अधिक जवाबदेहो से और गर्मी वी छुट्टियों के क्रियात्मक उपयोग से जोड़ा जाद्ा चाहिए। यदि हम भविष्य के लिए तर्कसगत तरेके मे शैक्षिक व्यवस्पा 25 शिक्षा की योजना बनाना चाहते हैं तो हमें शिक्षण और परीक्षा प्रणाली के दोषों को दूर करना होगा। शैक्षिक असमानता और सामाजिक गतिशोलता (टवातल्यांणाओं ल्वृष्या0 शाप $0०5ग ०७9) यद्यपि यह एक तथ्य है कि सभी मनुष्य योग्यता और दक्षता में समान नही हैं और ऐसे समाज की कल्पना करना भी अविवेकपूर्ण और आदर्शहीन होगा जो अपने सभी सदस्यों को एक समान स्थिति और लाभ प्रदान कर सके, फिर भी उनके उद्देश्यों और आकाश्षाओं की प्राप्ति के लिए सभी लोगों को समान अवसर प्रदान करना आवश्यक है! यहा हम लोगों के बौच आर्थिक अस्मानता को बात नहीं कर रहे हैं बल्कि उस असमानता की चर्चा कर रहे जिसे आद्रे बेतेइ ने (#८५००॥७ 8:णण8 ०० 977.. 3) “असख्ित्व की दशाओं" (००४०॥/075 06 ८१०५४९८४८८) में असमानता कहा है| इस्त प्रकार हम न तो श्रकृति आधारित असमानताओं वी (अर्थात, आयु, स्वास्थ्य, शारीरिक शक्ति या मस्तिष्क के गुणों की) बात कर रहे है और न 'किस्म' (००) पर आधारित समाजों की जैसे, आदिवासी, कृपि और औद्योगिक समाज बल्कि गुणों और कार्यों या उन कारकों के अर्थ में असमानता की जो मनुष्य को स्थिति और शक्ति प्राप्त करे के योग्य बनाते हैं। अत, उस समाज का प्रयल, जो अवसरों की समानता के लिए कटिबद्ध है, अधिकतर सेवाए प्रदान क्ले का रूप ले लेता है जो समाजीकृत सामुदायिक सेवाओं ओर शैक्षिक सुविधाएँ प्रदान करके आर्थिक पृष्ठभूमि में असमानता को क्षतिषूर्ति करता है। वास्तव में, इस प्रकार को सुविधाए पर्याप्त रूप से व सबकी प्रदान करने के मार्ग में कठिनाइया हैं। भारत जैसे ममाज के लिये यह लगभग असम्भव ऐ कि उन सभी को मुफ़्त शिक्षा प्रदान की जाये जो इससे लाभान्वित होना चाहते हैं, सिवाय चयनित अवस्थाओं के, या यों कहिए प्राथमिक स्तर तक या जएरतमन्द और योग्य बच्चों को। इससे पुन अवसरों की असमानता का उदय होता है। जहा केवल जरुख्मद लोगों के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, यदि वे योग्य हों, वही सम्पन लोगों के बच्चे तभी तक स्कूल जा सकते हैं जब तक चे शुल्क देते रहें। सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए अवसर की समानता अधुनातम (76८०) विचार है जो कि व्यक्ति के जीवन में प्रदत स्थिति के महत्व को अस्वीकार करने के बाद अर्गित स्थिति के महत्व को मान्यता देकर स्वीकार किया गया है। एमएसगोरे ने भी कहा है कि सामाजिक गहिशीलता तभी सम्भव हो पाई है जब से ज्यक्ति की स्थिति आनुचाशिक बन्षनों से मुक्त हुई है (006, कब ि4॥८०४०४ 7990.. 29)। उनका कहना है कि प्रौधोगिबी विशेषज्ञता अर्जित काना, उच्च प्रशासमिक पद अहण करता, और नये पन्धे सीखना, धन की सफलता और समाज में सम्मान प्राप्त करने के लिए कुछ कार्य क्षेत्र हैं। योग्यता और श्रेष्ठता आप्त करता केवल शिक्षा से ही सम्भव है। यदपि शिक्षा सभी लोगों के उच्च स्थिति और उच्च पद पर पहुँचने की गारम्टो नही देती, फिर भी शिक्षा के बिना सामाजिक गतिशौलता प्राप्त वरना सम्भव नहीं होता। एस एसगोरे (वही 30) का मानना है कि शिक्षा तीन प्रकार से अवस्तरों को समान करने की भूमिका अदा करती है. (9) उन सभी व्यक्तियों के लिए सम्घव बनाकर जिनकी इच्छा शिक्षित डोने की है और उस सुविधा का 26 शैक्षिक व्यवस्था लाभ उठाने की है, (2) शिक्षा की ऐसी विषय-वस्तु का विकास करके जो वैज्ञानिक दा वस्तुपएक दृष्टिकोण विकसित करेगी और 6) धर्म, भाषा, जाति, दर्ग आदि पर आधाजि परस्पर सहिष्णुता का वातावरण पैदा कर के। समाज में सभी व्यक्तियों को सामाजिक गतिशील के लिए समान अवसर प्रदान करने में सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त करे के समान अवसर प्रदान करना महत्त्वपूर्ण बात है। वास्तव में, केवल शिक्षा ही सामाजिक गतिशोलता का मार्ग नहीं है, तथा वर्ग, सास्कृतिक पृष्ठभूमि और माता-पिता का सहाय, आदि भौ महत्त्वपूर्ण कारक हैं जो अवसरों को प्रभावित करते हैं। लेकिन शिक्षा का अभाव निश्चित रूप से गतिशौलता के लिए अवग्रेष सिद्ध होता है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि अवसर की समानता प्रदान करने में प्रयासरत समाज केवल चुनीदा लोगों को हो शैषिक सुविधाएँ प्रदान करता है। शिक्षा किस प्रकार अवसर को समानता से सम्बद्ध है, इस तथ्य को 967 में आठ राज्यों में किए गए एक अनुभवात्मक अध्ययन के आधार पर प्राप्त निष्कर्षों से देखा जा सकता है, जो कि विभिन स्तरों पर हाइ स्कूलों, कालेजों और व्यावसायिक सस्याओं में-अध्ययनरत छात्रों कौ सामाजिक पृष्ठभूमि (आयु, लिंग, जाति, पिता के व्यवसाय, पिता की शिक्षा आदि) पर आधारित था। इस अध्ययन ने दो सम्भावित विचारणीय तथ्य उजागर किए (|) शिक्षा श्वेतवसन समूह में प्राथमिकता प्राप्त (9०70) होती है और इस समूह के बालक शिक्षा सुविधाओं का उपयोग अन्य समूहों के बालकों से अधिक के हैं 0) म लोगों को जो श्वेतवसन समूह के नहीं है, शिक्षा विभेदों से (0॥0८:॥ए४»79) उपलब्ध है देखें, १६8७ 60९, मिवोका सिवंधरव/छा.. उक्ाटवातर बाव 7०८७७, 990 * 33)। यदि अथम द्ध्य सत्य है तो सम्भवत यह हमारे समाज में गैर श्वेतवसन समूहों के लिए शिक्ष की निरर्धकता को रेखाकित करता है। माध्यमिक शिक्षा में उनकी रुचि का अप्राव इस ह् से उत्थन होता है कि जिन आकाक्षाओं की पूर्ति के लिए उन्हेंने माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त को, वे उनके व्यवसाय में कोई सार्थक योगदान नहीं करती। क्‍या यह शिक्षा में दोपपूर्ण नियोजन पर प्रकाश डालता है या उन गैर विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के पिछडास भर जो सामाजिक गतिशोलता की इच्छा हो नही रखते ? हमारे समाज के वे लोग जो लाएं से वचित रहते हैं (जैसे, $ (५, $75, 0805, लिया और धार्मिक अल्पसख्यक) शोषण कें कारण बड़े कष्ट सहते रहे हैं क्योंकि वे अशिक्षिद हैं। शिक्षा में असमानताओं के वर्णनों पर बुछ अध्ययन किए गए हैं, जैसा कि क्षेत्रीय, आमीण-मगरीय, लिंग और जाति असमानताओं, स्कूल और कालेजों में प्रवेश में असन्तुलनों, और असमानताओं के परिणां से सिद्ध होता है। इन सभी अध्ययनों ने लाभों से वचित लोगों के स्तर और पहचान प शिक्षा के प्रभाव को इग्ित किया है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर किए गए अध्ययनों से सकेत मिलता है कि जब तक थे लोग शैक्षिक रूप से पिछड़े रहेंगे तब तक उरें आर्थिक मदद या उच्च शिक्षण सस्थानों में आरक्षित प्रवेश के रूप में सरक्षणात्मक भेद प्रदान करना है। इस प्रकर का एक अध्ययन आई पी देसाई के निर्देशन में 974 में 3) विज्ञान अनुसधान परिषद 6255२) ड्वादा आ्रयोजित किया गया था। इस के थे ओर थे 0 का उद्देश्य था देश में अनुसूचित जातियों और जनजाविगे स्कूल और कालेज के छात्रों को स्थिति और उनको समस्याओं का अध्ययद | इस अध्वा शैक्षिक व्यवस्था शा7 में यह सकेत प्रिला कि दलित छात्र अध्ययन के प्रति उदासीन होते हैं, और अशिक्षा असमानता में वृद्धि करती है तथा व्यवसायिक व सामाजिक गतिशौलवा को रोकप्ती है। सुमा चिटिनिस ($099 (॥य5, 972) ने भी बम्बई नगर में उच्च शिक्षा कालेज छात्रों के प्रवेश में असमानताओं तथा उनके द्वार भोगी गई समस्याओं की जाँच की थी। विक्टर डिसूज (फल्नण 05०७2७, 977) ने भी पंजाब में दलितों और अन्य के बीच शिक्षा में प्रेदभाव के स्वरूप और जातिप्रया, जावि व्यवहर, आर्थिक कारक और कल्याण कार्यक्रमों का स्वरूप और कार्यविधि किस प्रकार इन स्वरूपों की प्रभावित करते हैं, का पता लगाया। एमएल, झा (१४, 7॥9, 973) मे भी आदिवासियों की शिक्षा और उसमें भेदभाव का अध्ययन किया। वी पीशाह (७७ 505, 973) ने गुजरात में शिक्षा और अस्पृश्यवा के बौच सम्बन्ध को इगित किया है। सब्चीदानन्द सिन्हा ($800॥080200 809, 975) ने उत्तर प्रदेश में कालेजों के दलित छात्रों को स्थिति का वर्णन किया है। इस प्रकार, यह सब 8 शिक्षा को अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए एक साधन के रूप में मानते ॥ इसी प्रकार स्त्रियों को शिक्षा पर भी (उन लोगों की महत्वपूर्ण श्रेणी जो शैक्षिक रूप से पिछड़े हैं) अध्ययन हुए हैं। यह अध्ययन के अहमद (6 »॥7८०, 974) तथा अन्य लोगों द्वात किया गया जिसमें उन्होंने विकासशील समाज प्ें स्लियों की भूमिका में शिक्षा के महत्व को दर्शाया है ।*बेकर (846८, 973) ने महिला छात्राओं की आकाक्षाओं का, शैक्षिक सुविधाओं के उपयोग में उनके सामने आने वाली समस्याओं के समझने को दृष्टि से अध्ययन किया | सुमा चिटिनिस (50073 (8075, 977) ने बम्बई में मुस्लिम छात्राओं पर सह-शिक्षा के प्रभाव का अध्ययन किया। यें सब अध्ययन असमानताओं के प्रभाव और परिवर्तन की आवश्यकताओं को दशते हैं। शिक्ष| सामाजिक परिवर्तन और आपुनिकीकरण (एक0द्ला।क, $००ं2 (शाह शाएं #00ल्‍४75१०ा) शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के बीच सम्बन्धों के विश्लेषण में प्रश्श यह उठता है कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन किस अकार करती है। शिक्षा और आधुनिकौकरण के बौच सम्बन्धों के विश्लेषण में मुख्य प्रश्न यह है कि किप्त भ्रकार की शिक्षा और किन दशाओं में यह समाज में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को पैदा करेगी और उसे दृढ करेशी ? शिक्षा को सामाजीकरण के एक प्रमुख एजेंसी के रूप में और शिक्षकों तथा शैक्षिक सस्‍्त्याओं को एजेंट के रूप में स्वीकार किया गया है। शिक्षा को सामाजिक पस्वि्तन के एक साधन के रूप में बताने में तीन कारक महत्त्वपूर्ण हैं. परिवर्तन का एजेंट, परिवर्तन की विषय वस्तु, और उन लोगों कौ सापाजिक पृष्ठभूमि जिनका परिवर्तन किया जाना है, अर्थात, छात्र। विभिन समूहों के नियत्रण वाली शिक्षण सस्थाए उन समूहों के मूल्यों को प्रदर्शित करती हैं जो उन सस्याओं का प्रबन्ध एवं समर्थन करते हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षक भी बर्च्चों में विशेष मूल्य, आकाक्षाएँ और अभिरुचियाँ पैदा करते हैं। इस प्रकार परिवर्तन के साथन के रूप में शिक्षकों को भूमिका का विश्लेषण करने के लिए हमें उन दीन प्रकार की शिक्षण सस्थाओं को याद रखना होगा जो स्वतत्रता से पूर्व भार में विद्यमान थी एक, जो वैदिक दर्शन सिखाना चाहती थी 28 सौक्षिक व्यवस्था (ुरुकुल), दो, जो शिक्षा के भारतीयकरण पर ध्यान देती थी, तीन, वे जो पश्चिमी प्रकार को शिक्षा प्रदान करना चाहतो थी। दूसरे और तौसरे प्रकार कौ सस्थाओं का विश्वास था कि अप्रेजी कौ शिक्षा, विशेष रूप से हाईस्कूल स्तर पर, सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन कर सकेगी। वे समाज सुधारक जो अग्रेजी पढे लिखे थे, जाति प्रतिबन्धों की समाप्ति, ल्ियों की समानता, बुरे सामाजिक प्रथाओं और रिवाजों से छुटकारा, देश के शासन में भागोदारी, लोकतात्रिक सस्थाओं की स्थापना आदि पर बल देते थे। वे समाज को बदलने के लिए शिक्षा के माध्यम से उदार दर्शन सिखाना चाहते थे। दूसरे शब्दों में वे शिक्षा को ऐसी ज्ञान की ज्योति मानते थे जो अह्ञान के अन्धकार को दूर करती है। परन्तु यह सन्देहास्पद है कि शिक्षकों मे स्कूलों और कालेजों, दोनों में-मूल्यों के उदास्वाद को स्वीकार किया और तदनुसार शिक्षा दी। अत शिक्षण सस्थाओं ने सामाजिक एकवा, राजनैतिक लोकतत्र और तर्कसगतदा का सन्देश छात्रों तक नहीं पहुंचाया। स्वतत्रत् प्राप्ति के पश्चात ही लोकप्रिय लोकतत्र की अवधारणा स्वीकार की गई जब यह माना गया कि समतावाद, धर्म निरपेक्षवाद, व्यक्तिवाद, समाजवाद, मानववाद, जाति सस्था का अवमूल्यन और ब्राह्मणों की श्रेष्ठ में हास, आदि उद्देश्यों को शिक्षा के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है और यह कार्य स्कूलों और कालेजों में शिक्षा की विषय सामग्री बदल कर ही किया जा सकता है। आधुनिकोकरण के मूल्यों को फैलाने के लिए शिक्षा के उपयोग पर बल देने की बाद 960 और 3970 के दशकों के बाद समझी जाने लगी। अत्यधिक उत्पादक अर्थ व्यवस्था, वितरणशील न्याय, निर्णय करने वाली सस्थाओं में लोगों की भागादारी, उद्योगों, कृषि तथा अन्य व्यवसायों और पेशों में वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी का वरण, आदि भारतीय समाज को आधुनिक बनाने के उद्देश्यों के रूप में स्वीकार किये जाने लगे। और उन लक्ष्यों के उदाए शिक्षा के माध्यम से प्राप्त किया जाना था। इस प्रकार आधुनिकौकरण तर्कसगव मूल्य व्यवस्था पर आधारित आन्दोलन या दर्शन के रूप में नही बरन्‌ एक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया गया जो कि हमारे समाज की विशेषता मानी जाये। इस प्रकार आधुनिकीकण कैवल आर्धिक क्षेत्र तक ही सौमित नही रहना था, बल्कि सामाजिक, राजनैतिक, सास्कृतिक तथा धार्मिक क्षेत्र में भी आप्त किया जाना था। शिक्षा को आधुनिकता के विस्तार के लिए एक मार्ग के रूप में उपयोग किये जाने का प्रयल था। समस्या यह है कि सामाजिक राजनैतिक रूपरेखा व आधुनिकीकरण के मूल्यों के विषय में, हमारे समाज के अभिजात वर्ग में स्पष्ट असहमति है। अत. प्रश्न यह है कि आधुनिकीकरण के मूल्यों को कौन समझायेगा ? शिक्षा कौन देगा ? यदि परिवर्तन करे वाले स्वय परम्पणवादी हैं और स्वय अपने जीवन में आधुनिक मूल्यों को नहीं अपनातें, वो छ्जों को किस प्रकार दे इन मूल्यों को भ्रदान कोंगे ? इतने पर भी अनेक शिक्षा आवीग और 986 की नयी शिक्षा नीति ने असाधाएण स्पष्टता से आधुनिक समाज की विशेषताओं और मूल्यों को उजागर किया है, तथापि शिक्षा के माध्यम से आधुनिकीकरण का मार्ग इतना सरल नहीं है। केद्र तथा कुछ राज्यों में सत्ता में कुछ हिन्दू सगठनों के राजनैतिक नेता अभी भी विश्वास करते हैं कि शिक्षा के माध्यम से कुछ परम्परागव सास्कृतिक तथ्य सिखाए जे चाहिए। इस श्रकार को विचार शैली और आधुनिकोकरण के विशिष्ट मूल्यों (जैसे, धर्म निरेश्षता, व्यक्तिवाद, समाजवाद और समताबाद, आदि) की स्थिरता पर सहमति के अभाव सौक्षिक व्यवस्था डा में हम आधुनिकौकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने की उम्मीद कैसे करें 2 अत यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आधुनिक प्रभावों को प्रसारित करने के लिए एक साधन के रूप में शिक्षा का उपयोग एक ऐस्ता प्रकरण है जो गम्भोर चिन्तन चाहता है। अनेक समाजशास्त्रियों ने (६॥२ 7७2 (94), 50 ॥908 (97), ४5 606 (9), ४ 38,४घ७७ ([97) & ##छ०त (979), और &8 5960 (973), आदि) सामाजिक पुनर्गठन और आधुनिकीकरण के लिए शिक्षा को एक साधन के रूप में मानने के विषय पर ध्यान दिया है। के अहमद मे कहा है कि यद्यपि औपचारिक शिक्षा लोगों की अभिरुचियों और मूल्यों में ज्ञाव के परिवर्तन के माध्यम से वैचारिक परिवर्तन करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है, फिर भी समाज में सरचनात्मक परिवर्तन लाने में इसका प्रभाव सौमित हो है। ऐसा शिक्षा में विद्यमान प्रचलनों और कार्यविधियों हथा यथास्थिति में रुचि रखने वाले स्वार्थी लोगों के बीच सम्बन्धों के कारण ऐ। सुमा चिटनिस (5092 (%005, 978) ने भो विकास के साधन के रूप में शिक्षा को अनयिमित कार्यप्रणाली वी ओर सकेत किया है। एआर देसाई (974) ने सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में शिक्षा की मान्यता पर प्रश्न विन्ह लगाया है। उनका मानना है कि स्वतत्रता के बाद शिक्षा को वाछित परिणाम प्राप्त करने के उद्देश्य से तैयार नही किया घया है। उन्होंने सामाजिक गतिशोलता और समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने में शिक्षा को नीतियों तथा वित्त और कोष आवटन की नीतियों की आलोचना को है। एआर देसाई के समर्थन में हम अनुपूचित जातियों, जनजातियों, खियों और अल्पसख्यकों को शिक्षा के उदाहरण दे सकते हैं जो उनकी स्थिति को ऊपर उठाने में असफल रही हैं। अशिक्षित युवकों की बेरोजगारी और अल्प गेजगारी युवाओं की आकाक्षाओं की पूर्दि में शिक्षा की असफलता का एक और उदाहरण है। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास और गरीबी मिटाने में असफलता एक और उदाहरण है। जब तक शक्ति के मौजूदा वितरण की रूपरेखा को तोड़ा नहीं जाता और गधीबों के प्रति नीतियों में परिवर्तन नही किया जाता तब दक परिवर्दन के लिए ससाधन जुटाना कठिन ही बना रहेगा। सामाजिक परिवर्तन के लिए उच्च शिक्षा में भी परिवर्तन आवश्यक है। एमएसगोरे (97) ने शिक्षा की विधियों और विषयवस्तु में, उस वातावरण और ्सग में जिनमें इसका सचालन हो रहा है, और शिक्षकों तथा प्रशासकों की उन आस्थाओं और प्रनिवेद्धताओं में, जो वाछित विकास को प्राप्त करने में शिक्षा को प्रभाविता के लिए शिक्षा के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायो हैं, परिवर्तन लाने की आवश्यकता की ओए सकेत किया है। शिक्षा और आधुनिकोकरण के बौच सम्बन्धों पर भारत में कुछ अनुभवात्मक अध्ययन किए गए हैं। ऐसा एक अध्ययन दिल्ली में एनसौई आयटी (४८छाथ) द्वारा (960 के दशक के परिणाम) आठ राज्यों में किया गया था। इन अध्ययनों में वर्णन किया गया है कि किस सोमा तक देश में स्कूलों और कालेजों के छात्रों और शिक्षकों की अभिरुचियों, आकक्षाओं और दृष्टिकोणों में आधुनिकता आई है। इन अध्ययनों में अलेक्स इकलिस कक [905) द्वारा विकसित पैसाने का अनुकरण करके आधुनिकीकरण को मापा गया । परिणामों से आधुनिकीकरण पर शिक्षा के कम प्रभाव के सकेत मिलते हैं। पारिवारिक जीवन के विषय पर छात्र परम्पतत्मक बने हुए हैं। योगेद्र सिह 979) ने राजस्थान विश्वविद्यालय के कालेज शिक्षकों के आषुनिकीकरण के अ्रति अभिरुचियों और मूल्यों के 220 शौश्षिक व्यवस्ा सदर्भ में उनके दृष्टिकोण का अध्ययन किया। इस अध्ययन में विश्वविद्यालय के शिक्षकों को आकाक्षाओं, प्रतिबद्धताओं, प्रभुत्त और मनोबल के स्तर इस आशय से नापे गए कि शिक्षकों की भूमिव्स और मूल्य उन्हें आधुनिकीकरण के एजेंट के रूप में उनको भूमिका को किस अकार प्रभावित करते हैं। उन्होंने इन दोनों के बीच महत्वपूर्ण सम्बन्ध पाया और इस प्रका यह माना कि अध्यापकों के मूल्य छात्रों के आधुनिकीकरण को श्रभावित करते हैं। 975 में ईहक (8 प०4) ने एक अध्ययन यह जानने के लिए किया कि स्कूलों कौ पाठ्य पुस्तकों को विषय सामग्री ((०७८४७0) और माध्यमिक स्कूलों में शिक्षा की प्रक्रिया क्स प्रकार राजनैतिक आधुनिकौकरण को प्रभावित करते हैं। उन्होंने शिक्षा और जनसख्या सम्बन्धी परिवर्तनों के बीच सम्बन्धों की ओर भी सकेत किया। शिक्षा की समस्याएँ (एमाला$ ० एवण्ट्थांत्) छात्र असनोष (5ध0९॥ एग््) छात्रों पर किए गए अध्ययनों में से एक छात्र अध्ययन असन्तोष पर भी है। यहाँ हम इस समस्या का विस्तार से विश्लेषण करेंगे। छात्र अनुशासनहीनता को इस प्रकार समझाया गया है “सत्ता के प्रति अवज्ञा, शिक्षकों का अनादर, प्रतिमानों से विचलन, नियत्रण स्वीकार के से इन्कार, और सामाजिक मान्यता प्राप्त लक्ष्यों (०४७) और साथनों (9८80) को अस्वीकार करना ।” छात्रों में तीन स्थितिया अनुशासनहीनता पैदा करती हैं - ()) छा शिक्षा ओर शैक्षिक सस्थाओं में रुचि खो देते है और इसके प्रतिमानों को मानने से इन्कार कर देते हैं, (0) छात्र लक्ष्यों को स्वीकार तो कर लेते हैं किन्तु सन्देह करते हैं कि शिक्षण संस्था उनको प्राप्त कर सकेगी या नही। इसलिए वे शिक्षण सस्था को उसके प्रदिमानों से विचलित होकर सुधारना चाहते हैं, और (७) सस्या के प्रतिमान लक्ष्यों को ग्राप्ति में असफल रहते हैं, इसलिए छात्र प्िमानों में हो परिवर्तन चाहते हैं। 'छात्र असन्तोष' की विशेषताएं हैं : सामूहिक असन्तोष, शैक्षिक सस्थाओं में विकार्यात्मक स्थितियां और जनहा और छा्रों की मौजूदा अतिमानों में परिवर्तन की चिन्दा। दूसरी ओर 'छात्र आत्दोलनों' की विशेषताएं हैं. अल्याव की भावना पर आधारित कार्यवाही, असन्तोष, कुण्ठा और वचनाओं के झ्रोद की पहचान, नेतृत्व का उदय, कार्यवाही के लिए गतिमानता (7700॥59007), और उद्दौपन (॥ए) के प्रति सामूहिक प्रतिक्रिया छात्र असन्तोष विशेध को जन्म देता है। विरोध के प्रमुख उत्व हैं : () कार्यवाही परेशानियों को अभिव्यक्त करतो है (४) यह अन्याय के ग्रदि दृढ विश्वास का सकेत बखता है (0४) विरोध करने वाले अपने प्रयललों से सीधे तरीके से दशा को ठीक करेे में हैं, (5) कर्यवाही लक्ष्य-समृह (श९8० 87०ण%) द्वारा सुधायत्मक कदम उठाने के लिए प्रेरणा स्वरूप की जातो है (७) विरोधकर्सा दबाव (ण्थालंणण), समझाने बुझते (एश५॥३5०7), वेधा बादचीत (95८४5७०००) से (अथवा तीनों तरीकों से) लक्ष्य समूह को विचलित करने का अ्यल करते हैं। विरेधकर्तत यदि लूट करने लगें तो वे सम्पत्ति प्रापि के लिए ऐसा नही करते, यदि दे खिड़की शौशे होडने लग जायें, तो यह बदल्य लेने के लिए शौश्षिक व्यवस्था श्य नहीं करते, यदि वे एक व्यक्ति के विरूद्ध नोरेनाजी करने लगें तो यह उसकी भेइज्जती करने के लिए नहीं करते। ये सब उपाय केवल अपनी अभापूर्त मार्गों के विरुद्ध क्रोध का प्रदर्शन तथा 8208 सम्पन्त लोगों के अडियल रवैये के प्रद्वि प्रदर्शन है जो उनकी परेशानियों से सम्बद्ध हैं। छात्रों का विगेष कभी-कभी आक्रमण, आन्दोलन और उथल-पुथल को जन्म देता है। आक्रमण (०89658०४) एक शारीरिक या मौखिक व्यवहार है या आक्रमक कार्य जो कि चोट पहुँचाने, नुकसान पहुँचाने या नाश करने के इरादे से किया जाता है। क्षोभ/विलोडन (०्ा/0णा) पोशानियों और अन्याय को सत्ताधारी लोगों के ध्यान में लाने के लिए होता है। यह झटका लगाने (0 5॥8/८ 79), हिलाने 0 #॥ ४७) चिन्ता पैदा करने (0 द्ष्भ० 474८७) और सत्ताधारियों में घबड़ाहद पैदा करने के लिए होता है। आन्दोलन ए धााथा।) सामाजिक व्यवस्था को परिवर्तित करने के लिए विस्तृत समूह की क्रिया होती । छात्रों का आन्दोलन उन छात्रों का व्यवहार है जिनका लक्ष्य न तो किसी को चोट पहुंचाना है और न ही सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करना है, बल्कि केवल विरोध है। यह न तो विनाश कलने को प्रवृत्ति का परिणाम है और न ही कुण्ठा के प्रति जन्मजात प्रतिक्रिया। छात्र आन्दोलन के विभिन प्रकार हैं प्रदर्शन, चौखना चिल्लाना, हडतालें, भूख हडवाल, सडक-अवरोध, घेराव, और परीश। बहिष्कार। छात्र आन्दोलय की पूर्व दशाए ((72-८006॥0॥5) इस प्रकार हैं (3) सरचनात्मक खिंचाव (४080), (9) खिंचाव के ज्रोत वी पहचान (०) प्रारम्भिक (प्रा0000०) कार्यवाही में अवक्षेपक (छाल्थञध॥णह) कारक (0) नेता द्वारा कार्यवाही के लिए शक्ति को गति प्रदान करना। छात्र आन्दोलनों के महत्वपूर्ण कार्य हैं. सामूहिक चेवदा एय सामूहिक निष्ठा जागृत करना, छात्रों को नवीन कार्यक्रमों और नवीन योजनाओं के लिए काम काने के लिए सगठित करना, और छात्रों के लिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए और परिवर्तन के मार्ग में प्रभाव पैदा करने के लिए अवसर प्रदान करना। आन्दोलन हिंसात्मक एवं अहिसात्मक दोनों हो सकते हैं। उदाहरणार्थ लगभग एक दशक पूर्व भारत में लगभग 5,000 छात्र आन्दोलन हुए जिनमें से लगभग 20% दिसात्मक थे। पुन कुछ आये से अधिक आन्दोलन गैस्शैक्षिक मामलों मे सम्बन्ध कैम्पस के भीतर थे (जैसे मूर्ति लगाने पर, विश्वविद्यालय का नाम बदलने पर, बस किराया कम करने पर, आदि), लगभग 20% शैक्षिक मामलों और लगभग 25% कुछ सामाजिक मामलों (आरक्षण का मामला, आदि) से सम्बद्ध ये। छात्र आन्दोलनों का वर्गीकषण इस प्रकार किया जा सकता है. छात्र परक आन्दोलन और समाज-पएक आन्दोलन। छात्र पर्क आल्दोलनों में विद्यालय/विश्वविद्यालय स्तर की संपस्पाए तथा समाज-परक आन्दोलरनों में गज्य/यथ्ट व्यापी राजनीति, वीवियों और कार्यक्रमों से सम्बन्धित समस्याएं आती हैं। छाव्र पकक आन्दोलन आमतौर पर मूल्य परक होने की अपेक्षा समस्या-परक होते हैं और ये लगातार नहीं होते । उदाहरणार्थ, छात्र एक विश्वविद्यालय के विशेष उप-कुलपति को हटाने के लिये आन्दोलिव होंगे किन्तु वे भारत में विश्वविद्यालयों में उप कुलपतियों के चुने जाने की व्यवस्था में परिवर्तन के लिए नही लडेंगे॥ 222 शैक्षिक व्यवस्था छात्र आन्दोलन चरणबद्ध तशैके से विकसित होते हैं! इनमें चार अवस्थाए निम हैं (0 असन्तोष (05८०७४८०) की अवस्था, जो मौजूदा दशाओं के साथ बढवे असमजस और असन्तोष की अवस्था होती है, (॥) आरम्म करने (720०7) की अवस्था, जिसमें एक नेता का उदय होता है, अम्न्तोष के कारणों का पता लगाया जाता है, उत्तेजना में वृद्धि होती है और कार्यवाही के गस्वावों पर चर्चा की जाती है, (0) औपचारिकता (00एघथण्वरांग) की अवस्था, जिसमें कार्यक्रम विकसित किए जाते हें, गठबन्धन किए जाते हैं, किसी आका से समर्थन आ्प्त कल के प्रयाम होते हैं, (४) जनसमर्क (० 5एएफ़ण/) की अवस्था, जिसमें छात्र समस्या को सार्वजनिक समस्या के रूप में देखा जाता है। 985 से 999 के बीच भारत में महत्त्वपूर्ण छात्र आन्दोलन इस प्रकार थे : आरक्षण के विषय पर 935 में गुजपत आन्दोलन, 985 में मध्यप्रदेश के छात्रों द्वाय आरक्षण विशेषी आन्दोलन, 983-84 में असम आन्दोलन जो पूर्वी बगाल से आए शरणार्थियों के मामले में था, और 990 में भारत के विभिन राज्यों में चलाया गया मण्डल विरोधी आन्दोलन। छात्र आन्दोलनों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है : (॥) प्रवर्तक (समझने बुझाने) (08098) आन्दोलन, जिसमें छात्र सत्ताघादी लोगों के दृष्टिकोण बदलने का श्रयास करते हैं (भले ही वे कोई हों) वे अपनी समस्याओं पर उनसे बातचीत करते हैं, और उन्हें अपना दृष्टिकोण मानने को बाध्य कर देवे हैं। (अतिरेय (२65४०) आन्दोलन जिसमें 'सत्ताधारियों को उनकी जगह पर रखना” लक्ष्य होता है। 6) क्रान्तकारी (१०५०।७७०१००) आन्दोलन जिसका लक्ष्य सरम्ाजिक व्यवस्थाओं या शैक्षिक व्यवस्थाओं में व्यापक (६४८०७॥१७) परिवर्तन लाना होता है। कौन से छात्र आन्दोलनों के प्रति ग्रहणशौल (7८०००॥४८) होते हैं ? 0) सामाविक रूप से एकाकी किए हुए, अर्थात जो वृहद्‌ समाज से अपने को कया हुआ अनुभव कल हैं, ७) व्यक्तिगत रूप मे कुसमायोजित (.00|900५(८७), अर्थात्‌ जो सन्तोषयनक जीवन भूमिका पाने में असफल रहे हैं, या उन्हें अध्ययन में पर्याप्त रुचि नहीं है, 6) परिवार मे ३ पका (00092॥20), अर्थात वे जिनमें परिवार के साथ अन्तरग सम्बन्धों का अग्ाव है, () सोमान्त (00272), अर्थात वे जो अपनी जाति, धार्मिक/ भाषायी समूहों से जुडे हुए नही है, 6) गतिशील/पव्राजक (7०5), अर्थात्‌ वे जिनके पास वृहद्‌ समुदाय में समाहित होने के बिल्कुल कम अवसर हैं। बीवीशाह (8७ 5॥9, 968) ने गुजदात में विश्वविद्यालय के छात्रों का अध्ययन किया। उन्होंने अनुशासनहीन छात्रों की पहचान करने के उद्देश्य से उन्हें सामाजिक प्रस्थिति और व्यक्तिगत योग्यताओं के आधार पर चार समूहों में वर्गकृद किया ()) उच्च प्रस्थिति, उच्च योग्यता, 6) निम्न प्रस्थिद, निम्न थोग्यता, 6) किस स्थिति, उच्च योग्यवा, और 6) उच्च पस्थिति, निम्न योग्यता। उन्होंने कहा कि दूसरे और चौथे वर्गों के छात्रों में अधिक असन्तोष पाया जाता है। 960 में यूजीसी (60) कमेटी डरा बताए गए छात्र असन्तोष के मुख्य काएण दिल थे 0) आधिक कारण, जैसे शुल्क कम कस की मागे, छात्र वृद्धि बढाने की मार्ग, 2) शैक्षिक व्यवस्था 223 प्रवेश, परक्षाएं और शिक्षण सम्बन्धी मौजूदा प्रत्रिमानों में परिवर्तग को माग, 8) कालेजों और विश्वविद्यालयों की दोषपूर्ण कार्य प्रणाली, ई) छात्रों और शिक्षकों के बीच सर्पपूर्ण सम्बन्ध, जैसे, छात्राओं या छात्र नेताओं के साथ शिक्षको का व्यवहार, कक्षा छोडना आदि, 6) कैम्पस में सुविधाओं की अपर्याप्तता, जैसे, अपर्याप्त होस्टल, होस्टलों में खराब भोजन, कैन्टीन का अभाव, आदि, और (6) छात्र नेताओं का राजनीतिशों द्वार बहकाया जाना। सैद्धान्तिक दृष्टि से छात्रों के आन्दोलनों की व्याख्या इन सिद्धानों के आधार पर की गई है - असन्तोष सिद्धान्त (आन्दोलन की जड़ें असन्तोष और अन्याय की भावनाओं में होती हैं), व्यक्तिगत कुसमायोजन सिद्धान्त (आन्दोलन जीवन की असफलताओं के बीच शरण देते हैं), सापेक्ष बचना (८आए० तधग्राए्याएणा) सिद्धान्त, और ससाधन गतिशौलता (70४007०७ ॥07॥7%80ग्र) सिद्धान्त । छात्र आन्दोलनों को नियत्रित करने के प्रस्तावित उपाय इस प्रकार हैं. () उचित निर्देशन के द्वारा छात्रों के अति उत्साह को प्रवाहित करना 2) समस्याओं का उनके पथ समाधान, न कि उनके लिए समाधान अर्थात्‌ छात्रों को निर्णयकारी सस्थाओं के साथ जोड़ना 6) छोटी-मोटी उत्तेजताओं को अनावश्यक देर किए बिना दूर करना (4) राजनैतिक दलों के लिए आचार सहिता बनाना जिससे वे छात्रो को छोटी-छोटी बातों पर आन्दोलन के लिए न भडकावें। 6) शिक्षण सस्थाओं में पुलिप्त हस्तक्षेप के विषय में नियम बनाना। प्रौढ शिक्षा कार्यक्रम (80७६ |२00०व॥0ा छा०्छ्ग्गारे स्वतत्रता प्राप्ति के पश्चात से साक्षरता विस्तार सरकार का सजा प्रयास रहा है। 950 और 99। के बीच साक्षरता प्रतिशत में तीन गुनी (6 67 से 52 2॥) वृद्धि हुई है। 99॥ में अशिक्षिद लोगों वी सख्या 32890 लाख थी जिसमें 22050 लाख स्त्रियों शामिल थी (0४0॥90५27 27०४०, /४2/2, 998 46) | अधघुनावम निरक्षण्ता सम्बन्धी प्रकाशित तथ्यों के अनुसार 2000 तक विश्व में भारत का हिस्सा एक तिहाई हो जाना था जो 45 से ऊपर आयु वर्ग में निरक्षें की कुल सख्या के अनुपात के आधार पर है। 964 में शिक्षा आयोग ने प्रोढ़ शिक्षा की भूमिका को उजागर करते हुए 5-25 आयु वर्ग समूह में साक्षत्ता विस्तार के लिए गध्भीर प्रयत्नों को सिफारिश की और इसको विकास कार्यक्रम से जोडा। परन्तु इस ओर 975-76 तक कुछ नही किया गया। 3978 मे सरकार ने 5-25 आयु यर्ग समूह के लगभग 0 कंरेड निरक्षर लोणों के लिए राष्ट्रीय प्रौढ शिक्षा कार्यक्रम (४/६8ए) की घोषणा कौ। कोठारी आयोग (॥98-82) ने इस कार्यक्रम में कई दोष और अपर्याप्तओ की ओर सकेत किया। (१) यह कार्यक्रम अधिकतर निरक्षर्ता तक ही सीमित रहा । (2) निरक्षरता को विकास के साथ जोड़ना सरल नहीं था। 8) जागृति का उद्देश्य आ्राप्त नही किया जा सका। ६) विज्ञान में कार्यक्रमों के प्रति कम ध्यान दिया गया। 5) काफी सख्या में राज्य (आसाम, हिमाचल प्रदेश, और उडीशा) राष्ट्रीय प्रौढ शिक्षा प्रोग्राम से अछूते एरे । ७) कार्यक्रम लचीला और विकेद्धित नहीं था। ४) स्त्रियों और पुरुषों की अलग अलग आवश्यकादाओं पर कोई ध्यान नही दिया गया। (9) कार्यक्रम प्रमुख रूप से राज्य सरकारों का ही उत्तरदायित्व रहा। पर शौश्षिक व्यवस्था मीडिया और स्वय सेवी एजेंसियों को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया। बीस सूत्रीय कार्यक्रम में भी साक्षरता को महत्व प्रदान किया गया। 986 में शिक्षा से सबधित नवीन योजना (०) ने भी साक्षरता कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए नये दिशा निर्देश सुझाये। कार्यक्रम के ढाचे में लचौलापन शुरु करके, कार्यकर्त्ताओं की ट्रेनिंग पर बल देकर, सीखने वालों की बोलचाल की भाषा को महत्व देकर, नियक्षण व्यवस्था को विकेद्रोकृत करके, महिला-शिक्षकों की सख्या बढाकर, कार्यक्रम की अवधि में निस्‍न्‍ता प्रदान करके, प्राविधिक ससाधन व्यवस्था को सुदृढ बनाकर, प्रबन्धन व्यवस्था प्रदान करके, और प्रबन्धन व्यवस्था का मूल्याकन करके साक्षरता कार्यक्रम को मान्यता भ्रदान की गई। इन परिवर्तनों के बावजूद साक्षरता कार्यक्रम की गति को तेज किया जाना है। शैक्षिक नौति में नये सिरे से थक्का लगाने को आवश्यकता है। शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति (पिब्ांणा॥ एगाल) छा एक्टर) भारत सरकार ने 985 में देश के लिए एक नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (पष्टा3) बनाने कौ घोषणा कौ। विभिन क्षेत्रों से श्राप्त सुझावों और दृष्टिकोण पर विचार के बाद एनपीई की घोषणा 986 में की गई। इसका बल इन बातों पर था . 6) शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन, 2) सभी स्तरों पर शिक्षण को गुणवत्ता में सुधार। 8) विज्ञान और प्रौद्योगिकी को अधिक महत्व देना। (4) नैतिक मूल्यों का परिवर्दन। 6) अखण्डता को सुदृढ़ कला। 6) समान सस्कृति और नागरिकता का भाव विकसित करना। इस नीति में प्रमुख प्रस्तावित उपाय इस प्रकार थे . () सरकार द्वाया वित्त पोणि कार्यक्रम प्रारम्भ करके लिंग, जाति, विश्वास के भेदभाव के बिना सभी छात्रों को शिक्षा वा लाभ पहुंचाना, (2) देश के प्रत्येक भाग में 09+2+3 की समान शिक्षा सरचना धारण करना। प्रथम 0 वर्ष में 5 वर्ष प्राथमिक शिक्षा, दीन वर्ष मिडिल स्कूल, वधा शेष 2 वर्ष हाई स्कूल के लिए होंगे, 6) स्त्रियों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, और अन्य पिछडा वर्ग, अल्पसख्यकों दथा विकलागों को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना, (4) राष्ट्र के द्वार संसाधनों के समर्थन अ्रदान करने का उत्तरदायित्व सभालना, भेदभाव कम करना, प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण, प्रौह साक्षरता और प्रौद्योगिकी अनुसन्धान, 6) प्रोढ शिक्षा कार्यक्रम का क्रियान्वयन, (0) व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रम का क्रियान्वयन, (7) उच्च शिक्षा को अवनति से बचाने के लिए कदम उठाना। विशिष्टीकरण की माग को पूरा करने के लिए पाठ्यक्रमों का पुनरीक्षण। विश्वविद्यालयों में अनुसन्धान कार्यों के लिए अधिक सहयोग दिया जाना, (8) मुक्त (०) व्यवस्था प्रारम्भ करना, ७) डिग्ियों को मौकरियों से न जोड़ना, (00) आ्रम्य विश्वविद्यालय का नया पतिरूप विकसित करना, () भाविधिक और प्रबन्धन शिक्षा का सुदृढीकरण तथा साथ ही ग्रम्य प्राविधिक विद्यालयों को दृढ़ बनाना, ((2) शिक्षकों के साथ अच्छा व्यवहार और उनमें अधिक जवाबदेही का विकास करना, (3)मूल्य शिक्षा देने पर ध्यान देना, (4) शारीरिक शिक्षा व खेलकूद के लिए बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना, 05) परीक्षा प्रणाली में सुधार लागू करना। शौक्षिक व्यवस्था रट5 महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों क्षा (:07८४४णा ० एएच्नाक्त, $ताध्कालों ()6, इ$ताशांफाहव पाल त00 ()9त्त ऐ्छ्ज़याएं (355९५) महिलाओं को शिक्षा (90८४09 ग॑ १४०ाला) जियों के लिए शिक्षा आवश्यक है ताकि दे समानता प्राप्त कर सकें। मूल्य परिवर्तन के लिए यह पूर्व आवश्यकता है क्योंकि मूल्य परिवर्तन के बिना सामाजिक उद्देश्य प्राप्प नहो किए जा सकते। सामाजिक विधानों वे उन्हें एजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार दिए हैं लेकिन माद अधिकार प्राप्त होना उन्हें इन अधिकारों के लाभ प्राप्य करे के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। काजून उन्हें चुनाव में वोट देने का अधिकार, चुनाव लड़ने और गजनैतिक पद ग्रहण करने का अधिकार भले हो दे दे लेकिन यह उन्हे ऐसा करने को बाध्य नहीं कर सकता। कानून उन्हें पिता की मम्पत्ति में हिम्मा लेने का अधिकार दे सकता है पर बह महिलाओं के अपने भाइयों से उनको देय हिस्सा लेने के लिये बाध्य नहीं कर सकता। कानून उन्हें उनका जीवन साथी चुनने का अधिकार दे सकता है और उन्हें पति को वलाक देने का अधिकार भी दे सकता है जो उन्हें सताता हो, पीडा देता हो, शोषण करता हो लेकिन कितनी श्लिया इन अधिकारों का प्रयोग करने के लिए जोर डालती हैं ? इसका काएण यह है कि अशिक्षा ने उन्हें पःम्परागत मूल्यों से चिपकाया हुआ है। साहस कौ कमी उन्हें साहसी कदम उठाने से रोकदी है। शिक्षा उन्हें उदार और विस्तृत दृष्टिकोण का बनाएगी और उनकी अभिरुचियों, मूल्यों और भूमिका-विषयक विचार बदलेगी। जियों को साक्षरता दर 95 में 0%6 से बढकर 98 में 2975%, 997 में 3970% हो गई और अतुप्नान है कि 999 के प्रारम्भ में यह दर 39% हो गई है। 990-9] में कुल प्रवेशों के अनुपात में लडकियों के, प्राथमिक स्तर में 4! 4% भवेश हुए, मिडिल स्तर पर 47 4%, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर 33% और उच्च शिक्षा स्वर पर 333% (॥64 992 07) | राज्यों में सर्वोच्च स्री साक्षरता दर 99 में (75 65%) केरल में थी, फिर मिजोरम (68 60%) और दिल्लो में 62 57%), जबकि सबसे कम दर राजस्थान में 20 44%) और फिर बिहार (22 89%), उत्तर प्रदेश 25 3%), मध्य प्रदेश में 0885%) थी (#.ल#४/ रिटरिल, ध्वौ०.. 998.. 42)। आयु-वाए, 68 4% से भी कम तीन वर्ष की आयु को लडकिया हैं और उन्हें कोई शिक्षा नहीं मिलती 3 से 6 वर्ष आयु समूह में, 793% लडकियों को शिक्षा प्राप्त है, 7 से ! वर्ष आयु समूह में 7.% को, 2 से 4 वर्ष आयु समूह में 42% को और 5 + वर्ष आयु समूह में केवल 0% शिक्षा प्राप्त है (वहो 48) | भारत में अनुमूचित जाति की लड़कियों की साक्षरता दर 23 76% और अतुसूचित जनजाति समूह में 8 9% है। 7957 में आठ राज्यों में स्वानुभव आपघारित अध्ययन, जो कि विविध स्तर पर अध्ययनरद ।,500 छा्ों पर किया गया था, यह बतादा है कि शैक्षिक अवसरों में भेदभाव 'लिए' के आधार पर सर्वाधिक था। मोटे तौर पर (जैसा की उपरोक्त आकडे दशशति हैं) लड़कियों की शिक्षा मे बडे लम्ने डग भरे हैं और आज विश्वविद्यालयों के कई विभागों और 226 शैक्षिक व्यय (2८ण॥६७) में लड॒क्या लडक्तों को अपेष्ठा अधिक दिखाई देतीं हैं। उप्रेक्न दर्शवि हैं कि जो लडक्या शिक्षा व्यवस्था में प्रवेश सेठी हैं वे अधिकतर रद श्वेटवमन परिवारों को हैं। आवास, निम्न जाति और निम्न आर्थिक स्तर निश्चित रूप में लडक्यों व्नोे शिक्षा अवम्यें में वचित कर देते हैं। (१.5. 606, #टल ख्बघव्थपणा, 990 36) लडक्यों/म्त्रियों को शिश्षा में भागीदारी मुनिश्चित करने और उममें सुधार करे के लिए निलललिखित विशिष्ट कदम उठाए गए हैं . 6) श्याम पट्ट अभियान (एडच्कग 277८४ 80८४४) अनर्गत, मरकर ने 987-88 से एक लाख प्राथमिक स्कूल अध्यापों के पद सृजन के लिए सहययटा प्रदान की है जो रूयों द्वारा ही भरे जाने थे। पाँच वर्षो में (अर्थात्‌ 992 तक) लगभग 75% पद परे गए जिनमें से 60% महिला स्ि्िकए थीं। 0) लडक्यों के लिए एनएफ्ड (हा) केद्रों को सख्या 99 तक 8,000 हो गई रण विनको 90% मरठाये सहायता मिलती थी। 3) महिला समाख्या' (रूयों वी समानता के लिए शिक्षा) परियोजना अप्रेल 989 में प्रारम्भ की गई जिसका उद्देश्य था प्रत्येक सम्बन्धि गाँव में महिला सघ के माध्यम से शिखा प्राण करने के लिए महिलाओं को तैयार मरड। भह केंद्र सरकार की योजना है जिममें उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजयत में महिला समश्या समितियों को पूर्मरूपेण विद्चोय महायता प्रदान की जानी है। इण्डो डच (700 00%) योज्ता होने के काप्य इसको नीदरलेप्ड मरकार मे शत प्रदिशत सहायता प्राप्त होती है। हर योजना का उद्देश्य शिक्षा की माग पैदा करा और पूर्व-स्कूली, अनौपचारिक, प्रौढ दश अविराम (000॥7७ए१४) शिक्षा के लिए नवीन शेष्टिणिक प्रविष्टियों परसम्भ करना है। 6) सजग कार्ववाते द्व्य नवोदय विद्यालयों में लडकियों का प्रवेश 28% तक सुनिश्चित किय गया है। 6) प्रोद सिद्ध केद्रों में सियों के प्रवेश पर विशेष ध्यान दिया गया है। 6) प्रामीय प्रकार्यात्मक साखरता कार्यक्रम के अन्तर्गत 995 तक प्रौढ शिक्षा में कुछ नामित लोगों में मे लगभग 55% दो जियो हो थीं। कानूत कमी स्त्री को स्वय को शिक्षिन करने के लिए बाध्य महीं कर सकता। न हैं माता-पिता वन अपनी पुत्रियों को स्कूल भेजने के लिए बाष्य क्या जा सकता है। शशि के बिता स्त्री समानता प्राप्त नहों की जा सकती। इसके लिए पुरुषों का लड़कियों वी शिद्ष है अति दृष्टिकोय बदलने की आवश्यक्ता है। . गद्गीय नीवि 986 ने थो स्त्रियों को समानता के लिए शिक्षा पर बल दिया जो हि अत मूल्यों के विकाम को बढाएगी। अ्रस्तावित नोति है , ल्ियों के विकास के लिए सहन कार्यक्रम बनाने के लिए जैड्टिक मम्थाओं को प्रोत्माहन देना, स्रियों की निरश्॒ता सन5 करना, प्रारम्भिक शिक्षा दक रियों की पहुँच के बीच बाधाओं को हटाना तथा व्यावस्तामिई, अवेदिक और पेडेवार शिल्या पाय्मों में (लिंग रूदियों के स्थिर रूपों" को समा के के लिए गैर भेदघात्र नौति अपनाना। अनुसूचित जातिओें, अनुसूचित जनजातियों दा अन्य पिछड़े वर्गों को शिक्षा (छाल्तच्चष्त त 505, 55, 206 0809) शिश्वा व्यक्ति और समुदाय के विक्रम से अत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है। यह सामाजिक पु शैक्षिक व्यवस्था 227 तथा आर्थिक विकास्त के लिए एक मात्र कारक है। समाज के कमजोर तपके के लिए शिक्षा का विशेष महत्व है क्योंकि कई शताब्दियों तक उनकी निरक्षरता और साम्राजिक पिछड़ेपन को उनके आर्थिक शोषण, पीड़ा, और अवमानना के लिए श्रयोग किया जावा रहा है। कम विशेषाधिकार प्राप्त समूहों और आम जनता की स्रमस्याए परिमाणात्मक एवं गुणात्मक दोनों रूपों में भिल हैं। आमजन की भाष्त में साक्षरता दर 998 को जनगणना के अनुसार (22%) अनुसूचित जातियों और जनजातियों की अपेक्षा 5% से 23% तक ऊंची थी (अजाति की 37.456 और अजनजाति की साक्षरता दर 2960% के सहित) (४9006 आर्ण।6 ०0. ०॥, 42-43), साक्षता दर पं इस प्रकार का अन्तर पुरुषों में 64 3%, 49.9% और 40 65% क्रमश) तथा महिलाओं में 89 29%, 23 76% और 8 49% क्रमश)। ग़ज्यों में भी अनुसूचित जातियों व जनजातियों की साक्षरता दर समान नहीं है! भारत में 374% की तुलना में अनुसूचित जातियों में यह दर राज्यों में सबसे अधिक केरल में 79.66%), गुजणत में (6 07%) और गोआ, देहली, अरुणाचल प्रदेश, मदाराषटू, मणिपुर में 58 73% और 56 46% के बीच विविध) और निम्नतम बिहार में (9 49%), तत्परचात आन्य प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक में (359% और 38 06% के बीच) धी। अनुसूचित जनजातियों में साक्षरता दर सम्पूर्ण भारत में 2960% को दुलता में राज्यों में केरल में उच्चतम (६7.22%) है और न्यूनतम आशय प्रदेश में (7 6%) है हर ०८44) | राज्य के भीतर भी कुछ ऐसी जनजातियाँ हैं जिनमें साक्षणता सबसे ऊची है और कुछ में निम्मतम। उदाहरण के लिए राजस्थान में मीणा जनजाति की साक्षरता दर भीलों, सहारिया, रावत आदि की तुलना में ऊची है। केरल में भी ऐसा ही है। राज्य में सभी अनुसूचित जातियों की साक्षरता दर ७7 22%) की तुलना में, कधूनायकन, ऐरावलान, इस्ला, मधुवन, पनियम, आदि जनजातियों में बहुत कम साक्षरता है (0% से भी कम)। अत्य पिछड़े वर्ग के लिए ऐसे आंकड़े उपलब्ध नही हैं। परिमाणात्मक और गुणवत्ता के भेद के इसी सन्दर्भ में शिक्षा के केन््रीय सलाहकार बोर्ड ने लगभग 24 वर्ष पूर्व (जुलाई 976 में) सिफारिश की कि 0) अनुसूचित जातियों और जनजातियों की आरम्भिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण आवश्यक है, विशेषरूप से चयनित पत्रों में, 2) क्योंकि अनुसूचित जातिया और जनजातिया समजातीय समूह नहीं हैं (पराक्षतता स्दए पर उच्च विभेदों सहित-जनजाति वार और जातियार विभिन्‍न गाज्यों में) इसलिए उनके लिए विभिन कार्यक्रम आवश्यक हैं, ७) जनजातीय क्षेत्रों में क्योंकि कई मामलों में शैक्षिक मूलभूत ढाँचा है ही नही इसलिए एकल-शिक्षक स्कूल वाले शैक्षिक सस्थाओं के विस्ता:, स्कूल के विस्तार के घनत्व के अनुसाए छात्रावास सुविधाओं को प्रत्येक सूक्ष्म इकाई के लिए नियोजित करने की आवश्यकता है। अनुसूचित जातियो और अनुसूचिव जनजावियों के शैक्षिक विकास के लिए किए गए उपाय (शटाआआर5 40णु/९८१ [पएः [90९90छणा० 7टल्‍ल०फ्‌णलता एण 505 2०० 875) 6) हमारे सविधान में ग़ज्यों के लिए निर्देश है कि कमजोर तपके के लोगों के शैक्षिक हिंदों को प्रोत्साहित किया जाये, विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित 228 शैक्षिक नवत्या जनजाति के लोगों के लिए। उनके लिए शैक्षिक सस्थाओं को स्थापित किया जाये और उममें प्रवेश सुनिश्चित किया जाये तथा छज्वृत्तियों आदि के लिए राज्य कोष से अनुदान दिया जाये। इस भ्रकार सविधान में उनके लिए अस्थाई भेदभाव की नीति का प्रावधान किया गया है। ७) इन निर्देशों को दृष्टिगत करते हुए अनुसूचित जातियों और जनजातियों में शिक्षा सर को ऊचा करने के लिए, स्कूल खोलकर, पूर्व मैट्रिक एवं मेट्रिकोत्तर स्तर पर छात्रवृत्तिया प्रदान करके, लडकियों के लिए विशेष रूप से छात्रावास बनवा कर, पुस्तक बैंक बनाकर, दोपहर के भोजन की व्यवस्था कराकर, छात्रों को ऋण उपलब्ध करवा कर कोचिंग केद्र खोलकर, शिक्षकों के लिए मकान उपलब्ध कराकर और अन्य सुविधाए देने के लिए सभी पचवर्षीय योजनाओं में करोड़ों रुपये का प्रावधान किया गया है। ७) शिक्षण सस्थाओं में उनके लिए स्थान आरक्षित किए गए हैं, विशेष रूप से इन्जीनियरिंग और मेडिकल कालेजों में । (0 मवेश के लिए आयु सीमा व अक्ों में छूट दी गयी है। 6) पेशेवार पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए या केद्रीय व राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं || बैठने के लिए तैयारी हेतु आकाक्षी छात्रों के लिए विशेष निशुल्क कोचिंग दी जाती । 986 कौ राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने अनुसूचित जातियों की शिक्षा के लिए निम्नलिखित उपाय सुझाये थे 0) दलिव परिवारों को प्रोत्साहन ताकि वे अपने बच्चों को 4 वर्ष कौ आयु तक नियमित रूप से स्कूल भेजें। (2) कक्षा एक से आगे निम्न पेशों में लगे परिवां के बच्चों के लिए (सफाई, चमडे आदि का) पूर्व-मैद्रिक छात्रवृत्ति योजना (3) पाठ्यक्रमों के सफल समापन, प्रवेश और नियमित उपस्थिति आदि को सुनिश्चित करने के लिए लगाव निगरानी (4) दलितों में से ही शिक्षकों की भर्ती 6) छात्रावासों में सुविधा, (6) स्कूलों, बालवाडियों तथा शिक्षा केद्रों की ऐसी जगहों पर स्थापना जिनमें दलितों की पूर्ण भागीदारी हो सके, (7) उनकी भागीदारी में वृद्धि करने के लिए नयी विधियों का निरन्तर नवाचरण (परग0ए/॥०7) । उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त जनजातियों के लिये कुछ अन्य प्रस्तावित उपाय इसे प्रकार थे ([) जनजातीय क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालय खोलने में वरीयता, (2) प्रारम्भिक अवस्थाओं में जनजातीय भाषा में शिक्षण सामग्री तैयार करना, 8) शिक्षित जनजाति के लोगों को अपने क्षेत्रो मे शिक्षण का काम करने के लिए प्रोत्साहित करना, (4) बडे पैमाने पर आवासीय विद्यालय स्थापित करना। 3986 कौ राष्ट्रीय नीति में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए सिफारिशों इस प्रकार थीं . (0) समाज के सभी शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े दर्ग के लिए प्रोत्साहन, विशेष रूप से मामीण वेग में ७) पहाडी, रेगिस्दानी जिलों में और दूरस्थ दुर्गम स्थानों में सस्थात्मक मूलभूत ढोँचा अदान करता। शैक्षिक व्यवस्था 229 अनुष्दूचित जातिधो और अनुसूचित जनजातियों के लिये शैक्षिक योजञाओ को सफलता और असफलता (8प९:७5५ 00 -जप्/ट ए॑ टितैएस्यांगाडा $कत्यमाटड 0 505 घाव 575) यद्यपि योजनाओं के शैक्षिक विकास में कुछ प्रणति हुई है, जैसे अनुसूचित जातियों में शैक्षिक स्तर में 497] में [467% से 99 में 374% और अनुसूचित जनजातियों में ] 30% से 29 60%, और स्नातक, स्नातकोत्तर तथा पेशेवर पाठ्यक्रमों में भी छात्रों कौ सख्या में वृद्धि हुई है, फिर भी अवसरों कौ समानता अभी भी दूर का आदर्श मात्र है। वर्ग ] और वर्ग ॥ को सेवाओं में प्रवेश के अवसर अभी भी पूर्णरूपेण नही खुले हैं। क्या यह सरकार द्वारा चलाई गई शिक्षा नीतियों के क्रियान्वयन में दोषों के कारण है या निरक्षए दलितों व जनजातियों ने अभी भी अपने बच्चों के लिए शिक्षा के महत्व को नही समझा है या वे अपने बच्चों कौ शिक्षा पर इतनी कम घनराशि व्यय करने में गसेब और अक्षम हैं ? यहा अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों में कमियों व दोषों का निम्नलिखित विवेचन दिया जा रहा है * ().. अष्ययत छोडने वालों का उन्च अतिशव--यद्यपि गत पाँच दशकों में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के बच्चों को सख्या प्राथमिक कक्षाओं में धीरे-धौरे बढी है, फिर भी बडी सख्या में बच्चे अध्ययन छोड देते हैं, जब वे कश्षा पाँव उत्तीर्ण हो जाते है। अनुमान है कि विभिन्‍न राज्यों में दलित और जनजाति समुदायों में इस प्रकार की बर्बादी का प्रतिशत 30% (हिमाचल प्रदेश) से 88% (मणिपुर) है, यथ्यपि यह प्रतिशत अनुसूचित जातियों की अपेक्षा अनुसूचित जनजातियों में कही अधिक है। 0) अप्रभावी आरक्षण-चाछिव्र योग्य उम्मीदवारों की अनुपलब्धता के कारण सभी आरक्षित स्थान नही भरे जाते। 0) अल्प (८०६०९) छात्रवृत्तिया--छात्रवृत्ति के रूप में श्राप्त घनराशि को अपेक्षा शिक्षा पर व्यय धन कहीं अधिक है । (4५) अप्र्याप्त सुविधाएँ-कुछ जनजातीय क्षेत्रों में स्कूल दूर स्थानों पर स्थित हैं और स्कूल पहुंचने में बच्चों को कठिनाई होती है। इसी प्रकार हॉस्टल सुविधाएं भी अपर्याप्त रूप से उपलब्ध हैं। 6). दरण क्षेत्रों में शिक्षकों की बरास्थार अतुप्रस्थिति--जनजातीय तथा गैर-जनजातीय शेर में, अधिकरए स्कूल एकल-अध्यापक स्कूल हैं। शिक्षक या हो इन एजाक थेत्रों में नियुक्ति के इच्छुक नही होते या वे इतने अधिक अनुपस्थित रहते है कि छात्रें का अध्ययन प्रभावित होता है। ७). शिक्षण साथ्यम-जनजातीय बच्चे अपनी बोली बोलते हैं जबकि प्राथमिक विद्यालयों में ग़ज्य की भाषा में पढ़ाया जाता है। यह भाषा समस्या छात्रों कौ अध्ययन में रुचि कप कर देती है क्‍योंकि वे अनजानी भाषा में पाठ्य पुस्तकें नहीं पढ सकते। (0. प्रस्कृतिक एवं सामाजिक अवरोध--कई जनजातियों में पुत्रियों का छोटी आयु में विवाह और बहुओं को अध्ययन के लिए जाने की अनुमति न मिलना शिक्षा प्राप्त 230 शैक्षिक व्यवाथा करने में अवशेष वन जाता है। उनमें यह भावना भी है कि शिक्षित जनजातीय युवा जीवन के पारम्परिक मूल्यों और प्रतिमानों का सम्मान मही करेंगे। अत निष्कर्प रूप में कहा जा सकहा है कि जब तक जनजातियों को उनकी अपनी भाषा और ग॒ज्य घाषा, दोनों, नहीं सिखाई जातो, शिक्षकों को अलग-अलग क्रो में काम कसे के लिए प्रोत्साहन नही दिए जाते, एकाकी शिक्षक व्यवस्था को दो या अधिक शिक्षक व्यवस्था में नहीं बदला जाता, विद्यालय का समय स्थानीय लोगों की सुविधा से निश्चित नहीं किया जाता, तब वक शिक्षा के द्वार अधिकतर दलित और जनजाति छात्रों के लिए बन्द है रहेंगे। केवल सार्थक शिक्षा नीवि हो दलितों और जनजातियों की आवश्यकताओं की पूर्ण करेंगी । (देखें, 7:४530, ॥.]॥ "&6एल्‍्क्षाततश एगाए। ल्‍ण 505 ७०१ 875 20 ॥6 पगए/थाध्यबाता", 76 खबेदय 7गक्काद रु 2886 4द्ककाफाँएव700 00-१0, 986 908-32) । शैक्षिक पुतर्गठन (एतएट्ब्ागावा ए९९णाशणालवं0०) शिक्षा के उद्देश्यों के पुनर्गठन के पॉच लक्ष्य हैं । ()) शिक्षा को समाज की अपेक्षाओं और देश के विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप सार्थक बनाना। इसके लिए सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को रोजगारपरक व व्यवसायोन्मुख बनाने कौ आवश्यकता है। (2) विषयव्ु, शिक्षण विधि, तथा परीक्षण प्रणाली को पुनसंगठित करके छात्रों की विचार शक्ति का विकार कएा। 6) शैक्षिक अवसरों में असमानता कम कला और शिक्षा तक पहुंच को विस बनाना। इसके लिए पहले से हो बच्चों, युवाओं और औढों के लिए अनौपचारिक शिक्षा का संगठन आवश्यक है। (३) शिक्षा के मूलभूद ढाचे में तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार। यदि मूलभूत ढाघे को बनाने में अत्यधिक ससाधनों का व्यय हुआ है, फिर भी ससापों की कमी बनी हुई है। स्थानीय समुदाय द्वारा ध्यान न दिए जाने तथा उपकरणों के अनुपयोगी हो जाने के कारण उपलब्ध मूलभूद ढांचा पूरी तरह कारगर नही है। शिक्षकों को प्रोत्साहा देने में भी कमी है। 6) शिक्षा में प्रौद्योगिकी एव विज्ञन की विषय सामग्री को सुदृढ कला! 300 शिक्षा व्यवस्था का निर्माण कला जिसमें सामान्य भारतीय पहचान पुनर्श्थापित हो सके। 7986 को गाष्ट्रीय नोति के बावजूद शैक्षिक सुधार कार्य रूप नहीं ले सके हैं। लगभा तीन दशक पूर्व यह विचार किया गया था कि शिक्षा में निवेश जी एनपी (छाप) का 38 से 6% बढ़ेगा लेकिन हम अब भी 3% के आसपास हो हैं। पचवर्षीय योजनाओं में शिक्ष के हिस्से में कोई वृद्धि नही हुई है। जब हक मूलभूत ढांचों को सुदृढ़ नहीं बनाया जाता आधमिक, माध्यमिक, उच्च और समानता के लिए शिक्षा सहित), जब तक शिक्षा का पुर्तानन न हो (व्यवसायीकरण तथा मूल्य परक शिक्षा सहित), और जब तक पुरानी शिक्षा से विदा न ली जाये, अनौपचारिक शिक्षा के कार्यक्रमों में परिवर्तन न हो, नौकरी से डिग्री वी सम्बन्ध विच्छेदन न हो शिक्षा का प्रबन्धन उच्च शिक्षा में नियत्रण, और परीक्षा सुधार म हो, तब तक शिक्षा में सुधार नही हो सकता। ह 8 धर्म (रलाएं०ा) धर्म ; अवधाएणा और इसकी समाजशास्त्रीय सार्थकता (रशाह0क : (०ाटश_फछ .ा0 ॥5$ 502०० झ्ंथ्य एश३१शा०९) धर्म एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें विश्वास, प्रथाएँ एव पवित्र (3००९०) से सम्बद्ध मूल्य होते हैं। यह अतिप्राकृतिक/ अलौकिक (४४८॥०४०/») इकाइयों एवं शक्तियों से सम्बन्धित होता है जिन्हें मानव समूहों में सासारिक अस्तित्व (पराए००&॥० ८०७४८४८०) का अन्तिम लक्ष्य माना जाता है (504०८ $र3, /$0200०७५ ० र९९200," 76557, 5:67 ०४ 26८४/६४, ५४०। 2, 974 - 508) । समाजशास्त्री विभिन्‍न धर्मों के प्रतिस्पर्धात्मक दावों (८५०१) से सम्बन्ध नही रखते। वे दो धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं के सामाजिक प्रभावों का अध्ययन करते हैं। दूसरे शब्दों में, धर्म के समायशास्त्रीय विश्लेषण के द्वारा यह देखा जाता है कि धार्मिक विश्वासों और प्रधाओं की अभिव्यक्ति समाज में किस प्रकार होती है, विभिन धार्मिक भ्रों के मानने वाले लोगों की सामाजिक अन्तर्क्रिया को वे किस प्रकार उत्पन करते हैं और धर्म निरपेक्षता किस प्रकार अन्तर्धार्मिक पूर्वाग्रहों को रोक सकती है। धर्म के समाजशास्तरियों द्वार पूछे गए मश्न इस प्रकार के हैं. धार्मिक पूजा-पाठ तथा सस्कारों (॥0०७) के माध्यम से एक समूढ की सामाजिक एकता या सामूहिक एकात्मता को धर्म किस अकार पुनर्गठित (000००) करता है (दुर्खाम) ? धर्म किस प्रकार लोगों के भावात्मक तथा बौद्धिक विकास को शेकदा है (मार्क्स)? किस प्रकार एक विशेष अर्थ व्यवस्था (पूँजीवाद) विशिष्ट प्रकार की घार्मिक विचारघार (70/८४»षडाप्) की उपज है (मैक्स वैबर)? क्‍या एक धर्म (जैसे हिन्दुत्व) दूस धर्म (जैसे इस्लाम) से अधिक सहिष्णु हैं ? धार्मिक दृष्टि से एक व्यक्ति को अस्पृश्य कहे जाने से उस की जीवन शैली पर किंस्त प्रकार का प्रभाव पड़ता है ? क्या एक हो धर्म के दो सम्पदायों के विश्वास व्यवस्था में कुछ ऐसा है (जैसे इस्लाम में शिया सुनी में) जो उनके बौच सर्ष को अपरिहार्य बनाता है ? क्‍या धर्म (जैसे इस्लाम) परिवार नियोजन उपायों का विशेध करता है ? इनमें से कुछ पश्चों का विश्लेषण करने से पूर्व भारत में विभिन घर्मों के भौगोलिक विदरण व जनमख्यात्क आयाम को समझना आवश्यक है। 232 धर्म : जीवन प्रारूप (सेश्ाहतक : ॥4चरंणड शवशिए5) भारत में विभिन धर्मों के जनसख्यात्यक आयाम व भौगोलिक विवरण (एचा०ण्ड्ग्यूफ़रां2 ऐांगिशाकंताड शात छश्ण्ट्ाग्फ्रांट्बो 0950लं9ए07 एशशिशां एशाह005 47 जिहां9) भारत की जनसख्या को धर्म के आधार पर यदि वर्गीकृत किया जाये तो 99 की जनगणना के अनुसार 824! प्रतिशत हिन्दू हैं (अनुसूचित जातियों और जनजातियों सहिती, 22 प्रतिशत मुस्लिम, 230 प्रतिशव ईसाई, 84 प्रतिशव सिख, 060 प्रतिशत बौद्ध, 044 प्रतिशत जैन, और 029 प्रतिशत अन्य हैं। भारत में पाच ऐसे प्रान्त/ केद्रीय क्षेत्र हैं जहा हि अल्पसख्या में हैं। इनमें जम्मू कश्मीर, मिजोरम, मणिपुर, नागालैण्ड, और लक्षद्वीप शामिल हैं। जम्मू कश्मीर, असम और पश्चिम बगाल मुस्लिम बहुल हैं। मुस्लिम बहुलता 8 से 20 प्रतिशत के बीच पायी जाती है , जैसे असम में 28 4%, पश्चिम बगाल में 23.5%, केरल में 23 3%, उत्तर प्रदेश में 7 3%, बिहार में 4 8, कर्नाटक में 6%, महाराष्ट्र में 97%, और आन्ध प्रदेश में 89%, (7%९ आक८उ/2॥ वक्ष, वणह 8, 995) । यद्यपि भारतीय मुसलमान 2 2 प्रतिशव है, पस्नु केवल 5% लोग हो उर्दू बोलते हैं और सभी उर्दू बोते वाले मुसलमान नहीं हैं। पडोस के जीवन प्रारूप (धल/॥0०७०७००० पाणजड़ छाशिया७) मुसलमान लोग मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रहना पसन्द करते हैं क्योंकि : एक, हिन्दू लोग मुसलमानों को किरायेदार नही रखते, दो, मुसलमान लोग उन क्षेत्रों में सुरक्षित अनुभव करे हैं, तीन, वे अपनी सस्कृति को सुरक्षित रख पाते हैं। उन क्षेत्रों में जहाँ हिन्दू और मुसलमान रहते हैं दहाँ दोनों के बीच धार्मिक झुण्ड (७०४८०७), दरों (ल९०४०८०७) और घुवताएं (9००७॥0०5) होती हैं। धुवताओं का अर्थ है निकटता, लगाव, सम्बन्ध, चिन्ता और पहचान का एहसास जो किस्ली विशेष मुद्दे पर होता है और जो धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक था विचागत्मक प्रकृति का हो सकवा है। धुवीकरण का अर्थ है 'एकशा कायम करने के लिए समूहो या व्यक्तियों के शारेरिक, मानसिक या भावत्मक गतिशोलता के द्वारा पहचान ३ अपनत्व का उच्चतम भाव पैदा करना'। “दरार पडना' (८८०९०६४७) ऐसी स्थिति है| डा एक विशेष स्थान बी जनसख्या दो थुवों में बैंट जाती है जिनकी परवृत्तियों मिल सधर्षशोल तथा विशेषी होती हैं। 'घार्मिक झुण्ड ((0७४९॥७) का अर्थ है एक विशेष समय में एक क्षेत्र में घुवीय समानता में सहभागी लोगों के आवासीय प्रारूप। मुसलमानों का 28% बवत्व, धुवीकरण, दणयें और झुण्डों पर आधारित है जो उन्हें अन्तर्वैवक्तिक सम्बन्धों जाया अदान के में सहायता देते हैं। हिन्दू और मुसलमानों के आवासीय क्षेत्रों में भी वस्तु विनिमय या परस्पर तिमदा होता है। एक ही क्षेत्र में रहने वाले हिन्दू और सिख वस्तु विनिमय भी करते है दया विवाह आदि में भी भाग लेते हैं। इसके लिए लचोलापन व उदारता वाच्छित है ताकि व्यक्ति दूं मम 233 के साथ निकटता सम्बन्ध अबाथ रूप से बना सके | प्रेम और प्रातृत्व भाव दृददीकरण के तत्व (०ध्काशांण 8 0००४) हैं। सामाजिक सम्बन्ध सहभागिता तथा पारस्परिकता की उत्तरदायित्व वालो भाववा है जिससे व्यक्ति की वैयक्तिकता और स्वत्त्रता को दबाए बिना स्व की पहचान को भ्राप्त किया जाता है। अत्र्धार्मिक अनक्रिया और परिवर्तत (वांक-र्शाहंगा5 वर्तॉशइ्लाका गाते (000४श50ण5) उपग्रेक्त वर्णन के अनुसार आज के भारतीय समाज में धर्मों को बहुलता (907०७) है। वास्तव में, हमारे समाज के सामने दो प्रकार को धार्मिक परापराएँ हैं। प्रथम, पे धर्म जिनका उदय भाएत में ही हुआ--बौद, जेव और सिख, द्वितीय जिनका जन्म वो अन्य देशों में हुआ लेकिन पौरे-घोरे वे भारतीय समाज में फैल गए, जैसे इस्लाम, ईसाई और जोणाष्टू धर्म। भारतीय समाज पें धार्मिक विश्वासों और मतों कौ बहुलता जीवन शैलियों की विविधता को अदर्शित करती है। घार्मिक परम्पराओं की विविषता ने अनन्यवा (>णए5एछा८६४) का नकारात्मक रुझान बना दिया है। जब धर्म के अनन्य सारकारिक पक्षों पर अधिक ध्यान दिया जाता है तब अनन्यवावाद («ूलेए्अश»ण) जी प्रधानता हो जाती है (४८/0॥88 9080, #एगॉटयएणवज़ जितगा 50ठ6 ग्यप ॥४ 0]07॥ ए ९ह्ञणाऊ" का पर $30कांत॥कशात0. (रह फाश कैश्वटक्टटा, पिटए.. 388. #ह॥90॥9) एए/करत5, पि८७ एल, 3994. 02-06) आज के भारतीय समाज का ससार के प्रति भिन दृष्टिकोण है जो कि प्राचीन और 230) दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग है। आधुनिकता का अर्थ परम्पराओं से पूर्ण अलगाव नहीं है। यह तो सतददा (००४७७७०८७) है । जहाँ परम्पणगत भारतीय समाज में धार्मिक मूल्यों का प्रावल्य (97०00०॥779706), आध्यात्मिकता (६97ए08॥9), अन्य साम्तार्किता (०३३ ९४०70॥7८55) में विश्वास, तथा पदसताधारी के प्रति अधीनता ($एएग्रा5॥०५ ॥0 बार) प्रमुख गुण थे, वही आधुनिक पर्मनिरपेक्ष भारतीय समाज की चार श्रमुख विशेषदाएँ हैं . विद्यारों की स्वतत्रद्ा, भौतिक सस्कृति को प्रधानता, सासारिकता भावना का त्याग, तपा पदसत्ताधारी के सामने नप्नता के स्थान पर विद्रोह। इस प्रकाए आधुनिक भारतीय सप्राज ने एक ऐसे व्यविद् के विचारों को स्वीकार कर लिया है जो ईसाई, इस्लाम व सिख धर्मों के माने जाते हैं। समकालीन भारत में एकहा की भावना विविधवा से ऊपर है। पहले जब अन्य सांस्कृतिक समूह स्वदेशी धार्मिक विश्वा्ों के मम्पर्क में आते थे, थे अपनी पहचान बनाए रखते थे, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय सास्कृढिक दशाओं को भी अपना लेते थे। ऐसे सामाजिक सास्कृद्रिक परिपेश में विविधता में एकता की अवधारणा का उदय हुआ। लेक्नि आज ऐसा प्रदत होता है कि विविध धर्म एक दुसरे से समायोजन करना नहीं चाहते। प्रारम्भ में कुछ ईसाई धर्म प्रचारकों ने कुछ लोगों को, विशेष रूप से जनजातियों और निम्न जातौय हिन्दुओं को, ईसाई धर्म में परिवर्तित कर लिया था। आज कुछ हिन्दू कट्टूपथियों ने, विशेष रूप से विश्व हिन्दू परिषद वया बडण् दल के सदस्यों ने, ईम्राइयों और मुसलमाों को हिल्दुल में पुनर्परिवर्तित करना चाह्य है। हाल में हो ईंसाइयों पर हमले, दिसम्बर 7998 मैं गुजरात द जनवरी १999 में उडीसा में, परिवर्दित हिन्दुओं को हिन्दुत्व पुनर्परिवर्तित करते 23उब र्घ्म के प्रयास के साक्ष्य हैं। आज जिस समस्या को हमें समझना है वह यह है कि विभिन धार्मिक पर्पणओं और विश्वासों को मानने वाले विभिन्‍न लोग एक बहुविध समाज में किस प्रकार साथ साथ रहो हैं। अलगावबादी, साम्प्रदायिक व सकोर्ण हठधर्मित्पूर्ण दृष्टिकोण की शक्तियाँ विसवकारे तत्व (वाअप्र0पा8 धला८ण७) हैं। यह कहना गलत न होगा कि धर्मान्थता का पुनर्ददय (05प्रए७7८९ ए॑ ॥"ाहाणा5 शिभगाल$ण) 90 वे दशक से हुआ है। कतिपय हिन्दू व मुसलमान घर्मान्ध लोग (780०5) जिनको अधर्मी कर्मो (एर८था०05 0६८०७) के लियें धर्म घुए का पर्दा (॥00/४-50०६८४) प्रदान करता है, समाज को दाँव पर लगाए हुए हैं। यह भी एक रोचक स्थिति है कि पिन थर्मो के लोग साम्प्रदायिक दगों और तनावों के लिए एक दूसरे को दोष देते हैं। हिन्दू मुसलमान भारत पाकिस्तान विभाजन के समय विभिन धर्मों के हजाएँं लोगों की हत्या के लिए एक दूसरे पर दोषारोपण करते हैं। 960, 970 व 980 के दशकों में हिन्दू और मुसलमानों ने साम्प्रदायिक दर्गों के लिए एक दूसरे को उत्तरदायी ठहराया था। 993 में मुसलमानों ने अयोध्या में एक “विवादास्पद निर्माण' को गिराने व महाराष्ट्र दगगों में मुसलमानों की हत्या के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराया। 984 में इन्दिर गान्यी की हत्या के बाद सिखों ने देहलौ, उत्तप्रदेश व कई अन्य राज्यों में सिखों की हत्या के लिए हिन्दुओं को दोषी माना। 998-99 में ईसाइयों ने गुजयत व उडीसा में ईसाइयें पर हमले के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराया। स्थिति का फायदा उठाने के लिए धर्म एक हथियार के रूप में प्रयोग किया गया। पजाब में भिष्डगवाला आन्दोलन और कश्मीर में कुछ मुसलमानों का पाकिस्तान के पश्ष का रुझान, धार्मिक अल्पसख्यकों की अतिवादिता (७॥९०४॥००) के दो उदाहरण हैं। भारतीय जनता पार्ट के एक अनुभाग (श्र द्वए 'हिनदुत्न' के नारे ने मुस्लिमों और ईसाइयों में हिन्दू विरोधी भावनाएँ भड़का दी। फिर भी विविधता में एकता और सहिष्णुता है। अग्रेजों ने हिन्दुओं, मुसलमानों और सिखों को उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण कर उन्हें विभक्त करने का प्रयल किया लेकिन स्वतत्नतता सग्राम में वे एक रहे। आज भी अन्तर्धामिंक विवाह हो रहे हैं तथा त्योंा मिलकर मनाए जाते हैं। ईद, दिवाली व अन्य अवसरों पर निमंत्रण एक दूसरे को दिए जे | जिस प्रकार कुछ मध्यकालीन भक्तों (सन्तों) जैसे कबीर, नामदेव, रविदास, नानक, चेतन, आदि ने धार्मिक बन्धनों से ऊपर उठने का प्रयल किया, एक सूत्र में पिगेने वालो बोली प्रधारित की, कर्मकाण्डवाद (57000&ण) की निन्‍्दा की, उसी अकार ही स्वतत्रतता के बाद भी गान्धी, नेहरू, आदि कुछ नेता हुए हैं (जनीतिक दल भी) जिन्होंने मानव एकता पर बल दिया। आज भाय्त में कोई अधिकृत (०) धर्म नहीं है। सविधान सभी परम झवतत्रता प्रदान करता है। यह सत्य है कि कुछ राज्यों में राजनैतिज्ञ राजनैतिक सत्ता हथियाने के लिए धर्म का सहाण लेठे हैं, परन्तु लोग धार्मिक विश्वासों का यह पतित जोड़ वोड भली भाति समझ्न गए हैं। कुछ लोग मानते हैं कि हमारे देश में ऐसी स्थिति नही है जिसे शिन धर्म एक दूसरे को सहन करें। दे चाहते है कि हारे देश में कुछ ऐसे धर्म हैं जो सल (7०७॥79) के गतिवान (60००) स्वरूप को बल देते हैं जब कि अन्य उसके लिए (30) स्वरूप पर। ऐसे धर्म हैं जो व्यक्तिवाद (ए9८३०७७05४७) को प्राथमिकता पद के हैं (जैसे इस्लाम, ईसाई) और दूसरे ऐसे भी घर्म हैं जो देवी अस्तित्व (ताश्ण० 0००8) धरम 235 के अवैयक्तिक स्वरूप को मान्यता देते हैं। ऐसे भी धर्म हैं जिनके पास देवत्व (08 ) का आधारभूत सिद्धान्त नहीं है (जैन, बौद्ध) जबकि अन्य ऐसे धर्म हैं जो देवत्व को मानते हैं। लेकिन यह केवल (धर्मों को) विविथवा दर्शाता है न कि असहिष्णुता। परन्तु अब धार्मिक विचार राजनीति से जुड़ने लगे हैं। प्रशतिशील विचाएं के कुछ व्यक्ति हैं जो सहिष्णुता व सामजस्थ के आधार पर नयो सामाजिक सरचना बनाना चाहते हैं और अन्य लोग भी हैं जो रूढ़िवादी व प्रतिक्रियावादी विचारयारा के हें, जो वर्तमान साम्राजिक ढाँचे में कोई परिवर्तन नही चाहते हैं। दो इन्द्रात्तक विचारधाराए दर्गो और विरोयों को जन्म देती हैं। अत ऐसी स्थिति में सर्घपरत धार्मिक विचारधायओं से समझौता करना सरल नहीं है। इसलिए आगामी वर्षों में समुदायों के बीच स्वतत्र अन्तक्रिया आप्तान नहीं प्रतीत होती। चाम्प्रदायिकता (00ग्राशाणाजात) हिंसा के साथ साम्मदायिकदा की उदय होती प्रवृत्ति ने धार्मिक अल्पसख्यकों में असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है। विशेषरूप से मुसलमान, सिख और ईसाई भविष्य में भेदभाव तथा स॒र्ष का खतरा महसूस करते हैं। हो सकता है यह मात्र उनका भय हो, लेकिन ग्रष्ट अपनी जनसख्या के पांचवें भाग के लोगों में सन्देह, असुरक्षा, और भय बर्दाश्त नहीं कर सकता। कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, आसाम, उडीसा, आन्ध्रप्रदेश और दिल्ली में 984 से 2000 के बोच घटी घटनायें इस बात का उदाहरण हैं कि साम्प्रदायिकता का रोगाणु वायरस (४४४७) विविध रूपों में विनाशकारी प्रभाव पैदा करमे लगा है। भारत में घार्मिक अल्पप्रख्यकों को सविषान में सुरक्षा प्रदान वी गई है जो फिर न्याय, सहिष्णुता, समानता और स्वदज्ता प्रदान करता है। लेकिन ऐसे युग में जिसमें धार्मिक कट्टरवाद धार्मिक उन्माद असहिष्णुता और सकीर्णता में बदलती रहती जा रही है, राम राज्य' की कल्पना यदाकदा अल्पसख्यकों द्वात गलत समझो जाती है, विशेषकर मुसलमानों द्वार, जिसका अर्थ है भगवान ग़म्र का शासन, अर्थात्‌ हिन्दू शासन। आतकवादियों के छिपने को रोकने तथा उनकी क्रियाओं पर नजर रखने के लिए घार्मिक स्थलों फे आसपास पुलिस की उपस्थिति यो (जैसा कि 985 में अमृतसर में और नवम्बर 993 तथा मई !995 में कश्मोर में हुआ था) धार्मिक पामलों में हस्तक्षेप समझा जाता है। अत देश की शान्ति व अछण्डता को बचाएं रखने के लिए साम्मरदायिकवा तथा साम्प्रदायिक हिंसा विषयों के विश्लेषण एवं उन पर चर्चा करने को आवश्यक है । 'साम्प्रदायिकता' दी परिभाषा करना भी अत्यन्त आवश्यक हो गया है। यह खोजना भौ युक्तिसगत होगा कि साम्प्रदायिक कौन है। साग्रदापिकता वी अवधारणा (007 थी एशात्राधगरांधा) साम्रदायिकता एक विचारधाग है जिसमें कहा गया है कि समाज धार्मिक समुदायों में विभक्त है जिनके हित भिन्‍् भिन्‍्त हैं और कभी-कभी एक दूसरे से बिल्कुल विरुद्ध होते हैं। एक समुदाय या धर्म के लोगों द्वारा दूसरे समुदाय या धर्म के विरुद्ध किया गया शत्रुभाव हो 'साम्पदायिकता' कहा जा सकता है। यह शत्रुभाव विशेष समुदाय को गलत दोषारोपण, हानि पहुँचाने और जानबूझ कर अपमानित करने कौ हद तक चला जाता है तथा लूटपाट, मकानों और दुकानों में आगजनी ता कमजोरों और असहायों को सताना, रतियों को अपमानित करने 236 र्घ्म तथा लोगों की हत्या तक चला जाता है। साम्प्रदायिक व्यक्ति वे होते हैं जो पर्म के माध्यम से राजनीति करते हैं। नेताओं में वे धार्मिक नेता साम्प्रदायिक हैं जो अपने धार्मिक समुदायों को व्यापारी उद्यमों और सस्थाओं की तरह चलाते है और चिल्लाते हैं कि हिन्दुत्व, इस्लाम, सिख या ईसाइयत खदे में हैं, जैसे हो वे देखते हैं कि उनके पवित्र सस्यानों में दान कौ आमद कम हो चली है या फिर उनके नेतृत्व को चुनौती मिलने लगी है या फिर उनको विचारधाण विवादप्रस्त हो चली है। इस प्रकार साम्प्रदायिक वह नहीं है जो “धार्मिक व्यक्ि है' बल्कि वह है जो धर्म से जुडी राजनीति करता है। यह शक्तिलोलुप राजनीतिज्न ((0४थ 7०!४८०४७७) न तो अच्छे हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख हैं और न ही अच्छे पारसों, और बौद्ध। उन्हें खतरनाक राजनैतिक काई या झाग (०७४०७) कहा जा सकता है। उनके तिए ईश्वर और धर्म मात्र यत्र हैं जिनका प्रयोग वे विलासी जीवन तथा समाज में परजीवी एज की हरह व्यतीद करने में तथा राजनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए करते हैं। (0०/ 46, व०घर८ 990. 35-36) । यी के ऊमन (फू. 0०ताल्ा, 989), ने साम्प्रदायिकता के छ आयाम बवाये हैं * आत्मसातकारी (3$४फा|॥०छ8), . कल्याणत्मकारी (रक्षक), पलायनवादी (7८४८»५), प्रतिकारात्मक (लंथ।80०७9),. अलगाववादी ($धफम्ाभा४) वध पृथकतावादी (५८०८४४०७५) | आत्मसावकारी साम्प्रदायिकता वह है जिसमें छोटेफरे धार्मिक समृह एक बडे धार्मिक समुह में एकीकृत हो जाते हैं। ऐसे साम्प्रदायिक लोग दावा हैं कि अनुसूचित जनजाति के लोग हिन्दू होते हैं या जैन, सिख और बौद्ध हिन्दू होते हैं और उन्हें भी हिन्दू विवाह अधिनियम की परिधि में लिया जाना चाहिए। कत्वापकय साम्मदायिकता का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय का कल्याण करना होता है, जैसे ईसाई रे द्वारा केवल ईसाइयों के रहन-सहन के दर्जे, शिक्षा व स्वास्थ्य में सुधार करना या पाएसी सूप पराप्षियों के उत्थान के लिए कार्यरत है। इस प्रकार की साम्मदायिक गतिशीलवा का केश केवल अपने ही समुदाय के लोगों के लिए काम करना होता है। पलायनवादी साम्मदायिकता वह है जिसमें एक छोटा धार्मिक समुदाय अपने को राजनौति से अलग रखता है; उदाहएर्ण, बहाई समुदाय, जो अपने सदस्यों को राजनीति में भाग लेने से रोकता है। प्रविकाएलन साम्मदायिकता का प्रयास अन्य धार्मिक समुदायों के सदस्यों को हानि पहुँचाना, चोट पहुंचा, आघात पहुंचाना रहता है। पृथकतावादी साम्प्रदायिकता वह है जिसमें एक धार्शिक या जास्कृतिक समूह अपनी सास्कृतिक विशेषता (६9००॥॥०७) बनाए रखना चाहदा है और में अपनी सीमाओं के राज निर्माण (दाप्रा०्मत ४906) की माग करता है, उदाह्णा, उत्तर-पूर् या शिया में भिजो और नागाओं की मांग, असम में बोडो, बिहार में झरख जनजातियों की मोग (जिसको स्वरैकार कर नवम्बर 2000 में पृथक राज्य स्थापित किया गया है), पश्चिम बगाल में गोरखा लोगों को गोरखालैण्ड को माग, या उत्तर प्रदेश में उत्ताताई कौ मांग लवम्बर 2000 में उत्तराखण्ड राज्य भी बना दिया गया है), या महाराष्ट्र में विदर्भ वी माँग। अन्त में, अलगाववादी साम्मदायिकता वह है जिसमें एक धार्मिक समुदाय राज पहचान की माँग करता है और स्वतत्र राज्य को माँग करता है। सिखों का छोटा सा समुदाय खालिम्तान की माँग या कुछ मुस्लिमों का आजाद कास्मीर को माँग करना इस प्रकार ापदायिक्दा के उदार हैं। उपेक्द छ अकार को साम्रदायिकताओं में से असिम दे परम ४ 40000 साम्प्रदायिक दंगों, आतकवाद, सशस्त्र विद्रोहों को जन्म देने वाली समस्याएँ पैदा करते हैं। भारत में सम्रदायवाद ((0फ ्राजा॥कंजा ॥ [009) भारत का बहुलवादी (9]072॥5) समाज अनेक घार्मिक समूहों से मिलकर बना है, यद्यपि यह समूह उप धार्मिक समूहों में भी विभक्त है। हिन्दू धर्म पन्‍्यों में विभाजित है, जैसे आर्य समाजी, शैव, सनातनी, वैष्णव, जबकि मुसलमान एक ओर शिया और सुनियों में विभकत हैं और दूसरी ओर अशरफ (कुलीन), अजलम (जुलाहे, कसाई, बढई, तेली) और अर्जलों में । हिन्दू और मुसलमानों के बीच लम्बे समय से तमावपूर्ण सम्बन्ध रहे है जबकि हिन्दू और सि््धों ने एक दूसरे को 954+ के दाद लगभग दस वर्षों वक ही सन्देह की दृष्टि से देखा था। यद्यपि कुछ गज्यों में हिन्दुओं-ईसाइयों तथा मुसलमानों और ईसाइयों के बीच सघ्षों की चर्चा सुनी जा रही है, फिर भी अधिकतर ईसाई भारत में अन्य समुदायों द्वारा शोषित या बचित अनुभव नहीं करते। मुसलमानों में शिया और सुली एक दूसरे के प्रति पूर्वाप्रह एखते हैं का हम संक्षेप में हिन्दू-मुस्लिम और हिन्दू-सिख सम्बन्धों का अ्रमुख रूप से विश्लेषण । हिनू-पुस्लिम सामदायिकता (प्रक्ततध-॥ए8॥9 एएगए०एए/थ्आा) भारत में मुस्लिम आक्रमण दसवी शताब्दि में प्रारम्भ हुए लेकिन प्रारम्भिक आक्रान्ता धार्मिक अभुत्त स्थापना की अपेक्षा लूटपाट में ही अधिक रुचि रखते थे। कुतुबुद्दीन जब दिल्ली का प्रधम सुल्तान बना तब भारत में इस्लाम के पैर जमे | बाद में मुगलों ने (!707 तक) अपने सामाज्य को मजबूत किया और इस प्रकिया में इस्लाम को भी बल मिला। मुगल शासकों की कुछ नीतिया धर्मान्तरण (5705०॥/५४०॥००) के प्रयासों, हिन्दू मन्दिरों के विनाश तथा इन पर भस्जिदों के निर्माण ने हिन्दू मुस्लिम समुदायों के बीच खाई बना दो। जब अग्रेजो ने भारत में अपनी सत्ता जमाई, उन्होंने प्रारम्भ में तो हिन्दुओं की संरक्षण की नीति अपनाई, लेकिन 857 में श्रथम स्वत॒त्रता सप्राम के बाद, जिसमें हिन्दू और मुसलमान कन्‍्पे से कन्या मिलाकर लडे थे, अग्रेजों ने (विभाजित करो और राज्य करो' की नीति अपनाई, जिसका परिणाम हुआ साम्प्रदायिक सघर्षों का उदय और उनका वर्चस्व बना रहा। जब स्वतत्रदा सग्राम के दौगन शक्ति की ग़जनोति खेली जाने लगी तब हिन्दू मुसलमानों के बीच सम्बन्धों और अधिक तनाव आए। इस्त प्रकार हिन्दू मुसलमानों के बीच बैर भाव काफी पुराना प्रकरण है, फ़िर भी भारत में हिन्दू मुस्लिम साम्मदायिकता को स्वतत्रता सग्राम के दौरान की ब्रिटिश शासन की धरोहर ही कहा जा सकता है | यह साम्मदायिकतावाद 947 को आजादी के बाद आज बदले हुए सामाजिक और राजनैतिक परिवेश में काम कर रहा है। यह भारत के उन घर्मनिस्पेक्ष आदर्शों के लिए खतरा है जो (आदर्श) हमारे सविधान तक में समाविष्ट । प्रथम विश्व युद्ध के बाद हिन्दू मुस्लिम साम्म्दायिकता की उत्पत्ति तथा ऐतिहासिक जड़ों का परौक्षण किया जा सकता है ताकि इस घटना को समकालीन सन्दर्भ में समझा जा 338 छत मके। 4920 और 940 के बीच स्वतत्रता संग्राम में जिन राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था उनकी धार्मिक तथा राजनैलिक विचारधाग्ए एवं आकाश्माएँ क्‍या थीं ? राष््रीयड की ऊरपील में विभिल सरुमुदायों व्ये जोडने में दो महत्वपूर्ण कारक थे : प्रथम, औपनिवेशिक शासकों के शोषण मे मुक्ति और द्वितेय, सभी नागरिकों के लिए लोक्ठात्रिक अधिवारा लेकिन प्रमुख राइनैलिक दल जैसे काग्रेस, मुस्लिम लोग, कम्युनिस्ट पार्टी, हिन्दू महयरुभा ने बोसवी सदी के दोम व चालोस के दशकों में इन भावनाओं में हिस्सा नहीं लिया। कर्रेस ने नो आरम्प से हो शिखर से एक्ता' (एण7) ह०० (0८ 0) की नौति अपनाई किसे मध्यम तथा उच्च वर्याय मुमलमादों को, जो मुस्लिम समुदाय के नेता थे, जीतने का प्रयाम क्या था तथा मुस्लिम जन समुदाय को आन्दोलन में आरकर्दित करने का काम उन ऋ छोड दिया गया। यह 'शिखर से एक्ता' दृष्टिकोण साम्राज्यवाद से लड़ाई में हिल्‍्दूमुह्लन महयोग को प्रोत्साहित न कर सका। 98 व 922 के बौच हिन्दू-मुस्लिम एकता के सी प्रयल क्वल हिन्दू, मुस्लिम, सिखों तथा काग्रेस के शिखसस्थ नेताओं के बीच बातदीव को प्रकृति के थे। प्राय कप्रेस ने रिस्पेश् ा्रवादी दाक्तों के सक्रिय संगठतकर्ता वा कद विविध ममुदायों को संगठित करने के बज्यय विविध समुदायों के नेताओं के बीच मध्यन्य का काम क्या। इस प्रकर प्रारम्भिक राष्ट्रदादी नेताओं के बोच सन्निहित स्वीकृति दो हि हिन्दू, मुस्लिम, सिख अलग-अलग समुदाय थे जो केवल राजनैतिक व आर्थिक मामलों में भागीदार थे, न कि सास्कृतिक, धार्मिक व सामाजिक प्रधाओं में। इस प्रकार बोसवीँ सुदो के फ्रधम व ह्विलेय चौथाई वर्षों में साम््रदायिक्ता के बीज बोए गए। 936 तक मुस्तिम लोग व हिन्दू महासभा सगठनात्मक रूप से काफ़ी कमजोर रहे। 937 के चुनाव में प्रत्दोव विधायिकाओं में मुम्लिमों के लिए आरक्षित कुल (४2) स्थानों में से मुस्लिम लोग ने 22 अतिशत स्थानों पर विजय प्राप्त की। मुस्लिम बहुसख्यक श्रान्तों में भी मुस्लिम लौग दी उपलब्धि अच्छी नहीं रहो। केवल 942 के बाद हो मुस्लिम लीग मजबूत राजनैतिक दल के रूप में उभरी और सभी मुस्लिमों के अधिकायें के लिए बोलने का दावा क्या। डिला कस पार्यी को 'हिन्दे' सगठन कहते थे जिसका समर्थन अग्रेज भी करते थे। करे के तर मो झुछ नेता लोग, जैसे मदव मोहन मालवीय, के एम मुन्शो, और सरदार पटेत ने हिन्दू' पक्ष को लिया। इस प्रकार बाग्रेस अपने नेताओं कौ साम्प्रदायिक तत्वों वालो वे को ममाण न कर सकी। .. नहा 940 में मुस्लिम लीग द्वार पाक्स्तान का नाय सर्वप्रथम चलाया गया, वह अमस नताओं ने 9% में देश का विभाजन स्वीकार कर लिया। फ्लस्वरूप, लाखों वी अज्या में हिन्दुओं, मुसलमानों और सिद्धों को बेघर होना पडा। विभाजन के बाद भी, केस साम्ददायिकता पर काबू न पा सकी । अन यह कहा जा सकता है कि भारत में हिन्दू मुक्ति अमदायिक्दा की उलदि मुख्यद रजनैतिक-सामाजिक थो दया हिन्दू मुसलमानों के गोब हक, सोकरोवियों सह संघ का कारम नहीं था। आर्थिक हित तथा सास्कृतिक एवं सामरिक 4088 (0००४७) (डैसे त्वोहार, सामाजिक अदार) ने दोनों रम्रदायों को विभर्कि 4 में की कई ही हे यो की पहचान हिन्दू सुस्त दरों को दृष्टि से अति सवेदवशीत से ई है। इनमें से पांच शुरादाबाद, मेरठ, अलोगढ, आगरा व वाद्ययसी) उत्तमदेश मैं धर्म 239 है, एक (औरंगाबाद) महाणष्र्‌ में, एक (अहमदाबाद) गुजग़त में, एक (हैदगबाद) आम्ध्र प्रदेश में, दो (जमशेदपुर व पटना) बिहार में, दो (सिलचर व मौहाटी) असम में, एक (कलकत्ता) पश्चिम बगाल में, एक (मोपाल) मध्य प्रदेश में, एक (श्रीनगर) जामू व कश्मोर गें और एक (कटक) उडीसा में। क्योंकि !] नगर उत्तर क्षेत्र में हैं, तीन पश्चिमी और दो दक्षिण क्षेत्र में हैं, तो क्या यह माना जा सकता है कि दक्षिण भारत में मुस्लिम लोग सास्कृतिक दृष्टि से अधिक समन्वित हैं क्योंकि वे वाणिज्य व्यापार में सलग्न है जिसमें सभी से सदभाव की अपेक्षा की जाती है ? आएवर्य कौ बात गो यह है कि यह बात उत्तर प्रदेश के पाँच नगरों में भो लागू होदो है। इसलिए इस घटना के लिए कोई अन्य व्याख्या रमें दूँढनी होगी। हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य (02805॥) के पीछे कुछ जटिल तथ्य बताये जा सकते हैं। ये इस भ्रकार हैं. (!) मुस्लिम आक्रमण जिसमे आक्रान्ताओं ने सम्पत्ति को लूण और मन्दिएें के आम्त-पास मस्जिद बनवाई, 2) माप्राज्यवादी शासन के दौदान ब्रिटिश लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए मुस्लिम पृथकवावाद को भ्रोत्साहित किया, 5) विभाजन के बाद भारत में कुछ मुसलमानों का व्यवहार, जो पाकिस्तान के पक्ष में चुके हुए थे | इस प्रकार का व्यवहार बहु-सख्यक समुदाय में यह भाव पैदा करता है कि मुसलमान देश भक्त नहीं हैं। भारतीय मुसलमान की यह रूढ छवि जो कि कट्टर हिन्दुओं के मस्तिष्क में घर कर गई है वह है आष्यान्तरिक (४४३70 !०0०/77 ९) विदेशी की। इसी प्रकार एक मुसलमान के मस्तिष्क में भी हिन्दुओं के प्रति भाव सर्वशक्तिशाली, अवसरवादी तथा उपेक्षा करने वालों का है और वह स्वय को उनके द्वारा प्रवाडित एवं देश को तथा समाज को मुख्य धाग से अलग किया हुआ मानता है (४) पुसलमानों द्वार देश में स्थान प्राप्त करने के प्रयल में मुस्लिम ग़जनैतिक दलों की बव आक्रामकता (४8872६७४०४८४७) एपोर्ट तो यहा तक है कि कुछ कट्टरपंथी मुसलमान “विदेशी धन' श्राप्त करते हैं, विदेशी एजेन्ट बनते हैं” और देश के घर्मनिरपेक्ष आदर्श को बर्बाद करने पर बुले हैं और भाग्तीय मुसलमानों को भडकाने भें लगे हैं। 6) मुस्लिम नेताओं की मुसलमानों को एक करने में और उनकी समस्याओं के समाथान करे में अम्नफलता शायद उनकी कुण्ठा के काएण है क्‍योंकि वे पश्चिमी एशिया व पाकिस्तान में बहने वाली इस्लामी कट्टरवाद को हवा से प्रभावित हैं। नेताओं ने तो केवल मुसलमानों को संख्या बल का शोषण किया (विशेष रूप से केरल, कश्मीर व उत्तर प्रदेश में) और सौदेवाजी को, सस॒द और विधान सभाओं में कुछ स्थान प्राप्ति के लिए और अपने दथा अपने मित्रों के लिए शक्ति और सम्पलता की खोज करते रहे। 6) सरकार भी मुसलमानों को उपेक्षा के लिए कुछ सीमा रक उचए्टायी है | बडी छस्या ऐें पुछलमान स्वय को बाहए समझते हैं और परिणाम यह होता है कि वे स्वार्थी नेताओं के शोषण के शिकार हो जाते हैं। शासक अभिजात वर्ग शायद ही धार्मिक सदभावना की बात करते हों | वे मुसलमानों की वास्तविक समस्याओं को बहुत कम समझ रखते हैं। हिन्दू नेतृत्व केवल उन्ही मुस्लिम मेवृत्व से सम्बन्ध रखता है जो उनकी बात मानते हैं। भारतीय मुसलमान अधिकाशत अपने भविष्य को “हम” (05) और 'बे' (॥८/) के प्रश्न पर निर्भर मानते हैं जब वे अपनी माँगों को सर्वविदित करते हैं, जैसा कि समाज के कुठित समूह अपनी परेशानियों को स्वर देने के लिए करते हैं। तब यह भावना अक्सर हिन्दृ-मुस्लिम हिंसा के रूप में फूट पडदी है जिसके लिए विदेशी हाथ होने का आरोप लगाया 240 र्ध्म जाता है। तब क्‍या मुस्लिम समस्या को साम्प्रदायिक समस्या माना जाये? क्या यह झल नही है कि हिन्दू मुस्लिम से भिन नही हैं या असम के बगालौ-आसामी संघर्ष या महा के महाराष्ट्रीय और गैस्महाराष्ट्रीय से भिन्‍न नहीं है ? वास्तव में समस्या है सामाजिक-आर्थिक हितों की तथा कट्टरता एव मूल्यों में परिवर्तन की । उम्रवादी प्रवृत्ति के हिन्दू मानते हैं कि देश में मुसलमानों को अनुचित रुप में प्श्नय (7०07) किया जा रहा है। 992-993 के रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के प्रकण ने तो साम्प्रदायिक सद्भाव के नाजुक सन्तुलन को और भी प्रभावित किया है। काम्रेस से मोह भग होने के बाद मुसलमानों ने 990 में जनता दल में, 995 में समाजवादी पार्टी में, और 996 में सयुकत मोर्चे (7॥०० ०४0 में विश्वास बनाया। जनता दल के विभाजन (नवम्बर, 990) तथा राजीव गान्धी को हत्या (मई, 99) के साथ भारतीय जनता पार्य के नवम्बर [993 में सत्ता में आने के साथ चार राज्यों के चुनावों का होना (राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश) और 998 में केद्र में दथा कर्नाटक में जनता दल और आशख्य प्रदेश में तेलुगु देशम का 994 चुनावों में सत्तासीन होना, मार्च 995 के चुनाव में शिव सेना और भाजपा का महाराष्ट्र में और भाजपा का गुजग़त में सह्ता में आना, उत्तर प्रदेश में सपा बसपा और भाजपा-बसपा सयुक्त सरकारें का गिरना, अक्टूबर 996 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का बहुसख्या में न आना और अप्रैल 999 में केद्र में ससद में वाजपेयी के बाद मत्री मण्डल बनाने में समाजवादी पार्टी कौ सोनिया गान्यी को समर्पी देने में असफलता और फिर अक्टूबर 999 में बोजे पी द्वार गठबन्यन सरकार बनाना है, ल सभी बातों ने प्रान्ति पैदा की है। आज मुसलमान पहले की अपेक्षा अपनी सुरक्षा को लेका अधिक चिन्तित हैं। हिदृ-सिख साम्प्रदाविकता सिख लोग भारत की कुल जनसख्या का मात्र 2 अतिशव (3 करोड) हैं। यद्यपि समूचे देश में तथा विदेशों में भो फैले हुए हैं। पजाब में वे अधिक केन्द्रिव हैं जहाँ वे ग्य में बहुसख्यक हैं। पजाब में सिख आन्दोलद अस्सी के दशक के प्रारम्भ में शुरू हुआ। हत्याओं वी सख्या बढती गई और सि्ों का विरोध सगठित होता गया तथा आक्रामकता एव हिंसा वृद्धि हई। 984 में जब अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में उम्रवादी प्रकृति वाले सिखों को तथा हथियारों को जब्त करने के लिए सेना ने आपरेशन ब्लू स्टार प्रारम्भ किया, तब ने हिंसात्मक प्रतिक्रिया प्रकट की। अक्टूबर 984 में जब इन्दिरा गान्धी की हत्या की गई और देहली तथा अन्य राज्यों में हजारों सिखों की हत्या की गई, और उनकी सम्पत्ति गई, जलाई व नष्ट कौ गई, तब कुछ सिख हिंसावादी इतने उप्र हो गए कि उन्होंने बसों रेलों में सैकडों हिन्दुओं की हत्या कर दी, उनकी सम्पत्ति नष्ट कर दी तथा अनेक हिन्दुओं वो पजाब छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। मई 988 में अमृतसर में स्वर्ण मर्द उम्रवादियों को साफ करने के लिए आपरेशन ब्लैक थण्डर शुरू किया गया जो उनके नियत में लगभग 0 दिन तक रहा। तब सिखों ने बदले की कार्यवाही में बम विस्पोट किए हिन्दुओं की हत्या की तथा बैंकों को लूया। इस प्रकार लगभग दस वर्षों तक सि्खों और परम य्बा हिन्दुओं के बीच सम्बन्ध तनावपूर्ण रहे। अब पजाब में कट्टरवादी सिख आक्रामकता दवा दी गई है तथा [993 से आगे दोनों सम्पदायों के बोच के सम्बन्धों में काफी सुभार हुआ है। अब उनके बीच एक दूसरे के घार्मिक विश्वासों तथा पूजा स्थलों को लेकर सौहार्द और सम्मान विकसित हुआ है। भृजातोय हिंसा (:#ा८ भरणशाल्ल)े हिन्दूमुस्लिम सघर्षों एवं हिन्दू-सिख झडपों के अतिरिक्त हम विभिन नृजादीय समूहों के बीच सम्बन्धों को कैसे देखते हैं ? जैसे असामी और गैर असामी असम में लगभग 50 वर्षों से राज्य का आर्थिक विकास बाहरी राज्यों से आयातित श्रम और उद्यम द्वारा चलाया जा रहा था। इस अवधि में, जिसका विस्तार लगभग डेढ़ दशाब्दि तक रहा, असम तथाकथित 'बाहरी' लोगों का घर रहा है जिनका कोई अन्य घर नहीं रहा सिवाय असम के। कुछ लोग वास्तव में अमीर हो गए हैं लेकिन अधिकदर लोग नियश और निर्धन हैं। अब अस्नमियों ने ग्रद्टीयता का प्रश्न उठा दिया है। अखिल असम छात्र सघ (8५5) तथा अखिल असम गण परिषद (8५0९) आन्दोलन (जिससे 65९ राजनैतिक पार्टी के रूप में उभरी) ने “बाहरी” को “विदेशी” के रूप में गलत समझा (बॉगला देश से आए शरणार्थियों सहित)। राज्य में 50 लाख से 70 लाख “बहिएगतों' की आश्चर्य चकित करने वाली सख्या का आकलन किया गया। अम्तम को विदेशियों से छुटकाय दिलाने के इस प्रकरण ने राज्य को 6 वर्ष तक उद्देलित रखा--979 से 5 अगस्त, 7985 के असम समझौते तक। बोडो, बंगालियों, मारवाडियों और गैरःअसामी मुसलमानों के विरुद्ध घृणा को बढावा दिया गया। यह अलगाववादी (६७८८६६०७३) आन्दोलन हजारों अबोध लोगों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार बना। नौगांव जिले के मेली (३७॥८) में और उसके चारों ओर के 0 गाँवों में ,383 स्त्रियों, बच्चों और पुरुषों का नरसहार नृजातीय हिंसा का ही भाग था। एएसजीपी भी, जो 985 से 990 के बीच सत्ता में रही, नृजातीय तनाव को कम न कर सकी | उल्फा उप्रवादियों ने एक आन्दोलन चलाया जो इतना शक्तिशाली रहा कि जनवती 997 में होने वाले चुनावों की बजाय नवम्बर 990 में राज्य में रट्रपति शासन लागू किया गया, सेना और सुरक्षा बलों ने विद्रोहियों को पकड़ने तथा हथियार बरामद करने के लिए एक मुहिम छेडी | जून, 99] में एद्टूणति शासन वापस ले लिया गया जब राज्य में नयी काप्रेस सरकार ने सत्ता सम्भाली। लेकिन उल्फा उप्रवादियों ने नयी सरकार के गठन के प्रथम दिवस है| रज्य के विधिन भागों से ओए्न्जीसी के कुछ पदाधिकारियों सहित सश्कारी अधिकारियों का अपहरण करके नयी सरकार को झटका दे दिया। मई 996 के चुनावों ने भी बौड़ो लोगों को बदले की करर्यवाही से नहीं गेका | उम्रवादियों को अभी भी यह महसूस करता है कि असम भी देश के अन्य राज्यों की तरह है और यह भारत के सभी वैधानिक नागसितों का है चाहे दे कोई भी भाषा बोलें, कोई भी धर्म अपनाएँ और कोई भी रीति रिवाज व प्रधाओं का पालन करें। बोडो--एक जनजाति जो कि 947 में असप वी कुल जनसंख्या का 49 प्रतिशव तथा 99! में 29 प्रतिशत थे और 525 तक जिनका शासन समस्त असम धा--अब स्वायत्तता की माँग कर रहे हैं। यद्यपि असम सरकार और हम छात्र संघ (4850) दया बोडो पीपुल्स एक्शन कमेटी (छः42) द्वार श्रतिनिधित बोडो नेतृत्व अ42 रन के बीच फरवरी 993 में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, फिर भी यह समस्या अभी प्र अनिर्णीव ही है। बोड़ो नेश और असम सरकार सीमा प्रकरण तथा लगभंग 3,000 गाँवों को बोडोलैण्ड आटोनोमस काउन्सिल को सौंपने के विषय पर सहमत नहीं हो सके हैं। बेडो लोग यह भी नहीं चाहने कि स्वदेशी जनजादि के लोगों पर असमियों भाषा थोषी जागे। 960, 970, 980 तथा 990 के दशकों में बोडो आन्दोलन रुक रुक कर चला, यह अब इसमें बल आया है। अब बोडो लोग 'उदयाचल' माम की केद्ध शासित प्रदेश को में कर रहे हैं। बम विस्फोट, सडकों और रेल पुलों को ध्वस्त करना, आदि बोडो उम्रवादियों दवग चलाई जा रही हिप्तक करर्यवाहियों बताती हैं कि उम्रवादियों को देश के भीतर तथा विदेशों से मदद मिल रही है। इन (विद्रोही कार्यवाहियों के दमन के लिए सरकार द्वारा कठोर कल उठाए जाने की आवश्यकता पर बल देना आवश्यक है। साम््रदायिक हिंसा (ए०्फ्राणाओं शतलात्थे अवधारणा (6 (करत्क0 साम्ददायिक हिसा में दो विभिन्‍न धर्मों से सम्बद्ध लोग सम्मिलिव होते हैं जो एक दूपो हें विरुद्ध गतिवान हो जाते हैं तथा एक दूसरे के प्रति दुश्मनी, भावनात्मक ओ्रोष, शोषण, सामाजिक भेदभाव, तथा सामाजिक उपेक्षा से पीडित होते हैं। एक सम्मदाय की दूसो के मरी उच्च कोटि की एकता तनावों और धुवीकरण के बीच बनी हुई है। आक्रमण का तथ्य समुदाय के सदस्य होते है। सामान्यतया, साम्प्रदायिक दगों के दौरान कोई नेतृत्व नहीं होत जो कि दगे वी स्थिति को रोक सके या नियत्रित कर सके। अत यह कहां जा सकता है हि साम्मदायिक हिस्ता मुख्य रूप से घृणा, शवुत्त और बदले की भावना पर आषारित होती है। साम्मदाम्रिक हिसा परिमाण तथा गुणवत्ता दोनों में राजनैदिक साम्प्रदायिक साथ साथ वृद्धि हुई है। गान्दी जी इसका प्रथम शिकार हुए और बाद में 970 व 980 दशकों में अनेक व्यक्तियों की हत्या हुई। दिसम्बर 992 में अयोध्या में बाबरी मद के गिराए जाने के बाद, 993 के प्रारम्भ में बम्बई में बम विस्फोट ठथा महाराष्ट्र, तमिलाई बिहार, उत्तर प्रदेश व केरल में साम्प्रदायिक दर्गों में काफी वृद्धि हुई है। जहाँ कुछ एज पार्टिया नृजातीय-धार्मिक साम्प्रदायिकता को सहन करती हैं, कुछ इन्हें प्रोत्साहन भी देव है। इस प्रकार को सहिष्णुता के हाल ही के डदाहरण, कुछ राजनैतिक नेताओं और कुछ राजा पार्टियों द्वार धार्मिक सगठनों की क्रियाकलापों द्वारा प्रकट होते हैं जो कि ईसाई पर हमलों तथा गुजरात, मध्यप्रदेश तथा इलाहाबाद में ईसाई मिशनरियों पर हमलों से से है। मध्य 970 के दशक के आपातकाल से ग़जनोदिक मुख्य घाय में अपराधी वें वी प्रवेश भाम्म हुआ। यह घटना भारतीय राजनीति में इस सीमा तक घुलमिल गई है पर्मान्‍्धता जातिवाद तथा धर्म और राजनीति का मेल विविध आयामों में बढ गय है। राजनैतिक पार्टिया एव राजनेता हमारे समाज को नकायत्मक प्रेरणाओं के प्रभाव से बचने रे लिए सामूहिक लडाई की अपेक्षा आपस्ली सम्बन्धों में "तुमसे अधिक पवित्र" (॥0थ ४४०७) का दृष्टिकोण अपनाते हैं| धर्म 243 हिन्दू सगठन मुसलमानों और ईसाइयों को दोष देते हैं कि थे हिन्दुओं को जबरन अपने धर्मों में बदलते हैं। यह धर्मान्तरण बलात्‌ था या ऐच्छिक, इस्र विवाद में उलझे बिना केवल यह कहा जा सकता है कि आज यह मामला उठाना निश्चित रूप से धर्मान्धता ((2शाटाआगा) है। हिन्दुत्व सदा सहिष्णु रहा है और मानव परिवार की बात करता है। अब यह स्वीकार किया जाना है कि “हिन्दुत्व' का सिद्धान्त जो भारतीय राजनीति को दूषित कर रहा है उसका हिन्दू विचार से कोई लेना देना नही है। अब समय है कि पर्मनिसपेक्ष राजनेता और पार्टियाँ राजनैतिक व चुनावी विचारों को उपेक्षा करें और उन धार्मिक सगठनों की निन्‍्दा करें और उनके विछद्ध कदम उठाएँ जो अपने बयानो से शान्ति और स्थिरता को बिगाइवे हैं और 28 को एकता और बहुलवादी पहचान (७॥07॥५४८ 0८000) के लिए खतरा पैदा करते हैं। साम्रदाधिक दगो की विशेषताएँ, (गण ण॑ (पा सात5) गह पाँच दशकों की अवधि में देश में हुए प्रमुख साम्रदायिक दर्णो की जांच पडत्ताल से स्पष्ट है कि .()) साम्प्रदायिक दगे धार्मिक जुनून की अपेक्षा रजनीति-प्रेरित अधिक होते हैं। मदान आयोग ने भी, जिसने मई 970 के महाराष्ट्र के दगों की जोंच की थी, बल देकर कहा है कि साम्प्रदायिक तनावों के निर्माता (॥८॥८०७) साम्प्रदायिक लोग और गाजनौतिजों के कुछ वर्ग होते हैं। ये अखिल भारतीय और स्थानीय स्तर के वे नेता होते हैं जो अपनी राजनैतिक स्थिति मजबूत करने के लिए प्रत्येक अवसर का लाभ उठाते हैं, अपनी प्रतिष्ठा बढाते हैं, तथा अत्पेक घटना को स्राम्प्रदायिक शग देकर अपनो छवि को जनता के बीच अच्छी बनाने का प्रयल के हैं। इस प्रकार वे जनता की दृष्टि में अपने आप को दर्शाते हें कि वे ही अपने समुदाय के अधिकारों के रक्षक व धर्म के ठेकेदार हैं।” (2) गजनैतिक हितों के अलावा आर्थिक हित भी साम्प्रदायिक संघर्षों को तूल देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। 6) साम्रदायिक दंगे दक्षिण तथा पूर्वी भारत की अपेक्षा उत्तरी भारत में अधिक सामान्य हैं। ($) किसी नगर में साम्प्रदायिक दर्गो को पुनरावृत्ति की सम्भावना वहाँ अधिक होती है जहाँ एक या दो बार दगे हो चुके हैं, अपेक्षाकृत उन मगरों के जहाँ पहले कभी दगे नहीं हुए। ७) अधिकतर साम्रदायिक दगे धार्मिक त्योहारों के अवससे पर होते हैं (6) दरों में घातक अख्तर का प्रयोग वृद्धि कौ ओर है। साम्रदायिक दगो का अनुणद (फ़लंतल्ऋ०९ ० (१6णचराएप्रग सिंगर) भारत में ।946-48 को अवधि में साम्प्रदायिक उन्माद (८४०५) शिखा पर था जबकि 950 और 963 के बीच की अवधि को साम्प्रदायिक सदृभाव और शान्ति का सगय कहा जा सकता है। देश में ग़जनैतिक स्थिरता और आर्थिक विकास ने साम्मदायिक स्थिति के सुधार में योगदान किया। 963 के बाद से दर्गों का होना बढता गया। पूर्वी भारत के विभिनल भागों में, जैसे कलकत्ता, जमशेदपुर, राउरकेला, और राँची में 964 में गम्भौर दंगे हुए। 968 और ॥97 के बीच दर्गो कौ एक लहर और चली जब गज्यों और केद्ध में राजनैतिक नेदृत्व कमजोर था। डकव र्घ्य दिसम्बर 990 में उत्तर प्रदेश गुजण़त और आमन्ध्रप्रदेश में साम्प्रदायिक दगे नवाब 499! में बेलगाँव (कर्नाटक) में दगे फरवरी 992 में वाग़णसी और हापुर तर प्रदेश) में, मई 992 में सीलमपुर में (जुलाई 992 में देहली में समाईपुर में, नासिक (महारा्ट में, गुना विवेन्द्रम के निकट केरल में, और अक्टूबर 992 में सौद्ममढी में--सभी यह दर्शोते हैं कि देश में साम्रदायिक सदृभाव कमजोर था। दिसम्बर 992 में अयोध्या में विवादास्पद धर्म स्थल के तोड़े जाने के बाद जब विभिन राज्यों में साम्प्रदायिक उन्माद उमडा, पाँच दिनों में ही 000 लोगों के मरने की बह कही गयी जिसमें उत्तमदेश में 236, कर्माटक में 64, आसाम में 74, राजस्थान में 3), और पश्चिम बगाल में 20 व्यक्ति थे। इस हिंसा के बाद सरकार ने राष्ट्रीय स्वय सेवक सप (0१55) विश्व हिन्दू परिषद (शञात्र0), बजरंग दल, इस्लामिक सेवक सघ (5$) कया जमायते इस्लामी हिन्द पर दिसम्बर 992 में पाबन्दी लगा दी। जनवरी 993 में मुम्बई बम विम्फोट काण्ड तथा बाद में अप्रैल 993 में कलकत्ता में, महाराष्ट्र के साम्प्रदायिक दर्गों तथा अन्य राज्यों में हिन्दू और मुसलमान दोनों की 200 से अधिक जाने गयीं। मुम्बई विसमोरों के तुस्त बाद देहली के सुपरिचित इमाम ने कहा, “अब यह मूलरूप से अस्तित्व काप्रल है। जीवित रहने के लिए अर उठाने से अब इन्कार नही किया जा सकता”। संघ पतिवार के नेताओं ने दावा किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है, और हिन्दू सस्कृति ही यहा कौ अधिकारिक सस्कृति है। मुसलमान वास्तव में मोहम्मदी हिन्दू हैं, और सभी हिन्दुस्तानी परिभाषा से हिन्दू हैं। हिन्दू-मुस्लिम घर्मान्यता का यह ऐसा आक्रामक दृष्टिकोण है जो साम्रदायिक दगगों का कारण है। 96] में जब भारत के 350 जिलों में से 6॥ जिलों शो सवेदबशील पाया गया तो 979 में 26, 986 में 86, और 987 में 254। 999 में सह संख्या 86 थी। जन हानि के अलावा साम्प्रदायिक दरों से सम्पत्ति का माश वर्षा आर्थिक क्रियाकलापों को भी आघात लगता है। उदाहरणार्थ, 983-986 के बीच 4 कोड रुपये मूल्य वी सम्पत्ति नष्ट हुई (7कक् खका०, 7ए9 25, 986) | 986 और 988 के तीन वर्षों मे 2086 दरों की घटनाओं में, 024 व्यक्तियों को जान गयी और 72.82 व्यक्ति घायल हुए। 993 में महाराष्ट्र, बगाल और अन्य राज्यों में साम्प्रदायिक दर्गो के बाद तीन वर्ष वर्क कोई 8,903 नहीं हुए, लेकिन मई 996 में कलकत्ता में पुन पुलिस आज्ञा के तोडने के अकरण में दगे हुए जो मुहरईम जलूस को एक विशेष रास्ते पर ले जाने पर हुए थे। यह पता लगा कि दगे अचानक नहीं हुए बल्कि नियोजित थे और राजनैतिक दुश्मनी की पृष्ठभूमि में कक पायिक हिसा फैलने में भूमि निर्माण माफियाओं और तस्करों की प्रमुख भ्रूमिका रेही। इस प्रकार समय समय पर विभिन राज्यों में साम्प्रदायिक दरों की पुनसवृत्ति आज भी इंगित करती है कि जब तक राजनैतिक नेता व धर्मान्ध लोग अपने उद्देश्यों की पूर्व हे'ु अभदायिकता को एक शक्तिशाली साधन के सप में प्रयोग करते रहेंगे या जब तक धर्म वी स्हेगा। होता रहेगा, तब तक हमाशा देश साम्प्रदायिक तनाव की ज्वाला में दहकगा धर्म 245 साम्प्रदायिक हिंसा के कारण (४०5९६ 0६ (!6एत्ाणा्ं शंठाश्तत्शे विपिन विद्वानों ने साम्प्रदायिक हिंसा कौ समस्या को विभिन्‍न पष्पिश्ष्यों में, विभिन्‍न कारण बाते हुए और इसका मुकाबला करने के लिए विभिन उपाय सुझाते हुए, विचार किया है। मार्क्सवादी सम्प्रदाय, सम्रदायवाद को आर्थिक वचना से सम्बद्ध करते हुए बाजार की शक्तियों पर नियत्रण एवं एकाधिकार प्राप्त करने के लिए सम्पन्न (87८४) और विपल (४४५४ ४05) के बोच वर्ग संघर्ष कहता है। राजनीति वैज्ञानिक इसको शक्ति संघर्ष (7०७८ 5धाह॒ह्ै॥) कहकर पुकारते हैं। समाजशाख्रो इसे सामाजिक दनाव तथा तत्सम्बन्धिध वचनाओं की घटना मानते हैं। धार्मिक विशेषज्ञ हिंसक कट्टरवादियों एवं अन्धानुगामियों ((०आरा/णिएण5७) का मुकुट मानते हैं। साम्म्दायिकता के वर्ग विश्लेषण के लिए ध्यान्न आवश्यक है। व्याख्या यह है कि आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्थितियाँ समाज में कभी-कभी लोगों के लिए ऐसे सकट एव सप्रस्याएँ पैदा कर देते हैं कि यद्यपि वे इन्हें अपनी गिरफ्त में लेने का प्रयल करते हैं लेकिन वे असफल रहते हैं। इस असफलता के सही कारणों को समझने के प्रयल के बिना वे अन्य समुदाय को (वाणिज्य रूप से उनसे अधिक शक्तिशाली) अपनी परेशानियों का कारण समझते हैं जो कि विकृत रूप से उत्पन्न होता है और दर्शाया जाता है। स्वाधीमता के बाद मद्यपि हमारी सरकार ने समाजवादी” अर्थव्यवस्था को अपनाने का दावा किया फिर भी व्यवहार में, आर्थिक विकास्त पूँजीवादी स्वरूप पर आधारित था। इस्त स्वरूप में एक ओर वो विकास उस्त दर से नही हुआ जिससे बेग्रेजगारी, गरौबो, और असुरक्षा का समाधान होता जिससे कुण्ठा, छोटी-छोटी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा तथा अन्य आर्थिक अवसर से बचाव होता और दूसरी ओर पूजीवादी विकास ने समाज के कुछ स्तरों के लिए ही समृद्धि पैदा की है जिसने तीव्र असमानता, नव सामाजिक तनावों और सामाजिक चिन्ताओं को जन्म दिया है! वे जिनको लाभ मिला है, उनकी आकाश्षाए और ऊँची उडान पर हैं। वे अपने नव ग्राप्त समृद्धि से भयभीत भी हैं। उनकी यह सापेक्ष समृद्धि उन लोगों में सामाजिक ईर्ष्या उत्पन करती है जो विकास करने में असफल हैं या शक्ति और सम्मान में कम हैं। धार्मिक अल्पसख्यकों की समस्याओं के समाधान के सरकारी प्रयत्न समुदाय के उन सम्पन्न लोगों को भावनाओं को पडकाते हैं जो सख्या बल से बहुसख्यक हैं और जिन्होंने साँठगोँठ से आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक शक्ति प्राप्त कर ली है। वे महसूस करते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक पैमाने में कोई भी वृद्धि उनके सामाजिक प्रभुत्व को खबण पैदा कर देगी | इस प्रकार दोनों समुदाय शत्रुदा एव सदेह भाव से पीडित रहते हैं और साम्रदायिकता का पोषण होता रहता है। विशेष रूप से यह (साम्रदायिक्त) शहरो निर्धनों और ग्रामोण बेरोजगारों को तुसत प्रभावित करती है जिनकी सख्या में असन्तुलित (० आं4६०) आर्थिक एवं सामाजिक विकास तथा बडी सख्या में नगरों की ओर प्रव॒जन के फलस्वरूप तेजी से वृद्धि हुई है। इन आधार विहीन एवं कुण्डित लोगों का क्रोष अक्सर अचानक हिंसा में बदल जाता है जब कभी इन्हें अवसर मिलता है। साम्मदायिक दगे इसके लिए उपयुक्त अवसर प्रदान बस्ते हैं। लेक्नि इस आधिक विशलेषण को कई विद्वानों ने निष्पक्ष नहीं माना है। क्या धर्म साम्ग्रदायिकठा के लिए उत्तरदायी है ? ऐसे विद्वान हैं जो यह विश्वास नहीं 246 र्ष्म करते कि धर्म की इसमें कोई भूमिका नही है। बिपन चद्ध, (984) उदाहरण के लिए, मारते हैं कि साम्मदायिकता न वो धर्म से प्रेरित होती है और न ही धर्म साम्प्रदायिक राजनीति की वस्तु है, फिर भी साम्प्रदायिक व्यक्ति अपनी राजनीति धर्म भेद पर आधारित करता है, धार्मिक पहचान को सगठन सिद्धाल के रूप में प्रयोग करता है और साम्प्रदायिकता के सामूहिक दौर में लोगों को गतिशील बनाने में धर्म का अयोग करता है । धर्म-भेद, गैर धा्िक सामाजिक आवश्यकताओं, आकाक्षाओं और सपर्षों को ढेंकने के काम में लाया जाता है। धार्मिकता, अर्थात्‌ “व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक धर्म का प्रभाव” या व्यक्तिगत विश्वार्ों के परे अन्य क्षेत्रों में धर्म का अधिक हस्तक्षेप धार्मिक विचारधारा और राजनीति कौ ग्राह्मग (:०८८ए/था५) को पैदा करती है। साथ हो, धार्मिक सुधार-विशेध फटा, सकोर्णता, और हठधर्मिता उन लोगों को विभाजित करने का काम करती ई जिन्हें जीवन इतिहास ने साथ साथ लाकर खडा कर दिया है। इस अर्थ में विभिल धर्मों की सरचना, पस्कार विधि और वैचारिक प्रथाओं में विभिल तत्व होते हैं जो विभिन वकों पे साम्पदायिकता से सम्बद्ध होते है। उनका विश्लेषण और लोप का विभिन्‍न धर्मों में वर्ण किया जाना है। कुछ दिद्वानों ने बहु-कारकीय दृष्टिकोण रखा है जिसमें वे कई कारकों को एक साथ महत्व देते हैं। साम्मदायिकता की विचारधाण में दस कारकों को पहचाना गया है (संेतिया, 987 82)। ये हैं सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, वैधानिक, मनोवैज्ञानिक, अशासनिक, ऐतिहासिक, स्थानीय और अन्वर्राष्टरीय। सामाजिक कारकों में सामाजिक परमपपए, धार्मिक समुदायों की रूढ छवि, वर्ग और जातीय अह या असमानवा और धर्म आधाणि सामाजिक स्ततीकरण शामिल हैं, शा्विक कारणों में सहिष्णुता के धार्मिक प्रतिमानों और 'र्मनिसेक्ष मूल्यों में गिशवट, सकीर्ण और मामी (4०४7००४०), धार्मिक विश्वा्र, राजनैतिक उपलब्धियों के लिए धर्म का अयोग और धार्शिक नेताओं की साम्परदायिक विचारधाण शामिल है, एजनैतिक कारकों में धर्म आधारित राजनीति, धर्म के प्रभुत्व बाते राजनैतिक संगठन, धार्मिक विचाएं के साथ चुनाव भ्रचार, धार्मिक मामलों में राजनैतिक हस्तक्षेप, अपने स्वार्थ के लिए राजनीतिज्ञों द्वात आन्दोलनों को प्रेरणा एवं समर्थन, >भिदायिक हिंसा का राजनैतिक औचित्य तथा धार्मिक भावनाओं को रोकने में राजनैतिक नैवृत् की असफलता शामिल है, आर्थिक कारकों में धार्मिक अल्पसख्यक समुदायों का आर्थिक शोषण एव भेदभाव, उनका असन्तुलित विकास, अतिस्पर्धी बाजार में अपर्याण अवसर, गैर विस्तारीय / अल्पसख्यक धार्मिक समूहों के मजदूरों का विस्थापन और रोजगार को व्यवस्था करना तथा धार्मिक सघर्षों को भडकाने में खाड़ी के देशों को आर्थिक मदद शामिल है, वैधानिक कारक में समान नागरिक सहिता का अभाव, सविधान में उछ समुदायों के लिए कुछ रियायतें और विशेष प्रावधान, कुछ राज्यों को विशेष दर्जा, हें सं नीवि तथा विभिन समुदायों के लिए विशेष कानून शामिल हैं, मत्रोवेज्ञारिक कारों में सामाजिक पूर्वामह, रूढ दृष्टिकोण, , अन्य समुदायों के लिए शज्रुता वा उदासीनता, अफवाह, भय की ., गेथा जन सचार द्वाय प्रदत्त गलत सूचनाए/गलत अर्प _>वस्था/ गलत अतिनिधित्व शामिल हैं, अशासनिक कारकों में पुलिस तथा अन्य प्रशासनिक इकाइयों के बीच समन्वय को कमी, खराब उपकरण तथा खराब प्रशिक्षित पुलिस कर्मी, पुतिम ्ध्म थ्वा ज्यादतियों और निष्करियता शामिल हैं, ऐव्हासिक कारणों में विदेशी आक्रमण, धार्मिक सस्थाओं को हानि, धर्मान्तरण के प्रयल, औपनिवेशिक शासकों की “बाँटों और राज्य करो" की नोति, विभाजन कौ पीडा, विगत साम्प्रदायिक दो, जमोनों, मन्दियों और मस्जिदों के पुराने विवाद शामिल हैं, स्थानीय कारकों में धार्मिक जुलूस, नारेबाजी, अफवाहें, भूमि विवाद, स्थानीय अ-सामाजिक तत्व और समूह विद्देष शामिल हैं , अन्तर्राष्ट्रीय कारकों में अन्य देशों से प्रशिक्षण और आर्थिक मदद, भारत को कमजोर करने और तोडने के अन्य देशों के कार्य तथा साम्मदायिक सगरठनों को समर्थन शामिल हैं। इन दृष्टिको्णों के अलावा, साम्रदायिकता और साम्प्रदायिक हिंसा को समस्या को समझने के लिए हमें समष्टिवादी (॥०॥७॥०) दृष्टिकोण की आवश्यकता है। यह दृष्टिकोण विविध कारकों पर बल देता है तथा प्रमुख (कण) कारकों को गौण (7००) कारकों से अलग करता है। इन कारकों को हम चार उप-समूहों में विभाजित कर सकते हैं. अत्यधिक स्पष्ट (८०४५.४८४०५७), प्रमुख सहयोग करने वाले, थोडे पडकाऊ (9000 ०882५०॥०६), और स्पष्ट रूप से सहयोग न करने वाले। विशिष्ट रूप से ये कारक हैं. साम्मदायिक राजनोति तथा राजनौतिशों का कट्टरपथियों ((8790८8) को समर्थन, पूर्वामह (जो भेदभाव, उपेक्षा, शारीरिक आक्रमण और बहिष्कार पैदा करे है), साम्प्रदायिक सगठनों का विकास, एवं पर्मान्दरण (००एप्घआ०० बात ए7052)459007) । मौे तोर पर धर्मान्यता, अ-पामाजिक तत्वों तथा आर्थिक हितों पर ध्यान दिया जा सकता है जिनका विगेधी समुदायों में हिंसा फैलाने में बडा हाथ एवा है। मेरी अपनी शोध धारणा यह है कि साम्पदायिक हिंसा धर्मान्यों द्वाश भड़काई (7४8००) जाती है, असामाजिक तत्वों द्वारा प्रेरित (४0४७८) की जाती है, राजनैतिक सक्रियदावादियों (०७३७७) द्वाग समर्थित होती है, निहित स्वार्थ हितों वाले व्यक्तियों द्वार बिठीय सहायता दी जाती | और पुलिस तथा प्रशासकों की निष्क्रिय से फैलती है। ये कारक दो साम्प्रदायिक हिंसा के सीधे कारण हैं, परन्तु वह कारक जो हिंसा फैलने में सहायक होता है वह है. किसी विशेष नगर का पर्यावएणीय नियोजन (००ण०ट्टाव्यों ॥9/०0) जो दगाइयों को बिवा दण्ड के बच निकलने में सहायक होता है। मध्य भारत में, गुजरात में बड़ौदा और अहमदाबाद के दो, उत्तर प्रदेश में मेरठ, अलीगढ़ और मुरादाबाद के दगे, बिहार में जमशेदपुर और उत्तर परारत में कश्मीर में श्रीनगर के दगे, दक्षिण भारत में हैदगबाद और केरल के दगे, पूर्वी भारद में असम के दगे मेरे शोध को पुष्टि करते हैं। साफदॉयिक हिंसा यर समश्ििपरक (१०७०) दृष्टिकोण के लिए कुछ कारकों को व्याख्या कर्ता आवश्यक है। इनमें से एक है मुसलमानों में भेदभाव की वर्क विहीन भावना। 4998 तक आईएएस (/5) में मुसलमानों का प्रतिशत 29, आई पी एस (75) में 28, में 22, और न्यायिक सेवाओं में 62 धा। अत पुसलमान ऐसा अनुभव करते हैं कि इन सभी क्षेत्रों में उनके साथ भेट्भाव क्या जाता है तथा उन्हें उचित अवसर श्रदान नही किए जाते | सत्य यह है कि मुसलमानों की सख्या, जो इन सेवाओं के लिए प्रतियोगी होते हैं, बहुत कम है। मुसलमानों में व्याप्त भेदभाव को भावना हास्यास्पद और तर्क विहोन है। दूसग कारक है खाड़ी तथा अन्य देशों से भार में धन का प्रवाह! वाफी मुसलमान खाडो देशों में अच्छी आमदनी वधा सम्पनता प्राप्व करे के लिये जावे हैं। ये मुसलमान 248 र्ष्म और स्थानीय शेख लोग मस्विदें बनवाने, मदरसे खुलवाने तथा दान से चलने वाले मुस्तिय सस्थाओं को चलाने के लिए घन भेजते हैं। इस प्रकार यह माना जादा है कि यह घत मुस्लिम कट्टवाद को सहायता के लिये होता है। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहाँ के शासकें में सदेव से भारत के प्रति शत्रुता भाव रहा है। नवाब शरीफ के बाद मुशरफ सका की अवधि में तो यह और बढ गया है। इस देश का शक्तिशाली अभिजात वर्ग भाल में सदैव अस्थिसता पैदा कले में लगा रहता है। कारगिल युद्ध के बाद अब यह स्थापित हे चुका है कि पाकिस्तान प्रशिक्षण एव सैन्य शस्त्र देकर मुसलमान आतंकवादियों को सक्रिय रूप से समर्थन देठा रहा है (जम्मू कश्मीर और पजाब के)। पाकिस्तान तथा अन्य सरकारों के इस प्रकार के अस्थिरता पैदा करने वाले पयलों ने हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति दुर्घवगा और सन्देह पैदा कर दिया है। यही बात हिन्दू उम्रवादियों दा हिन्दू संगठनों के विषय में भी कही जा सकती है जो मुसलमानों और मुस्लिम संगठनों के विरुद्ध शत्रुता भाव पड़ते हैं। इस प्रकार के प्रकरण, जैसे अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद, मा में कृष्ण जन्म भूमि था पास में स्थित मस्जिद परिवर्तन का झगड़ा, वागणसी में काश विश्वनाथ मन्दिर तथा निकट को मस्जिद का विवाद, सम्पल कल) में मस्जिद विवाद जिममें भगवान शिव का मन्दिर होने के दावा किया जाता है जो कि पृथ्वीयज चौहान के शासन कल से था, और इस प्रकार की घटनाएँ जिसमें एक मुस्लिम नेवा द्वाग गणतत्र दिवस पर मुस्लिमों से शामिल न होने की अपील की गई थी और 26 जनवरी (987) को काला गा कम में मवाने को कहा गया था, इन सभी ने दोनों समुदायों के बीच दुर्भावाा में च्‌ । जनसचार (प958 7726/9) भी कभी-कभी अपने तरीके से साम््रदायिक तनाव पैदा कले में योगदान करते हैं। कई बार समाचार प्रो में प्रकाशित समाचार सुने हुए, अएवडं था गलत अधों पर आपारित होते हैं। ऐसे सामावार आग में भी का काम करते हैं और साम्मदायिक तनाव को हवा देते हैं। 969 में अहमदाबाद में यहो हुआ जब कि 'सेवक प्र में कहा गया कि मुसलमानों द्वारा अनेक हिन्दु रिरयों के वस्र उतारे गए और उनका बतावार किया गया। यद्ञपरि इस समाचार का खण्डन अगले दिन हो कर दिया गया था लेके तोड-फोड तो हो चुकी थी। इससे हिन्दुओं की भावनाएं भड़क उठीं और साम्प्रदायिक दो शुरु हो गए। एक और प्रकरण जो हाल में ही वर्षों से हिन्दू और मुसलमानों को आउ्दोलित किए हुए है वह है 'मुस्लिम व्यवित्रगत कानून' (कफ एलउ००३ .890) । शाहबानों के प४३ उच्चतम न्यायालय के निर्णय के साथ तथा 4995 अप्रैल में न्यायालय द्वारा सरकार समान नागरिक सहिता कानून को लागू करने की सलाह के साथ हो, मुसलमान लोग लगे हैं कि उनके व्यक्तिगत कानून में हस्तक्षेप किया जा रहा है। राजनीतिज्ञ भी अपने वो सत्ता में बनाए रखने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते हैं। भाखौय जता पर्य, विश्व हिन्दू परिषद्‌, शिवा सेना व राष्ट्रीय स्वय सेवक सघ ऐसे सगठन हैं जो हिदुत के जा हे का दावा करते हैं। इसी अकार, मुस्लिम लीग, जमावते हे मुसलमानों 7५) मजलिस ए मुसलमीन, मजलिस ए-मुशब्विणत, अर + भावनाओं को भडकाते हुए मुसलमानों को अपना वोट बैंक मार पर्प 249 ज्रयोग करते हैं। जम्मू कश्मीर, आन्ध्र प्रदेश, केरल, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार में साम्प्रदायिक राजनीति इसी व्यवहार के उदाहरण हैं। राजनौतिज्ञ अपने भडकाऊ भाषणों, लेखों दया प्रचार द्वारा सामाजिक वातावरण को साम्प्रदायिक भावनाओं से पर देते हैं। वे मुसलमानों के मस्तिष्क में अविश्वास के बीज बो देते हैं, जबकि हिन्दुओं को विश्वास है कि उन्हें आर्थिक, सामाजिक व सास्कृतिक क्षेत्रों में मुसलमानों को असाधारण रियायवें देने के लिए बाध्य किया जादा है। वे दोनों समुदायों के गहरे धार्मिक परम्पणओं का भी फायदा उठते हैं और दोनों की प्रथाओं तथा सस्काएं को प्रकाशित करते हैं। नेता लोग लोगों के मन में भय ओर सन्देह भरने के लिए आर्थिक तर्क प्री देते हैं और अपने अनुयायियों को थोडे से भी भड़कावे पर दगे करने के लिए तैयार करते हैं। भिवण्डी, मुरादाबाद, मेप्ठ, अहमदाबाद, अलोगढ और हेदग़बाद में यहो हुआ था। सामाजिक कास्क, जैसे अधिकतर मुसलमानों का परिवार नियोजन विधियों को अपनाने से मना करना भी हिन्दुओं में सन्देह और बुरी भावनाएं पैदा कर देते हैं। कुछ वर्ष पूर्व एक हिन्दू सगठन द्वारा महाराष्ट्र के शोलापुर और पूना में इस आशय के पर्चे बॉटे गए जिनमें मुसलमानों की आलोचना करते हुए कहा गया के वे परिवार नियोजन नहीं अपनाते और बहु पली प्रथा अपनाते हैं ताकि अपनी जनसख्या में वृद्धि कर सकें और भारत में मुस्लिम सरकार बना सरकें। यह दर्शाता है कि ग्रजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व प्रशासनिक कारकों का समन्वय किस प्रकार स्थिति को बिगाइते हैं जिससे साम्म्दायिक दगे होते हैं। रा्प्रदाषिक हिंसा के सिद्धान्त (१॥६७१८७ ण॑ 0णाएण/ पणचाप्णे साम्णदायिक हिंसा सामूहिक हिंसा होती है। जब एक सम्प्रदाय में अधिकतर सख्या में लोग अपने सामूहिक लक्ष्यों की श्राप्ति में असफल रहते हैं या ऐसा अनुभव करते हैं कि उन्हें समान अवसरों से बचित रखा जा रहा है और उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है, तब वे कुष्ठा और भ्रमप्रस्त हो जाते हैं और यह सामृहिक कुण्ठा फिगबेण्डस और नेसवोल्ड ने जिसे व्यवस्थित कुण्ठा' (5)४८००७४० ॥05४9४०४) कहा है) सामूहिक हिसा पैदा करती है। परन्तु समूचा प्रमुदाय हिंसात्मक विरोध नहीं चलाता। वास्तव में, सत्ता समूह के विशेध में असनुष्ट लोगों द्वारा उठाया जाने वाला कदम या शक्तिशाली अभिजाद वर्ग (जिनके वरीकों के खिलाफ थे विरोध क्ते हैं) बहुघा अहिसक होता है। विरोधियों का छोटा सा समूह ही ऐसा होता है जो अपने सघर्ष को सफलता के लिए अहिंसा को व्यर्थ और हिंसा को आवश्यक समझता है और जो अपनी विच्यरघाय की शक्ति को सही मनवाने के लिए अत्येक अवसर का लाभ उठाने का प्रयल करता है। यह उप-समूह हिसात्मक व्यवहार में लिप्त होकर समूचे समुदाय का अ्रतिनिधित्व नही करता और न असतुष लोगों के कुल समूह के विचारों को अस्तुत करता है। इस उप समूह का व्यवहार का अधिकतर, शेष समुदाय द्वारा समर्थन नही किया जाता। इस प्रकार, मेरे मान्यता पुराने मैल सिद्धान्त (२॥/-४ग पर॥८०३) से मिलती है जिसके अनुसार अधिकतर लोग उप समूह द्वाय हिसात्मक व्यवहार को “गैर जिम्मेदार व्यवहार कह कर उसका पिरोध करते हैं। प्रश्न यह है कि कौन सा करण “व्यक्तियों के समूह' को हिसात्मक बना देता है ? सामूहिक हिंसा पर दो महत्वपूर्ण सैद्धान्दिक पक्ष हैं - ) यह उकसाये जाने के बाद सामान्य 250 रा प्रतिक्रिया होती है (॥) यह ऐसी प्रतिक्रिया है जो इसके प्रयोग का समर्थन कले वाले प्रतिमानों से युक्त होती है। इससे कुछ महत्वपूर्ण विद्यमान सिद्धान्तों का विश्लेषण आवश्यक प्रतीत होता है। मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों (99,०॥०-००१॥००६४८७) को छोड कर (क्योंकि वे आक्राना (०887८७५०४) की मनोवैज्ञानिक व्यक्तित्व की विशेषताओं तथा बैकारिक व्यवस्थाओं 5 हिंसा के मुख्य निर्धारक मानते हैं (और मैं इन्हें वैयक्तिक हिंसा की व्याख्या के लिए महत्रपृ मानता हूँ, न कि सामूहिक हिंसा के लिए), अन्य सिद्धान्तों को दो भागों में चर्गकृत किया जा मकक्‍ता है (७) सामाजिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के स्तर पर ओर (0) सामाजिक मास्कृतिक या समाजशास्त्रीय विश्लेषण के स्तर पर। प्रथम समूह में कुण्ठा-आक्रमण सिद्धान (पराह्ञागाणा-ब(६2४5६00), निरोषक सिद्धान्त (9760८४॥०7), प्रेरणा प्रदत्त सिद्धान्त (03०0४८-आ७7००७०॥), और स्व-अभिवृत्ति ($ला-बपरी०००) आदि जैसे सिद्धान्त सम्मिलित हैं, जब कि दूसरे समूह में, सामाजिक तनाव (०लग 7४०) सिद्धान्त व्याधिकी सिद्धान्त (9707९), हिसा की उप सस्कृति का सिद्धान्त (0००७ रण &00-०४॥००८ 0 ०६४८४) तथा सामाजिक सौखने का सिद्धान्त (8063 [९807६ 7००५) आदि सम्मिलित किए जा सकते हैं। मेरी मान्यदा है कि ये सभी ४ साम्दायिक हिंसा के दौरान सामूहिक हिस्ता की घटना की व्याख्या करने में असफल हैं। सैद्धान्तिक दृष्टिकोण (जिसे सामाजिक बाधाओं का सिद्धान्त कहा जाता है) सामाजिक सरचनात्मक स्थितियों के समाजशास््रीय विश्लेषण पर केन्द्रित है। सामाजिक बाधाओं का सिद्धान्त (5०07 छ366 ९१5 १॥6075) साम्मदायिक हिंसा को पैदा करने वाली दशाएँ हैं. खिंचाव (5७८5७), प्रस्थिति सबधी कुण्ठा (४9६ 9797000॥), और अनेक प्रकार के सकट (०४५८७) । मेरा विचार है कि 3 (3887055079) हिसा का अ्योग इस कारण करे हैं क्योंकि वे असुरक्षा और चिला पीडित रहते हैं। किसी व्यक्ति में इन (असुरक्षा सम्बन्धी) भावनाओं का जन्म व चिस्ता का भाव उन मामाजिक बाधाओं में देखा जा सकता है जो अत्याचारी (०ए77०5४४९८) 404 व्यवस्त्थाओं द्वारा, सत्ता अभिजात द्वाय, तथा व्यक्ति की उस पृष्ठभूमि व पालन पोषण कै, तीनों के कारण पैदा होती हैं और जो सामाजिक प्रतिमानों और सामाजिक सस्थाओं के प्रति अयधार्थ एवं अविवेकी अभिवृत्तियों को भडकाने में मदद करती हैं। मेरा सिद्धाल भी 'आक्रान्ता' के व्यवहार में तीन कारकों को बताता है. समायोजन (स्थिति में) लगाव (०(३८॥7४०) (समुदाय के प्रति) और प्रतिबद्धता (मूल्यों के प्रति) और साथ ही सामार्जिक पर्यावरण (जिसमें व्यक्ति/आक्रान्ता रहते है) एव व्यक्तियों (आक्रान्ताओं) के सामाजौदृद (5०८»75८०) व्यक्तिन्व। इस प्रकार मेगा सैद्धान्तिक प्रतिरूप (मॉडल) सामाजिक व्यवस्था, आक्राना की व्यक्तित्व सरचना, तथा उस समाज अणाली का फल होते हैं, व्यक्तित्व ढांचे में में समायोजन, आक्रात्याओं ही अतिबद्धता शामिल करता हूँ, और उप सस्कृतोय र्ध्म य्डा कराता हूँ जो सामाजिक नियंत्रण के रूप में कार्य करते हैं। मेरी घारणा है कि व्यक्तियों का कुसमायोजन, अलगाव तथा अम्रत्रिबद्धता उनमें सापेक्ष बचना (6!2056 0८ए7५2700) की भावना को, पैदा करता है। सापेक्ष बचना समूह के सदस्यों अपेक्षाओं (८८८७४७॥०४७) और उनकी क्षमताओं (८्वए४»॥065) के बीच विदिव विप्तगवि (ध०शए८१ 05०थ्एआ0) है (अथवा जीवन को वे दशाएं हैं जो व्यक्ति/समूह प्राप्त करने के योग्य समझते रे यदि उन्हें विधि सम्मत साधन और अवसर प्रदान किए जायें)। यहा 'विदित' शब्द (समूह के सदस्यों द्वाए) महत्तपूर्ण है, इसलिए व्यवहार भें भिनता या सापेक्ष वचनाएँ सदैव हिंसात्मक व्यवहार को जन्म नहीं देती। समूह में सापेक्ष वचन तब पैदा होती है जब (॥) अपेक्षाएँ तो बढ जातो हें परन्तु धमताएँ वैसो हो रहती हैं या कम हो जाती हैं, या (॥) जब अपेक्षाएँ उतनी ही रहती हैं परन्तु प्रमवाएँ कम हो जाती हैं। अपेक्षाएं और क्षमवाएँ दोनों ही क्योंकि अनुभूति (9०:००३७०४) पर निर्भर होती हैं, समूह के मूल्यों का प्रभाव निम्न तत्वों पर पड़ता है. (3) समूह किस प्रकार वचनाओं को समझेगा, (७) लक्ष्य (6७) जिस पर सापेक्ष बचना केंद्रित होगी, और (०) पह रूप जिसमें वचना अभिव्यक्त की जायेमी। क्योंकि प्रत्येक समूह/व्यक्ति विभिन्‍न बलों (9८८७) से प्रभावित होता है, प्रत्येक समूह/व्यक्ति हिंसा के मामले में भिन्‍न प्रतिक्रिया करेगा या भिल प्रकार से सामूहिक साम्प्रदायिक हिंसा में भागीदारी करेगा। सामाजिक बाधाओं का सिद्धान्न आवश्यक रूप से हिस्सा का अभिजातीय सिद्धान्त (०४६: 08८०५ 0 ५४०॥०४०८) नह्वी है जिसके अनुसार एक छोटा समूह, (वैचारिक रूप से श्रेष्ठ, हिंसा फैलाने कौ पहल करता है तथा उम्र सम्पूर्ण कुण्ठित समूह के हित के लिए हिसा का प्रयोग करने का निश्चय करता है जिसके लिए यह अपना विग्रेध प्रकट करता है। साथ ही छोटा प्रपूह कुण्ठित जन के विस्तृत सामूहिक कृत्य पर निर्भर नहीं कप्ता। इस सन्दर्भ में मेरी व्याख्या रूढिंगत मार्क्सवादी सिद्धान्त से भिन है क्योंकि मार्क्स इस प्रकार के आन्दोलन एवं जन क्रान्ति को पान्यता नहीं देता। पघुदीकरण सिद्धान्त और वलस्टर का प्रभाव (000 ण॑ एग्रां539०0% जा0 एफाछ छील्ल) हाल ही में भारत में अन्तरसामुदायिक (07-00णगाण्णा)) और अन्तर्सामदायिक (00॥3-00॥"0४0) हिंसा वी व्याख्या कने के लिए अवधारणात्मक प्रतिरूप (मॉडल) विकसित किया गया है (वीवी सिह, 990) | यह प्रतिरूप तीन अवधारणाओं पर आधारित /“धुवीयता (0७909), अनुभेदन (दरार (८ा८७४उ१०) और क्लस्टर (जमघट) (००७(४7) । यह प्रतिरूप दगा पूर्व (०-7०), दर्गो के दौग़न, और दर्गो के बाद की स्थिति में दथ्यों के आधार पर तैयार किया गया है तथा भिल भिन्‍न सामाजिक समूहों, जो एक दूसरे से शतु भाव रखते हें (एण३:४७), के व्यवहार वा विश्लेषण भी करता है। क्योंकि साम्प्रदायिक अव्यवस्थाओं (दरों) में दो शत्रु भाव वाले सामाजिक समूह लिप्त होते हैं, इसलिए इस इजुता भाव (भव और मस्तिष्क वी स्थिति) सरचनात्मक समानता ब पूर्वाप्रहों का सावधानौपूर्वक विश्लेषण आवश्यक है। 252 हे अकेला व्यक्ति कमजोर व असुरक्षित होता है। पसनतु समूहों और सभाओं में शक्ति होती है। व्यक्ति अपने लाभ एव सुरक्षा के लिए समूहों से जुड़ता है। समाज में सदैव ही विविध धुवताए होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह धुवताए दो प्रकार की होती हैं सवाई और अस्थाई । प्रथम श्रेणी में विचारधाग, धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र और लिंग आते हैं। झ ध्रुवीय भिन्‍नताओं में व्यक्ति को मूल पहचान होती है जो व्यक्ति के साथ अन्त तक एती है। दूसरी श्रेणों में व्यवसाय, पेशा, एव स्वार्थों पर आधारित कार्य आते हैं। यद्यपि घुदौय भिनताएँ सामान्यतया परस्पर एकान्तिक (ए्रपा॥श५ ८४०प्रआञ४८) नहीं होतीं, परन्तु वे दब एकान्तिक हो जाती हैं जब समाज अनुभेदन (८८३४१४०७) की भ्रक्रिया से गुजरवा है जो कि विदित अन्तर (एकल्टाएड0 काश्तिधा०८) और पघ्रवीयन के फलस्वरूप जनसख्या विभाजन के कारण होता है। जब आमजन (70455८5) सामान्य रूप से एक धुवोयन (790०»४9) के प्रति निकटता दशते हैं, तो यह धुवीयन विशेष स्थान, समय व जनसख्या के लिए प्रभावी धरुवीयन हो जाता है। यह प्रभावी (७07॥9०॥7९9) ध्रुवीयन जनसख्या के अतर्बाधा उन करने वाले स्वरूप को स्थापित कर देता है (जमावड़ा निर्माण), अर्थात्‌ घुवीयन आपारि जन जनसंख्या के जीवन स्वरूप को निर्धारित करते हैं। पुराने शहरों व कस्ों में झ प्रकार के क्लस्टर (जमघर) धर्म, जाति, पन्‍्य पर आधारित होते हैं, लेकिन आधुनिक शहों में ये अधिकतर वर्ग आधारित होते हैं, जब इस प्रकार का जमावड़ा दो धुवों के कारण शुर हे जाता है (धर्म या धार्मिक पन्‍्य का) तभी संघर्ष होता है। क्लस्टर में रहने की सामाजिक गिशीलता यह है कि यह दगे वाली स्थिति पैदा करने में सहायक सिद्ध होते हैं क्योंकि सम्बन्ध कम होने लगते हैं और ऐसे आवेशात्मक दध्य पैदा कर देते है बिरें जानबूझ कर एक दूसरे के प्रति किया जाने वाला अपमान, प्रवचना, या चोट समझा जता है। ये घटनाएं भौतिक निकटवा के कारण समूह में रहने वाले लोगों को अधिक प्रभावित कौ हैं। इससे लोगों को अपनी हो जनसख्या वाले क्षेत्रों में सम्पर्क बढाने की प्रेरणा मिलती है और यह जन ड्रोह (7855 फाञय००ा09) के लिए उपयुक्त होता है। नेताओं द्वार किया जाने वाला साम्पदायिक आह्वान भी घुवीयन की प्रक्रिया में वृद्ध कर्ता है। उदाहरणार्थ, 982 में मेरठ शहर मे मुसलमानों के लिए शाही इमाम बुखाए के प्र शऊ भाषण ने हिन्दुओं को मुसलमानों के विरोध में अपने हितों को रक्षार्थ बडी प्रतिक्रिया मच्वलित कर दी जिसका फल हुआ शहर मे साम्रदायिक दगे। उन्होंने अप्रैल 988 हैं, उन्हें उनके अधिकारों से वचित रखा गया है और उनकी समस्याओं वी ओर घात नहीं दिया गया है। ऐसे ही भाषण धर्म के नाम पर लोगों को भडकाते हैं जो फि! साम्पदायिक हिसा पैदा करते है। धुवीयन मभुत्व (ए05चाक शा को प्रकृति पाँच कारकों पर निर्भर है :00 समय और स्थान (अर्थात्‌ अवधि, के, स्थिति और भौगोलिक सीमाएँ), 2) सामाजिक दावा (अत जाति समुदाय और सामाजिक समूछ, 6) शिदा (अर्थात्‌ हितों के प्रति जागृति, 6) आर्थिक स्वार्थ, ओर 6) नेतृत्व (अर्थात्‌ भावगात्मक भाषण, वायदे, वथा नेताओं की मौतियोँ र्््म 253 उपगशेक्त विश्लेषण के आधार पर चौवीसिंह ने दगोन्युख रण फ़ाण्ाट) (प्रामदायिक) सरचना इस प्रकर बताई है. () द्वि-घुवित (#-0,॥0) जनसख्या चिन्हित कलसटरों में; 2) निकटता; 8) समान हित तथा परिणामद शत्रुता, (५) घुवीकृद जनसख्या की शक्ति (9/था०)) | यह शक्ति सख्याबल (व्रण्शाशाल्श धधध्याष्टा)), आर्थिक समृद्धि, अछू-शख्त्र रखने को स्थिति, समन्वय नेतृत्व के प्रकार और क्रियाकलापों (४०0७७) कौ शक्ति पर आधारित होदी है, और ७) जिला पुलिस तथा जन प्रशासन की अक्षमता और प्रशासनिक योग्यता। साप्रदायिक हिंसा को रोकने के उपाय (0६४5७४६६ [0 एज) एग्रागएा३। शणरात्शे साम्मदायिकता और साम्प्रदायिक हिंसा कौ चुनौतो का सामना कलने के उपाय दो प्रकार के हो सकते हैं - लम्बी अवधि और कम अवधि के । लम्बी अवधि के उपाय हैं प्रथम, लोगों को साम्मदायिकता-विहोन करमे को प्रक्रिया विधिन स्तरों पर प्रारम्भ करना। ये स्तर निम्न हो सकते हैं उनको यह समझा कर कि साम्प्रदायिक मान्यताएँ झूठी होदी हैं, उन्हें साम्प्रदायिकता को राजनैतिक जड़ों और सामाजिक-आर्थिक जडों के विषय में समझा कर, और उन्हें यह चढाकर कि साम्प्रदायिक तत्व जिन तथ्यों को समस्या दतते हैं ले वास्तविक समस्याएँ नहीं हैं तया जो उपाय वे बताते हैं वे सही उपाय नहीं है। (उदाहरण के लिए लोगो को यह बताना कि कश्मीर की भमस्या हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों को समस्या नहीं है परनु कश्मीरियों के “पहचात' (0८780) को है। आम कश्मीरी पाकिस्तान के साथ जुडना नही चाहते, ये केवल 'स्वाधीनता' चाहते हें जिससे अपनी एकझुपता को स्थापित रख सके। अत मुख्य मुदा 'स्वाधीनता' की अकृति का ही है)। दूसरे, पज्य तथा सत्ताधारी सजनैदिक अभिजात वर्ग के (००वाग्मए02७०॥०॥) को रोकना, क्योंकि इससे साम्प्रदायिक हिसा के विरुद्ध साम्प्रदायिकता को स्पष्ट या गृप्त समर्थन को बढावा मिलता है। इसमें राज्य नियमित मीडिया भी शामिल है। तीसरे, नागरिक (८क्षौ) समाज की साम्प्रदायिकता को गेकना, क्योंकि इससे अधिक साम्प्रदायिक दर्गों को मदद मिलती है। साम्प्रदायिक विचारों एवं विचाप्पाणओं वाले व्यक्ति सरकार को इस पक से कार्य करने के लिए दबाते हैं कि जो सदैव धर्म निरपे्षता के सिद्धान्त के विरुद्ध होते हैं। पर्मनिसपेक्ष उज्य, सत्ता में पर्मनिपेक् पार्यी और पर्मनिष्षेत्त शक्तिशाली अभिजात वर्ग कई बार इन साम्प्रदायिक लोगों के दबाव के सामने झुक जाते हैं। इन जाहों पर बुद्धिजोवी, गजनैतिक पार्टिया और स्वैच्छिक संगठन अत्यधिक प्रभावी हे सकते हैं। चौथे, स्कूलों, कालेजों/ विश्वविद्यालयों में मूल्यपरकता पर बल देने वाली शिक्षा पर जोर देना, जो साम्प्रदायिक भावताओं को ऐकने में महत्वपूर्ण है। नेव विचारधागओं पर आधारित शिक्षा युवकों को घृणा कौ विचारधारा से बचा सकती है। इतिहास की शिक्षा को भूमिवा भारतीय सन्दर्भ में विशेष रूप से हानिकारक रही है। इतिहास को साम्मदायिक व्याख्या विशेष रूप से मध्य युग कौ, भारत में साम्यदायिक विचारधारा का आधार बनी है। शिक्षा सस्थाओं में वैज्ञानिक पद्धति से इतिहास को शिक्षा साम्प्रदायिक के विरुद्ध किसी भी वैचारिक सधर्ष में मूल तत्व होना चाहिए। पॉव्वे, मीडिया भी साम्रदायिक फदनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण व लाभकारी सिद्ध हो सकता है। साम्प्रदायिक प्रेस को बद अठव र््म किया जा सकता है और साम्मदायिक लेखकों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए। छठे, यह विचारधाय कि आर्थिक विकास, औद्योगोकरण, पूजीवाद के विकास तथा काम वर्ग के विकास से साम्प्रदायिकता स्वत कमजोर हो जायेगो और लोप हो जायेगी अतर्कसगत | इस प्रकार का वामपन्‍्थो दलों और नक्सलवादियों का आर्थिक अपचयवाद वर्ग एकता को अवश्य शेक्ती है। साम्मदायिक हिंसा महाराष्ट्र, पजाब, गुजरात जैसे ज्यों और मुम्बई, अहमदाबाद, जमशेदपुर और कानपुर जैसे शहरों में अधिक है। साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायिक दरों को गेकने के लिए कुछ तुरन्त उपाय आवश्यक है। अधम, शान्ति समितियों स्थापित की जा सकती हैं जिनमें विभिन धार्मिक सम्ददायों के लोग सदभावना और भ्रातृभाव फैलाने के लिए साथ-साथ काम कर सकते हैं और दगा पीड़ित क्षेत्रों में भय और घृणा का भाव दूर कर सकते हैं। यह न केवल साम्प्रदायिक तनाव अमाप्त करे में प्रभावी हो सकता है बल्कि दगों को शुरु होने से भी रोक सकता है। दूस, रज्य को साम्मदायिक हिंसा से निपटने के लिए योजना एवं नई रणनीति बनानी चाहिए। हाल के ही वर्षों में भारत का अनुभव इस उपयोगिता को सिद्ध करता है। जब कभी मजबूत और धर्मनिरपेक्ष प्रशासन ने कठोर कदम उठाने की धमकी दी है या कठोर कदम उठाए हैं, तब या दंगे हुए हो नहीं या कम अवधि तक ही चले। उदाहरणार्थ, कठोर, पुलिस और सेना के हस्तक्षेप से नवम्बर 984 में कलकत्ता में तथा जनवरी 4994 में मुम्बई में दर्गों कौ पुनरावृत् पर रोक लग गई। जब अ-सामाजिक तत्व और घर्मान्य तथा स्वार्थी लोग महसूस के हैं कि सरकार निष्पक्ष है और पुलिस अपने समस्त ससायनों के साथ दर्गों को समाप्त कले हेतु गम्भीर है, हब वे साम्प्रदायिक उनाद को तुस्त कम करने लगते हैं। इससे गैर साम्दायिक कानून का क्रियान्वयन करने वाली एजेन्सियों को श्रोत्माहन मिला है। मुम्बई, अहमदाबाद, भिवन्डी और मेरठ के दगगों तथा पंजाब में अमृतसर, जलन्धर और लुधियाना की हिंसा के >तुभव दशते हैं कि साम्प्रदायिक रग में रगे अधिकारी साम्मदायिक स्थिति को बदतर बना देते हैं। त्रीक़रे, मीडिया की भूमिका साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती | समाचार पत्र आग में थी डालने का या आग को बुझाने का काम कर सकते हैं। पय और घृणा का वातावरण सुधर सकता है यदि प्रेस, रेडियो, दीदी घटनाओं को जानकारी लोगों की दुखती रगों को दुखाने को *+ सान्तवता और शान्ति का वातावरण देने में मदद करे। मीडिया सजीदा ढंग से घटनाओं की रिपोर्ट दे सकता है और अफवाहों का खण्डन कर सकता । विभिन धर्मों के मारे गए या नल हुए व्यक्तियों की सही सख्या को रिपोर्ट देने में मीडिया धैर्य व सावधानी से काम ले सकता है। अत्त में, सत्ताघाती सरकार को कहर साम्थदायिक अयोग्य के साथ तुरन्त लक्ष्य मानकर कदम उठाना चाहिए और शात्लि में. जंग करने के उनके प्रयासों को तोड़ देना चाहिए। कश्मीर में अलगाववादी, पगाद उ्मवादी, केरल में आईएमएस (58) (अब निषिद) तथा हिन्दू, मुसलमान, सिख _दायिकता से सम्बद्ध अन्य कइरवादी संगठवों के साथ राज्य को कानून तथा अन्य र्ध्म 255 ससाधनों द्वारा सख्ती के साथ निपटना है। छोटे असुरक्षित समुदाय सदैव सुरक्षा के लिए या वो सरकार या साम्मदायिक पार्टियों की ओर देखते हैं। कश्मीर के पण्डित, मुम्बई, उत्तर प्रदेश, गुनत व अन्य राज्यों के बेकसूर दाग पौडित लोग तथा बिहार और असम के कट्टरवादियों को हिंसा से पीडित लोग जान माल की सुरक्षा के लिए पर्मनिरपेक्ष भारत की ओर आख लगाए रखते हैं। 980 तथा 990 के दो दशक के साम्प्रदायिकवाद ने धर्मनिरपेक्ष गज्य पर यह जिम्मेदायों स्पष्ट रूप से डाल दी है कि यह साम्प्रदायिक तत्वों का सामना को जिनका मृत्यु के सोदागर के रूप में उदय हुआ है । आज साम्प्रदायिकता आगे की ओर अग्रसरित हो रहो है और घर्मनिरपेक्षता पीछे की ओर जा रही है और राज्य अपने बचाव की ओर। ब्लु स्टार ऑपरेशन पश्चात अवधि में राज्य बचाव कौ ओर था, शाहबानें प्रकरण में पीछे की ओर, वधा 992 में अयोध्या में मन्दिर मस्जिद प्रकरण पर नवम्बर 993 में हजरत बल तथा कश्मीर में मई 995 में चशरे शणफ प्रकरण में घेरे में आ गई थी। इन सभी स्थितियों में सिख, मुसलमान व हिन्दू साम्प्रदायिक अपने-अपने बचाव में लगे थे। भारत सरकार को हिन्दू, मुस्लिम, सिख साम्मदायिकता से राजनैतिक व बैचारिक दोनों स्तरों पर लघु अवधि व लम्बी अवधि के उपायों के साथ सामना करना है। चुनावों और सावंजनिक मामलों में भी सरकार धर्म आधारित राजनीति के उदय का सामना एक मुख्य कारण के रूप में कर रही है, यद्यपि गत पांच या छ वर्षों में अनेक गाज्यों में चुनाव परिणामों ने सिद्ध कर दिया है कि लोगों ने ऐसी राजदीति को ठुकरा दिया है। यदि शाम्मरदायिकता के उठते हुए ज्वार को पीछे न धकेला गया तो यह पूरे देश को बहा ले जायेगा। स्वतृत्रता से पूर्व, यह कहना सरल था कि साम्प्रदायिक हिंसा अंग्रेजों के 'बॉये और शज्य करो' का फल था लेकिन अब सत्य जटिल हो गया है। पर्म का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है। जब तक सभी धार्मिक समुदाय अपने को एक राष्ट्र का अग नहीं मानते, साम्प्रदायिक दुर्भावनगा को गेकवा कठिन होगा। वह देश जिसे अपनी धर्मनिरपेक्ष नीतियों पर गर्व है उसे उन राजनोतिज्ञों से सतर्क रहना है जो अपने ही धार्मिक समुद्याय के लोगों की बात करते हैं। राज्य को उन नौकरशाहों को उद्पाटित करना तथा उन्हें अलग थलग कर देना है जो धर्मनिरपेक्षता को सैद्धान्तिक सम्भावना मानते हैं। पुलिस भी साम्प्रदायिकता के प्रकरण को इस प्रकार से पनपने नहीं दे सकती जिस प्रकार से यह प्रकण अब तक पनपता रहा है! साम्प्रदायिक मानसिकता के रजनतिज्ञों को रोकना उन्हें चुनाव लड़ने से रोकना, धर्मान्यों धर्म विगेधी भावनाओं को भडकाने के लिए अ्रतिरोधिक दण्ड देना, पुलिस विभाग को राजनीतिज्ञों के नियत्रण से बाहर रखना, पुलिस खुफिया तत्र को बलवान बनाना, पुलिस अशासन को अधिक सवदेनशील बनाना, पुलिस अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर पुन काम कर्ना, उन्हें धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाने के योग्य बनाना, और उन्हें अपनो असफलताओं के लिये उत्तरदायी ठहणना, आदि कुछ उपाय साखदायिक दर्गों की समस्या को सुलझते में प्रधावों सिद्ध हो सकते हैं। कुशल पुलिस पगठन, जागहक पुलिसकर्मी, सुसज्जित एवं विशेष प्रशिक्षण आप्त पुलिस निश्चय ही भैकाणत्क परिणाम देंगे। सरकार को भी भेदभाव और बचना भाव को समाप्त करने के लिए कदम उठाने चाहिए जो कि वास्तव में है ही नहीं। 978 की मोरारजी देसाई के प्रधानमत्रित्व काल में 256 र्ष्म - केद्ध और राज्य सरकाएं द्वार तथा सविधान में उल्लिखित अल्पसख्यकों के हितों के लिए सरचनाओं को कार्यत्रणाली का मूल्याकन करना। 7 अल्प सख्यकों से सम्बन्धित कानूनों के पालन करने के अत्यधिक प्रभावी वरीकों वी सिफारिश करना। - विशेष शिकायतों को देखना। 7 अल्प सख्यकों के विरुद्ध भेदभाव से बचने के प्रश्न पर अध्ययन एवं शोध कर्ा। 77 ैल्प सख्यकें के अ्रति केद्र व राज्य सरकारों की नीतियों का पुनर्मूल्‍्याकन। केद्र व राज्य सरकापों द्वार किये जाने वाले कानूनी व कल्याण उपाय सुझाना । +.. मैंस सद्यकों की दशाओं के सम्बन्ध में सूचनाओं के लिए राष्ट्रीय सूचना केद्र के रूप में काम करमा। आयोग की दशा ऐसी थी कि कोई भी इसे गम्भीरता पूर्वक नही लेता था क्योंकि केद्रौय तथा राज्य सरकारें दोनों ले इसके सुझावों को मानने के लिए बाध्य नहीं थे। वर प्रतिशत हैं। अदीकात्मक भाव दर्शाना काफ़ी नही होगा। यह आवश्यक है कि रोजगार, साक्षता, तथा प्रत्येक क्षेत्र में उनके लिए यथेष्ट अदिनिधित्व दिलाने सम्बन्धित मामलों में धार्मिक अत्प उप मे की वास्तविक समस्याओं को देखा जाए। अल्प सख्यक समुदायों के विकास तथा सकी जन निशधवस्ता तथा बेरेजगाती दूर कले के लिए प्रयल करने की आवश्यकता है। धर्मनिरपेक्ष सरचनाओं को रन सुरक्षा अदान की जानी चाहिए। उन पार्मिक सेवाओं पर भादी हमले किए जाने चाहिए जो साम्प्रदायिकता को बढावा देती हैं। समरदायों बीच सन्देह को मिटाया जाना चाहिए। आज देश को समान नागरिक सहिता वी किसी... किसी विशेष हा के लिए विशेष कानूव नहीं होने चाहिए और न ही र््म 257 जाना है। जनमत एवं जन जामृति लाने की आवश्यकता है ताकि धर्मनिप्पेक्ष मूल्य सही प्रकार चलें। इन उपायों के साथ ही अन्य उपाय जो सरकार द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा पर नियत्रण के लिए करने चाहिए वे हैं. 6) दगा सवेदी क्षेत्रों में धर्मनिर्पेक्ष विचारों के पुलिस अधिकारियों की तैनावी, (2) साम्प्रदायिक अपराधों से सम्बन्धित मुकदमे चलाने के लिए विशेष अदालतों का मठन, () साम्मदायिक दरगों से पीडितों के पुनर्वास के लिए सहायता एव आर्थिक मदद तुरन्त उपलब्ध कराई जानी चाहिए। (4) उन लोगों के विरुद्ध कठोर कदम उठाए जायें जो साम्प्रदायिक तनाव उकसाते हैं या उसमें भाग लेते हैं। इस प्रकार साम्प्रदायिक तनाव कम कलने तथा साम्मदायिक सदभाव बनाये रखने के लिए बहु आयामी उपायों की आवश्यकता है। हमें न केवल धार्मिक साम्मदायिकता से लडना है बल्कि राजनैतिक साम्प्रदायिकता को भी रोकना है जो अधिक गम्भीर और खतरनाक है। भारत में बड़ो सख्या में मुसलमानों और सिद्ों को साम्रदायिकता से कोई लगाव नहीं है और यह बात अधिकवर हिन्दू लोगों की भावनाओं के विषय में भी सही है। मुस्लिम और सिख समुदायों के सदस्य इस बात से आश्वस्त हैं कि बढता सम्प्रदायवाद रुक सकता है, यदि ग़जनोतिज्ञों को अपने स्वार्थों के लिए लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड करने से गेका जा सके। आम मुसलमान परे-धीरे साजनीतिजें के शोषक इशदों से परिचित होता जा रहा । धार्मिक नारेबाजी अब उन्हें अधिक प्रभावित नहीं करती। अब उसे आर्थिक राहत के लिए मो के पार से सहायता की इच्छा नही है। वह यहाँ कही अधिक सुरक्षित महसूस करता । यदि मुस्लिम व अन्य अल्पसख्यकों को स्वठत्र भारत के समराव नागरिक होने की अपेक्षा चुनाव के समय में मूल्यवान खरीदफरोक्त की वस्तु के रूप में समझे जाने के लिए किया जाता है तो उन्हें श्र के लिए महान अयलों में भाग लेने के लिए कभी भी प्रोत्माहित नही किया जा सकता । समाज वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों को साम्प्रदायिकता की राष्ट्रीय बुगाई तथा ऐसे ही अन्य मामलों, जैरो धार्षिक हिंसा, अलगाववाद, पृथकवावाद और अतकवाद को गेकने, में भम्भीर रुचि दिखानी होगी। घम निरपेक्षतावाद और धर्म िपपेक्षीकरण (६९८४ो३म5॥ भा 5९ए०ा/|श75बणा) धर्म निरपेक्षवाद ऐसी विचारधारा/विश्वाप्त है जिसके आधार पर धर्म और धर्म सम्बन्धी को इह लोक सम्बन्धी मामलों से जानबूझकर दूर रखा जाना चाहिए। यह तटस्थता की बात है। पीटर बर्गर के अनुसाए धर्मनिरपेक्षीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वार समाज व सस्कृति के विभागों को धार्मिक एव प्रतीकों पर प्रभाव से दूर रखा जाता है। आपुनिक जीवन को एक विशेषता यह है कि यह ऐैर धर्म-निर्पेक्षीकरण की प्रक्रिया को विशेषता दर्शाता है, जैसे घटनाओं और व्यवहार की व्याख्या कले के लिये अब अन्यविश्वा्सों का सहाश कम लिया जाता है। जिस प्रकार आज ससार को देखा जाता ऐ वह मध्ययुगीर व घाचीड जगत से घिल है जिसमें यट समझा जाता था कि “ईश्वा सर्व कितिमान है", या कि “प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आत्माओं का हस्तक्षेप होता है” या कि 258 ़्ं “व्यक्ति के जीवन में जो कुछ होता है वह पूर्व निर्धारित होता है।” आज, रहस्य और अचम्भों में विश्वास कम हो गया है यद्यपि पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ है। वर्क की विजय मिथक और कहानियों की कौमत पर हुई है। यहो धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया है। बेबर धर्मनिरपेक्षीकरण को तर्क सगतीकरण की एक प्रक्रिया मानते हैं। प्रदत्त सध्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त सिद्धान्त हैं जो वैज्ञानिक विचारों पर आधारित है, अर्थात्‌ जे तर्क सगत है। इस विचार ने धर्म का महत्व कम कर दिया है। डार्विन, फ्रायड और मार्क ' मानव व्यवहार की धार्मिक व्याख्या के स्थान पर वैज्ञानिक व्याख्या में प्रमुख योगदावा रे । धर्म पर आधुनिकता का कया प्रभाव पडा है 2? बर्गर इस विचार के हैं कि बढ़ी हुई सामाजिक एव भौगोलिक गतिशोलता तथा आधुनिक सचार व्यवस्था के विकास ने व्यक्ति को घार्मिक प्रभावों की विविधता के समक्ष असहाय बना दिया है। इसलिए उन्होंने एक दूपो के धार्मिक विश्वाप्तों को सहन करना सीख लिया है। इसलिए लोग अब नये विचाएं और नये पश्तिक्ष्यों कौ सस्कृति की खोज के लिए स्वतत्रवा का अनुभव करते हैं। भारत में भी हम देखते हैं कि शिक्षित एव आधुनिकता कौ ओर उन्मुख मुसलमान धर्मोन्‍्मुख प्रतिमा ने परिवर्तन के लिए खोज करना शुरु कर दिया है, जैसे तलाकशुदा पतियों के लिए गुजारा भरे की माँग (जो कि धर्म द्वारा मान्य नहीं है), बच्चों का गोद लेना, स्लियों को अपने पतियों को तलाक देने के लिए अधिक उदार नियमों को माँग, बहुपली विवाह पर प्रतिबन्ध, आदि। हिनू भी ल्लियों पर धार्मिक प्रतिबन्धों, अन्र्जातीय विवाह पर प्रतिबन्ध, वलाक व विधवा पुनर्विवाह पर अतिबन्ध तथा सती प्रथा आदि को स्वीकार नहीं करते। लोग अपने अनुभवों का अर्थ दूढते हैं। वास्तव में, गैर धार्मिक दर्शन भी अस्तित्व की सार्थक व्याख्या देते हैं। यदि भारत में धर्मनिर्पेक्षीकरण का विश्लेषण किया जाये तो यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज अधिक धर्मनिपपेक्न हो गया है लेकिन दर्शाने में जटिल है। मोटेवौर पर धर्मनिरपेक्षीकरण को धारणा बताती है कि अनेक धार्मिक मूल्य बदल गए हैं, कई प्रधाए समाप्त हो गई हैं, और विज्ञान तथा तर्क सगतता को महत्ता बढ़ गई है (माइक ओ डोनेत, 997 532-33)। यह सही है कि समाज के सास्कृतिक और सस्थात्मक नीव में मौलिक और तीब्र होना चाहिए। विवाह, परिवार, जाति और कई सस्थाओं पर धर्म का अपा३ कम होता दिखाई दे रहा है, लेकिन यह भरी सत्य है कि धर्म की ताकत जारी है ! पर्म सथतों पर जाने में, तीर्थयात्रा पर जाने में, धार्मिक उपवास करने में और घार्मिक त्योंहार मनाने में लोगों कौ अभिरूचि में परिवर्तन हो सकता है, सिविल विवाह में वृद्धि हो सकदी है, यहा दर कि सक्रिय धार्मिक लोगों की सख्या में कमी हो सकती है, लेकिन धार्मिक प्रयाओं में की टिन्दुओं में धर्मनिरपेक्षता की प्रक्रिया की ओर आवश्यक रूप से सकेत नहीं कएती। मिल अभी भी धार्मिक प्रतिबन्धों को जाये रखे हुए हैं। सस्थात्मक धर्म की अपेक्षा व्यक्तिगत अर्थ और पूर्वि के माध्यम के रूप में धर्म पूरे उत्साह और शक्ति के साथ जीवित है। अं धर्मनिसपेक्षीकरण की घारणा औपचारिक धर्म को अपेक्षा व्यक्तिगत धर्म पर कम लागू है। इसमें आश्चर्य नहीं कि डेविड मार्टिन जैसे विद्वान यह मानते हैं कि धर्मनिरपेक्षीकर्स शब्द इतना बोझिल है कि यह शब्द प्रयोग में नही लाया जाये (माइक ओ डोनेल,97' 538) यहा उदारवाद और कट्टराद के बीच सम्भावित संघर्ष को सन्दर्भित किया जाता परम 259 चाहिए। उदारवाद समूहों (धार्मिक) के बौच अन्तर की परस्पर सहिष्णुता पर आधारित है, अर्थात्‌ यह बहुवादी है। कट्टरवाद ([07त्रा॥८४(अ५5थ) उदासवाद के विरेध से सम्बद्ध रे और कभौ-कभो बहुलवाद (.9079॥57) की हिंसात्मक अभिवृत्ति की ओर सकेत करता है। पाकिस्तान, सऊदी अरब, ईग़न आदि देश कट्टरवादी अधिक माने जाते है। भूमण्डलीय सन्दर्भ में लागू करने पर धर्मनिरपेक्षीकरण की धारणा के सम्बन्ध में उदारवाद और कट्टसवाद के बीच अन्तर सार्थक है। जब पश्चिमी समाज धर्मनि्पेक्ष हो गया है (वर्व के अधिकारों में कमी आने के अर्थ में), कई मुस्लिम देशों में इस्लामिक कानून ही नागरिक व धार्मिक जीवन को संचालित करते हैं। एक दो वर्ष पूर्व (नवाब शरीफ के कार्यकाल में) पाकिस्तान ने भी इसी विचारधाग को स्वीकार किया था जिसके कारण इसे धार्मिक राज्य कहा गया था। परन्तु भारत ऐसा देशा है जहा धार्मिक, सामाजिक, सास्कृतिक एवं यहा तक कि राजनैतिक बहुलवाद भो मौजूद है। भारत के मुसलमान जो इस्लामी परायग़ओं का निर्वाह जारी रखे हुए हें कष्टवादी ही बने हुए हैं जो उन्हें आधुनिकता स्वीकार करने से रोकती है। हिन्दुओं की न संख्या के लिए उदार्वाद आधुनिक हिन्दू समाज के विकास के साथ चलने वाला । आतीय सन्दर्भ में धर्मनिस्पेक्षवाद ने धार्मिक समुदायों के रक्षक के रुप में व उनके सपर्षों में मध्यस्थ को भूमिका निभाने के सदर्भ में राज्य शक्ति को बढ़ा दिया है। यह राज्य द्वार किसी विशेष धर्म को सरक्षण प्रदान करने को रेकता है। वास्तव मैं, 'धर्मनिष्पेक्ष' धारणा का प्रयोग सर्वप्रथम यूरोप में प्रयोग किया गया था जहा हर प्रकार की सम्पत्ति पर चर्च का ही नियत्रण था और चर्च की सहमति के बिना कोई भी प्रयोग नहीं कर सकता था। कुछ बुद्धिजीवियों ने इस प्रथा के विरुद आवाज उठाई | इन व्यक्तियों को धर्मनिरपेष्ठ कहा जाने लगा जिसका अर्थ था चर्च से पृथक या “चर्च के विरुद्ध/। पारत में यह शब्द आजादी के बाद अनेक सन्द्भों में प्रयोग किया जाने लगा। देश के विभाजन के बाद ग़जनीतिज्ञ अल्पसख्यक समुदायों को, विशेष रूप से मुसलमानों को आश्वासन दिलाना चाहते थे कि उनके स्लाथ किसी प्रकार का भेदभाव नही किया जायेगा। अत नये सविधान में प्रावधान किया गया कि भारत धर्मनिरपेक्ष बना रहेगा, जिसका अर्थ था (०) भ्त्येक नागरिक को अपने धर्म का उपदेश देने और पालन करने की पूर्ण स्वतत्रता होगी, (0) ग़्ज्य का कोई धर्म नहीं होगा, और (०) सभी नागरिक अपने धार्मिक विश्वास के भेदभाव के बिना समान होंगे। इस प्रकार विरोधियों को भी वही अधिकार दिये गये जो अनुयायियों को थे। यह दर्शाता है कि एक घर्मनिरपेक्ष समाज था राज्य अधार्मिक समाज नहीं है। धर्म मौजूद रहते हैं, उसके अनुयायी अपने, धर्म पुस्तकों, में प्रतिष्ठित सिद्धान्तों और प्रधाओं को मानते हैं और कोई भी बाह्य एजेन्सी, राज्य सहित, वैधानिक धार्मिक कृत्यों में हस्तक्षेप नहीं कएही। दूसरे शब्दों में, पर्मनिरपेक्ष समाज के दो अभिन्‍न तत्व हैं; (3) पर्म और राज्य की सम्पूर्ण रूप से पृधकता, और (७) सभी धर्मों के अनुयायियों को पूर्ण स्वृततरता और साथ ही नास्तिक और अनीश्वस्वादियों को भी अपने-अपने विश्वास को मानने को स्वात्रदा। पर्मनिर्षेक्ष समाज में विभिन्न घार्मिक समुदायों के नेताओं और अशुयागियों से अपेक्षा की जाती है कि वे राजनैतिक लाभ के लिए घर्म का प्रयोग न करें। पस्तु व्यवहार में 260 र्घ्म हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई और अन्य धर्मावलम्बो, ग्जनैदिक उद्देश्यों के लिए राजनीति का प्रयोग करते हैं। कई राजनैतिक पार्टियों को गैर-धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है। दिसम्बर 992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद सरचना के ढाहे जाने के बाद (एस आरबोम्मई केस के नाम से ज्ञाव) एक मामला भाजपा नीत सरकार को अपदस्थ करने के लिए अदालव में दर्ज काया गया था। नौ न्यायाधीशों की छण्डपीठ ने 'सेक्यूलरिज्म' शब्द पर विचार किया और विर्घाई निकाला कि यद्यपि यह शब्द सविधान में वर्णित है, लेकिन इसे बडी चतुराई से अपरिभाषि छोड दिया गया था क्योंकि इसमें सूक्ष्म परिभाषा करने की क्षमता नहीं थी। सविधान में “धर्मनिरपेक्षता' शब्द सभी थर्मों को समानता की गासन्टी देता है और राज्य द्वाग इस कमूत का क्रियान्वयन किया जाना था। इस प्रकार कानूनी विचार से भाजपा को अपदस्थ कले का तर्क स्वीकार नहीं किया गया। इसमें आश्चर्य नहीं कि कुछ लोग कहते हैं कि एस आए बोम्मई मामले में उच्चतम न्यायालय की मान्यता थी कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अन्त 'हिन्दुत्व' की अपील स्वीकृत हो गई। अन्य दलों के धर्म पर प्रविबन्‍्ध लगा दिया। इस प्रकार यह कह जा सकता है कि राजनैतिक दलों के लिए घर्मनिरपेक्षता का अर्थ मुस्लिम, पिछडी जातियों, ता अनुसूचित जातियों व जनजातियों के वोट बैंक का बनाना था। मई 99 में लोकसभा चुनावों तथा अक्टूबर 996 में उत्तर प्रदेश की विधान सभा चुनावों में और फिर फरवरी 998 तथा सितम्बर 999 में ससदीय चुनावों में जब केन्र में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आयी, स्वार्थी राजमैदिक दलों ने भाजपा को मिलकर साम्प्रदायिक पार्टी कहा। साम्प्रदायिकता के विरुद्ध यह शोर केवल वोट तथा एजनैतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए था। अप्रैल 999 मे 3 पार्टियों का केद्ध में गठबन्धन तथा भाजपा नौत सरकार को पराजित करने के लिए अनेक राजनैतिक दलों का एक साथ मिलता किसी आम सहमति वाले न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर आधारित नही था बल्कि केवल एक हो तथाकथित 'हिन्दू पार्टी” को सरकार बनाने से रोकना मार था और यह पार्टी अक्टूबर 99 में फिर शक्ति में आ गयी। इस अकार साम्मदायिकता न तो राजनैतिक दर्शन ही है न विचारधारा और न ही सिद्धान। यह तो भारतोय समाज पर राजनैतिक उद्देश्यों के लिए थोष दिया गया है। साम्मदायिकता के पत्ते अब केवल राजनीति प्रेरित होकर खेले जा रहे हैं। साम्मदायिकता न केवल राष्ट्रीय विखण्डन रोकने के लिए जीवित रखा जा रहा है बल्कि इसलिए कि अल्पसख्यक बोट बड़े भाग्तीय परिदृश्य में समाहित न हो जायें। यहा तक कि दे राजनेता जो ईमानदार माने जाते हैं, विषद रूप मे जातिवाद फैलाते हें और विदेधी राजनेताओं मो साम्यदायिक बतते हैं। इस प्रकार शक्ति प्राप्त करने वाले अपने पापों को छिपाने के लिए साम्पदाभ्रिकता का सहाग लेते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि लोग धर्म के आधार पर धुवीकृद बने रहें और भारत साम्प्रदायिक बना रहे । निर्भय स्लिंह 0994 ]) ने मादा है कि भारत में दबाव का सकट कट्टपथियों और राजनीतिजों 32 0282 धर्म के राजनीतिकरण और धर्मनिरपेक्षोकरण के कारण है। इस प्रवृत्ति अल्पसख्यकों को भारतोय समाज को मुख्य घाप से अलग कर दिया है। इस अर्थ में पर्मनिस्ेक्षवाद की प्रक्रिया हो भारद के बहुधर्मी चरित्र के लिए चुनौती है। इसने धार्मिक मूल्यों के अवमूल्यन की अ्रक्रिया प्रारम्भ वर दो है। आज आवश्यकता इस बात की है कि र्ध्म हा अन्य धर्मों और विश्वार्ों के प्रति अन्र्दष्टि और खुलेपप को आवश्यकता है। अन्य विश्वासों की प्रशसा का अर्थ है उनको स्वतत्रता की गारण्टी देना। इस अर्थ में धार्मिक विश्वास की आजादी धर्म के बहुरूप को मानना है। चर्मनिषेक्ष समान भे धर्म (रलाझ्णा 47 50०लांगा 50569) धर्मनिरपेक्ष समाज में धर्म कैसे सार्थक है ? धर्म मनुष्य और समाज के मामलों में महत्वपूर्ण था और महत्वपूर्ण भूमिका निभाए जा रहा है। एससी दुबे (9904 79-80) ने धर्म के नौ कार्य बताये हैं. [) य्याख्यात्मक (०८० )) कार्य रहस्यों के प्रति क्यों, क्या आदि की व्याख्या से सम्बन्धित (॥) एकीकृत (/८४ज५्८) कार्य (अनिश्चितता में समर्थन तथा असफलता और कुण्ठा में सान्तवना प्रदान करते हैं), (8) पहचान सम्बन्धी (02000) कार्य (पुरक्षा और पहचान के लिए श्रेष्ठ सम्बन्ध बनाए. रखने के लिए आधार प्रदान करना) (४४) अमाणित करने (५४॥08॥08) का कार्य (सभी मूलभूत सस्थाओं को शक्तिशाली मान्यता तथा नैतिक औचित्य भ्रदान करमा) (४) नियत्रण कार्य (विचलत के विविध स्वरूपों पर अकुश लगाना) (५) अभिव्यक्ति (८॥८४॥४८) का कार्य (दुखदायी कारकों के सन्तुष्टि के कार्य का), (शव) भविष्यवाणी का कार्य (स्थापित स्थितियों के विरुद्ध विशेध प्रदर्शन में), (ण॥) परिपक्वदा का कार्य (अधिकारों की रक्षा करके व्यक्ति के जीवन इतिहास्न में सकटपूर्ण स्थिति में मान्यता प्रदान करना), और (०७ इच्छा पूर्ति (आब्क छिधतीए्थ्या) का कार्य (आन्‍्तरिक एव बाह्य दोनों ही प्रकार की इच्छाओं कौ)। जैसे-जैसे वैज्ञाचिक शान और प्रविधि का क्षेत्र विस्तृत होता है, धर्म का क्षेत्र सकुचित होता जाद्ा है। इसके कुछ कार्य अन्य एजेन्सियों द्वार ले लिए जाते हैं। दुबे 994 80) का मानना है कि सरल समाजों में, जिन्हें व्यवहारिक वे अनुभवात्मक ज्ञान कम होता है, इसके प्रभाव का छेत्र अधिक होता है। प्रोद्योगिको अर्थ में कम विकसित समाज में सामारिक उपलब्धियों के लिए अव्ि प्राकृतिक शक्तियों का बडे पैमाने पर प्रसन्‍न करने के लिए संस्कार एव प्रतैकात्मक कार्य किए जाते है। आधुनिक औद्योगिक समाजों में धार्मिक विश्वासों कौ प्रकड ढीली पड़ जाती है, यद्यपि धर्म में रुचि बनी रहती है। यह सामूहिक तथा साम्प्रदायिक मामला न होकर व्यॉक्तगत रहता है। धर्म निरपेक्षोकरण/तर्क सगवीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है जिसके कारण धर्म विविध सामाजिक क्रियाकलापों पर नियत्रण खो देवा है, जैसे आर्थिक, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, आदि। धर्म के कई पास्परिक कार्यों की देखभाल धर्मनिर्पेक्ष सस्थाएं करने लगती हैं। एक समग्र धार्मिक सासारिक दृष्टिकोण जिसमें क्रियाकलापें का समस्त ढोंचा धर्म उन्मुख होता है, उसमें पूर्ण रूप से परिवर्तन हो जाता है। लेकिन धर्मनिए्पेक्षता हर समाज में भिन होदी है। शायद भारत विविध सस्थाओं को विदृप्तित करे में असफल रहा है जो धर्म के परम्परागत कार्यों को अपना सकें। इस कारण यह भाम्पदायिक हो रहा है औए धार्मिक विश्वास जाए हैं। समस्याओं वो बडे गट्टीय पश्िक्ष्य वी अपेक्षा सकर्ण और साम्प्रदायिक दृष्टि से देखा जाता है। धर्मोन्मुखता, कार्य और धन के भ्रति दृष्टिकोण निर्धारित करती है और ऐसी नैतिकता के उदय में बापक है जो प्रगति में सहायक है। वास्तव में, कोई भी समाज पूर्ण रूपेण धर्मनिरपेक्ष मही है और न हो सभी मूल धार्मिक मूल्य व सास्कृतिकपरकता को सुरक्षित रखा गया है तथापि धर्म परिवर्धनशील 262 रद आचार तल्वों के साथ समायोजन करने का अयल कर रहा है। यह बात न केवल हिन्दू धर्म के लिए सत्य है बल्कि मुस्लिम, सिख और जैन धर्मों के लिए भी। दुवे (9 : 8) के भी विचार है कि भारत में सभी धर्मों न परिस्थितिपरक समझौते किए हैं। कोई भी धर्म अस़े पूल स्वरूप को कायम नहीं रख पाया है लेकिन सभी ने आवश्यक समायोजन विर है। धर्मनिरपेश्त और आधुनिक समाज धर्म के विरुद्ध नहीं है। इस आधार पर भास में एम आपुनिकौकरण के विरुद्ध नहीं है। अनेक लोग सकर में भी धर्म का सहाय लेते रहेंगे और धर्म सक्टापन आपातों के समय समर्थन और विश्वास प्रदान करता है। इस ग्रकर हफ़रे देश में अलग अलग धार्मिक पहचान मान्य रहेगी जब तक वे बडे राष्ट्रीय हितों की वैधदा को चुनौती नहीं देते है। उन पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता यदि वे राष्ट्र एकता में योगदान करते हैं। 9 जनजातीय समाज (प्रक्ठण 50०थंट)) भाख में जनजातीय समुदाय : संख्या एवं विवरण (फ़रा्बा एग्राप्रष्मा॥65 गा एढ04 : डकशाह्ा आएं छजताी)आ[07) 99] को जनगणना के अनुसार घारत में आदिवासियों की सख्या 6758 करोड थी। यह इगलैंड कौ जनसंख्या के लगभग बग़बा ही थी। (/फुफ/ह 7०, कबाव, 998: 34) जनजाति जनसख्या देश की कुल आबादी की 808 प्रतिशत थी। जनजाति जनसख्या अफ्रीका के बाद भारत में द्वितीय स्थान पर है। भारत में जनजातियों समूचे देश में फैली हैं। अला-अलग राज्यों में उनको सख्या कुछ सौ से लेकर लाखों में है। 99॥ की जनगणना के अनुसार सबसे अधिक आदिवासी मध्य प्रदेश में (54 करोड) हैं। और उसके बाद महाराद्र 073 करोड), उडीसा (0.70 क्रेड), विहार (066 कंग्रेड), और गुजरात में (06॥ कयेड) हैं (॥/2/90%८० 7१26, 464:७, 998 35) देश की कुल जनसख्या के वीन पाँचवे भाग से कुछ अधिक 62 75%) आदिवासी पाँच राब्यों में पाए जाते हैं। मिजोसम में रज्य की ६9 जनसख्या के 95 प्रतिशत जनजाति के लोग हैं, मागालैण्ड में 89 प्रतिशत, मेघालय और अरुणाचल देश में अत्येक में 80 अ्रतिशव, त्रिपुरा में 70 प्रतिशत, मध्यप्रदेश और उदप्ना में प्रत्येक में 23 प्रतिशत, राजस्थान में 2 प्रतिशत, और अराम और बिहार पत्येक में 70 प्रतिशत । इस प्रकार 4 सज्यों में जनजाति जनसख्या राज्यों कौ कुल जनसख्या का 80 प्रतिशत हैं। सख्या में सर्वाधिक गोंड (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आन्द प्रदेश में) लगभग 40 लाख और भोल (राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश) लगभग 40 लाख हैं। सबसे कम सख्या वाली जनजाति अण्डमानी केवल 79 हैं। जनजातियों का अधिकतर हिस्सा स्वयं को हिन्दू मानता है। धर्म से 89 प्रतिशत हिन्दू, 55 प्रतिशत ईसाई, 03 प्रतिशत बौद्ध, 02 प्रतिशत मुसलयात, और 5 प्रतिशत अन्य हैं। वे सभी जो स्वय को हिन्दू मानते हैं पूर्णल्‍्पेण हिन्दू तामाजिक व्यवस्था को स्वीकार नही करते हैं। इस सन्दर्भ भें जनजाति जनों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है. (॥) जो हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में ढल गए हैं, अर्थात्‌ जाति साचना को मान लिया है, जैसे भील, भूमिज, आदि (2) जो हिन्दू सामाजिक अवस्था की ओर स्वीवाग्रत्मक भाव से झुके हुए हैं, अर्थात यद्यपि उन्होंने हिन्दुओं के आचार पे (८॥०), प्रतीकों (599०७), ओर सासारिक दृष्टिकोण (४6-८७) को घारण कर लिया है लेकिन उन्होंने स्वथ को जाति ढाचे में शामिल नहीं किया है, जैसे सन्याल, ओग़ब, गोंड। 0) हिन्दू सामाजिक व्यवस्था की ओर नकारात्मक झुकाव वाले, जैसे मिजो, रह जनजातीय समाज नागा। (६) हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के प्रति उदासीन, जैसे उत्तरी-पूर्वो कषेत्र (घ्ा9) की जनजातियाँ | भौगोलिक वितरण की दृष्टि से एलपी विद्यार्थी (6.7 जकगाफा, ॥0557 5० 7 कल्त्क्षाका ०5००७ क्ाब 47//727०/०७५, ४०| गा, 972 , 32) ने जनजादीय लोगों को चार क्षेत्रों में बाँटा है (3) हिमालियन क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश (भोंट, गुजर, गादी), उत्तर प्रदेश का तई क्षेत्र (यार), असम (मिजो, गारे, खासी), मेघालय, नागालैण्ड (नागा), मणिपुर (माओ), और ज्िषुरा (त्रिपुरी) शामिल है और देश की कुल जनजाति भ्रख्या का ॥] प्रतिशत है। (0) मध्य भ्रातत क्षेत्र, जिसमें पश्चिम बगाल, बिद्यर (सन्यात, मुण्डा, ओगेव, और हो) उड़ीसा (दोष्ड, गोंड) शामिल है और देश की कुल जनजादीय जनसख्या का 57 अतिशत हैं, (० प्रसिचकरों ग्ररत क्षेत्र, जिसमें गजस्थान, (भौल, मोणा, गरासिया), दा, (भौल, दुबला, घोदिया) और महाराष्ट्र (भील, कोली, महादेव कोकत) शामिल हैं और भारत की कुल जनजातीय सख्या का 25 प्रतिशत है, और (9) दक्षिण श्र क्षेत्र जिसमे आन्य प्रदेश (गोण्ड, कोया, कोण्डा, दोव), कर्नाटक (नैकदा, मराती) तमिलनाइ (इरुला, टोडा) केरल (पुलयन, पनलयन) और अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह (अण्डमानी, निकोबारी) शामिल है और देश की जनजातीय जनसख्या का लगभग 7 गतिशत है। विभिन्‍न राज्यों में रहने वाले जनजाति लोग विभिन्‍न प्रजातीय (3०) समूहों से सम्बद्ध हैं, जैसे प्रोटोआस्ट्रोलाइड (770020४४०/०0) जिसमें सथाल, मुण्डा, औरैव, और भूमिज शामिल हैं। भगोलियत (0/०78०००) जिसमें गोग, आदि शामिल हैं और नौपिये। भाषाई आधार पर उन्हें तीन समूहों मे विभाजित किया जाता है; ये हैं आस्ट्रिक (40७४०) (जिसमें सन्वाल, मुण्डा, भूमिज शामिल हैं, अविड जिसमें ओराव, येडा, चैंचू शामिल हैं, और तिब्बत चोद जिसमें गागे, भूटिया, आदि शामिल हैं। इसके अलावा उन्हें आर्थिक (भोजन एक कले, शिकार करने वाले, हलवाहे, कृषि करने वाले, पशु-पालक, श्रमिक), सामाजिक और धार्मिक श्रेणियों में भी विभाजित किया जाता है। उनके विकास के स्तर और आमाजिक सास्कृतिक एकता में यद्यपि बड़ी विविधवाए मौजूद हैं लेकिन कुछ समानताए भी हैं। जनजाति के लोग समग्र रूप में प्राविधिक ((८००००४४८०॥))) व शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए हैं। यद्यपि अधिकतर जनजातिया सामाजिक संगठन की पितृवशौय व्यवस्था का अनुसरण करते हैं, फिर भी कुछ ऐसे भी है जिनमें मातृवशीय व्यवस्था चलती है (जैसे, गाणें, आदि)। नागाओं, भिजो, सन्यालों, मुण्डा, ओरओं के अच्छे अनुपात ने ईसाई धर्म अपना लिया है। कुछ लोगों को बौद्ध परिचय से भो चिन्हित किया जाता है, जैसे, भोटिया, लप्चा, आदि। जनजातीय समुदावो की विशेषताएँ (0:न्‍#लाएर कैल्गणरड त्‌ प्रंष्या (ए०्गगफ्माहल) जातीय लोग बृहत्‌ सास्कृतिक प्रावों से अपेक्षाकृत बचे रहते हैं। उनमें सापेक्ष रूप से समानता होती है तथा उनके पास पल अविधि (0:0४००६५) भी होती है। वे आत्माओं, जप भूत विद्या में विश्वास करते है। उनके अपने निषेष (5७००5) होते हैं जो उमके कुछ कार्यों को वर्जित करते है जो समुदाय, लकी व जादू के परिणामों से दण्डित होते है अधिकतर जनजातिया (ग्यप्मांडण) में विश्वास की जनजातीय समाज 265 है जिसके अनुसार सभी वस्तुओं--चेतन और जड (ग्राणाब० 200 प्रगरशादव०)--में स्थाई या अस्थाई रूप से आत्माए रहती हैं। अक्सर कोई कार्य इन आत्माओं के कारण होता है। कुछ आत्माओं की पूजा की जावी है और कुछ का आदर किया जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जीववाद जनजातियों में धर्म का प्रारम्भिक स्वरूप था। अनेक जनजातिया पूर्वजों को पूजा में भी विश्वास करती हैं। भारत में जनजातियों की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार है # प्ामन्य ग्राम प्रत्येक जाति का अपना विशिष्ट नाम होता है जिसके द्वारा उसको दूसरों से अलग पहचाना जाता है। ] रा सीमा 00४7079) जनजातियों की आमतौर पर साप्ान्य भौगोलिक सीमा होती है। *. प्म्रात्य भराण एक जनजादि के सदस्य एक ही भाषा बोलते हैं। प्रत्येक जनजाति की अपनी बोलो होती है, भले ही लिपि न भी हो। * सामान्य सस्कृति प्रत्येक जनजाति में व्यवहार के स्वछप, त्पौंहार और पूजा की पूर्तिया निर्धारित हैं। ० 7020 अत्येक जनजाति में अपने ही सदस्यों के बीच विवाह करने का प्रचलन । * गजनैतिक संगठन प्रत्येक जनजाति का अपना राजनैतिक सगठन होता है। उनके बुजुर्गों की परिषद (००४॥०/) होती है जो सदस्यों को नियत्रित रखती है। * आर्थिक सक्रियता राष्ट्रीय औसत 43 प्रतिशत के विपरीत, 57 प्रतिशत जनजातियाँ आधिक रूप से स्वयमेव सक्रिय होती हैं। काम की प्रकृति जहाँ तक काम की प्रकृति का सम्बन्ध है, 73 अतिशत के राष्ट्रीय औसत के विपशीत 9] अरविशत जनजाति के लोग कृषि में, लगभग 3 प्रतिशव निर्माण कार्य में (सामान्य जनसंख्या के (] अविशत के विपरीत), और 5 प्रतिशत नौकरी में (सामान्य जनसख्या के 6 प्रतिशत के विपशेत) और, लगभग एक प्रतिशत वानिकी और भोजन सम्रह के कार्यों में लगे हैं । जनजातीय लोगों को कुछ अन्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं उनमें से अधिकतर लोग एक्ाको भूखण्डों (5०08० (बता ०7) में रहवे हैं, उनकी जीविंका के मुख्य सोव कृषि और बन के उत्पाद हैं, वे लाभ प्राप्त के लिए खेदी नहीं करते, वे अभी भी वस्तु विनिमय (८:णाआह०) पर निर्भर रहते हैं, वे अपनी आय का अधिकतर भाष सामाजिक ओर घार्मिक समागेहों पर खर्च करते हैं, और अधिकतर सख्या में अनपढ और साहूकारों तथा असन्दिग्ध द्वाग शोषण का शिकार चोते हैं। उनवाति और जाति (पलए८ करत एड्जले जाति और जनजादि के दीच भेद करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं हैं। विस्तृत अर्थ में, ऐसा समुदाय है जिसका एक सामान्य क्षेत्र, भाषा, सस्कृति और कुछ विश्वास तथा 266 जनजातीय समा प्रथाए हों (प86०१००४०७.. 969 443) । नैडेल (४७०6०) ने जनजावि को “एक प्रगाः जिसकी भाषायी, सास्कृतिक व राजनैतिक सीमाए हो” कहा है । लेकिन ऐसे अनेक जनजातीर समाज हैं जिनमें साधारण शब्दों में सरकार और कोई केद्रीय सत्ता नही होती। इसी दर जनजाति में सास्कृतिक समानता भी भ्रामक है। धूर्ये, टी वी नाइक, बेली और वेरियर एलविन जैसे विद्वानों ने जावि और जनजाति मे भेद के लिए धर्म, भौगोलिक पृथकता, भाषा, आर्थिक पिछडापन, तथा राजनैतिक सगठन को आधार माना है। पर्म के आधार पर यह कहा जाता है कि जनजाति के लोगों का धर्म जौववाद (वग्ाआ)) है और जाति व्यवस्था वाले लोगों का धर्म हिन्दू है। हट्न (963) और बेली (960 263) का मत है कि जनजातियों के लोग हिन्दू नही हैं बल्कि जीववादो हैं। जीववाद की भ्रमुख विशेषताएँ है. सभी जड़ एव चेतन वस्तुओं में स्थाई या अस्थाई रूप से ना सरल नहीं है। राम अहूजा (965), वेरियर एलविन 0943) और रिजले (908) ने भी माना है कि जीववाद और हिन्दूवाद में अन्तर करना कृत्रिम और निरर्थक है। इस प्रकार केवल धर्म इस (बन्जात और जाति के मध्य) अन्तर का आधार नहीं हो सकता। घूरये, नाइक और बेली ने भी इस आधार को स्वीकार नही किया है। भौगोलिक (8९०हाब्ुमाट्व 7509005) के आधार के विषय में यह कहा जाता है कि जनजाति के लोग भौगोलिक दृष्टि से अलग अलग भूभागों, जैसे पहाड, जगल आदि, मे रहते है लेकिन जातिवादी हिन्दू मैदानों में रहते हैं। सभ्य पडौसियों से अलग तथा उनसे कम सम्पर्क के काएण वे हिन्दुओं की तुलना में कम सभ्य हैं। यद्यपि यह सत्य है कि ी भौगोलिक अलगाव के आधार के भी स्वीकार नही किया जा सकता। भाषा को जाति और जनजाति में भेद करने के लिए आधार मानने के सम्बन्ध में भी यह कहा जाता है कि प्रत्येक जनजाति को अपनी भाषा होती है, लेकिन जाति की महीं। लेकिन ऐसी जनजातिया जो अपनी भाषा नहीं बोलती बल्कि प्रमुख भारतीय भाषाओं में से किसी एक की बोली (4४०0) बोलती हैं, जैसा कि दक्षिण भारत में पाया जाता है। अठ भाषा को भी भेद का आधार स्वीकार नही किया जा सकता। आर्थिक भी अन्तर का सहो आधार नहीं है। यदि जनजातीय लोग पिछडे और आदिकालौन हैं तो हिन्दुओं में भी पिछडे लोग हैं। दूसरी ओर आधिक रूप से विकसित जनजातीय समाज खा जदजातियां भी हैं। बेलो (960 : 9) ने भी इसको अस्वीकार करते हुए कहा है कि समाजशासीय दृष्टिकोण से यह मानना गलत है कि आर्थिक पिछडापन “आर्थिक सामबन्धों के प्रकार को अपेक्षा 'रहन-सहन के स्तर को बताता है। उसने स्वयं उडीसा के कोल्ड (जनजाति) और उड़ीया (जाति) में अन्तर काने के लिए 'आर्थिक सरबना और राजनैतिक-आर्थिक सगठन' शब्दों का प्रयोग किया है। बेली (89्वॉ८५, 960) ने रेखाकार निस्‍न्‍तरता (एरह्क्षा 007) में दो आदर्श बिन्दुओं के रूप में जाति और जनजाति के आमने-सामने की स्थिति पर विचार करने के लिए एक व्यवस्थित अन्तर्क्रयावादी मॉडल (27-80079 7002) अस्तुत किया | उसने दो कारकों पर ध्यान केन्द्रित किया : (3) भूमि पर नियत्रण और (७) भूमि ससाधर्नों (८5००८८४) पर अधिकार। उसकी मान्यता थी कि जातिंगत तथा जनजातीय दोनों ही समराजों में हमें भू-स्वामी (8000%0०४5) और भूमिहीन लोग मिलते हैं जो भूमि ससाधनों में से अपने हिस्से के लिए भूस्वामियों पर निर्भर करते हैं। लेकिन 'गाँव की सीमा' (०66 ॥८7मो ०३) (जिसमें जाति के लोग रहते हैं) तथा वश सीमा (७9 धा्त।0)) (जिसमें जनजाति के लोग रहते हैं) के आधिक सगठन का विश्लेषण करने में उसने देखा कि गाँव श्रेणीक्रम में व्यवस्थित आर्थिक रूप से अल्तर्तिभर जातियों में विभक्त रहता है जबकि वश सीमा सद्यपि आर्थिक रूप से विशिष्ट समूहों को बनी होती है, लेकिन वह श्रेणीक्रम में व्यवस्थित नहीं होती है, न ही वे आर्थिक रूप से परस्पर निर्भर होते हैं। दूसरे शब्दों में, एक जनजादीय समाज में अधिक अनुपात में लोगों की पहुँच भूमि तक होती है जबकि जावि आधारित प्रप्ताज में भूस्वामो बहुत कम होते हैं और अधिक सख्या में लोग भूमि पर अधिकार निर्भर सम्बन्धों द्वारा प्राप्त करते हैं। इस प्रकार बेली के अनुसार जनजाति अलगाव की एकता में व्यवस्थित है जबकि जावि सुव्यवस्थित एकता में । लेकिन बेली प्रतिकूल धारणा रखते हुए कहता है कि निरन्‍दस्ता के किस बिन्दु पर जनजाति समाप्त होकर जाति प्रारम्भ होती है यह फहना कठिन है। भारत में स्थिति ऐसी हे कि शायद ही ऐसी कोई जनजाति हो जो पृथक समाज के छूप में हो तथा जिसकी अलग ग्रजनैतिक सीमा हो। आर्थिक दृष्टि से भी जनजातीय अर्थव्यवस्था क्षेत्रीय या राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से भिन्‍न नहीं है। लेकिन हम कुछ स्का को समुदाय में शामिल करते हैं और उन्हें मान्य अनुसूचित जनजाति सूची में भी रखते हैं। एचएबैनएजी ने भी 969 में बारभुम (छक्कशाणा) के कोग (07००) जनजाति जनजाति जाति सम्बन्धों के स्वरूप पर विस्तार से काम किया। एनके बोस (949) ने माना है कि जनजातियों जातिगत समाज में विद्यमान प्रमुखद कृषि व शित्प आधारित अ्व॑व्यवस्था कौ ओर खोची जा रहो हैं। एम ओरान्स (0४ 07005, 965) ने कहा है कि जर्चें हिंदुओं की उच्च अर्थव्यवस्था ने जनजातियों को जादि व्यवस्था वी बगबरी दरने के लिए खोचा है, वही राजनीतिक एकता की शक्तियों ने उन्हें हिन्दू जाति व्यवस्था से दूर किया । एलपी विद्यार्थी 0558 २८७०४, /972. 33) ने कहा है कि जनजाति समूह जाति अवस्था में जोड़ (॥%0 का कार्य करता है और कुछ मामलों में पर अत्यय (500) का े। मतवशासरीय दृष्टिकोण से भारत में जनजादिया जाति व्यवस्था में धीरे-धीरे दिलीन होती अतीद हो रही हैं। घूर्ये का मत है कि कुछ जनजातिया मैदानों के हिन्दू जातियों से भाषा, 268 जनजातीय सदाय अर्थव्यवस्था, या धर्म में अलग नही हैं। वह उन्हें पिछडे-हिन्दू मानता है। इस प्रकार,यह कह जा सकता है कि जाति व जनजाति एक सिक्के के दो पहलू हैं। जनजातीय अध्ययन (ठझ इणाल) भारत में अमुख जनजातियों पर विश्लेषणात्मक अध्ययन और विनिबध (कर6#ह्ट्टाण) 950 के बाद अनेक विद्वानों (५८ 7२०५ (मुण्डा, ओसियों, बिरहोर, खरिया), $णाध्कष उप (पूनिज), 0)४ 'भण्प्रवण (खासा) 5९ 96 (कमाए, ।.एजक॒शां (मॉँझी), 65 6#ण७ (कोली), प८ #गीपणएण०्ड्ाव्यं उष्पए्ए रण ]043 (ही), 8॥. 2०४ छणाएक्षा (मोटी, 8 5 6088 (अबोर), एद्यमंटः [7 (बैगा, मारिया) 78 पक्षा: और प्रशष्पश्ञत्त (दक्षिण भारत में जनजातिया) द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। झ अध्ययनों में जनजातीय समाज के पाँच पश्चों का अध्ययन किया गया है . 6) सामानिकि संरचना जिसमें जनजातीय विभाजन के सन्दर्भ में वश, उपवश, परिवार वशावलि, परिर, नातेदारी, विवाह, स्त्रियों की प्रस्थिति, और पचायत व्यवस्था, () जनजातीय अर्थव्यवस्था, जिसमें व्यावसायिक मरचना पर विश्ञेष रूप से बल देते हुए और जीविक के साथों में परिवर्तन के सन्दर्भ में शिकार करने से भोजन सग्रह, वन (४८७) से कृषि, भूस्वामिल, जनजातौय व गैर-जनजातीय समुदायों में आर्थिक सम्बन्ध, जनजातीय व गैर-जनजातय समुदायों में आर्थिक सम्बन्ध, जनजातीय क्षेत्रों में औद्योगीकरण के स्वरूप, बाजार वी भूमिका, औद्योगीकरण का सामाजिक मूल्य, रूियों को आर्थिक भूमिका, जनजातीय जीवन में महाजन को भूमिका, और आधिक परिवर्तन, 8) शार्मिक विश्वास और सस्कार, जादू, पु विद्या, धार्मिक आन्दोलन (बैसे भगद आन्दोलन आदि) और ईसाई मिशनरियों का प्रभाव, (0 राजनैतिक संगठन कानून और न्याय, पचायत नेतृत्व, राजनैतिक दलों का प्रभाव, मतदाव व्यवहार और राजनैतिक भागोदारी, 6) सात्कृतिक जीवन जो लोक सगीत, लोक नल, मेतों और त्योंहरों आदि का वर्णन करता है। जनजातीय शोषण एवं असतोष (धक्रण्भ छक्रौगा४0ा ४०१ एगत्हढ) युगगों से जनजातीय लोग भारतीय समाज को आदिकालीन इकाई के रूप में समझे जाते ऐ हैं। वे जगलों और पर्वतों पर तथाकथित सभ्य और विकसित पडौसियों के साथ केवल आकस्मिक सम्पर्क के साथ रहते थे। जनसख्या दबवाब न होने के कारण, उनके क्षेत्रों मे घुसपैठ के अयल नहीं हुए और न ही उन पर बाहरी मूल्यों और विश्वासों को दोपा गया। लेक्नि जब अग्रजों ने देश में अपनो स्थिति मजबूत कर ली, उनकी औपनिवेशिक (०००७७) आवाक्षाओं और प्रशासनिक आवश्यकताओं ने एक प्रभावी सचार व्यवस्था के शष्यम से समूचे देश को 'खोलना” (०क०्णणढ ७) आवश्यक हो गया। अग्रेजों उस्लामित्व व राजस्व व्यवस्था शुरू कर दी। वादिक-कर- दिगुन्य कर दिया गया जो जनबें जनजातीय समाज 269 की। इन आर्शिक तथा बाद में सामाजिक ओर सास्कृतिक शोषण ने जनजातीय नेताओं को आदिवासियों को उकसाने और आन्दोलन के लिए जागृत करने के लिए बाध्य किया । बचना की भावनाओं के साथ जन आददोलन भो बढ़ने लगे। प्रारम्भ में वे केवल उनके अधिकाएँं को हडपने वालों के विरुद्ध थे, पर अन्त में वे सरकारी शासकों के भी विरुद्ध हो गए। अत जनजातीय अशान्ति और असन्तोष अनेक कारकों का योग कहा जा सकता है। झनमें से प्रमुख कारक थे * जनजातीय शिकायतों से निपटने में नौकरशाहों और प्रशासकों की सहानुभूति में कमी, सुस्ती और उदासी। बन कामूनों व नियमों की जटिलता। पैर-जनजातीय लोगों के हाथों जनजातीय लोगों को भूमि जाने से बचाने के कानूनों की कमो। जनजातीय लोगों के पुनर्वास के सरकारी प्रयासों का प्रभावहीन होना। जनजातोय समस्याओं को सुलझाने में राजनैतिक अभिजात वर्ग में रुचि व गति की कमी । उच्च स्तरीय समितियों की सिफारिशें लागू करने में विलम्ब। सुधारात्मक उपायों को लागू करने में भेटभाव। संक्षेप में जनजातीय असतोष के कारण आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक कहे जा सकते हैं। जनवावीय समस्याएँ (709 |0ाशा5$) जनजातीय लोग निम्न प्रमुख समस्याओं का पतामना करते हैं उनके पास छोटे व अनार्थिक जमीन के टुकड़े होते है जिसके कारण क्योंकि उनकी उपज कम होती है, वे बुरी तरह ऋणग्रस्त रहते हैं। जनसख्या का एक बहुत कम अनुपात व्यावसायिक क्रियाकलापों में द्वितीय व तृतीय धेग्नें में भाग लेता है। जनजातियों में साक्षरता की दर बहुत कम है। !96! में यह जब 8 53 अतिशत थी, 99] में यह 2960 प्रतिशत तक बढ गई जो देश को साक्षस्ता दर 52 2 प्रतिशत की तुला में बहुत क्रम है। पत त्तोन दशकों थे जब साक्षण्दा विकास दर 282] प्रतिशत थी तव्‌ जनजातियों में यह केवल ] 7 अतिशत थी (#;ए+ह गए 47० 908 44] । यद्यपि जनजातीय साक्षत्ा दर मिजोरम में 8273 प्रतिशत और जागालैण्ड, सिक्किम, व केरल में 57 और 6 जविशव के भोच है, पस्तु शेष जतजादीय लोगों में साक्षरता दर में कमी एक प्रमुख विकास समस्या के रूप में चिन्हित की गई है। सब से कम आल्य अदेश में 7 6 प्रतिशत, राजस्थान में 9 44 अतिशव और मध्य प्रदेश में 2 54 प्रतिशत हे (वही 44)! जनजातीय क्षेत्रों में भूमि का एक अच्छा अनुपात कानूनी रूप से गैर जनजाति लोगों 270 जनजातीय फ़गज को स्थानान्तरित कर दिया गया है। जनजातीय लोग इस भूमि को उन्हें लौटने की माँग करते हैं। वास्तव में, पूर्व में जनजातियों ने वनों के उपयोग की आजादी दया जानवरों के शिकार करने का लाभ उठाया था। जगल उन्हें न केवल घर बनाने के लिए सामग्री प्रदान करते हैं बल्कि ईधघन, बीमारियों, का इलाज करने के लिए जी बूटिया, फल एवं शिकार आदि भी प्रदान करते हैं। उनके धर्म के अनुसार पेडों और जालों में अनेक आत्माएँ बसती है। उनकी लोक गाथाएँ मानव और आत्माओं के सम्बन्धों के विषय में उन्हें बताती हैं। जगलों से ऐसे भौतिक एवं भावनात्मक मेह के कारण जनजातीय लोगों ने सरकार द्वारा उनके परम्परात्मक अभिकारों के हनन के विदोध में तीत्र प्रतिक्रिया का प्रदर्शन किया है। मि सरकारी जनजातीय कार्यक्रमों ने जनजातीय लोगों की आर्थिक स्थिति को उठाने अधिक मदद नहीं की है। ब्रिटिश नीतियों ने जनजातियों के अनेक प्रकार के 9५९ के रास्ते खोल दिए क्योंकि ये नीतियाँ जमीदारों, भू-स्वामियों, महाजनों, जग्ल ठेकेदारों, तथा उत्पाद कर, राजस्व व पुलिस अधिकारियों का पश्च लेती थी। जनजातीय क्षेत्रों में बेकिग सुविधाए इतनी कम हैं कि जनजातीय लोगों को महाज्ों पर निर्भर रहना पडता है। बुरी तरह ऋण जाल में फँस जाने के कारण ००० लोग कृषि ऋणग्रस्तता मुक्ति अधिनियम को लागू करने की माग करते हैं ताकि अपनी गिरवी रखी जमीनें वापस ले सकें। डभग 90 अतिशत जनजातीय लोग कृषि में लगे हैं, और उनमें अधिकतर ६० हैं तथा वे स्थानानतरणशील (६४६०९) खेती करते हैं। उन्हें नये खेती के 7 सिखने में मदद की आवश्यकता है। बेरोजगार और अल्प बेरोजगार लोग पशुपालन, मुर्गी पालन, हाथकरपा बुनाई, न हस्त शिल क्षेत्र में विकास के द्वात आय के द्वैतीयक खोत दूढने में मदद चाहते हैं। अधिकतर जनजाति के लोग दूर-दूर पहाडियों पर रहते हैं जिनमें जनसख्या कम ५ और इन क्षेत्रों में दूः सचार कठिन हो जाता है। इसलिए जनजातीय लोगों जकाकी जीवन व्यतीत करने से सरक्षण की आवश्यकता है। वहा सडकों के जाल बिछाने की भी आवश्यकता है। जनजातीय लोगों का ईसाई मिशनरियों द्वार भी शोषण किया जाता है। ह 7 जातीय ज्षतरों में ब्रिटिश काल के दौरान उनका ईसाई धर्म में परिवर्तन हुआ पे, मिशनरी जब शिक्षा के अग्रदूत रहे हैं और उन्होंने इन क्षेत्रों में अस्पताल भी खोले, परन्तु वे जनजातीय लोगों को उनकी सस्कृति से विमुख करने के लिए भी उत्तरदायी हैं। कहा जाता है कि ईसाई मिशनरियों ने कई बार जनजातीय लोगों को भाल सरकार के विरुद्ध का लिए भी भडकाया है। रा ] रस प्रकार जनजातीय व “जनजातीय लोगों के बीच के सम्बन्ध खराब होने शु गए और गैर जनजातीय निवासियों को अर्ध सैन्य बलों के सरक्षण पर अधिक से अधिक निर्भर रहना पड़ रहा था| जनजातियों कौ अलग राज्य की माँग ने मिजोरम, नागालैष्ड, मैघालय, बिहार, मणिपुर, अस्णाचल अदेश और जिपुरा में सशस्त्र विद्रोह का रूप ले लिया। जनबातोय समाज £६८॥ भारत के प्रति मैद्रैधाव न रखने वाले पडौसी देशों ने इन थारत वितेधी भावनाओं को भडकाने में सक्रियता शुरू कर दी। जनजातीय पट्टियों से घिरे इन राज्यों में विदेशी नागरिकों की घुसपैठ, गोलीबारी, मादक पदार्थों की तस्करी आज भी गम्भीर समस्याएँ हैं। सक्षेप में, जनजातीय लोगों को प्रमुख समस्याएं गरोबी, ऋणग्रस्तता, अशिक्षा, बन्धुआपन, शोषण, बीमारी और बेरोजगारी हैं। स्ववत्रता के बाद जनजातीय असन्तोष व समस्याएँ राजनीतिक हो गई हैं। अनेक जनजातीय क्षेत्रों में स्पष्ट वक्‍ता तथा प्रभावी राजनीदिक अभिजात वर्ग का उदय हुआ है। यह अभिजात वर्ग जनजाति के लोगों के अधिकारों के प्रति जागशक है और उनकी स्वीकृति प्राप्त करने के लिए नपे तुले कदम उठाने में सक्षम है। बिहार के झारखण्ड क्षेत्र और मध्य प्रदेश के बस्तर क्षेत्र के जनजातीय लोग इसके उदाहरण हैं। बिहार में तो फरवरी 2000 के चुनाव के बाद और इसी प्रकार मध्य प्रदेश में जनजातीय राजनैतिक नेता अलग राज्य बनाने के लिए ग़जी करने में सरकार को बाध्य करने में सफल हो गये। बिहार में अलग राज्य वनानचल (झारखण्ड) में 8 जिले दक्षिण बिहार के सम्मिलित हैं जिनमें 25 श्रतिशत जनजातीय जनमख्या है। वृहत्‌ झारखण्ड की मांग में बिहार, पश्चिम बगाल, उडीसा व मध्य प्रदेश के जनजातीय बहुल क्षेत्रों के 26 जिले हैं। मध्य प्रदेश में 6 जिलों में से 6 जिले छतीसगढ गत्य में शामिल किये गये हैं । जिम क्षेत्रों में जनजातीय नेतृत्व नही है, राजनैतिक दल, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या स्थानीय लोग खाली स्थान भरने के लिए आगे आ रहे हैं। एप्सी दुबे (शव 0707 ७0 ४7, 972 30) ने भी कहा है कि जनजातीय लोगों को राजनीतिक अभिवृत्तियों और इन नीतियों में बदलाव दृष्टिगत हो रहा है। अब वे अनुपालन व स्वीकृति कौ राजनीति से दबाव और विरोध की गजनीति अपना रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि जनजातियों की राजनोदिक सस्कृति में आमूल परिवर्वन हो रहे हैं। यह ग्राम्य राजनीतिक प्रस्कृति तथा भागीदारी की गाजनोतिक सस्कृति विस्तृत राष्ट्रीय पहचान कौ बजाय उप-राष्ट्रीय पस्कृति पहचान को ओर अधिक उन्मुख है। जब छोटी इकाई (॥06) के हित बडी इकाई (टू) के हिं्ों से सकणते हैं तब राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा या त्याग करने को प्रवृत्ति बढती है। इस परिदृश्य का फल यह होता है कि यह विशुद्ध जनजातीय हितों पर केद्धित तथा राष्ट्रीय हितों से अलग होकर उदीयमान राजनैतिक सस्कृति को प्राम्य स्वरूप प्रदान का है। दूसरी ओर भागीदारी यो राजनीतिक सस्कृति में जनजातीय लोग नीतिनिर्माण सरकार के राजनीतिक निर्षयों पर प्रश्न पूछने तथा सुधारात्मक सुझाव देकर सक्रिय रुचि ले रहे हैं (५0, 090७, 090 3।) । इस अकार प्रमुख प्रकरण जनजातौय तथा ्जनैतिक हितों का समन्वय है। दूसरे राद्दों में जनजातीय समस्याओं को अलग से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि राष्ट्रीय जीवन में परिचालित रणनीतियों के रूप में देखना चाहिए। जनबागीय आदोलव (ात्न०9श कक्वात्ण७) जनजादीय लोगों के अनेक आन्दोलन बिहार में 4972 से शुरू होकर आख्ध प्रदेश, अष्डमान , अरुणाचल प्रदेश, असम, मिजोरम, और नागालैण्ड तक हो चुके हैं। उतीसवीं श्ाबि में विद्रोहों में सलग्न महत्वपूर्ण जनजातियों थी, मिज़ो 90), कोल (795 83!), मुण्डा (889), डफ्ला (875), खासी और गाणे (829 (फण्णे, 272 जनजातीय समाज गोण्ड (886), नागा 844 और 879), भुइया (868) और कोन्ध (87) | जनजातीय आन्दोलनों का वर्णन करने से पूर्व आन्दोलनों के प्रकारें की जानकारी आवश्यक है। कैमेरान (0&0८:००) ने इन्हें चार समूहों मे बाँठा है. () अविक्रियावादी (१९३०0०४७३9), जो अतीत के अच्छे दिनों की वापसी चाहते हैं। लिन्टन ([07/08) इन्हें चुन्नरूत्यानी (२८७४७४७४८) आन्दोलन कहता है। (2) रुढिवादी (00%एशाएथ), जो समकालीन परिवर्तनों में बाधा डालने और यथास्थिति बनाए रखने के लिए आयोजित किए जाते हैं। लिन्टन इन्हें स्थिरतावादी (ए८9०७००४८) आन्दोलन मानता है। 8) सशोयनकाय (२८५$०॥७79), जो विद्यमान रिवाजों में विशेष परिवर्तन एवं सस्कृति या सामाजिक व्यवस्था में सुधार या शुद्धीकरण चाहते हैं। ये कुछ सस्थाओं को कम करना भी चाहते हैं, यप्नपि यह आन्दोलन मौजूदा समूची सरचना को बदलना नहीं चाहते हैं। ये आन्दोलन “सामाजिक गतिशौलता' आन्दोलन भी कहे जाते हैं। ये आन्दोलन अधिकतर निम्न जातियों में होते हैं लेकिन जनजातियों में नहीं। (4) ऋतिकारी (२९५०४४००७)), जो मौजूदा सामाजिक व्यवस्था या सस्कृति को किसी प्रगतिवादी व्यवस्था से समूल भ्रतिस्थापित करना चाहते हैं। इस आन्दोलन को पुतन्ररूद्धार आन्दोलन का नाम भी दिया गया है। पूर्वकालीन भारत में अधिकतर जनजातीय आन्दोलन धार्मिक उथल-पुथल के फलस्वरूप हुए, जैसे बौद्धत्व, वैष्णववाद। कुछ वैष्णव आन्दोलन मणिपुर में मैथेई ((०॥४०), पश्चिम बगाल में भूमिज, असम में नोक्ते नागा, उडीसा में बाथुडौ, बिहार में झारखण्ड की जनजातियों, तथा दक्षिण भारत में हुए। (,॥6 ॥(४॥०98४३, 972 . 402) इन आच्दोलनों को धार्मिक आन्दोलन भी कहा गया है। ये मध्य भारत के गोण्ड जनजातियों में तथा उडीसा में कोण्ड और राजस्थान में भीलो में भी हुए। अप्रेजों को भी 9वी तथा 20वीं शताब्दि में कुछ आन्दोलनों का सामना करना पडा था जब उन्होंने सिर का शिकार, मानव बलि, या उत्तस्पूर्वी भारत में गुलामी को रोकने का प्रयास किया। बिहार, पश्चिम बगाल, उड़ीसा और मध्य भाजत के राज्यों में जमीदारों के अत्याचारों, महाजनों, पुलिस और बन अधिकारियों के द्वारा उत्तीडन के विरुद्ध भी आन्दोलन हुए। भगत आन्दोलन छोय नागपुर के औगवों और ग़जस्थान के भीलों में हुए थे। ये आन्दोलन जानवरों के भोजन, मद्र और रक्त बलि को गेकने के लिए पुन्नरूत्यानी आन्दोलन थे। स्वतत्रता के बाद जनजातीय आन्दोलनों को त्रीन समूहों में बाद जा सकता है () बाहरी लोगों के शोषण के कारण आन्दोलन (जैसे सन्‍्याल और मुण्डा लोगों का) (2) आर्थिक वचनाओं के कारण (जैसे मध्य प्रदेश में गोण्ड तथा आन्ध्र प्रदेश में मेह) (3) प्रथकवावादी अ्रवृत्तियों के कारण आन्दोलन (जैसे नागा और मिजो लोगों क)। जनजातीय आन्दोलनों को चार प्रकार के अन्य आधारों पर भी बाँट जा सकता है (0) राजनैतिक स्वायत्तता तथा राज्यों का निर्माण चाहने वाले आन्दोलन (नागा, मिजो, झारखण्ड), (2) कृषि आन्दोलन, 6) वन आधारित आन्दोलन, और (4) सामाजिक-धार्मिक या सामाजिक-सास्कृतिक आन्दोलन (भगत आन्दोलन, राजस्थान व मध्य प्रदेश में भीलों का, दक्षिण गुजय़त में जनजातियों में, या सन्यालों में रघुनाथ मुस्मू (रब 'ीणयणा) को आन्दोलन। जनजातीय समाज 273 ऐसा सुधारात्मक आद्दोलन मुण्डा लोगों का धर्तो अबा (00990 ७७) के करिश्माई भ्ेदृत्व में रिपोर्ट किया गया जो सस्कारों की शुद्धता, नैतिकता, और सन्यासवाद (०5६००॥०5०७) के हिन्दू आदरशशों दा उपदेश देता था और पुजारियों को पूजा की आलोचना कात़ा था। मध्य प्रदेश में गोण्ड लोगों में करिश्माई लोगों द्वाव चलाए गए धार्मिक व सामाजिक गतिशोलता से सम्बद्ध आन्दोलन चलाए गए थे जो क्षत्रिय प्रस्थिति का दावा कर रहे थे और धार्मिक व सामाजिक सस्याओं का शुद्धिकरण चाहते ये। सुज्जीत सिन्हा ने पाँच प्रकार के जनजातीय आन्दोलन बताएँ हैं (0) 8वीं तथा 9वी शव्ाब्दि के दौरान ब्रिटिश शासन काल में नृजातीय (८७ाणण)े विद्रोही आन्दोलन, जैसे मुड्ा लोगों का बीरसा आन्दोलन, 832 में कोल विद्रोह, 857-58 में सन्धाल विद्रोह, और 880 के दशक में नागा विद्रोह। (2) उच्च हिन्दू जातियों से प्रतिस्पर्धा करते हुए सुघागत्मक आन्दोलन, आरंवों में भगत आन्दोलन, भूमिजों का वैष्णव आन्दोलव, सन्धालों में खेखार आन्दोलन । 6) स्वतत्रयोत्तर काल में भारतीय सघ के भीतर ही जनजातीय राज्यों के लिए राजनैतिक आन्दोलन, जैसे छोटा नागपुर तथा उडीसा में झारखण्ड आन्दोलन, तथा अस्रम व मम्य प्रदेश में पहाडी राज्य आन्दोलन, आदि। (3) पृथक्कतावादी (६९८८५४७॥७) आन्दोलन, जैसे भागा व मिजो आन्दोलन। (6) कृषि अशान्ति से सम्बन्धित आन्दोलन, जैसे नक्सलवादी आन्दोलन 6967) और बिस्सादल आन्दोलन (968.69) | यदि हम सभी आद्दोलनों पर विच्वार करें जिनमें नागा आन्दोलन (जो 946 में शुरु होकए १972 तक चला जब नपी सरकार भत्ता में आई और नागा विद्रोह पर नियत्रण प्राप्त कर लिया गया), मिजो आन्दोलन (गुरिल्ला गुद्ध जो अप्रैल 970 में मेघालय राज्य के गठन के बाद सम्माप्त हुआ और 3972 में असम और मिजोरप से उत्पस हुआ था), गोण्ड राज्य आन्दोलन (जो 94! में अलग राज्य के लिए मध्य प्रदेश और मदागद्र्‌ के भोण्ड लोगों द्वार चलाया गया और जो 962-63 में अपनी चरम सीमा पर पहुचा), नक्सलवादी आन्दोलन (जो बिहार, पर्यिमी बगाल, आन्य्र प्रदेश और असम में चल), कृषि आन्दोलन (मध्य प्रदेश में गोण्ड और भीलों द्वा चलाया गया) और वनों पर आयारित (परम्पतगत वन अधिकाएं के लिए गोण्ड लोगों द्वाम चलाया आन्दोलन) आदि सम्मिलित हैं तो यह कहा जा सकता है कि जनजातोय अशान्ति के फ्लस्वरूप अज़्दोलन ऐसे आन्दोलन थे जो (0) अत्याचाएोें और भैदपाव, (0) उपेछा द पिठडेपन और (0)) ऐसी सप्कार के विस थे जो जनजतीय गरैबी, राग और शोषण के श्रति उदाप्तोन धी और जो सझर से मुक्ति के लिए छेड़े मए 4। हाल ही में (विशेष कर बिहाए और मध्य भ्रदेश में) जनजातीय आन्दोलन में गरजनातिहों ओर विद्वारों द्वार अधिक रचि दिखाई गई घो। बिह्यर के आन्दोलन को 'झाप्खण्ड आन्दोलन' के नाम से जाना जाता है। छोटा नागपुर में ओगेव, मुण्ठा और हो फमुख जातिया हैं। उनकी कुल जनस्तज्या 50 ला है जो णज्य वी कुल जनजातीय सप्या का 0 प्रतिश्ठत है। यह आन्दोलद छोटा जागपुर में छोटा नागपुर उनति प्माज द्वात चलाया 274 जनजातीय पमाज गया था जिसका नेतृत्व कुछ शिक्षित जनजातीय ईस्ताइयों ने किया था। बाद में समाज का नाम आदिवासी सभा कर दिया गया। 938 में इसने अपने आपको एक ग़जनैतिक दल का रूप दे दिया जो आदिवासियों के हितों के लिए सपर्ष करने लगी जिसका नाम झारखण्ड पार्टी रखा गया। भाजपा-नीत केन्द्र सरकार ने 998 के अन्तिम भाग में तथा 999 के भ्रारम्प में पृथक झारखण्ड राज्य बनाने का अस्ताव रखा (जिसका नाम वनाचल दिया गया जिसमें 6 जिले ठथा दो सम्भाग (0शह्घ0०)-बिहार के छोटा नागपुर और सन्वाल शामिल थे)। अगस्त 2000 में सदन में बिल पास कर नवम्बर 2000 में बिहार के 55 जिलों में से 8 जिलों का झारखण्ड शज्य बनाया गया। जनजातीय आन्दोलनों के कारणों को व्याख्या के लिए उनके शोषण के दो उदाहरण दिए जा सकते हैं। स्वतव्रता के समय आन्य-अदेश में एक सरकारी आदेश मौजूद था जिसके अनुसार सभी भूमि सम्बन्धी सौदे आदिवासियों के पक्ष में ही होते थे। 974 में तत्कालीन कग्रेस सरकार ने एक आदेश पारित किया जिसके द्वारा गैर आदिवासियों को 5 एकड भूमि 6 एकड पानीवाली तथा 0 एकड शुष्क) रखने की अनुमति दी गई। इस आदेश के बाद गैर-आदिवासियों ने बड़ी मात्रा में भूमि हथिया ली। आदिवासियों ने दावा किया कि भैर आदिवासियों ने 974-984 के बीच 30,000 एकड भूति पर कब्जा कर लिया है। इत्त अवधि में लगघग 2000 भूमि विवाद न्यायालय में थे और लगभग 400 आदिवासी अभियुक्त ठहरए गए। 994 में तेलुगुदेशम सरकार ने पूर्व आदेशों को निरस्त कर दिया जिसके काएण गैर आदिवासियों ने रक्षात्मक स्थिति अपना ली। क्रान्तिकारियों ने आदिवासियों को सामन्तवादियों तथा गैर-आदिवासियों के विरुद्ध सगठित किया। गोण्ड आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच हिंसा की घटनाएं घ्ीं। गैर आदिवासियों मे संघर्ष किया। उन्होंने आदिवासियों के झोंपडे जलाए, महिलाओं पर अपएंधिक हमले किए, आदिवासियों की हत्या की और उन्हें बन्पुआ मजदूरी के लिए बाध्य किया। एक अन्य घटना में 2 गैर आदिवासी, जिन पर जगल से जलाने की लकडी चुराने वा आगरेष था, आदिवामियों द्वारा पकड़ कर बन्द कर दिए गए जब तक कि पुलिस ने उन्हें मुक्त नही कराया। दूसरा मामला एक आदिवासी सम्मेलन के सन्दर्भ में है जो फरवरी 984 में महागई के नागपुर के पास विदर्भ क्षेत्र में हुआ था। सम्मेलन का स्थान था ग्राम कमालपुर जिसकी आबादी 4000 थी। सम्मेलन में 20,000 लोगों के आने कौ आशा थी। इसका उद्घाटन नागपुर उच्च न्यायालय अधिवक्ता सघ के अध्यक्ष द्वार किया जाना था और इसकी अध्यक्षता एक नाटक लेखक, फिल्म निर्देशक तथा सिने-कलाकार द्वारा की जानी थी। सम्मेलन से दो दिन पूर्व सम्मेलन स्थल तक के सभो रास्ते सोल कर दिए गए, 000 व्यक्ति गिरफ्तार किए गए ओर 5 से अधिक व्यक्तियों के एक साथ इकट्ठा होने पर निषेध आज्ञा लागू कर दो गई। मजे को बात यह कि गिरफ्तार लोगों पर निषिद्ध साहित्य ले जाने वा आरोप लगाया गया और कहा गया कि वे लोग जगल में पेड गिय रहे थे, वन सम्पदा वी चोरी कर रहे थे। (0:0०६, 7 #फ़ञपम, 984 29) | स्वागव समिति के अध्यक्ष को वन सम्पत्ति की चोरी के आग्ेप में गिरफ्तार किया गया। अन्य पकडे गये लोगों में सगीवकार जवजातीय समाज 275 थे जिन्हें सम्मेलन में कार्यक्रम प्रस्तुत करा था तथा अन्य लोगों में बम्बई, हैदगबाद, मद्रास से आये छात्र प्रतिनिधि थे। इस प्रकार के सम्मेलन में जहाँ केवल कुछ प्रस्ताव पारित किये जाते और कुछ गर्म भाषण होते, वहाँ सम्मेलन-स्थल एक लड़ाई का मेदान ही बन गया था। थह सब कुछ यह दर्शाता है कि जब कानून आदिवासियों की सहायता म॑ को, सरकार कठोर हो जाये, और पुलिस उन्हें बचाने में अप्षमर्थ हो और परेशान करे, तो वे शोषकों के विरुद्ध हृधियार तो उठाएगे हो। उपरोक्त आन्दोलन दर्शाते हैं कि आद्विवासियों ने अपनी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दो शप्ते अपनाए (४) हिस्ता और विद्रोह के बिना सरकार से बातचीत और सौदेबाजी का रास्ता, और (७) आदिवासियों को संघर्ष शक्ति का विकास कर विद्रोह और सैन्य सघर्ष का रास्ता अपनाकर। इन दोनों हो रास्तों के परिणाम भिल है। एक राप्ता सपर्पपरक सुधार के लिए है जबकि दूसरा रास्ता समुदाय के सरवनात्मक परिवर्तग की ओर सफेत करता है। यह तथ्य कि आदिवासी समस्याओं से जूझते जा रहे हैं और असन्वोष तथा वचना भाष से भी पीडित है, इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि दोनों हो गस्तों से वे अपने लक्ष्यों तक नहीं पहुंच सके हैं। जनजादीय नेतृत्व त्न0ण [€8१७ज्ञक्त) आदिवाप्ती आन्दोलनों को प्रारम्भ करने और प्रोत्साहित करने में आदिवासी नेतृत्व के विषय में एलपी विद्यार्थी द्वाता दी गई जानकारी को मानते हुए हम आदिवासी नेतृत्व का कई विशेषताएँ बता सकते हैं ].. आदिवाप्ती नेताणणों में उप राष्ट्रवादी (॥9-38॥0०४०॥७०) पाये जाते हैं। 2. भेता आमतौर पर वे हैं जो आपुनिक शक्तियों के प्रभाव में है। 3... ईप्ताइयव और पश्चिमी शिक्षा बाला नेतृत्व का बाहरी मॉडल जो कई आदिवासी फ्ेत्नो में कई दशाब्दियों तक एक मात्र मॉडल रहा है, अब उसके बाहरीपन में परिवर्तन आ एहा है। उदाहए्ण के लिए झारखण्ड पार्टो जिस्त पर ईसाई आदिवासियों का प्रपुत्व रहा था और यो आवश्यक रूप से ईसाई घर्मान्वरित व्यक्तियों (८०॥५८४३४) के एकीकरण (८०॥५०॥४०॥०॥) के लिए भ्रारम्भ की गई थी, ने अपना क्षेत्र तेजी से बढा लिया और हिन्दू आदिवासी और गैर-आदिवासी इससे जुड़ने लगे और इस पार्टी ने क्षेत्र की आवश्यकताओं एवं समस्याओं पर जोर देना शुरू किया। पर्मनिस्पेक्ष उद्देश्यों, राजनैतिक दबावों और बहकावों, और राजनैतिक सुविधा के साथ अब इन नेताओं की कार्यप्रणाली में उल्लेखनीय परिवर्दन देखे जा सकते हैं। 4. जहाँ एक ओर छ्षेत्रीय और राज्य स्वग्ैय नेतृत्व आधुनिक लोकतात्रिक हितों के साथ मिलकर चल रा है, वह दूपरो ओर गांवों के भौतरी भागों में नेतृत्व अभो भो सस्यथात्मक, औपवारिक, तथा वशानुगत है। 5... कभी कभी आदिवाप्ती नेता अपने ग़जनैठिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अन्य गजनैठिक दलों के नेताओं के साथ राष मिला लेते हैं। 6 नेवाओं द्वाग उठाए गए प्रकण आमतौर पर वे होते हैं जिनकी अभिव्यक्ति जनजातीयवाद, क्षेत्रवाद, स्थानीयवाद ओर क्भो-क्षों धार्मिक अतिवाद में होते है 276 जनजातीय समाज 4. नेता आम्य आधारित एवं शहरीकृत दोनों होते हैं। साथ ही बे परम्परापरक एव आधुनिक दृष्टिकोण वाले भी होते हैं। वे हिन्दू व ईसाई भी होते हैं। 8. नेदगण अधिक शिक्षित नहीं होते बल्कि धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक व ग़जनेतिक सभी विचारधाराओं के होते हैं। आदिवासी महिलाएँ (06 प्राहक ए0फाल्णे स्त्रियों की 'प्रस्थिति' का अर्थ है. ()) मृहणी, श्रमिक, और नागरिक के रूप में रयों की स्थिति (0) इने स्थितियों से जुडी हुई शक्ति व प्रतिष्ठा, और (४) वे अधिकार और कर्तव्य जिनको उनसे अपेक्षा कौ जाती है। मेसन (७५००७, 984) ने सकैत किया है कि स्त्रियों की प्रस्थिति के तीन पक्ष हैं. प्रतिष्ठा, शक्ति, एवं स्वाग्रततता, (शिक्षा, विवाह, गेजगार, और स्वास्थ्य रक्षा आदि मामलों में निर्णय लेने की आजादी)। सभी जनजातियों में स्त्रियों की प्रस्थिति एक समान नहीं है। यह एक जनजाति से दूसरी में भिन है। आदिवासियों में स्त्रियों की प्रस्थिति इतनी निम्न है कि उन्हें ज्ञान, (आर्थिक ससाधनों, और सत्ता का ज्ञान) नही है। उनकी व्यक्तिगत स्वायत्तता तो निम्नतम स्तर की है। यद्यपि श्रम शक्ति में स्लियों की भागीदारी बहुत कम है, फिर भी अधिकतर आदिवासी महिलाएँ आर्थिक स्थिति के विचार के बिना हो काम करती हैं। वे आर्थिक क्रियाकलापों में पुरुषों के लगभग समान जिम्मेदारी का पालन करती हैं। जब पुरुष लोग अन्य मगरों या कस्म्रों में काम करते हैं, तब स्त्रियां खेती का काम बरती हैं। यदि हम शिक्षा को प्रस्थिति का सामाजिक आर्थिक सूचक मानें, तब देखेंगे कि इन स्त्रियों की साक्षरता दर कम है। जब हमोरे देश में महिलाओं की सामान्य साक्षरता दर 799] में 393 प्रतिशत थी तब आदिवासी महिलाओं की यह दर मात्र 8 9 प्रतिशत थी। सबसे अधिक साध्षरता प्रतिशत जनजादीय महिलाओं में प्राथमिक स्तर तक है। इस असमानता के कारण गाँवों में स्कूलों की अनुपलब्धता, स्त्री शिक्षकों वी अनुपलब्धता, प्रचलित परम्पणगत मूल्यों के कारण लडकियों को स्कूल भेजने में शर्म महसूम करना, माँ के काम पर चले जाने के बाद लडकियों को छोटे शिशुओं कौ देखभाल के काम में प्रयोग करना, तथा घरेलू कामकाज में लडकियों को सहायत मी आवश्यकता आदिवासो महिलाओं को भूमि को रखने का अधिकार नहीं है। स्त्रियों को अपनी मम्पत्ति के अधिकार का ज्ञान नही है। उनकी राजनैतिक चेतना भी बहुत कम है क्योंकि वे न तो अखबार पढती हैं, और न ही रेडियो या टी वी पर समाचार सुनती है। सूक्ष्मतम ग्रामीण सत्ता सस्चना में भी उनका कोई स्थान नहीं होता है। आदिवासी समितियों और ग्राम पचायतों में भी उनका प्रतिनिधित्व बिल्कुल कम है। यद्यपि बुछ आदिवासी समुदाय हैं, जैसे मीणा, सेमा नागा और थारु, आदि जिनमें ख्लियों की स्थिति किसी प्रकार से भी कम नहीं कही जा सकती। आदिवासी समाजों में विधवाओं को गम्भीर समस्या नही है। वे विधवा पुनर्विवाह के लिए स्वतत्र हैं। कुछ जनजातिया ऐसी हैं जिनमें विधवा अपने मृत पति के छोटे भाई से विवाह कर सकती है (देवर विवाह)। वधु मूल्य (७772-7८) परिपाटी ने खियों की अस्थिति को नहीं उठाया है बल्कि इससे स्त्रियों को क्रम विक्रय की वस्तु समझा जाता है जिससे उनका अपमान ही होता है । कई जनजातीय समाजों में तलाक की अनुमति है । तलाक जनजातीय समाज £६2॥ की प्रक्रिया भौ सरल है क्योंकि इसमे परस्सर सहमति आवश्यक होती है। एक अनौपचारिक सस्कार तथा वधु मूल्य की वापसी से ही दलाक हो जाता है। आदिवासी परिवर्तन साश्षात्यक भेदभाव और आदिवाडी कल्याण और विकास (्लांभ प्ीमाज्ञाणा + शाण॑त्ती९ छी5च्वंग्राग्राजाण बह पीगीय जरिए जात 00 थरणफणशा) आदिवासी परिवर्तन का अर्थ आदिवासी कल्याण या आदिवादी विकास है। आदिवासियों के पुनर्वास और विकास के लिए भारत में लागू किए गए सरकारी कार्यक्रम अपने लक्ष्य प्राप्त नही कर सके हैं तथा स्वतत्रवा के बाद से हो आदिवासी सर्वहागवाद कायम रहा है। इसमें आश्चर्य नही कि न केवल 970 के व 980 के दशकों में विभिन्‍न बिद्वानों का ध्यान (977 में (एलपी विद्यार्थी बिहार में, 974 में महाराष्ट्र में ए के डान्डा और एमजी कुलकरनी, तथा 97 में आन्य् प्रदेश में रजीत गुप्ता और एमबीडी राजू) आदिवासी समस्याओं की ओर गया बल्कि 990 के दशक में भी विद्वानों का ध्यान इस विषय पर गया। जनजावीय कल्याण (0५ छत आदिवासियों की समस्याओं के समाधान के लिए ब्रिटिश शासकों द्वारा अपनाए गए कुछ उपायों में आदिवासियों की जमीन व वन अधिग्रहण करना, और कुछ आदिवाप्री क्षेत्रों को पूर्णह्पेण पृथक या आशिक रूप से पृथक धोषित करना शामिल थे। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने भी ईसाई मिशनरियों के सहयोग से काफी सख्या में अस्पताल और स्कूल आदिवासी क्षेत्रों में खोले थे जिन्होंने अनेक आदिवासियों को ईसाई बना लिया। इस प्रकार आदिवासी बिटिश युग में औपनिवेशिक-सामन्ती अधीनता, नृजातीय पूर्वायहों, अशिक्षा, गरीबी, और एकाकौपन के शिकार बने रहे। स्वतत्रता के बाद आदिवासो हितों को सुरक्षा तथा उनके कल्याण व विकास के क्रियाकलाएों को श्रोत्साहित करने के लिए सविघान में प्रावधान किए गए। गान्धीजी और टक्कर बष्मा ने भी आदिवाप्तियों के बोच कुछ अग्रगणीय कार्य किए। नेहरू ने भी आदिवासी परिवर्तन के लिए पचशोल को नीदि प्रारम्भ की जो पोंच सिद्धान्तों पर आधारित थो, ] उन पर बहुसख्यक सस्कृति को थोषने से उन्हें दूर रखना ओर हर भ्रकार से उनको पण्पशशत कला व सप्तकृति को प्रोत्साहन देना) भूमि व वनों पर आदिवासी अधिकारों का समादर। 3. बाह से कुछ प्राविधिक कर्मियों की सहायता से आदिवाम्ी नेताओं को प्रशासनिक व विकास कार्यक्रमों का प्रशिक्षण देना। 4 आदिवासो क्षेत्रों को अधिक प्रशासन से दूर रखना। परिषामों बा आकलन व्यय किए गए धन के आधार पर नही बल्कि किस प्रकर वा मानव चरित्र विकसित हुआ इस आधार पर किया जायेगा। 278 जनजातीप समाज 3960 में अनुसूचित जनजाति आयोग यूएनढेबर को अध्यक्षवा में आदिवासियों को उनति के लिए गठित किया गया। पाँचवी पचवर्षीय योजना के बाद 980 में जनजातीय उप-जीति (प7799 500 7)07257) बनाई गई जिसमें दो बातें थी 6) जनजातियों का आर्थिक-सामाजिक विकास (४) शोषण से आदिवामियों का बचाव | टीएमप्री के लिए धनराशि राज्य सरकारों और केद्रीय मान्यताओं से प्रदान की गई। परन्तु टी एसपी परिणाम अब दक किए गए अत्यधिक निवेश और आकाक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे हैं क्योंकि अधिकतर राज्यों में आधारभूव सरचना के विकास पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है तथा उप्तको जनजातियों के विकास के अनुरूप बनाने को उपेक्षा की जा रही है। टी एसपी योजनाएं कृषि, पशु पालन, सहकारिता, जनजातीय शिक्षा, आदि क्षेत्रों में परिवारोन्मुख आय पैदा करने वाली योजनाओं पर बल देती हैं यद्यपि इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आवास पर भी बल दिया जा रहा है ॥ सातवी, आठवी व नौवीं पचवर्षीय गोजनाओं में (985-990) जनजातियों के कल्याणकारी कार्यक्रमों का उद्देश्य था 6) आर्िक दशा सुधारने के लिए कृषि, पशुपालन, चानिकी, घरेलू एव लघु उद्योगों में उत्पादन स्तर को बढाना, (2) बन्युआ मजदूरों का पुनर्वास, 6) शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम, (4) स्त्रियों और बच्चों के लिए विशेष विकास कार्यक्रम। लेकिन आदिवासियों के लिए एकीकृत कार्यक्रमों ने इन कार्यक्रमों कौ अपर्याप्तताओं को उजागर कर दिया है। परसस्कृतिप्रहण और जनजातीय सस्कृति मे परिवर्तन (#९८ण[फततांग इणव (४०8९5 0 पं] 0जॉप्फ्टे “समाज या समुदाय के व्यक्तियों के नैतिक सिद्धान्दों, धार्मिक विश्वासों, व्यवहार, विचारों, अभिवृत्तियों एवं ज्ञान में परिवर्तन” ही सास्कृतिक परिवर्तन है। सांस्कृतिक परिवर्तन एक प्रकार की बहु कारकीय प्रक्रिया है। राहा और दुबाश राय (0४88 ४०० 700088॥ 7२०५, 997 49 59) ने अनेक कारक चिन्हित किए हैं जिनसे आदिवासी सस्कृति में परिवर्तन आए हैं। ये हैं सरकार द्वारा किए गए उपाय, सचार सुविधाएं, शिक्षा का प्रसार, नगरीकरण की प्रक्रिया, सामुदायिक विकास योजनाएँ, शहरी क्षेत्रों में पडौसी हिन्दुओं के साथ बास्बार सम्पर्क, आदिवासो, क्षेत्रों में बाँधों का निर्माण, ईसाइयत का प्रभाव, बैंक ऋणों की सुविधाएं, आधुनिक स्वास्थ्य सुरक्षा, सहकारो समितियाँ, आधुनिक कानून, नेंकद धन और बाजार अर्थव्यवस्था, और सुघारवादी आन्दोलन, आदि | जनजाति-जाति अन्तर्क्रिया तथा परसंस्कृतिप्रहण की प्रक्रिया विभिन्न जनजावियों में फिक्स राज्यों, हें, 'पाई जाती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण बिनये कुमार पथ्नावक के उडीसा के गाँव घोगबार में सबरस जनजाति के अध्ययन में बताया गया है जो 280 लोगों के 235 घर्ये की कुल सख्या के 5 प्रदिशत हैं (६७८, 6०08४ एव, टककाशफरुलबए' 4068). ग्राश्व! 5:६6, 997, 37-329) इस जनजाति द्वारा परसंस्कृतिग्रहण को प्रक्रिया में से गुजरना निम्न-लिखित परिवर्तनों में देखा जाता सकता है जनजातीय सम्मज 279 १. इस जनजाति में संरचनात्मक परिवर्तन समतावाद (८७७॥७४४75फ) के त्याग (कम से कम कार्यात्मक निर्भरता के साथ) और जाति श्रथा के स्वीकार करने में देखा जा सकता है जिससे उस समुदाय में स्तरोकरण का प्रारम्भ हो रहा है। 2... यह समुदाय सस्तरणात्मक रूप में [8०४ ८ग८आ9) संस्काऐं की श्रेष्ठता के आधार पर चार खण्डों में विभाजित है जो हिन्दू वर्ण व्यवस्था से मिलता-जुलदा है। चारों विधागों पें कार्यात्मक (००००७०४००४) विभाजन भी है, जैसे चारों वर्षों में क्रमश. शिकार और युद्ध, पूजा पाठ, कृषि, तथा नृत्य व गायन | अन्तर यह है कि जहां वर्ण व्यवस्था में पूजा पाठ का सर्वोच्च संस्कारिक स्थान है, इस जनजाति में इसका दूसरा स्थान है। दूसरे, इस सबरस जनजाति में शुद्ध और अशुद्धवा नहीं हैं जैप्ता कि जाति प्रथा में पाया जाता है। इस प्रकार, सबरस अलग जाठि के रूप में स्वीकृत हैं और गाँव में जनजाति नहीं माने जाते । 3 जाति प्रथा की तरह सबरस जनजाति में भी प्रत्येक ठप-जाति कौ अपनी पचायत है जो समुदाय के रीति-रिवाजों और निषेषों पए निगाह रखते हैं। 4. सबस्स जति का प्रत्येक उप विभाजन स्वयं को तीम सबरसों का उत्तराधिकारी मानता है जो कि हिन्दू पौगणिक कथाओं--महाभाज और यमायण में आते हैं। 5 हिन्दू सस्कृति के चिन्ह सबरप्त विवाह रीविरिवाजों में पाए जाते हैं यद्यपि अन्तर्जातीय नहीं होते। बहु-विवाह प्रथा निषिद्ध है। वधू मूल्य का स्थान दहेज में ले लिया ॥ सबस्स लोगों के द्वाण हिन्दू मूल्यों का अनुपालन सस्कृतिकरण मे कहकर पस्सस्कृतिग्रहण इस कारण कहा जावा है क्योंकि (७) परसस्कृतिप्रहण का लाभ उच्च भस्कारी प्रस्थिति प्राप्त त का होकर आर्थिक लाम प्राप्त करना है। जाति के रूप में हिन्दू पक्ष में शामिल होने से उन्हें लकडी काटने और टोकरी बनाने का कार्य स्थाई रूप से दे दिया गया है। वनों के कट जाने के बाद वे कृषि मजदूर हो गए हैं (७) भविशीलता के लिए अपनाया गया मॉडल ब्राह्मण वाला न होकर चैश्य मॉडल है जो सस्कारी श्रेष्ठता की अपेक्षा आर्थिक श्रेष्ठता को दो भ्रेष्ठ मानता है । स्पोंकि सबरस अपने व्यवसायों के तेलियों पर निर्भर रहते हैं. इसलिए उन्होंने वेलियों को सन्दर्भ-समूह के रूप में स्वीकार कर लिया। यदि हम भारत में जनजाति सस्कृति में परिवर्तन का परीक्षण करें दो हमें छ मुख्य परिवर्तन मिलेंगे। वे इस प्रकार हैं . आदिवासियों कौ जोवन जैलो, विशेष रूप से जो शहरों क्षेत्रों के निकट या गैर-आदिवामो, बाहुलय क्षेत्रों में एहते हैं,उन्‍नत (४४९७४०८०) हिन्दुओं की संस्कृति के अनेक लक्षण धारण के के कारण अपरिवर्तनीय रही है । 2. परिवर्तन की प्रकृति ऐसी हे कि जनजातियों न तो अपनी पहचान खो रही हैं और न ही अपनी सास्कृतिक विरासत हो। वे हिन्दू नही हो रहे हैं। अनेक विद्वानों ने इसे वह प्रक्रिया बतायो है जिसमें आदिवासी हिन्दूवाद (की प्रक्रिया) से गुजए रहे हैं। ये विद्वान हैं बोम (953), दना मजमूदार (937), देवगाबकर (990), रहा और देबाश राय (99 .53)। इन्होंने पातो गधा (अप्तम), हो और लुआग (उडीसा) सन्याल 280 जनजातीय समाज (बिहाए, भूमिज, ओराँव, मुण्डा और कोरकू (महाराष्ट्र) आदि को सन्दर्भित किया है। हमारी मान्यता है कि हिन्दुओं के कुछ सास्कृविक तत्व अपनाने का अर्थ हिन्दू होगा नहीं है। हमारे वर्क में यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण हैं कि ये आदिवासी अभी भी अपने आपको जनजाति ही कहते हैं, न कि हिन्दू । भारत के कुछ भागों में कुछ आदिवासियों ने ईसाइयद के कुछ गुणों को भी धाएण कर लिया है जैसे नागा, मिज्ो, सन्‍्थाल, ओरँव, मुण्डा, खरिया, आदि। इन पर इंसाइयत का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। इसका साक्ष्य हमें दत्ता मजमूदार (950) सहाय (976), सच्चीदानन्द (/964) और एनके बोस (967) के द्वारा आदिवासियों के सूक्ष्मस्तरीय अध्ययन से लगता है। छोटा नागपुर के आदिवासी, जो असम व उत्तर बगाल चाय बयानों में श्रमिकों को तरह कार्य करते हैं, उनमें परिवर्तन धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं की अपेक्षा भौतिक जीवन में अधिक देखा जा सकता है। जो उद्योगों में काम करते हैं उनमें प्रदत्त आर्थिक सुए्शा के कारण वैयक्दिक दृष्टिकोण विकप्तित हुआ है जिसने उनमें परप्पएगद जीवन के प्रति उपेक्षा भाव विकसित किया है। आदिवासी क्षेत्रों में कृषि उद्योगीकरण ने आदिवासियों के जीवन को इस हद तक प्रभावित किया है कि परिवार को सरचना, विवाह सस्था, सत्ता सरचनां अन्तर्वैथक्तिक सम्बन्ध, वश पयायत सत्ता का कमजोर होना, आदि परिवर्तन तक देखे जा सकते हैं! (2 ॥6 ॥(», 98) मजदूर सर्घों का भी आदिवासी श्रमिकों पर काफी प्रभाव पडा है। आदिवासी मजदूयें ने स्वय को “वर्ग' के रूप में सगठित कर लिया है जिससे उनके सक्रिय राजनीति में भाग लेने के अवसर बढ गए हैं। वे आदिवासी जो लम्बे ममय से खदानों (07७5) और कोयले की खानों में काम कर रहे हैं अपने समुदाय के लोगों से सम्बन्ध नहीं रख पाते हैं जिसके कारण उन्हें खानों के कार्य में ही लिप्त रहने के लिए बाध्य होना पडता है। इससे उन्हें कई सामाजिक प्रधाओं को छोडना पडता है और नई अभिवृत्तिया और व्यवहार प्रतिमानों को अपनाना पडता है। सच्चीदानन्द (964) ने बिहार के मुण्डा और ओरॉब जनजातियों में ऐसे परियर्तनों के विषय में बढाया है। आरचन्द्रा (989) ने भी उडीसा की अरुला और जुआग जनजातियों के सामाजिक-सास्कृतिक जीवन में परिवर्तनों की बात कही है, जो परम्पेयगत रूप से शिकार, भोजन एकत्र करने और स्थानान्वरण खेती (डशफ़िह ५०॥४०४०७०) के आदी थे लेकिन वे अब बागानों, कृषि व मजदूरी में स्थापित हो गए हैं। उन्होंने प्रगतिशील दृष्टिकोण अपना लिया है तथा स्कूल, बैंक, सहकारी समितियों तथा चिकित्सा, आदि की सुविधाओं का लाभ उठाने लगे हैं। आधुनिक शक्तियों के प्रभाव के कारण आधुनिक मूल्यो को अपनाना तथा परम्परागत प्रधाओं का त्याग आदिवासियों को लाभदायक सिद्ध नही हुआ। अनेक जनजातिया कुसमायोजन कौ समस्या का सामना कर रही हैं। आर जोशी (984) के अनुसार देगा जनजाति ऐसी ही एक जनजाति है जिसके सदस्य पूर्व में इंसी-खुशी से तथा सनुष्ट रहने वाले लोग थे, जो नृत्य वथा महुआ पीने में शाम व्यतीत किया करते थे, जिनके पास जमीने तो थी किन्तु चिन्हित पट्टे नही थे, जिनकी ख्त्रिया निर्भय होकर जनजातीय समाज कहा सोने-चोंदी के आभूषण पहनती थी, लेकिन वे अब भयभीत रहती हैं और स्वार्थी लोगों द्वारा ठगी जा रही हैं। खुशी को जगह दुखों ने ले ली है। अत यह स्पष्ट है कि आदिवासी विभिल ताकतों के सम्पर्क में आने से सामाजिक, आर्थिक व सास्कृतिक दृष्टि से काफ़ी बदल गए हैं जिनसे उन्हें कई प्रकार के लाभ हुए हैं लेकिन उनके समुदायों में कई बुराइयों ने भी प्रवेश कर लिया है। अनेक आदिवासी भूमि व वनों पर अपना वर्चस्व खो चुके हैं। उन्हें बडे महाजनों, जमौदारों व्यापरियों द्वार कई मामलों में शोषण किया जाता है। इसके बावजूद भी हम वेरियर एलविन जैसे विद्वानों के विचाये का समर्थन नही कर सकते जो आदिवासियों को आशिक रूप से या पूर्ण रूप से अलग रखने के पश्षथर हैं और जिन्होंने इस बाव पर जोर दिया है कि इन लोगों को जह्य तक सम्भव हो अपने आदिवासी जीवन को मूल रूप में तथा परम्परागत ढंग से रहने कौ अनुमति दी जानी चाहिए। यद्यपि हम यह नही चाहते कि आदिवासी संस्कृति नष्ट हो जाये लेकिन माथ ही हम यह भी नही चाहते कि वे पिछडे हुए रहें और विकास कौ पिभिन योजनाओं, जेसे औद्योगिक विकास, व्यावसायिक गविशीलता, शिक्षा, और कल्याण योजनाओं का लाभ न उठाएँ। आदिवासियों के अलग तथा एकाकी जमद की दशा जिससे उनमें गगैबी, अशिक्षा, शोषण आदि पैदा होते हैं, इस युग में सहन नही किए जा सकते। न्याय, जागृति, सहायता, और सहमोग आदि उनके लिए आवश्यक हैं। आदिवासियों का विस्थापन और पुमस्थापना (एक्रुग्त्थ्जशा। गाते एेल््शगरेटशला। ४ प्रोएम5) हाल के ही वर्षों में आदिवासियों के विस्थापन ने अनेक विद्वानों का ध्यान आर्कर्दित किया है। अनुमान है कि विकास योजनाए, जैसे बाँध, खाने, उद्योग और अन्य विविध योजनाओं ने 4957 और 99 के बीच लगभग 40 प्रतिशत आदिवासियों को विश्थापित किया है (छ८काशा6०5, 994 24) | अशिक्षित और शक्तिहीन आदिवासियों को अपने ससाधन समन क्षेत्रों को छोडने के लिए बाध्य किया गया है तथा अन्य स्थानों को जाने के लिए मजबूर किया गया है। इससे अनेक पुनर्वास की समस्या उत्पन हुई। एक अनुपान है कि लगभग 20 प्रतिशत आदिवासियों का पुनर्वास हो गया है। महाराष्ट्र और गुजग़त में “भूमि के लिए भूमि' योजना के अन्तर्गत 0,000 गोग्य (०8४४)०) आदिवासी परिवाएं में से केवल 5 प्रतिशत को ही भूमि स्वोकृत को गई (ए८गाआ0०5, वही. 36)। इससे आदिवासियों में गरीबी और उनका सीमान्तीकरण (परआ2॥7»/58007) बढा है। कई क्षेत्रों में आदिवासियों ने अपने समर्थन की व्यवस्था को छोने जाने का विगेष किया और आन्दोलन शुरु कर दिया। ऐसे आदिवासी आन्दोलनकारों आन्ध प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, अरुणाचल भरदेश, उडीसा, मध्य प्रदेश, आदि में भी थे। आरचर्य दो यह है कि आदिवासी उच्च जाति के गैर-आदियासी किसानों से अधिक उत्तेजित आन्दोलनकारी सिद्ध हुए यद्यपि वे अशिक्ित और कम सगठित हैं। इस तथ्य को प्राकृतिक ससाधनों पर निर्भरता को सीमा, बाहरी समाज के साथ सम्पर्क, उनमें नेतृत्व को सोमा, वधा योजना से मिलने वाले लाभ को आकाक्षा में अन्तर के अर्थों में समझाया जा सकता है। (गाल फटा2055, *9फ०श/०ट्ाा 0 वराएग5", 00०96 एलिीलि, "माह्कफ़्कगत) उतर... वकबा उाग्रदाह/ 7 282 जनजातीय समाज 997 82) | आदिवासी इन योजनाओं का विरोध करते हैं क्योंकि उनका अधिकतर भोजन और प्रतिदिन की आवश्यकता की वस्तुए जगलों और उल्हें स्थानान्तरण कृषि से प्राप्द होती है। जगलों पर यह निर्भरता आदिवासियों के प्रतीकात्मक सम्बन्धों और उनकी आजीविका के ससाधमनों से विकसित होतो है। दूसरा कारण है लाभों की अपर्याप्तता। जगलों के लिए उन्हें कोई क्षतिपूर्ति प्रदान मही की जाती क्योंकि आदिवासी जिसे अपनी निजी सम्पत्ति समझते हैं वह वास्तव में सरकारों है। छोटों से छोटों भूमि का दुकडा जो उनके पास होता है उसकी क्षत्िपूर्ति भी कम होतो है (लगभग 3000 रुपये प्रति एकड)। जो कुछ भी थोडी बहुत राशि श्षत्तिपूर्ति के रूप में उन्हें मिलती है उसमें से भी मध्यस्थ व्यक्ति तथा महाजन ले लेते हैं। इस प्रकार वे गरीब ही रह जाते हैं। तीसस कारण यह है कि उनकी शिक्षा इतनी कम होती है कि योजनाओं में काम मिलने को उन्हें कोई उम्मोद नहीं होती। अधिक से अधिक उम्हें अकुशल मजदूर के रूप में अस्थाई काम मिल जाता है। यह सभी कारण उन्हें नयी योजनाओं के । विद्रोह के लिए बाध्य करते हैं और उन्हें अपनी स्थाई भूमि से विस्थापित होना पडता है। लेकिन गोविन्द बाबू 997 92-94) का मानना हैं कि बार्षों के निर्माण से सम्बद्ध चार विभाग हैं. (5) सरकार व नौक्रशाह (७) वैज्ञनिक व पर्यावरणविद्‌ (०) सरक्षित शेर के लोग (0) कमाण्ड क्षेत्र के लोग। सरकार राजनैतिक व आर्थिक उद्देश्यों को पूर्ति हेतु बाँध बनाने का समर्थन करती है। नौकरशाह उनका समर्थन करते हैं क्योंकि वे सरकार के प्रवक्ता होते हैं और उन्हें अपनी प्रोन्नति के अवसर अच्छे बनाने हैं। वैज्ञानिक, वकनीकों विशेषज्ञ और पर्यावरणविद्‌ अधिक वस्तुपरक होते हैं। तकनीकी विशेषज्ञ जहा प्रोजेक्ट कौ साध्यता ((९4आ)॥9) के विषय में चिन्नित रहते हैं, वही पर्यावरणविद्‌ पर्यावरणीय पक्ष से । कमाण्ड क्षेत्र के लोग विस्थापित होना नही चाहते, भले ही वे गरीब हों क्योंकि उन्हें डर होता है कि उन्हें अनिश्चितता में पुत नवीन जीवन शुरू करना पडेगा। वे अपने नावेदारों और गाव बालों के सबधों से भी अलग नही होना चाहते हैं। कमाण्ड क्षेत्र के लोग इस विचार को अच्छा भानते हैं क्योंकि इससे कृषि सम्पननता तथा वर्ष भर रोजगार के अवसरों की आशा होती है। बॉँघों को उपयोगिता को नकाय नही जा सकता | प्रश्न केवल गरीब आदिवासी क्षेत्रों के आदिवासियों के पुनर्वास की व्यवस्था करने का उठता है। इन विस्थापितों की सामाजिक और सास्कृतिक उथल पुथल महत्वपूर्ण है। ध्यान देने योग्य प्रश्न हैं कि (॥) क्‍या विस्थापित आदिवासी पुनश्थापित बस्तियों (२05) में रहना पसन्द करते हैं ? 2) क्‍या सरकार विस्थाषित लोगों को आरमी एस (२८5) में रखने के लिए किसी नियम का पालन करती है ? 6) क्या श्वतिपूर्ति योजना वस्तुपरक ((00॥97००) है और क्या श्षतिपूर्ति राशि ठीक से प्रयोग को जावी है (७) विस्थापित लोग, जो पुनस्थापित बल्तियों में व्यवस्थित नहीं हो पाते, किस प्रकार जीविका चलाते हैं ? ७) पुनस्थापित बस्तियों में पुवस्थापित लोग अपने परम्पणगत व्यवप्ताय अपनाए रहते है या वे नये व्यवसायों के साथ सामजस्य बना लेते हैं ? 20 विघ्थापित लोग हटने के बाद या दौरान में किसो प्रकार की यातना का अनुभव कक ट आदिदासी क्षेत्रों में बार्थों की सफलठा और उपयोगिता उपरोक्त अश्नों को गम्भीसता से विचार करने और उनके तर्कस्रगठ हल निकलने पर निर्भर करेगी क्योंकि आदिवासियों के जनजातीय समाज 285 सास्कृतिक लक्षण तथा सरचनात्मक विशेषगाए जाति समूहों की नुलरा में बिल्कुल पिन्न हैं। वे अपनी सास्कृतिक प्रथाओं में कठोर हैं तथा परिवर्तन के बाह्य कारकों के प्रति कम उत्साह रखते हैं। एकीकरण और आलप्तातकरण (व्टागांणा गणठ #55फ्रीगिंत्ये डालटन, रिजले तथा अन्य ब्रिटिश शासकों ने 'हिन्दू हुए आदिवासी” और “आदिवासियों के हिन्दू बने भा की बात की है। उन्होंने कई सास्कृतिक विशेषताओं को बताया जिन्हें आदिवासियों में हिन्दू पडौसियों से धारण किया है। क्या कल्याण और विकास कार्यक्रमों ने आदिवासियों को ग़ष्टीय मच पर लाकर खडा कर दिया है 2? क्या उन्होंने आदिवाप्तियों की सामाजिक स्थिति को ऊँचा उठाया है? विद्वानों ने स्वीकाश है कि आदिवासियों और गैर आदिवासियों के ब्रीच की दूरी आंशिक रूप से साम्राज्यवादी उप-निवेशी शक्तियों की शजनैतिक मोतियों के कारण बरी और कुछ अश तक इस कारण क्योंकि गैर-आदिवासी आदिवाप्ियों को शेष जनस़ज्या से मैतिक व सास्कृहिक रूप से अलग मानते थे। अत स्वतत्रता के बांद आदिवासियों की विशिष्ट व्यवहार और यहाँ तक स्वायत्तता की माग ठीक थी। उन्होंने आदिवासियों को जोववादी (छक्रशं॥) की सज्ञा दी। नृजाति वैज्ञानिकों ने उनकी मृजादीय विशेषताओं और प्रजातीय पृष्ठभूमि की ओर सकेत किया। लेकिन पूर्ये के अनुप्तार सास्‍्कृतिक और भाषायी स्तर पर आदिवासी पडौसी हिन्दू ग्रामीण समुदायों तथा गैर-आदिवासियों से उल्लेखनीय रूप में प्रिन्न नही हैं। इस दृष्टिकोण का समर्थन डीएन मजूमदार और अय्यापन ने भ्री किया है। अनेक आदिवासी समूहों ने अपने अर्ध-एकाकी निवारों से हटकर तथा पैदारों में प्रवेश कप्के हिन्दू जाति व्यवस्था के बई प्रदिमानों को स्वीकार कर लिया है। आदिवासियों में बडी सख्या में सामाजिक सुधारों और धार्मिक आचददोलनों से यह साक्ष्य मिलता है कि उममें हिन्दू जाति व्यवस्था में मिल जाने की इच्छा है। कुछ जनजातिया जैसे मिजो, खासी, नागा, मुण्डा, भील, आदि पिछड़ी रह गईं हैं। उनका प्रौद्योगिकी-आर्थिक पिछडापन और परम्परागत मूल्यों से उनका चिपका रहना हिन्दू समाज में उनके सलग्नता के मार्ग में अवरोधक रहे हैं। अरन यह है क्‍या सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का लक्ष्य आदिवासियों के राष्ट्रीय जीवन की भुख्य धाए में पूर्ण आत्मप्तातकरण करना है या उनके हितों, रौतिरिवाजों तथा मस्थाओं की सुरक्षा की चिन्ता बताकर, उनके जोवन के ठगीकों की रक्षा करके तथा विकास सुनिश्चित करके उनका सामाजिक एकीकरण करना है ? ऐसा मालूम पड़ता है कि विभिन थोजनाएँ और वर्यक्रम उन्हें सामाजिक अन्याय व शोषण से बचाने तथा उनके जीवन के सामान्य तरीकों को उठाने के उद्देश्य से बनाए जा रहे हैं। आदिवासी क्षेत्रों का गठन, शैक्षिक प्रस्थाओं तथा जन सेवाओं में उनके लिए स्थानों का आरक्षण टी एमएस योजनाओं का प्रारम्भ, सभी का उद्देश्य आदिवासियों का उत्थान तथा हिन्दू समाज में उनका सामाजिक व सास्दृतिक एकीकरण है। लेकिन एकीकरण और समरूपा में आत्मस्रातकरण को प्रक्रिया द्वार गलव नहीं समझा जाता चाहिए। हमें परिवर्तन की तीन प्रक्रियाओं के विषय में, अर्थात्‌ पप्प्कृतिप्रहण, एकीकरण (सामाजिक और सास्कृतिके, और आत्मसातकरण के विषय में स्पष्ट समझ लेना चाहिए। 284 जनजातीय समाज परसस्कृतिकरण (3०८ए/४४३४०४) एक या अनेक अन्य सस्कृतियों के साथ सम्पर्क द्वाग एक समूह की सस्कृति का अर्जन व परिवर्तन है। आदिवासियों के मामलों में इसवा अर्थ है कि आदिवासी हिन्दू समाज की ऐसी सास्कृतिक विशेषताओं को अपना लेते हैं जो वे अपने उत्थान व विकास के लिये कार्यात्मक समझते हैं। सामाजिक एकीकरण (ए7/ध5200०7) अनेक समूहों (79८४) का एक समूह (हिन्दू समाज) में पूर्व के सामाजिक व सास्कृतिक समूह (79) का अन्तर समाप्त करना है। सास्कृतिक एकीकरण नये सास्कृतिक विशेषताओं को अपनाने से परम्मणगत सास्कृतिक विशेषताओं का समायोजन है। हिन्दू समाज में आदिवासियों का एकीकरण पुरानी आदिवासी विशेषताओं का त्याग नहीं है। इसमें एक व्यवस्था के भौतर हौ एकता शामिल है जो कि हिन्दुओं से नयी विशेषताओं को भ्रहण करने का परिणाम है। आत्मसातकरण (७६७७४७७०७) (एक तरफा वाली) प्रक्रिय है जो एक समूह (जनजाति) को सस्कृति लेती है और दूसरी की पहचान (हिन्दू समाज), और उस समूह का हिस्सा बन जाती है। समूह का विलय (जनजाति का) इस प्रकार, आदिवासी और गैर-आदिवासियों के बीच सास्कृतिक अन्तर के पूर्ण रूप से समाप्त कर देता है। जनजातियों को अपनी साम्कृतिक पहचान और अपने सामाजिक अस्तित्व कौ समश्याओं का सामना का पड़ता है। प्रत्येक जनजाति के सामने तीन विकल्प होते हैं : () बहुसख्यकों के साथ अस्तित्व बनाए रखना, (७) अपने आपको प्रभुत्वशाली समूह के साथ मिला लेना, (॥) समानता के आधार पर शजनैतिक स्वतत्रता प्राप्त करना। विभिन जनजातियों ने उपरोक्त वर्णित तीन प्रक्रियाओं में से भिल-भिन्‍म प्रक्रियाए अपनायी हैं। उदाहरण के लिए भीलों और मीणाओं ने सह-अस्तित्व की प्रथम प्रक्रिया अपनायी, औराव और रोण्ड (२॥070) जनजातियों मे हिन्दू समाज में विलय की दूसरी प्रक्रिया को अपनाया, जबकि नागा और भिजे जनजातियों ने धर्म त्याग की तीसरी प्रक्रिया को अपनाया। हमारी सरकार ने सभी जनजातियों के सास्कृतिक एकोकरण की समान नीति नहीं अपनाई क्योंकि भिन भिन आदिवासी विकास की अलग-अलग अवस्थाओं में से गुजर रहे हैं और उनके लक्ष्य व आकाक्षाएं भी अलग अलग हैं। स्वाभाविक रूप से विभिन्‍न जनजातियों के एकीकरण का स्तर भी अलग अलग है। हम केवल यही कह सकते हैं कि आदिवासी देश के वृहत्‌ अर्थतन्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं और स्वय को बाजार अर्थव्यवस्था में शामिल कर रहे हैं। कृषि अनेक जनजातियों के लिए आर्थिक क्रिया का प्रमुख केद्ध बनतो जा रही है। 908 की जनगणना के आकडों के अनुसार देश के लगभग तीन चौथाई आदिवासी कृषक के रूप में कार्यरत हैं जबकि पाचवों भाग कृषि मजदूर और शेष खातों, जगलों या अन्य सेवाओं मे लगे हैं। यह तथ्य कि आदिवासी कृषक कृषि के आधुनिक तरीकों को अपना रहे हैं, भारतीय समाज के आदिवासियों को अर्थव्यवस्था की ओर सकारात्मक प्रगति कौ ओर इगित कप्ता है। पत्तु आदिवासियों के आर्थिक एकीकरण का अर्थ यह नहीं है कि सभी जनजातियों ने आय के उच्चतम स्वर को प्राप्त कर लिया है। अनेक आदिवासी अभी भो गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। आदिवासी देश की राजनैतिक व्यवस्था में भी समायोजिद होते जा रहे हैं| पचायती राज के प्रारम्भ होने से उन्हें राजनैतिक क्रियाकलापों में भाग लेने का अवसर मिला है। चुनाव लडकर उन्होंने पचायत समितियों और राज्य स्तर पर सत्ता हथियाना शुरू कर दिया जनजातीय समाज 285 है। इससे उनका शैक्षिक व सामाजिक विकाम्त भो सम्भव हुआ है। सामाजिक जीवन में भी आरक्षण नीति के कारण अब वे लोग अच्छे प्रामाजिक पर्दों पर आ रहे हैं। यद्यपि वश पायें उनके लिए निरर्थक नहीं हुई हैं लेकिन उनकी भूमिका विवाह और भूमि आदि सघर्षों में अधिक महत्वपूर्ण है। अत अब जनजातीय पचायवें कमजोर हो गई हैं। यह कहा जा सकता है कि एक ओर तो जनजातियों ने अपनी सास्कृतिक पहचान बनाए रखी और दूसरी ओर उन्होंने अपने आप को देश की वृहत्‌ आर्थिक, सामाजिक, ग़जनैतिक व धार्मिक च्यवस्थाओं में सकलित कर लिया है। इस सकलन मे जनजातियों और गैर जनजातियों के बीच की दूरी को समाप्त करने का रास्ता बना दिया है यद्यपि सामाजिक समानता प्राप्त करने में उन्हें अभी भी सफलता नहीं मिली है। वृहत्‌ समाज में जनजातीय सकलन का विश्लेषण करने में घूर्ये (943) का जनजातियों को पिछड़े हिन्दू कहने का प्रतिरूप, या मजमूदार (944) का जातिवादी हिन्दुओं के साथ सम्पर्क के द्वाग आदिवासियों का हिन्दू विचारों को अपनाये जाने का प्रतिरूप, या एमएन श्रीनिवास (952) का सस्कृतिकरण का मॉडल अर्थात्‌ जनजातियों का उच्च जादीय प्रथाओं का पालन करना, या बेली (960) का दो किनारों पर खड़े रहने का मॉडल जिसमें एक छोर पर जनजातिया ओर दूसरे पर जाति हो, को लेना उपयुक्त होगा। लुज और मुन्डा (.02 700 '४४॥५9, 980) ने घूर्ये और श्रीनिवास के मॉडल की आलोचना करते हुए कहा है कि आदिवासियों में परिवर्दन को समझने के लिए आधुनिकौकरण का मॉडल ठीक रहेगा। आदिवासी समाज किस्त प्रकार जातिवादी हिन्दू या ईसाई समाज होते जा रहे हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए लुज और मुण्डा ने जनजातियों में परिवर्तन की प्रेरणा देने के लिए सरकार और मानवशास्त्रियों को मिलकर काम करने के लिए कहा है। मानव स्त्री सरकारी कार्यक्रमों के प्रभाव का मूल्याकन करते रहे हैं और उनको असफलताओं कौ ओर इशारा करते रहे हैं। 966 में ग़य बर्मन ने भारतीय समाज, भाप्त सरकार और समाज वैज्ञानिकों का जनजातियों के विरुद्ध मजबूत नृजातीय पुर्वापह देखा। उनका मानना था कि इन समूहों को जनजातियों की सज्ञा इसलिए दी गई क्योंकि मुख्य धारा का हिन्दू समाज इन आदिवासियों को भूतकाल में भी और वर्तमान में भी अलग समझता है। एलपी विद्यार्थी (968) ने जनजातीय विचारों को स्वीकार किया जो कि उनमें परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हमारो मान्यता है कि जब तक आदिवासी स्वय ही अपने भीतर से आदिवासी होने की भावना और सीमाओं का त्याग नही करते, जब तक वे अह और आत्म विश्वास विकसित नही करते, जब तक वे उधार की कृपा व सरकारी आरक्षण नौतिं पर पलना नही रोकते, केवल सरकारी नीतियाँ प्रसल करने को धारणा से उनके लिए कुछ नहों कर सकते। आदिवासी स्वय को भारतीय समाज में अपनी सस्कृति से बंधे पह कर नहीं बल्कि नये अवसरों को खोजकर ऊपर उठ सकते हैं। 0 ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था (रिफछो 50वथथों 59807) आमीण समुदाय के सामाजिक-सास्कृतिक आयाम ($0९०-0४फन गिग्राशाहंणा5 ण॑ रियो 0०्गाणण्ञाए) आमीण लोग जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि है प्रकृति के अधिक निकट हैं, नातेदारो और पभिनता के घनिष्ट बन्धन मानते हैं, और परम्परा, समाने राय (मतैक्य) और अनोपचारिकता पर बल देते हैं। गाँवों में जनसख्या घनत्व इतना कम होता है कि यह न कैवल उत्पादन और वितरण को प्रभावित करता है बल्कि समूचे समुदाय के लोगों के जीवन स्तर को भी प्रभाविद करता है। शहरों की तुलना में जन्म और मृत्यु दर दोनों हो अधिक होती हैं जो कि आमीण लोगों के गुणात्मक एवं गुणवत्तापरक विकास को विपरीत प्रभावित करते हैं। ग्रामीण लोगों के जीवन का एक और पक्ष जिस पर अध्ययन की आवश्यकता है, वह है आयु और लिंग समूहों में उनका वितरण । लगभग 45 प्रतिशत ग्रामीण लोग उत्पादक आयु (5 से 59) के हैं और लगभग 55 प्रतिशत काम करने वाले (४क्र.ए0४2 ०९ 09, 2998 435) | बच्चों की /4 से कम) और बुर्ढों 0 +) की अधिक सख्या लोगों के काम करने वाले समूह के आर्थिक और सामाजिक जीवन को काफी प्रभावित करती है। इसी प्रकार यह तथ्य कि प्रति 000 पुरुषो पर स्त्रियों की सख्या शहरों की अपेक्षा गाँवों में अधिक है और सह तथ्य कि 330 प्रतिशत ग्रामीण स्त्रियोँ कार्य शक्ति से सम्बद्ध होती हैं (56 १ प्रतिशत ग्रामीण पुरुषों के विपणैव] लिग लोकरीतियों (६८४ 9०६७), सामाजिक नियमों, सामाजिक कर्मकाण्ड, और सामाजिक सस्थाओं को प्रभावित करता है। गाँवों में परिवार सरचना, जाति रचना, धार्मिक विभेद, आर्थिक जीवन, भूमि सम्बन्ध, गरौबी, और जीवन स्तर भी ग्रामीण लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। इन सप्ो पक्षों का अलग-अलग वर्णन करना जरूरी है। परिवार (एगञर स्ाक्ारे परिवार और परिवार्वाद (४5७) गाँवों के भौतिक और सास्कृतिक जीवन में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं और ग्रामीण सामृहिकदा (८०॥८७ण०) की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को परिवर्तित करते हैं। एक ओर जहाँ सयुक्त परिवार प्रमुख रूप में अभी भी मिलते हैं, दूसरी ओर एकल परिवार भी विद्यमान हैं। एकल परिवार ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार अर्थव्यवस्था के विकाम के परिणाम स्वरूप, युवा वर्ग के शहरों में चले जाने के कारण, और ग्रामीण समाज पर शहरी सामाजिक आर्थिक शक्तियों के प्रभाव के फलस्वरूप पाये जाते हैं। इस परिवर्तन के बावजूद, शहरी परिवार की हुलना में ग्रामीण परिवार कही अधिक समजातीय आम्रीण सामाजिक व्यवस्था 287 (#०पाणह०१९०७७), एकीकृत (0८०९०) और सावयविक हूप में कार्य करने वाला (णहक्रान्‍्जीए पिमण्यंग्णणष्ठी) है। माता-पिता के बीच, पति-पलि के बीच, सहोदर (पाई-बहन) के बोच, तथा निकट नातेदारों के बीच के सम्बन्ध मरामीण परिवारों में शहरी परिवारों की अपेक्षा अधिक मजबूत होते हैं और अधिक समय तक चलते हैं। ग्रामौण परिवारों की अन्य विशेषदा यह भी है कि ये कृषि उनुख होते हैं, अर्थात इनके सदस्यों की बड़ी सख्या कृषि व्यवसाय में लगी होतो है। आमीण परिवारों के सदस्य क्योंकि एकल आर्थिक इकाई बनाते हैं, कृषि कार्यों में एक दूसरे की सहायता करते हैं, सबसे बूढे सदस्य द्वारा सचालिव सम्पत्ति में समान अधिकार रखते हैं, और क्योंकि वे अपना अधिक समय एक साथ व्यतीत करते हैं, उनके विश्वास, अभिवृत्तिया, आकाश्षाएँ, और मूल्य समान होते हैं। सदक्ष्यों की परस्पर निर्भरता उनमें सामूहिक पारिवारिक चेतना अधिक विकसित करती है और वैयक्तिक भावनात्मक चेदना कम। यद्यपि शहरीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा, आदि के प्रभाव ने परम्पगत सत्तात्मक सरचना को कमजोर किया है, केन्द्रीकृत प्रवृत्तियों को जन्म दिया है, और एकल क्रियाशीलवा पर आधारित आर्थिक समानता को कम किया है, फिर भौ परिवार अणुकृत (॥070500) नही हुआ है। यह कहना तर्कसंगत न होगा कि यद्यपि ग्रामोण परिवार में गुणवत्तात्मक परिवर्तन हो रहे हैं, परिवारवाद का प्रभाव कम हो रहा है, पारिवारिक अह कम हो रहा है और प्रथाओं के शासन के स्थान पर कानून का शासन आ गया है, फिर भी परिवार का विघटन नहीं हो रहा है। जाति व्यवस्था (४६६९ $9500) एक समय था (940 तक) जब म्रामीण क्षेत्रों में जाति प्रथा बडी कठोर थी, जाति समितियों बडी शक्तिशाली थी और जाति हो व्यक्तियों को गतिशोलवा के लिए अवसर्यो और प्रस्थिति का निर्धारण करती थीं, यहाँ तक कि भू-स्वामित्व और शक्ति सरचना भी जाति आधार पर चलदी थी। लेकिन 7950 के बाद सचाए साधनों के प्रसार से, शिक्षा के विकास से, प्रतिस्पर्धात्मक अर्धव्यवस्था के विकास आदि से स्व-केद्धित जाति गतिशौल (घा०७॥०) वर्गों में बदल गई है | कुछ जातियाँ अपनी पूर्व प्रस्थिति और कार्यों को समाप्त करती जा रही हैं और आधुनिक समाज के निम्नतम यर्गों में विलीन होती जा रही हैं, जबकि दूसरी ओर कई निम्न जातिया आर्थिक और राजनीविक शक्ति प्राप्त करती जा रही हैं और प्रभावशाली जातियों के रूप में ठभर रहो हैं। एआर देसाई, आद्रे बेतेइ, योगेन्द्र सिंह, बो आर चौहान, आदि विद्वानों ने जाति व्यवस्था में हो रहे परिवर्तनों, लोगों पर इसके घटते प्रभावों, और वर्ग व्यवस्था के बढते प्रभावों की ओर स्केत किया है। जाति व्यवस्था पर आघारित ग्रामीण ऋणप्रस्तता सहित आर्थिक जीवन में भी परिवर्तन आ रहा है। आरके नेहर ने कुछ गाँवों के अपने अन्वेषणात्मक अध्ययन में सकेत दिया है कि जाति, ऋणग्रस्तदा और आपमीण क्षेत्रों में ऋण देने के सम्बन्ध में, पूर्व में कितने घनिष्ट सम्बन्ध होते ये जो आज भी विद्यमान हैं। ऐसी जातियाँ भो होती थों जिनमें ऐसे सदस्य होते ये जो अनुवाशिक ऋषी होते थे, जबकि कुछ अन्य वे होते थे जो मुख्य रूप से ऋणदावा होते थे। हाल के कुछ अध्ययनों से इनमें आए परिवर्ततों का पा चला है। जाति के आपार पर आवासोय स्वरूपों में भी परिदर्देन आया है। जब पूर्व में कुछ क्षेत्र और उनमें बने मकान 288 आमीण सामाजिक व्यवस्था जाति सदस्थता पर निर्भर होते थे, आज जाति और आवास में कोई सम्बन्ध नही है। ग्रामीण क्षेत्रों में जाति व्यवस्था से सम्बन्धित और महत्त्वपूर्ण तथ्य थे-व्यवसायिक, आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता। अब जाति के सदस्य आवश्यक रूप से जाति निर्धारित पेशों को नहीं करते। फलस्वरूप, कुछ जातियाँ आर्थिक सीढी में नीचे उतरती हैं और कुछ ऊपर चढ रही हैं। पूर्व में शिक्षा के प्रति लोगों के दृष्टिकोण को जाति निर्धारित करती थी लेकिन आज सबसे पिछडी जातियों ने अपने बच्चों को (लडकियों सहित) शिक्षा भराप्त करने के लिए भेजना शुरू कर दिया है। ग्रामीण लोगों का धार्मिक जीवन जो कठोरता से जाति द्वारा निर्धारित होता था अब इसमे बिल्कुल प्रभावित नही है। गाँवों में धार्मिक प्रथाएँ भी धीरे-धीरे बदलती जा रही हैं। आज गावों के राजनीतिक जीवन को जादि भी प्रभावित कर रही है। राजनैतिक चुनावों में उम्मीदवारों का चयन या अस्वीकृति और साथ ही भ्रचार का तरीका भी पूर्व रूपेण जाति-विचारों से निर्धारित नहीं होते। आज जाति सबर्धों के बाहर के अतिरिक्त विचार राजनैतिक पूर्वाप्रहों ओर वरयताओं को काफी प्रभावित करते हैं। मेतृत्व भी, आज के प्रामीण समाज में, पूर्ण रूपेण जाति सदस्या पर निर्भर नहीं है। जाति के नेता ग्रामीण लोगों के सामाजिक, आर्थिक, राजमैतिक और वैचारिक जीवन में अब नेता नहीं है। जजमानी तथा अन्तर्जातीय सम्बन्धों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं। नये विधानों ने भी ग्रामीणों के अनर्जातीय सम्बन्धों को प्रभावित किया है। सक्षेप में, ग्रामीण जीवन में विविध क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्दन हुए हैं। धर्म (रशाह0७) ग्रामीण धर्म को तीन पक्षों के सम्बन्ध में देखा जा सकता है. (9) विशेष दृष्टिकोण देने वाला, जैसे आ्माओं के कब्जे में होने को बात, जादू-टोने, भूतविद्या, पूर्वजों की पूजा, आदि में विश्वास करना , (0) धार्मिक प्रथाओं की सस्था के रूप में प्रार्थना, बलि व कर्मकाण्ड आदि सहित (79) सस्थात्मक समूह के रूप में अर्थात्‌ अनेक उप-धार्मिक और धार्मिक पन्‍्थों के समूह, जैसे वैष्णव, शैव आदि। स्वतत्रतता से पूर्व आमीण सामाजिक जीवन की प्रक्रिया के निर्धारण में धर्म महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि ग्रामीण लोगों के धर्म के पति पूर्वानुकूलवा शहरी लोगों की अपेक्षा अधिक थी। वर्षा, देवी प्रकोप, आदि प्राकृतिक शक्तियों पर निर्भर कृषि में उच्च या निम्न उत्पादन, देवताओं का असल या अपसन होना, ग्रामीण जन में धार्मिकता की ओर सक्त करता है! आत्माओं, जादू, भूवविद्या और अन्य प्रकार के आदि धर्मों में विश्वास ग्रामीण लोगों में अत्यधिक प्रचलित थे। आआमीण लोगों का धार्मिक दृष्टिकोण उनके बौद्धिक, भावात्मक और व्यावहारिक जीवन को भी प्रभावित किये हुए था। उनके जीवन के किसी भी ऐसे पक्ष को दृढना कठिन था जिस धर्म का रा ने चढा हो। उनके धार्मिक विश्वासों, लोक गीर्तों, कलाकृतियों, वैवाहिक रीति रिवाजों और सामाजिक उत्सवों को भी प्रभावित करते थे। रीति सस्कार वे धार्मिक साधन हैं जिनके द्वारा व्यक्ति की शुद्धता और उसका सामाजिक जीवन विश्वस्त हो जाता है। खान-पान सम्बन्धी संस्कार, जन्म सम्बन्धी सस्कार, विवाह सम्बन्धी सस्कार, मृत्यु सम्बन्धी सस्कार, पेशे सम्बन्धी सस्कार, बीज बोने और फसल काटने सम्बन्धी सस्कार, अनेक सस्कार प्रामीण स्ाम्राजिक व्यवस्था 289 है। ये संस्कार भामीण जीवन में प्रभावी हैं। ये सस्‍्कार व्यक्ति और सामाजिक समूहों के जीवन के अनेक क्षेत्रों में उनके ज्यवहार के स्वरूप को निश्चित करते थे। एक विशेष जाति के लिए संस्कारों का विशिष्ट विधान था। उनके सदस्यों में इद संस्कारों का कठोर क्रियान्वयन सामाजिक निन्‍्दा या जाति निष्कासन का भय स्वीकृति प्रदान करता था। ग्रामीण क्षेत्रों में मन्दिरों का भी बडा महत्व था और आज भी है। मन्दिर न केवल प्रार्थना के लिए दरन्‌ शिक्षा, सास्कृतिक कार्यक्रमों के प्रबन्ध, सामाजिक उत्सवों और सामाजिक कल्याण कार्यों के के में, सार्वजनिक सभाओं के जुटने में, नैतिक मूल्यों के प्रचार प्रसार में तथा न्याय प्रदान करने में भी प्रयोग किये जाते हैं। देवी, देवताओं को मूर्तियों के साथ-साथ स्थानीय देवताओं के भी चित्र मन्दिरों में मिलते हैं। गाँवों में कुछ मन्दिर सार्वजनिक और कुछ निजी स्वामित्व वाले हैं। स्वतत्रता के पश्चाव नये आर्थिक व राजनैतिक बातावएण में, नये प्रतिमान, मूलरूप से गैर-धार्षिक और घर्मनिरपेक्ष तथा उदारवादी लोकताद्रिक विदारों से उत्पन्न प्रतिमानों का उदय हुआ है और धार्मिक प्रभुत्व वाले प्रतिमानों पर उनका वर्चस्व बढने लगा है। गाँव के लोगों मे लोकताबिक तथा समतावादो विवारों को अपनाना शुरू कर दिया है। नये धर्मनिरपेक्ष सध व सस्याएँ तथा नये धर्मनिस्पेक्ष नेतृत्त और सामाजिक नियद्रणों का प्रामीण समाज के अन्दर हो उदय होना शुरू हो गया है। इसका भी यह अर्थ नही है कि आज के ग्रामीण लोगों के मपत्ििष्क पर धर्म का शक्तिशाली नियत्रण नहीं रहा। वास्तव में, समकालीन ग्रामीण समाज एक ओर तो धार्मिक कट्टरवाद और प्रभुस्त सम्पल सामाजिक अवधारणाओं के बीच सपर्षों का युद्ध-स्थल बत गया है और दूसरी ओर धर्मनिरपेक्ष लोकतात्रिक प्रगति का। कृषक वां सरचना (#छबतेजा (355 5070७) यदि हम स्वतत्रता पश्चात्‌ के भारतीय ग्रामीण वर्ग को सरचना का विश्लेषण करें तो हमें चार यर्ग मिलते हैं कृषि क्षेत्र में तोन वर्ग हैं, भू-स्थामो, आस्ामी (९४७४६) और मजदूर, जबकि चौथा वर्ग है गेरकृषि वालों का। एआएर देसाई के अनुमार भू-म्वामी लगभग 22 प्रतिशत, आसामी लगभग 27 प्रतिशत तथा श्रमिक वर्ग के 3] प्रतिशत लोग, और 20 प्रतिशव गैस-कृषक हैं। कृएकों का एक बडा भाग (0%) सीमान्त किसान होते हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम भूमि होती है। उनके बाद छोटे किसान (65%) 2 से 5 हैक्टेयर भूमि के स्वामी, मध्यम किसान 6५४) 5 से 0 हैक्टेयर भूमि वाले, और बडे किसान (!8%) 0 रैक्टेपर से अधिक भूमि वाले [05६॥ #.२ 00 ८!, 25)। गाँवों में अति परिवार उपलब्ध भूमि एक एकड से भी कम (या 04 हैक्टेय0 है। कुल बपत (६00७४) क्षेत्र का लगभग 75 प्रतिशत खाद्यान फसलों से घिरा है। कुल उत्तादन का लगभग 35 प्रतिशत किसानों दवात बेचा जाता है। विक्रप के इन सौदों में से लगभग 65 प्रतिशद बस्तुए गाव के ही व्यापारी को बेच दी जाती हैं। मग्डियों (८०) में कृषि उत्पादों का विषणन अधिकवर बिचौलियों के हाथों में होता हे जो कि व्यक्तिश हिलों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे हो ऋण प्रदान करे के साथ साथ उत्पाद की बिल्ली यानी दोनों को सुविधा का नियत्रण करते हैं। इस प्रकार बडी सख्या में श्रमजीवी जन, भूमि की गैर आर्थिक उपयोगिदा वाली भूमि के बडो संख्या में स्वामी, तथा कम सख्या में शिल्पी, और स्वरोजगार में लगे 290 आ्रमीण सामाजिक व्यवस्था लोग, भ्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीणों द्वारा दुखद आ्थिक जीवन को दशवि हैं। कृषि स्चना की पृष्ठभूमि में अब हम कृषि सम्बन्धों (छठ्ठाक्माआ 7३000) का विश्लेषण कोंगे। इन सम्बन्धों को इस प्रकार वर्गकृठ किया जा सकता है. (७) वे जो कानून द्वारा परिभाषित और क्रियान्वित हैं, (5) वे जो रूढिबद्ध (०४४०7) हैं, और (०) वे जो अस्थिर (गएटाए्जधाह) है। डेनियल थारनर (0उगटी वाणाद, #ह्वक्मक्का डकरव्घाढ, श्रीट0, एथप 956 और 973) तथा दीपान्कर गुप्ता (छवदथ्ाद्य 074 (80), उत्दग उ#परलफाट, ऐ0्वणप एग्राएलजाए शि5, बट ए९॥, 99॥. 26-270) ने प्रामीण क्षेत्रों में तीन वर्गों में वर्णित--भू स्वामी, आसामी और मजदूर कृषको--वर्गॉकरण को अस्वीकार किया है! उनके तर्क का आधार था कि तीनों बर्गों में एक समय में एक ही व्यक्ति हो सकता है। एक व्यक्ति अपो स्वामित्व को कुछ एकड भूमि पर स्वय खेती कर सकता है, कुछ भूमि आसामी को किंग्रए पर दे सकता है और सकट में दूसरों के खेतों में मजदूर की तरह काम भी कर सकता है। उसने कृषि सम्बन्धों का विश्लेषण तीन शब्दों में प्रयोग द्वारा किया है. कृषि जमीदारों के लिए मालिक, कृषि काम करने वालों के लिए किसान (आसामी सहित), और खेदी श्रमिकों के लिए मजदूर। मालिक अपनी कृषि आय॑ मुख्यत (यद्यपि आवश्यक रूप से पूर्णरूपेण नहीं) भूमि में अपने सम्पत्ति अधिकार से अर्थात्‌ अपनी भूमि के उत्पादन के हिस्से में से प्राप्त करता हैं। यह हिस्‍्मा नकद और वस्तु (00087) के रूप में भी वसूल किया जाता है (उत्पादन का प्रदिशत)। वह अपनो भूमि या तो आसामी को दे सकता है या स्वय मजदूर रखकर इस पर खेती कर सकता है। वह भाडे के मजदूरों का स्वय प्रबन्ध कर सकता है या प्रबन्धक द्वारा भी करा सकता है। मालिक को अन्य खोतों से (जैसे, व्यापार या पेशे से) भी आय प्राप्त हो सकती है। मालिक दो प्रकार के होते हैं : वे जो अनुपस्थित जमीदार हैं और वे जो उसी गाँव में रहते हैं जिसमें उनकी जमीन है। किसान काम करने वाले लोग होते हैं जो छोटे भू-स्वामी या आसामी हो सकते हैं। मालिक और किसान में अन्तर उनकी स्वामित्व वाली भूमि के आक्मर पर होता है। किसान स्वय या उसके परिवार के एक, दो या तीन सदस्य स्वय भूमि पर श्रम करते हैं। कभी कभी किसान की आय इतनी कम होती है कि वह स्वय या उसके परिवार के सदस्थ कृषि मजदूर के रूप में काम करते हैं। मजदूर भूमि पर काम कस्के अपनी आजोविका चलाते हैं। वे अपना पारिश्रमिक नकद और कभी कभो वस्नु के रूप में आप्त करत हैं। जब उन्हें ग्रामों में काम नहीं मिलता, वे अन्य णाज्यों में चले जाते हैं या तो कृषि मजदूरी करने (जैसे बिहारी लोग पजाब चले जाते हैं) या निर्माण या औद्योगिक मजदूर के रूप में काम करने डेनियल थारनर (0 पणमछ्) ने तौन आधाएरों पर कृषि सामाजिक सरचना के तौन चर्गों का विश्लेषण किया है--(७) भूमि से प्राप्त आय (अर्थात्‌ किराया, स्वयं की खेती से आय या पारिश्रमिक से), (७) अधिकाएँं की प्रकृति (जैसे स्वामित्व, आसामी, बटाई और बिना किसी अधिकार के), और का किए गए वास्तविक कार्य की सीमा (अर्थात्‌ कार्य ने करना, थोडा कार्य पूर्ण करना दूसरे के लिये काम करना) डीएन धनागे (0 ४2००८) ने बिल्कुल भिल प्रकार के कृषक वर्ग का प्रारूप दिया है। उन्होंने पाँच अकार बताए हैं - (.) जमीदाद अर्थात्‌ वे लोग जो मुख्य रूप से भू-स्वामियों के आधार पर ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था अपर आस्ामियों से वसूली करके, ठप-आसाम्रियों तथा बटाइदारों से आमदनी प्राप्त करते हैं; ता) धनी कृपक, अर्थात छोटे भू-स्वामी जिनके पास अपने परिवार के निर्वाह के लिये काफी भूमि होगी है और जो स्वय अपनी भूमि जोतते है, और अपने जमीदारों को थोडा सा किया देना पड़ता है, (0) मध्यम कृपक, अर्थात मध्यम आकार कौ भूमि के स्वामी और अच्छी खासी भूमि पर काम करने वाले उच्च (किग़या) लगान देने वाले, (७) यरब कृपक, अर्थात (अ) दे भू-स्वामी जिनके पास अपने परिवार के निर्वाह के लिए पर्याप्त भूमि नहीं होती और इसलिए वे दूसरों को भूमि किये पर लेने को बाध्य होते हैं, (ब) छोटो भूमि के आसामी, (स) बाई वाले, और (९) भ्रूमिहन मजदूर। (0॥आाग्हाब, 9), “08 (00७ हैहाआ॥ (03525 गा [7 03" ॥ 65 /५र , ?८६6&॥/ [0/छशाशाह ॥ वी, एर्णव पनाध्टाआ(ए ?7९55, 020, 4983. 920-950 और भी देखें, 00087 एफ, उठ्दद्य उ#वग्ीव्दा/ठय.. 27-275) | धनी कृपक और व्यापारी ऋणदाता आसामियों और भूमिहीन मजदूरों का इतना शोषण करते हैं कि उनके बीच के सम्बन्ध सदैव कु रहते हैं। उनके पास काफो आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शक्ति होती है। गावों में सहकारी और ऋष समितियों के उदय ने निस्सन्देह मालिकों की शक्ति पर प्रभाव डाला है फिर भी वे मजबूत बने हुए हैं। यहाँ दो बातें ध्यान मे रखने योग्य हैं. एक, गांवों में सहकारी समितियों अधिक सफल नहीं हो पाई है, और, दो, निजी व्यापार सफलता से कार्य किए जा रहे हैं। स्वार्थी लोग यथा स्थिति बनाए रखना चाहते हैं, यहाँ तक कि भूमि सुधारों से भी मालिकों और महाजनों की शक्ति कम नहीं कौ है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक उलति नही होती, जब तक उत्पादन के अधिक समान वितरण के लिए कोई आन्दोलन नहीं चलाया जाता, जब तक छोटी इकाइयों को आर्थिक बल नहीं मिलद्ा जिससे कि वे बडे कृषकों और महाजनों तथा व्यापारियों के दबाव का मुकाबला कर पायें, तब तक वर्ग सम्बन्धों के सुधार करने में कोई सफलता प्राप्त नही हो सकती। भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को समस्याएं आर्थिक अधिक हैं अपेक्षाकृत सामाजिक के। इस बात से इन्कार नहीं है कि सामाजिक सरचना में उनकी स्थिति समस्या नहीं है लेकिन हम मानते हैं कि ऐेजगार के अवसरों की समस्या और उनकी मजदूरी की समस्या महत्वपूर्ण है। ग्रेजगार के अवसरों की समस्या कृषि अर्थव्यवस्था के विकास और गाँव के शिल्पियों को श्रोत्साहन से सम्बद्ध है। कृषि श्रमिक जाँच में कृषि श्रमिक का वर्णन इस प्रकार किया गया है : वह व्यक्ति जो बर्ष में काम किए गए कुल में से आधे दिनों से अधिक की अवधि में कृषि मजदूरी कर चुका हो। इस परिभाषा के आधार पर 30 प्रविशत से अधिक मजदूरों को कृषि मजदूएों के रूप में पहचाना जा सका, उनमें से भी आधे भूमिहीन और शेष थोडी जमीन के मालिक ये (एक बीघा या कुछ अधिक)। लगभग 85 अतिशत मजदूरों को बीज बोने, फस्तल काटने, निएई शुड़ाई के समय या हल चलाने कौ अवधि में हो काम मिलता है। आज कृषि श्रमिक कौ दैनिक औसत मजदूरी 50-60 रुपये है। रोजगार की सोमा भी देश के विभिन भागों में विभिन स्थितियों में भिन्न होती है, औसत लगभग 200 दिन का आठा है। इस प्रकार मजदूरी सहित काम के समय कौ अवधि वर्ष में 6 माह आही है। इसमें पूर्व रोजगार 3 माह तथा स्व रोजगार 3 माह होता है। इस अकार कृषि मजदूर की वार्षिक आय 292 ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था मुश्किल से 0,000 रुपये ही हो पाती है। इस प्रकार वे गरीबी रेखा से नीचे जीवन-निर्वाह करते हैं। कृषि श्रमिक जोंच (#87०शाएव 7.400घ7 संशवृण्ए३) घुख्यत कुछ आिक पदों से सम्बद्ध थी लेकिन सामाजिक निर्योग्यताएं तथा अधिकतर कृषि मजदूरों की निम्न सामाजिक स्थिति भी समस्या के कम महत्त्वपूर्ण भाग नहीं है। अधिकाश मजदूर एससी, एसटी तथा ओबीसी समूहों से होते हैं। हो सकता है उनकी कुछ कमियाँ सरकारी आरक्षण नीतियों के कारण सपाप्ठ हो गई हों, फिर भी उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति में सुघार नहीं हुआ है। गाँव में उन्हें सामाजिक जीवन का हिस्सा नहीं माना जाता। शक्ति सरचना परम्परा और परिवर्तन (एएऋश $॥55छ5 + 80005 396 (॥०४७९९) गाँवों में शक्ति किसके पास है ? परम्परागत शक्ति सरचना क्‍या थी और नव-शक्ति सरचना क्या है जिसका उदय अब हो रहा है ? शक्तिघारियों को चार समूहों में बॉ जा सकता है (9) वे जो भूमि स्वामित्त और इसके नियत्रण के आधार पर शक्ति रखते हैं, (७) वे जो जाति के आधार पर शक्नि रखते हैं, (८) थे जिनके पास सख्या के आधार पए शक्ति है, और (0) वे जिनके पास अपने पद (09०४) के कारण शक्ति है, जैसे, पचायतों में। परम्परागत शक्ति व्यवस्था में शक्ति व्यवस्था के प्रमुख आयाम इस प्रकार थे : जमीदारी प्रथा, जाति प्रथा, और ग्राम पचायत | ग्रायीण अपनी सामाजिक, आर्थिक और अन्य अमम्याएँ या वो ऊमीदार या अपनी जाति के पुछिया को या गाँद को पचायद को बढ़ाते थे। शजस्थान जैसे राज्य में परम्पपगत शक्ति सरचना सामन्तवादी थी। अन्य राज्यों में भी जमीदारी वशानुगत थी। जागीरदारी व जमीदारी व्यवस्थाए वास्तव मैं भू राजस्व प्रधाएँ थी। ग़जा लोग अपने चुने हुए प्रिय लोगों को भूमि आवटित कर देते थे, जैसे मत्री, दरबारी, सेनापतियों , आदि को । जाए जमीदारियों कौ अपेक्षा बडी रियासत होती थी। जागीरदार भूमि जोतक तथा राज्य के बीच मध्यस्थ होता था, लेकिन किसान के सम्बन्ध में वह वास्तव में भू-स्वामी के रूप में व्यवहार करता था। वह किसानों से अपने निर्वाह तथा सैन्य शक्ति, जो वह रखता था, के लिए राजस्व एकत्र करता था। जमीदार बडे भू-स्वामी होते थे और उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा भू राजस्व के रूप में वसूल कर लिया करते थे। वे समाज सुधार तथा सामाजिक जागृति को हतोत्साहित करते थे। जमीदार वे लोग होते थे जिन्हें सामान्ती मुखियाओं द्वारा भूमि दी जाती थो तथा उन्हें शासकों के प्रति श्रद्धा दिखानी पडती थी। वे अपनी भूमि आसामियों को दे दिया करते थे जिनका वे हर भ्रकार से शोषण करते थे। इस प्रकार भूस्वामित्त तथा उनकी आर्थिक प्रस्थिति गाँव में जागीरदारों और जमीदारो की शक्ति के मूलख्नोत होते थे। जाति मुखियाओं की गाव में सामाजिक प्रस्थिति होती थी। क्योंकि कठोर अनुशास्तियों (६७9८४००७) के कारण जाति समितिया बहुत शक्तिशाली होती थी इसलिये वे भुगतान न कले वालों को जाति से बहिष्कृत कर देते ये। मुखियाओं के पास सदस्यों से अधिक शक्ति होती थी। आम पचायतों में गाँव की सभी प्रमुख जातियों में से बुजुर्ग लोग होते थे। ये अनौपचारिक संगठन होते थे। जब काफ़ी गांव के हित के मामले प्रकाश में आते थे, सभी गमोष सामाजिक व्यवस्था 29 सदस्य एकत्र हो जाते थे! स्वतत्रता के पश्चात जागीदारी व जमीदारी प्रथाएँ समाप्त कर दी गईं और अनेक भूमि सुधार लागू कर दिये गए जिसने परम्पसगत शक्ति सरचना को कमजोर कर दिया और नवीन शक्ति सरचना को जम्ग दिया। आमुवाशिक और जाति मुखियाओं के स्थान पर गजनैतिक पृष्ठभूमि के चुने हुए लोग नेता बन गए। नेतृत्व में व्यक्तिगत गुण, न कि जाति, गुख्य कारक बन गए। योगद्ध सिंह (967) ने उत्तर प्रदेश में बदलदी शक्ति सरचना के अपने अध्ययन में निष्कर्ष निकाला कि शक्ति व्यवस्था में उन समूहों के श्रति झुकाव की प्रवृत्ति होती है जो गाँव में लोगों की आर्थिक आकाक्षाओं कौ पूर्ति करते हैं। हरियाणा और गजस्थान के कुछ गाँवों पर 970 और 980 में किए गए अध्ययनों में भी यही दर्शाया गया है कि प्रामीण स्तरीकरण में पहले से हो विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग के ग़जनोतिज्ञों व अधिकारियों के बीच सम्बन्ध और भी सुदृढ हुए हैं। आन्द्रे बेतेइ (966 780) ने अपने अध्ययन में यह देखा कि शक्ति काफी हद तक वर्ग से अतीत की अपेक्षा मुक्त हो गई है। शक्ति अर्जन में भू-स्वामित्व अब निर्णयक कारक नहीं है। एआए हीरामन (977) ने कहा है कि गांवों में शक्ति और सत्ता भूमि स्वामित्व या जाति के बोच कोई सम्बन्ध नही दर्शाती। राजस्थान में इकबाल नागयन तथा माथुर (969) ने अपने अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला कि उच्च वर्ग आज भी नेतृत्व पर एकाधिकार जारी रखे हुए है लेकिन छोटी आयु समूह का नया नेतृत्व भी गाँव के स्तर पर उदित हुआ है। सिर्सीकर (970), कैरास (972), इनामदार (97)), सम रेड्डी (970), ईशवरन (970), योगेश अटल (॥97॥) ने भी गांवों में राजनेतिक दलों द्वारा आधार बनाए जाने और पचायत राज सस्थाओं के प्रास्म्भ होने के गाँवों में नेतृत्व अवस्था में परिवर्तन के स्वभाव पर प्रभाव का अध्ययन किया। उम्न (0काणटण, 969) ने भी ग्रामीण नेतृत्व तथा ग्रामीण समुदाय की शक्ति सरचना के प्रकृति पर विकेन्द्रीकृत निर्णय करने की प्रक्रिया के प्रभाव को दर्शाया है। ग्राप्रीण निर्धनवा एवं ऋणप्रस्तता (एकत्र ए०श७ श्ञा0 ॥8000(९07९5७) भारत की लगभग 74 प्रतिशत जनस्नख्या गाँवों में रहती है। गाँवों में निर्धनता अत्यधिक है, मोटे तौर पर प्रामौण जनसख्या का 39 प्रतिशत। 70 श्रतिशत जनसख्या के लिए कृषि ही जीविका का मुख्य साधन है, लेकिन कृषि राष्ट्रीय आय में 40 प्रतिशत से भी कम का योगदान करती है। इसका एक कारण यह है कि भूमि का वितरण असमान है। 0 से 20 प्रदिशव भूस्वामी सम्पूर्ण भूमि के २0 प्रतिशद भाग के मालिक हैं और 50 प्रतिशत भूस्वामी सौमान्त किसान हैं जिनके पास एक हैक्टेयर (०47 एकड) से भी कम भूमि है। अत गगोबो उन्मूलन के लिए तैयार किया गया कोई भी प्रारूप आमीष क्षेत्रोन्मुख होना चाहिए। इसमें सन्देह नहीं कि 952 में योजना प्रक्रिया के प्रारम्भ से हो हमारे नौति निर्माता कृपि एवं ग्रामीण विकाप्त पर बल देते रहे हैं। लेकिन गावों में हम कितना गरीबी उन्मूलन कर सके है? एककृत ग्रामोण विकाप्त प्रोग्राम धारा)ए) परिभाषा के अनुसार जो कि आमोण विकास मंत्रालय द्वारा स्वोकृत है तथा मई 99] में सशोधिव हुई थी, पहले ,000 रुपये और अब 5,000 रुपये वार्षिक आय से कम आय वाला ग्रामीण परिवार गरैय माना गया है। ये 2फ्रव आमीण सामाजिक व्यवस्था गरीब परिवार आगे और चार समूहों में विभाजित किए गए हैं. अर्किज्वन (८६०) (8,220 रुपये वार्षिक आय से कम 993-94 मूल्य स्तर पे, अति निर्षन (ः्याध्णथ) |००) (8,220 से 9660 रुपये वार्षिक आय वाले), बहुत गयेब (८7४ 70०) (9,660 से 2,060 रपये वार्षिक आय वाले), और गरीब (90०7) 2,060 से 4,760 रुपये वार्षिक आय बाले)+ राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसधान परिषद (6 रिभाणा् 0०एारलों #कए०0 ए००॥०ण० २८5९८, १०५६) ने 6 राज्यों में 33,000 ग्रामीण परिवारों के 300 बिन्दुओं पर चार वर्ष तक अध्ययन करने के बाद ग्रामीण भारत के मानव विकास चित्र ([7०॥८) तैयार किया जिसको विकास अधिकारियों को गम्भीरता पूर्वक लेना चाहिए। 994 की रिपोर्ट जो दिसम्बर 996 में भोपाल में यूएनडी पी ((/ध00) में प्रस्तुत की गई और राज्य सरकार को कार्यशाला ने दर्शाया कि ग्रामीण जनसख्या के 39 प्रतिशव लोग गगैबी रेखा के नीचे रहते है या 2,444 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष से भी कम वार्षिक आय वाले लोग हैं (993-94 में योजना आयोग ने दावा क्या था कि गरैबी रेखा से नौचे रहने बाले लोग 8% हें)। एन सी एई आर (४0४7) के सर्वेक्षण के अनुसार 994 में भारत के गाव वी प्रति परिवार वार्षिक आय 4,485 रुपये थी, उडोसा में 3.28 रुपये, पदगाल में 3,57 रुपये, बिहार में 3.67 रुपये, उत्तर प्रदेश में 485 रुपये, मध्य अदेश में 4,66 रुपये, राजस्थान में 4,229 रुपये, पजाब में 6,380 रुपये, और हरियाणा में 6,368 रुपये थी (708 घ्षबंदधक्ा प्राक्ा5, 0९०८गा०८ 4, 996) । सर्वेक्षण ने यह भी दर्शाया कि उडीसा की 55 प्रतिशत और पश्चिम बगाल की 5] प्रतिशत जनमख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती थी। ये गरीब लोग असुरक्षित हैं और यह भी नहीं जानते कि अगला भोजन कहा से आयेगा। यहा तक कि पजाब और हरियाणा जैसे सम्पन्न राज्यों में भी ग्रामीण निर्धनता के क्षेत्र मौजूद हु । पजाब के 32 प्रतिशत और हरियाणा के 27 प्रतिशत ग्रामीण गरीबी-रेखा से नीचे रहते | निर्धनता का ऑक्लन गदीबों के पास नल के पानी, बिजली, कच्चा या पक्का मकान तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली वही उपलब्धता से किया जाठा है। देश की 55 प्रतिशत डगमगाती ग्रामीण जनसख्या अभी भी कच्चे मकानों में रहती है। साथ ही, सर्वाधिक पिछडे राज्यों में (जैसे परिचम बगाल, बिहार, उडीसा, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश) 5 से 9 प्रतिशत भामीण घरों में बिजलो है, 9 से ! भ्रतिशत घरो में नल का पानी, और ] से 6 प्रतिशत घंटों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सुविधा प्राप्त है। ग्रामीण निर्धनता के कारण (0७५९५ ण॑ एणच्ता ए०5९१३) विश्व बैंक द्वाय प्रायोजित 996 मे राजस्थान के सात जिलों मे किए गए एक अतुभवाश्रित अध्ययन के आधाए पर मैंने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के निम्नलिखित कारण पाए * 0) निर्धनता विग्येधी कार्यक्रमों का अपर्याप्त व अप्रभावी क्रियान्वयन, (2) एैर-कृषि कार्यों में लगी जनसख्या का कम प्रतिशत, (3) सिंचाई सुविधाओं बी अनुपलब्धता और अनेक राब्यों में असमान वर्षा, 4) परम्पगत कृषि विधियों पर निर्भरता और अपर्याप्त आधुनिक कुशलताओं के परिणाम स्वरूप निम्न कृषि उत्पादन, ७) अधिकतर गाँवों में कृषि और औद्योगिक उपयोग ग्राम्रेण सामाजिक व्यवस्था 295 के लिए विद्युत की अनुपलब्धता, 6) पशुधन की निम्न गुणवत्ता, (7) अपूर्ण और शोषित साख बाजार (ल«व0 छाक्षा४); (8) संयोजक (॥7॥) सडकों कौ कमी तथा सचार सुविधाओं और बाजाएें का अभाव (आधारभूव सरचना (स्राब्घ्धाएथए०); (9) शिक्षा का निम्न स्तर । देश में प्रामीण क्षेत्रों में सामान्य साक्षरता स्तर निम्न है (42 85%) | लियों का साक्षरता स्तर तो इससे भी निम्न है (4 85%); (0) सक्रिय सामुदायिक मेतृत्व का अभाव, (0)) विकाम कार्यों में र्तियों का सहयोग लेने में असफलता और नियोजित कार्यक्रमों में उन्हें प्रागीदार न बनाता, (2) अन्तर्जातीय संघर्ष और वैमनस्थ (70८४), (!3) सामाजिक सस्कारों, जैसे विवाह, मृत्य-प्ोज, आदि अवसरों पर वार्षिक आमदनी में से अधिक खर्च करा और लोगों को खर्चीले रीतिरियाजों से छुटकाग़ पाने से अनिच्छा। इन कारणों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है और निम्न मॉडल के भाष्यम से समझाया जा सकता हैः ग्राप्रेण निर्धनता के कारणों को दर्खाता प्रतिछूप (पॉडल) सप्ताधन बाघाएँं।.. समर्थक बाघाएँ साप्राजिक व्यवस्था दाधाएँ.. दाजाए बाधाएँ, # मिट्टोकी_ » कम और # कऋ्रण सुविधाओं तक ७ कृषि उत्पादों के प्रकृति असमान वर्षा पहुँचने में कठिनाई मूल्य में वृद्धि करने में कठिनाई *» खनिज ७ अपर्याप्त » लोगों की अशिक्षा » कृषि श्रमिकों के पदों कौ सिंचाई और खर्दोले पारिअ्मिक में घटिया सामाजिक प्रचलनों से. समयबद्ध वृद्धि से गुणवत्ता या/ विचतलिव होने की इन्कार उत्खनन न होना अनिच्छा ०» औद्योगिक ७ निम्नस्तर का ७ लघु उद्यमियों को. ७ बाजार तक पहुँचने विनियोजन के. पशुधन वाच्छित ससाधनों का के लिए सडकों जिए अपर्याप्त निश्चित ने होना का अभाव गा पूजी (बिजली, कच्चामाल उत्पादों को बेचने आदि) के लिए बाजार की सुविधाओं की अनुपलब्धता # सम्मिलित # उद्योगों का # गरौबी उन्मूलन ० उत्पादों पर सम्पत्ति का अभाव « र्यक्रमों का सचालन अलाभप्रद लाभ अभाव करने में असफलता के सीमा परिषाम स्वरूप लाभ उनको होठा है जो वास्तव में गरोब नहीं है # अपर्याप्त ऋण व्यवस्था। 296 आम्रीण सामाजिक व्यवस्था ब्ापीण निर्षनता उन्पूलन के लिए कुछ प्रभावी उपाय (इग्राध शीटला९ उाग्बाच्ट्रादड 0 है॥0४ंगाएड़ गिए्वाँ 205९7) ग्रामीण क्षेत्रों में गरोबी कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं : () ऋण देने थाली एजेन्सियों को सुदृढ़ कला, (2) कृपि और औद्योगिक उपयोग के लिए सस्ती बिजली उपलब्ध करना, 6) घेरेलू उद्योगों के उत्पादों को बेचने के लिए सहकारी समितियों को सक्रिय बनाना, (3) गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों (0875) में अनुदान आवटन को लचीला बनाना और अच्छे परिणाम देने वाले जिलों, ब्लकों/गार्वों को विशेष अनुदान आवटन स्वीकृत करना, 5) विविध पीएपी (2५) करर्यक्रमों को एक या दो योजनाओं में मिला देना दथा लाभ उपलब्धता को सरल बताना, 6) शिक्षा, स्वास्थ्य और दक्षता कार्यक्रमों को केन्द्रित करके मानव ससाधनों को विकसित करना, (7) असहायों तथा अत्यन्त गरीबों के लिये द्वि-वितरण प्रणाली लागू करना, (8) गरीबों के बोच ऋण विकास वृद्धि को सामाजिक चेतना जायूव करके रोकना, (9) पशु पालन को सुधारना और दुग्ध तथा मुर्गी पालन को विकसित करना, 70) पंचायतों को प्रौढ शिक्षा कार्यक्रमों, सडक निर्माण तथा वृक्षारोपण की व्यवस्था पर ध्यान देने के लिए सक्रिय करना, () गैर सरकायी सगठनों को टैंक खोदने, वृक्षारोपण, युवा वर्ग को दीक्षित करने, ल्ियों को दक्ष बनाने, लोगों में सामाजिक चेतना जागृत करने आदि जैसे भूमिका निर्वाह के लिए सक्रिय बनाना। बन्युआ मजदूर (807९8 7,00०००) अपने निजी स्वार्थों के लिए व्यक्ति को बन्धुआ के रूप में रखना, मानव की मानव के प्रति ऐसी क्रूरता है जो किस्लौ विशेष देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि मह तो सार्चभौमिक घटना है जो सैकड्डो वर्षों से आ रही है। नाम समय-समय पर व स्थान स्थान पर बदलते रहे हैं, गुलाम सेवक, अनुचए तथ बन्चुआ मजदूए। भारत में भनुष्य का इस प्रकार का शोषण वर्षों से बेगार और रयोत्‌ के नाम से प्रचलित रहा है। बन्धुआ मजदूर शब्द हाल ही की उत्पत्ति है। जमीदाए प्रया, भूमि सुधार, भूदान आन्दोलन (बन्धुआ मजदूर उन्मूलन अधिनियम, 976) के क्रियान्वयन, पचायत राज कौ स्थापना, सामाजिक समूहों द्वाय दर्शायो गई रुचिं, और समाज के प्रबुद्ध वर्ण के प्रयलों के बाबजूद बन्धुआ मजदूरों का शोषण जारी है और वे नितान्त शान्त भाव से कष्ट और कुण्ठा का बोझ उठाए चले जा रहे हैं। वास्तव में, बन्चुआ मजदूए प्रथा जैसी कि भारतीय समाज प्रें प्रचलित है, सामन्ती श्रेणोबद्ध समाज का ही अवशेष प्रात्र है। सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक वैज्ञानिकों तथा सरकार द्वारा गत दो दशाब्दियों में इसमें काफो रुचि दर्शायी गई है क्योंकि समतावाद हमारे सामाजिक आदर्श और मानवाधिकारों के विरुद्ध मात्र जाता है। बन्युआ मजदूरी का विस्तार चकरने वाला (७/॥ग७९) है क्‍योंकि लाखों स्त्री पुरुष और बच्चे इसके बोझ तले कष्ट उठा रहे हैं। अवधारणाएँ (5६ (०) हमें 'बन्युआ मजदूरी प्रथा' और 'बन्धुआ मजदूर” को समझना है! “बन्धुआ मजदूरी प्रया' महाजन और ऋण लेने वाले उन व्यक्तियों के बीच के सम्बन्धों को सन्दर्भित करती है जो ग्रामीण साम्राजिक व्यवस्था 2 दैनिक जीवन की कठिनाइयों के कारण आर्थिक बाध्यता से ऋण लेते हें और ऋणदाता की जातों का पालन कणा स्वीकार करते हैं। स्वीकृति का महत्त्वपूर्ण शब्द दर्शावा है कि ऋण लेने याला अपनी सेवाएं, परिवार के किसी सदस्य की सेवाएँ, या सभी सदस्यों की सेवाएं निश्चित या अनिश्चित अवधि के लिए गिरवी रखने के लिए सहमत है। सहमति पर बे सम्बन्ध ऐसी अमान शर्तों पर होते हैं कि इस प्रधा के अन्तर्गत सेवा ऋण चुकाने के लिए दी जाती है या कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए जबकि बाजार में श्रम के मूल्य के बग़बर अच्छा पारिश्रमिक होना चाहिए। कर्जदार या तो किसी भी प्रकार का पारिश्रमिक लिये बिना काम करता है या किसी भी प्रकार का पारिश्रमिक होता भी है तो यह न्यूनतम मजदूरी से (न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के अन्ताति भोषित) या बाजार में मौजूद मजदूरों दर से भी कम होता है । 4975 का 8] [आ मजदूपै उन्मूलन अधिनियम कहता है “बन्धुआ मजदूरी प्रथा ऐसी बाष्य मजदूर प्रथा है जिसके अन्तर्गत एक कर्जदार अपने कर्जदाता से एक कराए (#ट्वाध्थ्याट0)) करता है कि या तो वह स्वय या अपने परिवार के किसी भी सदस्य द्वार भा अपने ऊपर निर्भर किसी भी सदस्य द्वार उसको सेवा प्रदान करेगा या कराएगा। यह सेवा किसी निश्चित या अनिश्चित अवधि के लिए होगी तथा यह या दो ऋण के अन्तर्गत या अन्य किसी भ्रकार की आर्थिक सहायता के अन्तर्गत उसके द्वाय या उसके किसी पूर्वज के द्वार प्राप्त, या सामाजिक कर्तव्य का निर्वाह करते हुए या अपने ऊपर पीढी दर पीढी से सौंपे गए कर्तव्य की दृष्टि से होगी। इम करार के अन्य परिणाम भी हैं, जैसे कर्जदाए को रोजगार के अवसर से वचित रहना पड़ता है, देश के किसो भी भाग में आमे जाने की आज्ञा देने से इन्कार, तथा अपनी सम्पत्ति या श्रम के उत्पादन को बाजार दर पर बेचे जाने के अधिकार से वचित। अम पर राष्ट्रीय आयोग ने 'बन्युआ मजदूर' की परिभाषा करते हुए कहां है कि यह बह श्रम है जो लिए हुए ऋण के बदले में निश्चित अवधि के लिए बन्धन में रहता है। अनुसूचित जाति व जनजाति आयुक्त ने अपनी 24 वो रिपोर्ट में बन्धुआ मजदूरी की व्याख्या करते हुए कहा, “वे लोग जिन्हें लिए हुए कर्ज की एवज में या दो मजदूरी सहित या थोडो मजदूरी पर अपने कर्जदार के लिए काम करने को बाघ्य होना पडता है” (६॥8क09. 990- 52)। बन्धुआ श्रमिक उद्योगों, खदानों, प्लान्टेशनों तथा गोदी आदि में कार्यएत “सविदा श्रम (००४७०८४ [49०0४ से भिन होते हैं। 'सविदा' मजदूर में वे मजदूर भी शामिल होते हैं जो उस सस्था द्वारा सोधे भर्ती नहीं किए जाते हैं, जिनके नाम वेहत पटल पर अकित नहीं होते है और जिन्हें नियोजक द्वार सीबे भुगतान नहीं किया जावा। सिद्धान्त में, भाख में झविदा भजदूर फैक्ट्रों अधिनियम, 948, खान अधिनियम 952, प्लास्टेशन श्रसिक अधिनियम, 95, और गोदी कर्मचारी अधिनियम, 948 को परिपि में आते हैं। प्स्तु बन्धुआ तथा सविदा मजदूरों को भर्तो कपे के लाभ एक से हैं . 0) श्रमिक निम्त मूल्य पर रखे जाते हैं, (0) नियोजझ्ों को श्रमिकों को छोटे मोटे लाभ जहीं देने पडते, (8) तियोजक श्रमिकों को विविध अधिनिययों में उल्लिखित सुरक्षा उपायों और कल्याण ढपायों को प्रदात करने के लिए बाध्य नहीं हैं। हमारे देश में सविदा श्रम वी व्यवस्था सितम्बर, 970 में “सविदा श्रम' नामक अधिनियम के माध्यम से समाप्त कर दी गई। 298 ममीण सामाजिक व्यवस्था “बन्घुआ श्रम' को दो मूल विशेषताएँ हैं. ऋणग्रस्तता और बाध्य श्रम! बाध्य श्रम आनुवाशिकता से पिता से पुत्र तक आ सकता है या पीढी दर पीढ़ी चलठा रहता है। बन्युआ अवधि में ऋणी अन्य किसी व्यक्ति के पास नौकरी नही कर सकता। आर्थिक दृष्टि से इसका अर्थ हुआ कि वह बाजार में बाजार मूल्य पर अपना श्रम नहीं वेच सकता। बन्युआ मजदूर प्रथा कृषि मजदूएों में गाँवों में हो पाई जाती है, यद्यपि आज इसका विस्तार पत्थर को खदानों, इंट के भट्टों, बीडी फैक्ट्रियों, कांच फैक्ट्रियों, डिट्स्जेन्ट, दरी गलीचे, कीमती पत्थरों, आदि की कैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों में भी यह प्रचलित है। आरत में बन्धुआ मजदूर विविध भागों में भिन्‍न नामों से जाने जाते हैं। उदाहरणार्थ, आन्ध प्रदेश और कर्नाटक में उन्हें 'जीथम', गुजगत और मध्य प्रदेश में 'हली', बस्तर मध्य प्रदेश में 'कबाडी', हैदराबाद में 'भगेला', राजस्थान में “सगरी', बिहार में 'कामिया', उडीसा में “गोठी', तमिलनाडु में 'पण्डिपाल', केरल में 'अदिया' 'पणिया', और उत्तर प्रदेश में 'कोल्टा' कहा जाता है। बन्युआ मजदूरी के कारण ((्ला5९५ ० छ0॥6९0 [90०7 यद्यपि बन्युआ कह अथा के उद्भव, विकास और प्रचलन के पु ख कारण आर्थिक हैं, लेकिन सामाजिक और धार्मिक कारक भी इस प्रथा का समर्थन करते हैं। आर्थिक कारणों में लोगों की अत्यन्त निर्धनता, जीवतयापन के लिए काम की अयोग्यता, परिवार के निर्वाह करने के लिए अपर्याप्त आकार की भूमि, शहरी और यामीण गरीबों के लिए लघु-पैमाने पर ऋण के विकल्प की कमी, सूखा, बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाएं, मनुष्यों और पशुओं का विनाश, वर्षा का अभाव, कुओं का सूखना, वन उत्पादों से कम आय, तथा लगातार मूल्य वृद्धि और मुद्रा-स्फीति सम्मिलित है। सामाजिक कारकों में, विवाह, मृत्यु भोज, बच्चे के जन्म, आदि अवसरों पर बडे खर्चे जिनका परिणाम भारी ऋण, जाति आधारित भेदभाव, पु और बीमारी के विरुद्ध ठोस कल्याण योजनाओं की कमी, अबाध्यकारी तथा असमान शैक्षिक व्यवस्था तथा सरकारी अधिकारियों में उदासीनता और भ्रष्टाचार। कभी-कभी एाव में कुछ लोगों द्वार भ्रष्टाचार लोगों को अन्य स्थानों पर जाने को बाध्य कर देवा है जिससे वे न केवल नियोजक को शर्तों पर काम करने को बाध्य होते हैं बल्कि प्रभावशाली व्यक्तियों का सरक्षण भी प्राप्त के हैं। धार्मिक तर्क निम्न जाति के लोगों को आश्वस्त करने के लिए दिए जाते हैं कि धर्म उन्हें आदेश देता है कि वे उच्च वर्ण के लोगों की सेवा करें। अशिक्षा, अज्ञानता, अपरिपक्वता, कुशलव् और पेशेवर दीक्षा ऐसे विश्वासों को बढावा देते हैं। मोटे तौर पर यह माना जा सकता है कि “बन्धुआ' प्रथा मुख्यव सामाजिक और आर्थिक दबावों के काएण पैदा होती है। विधान (हर [धप्नंडाउत 0) “बन्धुआ मजदूरी” की घातक और कठोर प्रथा भारत के कई प्रान्तों में विद्यमान थी। स्वतंत्रता के बाद इसे देश के जीवन को अधकारमय बनाने के लिए अधिक चलने महीं दिया जा सकता था। इस प्रकार जब भारत का सविघान बनाया गया, इसमें धारा 23 भी बनाई गई जिसमें 'मानव श्रम का व्यापार 'बेगाए' ठथा इसी प्रकार के जबरदस्ती वाली मजदूरी कराना आमीप सामाजिक व्यवस्था 299 निषिद्ध है। फिर भी इस धारा पर कोई भी प्रभावी कदम नहीं उठाया गया और इस घातक प्रथा को समाप्त करने के लिए कुछ नहीं किया गया। 99 में अन्नर्राध्रीय श्रम सगठन (॥.0) द्वाग अपनाए गए बाध्य श्रम (उन्मूलन) परापय की केवल भारत द्वारा तवम्बर 954 में पुष्टि की गई। भारत में कुछ ज्यों ने भी बन्धुआ मजदूरी को समाप्त करने के लिए कानून बनाए। उदाहरणार्थ, 920 में बिहाए कमियान्ती अधिनियम पारित किया गया, 940 में मद्रास अभिकारक ऋण बन्धन नियमितीकरण कानून, 943 में हैदराबाद भगेला सहमति नियम,१948 में उडीसा ऋण बन्धुआ उन्मूलन नियम, 967 में राजस्थान सागर प्रथा उन्मूलन अधिनियम (जो 975 में सशोधित किया गया) और 975 में केरल में बन्धुआ मजदूर प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम पारित किए गए। इनमें से अधिकतर अधिनियमों में यह उल्लेख विशेषरूप से किया गया (जैसे मद्रास, उडीसा, बिहार और हेदराबाद में) कि अधिनियम लागू होने के बाद कर्जदार और महाजन के बीच हुआ समझौता पूर्ण रूप से निरस्त समझा जायेगा यदि (७) समझौते की पूर्ण शर्तें लिखित में व्यक्त न की हों और उम्तकी एक प्रतिलिपि निश्चित अधिकारी को न सौंपी गईं हो, (७) श्रम कौ लिखित व मिहित अवधि एक वर्ष से अधिक हो, (०) प्राविधित ज्याज का साधारण ब्याज एक वर्ष से अधिक का न हो, और (७) ब्याज की दर 6.25 प्रतिशत प्रतिवर्ष से अधिक हो। लेकिन । जुलाई, 975 को 20 सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा के बाद ही राष्ट्रीय स्तर पर वैथानिक कार्यवाही तेजी से तथा गम्मीरता से भारम्भ हुईं। अक्टूबर 975 में अध्यादेश लागू हुआ जिसके स्थान पर बाद में फरवरी, 976 में अधिनियम पारित किया गया जिसको बन्धुआ मजदूर प्रथा (समाप्ति) अधिनियम कहा गया। 976 में केद्रीय सरकार द्वाय इस अधिनियम को लागू किए जाने के बाद सभी प्रज्यों के नियम अक्रियान्वित हो गए। इस अधिनियम में निम्न तत्व निहित हैं. (0) बन्धुआ मजदूरों कौ पहचान, (0) बन्युआ मजदूरों की मुवित (॥) अपराधियों के विरुद्ध कार्यवाही, अर्थात्‌ वे ऋणदाता जिन्होंने ऋण लेने वालों को समझोते के लिए बाध्य किया, (४) जिला एवं तहसील स्तर पर सतर्कता समितियों कौ नियमित बेठकें करना (९) निर्धारित पजिकाओं का रख रखाव, और (७) कार्यकारी मजिस्ट्रेटें को न्यायिक शक्तिया प्रदान करना। अधिनियम में उन बन्धुआ मजदूरों के पुनर्वास का भी प्रावधान है जो अपने कर्जदारों से मुक्त हो जाते हैं। 976 का अधिनियम १996 में सशोधित किया गया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि सविदा मजदूर और अर्नगज्योय श्रमिक, यदि वे बन्धुआ मजदूर व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम में दी गई शर्तों को पूरा करते हों, बन्युआ मजदूर माने जायेंगे। 976 के अधिनियम के क्रियाववयन में मुख्य समस्या यह है कि 'बन्घुआ मजदूरों' दी पहिचान किस प्रकार की जाये 7 न तो जिला और तहसील स्वर के प्रशासक अपने क्षेत्रों में इनका अस्तित्व मानते हैं और न दी ऋणदाता स्वीकारते हैं कि उनकी सेवा में कोई ऐसे मजदूर कार्यरत हैं, और न ही श्रमिक यह बयान देने को दैयार होते हैं कि लम्बे समय से उन्हें बन्युआ मजदूर के रूप के कार्य करने के लिये बाध्य किया गया है। स्वैच्छिक सगठनों और गैर ग़जनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता समूहों से सम्बद्ध सामाजिक कार्यकर्ता ही बन्धुआ मजदूरों की पहचान वस्ते हैं। इस समस्या को और गम्भीर बनाने वाली एक और बाघा है बन्युआ मजदूयें का आर्थिक पुनर्वास। आर्थिक पुनर्वात्त में उनके लिए नौकरी की तलाश, उनके लिए 3७ आमीण सामाजिक व्यवस्था न्यूदवम मजदूरी दिलाना, कला और शिल्प में उन्हें दीक्षा दिलाना, कृषि भूमि का उनके लिए आवटन कराना, आवटित भूमि को विकसित करने में उनकी मदद करना, वन उत्पादों के अबन्ध में उनकी मदद करना, उन्हें और उनके बच्चों को शिक्षित करना, उनके लिए स्वास्थ्य चिकित्सा का प्रबन्ध कसा, आदि शामिल है। ये सभी कार्य कठिन हैं। आर्थिक पुनर्वास उपलब्ध करने के अतिरिक्त राज्य सरकारों से यह अपेक्षा भी की जाती है कि उनके मनोवैज्ञनिक पुनर्वास और राज्य तथा केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का समन्वय प्री किया जाये। पुनर्वास के लिए योजनाओं और उपायों की योजना बनाने में मुक्त श्रमिकों के विभिन विकल्पों के बीच उनको इच्छा का भी ध्यान रखना होगा (58079, ०0, थी. 54) बन्युआ स्थिति भे पीड़ा और वेदना (भाउच्च> ७०0 $एीलाएड 9 ०००8०) सर्वोच्च न्यायालय के एक मुख्य न्यायाधीश (न्यायमूर्ति पीएन भगवती) ने बन्घुआ मजदूयें का वर्णन करते हुए किह्य कि वे “गैर जोबित (30॥-९॥ए?) सभ्यता से निष्कासित तथा पशुओं से भी खराब जीवन व्यतीत करने वाले व्यविन है क्योंकि पशु इधए*उधर घूमने के लिए, भोजन पर अधिक या छोनने के लिए तो कम से कम स्वतत्र हैं, किन्तु ये बेचारे समाज से बहिष्कृत बन्धन में रखे जाते हैं और अपनी स्वत्त्रता से भी हाथ धोए रहते हैं” | उनवो ऐसा भयावह अस्तित्व श्रदान किया जाता है जहा या ती उन्हें एक उप्पर या खुले आसमान के नीचे रहना पडता है और जो कुछ भी अपर्याप्त भोजन जुटा पति हैं उसी में सन्हुष्ट एटा पड़ता है, वह भी उनके भूखे पेटों के लिये अपर्याप्त होता है। विकल्प के अभाव में भूख और गरीबी के काएण उन्हें ऐसे घोर अम्धेरे में व ऐसे शोषक समाज में, जिसमें से बचने वी वे आशा पी नही कर सकते, बन्धुआ जीवन जीना पड़ता है। (४०७09, )७३७४ 7-5, 987 32-33) | अनुमानव भारत में लगभग 32 लाख बन्धुआ मजदूर हैं। इनमें से 98 प्रतिशत ऋणग्रस्तता के काएण बन्धुआ मजदूर कहे जाते हैं और 2 प्रतिशत परम्पएांगतव सामाजिक मान्यताओं के कारण। सबसे अधिक सख्या आन प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में और उसके पश्चाद उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में मानी जाती है। (उच्चतम न्यायालय के निर्देशों पर किए गए) गज्य सरकारों द्वारा प्रायोजित सर्वेक्षण के आधार पर मई 997 में अधघुनतम ऑकड़ों के अनुसार, तमिलनाई में 24,000 अधिकतम वन्युआ मजदूर हैं जो कि 30 विभिन पेशों में लगे हैं। ग॥८ क४/0॥ 78, ४३ 3, 997) । यह बताया गया है कि अधिकतर बन्धुआ मजदूर गांवों में कृषि मजदूर के रूप में काम करवे हैं और बहिष्कृत या जनजातीय समुदायों से सम्बन्धित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कुल मजदूर शक्ति के 42 अ्िशव खेदिहर हैं और 25 प्रतिशद कृषि मजदूर को तरह काम करते हैं। कृषि मजदूएं के रूप में कार्य करने वालों में से 48 प्रतिशत अनुसूचित जाति के हैं और 33 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के अकुशल और असाठित होने के कारण कृषि मजदूरों के पास आजीविका चलाने के लिए व्यक्तिगत श्रम के अतिरिक्त और कुछ भो नहीं होता। बन्युआ कृषि मजदूर ग्रामीण स्वर पर निम्नतम स्थिति रखते हैं। एक गाँव में सामाजिक और आर्थिक स्वरीकरण भूमि और जाति से जुडा रहता है जो कि लोगों कौ आर्थिक और सामाजिक ग्रामीण पाग्माजिक व्यवस्था ञ प्रस्थिति को निर्धारित करते हैं। इस प्रकार बन्चुआ मजदूर दयक्कीय और कष्टमद दशाओं में रहते हैं। सामाजिक दृष्टि से उनका शोषण होता है क्योंकि यद्यपि सिद्धान्त में उन्हें भोजन, कपड़े और तम्बाकू का आश्वासन मिलता है, लेकिन व्यवद्टार में उन्हें बचा खुचा भोजन, और परिवार के सदस्यों के उतो हुए कपडे ही मिलते हैं। उन्हें 42 से 4 घन्टे प्रतिदिन कार्य करना पडता है और गाय और भैंसों के साथ तबेलों में रहने के लिए बाध्य होना पडता है। यदि वे बौमार पडते हैं तो उनका नियोजक दया करके स्थानीय हकीम से उनके लिए दवा का प्रदध करदा है। 989 भार्च तक भारत में पहचाने गए और मुक्त हुए बन्घुआ मजदूरों की कुल सख्या 242 लाख थो जिनमें से 2.8 लाख ७0 प्रतिशत) का पुनर्वास कर दिया जाना बताया जाता है (007०, !४४७, 989 - 23) । इस प्रकार भारत में कुल बन्युआ मजदूरों में से मुश्किल से 8 प्रतिशत मजदूर अब तक पहचाने गए हैं जो राज्य सरकाएं के /50 आ मजदूरों की समस्या के समाधान में रुचि कौ कमी का घयोतक है। 28, 979 और 983 के बीच भारत सरकार को प्रस्तुत की गई कम से कम चार रिपोर्ट में सकेत है कि भारत में बन्धुआ मजदूरी की शर्मनाक प्रथा किस प्रकार प्रचलन में रहो और देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को विकृत करती रही। यह एिपोर्टे थी (४) श्रम भत्नालय, भारत सरकार को भ्रस्तुत की गई ग्रामीण विकास केद्धों को रिपोर्ट जो 'बिहार के मुगेर जिले के बन्युआ मजदूयों के पुनर्वास” पर थी। (७) उत्तर प्रदेश के 'टिहरी गढवाल में बन्युआ मजदूरों कौ पुर्वास योजना के मूल्याकन अध्ययन' पर भारत सरकार के श्रम मत्रालय को भारतीय लोक प्रशासन सस्यान (00॥॥ 980902 00 एफ॥० #0ग/गन्रशशा0णे के सार्वजनिक नौति और योजना विभाग द्वाण प्रस्तुत रिपोर्ट, (७) उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आशय प्रदेश, कर्नाटक, उडीसा, बिहार, राजस्थान, तमिलनाडु और केरल में मुक्त बन्धुआ भजदूयें के पुर्वास और मुक्ति तथा पहचान के सम्बन्ध में तत्काल व स्थान पर हो अध्ययन के आधार पर भारत सरकार को (अ्म कल्याण) महानिदेशक, लक्ष्मी घर मिश्रा की रिपोर्ट, और (०) 7-9 फरवरी 983 से प्रारम्भ हुई राष्ट्रीय सेमीनार [[ठछ&0८काणा आते छ८॥४७॥॥॥0०७ 0 80500 .30०॥) को रिपोर्ट | मार्च 4989 तक पहचाने गए और मुक्त हुए 242 लाख बन्धुआ मजदूयें में से 26 प्रतिशत कर्नाटक में, 20 प्रतिशत उडीसा में, 6 प्रतिशत वमिलनाई में, 4 प्रतिशत आन्य प्रदेश में, ! प्रतिशत उत्तर प्रदेश में, 5 प्रतिशद बिहार में, 4 प्रतिशत मध्य प्रदेश में, 03 प्रतिशत केरल में और 02 प्रतिशत हरियाणा में मुक्त हुए (१&छ76, एण०.. 23)। पुरर्वास (७0०७9 ७७) बन्युआ मजदूरों को मुक्त कावाना और उनका पुतर्वात्त काना केवल राज्य सरकारों का हो दायित्व था किन्तु नवम्बर, 987 से आगे स्वैच्छिक सगठन भी पहचान और पुनर्वास के लिए अधिकृत कर दिए गए। मार्च 989 हक पुनर्वासित 2.8 लाख बन्युआ मजदूएों में से दीन चौदाई उडोसा 238%), कर्नाटक 033५), तमिलनाडु 7%) और उत्ता प्रदेश (2.%) में थे,पाँचवा भाप दोन ज्यों आशय प्रदेश (! :5), बिहार 5.2:%) और मध्य प्रदेश 86%) में थे और शेष 4 प्रदिशत वोन राज्यों--राजस्थान 8.22), महा (04%) 302 गमीण सायाजिक व्यवस्था और केरल (04%) में थे कदम 7बहगक उग्प्ाघवा, 208050 989 277) | बन्युआ मजदूरों के पुनर्वास और पहचान के सम्बन्ध में 986 के 20 सूत्रीय कार्यक्रम में भी प्रावधान है। इस कार्यक्रम का छठा बिन्दु बन्धुआ मजदूरों के विषय में ही है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत भारत सरकार ने अगस्त 986 में सभी ग़ज्यों के (श्रम कल्याण) उप महा निदेशकों को कार्यवाही करने के निर्देश जारी किए थे। तब से केद्धोय श्रम मल्नालय समय-समय पर बन्धुआ भजदूतें के पुनर्वास, मुक्ति और पहचान के कार्यक्रमों का मूल्याकत और सचालन करता रहा है। पुनर्वास मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दोनों तरह का होता है। शारीरिक पुनर्वास आधधिक होता है जबकि मनोवैज्ञानिक पुनर्वास आश्वासनों और पुमर्आश्वासनों कौ प्रक्रिया के द्वात बनाना पडा है। दोनों हो साथ साथ चलने चाहिए। मनोवैज्ञानिक पुनर्वास को प्रथम आवश्यकता यह है कि मुक्त बन्धुआ मजदूरों को पुराने आवासों से हटा दिया जाना चाहिए और उन्हें ऐमे स्थान पर पुनर्वासित किया जाना चाहिए जहाँ उन्हें उनके पूर्व नियोजकों का कोई प्रभाव ही न हो । जब तक मनोवैज्ञानिक रूप से उन्हें आश्वस्त न किया जाये कि बन्धन से मुक्त होने के बाद ऋण उनके भाग्य का निर्णय नही करेगा तब तक इस बात की सम्भावना बनी रहेगी कि वे फिर से ऋण बन्धन में फेस जॉये। मूलरूप से पुनर्वास के तीन चरण हैं. ()) मुक्ति के बाद तुरन्त भौतिक मदद, (0) नया जीवन प्रारम्भ करने के लिए मुक्त श्रमिकों को कम अवधि के सहायता उपाय (उदाहरण के लिए मकान के लिए जगह का आवटन, मकान बनाने के लिए सहायता, कृषि भूमि के लिए भूमि के टुकडे का आवरटन, बैलों की जोडो या कृषि उपकरणों की आपूर्ति, या लाभकारी रोजगार उपलब्ध कराने के प्रावधान आदि), और (00) लम्बी अवधि के उपाय (जैसे ऋण का प्रबन्ध, नई कुशलताओं में दीक्षा, मोजूदा कुशलताओं का विकास, मानदेयक मूल्य समर्थन प्रदान करना प्रौढ सदस्यों के लिए अनौपचारिक शिक्षा तथा बच्चों के लिए औपचारिक शिक्षा सुनिश्चित करना, चिकित्मा सुविधा प्राप्त करना, नागरिक अधिकारएंं की सुरक्षा! इस प्रकार पुनर्वास मुक्त बन्धुआ मजदूरों को आदमी की स्थिति प्रदान करेगा ताकि वे स्वय की सभ्य से को मुख्यधाय में शामिल कर सकें और मानव अस्तित्व कौ प्रतिष्ठा को अनुभव कर सकें। प्रभावी पुरर्वास पे कमियों त्‌ ७एछा॥६ ॥ प्रशीश्लाट एशाइणजा ०) विभधिन राज्यों भें बन्चुआ मजदूएं के लिए पुनर्वाप्त कार्यक्रमों के क्रियान्चयन के गुणपए्क पुनरीक्षण पर पता लगता है कि कुछ यज्य जैसे, उडीसा, उत्तर प्रदेश, केरल और आन्य प्रदेश, पहचान और पुनर्वास के अच्छे नहींजे अस्तुत करते हैं, लेकिन कुछ राज्यों में अभी भी नवीन परिवर्तदों कौ आवश्यकता है। निम्नलिखित स्पष्ट कमियों पर तुस्‍्त कार्यवाहों वी आवश्यकता है अशम, कार्यक्रम को किसी विशेष मत्रालय/विभाग का मानकर अकेले चलाने की अपेक्षा विभिन मत्रालयों विभागों के सहयोग की आवश्यकता है, जैसे कृषि, पशुपालन, सिंचाई, वन मत्स्य पालन, आदि, ताकि कार्यक्रम को राष्ट्रीय एकीकृत कार्यक्रम के रूप में आगीण साम्राजिक व्यवस्था 303 चलाया जा सके द्विदीय ,क्योंकि सामाजिक वातादरण और सामाजिक सरचना जिनके काएण अतीत में बन्धुआ मजदूरी प्रथा चलती रही और आज भी ग्रामीण जीवन और अर्थ व्यवस्था पर पिरी हुई है, उनकों जांच को जानी चाहिए और प्रतिबद्धता से परिवर्तन किया जाना चाहिए। तृतीय, विकास विभाग ऐसी योजनाओं से दबे रहते हैं जैसे आई आरडी पी (एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम, जे आखाई (जवाहर ग्रेजगार योजना), टीआरबाई णएसई एम (ग्रामीण युवकों के स्व रोजगार के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम), आदि, कि उनके कार्यक्रम अधिकतर समयबद्ध और उद्देश्यपरक ही रहते हैं और उनमें लाभार्थियों को वरीयता, अभिरुचि, आवश्यकताओं, आदि का ध्यान नही रखा जाता। इसलिए इन कार्यक्रमों को इस प्रकार बनाए जाने की आवश्यकता है दाकि वे उद्देश्य-समूहपरक (#8५-हाणाफ ०ां४॥/८0) हों, न कि उद्देश्य पर्क | चहुर्य, कमजोर आधारभूत सरचना और संसाधनों की कमो के कारण लाभाषियों को लम्बी अवधि के आधार पर सरक्षण प्रदान नहों किया जाता, प्ररिणाम स्वरूप बहुपा उत्पादक सम्पत्ति देनदारी बन जाती है। प्रचम, मध्यस्थ व्यक्ति पररोपजीवी की तरह काम करते हैं और अपने लाभ के लिए सीमित प्रतिफलों का पुनर्वास के लाभों का आनन्द लेते है। अत आवश्यकता इस बात की है कि सावधानीपूर्वक योजनाएं बनाई जायें शो कि पहले हो से उपलब्ध आधारभूत सरचना पर आधार हों और विविध प्रकार से सम्बद्ध हों । छठा, मुक्त बन्युआ मजदूर जो समाज के नि्नतम स्वर के होते हैं और निदान्त गरीबी और अभाव का प्रतिनिधित्व करते हैं उनमें किसी विशेष योजना का चुनाव करने को योग्यता नही होती जो उनके लिए लाभकारी हो। अपने लिए सही योजना को चुनने के लिए अधिकारियों पर उनकी निर्भरता उस्हें पुनर्वास के वास्तविक लाभों से वचित रखतो है। इस निर्भरता को कम करने को आवश्यकता है। अन्त में, पूर्व बन्धुआ मजदूर नियोजकों, मुक्त लोगों और विभिन्‍न विभागों के अधिकारियों का दृष्टिकोण इन गरीब बन्धुआ मजदूरों के भ्रवि बिल्कुल नही बदला है! यहा तक कि जब पूर्व नियोजकों द्वार या जमीदातें द्वार इन मजदूरों को पीटा जाता है, तब उनको भूमि जबरन छीन ली जाती है, उनके बच्चों को स्कूल जाते समय जमीदारों के धान के खेतों के बीच से नहीं गुजप्ने दिया जाता, उनके शोषकों द्वार उनके पशुओं को भगा दिया जाता है, और जब वे पुलिस में शिकायत करने हैं या सहायता के लिए डाक्टर के पास जावे हैं या सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों से शिकायत करते हैं, थे (अपिकारो, पुलिस, डाक्टर, आदि) उनकी शिकायत से जग भी प्रभावित नहीं होते और निषभभावी सवेदनाहीन, चुप हो जाते हैं और उनकी सहायता नहीं करते। लोगों और अधिकारियों के दृष्टिकोण में परिवर्तन के बिना मुक्त बन्युआ मजदूर समाज के अति शक्तिशाली वर्ण के स्गठित आधातों से बच नहीं सकते। उनको अज्ञावता, अशिक्षा और अपने अधिकारों के लिए लडने कौ अथोग्यता उन्हें हमेशा मुक्ति और विकास के लाों से वचित रखेगी। सामाजिक व्यवप्या और मामाजिक सरदना को उन गरीबों के लिए जो बन्धुआ मजदूर बन जाते है, साथ के लिए बदलता सरत कार्य नही है। दो उदाहरण दिये जा सकते हैं - एक जनजाति का व्यक्ति या वो अपने या अपने बेटे के विवाह के लिए कुछ घन प्राप्त कर लेता है और इस प्रकार बन्युआ मजदूर वन जावा है। इसी प्रफार, माना एक व्यक्ति को 304 ग्रामीण सामाजिक व्यवत्या अवैध शगब बनाने के जुर्प में न्यायालय से अभियुक्त माना गया है और उस पर कुछ जुर्माना किया गया है। क्योंकि उसके पास जुर्माना भरने के लिए घन नहीं है, वह एक प्रभावशाली व्यक्ति के पास अपना श्रम गिखवी रखकर ऋण ले लेता है और एक बन्धुआ मजदूर बन जाता है। अब, क्या वधू मूल्य प्रथा समाप्त करना सम्भव है ? क्या न्यायालय द्वारा आर्थिक दण्ड दिया जाना गलत है ? गरीबों कौ अनेक आर्थिक आवश्कताए बिना ऋण लिए पूर्ण नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में, आवश्यकता इस मात की है कि ऋण लेने में समझौते का सावधानी से परीक्षण किया जाये ताकि श्रम को गिरवी रखने से रोका जा सके और बन्युआ मजदूर प्रथा को नियत्रित क्या जा सके। विकास के लिए सामूहिक प्रयल मुक्त बन्धुआ मजदूरों को सगठित कर सकते हैं, ससाधनों को इकट्ठा करने योग्य बना सकते हैं विविध एजेन्सियों से सहायता ले सकते हैं तथा स्थाई पुनर्वास और गुणवत्तापूर्वक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए स्वयं को गठित कर सकते हैं। इस प्रकार के सामृहिक प्रयल सफलता प्राप्ति के लिए भूमि आधारित शिल्प-आधारित या सम्पत्ति आधारित हो सकते हैं। इसके लिए लाभाधियों का उचित चयन होना चाहिए। उस्त स्थान का चयन आवश्यक है जहा उन्हें स्थापित होना है तथा उन्हें सिखाई जाने वाली दक्षता का भी चयन होता है। लाभार्थियों में जागृति पैदा की जाने की भी आवश्यकता है। उनके पुनर्वास प्रगति और उनति, विकास के लिए सह उद्यम में स्वैच्छिक हिस्सेदारों के रूप में बदले जाने की भी आवश्यकता है। पर प्रमुख समस्या यह है कि यदि मुक्त बन्धुआ मजदूर पुनर्वासित नही किए जाते हैं, तो वे और अधिक कष्ट भोगेंगे। उनके सामने प्रश्न होगा भूख और गुलामी में से वे किसे चुने ? मुक्ति और सुरक्षा में से गुलामी में कठिन काम या परिवार के पालन के लिए अपयाप व परिणामस्वरूप कारावास का दण्ड में से किसे चुनें ? पुनर्वास का काम एक दशक पूर्व पूर्णछूप से गज्य सरकारों को सौंपा गया था। 983 में केन्द्र सरकार ने श्रम मत्रालय के माध्यम से एक योजना प्रयोजित की। केद्ध सरकार समान अनुदान आधार पर प्रतिवर्ष 4 से 5 करोड रुपया राज्य सरकारों को विशेष योजनाए बनाने के लिए प्रदान करती है। योजना आयोग की एक एपोर्ट के अनुसार पुनर्वास कार्य की प्रगति अत्यन्त मन्द है। राज्य सरकारों के अधिकार वर्ग में अग्रणी होने के गुण नही हैं या वे पहिचान और पुनर्वास के कार्यक्रमों के प्रति उदासीन रहते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता भी अपने काम में अनेक बाधाओं का सामना करते हैं। आशा की जाती है कि केन्द्रीय सहायता तथा स्वैच्छिक सगठनों की हिस्सेदारी बन्धुआ मजदूरों की पहचान और पुनर्वास के कार्यक्रमो को अधिक प्रभावी बना सकेंगे। 982 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी ऐसे श्रमिकों के 'जबरन मजदूरी” को उनके मौलिक अधिकारों का हनन बताया और 983 में न्यूनतम मजदूरी से कम पाने वाले श्रमिकों को “जब मजदूएं (०८० ॥980७४० कहा। 984 में फिर, सर्वोच्च न्यायायल ने बन्धुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम को क्रियान्वित करने में सरकार की विफलता का वर्णन किया और 976 के सविधान का इसे उल्लघन बताया। सर्वोच्च न्यायालय ने बन्युआ मजदूरों की मुक्ति के बाद उनके पुनर्वास को सरकार का दायित्व बताया ताकि मजदूर फिर से गरीबी और असहायता के कारण गुलामी न करने लगें (5॥30999, 990 56) | आशा की जाती है कि ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था आ5इ इस प्रकार के न्यायिक निर्णयों से राज्य सरकार और स्वैच्छिक संगठनों के प्रयलों को मजदूरों को उनके नियोजकों के चगुल से छुडाने मे मदद मिलेगो। प्रभावो चिता (सा०त९ एग्राल्श्या) बन्धुआ मजदूरों को दुर्दशा अभी भी एक गम्भीए सामाजिक समस्या बनी हुई है और यह जनता, सरकार, न्यापालिका, सामाजिक वैज्ञनिक, और सामाजिक कार्यकर्ता सभी के लिए चिन्ता का विषय है। लगभग ]7 लाख सालाना अपराध जिनके लिए आईपीसी (7८) के तहत लगभग 25 लाख व्यक्ति पकडे जाते हैं, यदि यह सब भारतीय समाज के लिए चिन्ता का विषय है तब तो बन्धुआ मजदूरों को मुक्त किया जाना समाज के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि इस विषय पर विविध अनुसन्धान विविध ऐजेन्सियों द्वार प्रायोजित किए जाने चाहिए ताकि समस्या के विस्तार और भ्रकृति को सुनिश्चित किया जा सके, पहचान के कार्य में पडने वाली बाधाओं का परीक्षण किया जा सके, विविध पुनर्वास योजनाओं का परीक्षण हो सके, केद्रीय सरकार और विविध स्वैच्छिक संगठनों के बोच तालमेल हो सके, 976 के अधिनियम को सुधार जा सके, सम्बन्धित अधिकारियों की जवाबदेही घ जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाये तथा मुक्त बन्धुआ मजदूरों के लिए बाद में देखरेख के कार्यक्रमों को प्रारम्भ किया जाये। जब तक स्वार्थी लोगों के घिनौमे शोषण से बन्थुआ मजदूरों को बचाने के गम्भीर प्रयल नही किए जाते, यह सम्रष्या सामाजिक सकट बनी रहेगी। कानून के द्वारा बन्चुआ मजदूरी प्रथा का पूर्ण उन्मूलन आगामी भविष्य में तो सम्भव न॑ भी हो, फिर भी कानूत न बनाने से पीडित मजदूएें की दशा और अधिक बिगड़ सकती है। गरीबी, बेगेजगारी तथा अशिक्षा को समाप्त करना, जो कि बन्युआ मजदूरी प्रथा के मूल कारण माने जाते हैं, सरल कार्य नही हैं। बन्धुआ मजदूरों के लिए भविष्य के कार्यक्रमों, योजनाओं आदि का बनाने के लिए विविध स्तरों पर विस्तृत कार्य एवं दृष्टिकोण को आवश्यकता होगी। बन्पुआ मजदूरों कौ समस्या को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और वैधानिक, विभिन स्तरों पर लड़ा जाना है। हमें पीडितों को शिक्षित करना है कि वे दबाव की नौति में न फसे । शोषकों को भी हमें यह बढ़ाना है कि कानूनों को उनके हित में नहीं मोडा जा सकता और जनतात्रिक भारत में कानून अपनी ही राह चलता है। जनता में भी प्रतिबद्ध राय बनानी है। हमें न केवल बुद्धिजोवियों को इसमें सम्मिलित करना है बल्कि प्रवुद्ध नागरिकों को भी ताकि वे इस सन्देश को सभी तक पहुचा सकें। हमें कानूनों को कठोरता से लागू करना है। हमें 'शजरीविश्ें पर भी दबाव डालना है कि वे इस विषय पर मिशनरों भावना से तथा लगन व रुचि पे काम करें। सामाजिक व आर्थिक रूप से कुछ शक्तिशालो लोगों के द्वारा शोषण पर आधारित व्यवस्था, अधिक सख्या में लोगों के कष्टों के मूल्य पर अपने हित साधन करना और उन्‍हें बन्धन में रखना हमारे रा्रीय जोवन के लिए शर्म की बात है। योडे से ऋण के लिए समाज के आर्थिक दृष्टि से पीडित वर्ण को बन्धन में रखना, भारतीयों को प्रदद समान सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के बिल्कुल विपतीत है। इस प्रथा को समाप्त करना मानव सम्मान और सवैधानिक मूल्यों के अनुरूप आपास्पूत महत्व का विषय है। 306 गमीण सामाजिक व्यवस्था भूमि सुधार प्रकृति एवं सामाजिक परिणाम (390 एशंगफ़ा5 | रिश्राएकट 200 (०75९पुण्था०९5) भूमि सुधार (70 ऐश) हमारे देश में निम्नलिखित भूमि सुधार स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात प्रारम्भ किए गए : 00 जमीदारों उन्मूलन, 2) भूमि उसकी जो जोते' मूल सिद्धान्त कौ स्वीकृति () चकबन्दी अधिनियम का क्रियान्वयन (५) भूदान और मर्वोदय आन्दोलनों को प्रोत्साहन देना, और 6) भू राजम्व प्राप्त करते के लिये उचित तर्कसगत आधार तय करना। 'भूमि जोतने वाले को प्रस्ताव प्रामीण आय को उन लागों के लिए तो लाभ के लिए पुर्वविदरित करने के लिए था जो खेतों में काम करते हैं परन्तु जो खेत नहीं जोतने उनके लिए हानिकारक था। इस प्रस्दाव का एक दूसग़ प्रभाव यह था कि कापी भूमि का नियत्रग जमीदार से काश्तकार, किएएदार व मजदूरों के हाथों में चला जाये। कानून के द्वारा इस प्रस्ताव को प्रभावी बनाने के लिए क्या सम्भावित उपाय थे 2? (॥) यह प्रावधान करना कि गैर काश्तकार भू-स्वामियों की मृत्यु के पश्चात भूमि का अधिकार उन लोगों को दिया जाये जो वास्तविक काश्दकार है, या 60) कानून में प्रावधान हो कि वर्तमान काश्तकर या भविष्य में भूमि को अपने हाथ से काश्तकाग करने का इरादा रखते हों, ऐसे लोगों के अतिरिकन कृषि भूमि के हस्तान्तरण न किए जायें, या (७) गैर काश्तकारों से भूमि के अधिकार छोन लिए जायें और पूर्व मालिकों को मुआवजा दिया जाये या उन्हें दूसरे पेशे अपनाने के उद्देश्य से पुनर्वास अनुदान प्रदान किया जाये। लेक्नि सम्पत्ति अधिकार उन्मूलन का कार्यक्रम क्रियाव्वयन सरल नहीं था। भूदान आदोलन (छ006॥॥ फै०श्ाधा) चैधानिक भूमि मुधार की निराशाजनक प्रगति से निराश होकर आचार्य विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन ने आगे का मार्ग प्रशस्त किया। भूमिहीनों कौ स्थिति को सुधारना हो इसका उद्देश्य था। यह मानने हुए कि भारत में पांच करोड धूमिहीन कमान हैं, विनोबा जौ ने पाँच करोड एक्ड भूमि दान में एकत्र करने का मन बनाया, ताकि प्रत्येक भूमिहोन को एक एक्ड भूमि दी जा सके। उन्होंने भू स्वामियों मे कह कि प्रत्येक अपनी भूमि का छठा भाग घूदाव आच्दोलन में दान दें। क्योंकि भ'सत में 95] में लगभग 30 करोड एकड भूमि कृषि योय थी, इमलिए पाँच करोड एक्ड बाछित भूमि का लक्ष्य पूण हो जाता। इसके पश्चात दान मं प्राप्त इस भूमि को भूदान कार्यकर्ताओं को देख रेख में भूमिहीन कृषकों में वितरित किया जाना था। यह अन्‍्दोलन प्रारम्भ में अच्छा चला क्योंकि (952 से 954) तीन वर्षो में हो 0.3 करोड एक्ड घूमि भूदान में प्राप्त हो गई। फिर यह आन्दोलन धीमा पड गया। हे देखा गया कि दान को गई भूमि का अधिकतर भाग चट्टानी, बजर, कृषि की दृष्टि से कम उपजाऊ या मुकदमे बाजों या विवादग्रस्त था। फिर, भूमि के वितरण में अनेक समस्याएं उ् खडी हुई। मई 955 नक प्राप्त कुल 3 75 मिलियन एकड भूमि में से लगभग 0.2 मिलियन एकड भूमि का ही पुनर्वितर्ण हो सका। जिला और तालुका स्वर के मेता लोग हवोत्साहित थे। वे भूदान से सम्बद्ध इसलिए हुए थे ताकि उनके अनुयाय्ियों को सख्या बढ सके या मजबूत हो सके। विनोवा जो ने इन प्रयल्लों का विशेष किया। उनका निवेदन उन सभी परी ममीण सामाजिक व्यवस्था 30 और बडे भूस्वामियों से था जो अपने स्वार्थों के लिए सभी प्रकार के भूमि सुधारों का विशेष करते थे। अत चकबंदी की तरह भूदान भी असफल हो गया। हरित क्रान्ति (976शा ॥९४ठोएाणा) रखित क्रान्चि, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादन में वृद्धि करना था, लगभग 966 में लाई गई। उच्च कोटि का उत्पादन देने वाले गेहू, धान, मक्का, ज्वार और बाजरा की उननवर किस्मों का प्रारम्भ बडे भू-स्वामियों के लिए लाभप्रद सिद्ध हुआ जबकि छोटे भू-स्वामियों के लिए कम | ऐसा इसलिए था क्योंकि इसके लिए पानी को अच्छी आपूर्ति, कीमती खाद, उन्नत किस्म के बीज, कीटनाशक और मशीनों के प्रयोग की आवश्यकता थी। यह सब केवल धनी किसान हो वहन कर सकते थे। पोसीजोशो (974 33) के अनुसार पजाब, हरियाणा और कुछ अच् क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति बनी कि छोटे भूस्वामियों ने बड़े भू स्वामियों को भूमि किराए पर देना शुरू कर दिया जिनको अपनी मशीनों से अधिक लाभ लेने के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता थी। एक ओर इससे धनी भूस्वामी अधिक धनी हो गए और दूसरी ओर इससे भूमिहौन मजदूऐं की स्या में वृद्धि हुई जिनमें से अधिकतर निम्न जाति के या अस्पृ्य हैं। आजादी से पूर्व यद्यपि लगभग 70 प्रतिशत ग्रामीण जनसख्या कृषि में लगी थी फिर भी कृषि उत्पादन इतना कम था कि हम अपनी खाद्य आपूर्ति के लिए विदेशों पर निर्भर थे । निम्न खाद्य उत्पादन, भूराजस्व एकत्र करने की ब्रिटिश मीति, कृषि में आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग को कमी, छोटे भूस्वामियों को ऋण सुविधा की कमी, जमीदारों ओर जागीरदारों द्वार छोटे कृषकों के शोषण तथा कृषकों में फसलों के नये ममूनों से उगामे की विधि को न अपनाने के कारण था। भू-राजस्व की ब्रिटिश नीति का परिणाम यह हुआ कि अनेक कृपक जो कर चुकाने में असमर्थ थे या तो उन्हें अपनी भूमि को गिरवी रखना पडा या बेचना पडा या फिए सहायता के लिए महाजन के पास ही जाना पडा। इस कारण से भूमिहीन किसानों और मजदूरों का अनुपात 89 में ग्रामीण जनसख्या के [3 प्रतिशत से बढकर 96] में 38 प्रतिशव हो गया (280६॥ 952)। 950 के दशक में जब देश कौ जनसख्या 067 प्रतिशत प्रति वर्ष को दर से बढ रहो थी, तब कृषि उत्पादन की दर 05 प्रतिशत हो थी। आजादो के बाद प्रारम्भ किए गए भूमि सुधारों से भूमि बडे भस्वामियों के हाथों में और अधिक मात्र में सिमट गई। भूमि सुधारों का सिद्धान्त था “जमीन काश्तकार के लिए”। बडे धूस्वामियों ने, जिन्हें ऐसे कानूनों का पूर्वानुमान था, इस कानून के क्रियान्वयन से पूर्व ही अपनी भूमि आसामियों से खाली का लो थी। अनेक आस्रामियों ने डर के मारे भूमि के अधिकार उनके स्वामियों को सौंप दिए थे। उसके बाद बडे भू स्वामियों ने थोडे समय के लिए या मौसमी आप्माप्रियों को भूमि किराए पर दे दी या आकस्मिक श्रमिकों की सहायता से स्वय बाशत प्रारम्भ कर दी। 953-54 तक ऊपर के 0 प्रतिशत भूस्वामी आधो से अधिक भूमि के मालिक बन बैठे, 47 प्रतिशत से कम के पाप्त प्रति परिवार एक एकड से कम भूमि रह गई, और 23 प्रतिशत भूमिहोन रह गए। कृषि उत्पादन जो 95-52 में तीन प्रविशत की दर से बढ रहा था 993-95 में छ प्रतिशत बढा, 7996-97 में दस प्रतिशत बढा, लेकिन 998-99 में छ भ्रदिशत से घट गया (काद० 7०48१ ४३०७ 8, 999 : 8-9) | यह अनुमान है कि उलत प्रौद्योगिकी से उन उत्पादन के प्रयोग से ऊपर के 0 308 आग्रीण सामाजिक व्यवस्था प्रतिशत भू-स्वानी भारत वी शहरी व अन्य ऐेर-द्पि आधारित जतस्ज्या के लिए काफी अल उत्पन करते रहे । इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग 48 करोड काश्तकार परिवार भूमि से बेटखल पी चारणा कमा वाजिज्यौक्रण दर तोन बे हो गए। यह गलत घारणा है। दृषि व्म वाणिज्यीकरण और गत तौन दशवों वी हरित क्रानि से न हो कृषकीं पर कुष्रभाव पड सका और न हो गावों को सरक्षण ((4४०४5९०) प्रथा के पद्ययों से मुक्ति मिल सकी । नियोवित ग्रामीण विकाम (70379९0 एणण 0086ल०फ॒णशा) ग्रामीण जीवन को दो प्रकार की नीतियाँ प्रभावित करती हैं. (3) उत्पादन-परक क्रियाए जिनका उद्देश्य उत्पादन और सेवाएँ प्रदान करना हो, उदाहरणार्थ, सब्मिडो प्राप्त खादें, पिचाई व ऋण उपलब्ध क्या, ग्रामीण उद्योगों का पा लगाना, आदि। (7) गैर-उत्पादन क्रियाएँ जिनका उद्देश्य जीवन स्तर उठाना हो। प्रधम प्रकार को क्रियाए ग्रामीण विकास उपाय कहलाते हैं। ये क्रियाए या तो समस्त ममुदाय को प्रभावित करदीं हैं या समुदाय के कमी विशेष वर्ग को। प्रथम प्रकार की क्रियाओं के ठदाहरण हैं सामुदायिक विकास योजनाएँ (952), पचायती राज (962), भूमि सुघार (950), गगेबी हटाओ कार्यक्रम जैसे एकीकृत प्रामीण विकास कर्यह्र्म (978) आदि, जबकि दूसरे प्रकार की क्रियाएं हैं, जनजातीय विकास्त कार्यक्रम (959), सूखारस क्षेत्र कार्यक्रम (979), रेगिस्तान विकास कर्यक्रम (977), काम के लिए भोजन कर्षक्र्म (977), राष्ट्रीय मरामौण रोजगार कार्यक्रम (980), ट्राइसेम (77२४८53॥), आदि (0८6 $9०8%, “रा 0७९०फुणवल्याँ एण065 0 [शत खधदादय अगक्राद री कार 4क्ाफ्छएयठा, # गोल, 990. 25-26)। कुछ झरर्यक्रम सम्पत्ति (उत्ददन बढाने सहित) बढाने के उद्देश्य से और लोगों को अर्गशक महायता पहुँचाने के उद्देश्य से थे, जैसे आई आरड़ो पी न्यूनतम कृषि मजदूरी, म्रामीण रोजगार कार्यक्रम, आदि जबकि अन्य कार्यक्रमों का उद्देश्य लोगों का सामाजिक उत्थान था, जैसे, जमींदारी उन्दूलन, भूमि सुघार, पचायतो राज, ट्राइसेम, आदि | कुछ कार्यक्रम वास्तव में गरीदी उन्मूलन के लिए थे (जैसे एनआरईपी का स्वय शेजगार कार्यक्रम, डीपीएपी (07047), ट्राइसेम का प्रशिक्षण कार्यक्रम, आदि), जबकि कुछ कार्यक्रम राजनीति से अधिक प्रेरित थे, जैसे गरेबी हठाओ और बोस मूत्रोय करर्यक्रम। लेकिन सामुदायिक भागीदारी, सामाजिक बुराइयों को दूर करना, तथा जीवन की गुझवत्ता को मुघारने जैसे मूल उद्देश्यों को अभी भी प्राप्त करता शेष है। उपाय (6 5ए/थ्‌्/९$) गरायाण विकास के लिए तोन उपाय अभी तक किए गए हैं. (0 प्रारप्प में १990) के दशक में नोवि विर्मानाओं ने पूजी निवेश बटाकर आर्दिक विद्याप्ष वी अधिकता पर बल दिया, यह मानते हुए कि इसके लाभ नीचे तक पहुंचेंगे और ग्रामीण समाज के सभी वर्गों तक ग्राप्त होंगे। लेक्नि 4970 के दशक में यह अनुभव किया गया कि कृषि विकास के लाभ गरीब ग्रामीणों तक नहों पहुंचे! (७) इससे सरचनात्मक सम्ग्दाय (#फ्रतशर् 5०४००) द्वाय अस्तुत दृष्टिकोण का 35दय हुआ जिसने यह सुझाव दिया कि सम्पत्ति (३७८७) का विवरण भूमि सुधर्गें, सामुदायिक विकास योजनाओं, और सहकारी खेतो द्वारा किया जा सकता है। आमीण सापाजिक व्यवस्था उ09 लेकिन यह भी व्यावहारिक सिद्ध नही हुआ। (#) 980 के दशक में एक नया विचार आया कि ग्रामौण विकास कार्यक्रमों के द्वाग गरौबी पर प्रहार किया जाये (जैसे ॥र08 वएशपाराश, धारारा) और रा. जो बाद में ॥२9 कार्यक्रम में विलय हो गया)। गरीबी विरोधी इन कार्यक्रमों के विश्लेषण से पूर्व हम गरीबी उन्मूलन में बीस सूत्रीय कार्यक्रम व पचवर्षीय योजना की भूमिका का मूल्याकन करेंगे। पचवर्षीय योजनाएँ, (56 ४ध्था एऐ/95) 950 में गठित योजना आयोग देश की आवश्यकवाओं और ससाघनों को ध्यान में रखते हुए भार के विकास के लिए पचवर्षीय योजनाएँ बनाता रहा है। प्रथम योजना 95 अप्रैल में प्रारम्भ को गई और तृतीय योजना मार्च 966 में सम्पन हुईं। इसके बाद तोन एक वर्षीय योजना अप्रैल, 966 से मार्च, [969 तक चली। चतुर्थ योजना अप्रैल 969 में प्रारम्भ हुई और नौवी योजना अप्रैल 997 में शरर्म्भ हुई (यद्यपि इसको मत्रिमण्डल कौ स्वीकृति जनवरी 999 में प्राप्त हु)। प्रथम पंचवर्षीय योजना (95-56) का उद्देश्य चहु-तरफा सन्तुलित विकास करना था और इसमें कृषि तथा सिंचाई को उच्चतम वरीयता दी गई जिसमें इस उपक्रम में कुल योजना राशि का 446 प्रतिशत धन निवेश किया जाना था। यह योजना कृषि आयाततों पर देश की निर्भरता कम करने के लिए बनाई गई थी और विदेशी विनिमय को बचाने के उद्देश्य से थी। परनु इस योजना में सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के विकाम को भी महत्व प्रदान किया गया था। योजना के अन्त में देश की राष्ट्रीय आय में 8 प्रतिशत को वृद्धि हुई और प्रति व्यक्ति आय में ] प्रतिशत की वृद्धि। द्वितीय पचवर्षीय योजना (956-6व) में इस बात पर बल दिया गया कि विकास के लाभ अपेक्षाकृत समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को पहुचने चाहिएँ और आय के क्रेक्लीयकरण में क्रमिक कमी आनी चाहिए। लेकिन योजना की कार्मविधि से अपेष्ित आशाए पूरी नहीं हुईं। लगभग सभी क्षेश्रें में उपलब्धि लक्ष्यों की अपेक्षा कम रही) परिणामद द्वितोय योजना के मूल्य स्वर में 2.5 अ्रविशत को वृद्धि देखी गई जब कि प्रथम पचवर्षीय योजना के अन्त में मूल्य सूचकाक 3 अविश्वत कम देखा गया था। तृतीय पववर्षीय योजना (96-66) का उद्देश्य आत्म निर्भर विकास की ओर अग्रसर होना था। इसमें पाँच उद्देश्यों को सूचो थी गद्टीय आय में 5 प्रतिशव तक बृद्धि करना, मूल उद्योगों का विकाप्त (जैसे, इस्पात, शक्ति, रसायन), कृषि में आत्म-निर्भरता, मानव शक्ति का विकेद्वीयकरण । कृषि, क्छे, एक बए फिर उच्च, झाधमिकता दो गई और लगभग 45 प्रद्िशत घन राशि इसी क्षेत्र को आवटित की गयी। तृद्ीय योजना का काम भी द्विदीय योजना की भ्ोवि हतोत्साहित करने वाला था। पाँच वर्षों को अवधि में, राट्रीय आय में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि लक्ष्य 5 प्रतिशव का था। कृषि क्षेत्र में भी उत्पादन को धक्का लगा। वृतीय योजना के अन्त में अर्थव्यवस्था को इतनी दुर्दशा थी कि चतुर्थ योजना, जो मार्व %6 में प्रास्म्भ होनी थो, छोडनी पडी और इसके स्थान पर तोन वार्षिक योजनाएं बनानी पड़ी । 4966 और 969 के बोच ठौन वर्ष का समय, जिसको 'योजना अववाश' कहा 30 आमीण सामाजिक व्यवत्या गया, वृदीय योजना में आए दोषों को सुधारने में लगाया गया। तीन पचवर्षीय योजमाओं का उद्देश्य तृतीय योजना के अपूर्ण कार्यों को पूरा करना था। चतुर्थ पचवर्षोय योजना 0969-74) का दद्देश्य था गट्ठीय आय को 5.5 प्रतिशत वक बढ़ाना, आर्थिक स्थिरता उत्तन करना, आय वितरण में असमानदा वो कम करता और समानता के साथ मामाजिक न्याय का दह्देश्य प्राप्त क्ला। कृषि व उद्योग दोनों क्षेत्रों में साथ-साथ विकास को चतुर्थ योजना में पूर्ण मान्यता प्रदान की गई। लेकिन इस योजना में भी आधिक विक्रास सुनिश्चित न हो सका। न तो इस योजना के अनाज के उत्पादन में आत्म निर्भरता आ सकी ओर न हो विस्तृत बेरोजगार समस्या के समाधान में रोजगार के अवसर पैदा किए जा सके। मुद्रा स्त्रीति की स्थिति भो गम्भीर हो गई। पँचम पचवर्षीय योजना (974-79) का मुख्य उद्देश्य गरीबी समाप्त करना और आत्म निर्भरता प्राप्त करना था। योजना का उद्देश्य रोजगार के अवसर बढ़ाना, आत्म निर्भरता, न्यूनतम मजदूरी की नीति बनाता, क्षेत्रीय असन्नुलन समाप्त करना तथा निर्यात को प्रोत्साहन देना था। यह योजना 979 के बजाय 978 में जनढा दल शासन काल में समाप्त हुई और छठी योजना (२०॥४8 #39) के रूप में प्रारम्भ हुईं। लेकिन 978 में क्प्रेस पुन सत्ता में आई तो पाचवों योजना को अवधि 974 से 979 तक कही गई। पाँचवों योजना क्सों भी क्षेत्र में अपने लक्ष्यों को प्राप्त न कर सकी, सिवाय अन उत्पादन में वृद्धि के। छठी पंचवर्षीय योजना (980-85) गत तीन दशकों की योजना की कमियों और उपलब्धियों को ध्यान में रख कर बनाई गई थीं। इसमें आर्थिक विकास, बेयेजगारी कम करने, आय के विनरण में असमानता दूर करने, प्रौद्योगिकी में आत्म निर्भरता, समाज के कमजोर वर्ग के स्तर को उठाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार तथा जनसख्या वृद्धि मैं नियत्रण पर बल दिया गया था। इस योजना ने काफी सफलता प्राप्त की। रा््रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के अनुसार गदोबो रेखा से नोचे रहने वाले लोगों का अनुपात 977-78 में 48.3 प्रतिशत से घटकर 984-85 में 369 प्रतिशत रह गया। सततिवों प्वर्षीय योजना (0985-90) में कार्य और उत्पादकता में वृद्धि सबंधी तोन॑ प्राथमिकताए थों। ठोस उत्पादक रोजगार उत्पन्न करने पर बल देने के साथ ही योजना का उद्देश्य गरैबी कम करना और गरीबों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना भी था। फिर भी यह योजता भी अपने उद्देश्यों की ध्राप्दि में असफ्ल रही। कृषि क्षेत्र में, निर्माण क्षेत्र में, गेजगार बढाने के क्षेत्र में तथा देश को भुगतान स्थिठि के सन्तुलन में गम्भीर नुकसान हुआ। आठवी पचवर्षोय योजन 22-97) जो 990 में प्रारम्भ होनी थी, वास्तव में अप्रेल 992 में क्रियान्वित हुईं। वर्ष 7990.9 और 799-92 वार्षिक योजनाए मानों गईं। यह योजना रोजगार उन्मुख समझो जा रहो थी। योजना का आर पूर्द योजना से दो गुना था लेकिन उसके वाद को सभी योजनाए आकर में दो गुती थीं। विकास दर पूर्व को अपेक्षा दोगुनी थी। सत्य यह था कि प्रथम और छठो योजना के अतिरिक्त कोई भी योजना शायद ही लक्ष्य ग्राप्तकर सकी । आठवीं योजना अन्य पूर्व योजनाओं से बिल्कुल भिन्‍न नहीं थी और न हो इसके परिणाम भिन्‍न थे । नवी पचवर्षीय योजना जनवगें 2999 में हो मत्रौमण्डल से स्वीकृत हुई। इसको विकासोन्सुख और महत्वाकाक्षी कहा गया। इस योजना के प्राथमिकता के क्षेत्र हैं - कृषि, प्रामीण सामाजिक व्यवस्पा ञा रोजगाए, गरीबी, और कृषि के मूलढाचे थे, लेकिन सर्वोच्च प्राथमिकता सिंचाई को दी गई थी। पाच मूल ढाँचागत क्षेत्रों की कार्य कुशलता और उत्पादकता--सिंचाई, शक्ति, खनिज, रेलवे तथा संचार-में भी सुधार कौ आशा है। इस योजना को निकासी-अभिमुख (पथार्टाए ०पंथ/८त) कहा गया है। घचवर्षीय योजनाओं का मूल्याकन (#55९55फ९क ण॑ ४ घछाए शेआ७) यदि हम सभी नौ पंचवर्षीय योजनाओं को जानकारों लें तो पता लगेगा कि योजना के पाँच दशकों में हपारी सभी योजनाएं किसो न किसी विषय की ओर उन्मुख थी, कभी कृषि उत्पादन में आत्म निर्भाता, कभी औद्योगिक विकास, आदि। लेकिन गरीबी और बेरोजगार हमेशा वृद्धि की ओर रहे हैं। 95 से 50 वर्षों की अवधि में आर्थिक विकास की औसत दर 3 प्रविशत रही है। यद्यपि यह विश्व के 4 प्रतिशत की तुलना में बुरा नही है, तथापि विकासशील देशों के 7 से १0 प्रतिशत की तुलना भें कम है। 95-2000 के घोच हमारी वार्षिक राष्ट्रीय आय 35 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, कृषि उत्पादन 27 प्रतिशत, औद्योगिक उत्पादन 6 प्रतिशत और प्रति व्यक्ति आय में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यद्यपि सरकार ने दावा किया है कि गरोबी को सोमा रेखा से नीचे के लोगों की सख्या 999 में 36 प्रतिशत ही थी, लेकिन क्योंकि बेरोजगार लोगों की सख्या में वृद्धि हुई है, अत हम यह नहीं कर सकते कि गरीबी कम हो गई है। इसमें आश्चर्य नही कि आज अधिक लोप कुण्ठा का अनुभव करते हैं और प्रतिवर्ष आन्दोलन बढ़ रहे हैं। बोस सूत्रोय कार्यक्रम (20 709 ए7087शग70) इस कार्यक्रम को इन्दिरा गान्धी ने गरीबी और आर्थिक शोषण कम करने तथा समाज के कमजोर वर्ण के लोगों के उत्थान के उद्देश्य से जुलाई 975 में प्रारम्भ किया। इस कार्यक्रम के पाँच महत्तपूर्ण उद्देश्य थे (४) मुद्रा स्फीवि नियत्रण, (0) उत्पादन को प्रोत्साहन देना, (०) ग्रामीण जय कल्याण, (०) शहरी मध्यम वर्ग को सहायता देना, और (०) सामाजिक अपराध नियत्रण। 20 सूत्रीय कार्यक्रम में सम्मिलित कार्यक्रम थे भिंचाई सुविधाओं में वृद्धि, अतिरिक्त भूमि का वितरण, भूमिहोन मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी, बन्धुआ मजदूयों का पुर्र्वास्ष, परिगणित और परि्णित जनजाति का उत्थान, आदास सुविधाओं का विकाप्त, शक्ति उत्पाद में वृद्धि, परिवार नियोजन कार्यक्रम बनाना, वृक्षारोपण, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं वा विस्तार, रिरयों और बच्चों के कल्याण के लिए कार्यक्रम, प्राथमिक शिक्षा में वृद्धि, वितरण प्रणाली को मजबूत करना, औद्योगिक नीतियों का सरलोकरण, काले धन का नियत्रण, पीने के पानो को सुविधाओं को बेहतर बनाना, और आन्तरिक सझ्ाथनों का विकास कजा। 20 सूत्रैय कार्यक्रम सत्ता परिवर्तन से कम होता गया जब जनता दल सरकार सत्ता में आई, यद्यपि जनवरों 982 में यह कार्यक्रम नये स्वरूप में फिर से लागू किया गया। अन्य वल्लुओं में इस पुनरोश्ित कार्यक्रम में प्रामोण विकास की होड़ गति और ग्रामीण गरोबो पर 32 आमीय साम्राजिक व्यवस्था सीधा प्रहार सम्मिलित था, इसके साथ-साथ परिगगणित जाति और परिगणित जनजाति का उत्थान भी सम्मिलित था। छठी योजना अवधि (9809-85) से प्राप्त अनुभवों के प्रकाश में 20 सूत्रीय कार्यक्रम अगस्त 986 में पुनरीक्षित एवं सीमित किया गया। इस पुनर्निमित कार्यक्रम का उद्देश्य था गरीबी हटाना, उत्पादकता में वृद्धि करना, आय असमानता, सामाजिक और आर्थिक असंमानताए कम करनां, और जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि कना। 3986 के पुननिर्मित 20 सूत्रीय कार्यक्रम में निम्नलिखित वायदे सम्मिलित हैं. म्रामीण गरीबी पर प्रहार, वर्षा सिंचित कृषि के लिए कार्य योजना, सिंचाई के पानी का बेहतर प्रयोग, बड़ी फसलें, भूमि सुधारों वा क्रियान्वयन, ग्रामोण श्रम के लिए विशेष कार्यक्रम, स्वच्छ पीने का पानी, सभी के लिए स्वास्थ्य, दो बच्चों का सिद्धान्त, शिक्षा का विस्तार, परिगणित जाति व परिगणित जनजावि के लिए न्याय, खत्रियों के लिए समानता, युवाओं के लिए नवीन अवसर, लोगों के लिए घर, झुग्गी बस्तियों में सुधार, वानिकी (7८४79) के लिए नयी कार्ययोजना, वातावरण संरक्षण, उपभोक्ता के लिए चिन्ता, गाँवों के लिए ऊर्जा, और उत्तरदायी प्रशासन। यह तथ्य कि शहरी और प्रामीण लोग अधिक असन्हुष्ट हैं और आज वे अधिक कुण्ठा का अनुभव कर रहे हैं, इस ओर स्रकेठ करठा है कि 20 सूत्रीय कार्यक्रम अपनी वचनबद्धता में असफल रहा है। राज्य के निर्धनता कम करने के लिए कार्यक्रम (896 एकशा श्रै।शशंजा0ा ए:०ट्राथ्राप९5) निर्धनता उन्मूलन के लिए अनेक कार्यक्रम ग्रामीण निर्धनों तथा छोटे और सोमान्त किसानों, भूमिहीन मजदूरों, तथा ग्रामीण शिल्पियों के लिए सरकार द्वाण प्रारम्भ किए गये हैं। सम्मति महत्वपूर्ण कार्यों में से चल रहे कार्यक्रम हैं. आई आरडी पी (ए07) (सहायता एशि/ऋण स्व रोजगार तथा सिंचाई के लिए, पशु पालन आदि समर्थक भूमि आधारित कार्य) ट्राइसेम (स्व-रोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं को कुशलताओं में प्रशिक्षित करना), जवाहर रोजगार योजना (प्रामीण बेरोजगारों तथा कम बेणेजगारों के लिए लाभप्रद अतिरिक्त रोजगार पैदा करना तथा एक गरीब परिवार में कम से कम एक सदस्थ को एक वर्ष में 50 से 00 दिन रोजगार प्रदान करना, एनआरईपी (गर्?) (छोले मौसम में दिहाडी रोजगार, आरएलईजोपी (९,567) त्येक भूमिहोन परिवार को 80 से 00 दिन का दिहाडी रोजगा), और डीडी पी (0707) (ठण्डे और गर्म रेगिस्तानों के क्षेत्र विकास)। एकीकृत ग्रामीण कार्यक्रम (207) एकीकृत आमीण विकास कार्यक्रम गरीबी उन्पूलन के लिए सरकार का एक यु ख साधन है। इसका उद्देश्य प्राथमिक क्षेत्र में परिवारों को कृषि, फलोद्यान और पशु पालन जैसे स्वरोजगार उपक्रमों में लगाकर गरीबी रेखा से ऊपर उठाना, द्वितीय क्षेत्र में कपड़ा बुनना दथा हस्तकला का विकास, और वृतोय॑ क्षेत्र में नौकरी व व्यापार प्राप्त करने योग्य बनाना था। आई आखडौ पी का उद्देश्य है निश्चित समय सीमा और निवेश में न्यूनदम तय किए गए ग्रामीण झ्ाम्राजिक व्यवस्था 33 परिवारों को गरेबी की रेखा पार कएना। इस अकार इसमें सम्मिलित तीन चर (४4068) इस प्रकार हैं : (४) गरीब घर्रो की सख्या, (9) निवेश के लिए उपलब्ध ससाधन, और (०) समय अवधि जिसमें निवेशित पूजी आय देने लगेगी जो परिवार को गरीबी रेखा पार करने योग्य बना देगी। आई.आरडी पी कार्यक्रम केन्द्र सरकार के द्वाय 20 चयनित जिलों में मार्च 976 में प्राएभ किया गया लेकिन अक्टूबर 982 से यह कार्यक्रम देश के सभी जिलों में विस्तृत कर दिया गया। यह कार्यक्रम परिवार को विकास की एक इकाई मानता है। इस कार्यक्रम के कार्यात्मक पक्ष का इस तथ्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि 80 लाख से ऊपर परिवार १993.94 और 997.98 के बीच पाच वर्षों में आर्थिक दशा सुधारने हेतु सहायता प्राप्त कर थे । आई आएडी पी की कार्यप्रणाली के क्रियान्वयन के लिए अनेक सस्थाओं ने अध्ययन किया है। उन्होंने कार्यक्रम के क्रियान्वयन में अनेक दोषों की ओर सकेत किया है। किसी भी संस्था में कार्यक्रम की उपयोगिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया है। इस योजना के विरुद्ध मुख्य आलोचनाएँ इस प्रकार हें ()) कार्यक्रम में कई दोष हैं और आई आरड़ीप्री के अन्ठर्गत गठित सभी लाभ गरीबों के लिए नहीं हैं। इसके दीन प्रमुख कारण हैं. (8) गरौब लोग रिश्वत नही दे सकते, जटिल कागजात नहीं भर सकते, गाँव के मुखिया को प्रभावित नहीं कर सकते और अपने लिए जमानत का प्रबन्ध नहीं कर सकते, (0) बैंक अधिकारों गऐेब ऋण लेने वालों के प्रति उदासीनता का व्यवहार करते हैं। उनका विश्वाप्त है--सही या गलत-कि गरीबों को ऋण देना जोखिम भर है क्योंकि ऋण वसूली ग्रामीण बैंक को किसी खास शाखा के कार्य का धोतक भाना जाता है, और (०) गरीब स्वय भी ऐसे कार्यक्रमों में कम रुचि लेते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कही उन्हें ठगा तो नही जा रहा या फिर ऋण न चुका पाएँ। 0) ऋण कार्यक्रम के क्रियान्वयन में अत्यधिक भ्रष्टाचार, दुरूपयोग और अव्यवस्थाएं हैं। ऋण योजना के दिशा निर्देशों में थोडा हेर फेर करके ऋण गलत आवंटित कर दिया जाता है क्योंकि (७) दिशा निर्देशों में स्पष्ट है कि ऋणों के स्वच्छ आवटन के लिए लाभार्थियों के लाभ के लिए आम सभा की बैठकें (गाँव की सभा) आयोजित की जानी चाहिए लेकिन व्यवहार में ऐसा होदा नहीं क्योंकि गाँव के मुखिया और ग्राम सेवक गाँववासियों और प्रशासन के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं, (७) ऋण प्राप्त करने में रिश्वत ही आधार होती है, और (९ ) घर घर का सर्वेक्षण, जिस पर योग्य (८॥६॥७।८) परिवारों को सूची आधाहित मानी जाती है, पाँच यर्षों में केवल एक हो बार किया जाता है। 69) कार्यक्रम परिवारःआधारित है और क्षेत्र के ससाधनों पर आधारित या विकास आवश्कयताओं के साथ सम्बद्ध नहीं है। इस प्रकार आईंआएडी पी ऋण न वो लाभार्थियों के जीवन स्तर को उठाता है और न ही गरीबों को गरीबी के रेखा से ऊपर उठाकर ग्रामीण निर्षधनता पर कोई प्रभाव डालता है। कर्नाटक, उत्स्भदेश, पश्चिम बगाल, गुजरात, राजस्थान में अनेक जिलों के अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है। गगैवी पर विश्व बैंक योजना के अन्तर्गत गजघ््थात में सात जिलों में 996 एक अध्ययन किया गया था। अप्रैल 997 में प्रत्येक जिले के द्राो अलग-अलग एिपोर्ट भस्तृत को गई थी। अन्य तीन राज्यों--पश्चिप बगल, आत्यप्रदेश और मध्यप्रदेश-में भी 34 आम्रीण सामाजिक व्यवस्था इसी प्रकार के अध्ययन किए गए थे) इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार के गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम समाप्त कर दिए जायें। सरकार अपने उत्तरदायित्व से मुह नही फेर सकती | इसे तो केवल रोजगार पैदा करने के कार्यक्रमों को लागू करना और मौजूदा योजनाओं का वास्तविक लाभ, वचित समूझें तक पहुचाने के उद्देश्य से भ्रष्टाचार मिटाना है। ग्रापीण सुवको को स्व रोजगार के लिए प्रशिक्षण सवद्री कार्यक्रम तए्४5८७) स्व-रोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित करने की योजना 5 अगस्त 979 में कृषि, उद्योग और व्यापार क्रियाकलापों के क्षेत्रों में प्रारम्भ को गयी थी। केवल 8-35 आयु वर्ग के गरोबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों से सम्बद्ध युवा इस प्रशिक्षण के लिए योग्य हैं। इसमें अनुसूचित जाति एव अनुसूचित जनजाति के लोगों, भूढ पूर्व सैनिकों और नवीं कक्षा पास लोगों को चयन में प्राथमिकता दी जाती है। एक तिहाई स्थान स्त्रियों के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं। प्रशिष्ुओं के लिए बजीफा राशि 75 रुपये से 200 रुपये प्रतिमाह के बीच होती है। प्रशिक्षण सम्पन्न होने पर ट्राइसेम लाभार्थियों को आई आरड़ी पी के अन्तर्गत सहायता दी जाती है। 992-93 और 995-96 के मध्य चार वर्षों में दो लाख युवा प्रतिवर्ष प्रशिक्षित किए गए जिनमें से 4$ प्रतिशत स्व रोजगार में लग गए और 30 प्रतिशत दिहाडी पर गेजगार में लगे रहे (820/०ग्रा० 870 ए०॥0८8॥ ४८८०५, 995) | 996-97 से १999-2000 तक चार वर्षों में भी दो लाख से कुछ कम युवाओं को प्रशिक्षित किया गया है। इस कार्यक्रम के प्रमुख आलोचना बिन्दु इस प्रकार हैं. 0) आवश्यकता के अनुसार इसका प्रसार कम है, (४) प्रदत्त कुशलता ग्रामीण औद्योगिकरण प्रक्रिया से जुडी हुईं नहीं है। प्रशिक्षण अस्थाई तौर पर दिया जाता है और प्रदत्त कुशलवा निम्न स्तर की होती है, और (४) चजीफे को राशि प्रशिक्षण पर जाने घाले युवाओं को प्रेरित करने के लिए अपर्याप्त है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (५४८९) यह कार्मक्रम अतिरिक्त खाद्यान्न की सहायवा से ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त रोजगार अवस्तर पैदा करने के लिये नियोजित किया गया था। प्रारम्भ में इस कार्यक्रम को भोजन के लिए कार्य योजना (7५४०) कहा गया था। यह योजना 976-77 के अन्त में बनाई गई थी, लेकिन वास्तव में अप्रैल १, 7977 को यह प्रभावी हुई। इस योजना के अन्तर्गत लाखों दन खाद्यान के उपभोग के द्वारा प्रतिवर्ष लाखों गेजगार के मानव दिवस (छ9709)5) बनाएं गए थे। खाद्याल सरक्षण, विद्यमान सडकों का रख रखाव, नयी लिंक सडकों का निर्माण, सिंचाई सुविधाओं का सुधार, पचायठ घरों, स्कूल भवनों, स्वास्थ्य केद्रों का निर्माण तथा प्रामीण केतरं में सफाई दशाओं में सुधार, आदि इसके अन्तर्गत शुरू किए गए। इस कार्यक्रम में कुछ करमियों के कारण इसका (7५४०) अक्टूबर 980 में पुनर्तिरमाण किया गया था और छठौ योजना (980-85) का हिस्सा मानदे हुए इसका नाम एन आरईप्री दिया गया। इसका उद्देश्य उन ग्रामीण गरीबों की चिन्ता करना था जो अधिकतर मजदूरी पर निर्भर होते हैं और जिनके पास कृषि की कमजोर अवधि में जीविका का कोई साधन नहीं होता। इस कार्यक्रम के 6 आमीप सामाजिक व्यवाथा अक्टूबर 3977 में चलाया गया था। विचार यह था कि प्रतिवर्ष भ्रति गाँव से पाँच सबसे गरीब परिवार चयन किए जायें (27,000 आवासी गावों से) और उनकी आर्थिक भलाई में मदद कौ जाये। प्रारम्भ में राज्य के विभिन पर्यावरण क्षेत्रों (८०००ट्ाटथ :6.7070) में स्थित 25 गादवों में दैव सर्वेक्षण (787009 ६४४८५) से किया गया और ऋणग्रस्तवा के, निर्भरता अनुपात, भूमि की भौतिक परिसम्पत्ति, पशुधन, व्यवसाय, शैक्षिकस्त, आय और परिवार के आकार के सन्दर्भ में एक एक परिवार के विषय में सूचना एकत्र की गई। उसके बाद अन्त्योदय की विस्तृत योजना बनाई गई | प्राथमिकता के क्रम में गयैब परिवारों के चयन के लिए आधिक आपार इस प्रकार निश्चित किए गए (0) वे परिवार जो नितान्त अभाव में बिना उत्पादक सम्पत्ति के रहते हों और जिनमें 5 से 59 आयु समूह के कोई भी सदस्य आर्थिक क्रिया कलाप करने के योग्य न हो, (2) वे परिवार जिनके पास कोई भी भूमि मा पशु जैसी सम्पत्ति न हो लेकिन जिसका कप से कम एक सदस्य काम कपने योग्य हो और उस परिवार की प्रति व्यक्ति आय 20 रुपये प्रति माह द्क हो, (3) वे परिवार जिनके पास कुछ उत्पादक परिसम्पत्ति हो और प्रति व्यक्ति आय 30 रुपये प्रति माह हो, और (4) वे परिवार जिनकी प्रति व्यक्ति आय 40 रुपये प्रति माह हो। ऐसे परिवारों की पहचान करने का काम ग्राम सभा को सौंपा गया। इस योजना के अन्तर्गत खेती करने के लिए भूमि आवटन, मासिक पेंशन, मैंक से ऋण वथा नौकरी ढूढने में सहायता के द्वार किया गया। भ्रत्येक चयनित परिवार को 30-40 रुपये प्रतिमाह पेंशन दो गई। बैल गाडी, पशुधन (मैंसे, गाय, बकरी और सुअर आदि खरीदने के लिए) टोकरी निर्माण, बढई के औजाए खरीदने के लिए, दर्जी को दुकान खोलने के लिए, चाय, नाई या पंसारी तथा साबुन व निवाड बनाने के कार्यों के लिए बैंक से ऋण उपलब्ध कराया गया। जिला स्तर पर अन्त्योदय योजना का प्रशासन कलेक्टर तथा राज्य स्तर पर कृषि विभाग को सौंपा गया। इस योजना के अन्तर्गत गजस्थान सरकार कौ गोजना पाँच वर्षों में (978 से 982 तक) लगभग छ लाख परिवारों की सहायता करने की थी। स्वीकृत धनराशि की लगभग एक तिहाई पेंशन के रूप में दिया जाना था, लगपण दो तिहाई ऋण के रूप में और 4 प्रतिशत खादी बोर्ड के माध्यम से (ऋण और सहयोग राशि) के रूप में दी जानो थी। इस योजना के अन्तर्गत तीन वर्षों की अवधि में 978 से 980 तक लगभा डाई लाख चिन्हित परिवाएँ में से 83 प्रतिशठ को सहायता दी गई । चयनित परिवाएं में से 22 अतिशत को भूमि आवंटित की गई, 40 प्रतिशत को ऋण, 22 प्रतिशत को सामाजिक सरक्षण लाभ, और 8 प्रतिशत को रोजगार और अन्य लाभ उपलब्ध कराए गए (४०४७, 4953 347)। राजस्थान सरकार ने 98] में इस कार्यक्रम को पुनर्जावित किया! इसने तीर वर्षो को अवधि में प्रत्येक ब्लाक से गरौबी रेखा से नीचे के लगभग 800 परिवारों को लाभ पहुंचाया गया। भूमि आवटन और सामाजिक सुरक्षा लाभ सहायता राशि से अलग रखे गए। राजस्थान सरकार के कदमों पर चलते हुए उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश ने भी इमी प्रकार के कार्यक्रम 980 में चलाए। लेकिन राज्य में राजनीतिक परिवर्तनों ने इस कार्यक्रम को प्रभावित किया। अब कहा जा सकता है कि यह कार्यक्रम कम या ज्यादा असफल ही रहा है। परिवारों के चयन में पक्षपात, अधिकारियों में सहयोग की कमी, ऋण अदायगी में देर, तथा कार्य-पश्चात देख रेख में उपेक्षा इसकी असफलता के कारण रहे | राजस्थान स्वीर प्रमीण सामाजिक व्यवस्था 37 ने सितम्बर 990 से राज्य भें फिर से इस योजना को लागू किया है परन्तु वर्धमान में यह अधिक प्रचलित नहीं है। 2000 में) गरीबी हटाओ और वेकारी हटाओ कार्यक्रम (6गंकं मव30 भात छत0छर्व पि्वाव0 ?7०.्टा्रागा६७) “गरीबी हटाओ' का नाण इन्दिरा गान्यी द्वारा मार्च 97। में राष्ट्रीय चुनावों के दौरान दिया गया था जबकि 'बेकारी हटाओ' का नाग अखिल भारतीय काम्रेस़ समिति द्वाप अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में अप्रैल 988 में । वास्तव में कांग्रेस तो 950 के दशक से ही 'समाजवाद' की बात करतो रही है। काग्रेस ने आवडी अधिवेशन 955, भुवनेश्वर अधिवेशन 7964, और कामराजनगर अधिवेशन अप्रैल 988 में 'समाजवाद' को अपना त्रमुख लक्ष्य घोषित किया था। लेकिन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में काप्रेस कहा तक सफल रही यह इस तथ्य से सकेत मिला है कि हमारे देश में टस लाख लोग भीख माग कर जीवित हैं, लगभग 50 हजार लोग रा किए हुए रक्त से जीवत हैं और कग्रेड़ों लोगों की आय 500 रपये प्रति माह से भी कम । गरीबी-विशेधी कार्यक्रम का आलोचनात्मक पूल्याकन (एबादा एच्याण्नांग ण॑ व6 #ा-?0५ एफट्राथ्याएट5) विशेषज्ञों और शिक्षाविदों द्वाश किए गए विविध अध्ययनों ने दर्शाया है कि कोई भी कार्यक्रम ग्राषीण गैबी के स्तर को गिशने में सफल नहीं हुआ है। प्राभी्णों का एक बडा भाग भूल आवश्यकताओं के अभाव में जीवित है। कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में निहित दोष असम्बोधित पड़े हैं। सबसे पहले नीतिया राजनौतिज्ञों और नौकरशाहों की सुविधा के विधार से दिग्दर्शित हैं, बजाय ग्रामोणों को आवश्यकताओं और सतही यथार्थ से | परिणामत ग्रामीण अर्थतन््र को दिशाए उपेक्षित हो रह जाती हैं। दूसरे, क्योंकि अत्येक कार्यक्रम आगामी चुनाव को ध्यान में एख कर प्रासम्म किए जाते हैं, अत कार्यक्रम टुकड़ों में चलवा है और कई यार्यक्रम तो कुछ समय बाद समाप्त ही हो जाते हैं। तीसरे, कार्यक्रम इस प्रकार बनाए जाते हैं कि बिना उनके विशिष्ट व्यवस्तायिक अविरूप (एगापुणट ०८शाणार्श एशाटया) और स्थानीय आवश्यकताओं को घ्यान में रखे वे ग्रामीण अर्थव्यस्था पर थोष दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप, सूजित सापत्ति (355०६ (८७८०) टिकाऊ नहीं होते हैं। चौथे, कार्यक्रम कृषि क्षेत्र पर अधिक केद्धित हैं। ग्रामीण औद्योगीकरण पर वाच्छित घ्यान नहीं दिया जा रहा ! पाँचवें, इसके बावजूद भी कि सरकार ने कृषि उत्पादन और उत्पादकता, सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दूर करने और, आय असमानताओं को कम करने को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की है, इन योजनाओं के लाभ देश के सबसे गरीब वर्ग हक नहीं पहुंचे हैं। जत संसाधन, ऋण सुविधा, रज्य सहायक राशि (६४७७०४+) और अन्य सुविधाएँ कठिपय बडे किसानों द्वारा हडप लो जाती हैं तथा मध्यम व गरीब किसानों को वस्तुएँ ऊचे मूल्य पर खदने पड़ते है। छठे, विविध कार्यक्रमों के बीच कोई सामजस्य नहीं है। विविध गेजगार कार्यक्रमों के जवाहर योजना में विलय के बाद भो सप्कार अभी तक पदायवों दो समय पर कोष उपलब्ध नहों का पाती। साददें, इन कार्यक्रमों से सम्बद अधिकायें सरकार द्वारा रखे 35 गमीण साम्राजिक व्यवस्था गए लक्ष्यों में अधिक विश्वास करते नही दिखाई देते, फलस्वरूप वे अपनी भूमिका निर्वाह के प्रति प्रतिबद्ध नही हैं। अत वे या तो लोगों में इन कार्यक्रमों के प्रति जागृति पैदा कले में क्ष्म कष्ट उठाते हैं या उनका विश्वास जीतने तथा सहयोग लेने में असफल रहते हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि सरकार भी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करे में असमर्थ रही है। अख्िय, जवाहर रोजगार जैसी योजना में केनद्रीय धन कुछ राज्यों द्वाय पार्टी कार्यों में भी लगा दिया जाता है। उदाहरणार्थ, एक अध्ययन से पता चला है कि केनद्रीय सरकार द्वारा आश्रम प्रदेश के नलगोण्डा जिले में नये सिंचाई के लिए कुओं के लिए स्वीकृत 30,000 रुपये की जालसाजी हो गई और एक भी कुआ नही बना। मात्र योजना बनाना काफ़ी नहीं है। महत्व का विषय यह है कि गरीबी विरोधो मुहिम को सफल बनाने वाले अभिकारकों के क्रियान्वयन प्रयलों (॥जएव्णिथरागाए्ट 48070०८5) में ईमानदारी व निष्ठा हो। सामुदायिक विकास योजनाएँ (0०0॥रणाएजा 060९०फ॒णच्तश ?7णृंस्ट5) राज्य द्वारा सचालित ग्रामीणों के आर्थिक व साभाजिक जीवन में परिवर्तन लाने के लिए बनाएं गए सामुदायिक योजनाओं की एकीकृत योजना में प्रस्ताव किया गया कि देश भर में दस वर्ष के लिए विस्तार कार्यकर्ताओं (८ध८॥६०म ०7:४७) का एक जाल स्थापित किया जाये। सामुद्रायिक योजना क्षेत्र तीन विकास ब्लाकों में बॉटा गया जिसमें 00 गाँव और लगभग 60,000 से 70,000 तक की जनसख्या निर्धारिठ की गई। विकास ब्लाक वो फिए 5 गावों के समूह में विभक्त किया गया और प्रत्येक समूह एक ग्राम स्तरीय कार्यकर्ता (५7४) की देखरेख में दिया गया। प्रारम्भिक कार्यक्रम लगभग 55 योजनाओं के साथ 8,500 गाँवों में लगभग 52 मिलियन जनसख्या से शुरू हुआ। प्रारम्भिक योजनाओं के चयन में कृषि उत्पादन सबसे आवश्यक लक्ष्य था। योजना शषेत्रों के चयन में सिंचाई सुविधाओं तथा वर्षा को भी महत्व दिया गया। सामुदायिक योजनाओं के क्रियाकलापों को कृषि, सिंचाई, सचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, गेजगार, आवास, प्रशिक्षण और समाज कल्याण में बाँध गया। सगठानात्मक सरचना में योजना आयोग में एक केन्द्रीय समिति बनाई गई अथवा केन्द्रीय स्तर पर सभी सामुदायिक योजनाओं का एक प्रशासक (3तव्राःः/॥०) था, राज्य स्तर पर विकास समिति, जिला स्तर पर कमेटी जिसका सचिव आयुक्त था, ब्लाक स्वर पर 25 निरीक्षकों के साथ एक अधिशाषी अधिकारी (८२८८ए०४७ ०ग०७३), तथा प्राम स्तर पर ग्राम स्तरीय अधिकारी (श,09) थे। कार्यक्रम का मूल तत्व प्रारम्भ से हो जनता की भागीदारी सुनिश्चित करमा था। भारत सेवक समाज, जो कि सगठन का गैर अधिकारित अतिभाग था, भामीणों द्वारा स्वैच्छिक प्रयल करने के लिए तथा उन्हें श्रेरित करने के लिए गठित किया गया। गाँव वालों को श्रम या नकदी द्वारा योगदान करना था। लेकिन यह कार्यक्रम प्रामीणों में सामाजिक या आधिक परिवर्तन लाने में सफल न हो सका। जिन लोगों को लाभ मिला वे पहले से ही बेहतर स्थिति में थे। सामुदायिक विकार्स योजनाओं का मूल्याकन एआर देसाई, एससी दुबे, आस्कर लेविस, मैन्डलबाम, ओपलर, कार्ल टेलरस, विलसन, और कई अन्य विद्वानों द्वायय किया गया । इन सभी मूल्याकन कर्चाओं ने यह मान लिया था कि सामुदायिक विकास योजनाएँ ग्रामीण समाज और कृषि अर्थव्यवस्था के पुर्नर्नर्माण के लिए उपयुक्त और वाच्छनीय प्रविधि थी। आमीण जीवन पर सामुदायिक प्रमीण सामाजिक व्यवस्था 39 विकाप्त योजानाओं के प्रभाव का मूल्याकन कस्ते हुए लगभग उपरोक्त सभी विद्वानों मे निष्कर्ष निकाला कि प्रामीण लोगों को इन योजनाओं से प्रेरित नही किया जा सकता और वे इनके क्रियान्वयन को सभी अवस्थाओं में भाग नही लेवे । टेलर (0७ 'ज/65) का विचार था कि सम्पूर्ण कार्यक्रम मे निहित भावना को आत्मस्ताव बरने में सरकारी तन्र विफल रहा। एआए. देसाई का मानना था कि समाजशाख्रोय धारणाएं जिम पर सामुदायिक विकास योजनाएँ आपारित थी, जैसे, सभी व्यक्ति, समूह, और श्रेणिया जो ग्राम समुदाय में शामिल होते हैं, सामान्य हितों से बँें रहते है, और सामान्य हित यह उत्साह पैदा करेंगे कि समुदाय के विभिन श्रेणियों के हित समझौते से दूर टकराव वाले नहीं होते हैं,सही नहीं थी। एससी दुबे ने माना कि योजना (8४776) शिखर से नीचे ([09 ॥0 60७४) की ओर थी। आएकर लेविस ने माना कि विभिन्‍न विभागों के कर्मचारियों के बीच अधिकाएों और कर्तव्यों को लेकर काफी सघर्ष और अस्पष्टता थी और सम्ताज सेवी मानसिकता का अभाव था। सश्षेप में, सामुदायिक विकास योजनाएँ अपने अपेक्षित लक्ष्यों मे निरर्थक सिद्ध हुईं। ग्रामीण विकाप्त कार्यक्रमों में समान नियोजन और एकीकृत क्रियात्मकता का अभाव है। आई आरडीपी, एन आर ईपी, आरएलईडी पी, डी पी एपी आदि जैसे बहु-ओेणीय विकास कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जिला स्तर पर एक सयुकत एजेन्सी बनाई जानो चाहिए। इस एजेन्सी का प्रधान बीड़ी ओ (800) से अधिक ऊचे और कलैक्टर से नीचे पद का व्यक्ति होना चाहिए। इसमें सम्बद्ध अनुभागों से पूर्णकालिक विशेषज्ञ और बहु-अनुभागीय समर्थक कर्मचारैगण होने चाहिए। कुछ सदस्य अशकालिक सदस्य भी हो सकते हैं। नियोजित कार्यक्रमों को क्रियान्वयन के लिए एकीकृत योजना के साथ-साथ एकोकृत प्रशासनिक ढाँचा भी होना चाहिए। इसमे बैंक भी होने चाहिएँ। पंचायती राज (छजलाएएण एुं) ग्रामीण समुदार्यो के विकास में लोगों को शामिल करने में सामुदायिक विकास कार्यक्रमों को असफलता के काएण बलवन्तराय मेहता समिति की सिफ़ारिशों पर पचायती राज की स्थापना हुईं। पचायतराज के उद्देश्य जनतान्रौकाण, विकेद्रीकरण, और आधुनिकीकरण थे। पचायवों , निम्नतर स्तर पर प्राप्त समस्याओं की सुलझाने और स्रामाजिक तपा आर्थिक प्रगति के लिए स्थानीय मानव-शक्द्रि साधनों को सक्रिय बनाए जाने कौ अपेक्षा को जाती थी। वाप्तव में, भाएत में पचायतों गज उद्विकास को लम्बी प्रक्रिया के माध्यम से अस्तित्व में आया। इसके विस्तार का विश्लेषण पाँच चरणों में किया जा सकता है. 950 से 960 तक, 96] से 964 तक, 965 से 985 तक, 986 से 992 तक, और 993 से 2000 तक श्यानीय स्व-शासित इकाइयों के रूप में प्राम पचायतों के गठन के विपय में घोषणा जे ,री 950 में सविधान में एक प्रावधान द्वार को गई। प्रथम पचवर्षोय योजना में भो (६/5!-52 में) इस बात पर बल दिया गया कि स्थानीय प्रतिनिधि सस्याओं के माध्यम से पमोध विकास के प्रबन्ध में लोगों की मागीदार को प्रोत्माहित किया जाये। बलवल य्य मेटता समिदि ने भी 95 पें स्रापुदापिक विकास योजनाओं पर पुनर्विदार के दोगन घरामीण शैत्रों में आर्थिक व सामाजिक दशाओं वो सुधासे की प्रक्रिया में निस्‍नरठा बनाए रखने के 320 आमीण सामाजिक व्यवत्या लिए पचायत ग़ज सस्याओं की स्थापना की सिज्तास्शि की। योजदा आयोग पहले से हो कहता रहा था कि ग्राम पचायतों को सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए और इस नवीन लोक्वाविर व्यवस्था को थौरे-धीरे विकास प्रशासन की जिम्मेदारी दे दी जानी चाहिए। तोन स्वयं पचायत राज व्यवस्था के सगठन की सिफारिश करते समय बी आर मेहता दल का भी यह हो दृष्टिकोष था। पचायती व्यवस्था प्रास्म्प में 959 में तोन गाज्यों द्वारा स्थापित की गई। 959 के बाद पचायत राज सस्थाओं का तत्र अधिकतर राज्य सरकारों द्वारा स्थापित किया जाने लगा। 964-65 तक तत्कालीन घारत के १5 में से 2 राज्यों में पचायतों ने कार्य करना शुरू कर दिया। छ केन्द्र झासित क्षेत्रों में से केवल एक (हिमाचल प्रदेश) ने पचायती राज स्पेस क्या। कुछ राज्यों में इसको सरचना में अन्तर था। 965-85 की अवधि में पचायती यज में ठहराव आ गया और विकास्त प्र्रियाओं के प्रवन्ध वी इसको भूमिका में कुशलता में मै कमी आई। इसकी विश्वसनीयता में भौ आघाव लगा। सरकारों आदेशों के अनुसार इसकी शक्तिपा एवं कार्य इस आधार पर कम कर दिए भए कि दई राज्यों में कार्य अहमद, भ्रष्टाचार और भुटबाजी अधिक थी। 977 में उनता दल सरकार ने पचायदी राज के कार्य में कमों के कारणों को जाँच और पचायतों को मजबूत बनाने के उपाय सुझाने के ल्रि अशोक मेहता सम्रितिं नियुक्त की। 978 में इस समिति भे पचायती राज के पुनवित के लिए अनेक सिफारिशें वी। इसमें सम्मिलित थीं पचायतों को अधिक शक्ति देना, जिला परिषद को पंचायती राज व्यवस्था की प्रारम्भिक इकाई बनाना, पचायत राज चुनावों में राजनैतिक दलों का प्ग लेना, और पवायत सदस्यों को प्रशिक्षण देना। सन्यानम समिति पचायती राड के वित्त एव ससापनों वी समस्याओं के अध्ययन के लिए नियुक्त को गईं। इस समिति ने इन उपायों की सिफारिशें कीं ()) भूमि ग़जस्व, गृह, आदि पर आधारित पचायतें को विशेष कर लगाने की शक्ति देना, (2) ग़ज्य सरकारों द्वए पचायतों को अनुदान दिया जाना, 5) पचायदी राज को राजस्व के साधन सौंपना, () पचायनी राज के विविध स्तरों के बोच परस्पर वित्तीय सम्बन्धों का विकास करना, 6) पेंट और दान के माध्यम से वित्तीय ससाधनों को वृद्धि कस्ना, (6) पचायतों को वित्तीय सदया देने और उन्हें गांवों में मूल अधिकार प्रदान क्यने में सहायता देने के लिए पचायत राज विद निगम कौ स्थापना क्सता। तथापि पचायतों के पुन्जावन और पुनरुद्वार का काम 985 में शुरू हुआ जब [984 में तत्कालीन प्रधान मन्त्री ने राज्यों के मुख्यमत्रियों को पचायदी राज के लम्बित चुनावों को कराने और उनके कामकाज को फिर से जोवन्त बनाने के लिए लिखा। दो समितिया--4286 में (6५5 7४० 0०णण्णाधट) और 986 में (. व 5म्ठाप्र ए०कणध्णे 7 नियुक्त को गईं। राव समिति ने सिफारिश की कि ()) पचायती णज सस्थाओं को प्रभाव संगठन होने के लिए सक्रिय बनाया जाये तथा सभी आवश्यक समर्थन दिया जाये 2) पचायदी सस्थाओं को जिला और ब्लाक स्तरों पर नियोजन, क्रियान्वयन, और ग्रामीण विदा कर्यक्रत्ी को दिशा देने का काम सौंद जाये, 6) ब्लाक विकास कार्यालय विकास प्रतिया में मेरुस्जू (5902 ८४०१४) का काम करे। एलएस सिंघगे क्मेटो ने पाया कि पचावती सस्याएँ यजनोतिक इच्छा शक्ति को कमो, मूल्याक्न की कमी, और सुधायत्मक उपायों दो ग्रामीण साम्राजिक व्यवस्था उठ कमी के कारण ठीक से कार्य नहीं कर रही हैं। इस समिति ने पचायती संस्थाओं के लिए पर्याण वितौय ससायनों को उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए साधनों का पता लगाने का सुझाव दिया। समिति ने पाया कि पचायतों सस्थाएं बहुधा अपनो कर लगाने की शक्ति का प्रयोग के में आनाकानी कर रहो हैं। इसलिए इसने कुछ आवश्यक और कुछ ऐच्छिक कएपान करने का सुझाव दिया। तोनों समितियों के विचारों को सुनने के बाद सरकार ने देश के संविधान को सुधारने का निश्चय किया। यह सशोधन लोकसभा द्वाय दिसम्बर 992 में और राज्य सपा द्वार दिसम्बर 993 में पारित कर दिया गया और 7 राज्य विधायिकाओं द्वाय सशोधित करने के बाद इसको सविधान संशोधन अधिनियम 993 कहा गया। आज (सितम्बर 2000) परचायती गज सस्थाएं 25 में से 22 राज्यों में और 7 में से 6 केद्र शासित क्षेत्रों में कार्यरत | १॥5 राज्यों में यह जिस्तरीय व्यवस्था है,4 में 2 स्तरीय और तीन में एक स्तरीय व्यवस्था । पचायतों को सौपि गए कार्यों को अनिवार्य (०08०5), विवेकाधीन (१४००४०॥४०३) और स्थानानरित (#क्षार्शव्ाग८०) कार्यों में विधाजित किया जा सकता है। इन कार्यों में निम्मलिखित कार्य सम्मिलित हैं. नागरिक सुविधाएं, मूल ढोचागत कार्य और विकासत्मक क्रियाकलाप। मोटे तौर पर, इन कार्यों को स्वास्थ्य व सफाई (महामारी नियत्रण, शौचालयों का निर्माण और रख रखाव, श्मसान स्थलों का रख रखाव, सडकों की सफाई, वालाबों, तालों और नालियों की सफाई), सार्वजनिक कार्य (सडकों का निर्माण और रख रखाव, पीने के पानी के पापों, कुओं, गलियों में प्रकाश व्यवस्था), कृषि और पशु पालन (सुपर बौज ओर कीट नाशकों का वितरण, बडे हुए कृषि उत्पादों का नियोजन, पशु मेले की व्यवस्था, पशुओं को नस्ल सुधार, मुर्गी व मत्स्यपालव विकास), कमजोर वर्ग का उत्बान (उनकी शिक्षा, सास्कृतिक कार्यक्रमों का प्रबन्ध, कुओं और आवार्सों का निर्माण), और कुछ विविध कार्य (प्राकृदिक आपदाओं का सामना, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन और उन्हें मजबूत दादा, सहकारी समितियों को सुदृढ बनाता, वर्गों का विकास, स्त्रिपों और बच्चों का कल्पाण, प्रैढ शिक्षा कार्यक्रम) शामिल हैं। प्रारम् से हो पचायदों को भूमिका घीरे-धौरे बदली जादी रही है। ठनके कार्यक्षेत्र वा विस्तार किया जा रहा है। यहा तक कि धारणाओं में भी परिवर्तन हुआ है। न केवल पचायत पविनिधियों के स्थानोय सार्वजनिक मामलों का प्रशासन करने का उत्तरदायित्व सोंपा गया हे, बत्कि दाच्छित वित्त को बढाना और मानव शक्ति ससाधनों का पता लगाने का उत्तरदायित्व भो दिया गया है। 9093 के प्विधान सशोघन के पूर्व पचायतों के सामने मुख्य समस्याएं थी 0) पद्यायरदों को दी गई शक्ति और कार्य सौमित थे। (०) नियोजन के लिए पच्ाय्तों के पास मातव सझाधनों कौ कमी थो। 6) पचायतों को कर लगाझर अपने ससाधन पैदा करे के अधिवर नहीं ये। (५) चुनाव नियमित रूप से नहीं होते ये। 6) स्त्रियों और कमजोए वर्ग बा कोई अदिनिधित्द नहीं घा। इस प्रकार पचायदों से अपेक्षिद उच्च आवादाए पूर्ण नहीं हुईं। पचायती राज संस्थाओं के सफ़्ल क्रियान्वयन में प्रमुख बाधाए इस प्रकार बताई मई इन रस्याओं को गैर-कानूनी प्रस्थिति, अतियमिव चुनाव, नौकाशाहौ वा अहम, त्तोशों दो 322 आमीण सामाजिक व्यक्त भागीदारी में कमी, तथा राजमैतिक इच्छा शक्ति में कमी, आदि। (का व सा खशशक्फ्मरशा।, १०! 6, ४0. 4, 998, #]50 5८९, कैशश म्कादाबुदा फ्िण था अदा, 09 चाहा, (एशाश आते शव, जा(ठं 07000, 4996 : ) एपी बर्मबास (वीक :गाामग. थी सिएाद:- 4ब्गाड्माछशका।ता, 7र्णा $८ए(८एाए८7, 998 450) ने पचायती गज को असफलता के पाँच कारण बताये हैं कार्यों के विषय में विश्राति, स्वायतता का अभाव, प्रशासनिक प्रबन्ध में विश्राति, सामजत्य का अभाव, और विभक्त तथा अस्पष्ट सरचना। कार्यों के विषय में विभ्राति (८आाए्रए। #ऋ०ए ००४७ का अर्थ कार्यों के अस्पष्ट विभाजन से है जो दीन स्तरों में बटे हैं। प्रत्येक स्तर पर क्या काम किए जाने हैं, यह स्पष्ट मही है। विभिन राज्यों में कार्यों में भेद हैं। ग्राम सभा को सौंपा गया योजना बनाने का कार्य अस्तित्व में ही नहीं है क्योंकि उनके उद्देश्यों को निर्धारित करने की वाच्छित योग्यता, प्राथमिकताओं कौ पहचान और कार्यविधि बनाने की योग्यदा नहीं है। अशोक मेहता कार्य समूह और राव समिति ने जिला परिषदों को इस कार्य के लिए उपयुक्त मात्र था। ग्राम पचायतें और पचायत समितिया अपनी आवश्यकताएँ जिला परिषद को बी सकती हैं। 74वें सशोधन में नियोजन के लिए जिला योजना समिति बनाने का प्रावधान है लेक्नि इस समिति के गठन की आलोचना अभी भी की जाती है। स्वायत्ता का अभाव (#55८४८४ रण १एणा०गा9)) जिला स्तर पर स्वायत्तदा बा न होना दर्शाता है क्‍योंकि ग़ज्य और राष्ट्रीय योजनाओं का समायोजन होना होता है। बहुत सी योजनाएं (जैसे आई आरडी पी, पीने के पानी को आपूर्ति, आदि) केन्द्र से वित्त पौषित होती | और उनके लक्ष्य अस्पष्ट होते हैं। अत जिला योजन कैसे सार्थक हो सकती है? हारे देश की श्रेणीक्रम की प्रशासनिक व्यवस्था में विकेद्रीकरण की सस्कृति के लिए कम ही स्थान है। पचायत का 95 प्रतिशत से भी अधिक बजट प्रतिबद्ध होता हैं। कार्यात्मक और वित्तीय स्वायत्तता के अभाव में पचायतों से मुक्त कार्य क्यी अपेक्षः कैसे की जा सकती है ? प्रशासनिक प्रबन्ध में गडबडी (८ण्राएद्रणा ॥0 उतगागाडएबए४ बाआ28०0०णी का अर्थ विम्तार अधिकारियों को अपने विभाग के लिए बफादारी (कृषि, पशु-पालन, सहकाएं समितिया) और स्वतत्र कार्य से है। यहा ठक कि जिला ग्रामीण विकास ऐजेंप्तिया (2२08) जो कि विकास बजट में एक बच हिस्सा लेती थी, पचायदी व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं पी, यधपि अब यह जिला परिषदों को परिधि में आ गया है। सामजस्य का अभाव (#05८४८८ ० ०००००:४४॥०४) का अर्थ है जिला और ब्लाक स्तरों पर प्रशासनिक ढाँचे के टुकडे | विभिन्‍न इकाइयों के बोच कोई तालमेल नहीं है। गा सेवक, जिसे ग्राम विकास अधिकारी पट नाथ दिया गया है, को विविध कार्य सौंपे गए हैं | अनेक ग्रा्मों को देखना होता है और गरीबों की सहायवार्थ अनेक कार्यक्रम चलते होते । विभक्त और अतिछादी सरचना (बहुप्राव्याट्त बात 0एच०ए७ए०8 $07५एथे का अर्थ है किसभी विकास कार्यक्रम पचायतो को नहीं दिए गए हैं, अत उत्तरदायित्व स्पष्ट परिभाषा के अभाव में विश्राति पैदा होती है। 990 के दशक के प्रारम्भ में पचायरी राज सस्थाओं की कार्यप्रणाली का विश्लेषण करते हुए यह निश्चय किया गया था कि मामीण सामाजिक व्यवस्था 323 सरकार सविधान में सशोधन कर के पचायतों को अधिक सशक्त और प्रभावी बनावे। सविधान सशोधन ((णाहणाणाज #जधावेगाला) (3 वां) सविधान सशोधन जो 993 में किया गया, अप्रैल 974 में प्रभाव में आया। इस सशोधन के बाद, पचायदी शज मे लागू किए गए मुख्य परिवर्तन थे दो या तीन स्तरों पर पंचायतों को स्थापना और प्रत्येक गाव में एक ग्राम सभा आवश्यक कर दी गई। 2) पचायत्री सस्थाओं का कार्य पाँच वर्ष में दोनों पचायत स्वरों पर सदस्यों का चुनाव आवश्यक कर दिया गया। 8) जबकि मध्य और जिला स्तर पर चेयरमैन का चुनाव सोधे होना था, प्राम स्तर पर चेयएैन के चुनाव निर्णय राज्य सरकारों पर छोड दिया गया ८) 29 कार्यों की एक सूची पचायतों को उपलब्ध कराई गई थी। इसमें प्रामौण विकास मूल सरचना, समाज कल्याण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सामुदायिक परिसम्पत्ति का रख रखाव आदि थे। ७) पचायतों के तोनों स्तरों पर अनुसूचित जातियों व जनजातियों और जियों के लिए स्थान आएद्षित थे। (6) घन लगाने और पचायतो को वित्त उपलब्ध करने के सुझाव देने के लिए वित्त आयोग स्थापित किया गया। (7) पचायतों को कर लगाने, कर्तव्य और शुल्क निश्चित करने के अधिकार दिए गए। राज्य सरकार द्वास वसूले गए करों में से उनका भाग निश्चित किया गया, और उन्हें अनुदान राशि देने का अधिकार भी दिया गया। &) चुनाव अयोग को अधिकार दिया गया कि वह पचायत चुनाव करवे। (9) राज्य विधायिकाओं को पिछड़े वर्गो/जातियों (080) के आरक्षण का अधिकार तथा एमपी/एमएलए को पचायतों में शामिल करने का स्वतत्र विवेक से काम लेने के लिए छोडा गया। (0) सशोधन से पूर्व ग्राम पचायतों के स्र्पचों की पचायत समितियों का सदस्य बनाया गया था और पचायत समितियों के प्रधानों को जिला परिषद का सदस्य बना दिया गया था, सशोधन के बाद उच्च स्तर पर पचायतों के पदेन सदस्य होने का प्रावधान समाप्त कर दिया गया। पसल्तु राज्य सरकवाएँ के सरपचों को पचायत समितियों दथा प्रधानों को जिला परिषदों से जोड़ने का निर्णय के का अधिकार दे दिया गया। 993 में किए गए सशोधन के बाद इन परिवर्तनों के परिणाम इस प्रकार माने जा सकते हैं - () तीनों स्तरों पर प्रत्यक्ष चुनाव के सम्बन्ध में सरचनात्मक पस्वर्तन पचायतों को कार्यात्मकता को सुधारेगा। पूर्व में पचायत समितियों और जिला परिषदों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव नहीं होते थे! सभी सरपच पचायव समिति के सदस्य हुए और सप्री प्रधान जिला परिषदों के सदस्य हो गए। अब प्रत्यक्ष रूप से चुने गए सदस्यों कौ भूमिका और उत्तदायित्न विस्तृत हो जायेंगे। (2) पचायतों को बढ़ती शक्तियाँ और वित्ञीय ससाधन पचायतों की स्थिति सुधारेंगे। 8) अनुसूचित जातियों व जनजातियों और ल्लियों के लिए आशक्षण कमजोर वर्ग के लोगों को पचायत व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी के योग्य बनाएगा। (3) नयी सरचना पचायतों वो नोचे से योजना बनाने में सहायक होगो, स्थानीय ससाधनों का अयोग साभव होगा, बडी सख्या में समुदाय की भागीदारी बढेगो, प्रष्टाचार कम होगा, और विकप्त अयासों की गुणयर्ठा में सुधार छोगा। इसके मकाएत्मक प्रभाव भी हो सकते हैं : () प्रत्यक्ष घुनाव तौन स्तरों पर पचायतों में सम्बव॒तू अन्तर्क्रिया को रोक सकता है 2) आरक्षित स्थानों का आवर्तो क्रम 990) 324 आमोण सामाजिक व्यवस्था लम्बी अवधि के विकास कार्य करने के प्रतिनिधियों के वायदों में क्मो कर सकवा है! ह्ू्जा और हूजा (छ60|9 भाप पर०णु०, एमालीग्वना पेज पा रिक्रृग्ोशक्षा" गत पाल स्वाद जैगक्राबा! रु पर 4दंशगरा07400०7, उपए-58ए, 998- 474-75) मे कई प्रकरणों कौ ओर सकेत किया है जिनके अध्ययन पचायवों को सफल कार्यान्यवन के लिए आवश्यक हैं। ये हैं. () विकेन्द्रीकृत आयोजना का स्तर क्‍या होना चाहिए ? () क्योंकि जिला योजना सर्मिति बहुत बडी हो जायेगी, इसलिए विकेद्धीकृत नियोजन और उसके कार्यान्वयन को कार्य रूप देने के लिए सगठनात्मक व्यवस्था कया होनी चाहिए ? 8) बहुस्तरीय सरचना में किस स्तर पर क्या क्या कार्य अत्यन्त उपयुक्त होंगे ? ७) ग़त्य सरकार के स्तर पर क्‍या क्‍या परिवर्दन आवश्यक हैं तथा विकेद्धीकृत आयोजना प्रक्रिया का स्वरूप मिगडने से या पचायततों पर कब्जा जमाने से स्वार्थों तत्दों को या स्थानीय अभिजाव वर्ग को दूर रखने के लिए क्या सावधानिया रखना आवश्यक है ? (6) जब योजना बनाने तथा क्रियान्वयन कराने वालो सस्याए एक हो हों (अर्थोत ग्राम पचायत और पचायत समिति) तो यह कैसे सुनिश्चित किया जाये कि आयोजना बनाने वाला अपने लिए लक्ष्य निश्चित नहीं करेगा जो कि महत्वपूर्ण कलापों की अपेक्षा प्राप्त करना सरल है ? (7) विविध पचायत स्वरों तथा राज्य स्तरों पर किस प्रकार सम्भावित सपर्ष ठाले जा सकते हैं ? संविधान संशोधन के बाद की प्रगति (प्न6 शण्ट्रार55 #गिशि 0९ (०॥5५४(ए/०४०७॥ 4छल्ाताल्ाा) पचायव राज वी कार्थात्मक (७४०४००७) बनाने में यज्य सरकार अधिकारी कितने गम्मौर हैं ? उनकी वर्तमान में गम्भीरता इस अ्रकार दर्शाई गई है. () नौकरशाह पचायतों को शक्ति स्थातानदि कले में उदासीन हैं। 2) वे कोष निर्ममन करने में हमेशा अन्यमनस्क रहते हैं। 6) अधिकारी चुने हुए प्रतिनिधियों में विश्वास नहीं दर्शाते । (4) कुछ राज्यों ने तो अभी तक चुनाव ही नही कराए हैं, यद्यपि 994 के 73 वें संविधान सशोघन को लागू होने के एक वई के भोतर ही पचायतों को अस्तित्व में आ जाना चाहिए था। यद्यपि जिला भ्रमुखों को जिला ग्रामीण विकास एजेन्सियों (0॥205) का चेयरमैन होना है जो कि गरीबी निवाएण के सभी कार्यक्रम चलाती हैं, लेकिन वे डी आरडी ए ()270&) के श्रशासकीय समितियों की बैठकों की केवल अध्यक्षदा करेंगे, वित्तीय शक्तिया कलेक्टर के हाथ में होगो जो डो आएडी. ए की कार्यकारिणी समिति का अध्यक्ष बना रहेगा। इस प्रकार पचायतों और डो.आरडीए के सम्बन्धों को स्पष्ट करना आवश्यक है। यह समझ में नही आता कि चुने हुए लोगों को विकास योजनाओं का स्वतत्र भार क्यों नही दिया जाता, उन्हें आगे बैठने की अनुमति क्यों नहीं दी जाती ताकि लोग विकास प्रक्रिया में बढ कर हिस्सा लें । अन्त में कहा जा सकता है कि सूक्ष्मीकृत भागीदारी वाले लोकतन्र (झराफबराणगडल्त एश्वप्लए्भाए्ड वंदाप०८३०४) का व्यवशगि दर्शन (ग्रगद्लाकवाए फ॥०४०७॥५), जी प्रत्येक व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है, विकासात्मक गत्यात्मक (व७४९०फुफव्याँब ठुहक्त०्ो का आधार शिला (००एम८7 507८) है। जनमत यह है कि ग्रामोण विकास को बढाया जा सकता है थदि लोगों के समाधनों को गति प्रदान की जाये और उन्हें निर्णय करने के लिए ग्राप्ीय सामाजिक व्यवस्था 325 ग्रेश्ि किया जाये जो कि जीवन और जीवनयापन को प्रभावित करा है। (776 गशहव राह 70607702८, ए 36) । वर्तमान में हमारे गांवों में गहरो गुटबाजी है। धन का दुरूपयोग, शक्तिशालो लोगों का दबाव, र्यों को अदसरों का निषेध, दलितों के विषद्ध आतंक, और चुनावों में व्यवस्थाभजक कार्य (६700८:#०॥) आदि गावों में प्रचलित हैं। इन समस्याओं का निदान कठिन है। वृणमूल स्तर पर स्व-शासन को समाप्त करने के कोई ठोस कारण भी नहीं हैं। न्यायमूर्ति कृष्णमूर्ति ने कहा है (४6/8०, 3०0७५, 23, 989, 20) कि पश्चपात, जातिवाद, दुर्भावना, नौकरशाही द्वारा उपेक्षा और असहयोग वो रहेगा ही, फिए भी पचायदी राज का प्रयोग (०पए८४ंए०००७) लोगों की राजनैतिक आँखें खोलेगा। यह फैशन है कि आमोणों कौ कमजोरी और शहरी लोगों को योग्यवाओं को बद्धा-चढ़ा कर अस्तुत किया जाता है लेकिन हमारी आमीण त्रतिमाए (०7375) हिस्सेदारी की भूमिका की चुनौती का सामना निश्चित रूप से कर सकेंगे। नगरीय सामाजिक संगठन (एक्रकक $6लंग 0एट2०फांडथप०फ) प्रस्वावना (970070०॥००) १95 के पश्चात भारत मैं नगर विकास और नगरेकरण की प्रक्रिया के साथ नगरीय विषयों में समाजशार्यों की रुचि बढ गई है। वे न केवल नगरीय सगठन में परिर्वदन का विश्लेषण करते हैं बल्कि नगरीय समुदायों में स्तरोक्रण और गतिशौलठा का भी अध्ययन करते हैं तथा नवोदित नगरोय समस्याओं का भी परीक्षण करते हैं। 95 से सन्‌ 2000 दक के परिवर्तन दर्शाते हैं कि नगरेक्रण को दर (जनसख्या का ग्रामीण क्षेत्रों से नंगगेय क्षेत्रों की ओर जाना और फ्लद जनसख्या का अधिक अनुपात प्रार्मो को अपेक्षा नगें में अधिक रहना) बहुत अधिक नहीं है लेकिन नगग्रेय विकास को दर (नगरीय जनसख्या के गिरे आकर में प्रतिशत वृद्धि) व्यप्ती अधिक है। जहाँ 95 से 9997 तक नगरेय जनसख्या वा प्रतिशत आठ प्रतिशत (7.3 से 25 73 प्रतिशत) बढा है, वह इस अवधि में कुल जनसंख्या का पूर्ण आकार 26 गुना बढा है 5569 करोड से बढकर लगभग 95 करोड)। इस नगरीय विकस के दूरगामी परिणाम हो रहे हैं। इससे न केवल ग्रामीण-नगरीय विकास सन्तुलित रूप में कठिन होगा बल्कि सामाजिक-आर्थिक सामजस्य की समस्‍या भी बढेगी। नगगेयु, नगरेकरण तथा नगरवाद को अवधारणाएँ (एम्रतकु७ ० एफ)ब7, ए-छचणॉं5्राण्प्र आते एन्‍छ्उ्गरांडणा) यदि भारत का भविष्य ग्रामीण विकास से जुड़ा है तो यह नगगें के विकास तथा महातगरीय क्षेत्रों के विकास से भी जुडा है। यद्यपि बढते नगरीकरण ने प्रदूषण, अत्यधिक भीड, और गन्दी वस्तियों (६७७७), बेग्रेजगारी, गरोबो, अपराध, बाल अपराध, सचार व याठायाद नियत्रण, हिंसा, सतियों के प्रति यौन शोषण, तनाव व दबाव जैसी समस्याओं को जन्म दिया है, फिर भी नगर सभ्यता और सस्कृति के केद्ध होते हैं। आ्रमीण-नगरीय अन्तर्क्रिया, नगगैय सामाजिक सगठन में परिवर्तन, गतिशोलता, नृजातीय समुदायों का एकोकरण, आदि वी विश्लेषण करे से पहले यह आवश्यक है कि नगरीय, नगरीकरण ठथा नगरवाद कौ अवधाण्णाओं को समझ लिया जाये। “बगरीय' शब्द का प्रयोग जनसख्यात्क एवं समाजशास््रीय अर्थों में किया गया है। प्रथम अर्थ के अन्तर्गत यह जनसख्या के आकार, जनसख्या के घनत्व (उधाअफ) और नगरय साम्राणिक संगठन 2 निवाप्तियों के काम की प्रकृति पर बल देता है, जबकि दूसरे अर्थ में यह विषमता, अवैयक्तिकता (900८75००4॥9), परस्पर निर्भरता, और जीवन की गुणवत्ता पर केन्द्रित है। अत 5,000 से अधिक की जनसख्या, एक वर्ग मील में 000 व्यक्ति का घनत्व, और 75 प्रतिशत या अधिक जनसंख्या का गैर-कृषि कार्यों (जैसे निर्माण, वाणिज्य, व्यापार, नौकरी, इत्यादि) में व्यस्त होना कस्बा/नगर (0फ्राएलो)) या नगरीय” (एा०»॥)) की विशेषताएँ बताई जादी हें (९ ए॥0ीगराएवा, ए#कखाउव्राका कार्व 0छा 59005 का ख्वाब, 999 , 0-03) | 99 कौ जनगणना के अनुसार कोई भी ऐसा स्थान “नगरीय” है जहां कम से कम 5,000 जनसख्या हो, 75 प्रतिशत पुरुष गैर-कृषि कार्यों में लगे हों, जनसख्या का घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति भ्राति वरगे किमी (या 000 व्यक्त प्रति वर्ग मौल) हों, और जहा नगरपालिका/कार्पोरेशन/केन्टलमेन्/नोटीफ़ाइड एरिया हो। परन्तु इन मानदण्डों को निम्न आधारों पर अस्पष्ट (४०४४८) और रूढ़िवादी (८णाइट7४॥४८) कहा गया है . () यद्यपि कई स्थानों को, जहाँ 5000 से अधिक जनसख्या है, 'नगरीय' परिभाषित किया गया है और भारत में ऐसे 3000 स्थान हैं, लेकिन जनगणना विभाग 3,245 स्थानों को ही 'नार' को मान्यदा देता है। () जनसख्या का घनल जो किझ्ली स्थान को नए होने की पाता (५॥ह00॥8) प्रदात करवा है, सथार्थपूर्ण (/८9050८०॥9) कम है। 6) 75 प्रतिशत पुरुष जनसख्या से अधिक गैएकृषि कार्यों में सलग्न जनसख्या याला स्थान नगरीय माना गया है, लेकिन 498 और 994 की जनगणना के अनुसार कम से कम 25 प्रतिशत कस्बों में कृषि मुख्य क्रियाकलाप के रूप में पाई जाती है। (4) महिला कार्मिकों को काम करने वाली जनसख्या से अलग रखा गया है (रक्ला। (0ण0:थ॥, ० ०॥, 06-07)। इस आधार पर 'नगरीय' समुदाय को इस प्रकार परिभाषित किया गया है. वह समुदाय जो अत्यधिक विष्मताओं वाली (॥८८४०७८०८००७), गैर कृषि व्यवस्तायों की प्रधानतावाला, जटिल श्रम विभाजन वाला, काम में उच्च विशिष्टताओं वाला, औपचारिक सामाजिक नियत्रणों पर निर्भर रहने वाला और स्थानौय सरकार को औपचारिक व्यवस्था वाला है। "नगरीकरण' जनसख्या की ग्रामीण से नगरीय क्षेत्रों को ओर गतिशीलता है। ऐन्डरप्न (#॥0९७४०॥, 953 : 4) का मानना है कि नगरोकरण में न केवल जनसख्या का नाों की ओर जाना निहित है बल्कि जाने वालों की अभिवृत्तियों, विश्वार्सों, मूल्यों और व्यवहार पतिमानों में परिवर्तन भो शामिल है। 'नगरवाद' वह जीवनशैली है जिसकी निम्न विशेषताएँ हैं. अस्थित्वा (उथ्ाडधयल) अथवा थोड़े समय के सम्बन्ध, उपष्ठिता (६०ए८:८०४)) अथवा सीमित सख्या में लोगों के साथ औपचारिक और अवैयक्तिक सम्बन्ध, अनभिकता (४४०॥)०४३9) अपवा लोगों का गुमनामी में रहना, और व्यक्तिवाद (:700909॥5ण) अधवा लोगों का निजो स्वार्यों को अधिक महत्व देना। ल्यूइस वर्ध ([.00७ एफ, 938 24) ने नगखाद या नगरीय व्यवस्था की चार विशेषताएं बताई हैं. जनसख्या की विषमवा (#८८य०४८४८०), कार्यों का विशिष्टोकरण, गुमनामी तथा अवैयक्तिक्ता, और व्यवद्र का मानकीकण्ण (धकत0ंअपएआंप ! 328 नगरीय सामाजिक संगठन ग्राप्रीण-नगरीय भेद : जनसख्यात्मक तथा सामाजिक सास्कृतिक विशेषताएँ (शयोनक्रञत जिीलसाएरए$ : गशाण.:ए्न्करुमंर 970 504०-टणाए्ो एाजशग्ठलांडाट5) समाजशास्त्रियों ने 'समुदाय' शब्द का प्रयोग सम्बन्धों को गुणवत्ता (व०४॥४) बताने के लिए किया है जो एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बोच सहभागी पहचान (#097०6 उ0८गध३) की दृढ़ भावना पैदा करती है। वे 'प्रामीण” को एक समुदाय तथा "त्गगैय' को एक समाज कहते हैं। जब समाजशारदी यह कहते हैं कि समाज 'पस्म्पणा' से 'आधुनिक' की ओर बदल रहा है, तो वास्तव में वे उस सपाज की जो पूर्व-औद्योगिक, अधिकतर ग्रामीण तथा परम्परागत समाज है कौ उस समाज से जो औद्योगिक, अधिकत्ता नगरीय तथा आधुनिक है, अन्तर करना चाहते हैं। जबकि ल्यूइस वर्थ (0७5 ५४४) ने “आ्रमीण' और 'नगरोय' शब्दों का प्रयोग समुदायों में अन्तर करने के लिए किया है, यलीज (0ण४८७) ने गेमिनशेफ्ट (0८७८४७८४०७) और गेसिलशेफ्ट (0०55८!६८४शी) शब्दों का, दुर्खीम ने यात्रिक (१(०८८४०८४) और सावयविक (0।8»7०) एकात्मवा का, पार्सन्‍स में 'परम्षणगत” और 'आधुनिक” समाज शब्दों का प्रयोग किया है। ल्यूइस वर्थ (0०७७ ७४0, 938) ने 'नगगैय' की 'प्रामीण'” समाज से अन्तर करे हुए 'नगर' (८) को तीन आपारभूद विशेषताओं के आधार पर परिभाषित किया है जनसख्या आकार, घनत्व और विषमता। इन विशेषताओं का अर्थ है कि यद्यपि नगर निवासी ग्रामवासियों की अपेक्षा अधिक मानवीय सम्पर्कों का अनुभव करेगा, लेकिन वह अधिक अकेला भी अनुभव करेगा क्योंकि उन सम्पर्कों की प्रकृति “भावात्मक रूप से शूत्य' (०४०७०॥०]५ शएए0) होगी। ल्यूइस वर्थ के अनुसार नगयों में सामाजिक अन्तर्किया, जो शहरों की विशेषता है, अवैयक्तिक, खण्डीय (5८छाग्रथा/»), दिखावटी (६एए८घील॑ं»), अस्थाई और आमतौर पर विशुद्ध रूप से व्यावहारिक (छ़ा2८४८७) और साधक (75४0णथयओं) होती है। इनको वह 'ट्वैतियक' सम्पर्क कहता है जो प्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक सम्पर्कों से बिल्कुल भिन्न होते हैं। मैक्स बेबर के अनुसार नगर की हम विशेषता यह है कि यह 'बाजार' (परआ८८ /9००) की तरह काम करता है वाणिज्य व्यापार सम्बन्धों की प्रघानता दर्शाता है। ग्रामीण तथा नगरीय समुदायों में कई आधा्ें पर भेद किया जा सकता है, जैसे, व्यवसाय, आकार, जनसख्या घनत्व, वातावरण, समता विषतमाएँ, सामाजिक स्तरीकरण, गतिशीलता और अन्तर्क्रिया प्रणाली । 0) ग्रामीण समुदाय में लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृंषि होता है यद्यपि कुछ लोग गैर कृषि कार्यों में भी सलग्न होते हैं। नगरों में लोग आमतौर पर गैर कृषि कार्यों में लगे होते हैं जैसे निर्माण, वाणिज्य, व्यापार, नौकरी, और विभिन पेशों में। (2) ग्रामीण समुदाय छोटे आकार के तथा नगरीय समुदाय बडे आकार के होते हैं। भाएत में 99 की जनगणना के आकर्डो के अनुसार गार्वो में रहने वाली (74 27 प्रतिशत) जनसख्यां में से 36.57 प्रतिशत लोग 2000 से कम जनसख्या वाले गाँवों में, 2 37 प्रतिशत 2000 से 5,000 के बीच जनसख्या वाले गावों में, और 3 33 प्रतिशत 5,000 से अधिक जनसख्या वाले गाँवों में रहते हैं। दूसपी ओर शहर क्षेत्रों में रहने वाली (2573 अतिशवी नगतेय स्राम्रजिक संगठन 329 जनसंख्या में से,0.72 प्रतिशत लोग 0000 से कम जनसख्या वाले क्षेत्रों में, 527 प्रतिशत 0000 और 50,000 के बीच जनसख्या वाले क्षेत्रों में, 2 75 प्रतिशत 50,000 से एक लाख के बोच जनसख्या वाले क्षेत्रों में, और 6 4 प्रतिशत एक लाख से अधिक जनसख्या वाले क्रो में रहते हैं (न आकड्डों में जम्मू कश्मीर और असम की जनसख्या सम्मिलित नहीं है)। (पा (८ 2णी5 77472, 998, 23-24) ! भाष में 799। में मामीण क्षेत्रों में परिवार का आकार 4.9 और शहरी क्षेत्रों में 44 (सदस्यों) का घा। 6) प्रामीण समुदाय में जनसंख्या घनत्व कम है 200 से 000 व्यवित प्रति वर्ग मोल) जबकि शहरी समुदाय में ऊंचा है (000 व्यक्ति प्रति वा मील से भी अधिक)। (५) ग्रामीण क्षेत्रों में लोग प्रकृति के बिल्कुल निकट होते हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में मानव निर्मित वातावरण से घिरे रहते हैं और पकृति से कटे रहते हैं। (5) म्रमीण समुदाय अधिक समएस (॥09708८7200३) होते हैं जबकि शहरी समुदाय अधिक विषम । (6) प्रामीण समुदाय जाति तथा वर्ग के आघार पर अधिक स्तरैकृव (६79/60) होते हैं जबकि शहरी समुदाय वर्ग के आधार पर अधिक स्ततीकृत होते हैं। (7) ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव से गांव और गाँवों से शहरों की ओर गतिशीलवा अधिक है जबकि शहरी क्षेत्रों में गविशोलता एक शहर से दूसरे शहर के लिए अधिक है। 99। में देश में 2.25 करोड प्रव॒जकों (78775) में से 7.7 प्रतिशत प्रामीण क्षेत्रों से शहरों में गये थे, [ 8 प्रतिशत प्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में, 64 5 प्रतिशव ग्रामीण से प्रमीण क्षेत्रों में, और 06 प्रतिशत शहरों क्षेत्रों से प्रामोण क्षेत्रों में गए (॥#&फ्0#6 #०//8 ॥॥4/०, 998 * 26)। (8) प्रामीण क्षेत्रों में लोगों के बीच के सम्बन्ध प्रमुख व्यक्तिगत और अधिकतए दीर्घकालिक होते हैं जबकि शहा क्षेत्रों में अधिक गौण, अवैयक्तिक, आकस्मिक और अल्प समय के होते हैं। ७9) ग्रामोण क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर शहरी क्षेत्रों को अपेक्षा डेढ़ गुना अधिक है (80 : 49 अनुपात में)। (0) ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम शक्ति (!३0007 (0८८) भागीदारी शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा तौन गुनी से भी अधिक है। 993.94 में ग्रामीण क्षेत्रों में यह 2.04 कग्रेड थी जबकि इसके विपरीत शहरों में 8.57 करोड थी। पुरुषों में यह तीन गुनी से कम है (893 673 करोड अनुपात में) जबकि झ्तियों में 5 गुनी से अधिक है 0047 . 84 करोड अनुपात में) (१/०8.9०५९१ 242८, 708, 998 : 20) 6) ग्रामोण क्षेत्रों में श्रम कार्यों में सलग्न बच्चों को सख्या शहरी क्षेत्रों से दस गुना अधिक है (99] में यह सख्या १026 कप्रेड 003 करोड थी) यदि हम दानौज (]07॥८७) के शब्दों गेमिनशेफ्ट' और 'गेमिनशेफ्ट' को ही लें तो यह कहा जा सकता है कि ग्रेमिनशेषट सम्बन्ध प्रामोण जीवन की विशेषता हैं और गेमिनशेफ्ट सम्बन्ध शहरी जीवन की। गेमिनशेफ्ट प्रकार के समुदाय की विशेषता है घनिष् प्राथमिक सम्बन्धों की प्रधाना और इसमें परम्परा, मवैक्यता (८०४५८०5०७) और अरौपचारिक्ता पर बल दिया जाना | सामाजिक बन्धन मिद्रदा और नातेदारी के घनिष्ट बन्यनों पर आधारित होते हैं। दूसरे ओर, ग्रेसिलशेफ्ट प्रकार के शहरी समाज में सामाजिक सम्बन्ध औपषदारिक, सविदात्मक (००४७४०७०), हितकारे, और विशिष्ट रोते हैं। शहरी समाज में परिवाए सगठन कमजोर होता है और इसमें लाभकारों उद्देश्यों दया औपचारिक और ऋविस्पर्धात्मक प्रकार के सामाजिक सबधों पर बल दिया जाता है। के 'यान्दिक' और “मादयविक' एम्मत्मकदा कौ अवधाण्णाओं के अनुसार 330 नययीय सामाजिक संगठन (रू शाफाण व ० 7 59660, 7987) यह कहा जा सकता है कि ग्रामीण समुदाय में एकात्मकवा यख्रवत (7८00८) होती है और शहरी समुदाय में सावयविक (णष्ट०णं०) | प्रामीण समुदाय यत््रवत एकात्मता पर आधारित होने के कारण मूल्यों और व्यवहार में समानता, (अर्थात प्रत्येक व्यक्ति एक सी थार्मिक्ता से ओरित विश्वार्सो और आदतों में हिस्मा लेता है), दृढ़ सामाजिक सयम, तथा परम्परा व नानेदारी के प्रति निष्ठा से ओत प्रोत होहा है। सरल श्रम विधाजन पर आधारित ग्रामीण समुदाय में कार्यों में बहुत कम विशिष्टता, कुछ सामाजिक भूमिकाए और व्यक्तित्व में बहुत कम सहनशीलता, आदि गुण भी मिलते हैं। नगरीय समुदाय, जो सावयविक एवात्मता पर आधारित होवा है, की विशेषता होती है अत्यन्त विशिष्ट भूमिकाओं की बडी सख्या में अन्दर्निभरता पर आधारित होना और जटिल श्रम विभाजन, जिसमें समाज के सभी समूहों और व्यक्तियों के सहयोग वी आवश्यकता होती है। गआमीण-नगरीय अनक्रिया (७एघ०7७७७ फ्राश-३ए३ण) ग्रामीण-नगरीय अन्‍्तक्क्रिया नगरीकरण का एक मत्त्त्पपूर्ण पक्ष है। यह अपेक्षा की जाती है कि नगरीकरण और नगरैय विकास का प्रभाव आमीण क्षेत्रों पर पडेणा और प्रामीम क्षेत्रों के क्रियाकलापों का प्रभाव आमपास के कस्बों और नगरों पर पडेगा। ग्रामीण-नगरीय अन्तर्क्रिया पर कुछ अध्ययन किए गए हैं जिन्होंने यह दर्शाया है कि () नगरीकरण का प्रभाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इस तरह पडता है कि कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है (निकट के शहरों में खाद, अच्छे बीजों और ट्रैक्टरों आदि की उपलब्धता के कारण), फसलों के व्यापायैकरण में वृद्धि होती है, और फार्म जनसख्या के घनत्व में कमी आतो है। (2) प्रव्रजन (हरंद्धबपण०) के 0] और स्वरूप में प्रभाव पडा है। (3) ग्रामीणों ने कई शहरी विशेषताओं को अपना लिया है। समाज विज्ञान साहित्य ने शहरी और ग्रामीण सामाजिक सगठनीं और जीवनशैली में अन्तर और दोहरेपन को अक्सर बढा चढ़ा कर प्रस्तुत क्या है। इस प्रकर के परिमेक्ष्य में शहरी क्षेत्रों के आकार में, जो कि 5,000 से 5 कग्रेड के बीच भो होता है, अन्तर की उपेशा की गई है। दोहरा परिप्रेक्ष्य, निरन्तर अन्योन्यश्रिता के अस्तित्व, मामीण व शहरी क्षेत्रों के पूरक और परस्परोपर सम्बन्ध, जो वस्तुओं और सेवाओं के परस्पर लेनदेन में परिलक्षित होते हैं, की भी उपेक्षा करता है। ग्रामीण लोग नगरवासियों पर बैंक और ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं के लिए कृषि साज समान तथा अन्य पूर्वियों के लिए, कृषि उत्पादों के विपणन (7८४०) के लिए, और यहाँ तक कि व्यापारिक मनोरजन के लिए भी निर्भर होते हैं। शहरी क्षेत्र खाद्य पदार्थों की आपूर्ति, सस्ते श्रम और निर्मित सामान के लिए बडे बाजार हेतु ग्रामीण क्षेत्रों पर निर्भर करते हैं। शहरी पेशेवर लोग, जैसे डाक्टर, वकौल आदि, अपने अधिकतर मरीज/मुवक्किल ग्रामीण जनता में से प्राप्त करते हैं क्योंकि अस्मठाल और न्यायालय शहरी क्षेत्रों में हो सीमित होते है (प्छ5 8०, 2/0वंदागाएद्ाशय हारे एक्रक्रपडकागा एव गाद।2, 7996, 55-56) | दोहरे स्वरूप चाली एक और घटना जो ग्रामीण नगरीय सम्बन्धों को प्रभावित करती है वह है प्रव॒जन। गाँवों से शहर को आने वाले अधिकतर लोग युवा पुरुष होते हैं जो नगरीय सामाजिक संगठन ६) अकुशल या अर्प-कुशल व्यवसाय करते हैं। जो आमीण उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेवे हैं वे भी नगरों में हो रहना चाहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में यह प्रव॒जन नगरीय सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढावा है और सामाजिक विघरन की समस्याएं पैदा का है। गाँवों से शहरों को ओर प्रवास अलग प्रकार का होता है। एक तो अपनी इच्छा के शहरी स्थान में स्थाई रूप से बस जाता होता है। इसको स्थानापन प्रवास (750८४07 प्रांह्टा 4607) कहते हैं। दूसय वह है जिसमें प्रवासी अपने ग्रामीण आघार पर मडराते रहते हैं और बार बार प्रवास करते हैं-या तो उसी क्षेत्र में या अलग क्षेत्र में--इसको चक्रौय प्रवास (वाएणेअणए फ्राड्ा॥700) कहा गया है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्तरोय अवस्था में छोटे से बडे शहरों में प्रवास करते हैं, इसको क्रमिक प्रवास (०ए-॥रछा॥707) कहते हैं। मेप्े चैटनों (१4७४४ 0॥2८]८०, 97]) ने कहा है कि अवास का स्थायित्व मूल स्थान से दूरो और साथ ही व्यवसायी स्तर का कार्य है। मूल स्थान से दूरी जितमी अधिक होगी, उन प्रबासियों की संख्या उतनी ही अधिक होगी जो शहरों में अपना ठहराव अस्थाई भानते हैं। उच्च पेशों में सलग्न प्रवासियों की अपेक्षा निम्नअतिष्ठा वाले पेशों में सलग्न अवाज्ी शहरों में अपने ठहराव को अधिक अस्पाई मानते हैं। प्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों को प्रवततन कुछ स्वरूप अपनाता है। एक, यह शहरी छोर की ओर 'खिंचाव' (9७॥) कारकों पर और यामीण छोर पर “धकेलने” (/0७७॥) कारकों पर निर्भ! करता है | इस प्रकार, कटाई के मौसम में बिहार से पजाब को कृषि श्रमिकों का प्रवसन इसी प्रकार का होता है। फिए एक और प्रवसन है जो ग्रामीण निर्धनता और शहरों में काम प्राप्ति के अवस्ती के कारण पैदा होता है। उत्तर प्रदेश तथा बिहार से अन्य राज्यों को बच्चों और प्रौढ़ों का काम के लालच में प्रवसन इसी 'खिंचाव' प्रकार का है। सहकारी सम्बन्धों और कार्यात्मक निर्भरता के साथ ही शहरी और म्रामीण क्षेत्रों के दीच सधर्ष और टकराव भी होते हैं। सघर्षों को प्राथमिक या द्वैतियक, स्पष्ट (झआा८॥) या अब्यक्त ((8ध७0), निरन्तर (८०४घ०००७) या सायोगिक (५३5००) रूप में वर्गोकृत किया गया है। परन्तु प्रामौण-नयरीय संघर्ष स्पष्ट नही होते और खुलो हिंसा में नहीं फूटते । उनवा आदि और अन्त का निर्धारण करना कठिन है। हस नागप्राल (लथा5 ९०४७०), बी : 58-59) ने इसके लिए तीन कारक बताए हैं दो प्रामीण लोगों में शहरी लोगों के प्रति सपर्ष या टकराव को प्रोत्साहन देते हैं। ये हैं विपरीत परिस्थित्रिकीय उप-सस्कृतिया, आपुतिकीकाण, और शहरी पूर्वाप्रह। विपरीत परिस्थितिकोय उपसस्कृतियों का अर्थ है कि मामवासियों के श्राकृतिक चाठावरण नगरवासियों के कृत्रिम वातावरण से भिल होते हैं। ग्रामीण कार्य मोसमों और ऋतुओं से निर्धारित होता है जबकि शहरी क्ममकाज पूर्वातुमति दशाओं के भौवर किया जाता है। दोनों ही क्षेत्र एक प्रकार से अलग-अलग अपनी उप-सस्कृतियों वा विकास वर लेते हैं जिनसे आगे चलकर व्यक्तित्वों और सामाजिक सस्याओं का स्वरूप बनता है। यद्यपि सस्यात्तक रूप से प्रामवासी नगरदासियों से अधिक हैं, फ़िर भी शहरों लोग जीवन के अधिकतर छेत्रों में आमतौर पर अपना वर्चस्व रखते है। आर्थिक क्षेत्र में भी शहरी लोगों का एन-सहन वा स्तर अच्छा होता है। इप्तलिए शहरी लोग प्रामौ्ों पर आर्पिक और राजनैतिक दृष्टि से अपना अधिकार जमावे हैं। 332 नगतय साम्रजिक सगठत आएनिकीकरण का कारक भी सपघर्षों को प्रोत्साहित करता है। आधुनिकीकण कार्यक्रम के अन्तर्गत भारत सरकार ने गद पाँच दशकों में पचवर्षीय योजनाओं, सामागिल विधानों, कृषि सुधारों, अस्पृश्यवा निवारण, जनसख्या नियत्रण और वितरणीय न्याय आदि के रूप में अनेक योजनाएँ चलाई हैं। इन आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के चार महत्त्वपूर्ण परिणाम इस प्रकार हुए हैं () नगरीकरण की प्रगति और नगगैय क्षेत्र में शक्ति का केद्रीकरण 0) राजनैतिक लोकतस््रीकरण (3) जाति व धर्म पर आधारित परम्पयागत सस्थात्मक सरचना वा क्रमजोर होना और (५) बढती आकाक्षाओं की क्रान्ति का विस्तृत उदय (प्रक्का5 ]05808, ०० ८6, 60-67)। गांवों में दूर-दूर तक शहरी जीवनशैली का विलय हो वहा है, अधिक से अधिक लोक ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं, ग्रामीण क्षेत्र से युवा पुरुष अधिक से अधिक बाहर जा रहे हैं, प्रामीण परिवार स्त्री प्रधान हो रहा है, व शहरी-प्रामीण सम्पर्कों में वृद्धि हो रहो है। ग्रामोण लोग शहरवास्ियों द्वाय भोगी जाने वालौ सुख सुविधाओं से ईर्ष्या करते हैं। सम्पकों में वृद्धि से नगरवासियों और ग्रामवासियों के बोव टकयव और सघर्षों को अधिक से अधिक प्रोत्साहन मिलता है। राजनैतिक लोकतावीकण मे नये तनाव पैदा कर दिये हैं क्योंकि भू-स्वामित्व और जाति के आपार पर अर्जित नेदच के परम्परागत स्वरूप नये प्रकार के नेतृत्व को जन्म दे रहे हैं जो औपचारिकतावाद ((0774॥57) और चुनाव पर आधारित हैं। र्यों की बढती हुई भागीदारी ने भी कुछ सर्प, तनाव व खिंचाव पैदा किये हैं। यद्यपि जाति प्रथा की कठोरताएँ कम हो गई हैं, फिए मी राजनीति को प्रभावित करने में जाति का कारक महस्तवपूर्ण होता जा रहां है। आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के क्रियान्वयन ने परम्परागत सस्थाओं (जाति, परिवार और पर्म) वो आमीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में अधिक कमजोर करना शुरू कर दिया है। निम्न जाति समूह आज के राजनैतिक जीवन में दथाब समूह बन गए हैं। लोगों वो बढतो हु आकाक्षाओं ने भी आन्दोलनों तथा विगेधों को जन्म दिया है। अन्तिम, शहर पूर्वाग्रह भी ग्रामीण और नाैय क्षेत्रों में संघर्ष का खरोत है। आय में असमानता, व्यवसायिक गतिशीलता के लिए अवसर और जीवन स्तर को ऊँचा उठाना भी ग्रामीण लोगों के मन में शहरी लोगों के प्रवि पूर्वाग्रह पैदा करते हैं। यधपि सरकार ने कृति विकास, ग्रामीण पुनर्तिर्माण, और गैदी उन्मूलन कार्यक्रमों को दल दिया है किन्तु व्यवहार में ग्रामीणों की दशा में कोई अधिक सुधार नही हुआ है। ग्रामीण लोग इस बात से भी अधिना (०४४५८०) रहते है कि प्रामीण क्षेत्रों के लिए निर्धारित धन को नगरीय आधारभूत सरचता, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान, और यातायात सुविधाओं आदि के लिए खर्चा कर दिया जाता है। कुछ लोग शहरी अभिनति को मानसिक स्थिति कहते हैं, परन्तु सत्य यह है कि इससे सर्पा और तनाव पैदा होते ही हैं। सामान्यत अनुसन्धानकर्ता गाँवों में उस समायोजन का अध्ययन करते हैं जो करों और शहरों में परिवर्दनों के कारण (गावों को) करने पडते हैं। लेकिन विक्टर डिसूजा ने आमीण शेत्रों में हो रहे परिवर्तनों और शहरी केन्रों पर उनके प्रभावों का अध्ययन किया है। उन्होंने कस्बों और शहरों के कारों में और उस्त व्यापार और वाणिज्य में जो शहरों में वृह पैमाने पर पाया जाता है, अधिक परिवर्तन देखा। दूसरी ओर बी आरचौहान 0970) और एन आरसेठ (969) जैसे विद्वानों ने देश सगगय साम्राजिक संगठन 333 कि शहर और गांव के लोगों के बीच सार्थक और पनिष्ट अन्तक्रिया का अभाव है। एन आर सेठ ने तो भारत में ग्रामीण और शहरी समुदायों को अलग करने वाले सामाजिक, ग़जनैतिक और आर्थिक अन्तर कौ ओर भी सकेत किया है। इस अलगाव के होते हुए भी दो अलग समुदायों के बीच घनिष्ट और पूरक सम्बन्ध सामान्य और वाच्छित माने जाते हैं। शहर और कला अधिकतर अपने चारों ओर के ग्रामीण समुदाय के लिए सेवा का कार्य करते हैं। एलकेसेन (97) ने दर्शाया है कि कस्बे और शहर की तरह एक बडा गाँव भी आस-पास के शहरों या कस्बों तथा छोटे गाँवों के लिए केद्रीय स्थल का कार्य करता है। क्या भारतीय सपाज 'ब्रामीण' से 'नगरीय' होता जा रहा है? (5 ]0तंबा 80009 िफागए #007 रण] 40 एफश ?) "प्रामोण व 'नगरीय' शब्दों के बजाय यदि हम पारसन्स के परम्पएात' और 'आधुनिक' शब्दों का प्रयोग करें, तो हम उसके बदाए परिवर्ती प्रतिमानों (0000४ ४थ।०00) का प्रयोग कर सकते हैं और इस प्रकार दो समाजों में अन्दर कर सकते हैं। परम्परागत समाज कौ विशेषताएं हैं ; प्रदत्त रोपण (४५८०॥४॥०४) (जन्मजावि प्रस्थिति), ध्रूमिका विस्तार (70॥8 0॥0527९5७) (विस्तृत सम्बन्धे, विशिष्टतावाद (9700एआ75७) (प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से निजी तरीके से व्यवहार करता है), आवात्मकगा (०८७ज०३) (प्रावनाओं की सन्तुष्टि) और सामूहिक उन्मुखवा (००/२०४४७ ०767(७४07) (हितों में भागीदारी)। आधुनिक समाज की विशेषताएं हैं : उपलब्धिता (3०७४६४॥०८७/) (व्यक्ति के प्रयलों से अर्जित प्रस्थिति), शरगिका विनिर्दिष्ठणा (0/८ 59८०गल05) (विशेष उपेश्य के लिए विकसित सम्बन्ध), सार्वभोमिकवा (0णाट्टाइव5य) (एक से नियम सब पर समान रूप से लागू), भाषफ़रक निरपेक्षणा (थी००४५७ एरध्णाअश)) (नियत्रित भाव), और आत्मोन्दुषता (श-ठ7660680) (निजी हित्र का महत्वपूर्ण होना)। अत स्तरीय (छद्व4८४) प्रामीण-नगरीय निरन्तरवा के अर्प में विचार का सार्थक है जिसके उपरोक्त स्वरूप भिलताएं चरम बिन्दु हैं। भारत में ये विशेषताएं प्रमाण और शहर दोनों क्षेत्रों में मिली-जुली दिखाई देती हैं। क्योंकि ग्रामीण समुदायों में शहरी व शहरी समुदायों में ग्रामोण विशेषताएँ हैं, तो यह कहना तर्कहौन होगा कि भाज़ोय समाज 'प्रामोण' से 'शहरो' होता जा रहा है। नगीय सामाजिक सगठन : निस्‍्तरता एवं परिवर्तन (एक्रज $०57 0एइथांफगांणा ; 00ग्रॉग्रएंए गाए (प्रणाएल) नगगेय सामाजिक शगठन का दो जहर पर विश्लेषण किया जाग आवश्यक है. () वह परिवर्तन का स्तर जिसके अन्वर्गव परिवार, जाति व नाहेदारों प्रधाए और धार्मिक मूल्य परिवर्तित हे रहे हैं और (४) मामीण सामाजिक सगठन से इसकी तुलना व अन्तर। यदि हम दूसरे पश्च को पहले लें दो यह कह सकते हैं कि जहाँ ममौण सामाजिक संगठन जाति पर आपएाएि है, वही शहरे सामाजिक समठन वर्ग पर आधारित हैं। विक्टर डिसूजा (:558 रेप, 985 : 767) ने भी कहा है. “शहरी सामाजिक संगठन वर्ग आधारित और पर्म निषेशेनुष (६८८॥आ-०पंटया८०)” है। परन्तु विल्यम एल शेवे (था! 4. २०७८, उउ4 नगतीय सामाजिक संगत 973), डैविड एस डेकिन (0293 $ 03900) और ब्राडले आएहसाल (फब्वाल ए प्र, 978) जैसे विद्वानों का मानना ई कि जाठि, नातेदारों और धर्म का भारत के नगरीय समुदाय पर आज भी वर्चस्व बना हुआ है। इस स्तर पर आ्रामोण और शहरी समुद्र में परिवर्तन निवास स्थान के करण नहीं है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक प्रस्थिति में परिवर्तन के कारण है। एसपी जैन ने (97) उत्तर प्रदेश के एक कस्बे के अध्ययन के आधार पर वहा है कि हिन्दुओं और मुसलमानों में परम्पयगत जाति श्रेणीबद्धता अभी भौ जारी है। सिलबौया बुक (5७५३३ ५४, 973) ने भी उत्तर भारत के एक कस्बे में प्रवासियों के एक अध्ययन के आधार पर कह है कि प्रवासियों में नातेदारी का महत्व आज भी जारी है। मेरे चैटर्जी (७०9 ८४०७८॥८८, 7974) और एमएफ खान (976) ने कहा है कि नावेदारे सामाजिक संगठन का प्रथम सिद्धान्त है। शहंरें और कस्बों भें सामाजिक संगठन कौ परम्पयगठ विशेषदाएं, खासतौर पर घार्मिक अवसरों पर, स्पष्ट झलकती हैं। मिल्टन सिंगर (988) ने सकेत किया है कि शहरी और औद्योगिक परिवेश में भारतीय परम्परागत संयुक्त परिवार आज भी विद्यमान है। शहरी क्षेत्रों में जाति और राजनीति के बीच सम्बन्धों पर अनेक अध्ययनों ने दर्शाया है कि वोट लेने के लिए राजपूत, नादर, जाट, रेड्डी, ब्राह्मण, थादव, आदि ड्वाए जाति का प्रयोग किया गया है। दूससे ओर, कुछ जाठियों ने सामाजिक गतिशोलता के लिए शहरों में राजनीति का प्रयोग किया है। अत सामाजिक सगठन के परम्पणागत सिद्धातों में अर्थात्‌ जाति व नादेदारी प्रधाओं के कार्य करने में तथा घार्मिक मूल्यों के महत्त्व को मारते में निसन्देह निरन्‍्तस्ता विद्यमान है। परन्तु शहरी क्षेत्रों में जाति और नातेदाश के कार्य करने में भी कुछ परिवर्तन आए हैं। शहरी क्षेत्रों में लोगों के बीच दिन प्रतिदिन अन्तर्क्रिया में न वो जाति, और न हो धर्म को कोई महत्व दिया जादा है। उदाहरण के लिए, विभिन्‍न अवसरों पर सामाजिक और आर्थिक सहायता के लिए लोग जाति और नातेदारों की अपेक्षा पडौसियों, परिचितों और दफ्तर के सहयोगियों पर अधिक निर्भर करते हैं। नगरीकरण और परिवार (आ5बरघतत क्कवे स्क्रताड़ो परिवार सरचना पर नगरीकरण का प्रभाव एमएम गोरे, एलिन रास, केएम कापडिया और आईपी देसाई जैसे विद्वानों द्वारा बटाया गया है। नगरोकरण न केवल परिवार सरवना वी प्रभावित करता है, बल्कि परिवार के अन्तर्परिवारिक सम्बन्धों के साथ-साथ परिवार द्वारा किए जाने वाले कार्यों को भी प्रभावित करता है। आई पी देसाई 964) ने गुजग़त के एक छोटे कस्बे (महुवा) में परिवार के अध्ययन में पाया कि परम्पणगत सयुक्त परिवारों (अर्थीत निवार, अधिकार, सम्पत्ति और दौन सदस्यों से अधिक पीढिया) के स्थान पर प्रकार्यालर्क ((07८४०४०)) सयुक्‍त परिवार आ रहे हैं, परिवार का आकार छोटा हो रहा हैं और नतेदा सम्बन्ध दो या तीन पीढियों तक ही सोमित हो गए है। कापडिया 6959) ने गुजरात में “ग्रामीण” और शहरी परिवारों के तुलनात्मक अध्ययन में पाया कि ग्रामीण समुदाय में सयुक्ी परिवारों का अनुपात वही है जो एकल परिवारों का (६97 503) है, शहयी समुदाय में एक्स परिवारों की अपेक्षा सयुक्त परिदार अधिक है, और उनका अनुपात प्रत्येक तीन स्ुर्की परिवारों के लिए दो एकल परिवार है। रास ने 957 में बगलौर के मध्यम और उच्च हि नयरैय सामाजिक संगठन 335 पद के अपने अध्ययन में पाया कि परिवार के ढाँचे और आकार में परिवर्वन के साथनसाथ दूए के नातेदारों से सम्बन्ध कमजोर हुए हैं या टूटे भी हैं। एमएस गोरे (969) ने नगरीकरण के कारण परिवार में कम परिवर्तन देखे हैं। नगरीकरण और जाति (एक्ांड्जात्त शाएं धाजञछे जहाँ तक जाति पर नगरीकरण के प्रभाव का प्रश्न है, रमू (975), हेमलता आवार्या 976) और डीए, चेक्की (!974) ने जाति और नावेदारी सम्बन्धों में परिवर्तन और निस्‍न्‍्तरदा दोनों की ओर सक्ेत किया है। शहर का व्यक्ति न केवल जाति से अपनी प्रस्थिति को प्राप्त करता है बल्कि अन्य विचारों से भी। वृहत्‌ दृष्टिकोण से मह कहना गलत ने होगा कि नगरीकरण के साथ-साथ जाति पहचान समाप्त होती जाती है। शहर के लोग ऐसे सम्बन्धों में भाग लेते हैं जिनमें अनेक जातियों क्रे लोग होते हैं। रजनी कोठारी के अनुसार विशिष्टापक (एभा०णैकआं50०८) निष्ठाओं की मरचना के स्थान पर सामाजिक और राजनैतिक भागीदारी की अधिक परिष्कृत (50/॥50८८0) व्यवस्था मिलती है जिसमें निष्ठाओं में सहदृश्य काट (००४-८॥॥॥६) पायी जाती है। आउ्रे बेते३ 966 209-0) मे कहा है कि पश्चिमीकृत अपियात वर्ग में जाति बन्धर्नों कौ अपेक्षा वर्ग बन्धन अधिक मजबूत होते हैं। कभी-कभी किसी जाति के कुछ शिक्षित व आधुनिक व्यवसायों में लगे व्यक्ति स्वयं को एक दबाव समूह (ए८४४७४९ 87079) के रूप में संगठित कर लेते हैं। फल यह होता कि श़जनैतिक और आर्थिक संसाधनों (:८७०७४४८०७) को प्राप्त करने के लिए एक जाति समिति (0500॥000) अन्य दबाव समूह के साथ एक निगमित संघ (00908 हा ) कें रुप में प्रदिस्पर्धा में आ जाती है। इस प्रकार के सगठन भये प्रकार की एकता दशाते हे । ये प्रतिसर्धी इकाइयों जाति सरचना कौ अपेक्षा सामाजिक वर्ग की तरह काम करती हैं। आज एक और परिवर्तन दृष्टिग होता है और वह है उपजातियों का आपस्र में और जातियों का आपत्त में सम्मिश्रण (॥क्००) | कोलेण्डा ([(0९४09, 084. 50.57) ने दीन प्रकार का स्रीमश्रण बताया है. () विभिन्‍न जातियों और उपजातियों के लोग अपने कर्यस्थतों में और शहों में नये पडौस में मिलते हैं। वे लगभग एक हो दर्जे के होते हैं। पद्नैस या कार्यालय मूह में निष्ठा का विकास होता है। बड़े शहरों में सरकागी कालोनियों में यह आमतौर पर देखा जा सकता है, (0) अन्त उप जातीय विवाह हो रहे हैं जिससे उप-जातियों को एकरूपता बढ रही है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि कई बार शिक्षित कन्या के लिए उस उपजाति का यथेष्ठ शिक्षित वर मिलना कठिन होता हे लेकिन पडोस की उपजाति में मिल सकता है, और (४) लोकताचिक राजनीति उप-जातियों और आसपास की जाहियों मेल था एकरूपता लाने में सहायक होती है। तमिलनाडु को द्रविड मुनेद्र वषणन औए अना ड्रमुक पार्टियों एक उदाहरण हैं जिनमें उच्च गैर ब्राह्मण जाति के सदस्य हैं। शहरी लोग जाति प्रतिमानों र्य सख्तों से पालन नहीं करते। सह'्येज सम्बन्धों, विवाह समन्यों, सामाजिक सम्बन्धों, यहा तक कि व्यावसायिक सा्वन्धों में परिवर्तन आया है! बिहर में जाति प्रथा पर एक अध्ययन (नर्मदेश्वर प्रप्ताद) से स्पष्ट हुआ कि नगरीकरण जाति प्रष वो सभी विशेषताओं को समान रूप से प्रभावित करता है। इस अध्ययन में पोच दातियों (बाह्मण, राजपूत, धोनी, अहीर और चमाए के 200 लोगों के अध्ययन के आधार पर 336 नयदीय सामाजिक संगत यह पाया गया कि सभी उत्तरदाताओं ने अपनी ही जाति में विवाह किया, यद्यपि शहरों में रहने वाले 20 प्रतिशत उत्तरदाता (ग्रामीण क्षेत्रों के 5% के विपरीत) अन्तर्जातीय विवाह के पक्ष में थे। जहाँ तक पेशे का सम्बन्ध है, शहर में एक भी उत्तरदाता परम्परागत जाति पेशे में नहीं लगा था यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में 80% उत्तरदाता अपने परम्परागत बन्धे में लगे थे। इसी अ्रकार शहरों में जातीय एकता इतनी मजबूत नहीं थी जितनी प्रार्मो में। शहरों में जाति पचायतें काफी कमजोर थी। जीएस धूर्ये 0952), केएम कापडिया (959), एपी बरनाबास, योगेंद्र सिंह, आरके मुकर्जी, एम एन श्रीनिवास, योगेश अरल और एससी, दुबे ने भरी नगरीकरण के प्रभाव के कारण जाति प्रथा और अन्तर्जातीय सम्बन्धों में परिवर्तन को बात कही है। नगरीकरण और महिलाओ की प्रस्थिति ([॥097/52007 छाते 5905 0 छएल्) शहरों में स्त्रियों की प्रस्थिति गाँवों को स्त्रियों से ऊची है। शहरी स्त्रियों तुलनात्मक रूप से अधिक उदार और अधिक शिक्षित होती हैं। 99) की जनगणना के अनुसार शहरी क्षेत्रों मे 54 प्रतिशत स्त्रियाँ शिक्षित हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 25 प्रतिशत ही हैं। उनमें से कुछ घनोपार्जन का काम भी करती हैं। (65 प्रतिशत महिलाएँ 993-94 में श्रम से सम्बन्धि थी. ॥/#फ०0%० 7१०१०, 998 29)। अत वे न केवल अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक अधिकारों के प्रति जागरूक हैं परन्तु वे अपमान और शोषण से बचने के लिए इन अधिकाएं का प्रयोग भी करदी हैं। शहरों में विवाह योग्य लडकी को औसत आयु गार्थो कौ अपेक्षा कही अधिक होती है। परन्तु श्रम बाजार में स्लियाँ अभी भो सुविधा वचित स्थिति में हैं तथा अभी भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है और अवसर की समानता (रोजगार, प्रशिक्षण और पदोलतं अवसरों में) का विशेध होता है। इस अर्थ में तो लिंग के आधार पर विभाजित श्रम बाजाए में परिवर्तन सभव नहीं है जिसको सरचना बताती है कि रिरियों की जीवनवृति (६६०) असाततत्य (0/5207/४009) वाली होती है जबकि सामान्य पुरुष कार्य के स्वरूप निज्दरता अधिक होतो है। लिंग के आधार पर अलग किए गए श्रम बाजार में प्रतिबन्यों के कारण स्त्रियां चुने हुए व्यवसायों में अधिक सख्या में आती हैं जिनकी प्रस्थिति निम्न और मजदूरी भी कम होती है। सामान्यत स्त्रियों अध्यापन, नर्सिंग, सामाजिक कार्य, सत्तिव वीं कार्य और लिपिकीय कार्य को वशेयता देती हैं। इन सभी व्यवसायों में निम्न प्रस्थिति और निम्न मानदेय होता है। वे स्त्रियां भी जो पेशेवर शिक्षा की कठिनाई को पार कर लेती है, सुविधा बचित स्थिति में रहती हैं क्योंकि वे व्यवसाय को माँग की प्रतिस्पर्धा और अपने घर दोनों में समझौता करने में कठिनाई अनुभव करती हैं। स्त्रियों के लिये अकेला रहना या विवाह के साथ-साथ जीवन॒वृत्ति (वा) में लगा रहना कठिन होता है। इस सामान्य अपेक्षा के अलावा कि स्त्रियों को गृहिणी (005८४) होना चाहिए, यह देखा गया है कि जब कभी आवश्यकता पडती है, स्त्रियों को अपनी जोवमवृत्ति को बलिदान करना पडता है। इस प्रकार अपनी जीवन वृत्ति के साथन को अपने पति की यृत्ति के आयोन मानना पडता है। इससे बहुधा हों में कुण्ठा पैदा होती है जिसे कई स्त्रियों में मानसिक बोमारी भी पैदा होती है। परन्तु ग्रामीण स्त्रियों को ऐसी समस्या वी नयपय प्रामाणिक संगठन 337 सामना नही कला पडता! है यह भी पाया गया है कि भारत के नगरों में लड़कियों में उच्च शिक्षा का स्वर छोटे आकार के परिवार में मिलता है। यद्यपि स्त्रियों की शिक्ठा से विवाह की आयु में वृद्धि तथा जन्म दर में कमी हुई है, लेकिन इससे दहेज के साथ परम्पणगत तयशुदा (॥घ००६००) विवाह के स्वरूप में कोई क्रान्दिकारी परिवर्तन नहीं हुआ है। मार्गरेट कारमेक (धआएथाल (०४००४, %! : 09) ने विश्विद्यालय के 500 छात्रों के अपने अध्ययन में पाया कि सडकियों कालेड जाना और लडकों से मिलना-जुलना चाहती थी लेकिन वे यह भी चाहती थी कि उनका विवाह उनके माता-पिता तय करें। लडकियाँ नये अवसर तो चाहती हैं लेकिन सुरक्षा भी चाहती हैं। वे अपने नव स्वतत्रता का भोग भी करना चाहती है लेकिन साथ-साथ पुराने मूल्यों को भी जाये रखना चाहरीं हैं। लाक और पुन' विवाह दो नयी घटनाएँ हैं जो शहरी स्त्रियों में अधिक मिलती हैं। आज स्त्रियों #९५ तलाक में अधिक पहल करती हैं, यदि वे विवाह के बाद समायोजन अस्म्भव देखती हैं। केवल देहली में ही श्रति सप्ताह 20 दम्पत्ति अपने जीवन साथी से तलाक के लिए मुकदमें दायर करतो हैं। जनवगें और मई, 999 के बीच पाँच महीनों में लगभग 2,000 तलाक के मामले दिल्ली के न्यायालयों में दर्ज कर्म गये थे (796 मं॥८/0७॥ पर/॥०, 709०, 42, 999) | बडो बाव यह है कि बडी सख्या में स्त्रियों द्वारा 540९ उत्पौडन और बेमेल विवाह होने के आधार पर तलाक के लिए याचिका दायर कई जातो है। ्रजनैतिक दृष्टि से भी शहरी स्त्रियों आड अधिक सक्रिय हैं। चुनाव लडने वाली खियों को सख्या हर स्तए पर बढ़ी है। वे महत्वपूर्ण पदों पर आसौन हैं और उनकी विचारधाण भी स्वतत्र हैं। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जहा ग्रामीण जियों आधिक और सामाजिक दोनों प्रकार से पुरुषों पर आज भी निर्भर हैं वही शहरी स्त्रिया अधिक आत्म निर्भप हैं और अधिक स्वठत्रवा का आनन्द उठाती हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अगर हम अशीश नन्‍्दी (975) जैसे उन विद्ानों के विचारों को स्वीकार भी करें जिन्होंने शहरी सामाजिक संगठन के बन्पनों के स्थान 'र नये आयामों की चर्चा की है, फिर भी हम शहरी परिवेश में परिवार, जाति, नातेदारी व पर्म के कार्य प्रणाली के परम्परागत पक्ष की मौजूदगी की अवहेलना नहीं कर सकते। उगगीय समुदायों में स्तरोेकरण और सामाजिक गतिशीलता (0गाद्यांतत छ0 5०संग ० क एज (ए्चाग्नाणणांत85) प्ररतीय सामाजिक स्तरौकरण की विशेषता जाति और वर्ग है। नगगैकरण और औद्योगीकरण ने स्वोकाण प्रणाली को गतिशौलता प्रदान की है। विक्टर डिसूजा 0978) ने मात्रा है कि जाति और सामाजिक गतिशोलता में परिवर्तन लाने में औद्योगीकरण की भूमिका को बहुत अध्दिक बल दिया गया है। झहरो क्षे्र सामाजिक गतिशौलता के लिए अधिक अवश्नर प्रदान करे है लेकिन क्या शहों में जातिया अपनी सामाजिक परिस्थितियों को ऊँचा उठाने में सफल होतो है ? जेम्स फ्रिगेन (#व्राप८5 विष्प्याक्णो ते 974 में एक शहरीकृत हिन्दू गोंव 338 तगगेय सामाजिक संगठन के अपने अध्ययन में और श्यामलाल ने 975 में गजस्थान में जोधपुर के निकट भगियों के अध्ययन में जाति प्रथा में गिशीलता नही पाई। इसके विपरीव शहरी क्षेत्रों में निम्न जाति के लोगों ने अपने परम्णशशत विशेषाधिकार और कर्नव्यों को बनाए रखने में अधिक झुदार का सकेत दिया है। दूसय दृष्टिकोण यह है कि आज के युग में व्यक्ति की व्यावसायिक प्रतिष्ठा अधिकतर उसको शिक्षा पर निर्भर है। जितनी ऊँची शिक्षा होगी उठनी हो ऊंची व्यावसायिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने को सम्भावना होतो है। क्‍योंकि शहरों समुदाय अच्छे शैक्षिक अवसर प्रदान करते हैं इसलिए यहाँ प्रस्थिति गतिशोलदा के अवसर भी अधिक होते हैं। परन्तु ग़जेद्ध पाडे (974) ने शहरी व मामीण कालेज युवकों को व्यावप्तायिक आकाक्षाओं के अन्तर में अपने तुलनात्मक अध्ययन में निष्कर्ष निकाला कि शहरों और ग्रामीण समाजों के सरचनात्यक आधार युवाओं की आकाशक्षाओं, इच्छाओं, और मूल्यों में बोई भेद नहीं करते और तदनुसार शहरी और ग्रामीण युवा विभिन्‍न प्रकार की वृत्तियों (09) की प्राप्त करने कौ इच्छा रखते हैं। यद्यपि जाति व्यवस्था गतिशीलता को स्वीकार करती है, लेकिन जाति श्रेणीक्रम में सम्पूर्ण समूह अपनी स्थिति बदल लेता है। लिंच ([..7०9, 7969), हार्ईमेव (प्रध्नठ्ञा7९, १970) और अशीश नन्‍्दी जैसे विद्वानों ने सकेत दिया है कि जाटवों, नादरं, और मरिषों के ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहा नगरोकरण और औद्योगीकरण ने सामाजिक गतिशौलता का समर्थन किया है। सतीश सब्ब्वाल (976) ने पजाब में बढई जाति के रामगढियां लोगों में ऊर्ध्वमुखी (५०४४४०) गतिशौलता की चर्चा की है। जातीय विविधता आर सामुदाबिक एकीकरण (ष0एफ९ एफ. भा० (0ग्राणच्रणाज विच्ट्वागंगा) चुनिन्दा प्रकार के लोग हो क्योंकि शहरी क्षेत्रों को ओर प्रवास कत्ते हैं, शहरी समुदाएं में भी कुछ नृजातीय अल्पसख्यक होते हैं। यह शहरी सामाजिक सरचना में उनके एकौकृत होने की समस्या पैदा करता है। इस पण्मिश्य में डिसूजा ने दो विद्वानों के अध्ययनों का सत््ष दिया है--एक 978 में पूता में केएसनैयर के अध्ययन का और दूसरा ऐन्ड्री मेनेफ़ी सिंह (707८३ टाल 5गह9) का। इन दोनों ने हो श्वेतवसन व्यवसाय दक्षिण भ्राप़ीय ब्राह्मणों के एकोकरण का अध्ययन किया। दोनों हो अध्ययनों में यह पायः गया कि अ्रजकों ने स्थानीय सदस्यों की जीवनशैली को नहीं अपनाया बल्कि इसके विपरीत अपने पृथक निवास स्थानों में अपने निजी समुदायों की दशाओं का दक्षिण भारतीय सेवाओं, मस्थाओं और सो की स्थापना करके निर्माण कर जिया। इसी प्रकार की एकीकरण की प्रक्रिया हम बगालियों, पजाबेयों, केरल वाप्तियों, दमिलों, महाराष्टियों और कश्मीरेयों में भी देख सकते है जो अपने मूल नगें से दूसरे राज्यों के नगरों में जाकर बस जाते हैं। वे न केवल अपने संघ (७550०४900॥5) बना लेते हैं बल्कि विशेष अवसरों पर एक दूसरे से मिलते भी हैं ज दे अपनी सामाजिक प्रथाओं का पालन करे हैं। बीपुनेकर (8 एणाटप्थ, ॥979 ने भी बैंगलौर नगर में उत्तर भारत से आए लोगों के बीच एकीकरण की यही प्रक्रिया पायी । पुनिव, सिंह और नैयर ने एक नगर में रहने वाले भिन भिन नृजातीय समूहों के बीच सम्बनयों के विश्लेषण में परस्पर उदासीनवा और विन्ध न डालने की प्रवृत्ति [॥0॥-ए्ाटा८ए००) जफाय सामाजिक संगठन 339 वि्ल (०) देखा। कुछ मामलों में ही उन्हें आक्रामकता (#०पर7) दिखाई दो। एमएस गारे ५70) ने मुम्बई में अपने अध्ययन में पडौसियों के साथ सम्बन्धों में आक्रामक रूख देखा जहाँ महाराष्टरियों ने अपने उन पड़ोसियों के साथ नकारात्मक रूख का प्रदर्शन किया जो अस्य क्षेत्रों में आए थे। परन्तु महाराष्ट्रीय लोग शिव सेना प्तैनिकों के आदरशों से इतने अधिक प्रभावित हैं भहाराष्ट्र महाराष्टियों के लिए) कि यह नहीं कहा जा सकता कि इसी प्रकार कौ विचारधाण देश के अन्य भागों में विभिन्न उृजातिय समूहों के बीच सम्बन्धों को निर्धारित करती है। शहरों में विभिन्‍न नृजावीय समूहों के समायोजन के प्ररूपी (90/८०) स्वरूप सामजस्य (३८८०एग्रा०0॥॥०॥) और सहिष्णुता ([067०/0/) के स्वरूप होते हैं। नगीय पड़ोस (0%ण॥ 'श्मा0०००४०००) समाजशास्त्रियों ने पडौस को भायमिक समूह कहा है जिसके सदस्य एक दूसो के साथ घनिष्ट और निकट सम्बन्ध रखते हैं। लेकिन नगरीकरण मे पडौसी सम्बन्धों को इस प्रकार प्रभावित किया है कि पड़ौसी एक दूसरे को जानते पी नहीं हैं, सामाजिक अन्तक्रिया और निकट सब्बन्धों की तो बात ही क्‍या है। पडौसी सम्बन्धों पर किए गए एमएस गेरे के अध्ययन के अविरिक् 977 में सुभाष चद्धा ने उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में पडौस में सामाजिक सहभागिता ((आ४०9०७॥०॥) के स्तर (०४७) का अध्ययन किया था उन्हेंने पाया कि पड़ोसी अन्तक्रिया में उच्च स्तरोय अनौपचारिकदा होती है। हरिश दोषी ने 974 में अहमदाबाद में पड़ौप्तियों के अपने अध्ययन में परम्परागत पडौस को दृढ़ता के साथ-साथ बदलते परिवेश के साथ अनुकूलन भी देखा। निरजन पथ ने 978 में अपने अध्ययन में प्राया कि पड़ोस में उच्च सामाजिक-आर्थिक अस्थिति के लोग सामुदायिक मामलों तथा पडौस कौ मांगों और आवश्यकताओं को अभिव्यक्त करने में अधिक सक्रिय होते हैं। नगर के आनरिक भागों में रहने वालों का विश्लेषण यह दर्शादा है कि आय, शिक्षा ओर व्यवसाय जैसे सन्दर्भों में उसी पडौस में रहने वाले लोग बिल्कुल भिन्‍न जीवन व्यतीत करे हैं। पड़ौस में एहने वालों को कई समूहों में विभक्त किया जा सकता है. आग्रवासौ (॥एां्र॥8), पेशेवर, छात्र, बुद्धिजीवी, व्यापारी, नौकरी पेशा वाले, कम शिक्षित, उच्च शिक्षित और मध्यम तथा धनी वर्ग के सदस्य। ये विविध सामाजिक वर्ग यद्यपि निकट भोतिक सनिष्य (07० ध्याण)) में रहते हैं, फिए भी सामाजिक रूप से वे विभिल जगत में रहते हैं। उच्चवर्गाय सदस्य निम्नवर्गीय सदस्यों से थोड़ी ही दूरी पर रह सकता है, लेकिन अपने धन, शक्ति और विशेषाधिकारों के काएण उनसे अलग-धलग पड जाता है। इसी प्रकार के अन्तर भिन वर्ग के लोगों के बोच भी देखे जा सकते हैं जो शहरों में नव विकसित बडी कालोनियों में रहने आते हैं। उनके घर अलग न भी हों लेकिन सामाजिक दृष्टि से वे स्पष्ट और अलग जीवन व्यतीत करते हैं। वह रहने वाले घटी लोग अपने को स्थानौय समुदाय का हिस्सा नहीं मानते। उच्च यर्ग के सदस्य परस्पर एक दूसरे को जानते हैं लेकिन अन्य केवल उनके बे में हो जानते हैं। कभी-कभी मध्यम वर्णॉय लोग शहरों में श्रमिक क्षय में सम्पत्ति क्रय करते है। इस प्रकार को प्रक्रिया वो कुलौनीकरण' (ह६ण07रीव्या07) कहते है। हे निवासियों में सामाजिक स्वरूप आया की गुणवद्ा पर प्रभाव पड़ता है। 340 नयतीय सामाजिक संगरन नगरीय समाज की समस्याएँ (एएाशा्5 ०0 एज $०सलंलएओ शहरी समस्याएँ अनन्त हैं। प्रदूषण, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अपराध, बाल अपराध, अधिक भीडभाड और झुग्गी बस्ती, मादक पदार्थों का सेवन, शराब खोरी, और भिखारी उनमें से कुछ हैं। यहाँ हम कुछ पहत्त्वपूर्ण समस्याओं का विश्लेषण करेंगे। मकान और गन्दी दस्तियाँ (पण्छजंण्छ 38७१ 55फ5) शहर में मकान मिलना या बेघर समस्या का उन्मूलन एक गम्भीर समस्या है। सरका, उद्योगपति, पूजीपति, उद्यमी, ठेकेदार, और मकान मालिक, गरोब और मध्यम वर्ग लोगों को मकान की जररवों से तालमेल करने में असमर्थ रहे हैं। 988 की सयुकत राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार (78८ म।#द॥8/20 7/॥॥65, 9 १४०७, 7988), भारत के बडे से बड़े नगतों में रहे वाली शहरी जनसख्या का एक चौथाई और आधे के बीच भाग झोपड प्टियों में रहता है। लाखों लोगों को अत्यधिक किराया, जो उनके साधनों से कहो अधिक होता है, देना पडता है। हमारी 42868 ख अर्थव्यवस्था में निजो भवन मालिक और कालोनी बसाने वाले लोग शहरों में गरीबों और मध्यम वर्गीय लोगों के लिए मकान बनाने में कम लाभ देखते हैं, और इसकी अपेक्षा वे घनी व उच्च मध्यमवर्गीय लोगों की मकान की आवश्यकताओं पर ध्यान क्ेद्धित करने में लाभ समझते हैं। अत उच्च किगए और कुछ उपलब्ध मकानों के लिए भीड़ इसका नतीजा होता है। लगभग आधी जनसख्या खराब मकानों में रहती है या किएए पर अपनी आय के 20 प्रतिशत से अधिक देती है। कुछ राज्यों में हाउसिंग बोर्ड और नगर विकास प्राधिकरणों ने जीवन बीमा निगम, हुडको (प्रा॥000) और ऐसी ही एजेंसियों की सहायता से मकानों की समस्या का समाधान का प्रयल किया रे । वे मकान की कुल लागत मासिक किश्तों में भी वसूल कस्ते हैं जो 9 प्रतिशत से 2 प्रतिशत के बीच ब्याज की दर पर होती है। इस प्रकार शहरों में मकान आज भी रोटी और कपडे के बाद सबसे बडी समस्या बनी हुई है। नवी पचवर्षीय योजना के प्रारम्भ में मकानों की अनुमानित कमी लगभग तीन करोड की थी जिसमें से लगभग एक करोड तो शहरी क्षेत्रों के लिए हो चाहिए थे। 999 तक यह कमी शहरी क्षेत्रों में लगभग 5 करोड इकाइयों की थी। केवल दिल्ली में ही जहां एक दशक में 099। और 999 के बीच) 062 से 093 करोड जनसख्या वृद्धि तथा हर वर्ष 65,000 से 75,000 लोगों की वृद्धि हो जाती है, उन्हें नये घर प्रदान करने की आवश्यकवा होती है। दिल्ली की लगभग 70 प्रतिशत जनसख्या यूएन आई की रिपोर्ट के अनुसार, निल स्तरीय स्थितियों में रहतो है । यदि केवल चार महानगर्णो को लें तो दिल्ली में कुल जनसख्या का 44 प्रतिशत, मुम्बई में 45 प्रतिशत, कलकत्ता में 42 श्रविशत और चेन्नई में 39 ग्रतिशव लोग झोषड पट्टियों में रहते हैं। अन्य आठ महानयरों, बैंगलोर और जयपुर में भो दशा इससे अच्छी नहीं है। सरकारी प्रथलों के बावजूद भी, झोपड पट्टियों की जनसख्या 2000 तक मकानों की समस्या और अभाव को भयावह बना देगी। गन्दी बस्तियों में जोवन दशाओं दी विशेषताएँ हैं अधिक भीड, खराब वातावरण, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण सेवाओं का अभाव, और मकानों की पूर्णरूपेण कमी | परिणामत इन बस्तियों में रहने वाले लोगों की नफीय सामाजिक संगठन डा दरशाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की अपेक्षा कही अधिक खण्ब और दयनीय हैं। भीड़ और निर्वैषक्तिकरण (एफम्स्‍णंण्ड बाग्पे ऐकफटडणारय्बा09) भोड (जनसंख्या घनल) और अन्य लोगों की समस्याओं के प्रति लोगों को उदासीनता की समस्याएं (पडौसियों को समस्याओं सहित) एक और समस्या शहरी जीवन की उपज है। कुछ पा तो इतने अधिक भीड-भाड़ वाले होते हैं कि उनमें एक कमरे में पाँच से छ व्यक्ति तक रहते हैं। कुछ शहरी पड़ौस बहुत अधिक भीड वाले होते हैं। अधिक भीड के खगब प्रभाव होते हैं। यह विचलित व्यवहार को प्रोत्साहन देता है, बीमारियों फैलाता है और मानसिक ऐगों, शाबोरी और साम्प्रदायिक दरों के लिए स्थितिया पैदा करता है। घनो आबादी के शहरी जीवन का एक और प्रभाव है लोगों को उदाप्तौनवा। शहर के लोग दूसरे लोगों के मामलों में उलझना नहीं चाहते। कुछ ही लोग दुर्घटना, स्त्री उत्पीड़न, हपलों और यहा तक कि हत्या के मामलों में रुचि लेते हैं, लेकिन अन्य लोग मात्र दर्शक रहते हैं। जल आपूर्ति और जल निफास (५४७८६ 50990 बणप एः-डण्घ2९) पानी की समस्या भारत में अति गम्भीर होती जा रही है। (७४४ राद और राजस्थान में तो सूखा इतिवृत्त (000णं०८) है। पानी की कमी की समस्या न केवल दो-तीन राज्यों में है परन्तु अन्य परेशों में भी यह ही स्थिति है। लगता है कि भविष्य में गजनीति को लेकर नहीं परन्तु पानी को लेकर ही विभिन राज्यों में विरोध बढेगा। ताज्जुब यह है कि पृथ्वी के घातल (४780०) का एक-विहाई हिस्सा पानी से ढका हुआ है और फ़िर भी निवासी प्यासे हैं। यह इसलिए कि कुल उपलब्ध पानी का केवल 25 प्रतिशव ही शुद्ध (7८७४) पानी है। फिए इसका 026 प्रतिशत ही झीलों, नदियों आदि द्वारा उपलब्ध है। दूसो शब्दों में जमौन पर कुल उपलब्ध पानी का केवल 0007 भ्तिशत ही घारणीय (5७७७७७४७/०) आधार पर उपलब्ध है। (॥४ फशांफाद्य 7, 8 22, 2000) । भारत 2] वीं शताब्दी में पहुँच चुका है और अब न्यूक्लोय शक्ति के रूप में उद्यमन हो कर विश्यव्यापी स्तर पर प्रमुख भूमिका निभाने जा रहा है। लेकिन व्यग वाली बात यह है कि लोगों के बहुत बडे भाग को प देश में पानो की समस्या का सामना करना पडेगा। यह सकट आदमियों द्वारा निर्मित (प्पश-व40८) है क्योंकि अधिकाश नदियाँ रसायनिक और औच्ोगिक मलनिस्राव (भा०८०/) से प्रदूषित हो गई हैं। फिर देश का दो-तिहाई शुद्ध पानी हर वर्ष वाष्पित (०गण4०) होता है या समुद्रों में मह जाता है ! हाल हो में यूएत आपत्ति स्थिति फण्ड (033 हजहाहृ०ा०७ [छत) ने जमीन के पानो प्रदूषण, पानी के साधनों का कुप्रबन्धन, अपर्याप्त कानून ओर वर्तमान कानूनों का दोषपूर्ण रूप से कर्यान्वित कले को समकालीन शत पें पारो को कमी का काएण भाना है! भारत में वर्षा से काफी पानी मिलता है। फ़िर भो देश के 56 लाख गाँवों में से आधे से अधिक को पर्याप्त और शुद्ध पाती वी समत्या ॥ प्रामोध विकास मत्रालय के अनुसार देश में 70000 वाउ्स्पानों (॥2002800७) (हर एक 50 पाणविें के साथ) को 6 किलोमीटर की परिधि (30:00) में पानी के साधन की क्यो है। सन्‌ 2025 तक भारत की यह समस्या शुजगत, राजपघ्पान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, डिदा, दमिलनाइ आदि में गम्भीर हो जायेगी। यमुना नदी वा पानो हर वई 0 5 मीटर नौवे 342 नयगरय सामाजिक संगठन होता जा रहा है। जब अन्य देशों में प्रति व्यक्ति 8,900 क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध है, भारत में यह केवल 2,200 क्यूबिक मीटर है जो 25 वर्ष बाद 500 क्यूबिक मीटर ही रह जायेगा। देश के कुल पुन नवीयन वाले (767०४०४८) पानी की आपूर्ति 869 क्यूबिक किलोमीटर ही है। पानो को कमी से कम वनस्पति (ए८४८०॥७०४७), अधिक वनोन्मूलन (१9६(०:८६७०७००), कम चाय (0666), कम कृषि उत्पादन और अनुचित पोषणाहार (ग्रणा700) की समस्याएँ बढती हैं। इस समय झोलों और नदियों का 70 प्रतिशव पानी सिंचाई और प्रतिदिन की आवश्यकता के लिए उपयोग हो रहा है। गगा नदी को साफ करने में कुछ वर्ष पूर्ष गगा योजना में 300 लाख रुपये व्यय किये गये थे परन्तु गगा अब भी बैकटीरिया धारण किये हुए है। अत अब यह जरुरी है कि पानी प्रबन्धन और सरक्षण (००४६८४४०७०॥) उपायों पर अधिक बल दिया जाये। चेनई, हैदराबाद, अजमेर, राजकोट और उदयपुर जैसे शहरों में नगरपालिका से जलापूर्ति एक दिन में एक घन्टे से भी कम समय के लिए होती है। कुछ स्थानों में तो मुख्य जलापूर्ति बिल्कुल नहीं होती और लोग दूयूब बैल्स पर निर्भर रहते हैं। अपेक्षाकृत योजनाबद्ध और जलापूर्दि सेवित नगर दिल्ली को भी जल आपूर्ति में सुनिश्चित वृद्धि के लिए 80 किलोमीटर तक शमगगा तक जाना पड़ता है। बैंगलोर नगर को दूर से 700 मोटर की ऊचाई तक पानी पम्प से उठाना पड़ता है । प्रति वर्ष अच्छी वर्षा भ्राप्त करने वाले अधिकतर शहर और कस्बे भी गत आठ नौ वर्षों से पानी की कमी से त्रस्त हैं। सबसे बडा अभाव है राष्ट्रीय जल नीति का जो पहले जल ससाधनों का ऑकलन करे और तब जल का आवटन | सितम्बर 987 में देहली में राज्यों के मुख्यमत्रियों की सभा में पारित राष्ट्रीय जलनीति जिसका उद्देश्य पीने के पानी की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देना था, के बावजूद यह स्थिति अब भी बनी हुई है। जब हम जल समस्या के दूसरी तरफ देखते हैं, अर्थात जल निष्कासन (07872(०), तो स्थिति समान रूप से खग़ब पाते हैं। भारत के विषय में कम जानकारी का तथ्य यह कि यहाँ एक भी ऐसा शहर नहीं है जो पूर्णछ्पेण विकसित मल प्रवाह प्रणाली रखता हो। यह सम्मान चण्डीगढ जैसे शहर को भी प्राप्त नहीं है क्योंकि इसके अन्दर और चार्यो अनाधिकृत निर्माण मुख्य प्रणाली के घेरे से बाहर है। जल निष्कासन प्रणाली के न होने के कारण गर्मी के महीनों में भी ठहरे हुए पानी के बडे तालाब देखे जा सकते हैं। जिस प्रकार हमें राष्ट्रीय जल नीति की आवश्यकता है, उसी प्रकार हमें एक राष्ट्रीय व क्षेत्रीय गन्दे जल के निष्क्रमण नीति को भी आवश्यकता है। परिवहन और यातायात (रशाऋष्त्॑शाक बात पाल) भरत के सभी शहरों में परिवहन और यातायात की उत्वीर अत्यन्त अम्नन्तोषजनक है। अधिकतर लोग बस और टैम्पों का प्रयोग करते हैं जबकि कम लोग रेल का अयोग आवागमन के लिए करे हैं। स्कूटरों, मोटर साइकिलों, मोपेडों तथा कार्रों को बढती सख्या ने यातायात की समस्‍या को और भी खग़ब कर दिया है। उदाहरणार्थ, मुम्बई में 986 996 के बीच स्वचालित वाहनों की सख्या दिगुरी 8 लाख से 873 लाख) हो गई (7/6 कफवीफाकय प्रकाह, पिणप्थाएथा 29, 996) | ये वाहन घुए के साथ हवा को दूषित करते हैं। केवल मुम्बई में ही हवा में पहुँचने वाले दूषित तत्व लगभग 3,000 टन हैं जिसवा नग्य सामाजिक संगठन 343 $2 पा स्वचालित वाहनों से, 2 प्रतिशत घरेलू ईंधन से, और शेष 46 प्रतिशत उद्योगों से होता है। देहली, पे कलकत्ता व चेनई जैसे महानगरों में चलने वाली बसों की सख्या पर्याषत नहीं है ओर दैनिक यात्रियों को बस के लिए दो या तीन घन्टे तक प्रतीक्षा करनी पडती है, जिसका अर्थ है कि अपने कार्य स्थल तक पहुँचने के लिए उन्हें दो घन्हे पूर्व अपने घर से निकला और शाप्र को दो घंटा देर से घर पहुंचना। इस प्रकार की अव्यवस्था का प्रमुख कारण है कि बसों से यात्रा करने वाले लोगों कौ कम आमदनी उन्हें सस्ते रिहायशी क्षेत्रों में रहने को मजबूर करती है जिसके लिए लम्बी यात्रा की आवश्यकता होती है। शहः में रहने बाले लोग क्योंकि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के मँहगे किराए बर्दाश्त नहीं कर पाते, इसलिए नाए बस सेवा में कम किराए रखे जाते हैं। परन्तु शहर की आवश्यकता के अनुरूप ब्चों डे पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पाती और उनके विकास और रखरखाव में भी बाधाएँ आती हैं। ऊर्ख की कपी (900८० 89००७) आवागमन की समस्या के समान दूसरी समस्या है ऊर्जा की कमी ! शहरों में बिजली के उपकरणों का उपयोग बढ गया है। दूसरी ओर नये उद्योगों की स्थापना और पुयने उद्योगों के विस्तार ने भी बिजली पर निर्भरता में वृद्धि की है। अधिकतर राज्य अपनी आवश्यकता को बिजली उत्पादन की स्थिति में नहीं हैं, परिणामत- वे पडौसी राज्यों पर निर्भर करे हैं। हा ला ६ बिजली आपूर्ति के विषय पर विवाद शहरों में लोगों के लिए गभौर सकट दा कर देता है। सफाई (88000) भाज़ोय शहरों में नगरपालिकाए और कापपोरेशन वुव्यवस्था से इतने घिरे हैं कि उन्हें अन्य प्रब कार्यों में रुचि है, परन्तु सफाई में विशेष रूप से कूडा हटाने, नालियों कौ सफाई और प्लोदरें में रकावर्टों को साफ करने में कोई रुचि नहीं ऐ। सफाई कर्मचारी मुश्किल से ही अपने प्रदत्त कार्य को पूरा करते हैं और प्त्येक कुछ माह बाद वेतन बढाने के पस्ग में हडताल पर जाने की घमकी दे डालते हैं। कचरा उठाने वाले वाहन क्षमता से एक तिहाई या आधा काम उठाते हैं| जब कचरा हटाने का यही काम निजी ठेकेदारों को दे दिया जाता है वो वे भुगतान न होने को शिकायत करते हैं और थोडे से बहाने मात्र से काम रोक देते हैं। अत शहरों की सफाई व्यवस्था का प्रबन्ध कले में प्रेरणा का पूर्ण अभाव है। भीड भाडवाले राह क्षेत्रों में अवैध गन्दी बस्तियों का विस्तार और उनमें रहने वाले लोगों में नागरिक समझदारी वी कमी गन्दगों के ढेरों को तथा बीमारियों को और मी बढाती है। हमारे शहरों में विविध प्रकार के म्युनिस्िपल कार्यों में विविध प्रकार का कूट-व्यापार (20 0८टांपए्)े विद्यमान है। उदाहरण के लिए. (०) क्योंकि कचरा उठाने के लिए भुगवान चक्कर के आधार पर किया डाता है, न कि वाहन को भार क्षमता के आधार पर, सलिए आतैखों में बडी सख्या में चक्कर दर्शाए जाते हैं और घन ठेकेदाएँ और म्युनिप्तिपत उबव नयतीय साम्राजिक सयठत कर्मचारियों के बीच बँँट जाता है; (७) कचरा इकट्ठा करने वाले वाहनों की बडी सख्या चास्तव में बाहरी कार्यों में प्रयोग को जादी है, (०) मलबा हटाकर निजी पार्टियों को बेच दिया जाता है जो भवनों में भगन के काम आता है जबकि मलवा हटने का भुगवान नगरपालिका से भी चसूल कर लिया जाता है और (४) ट्रकों और डम्परें के चालक सफाई ट्रकों में प्रयोग किए जाने वाले डीजल को बेच देते हैं। स्पष्ट है कि मूल समस्या अत्यधिक नगरीकरण और परिणामस्वरूप गन्दी बस्तियों का होना है। लेकिन क्योंकि राजनीतिज्ञ प्रवासियों (778797/5) को वोट बैंक की तरह मानते हैं, इसलिए वे आवश्यक नागरिक कार्यवाही करने से करते हैं। नियोजन स्तर पर नासमझी, सम्बन्धित ऐजेन्सियों के बीच तालमेल को कमी, म्युनिसिपल बोड्डों में अव्यवस्था, और राज्य सरकार द्वारा आवटित सहायता धनराशि में कमी हमेशा सफाई चक्र को सहो दशा में रखरखाब करे में बाधा उत्पन्न करते रहेंगे। यदि शहर सफाई और सीवर व्यवस्था की उपेक्षा करना जारी रखेंगे तो आगामी वर्षों में शहरों में स्वास्थ्य सकट पर विजय पाना असम्पव हो जायेगा। दीर्घ-कालिक उपाय के रूप में आवश्यकता इस बात की है कि कूडा करकट एक)्र करने की नयी प्रविधि का प्रयोग किया जाये । नयी प्रविधि के प्रयोग के अलावा नगरपालिका को मूल सरचना और भूमि-प्रयोग नियोजन में मूलभूत परिवर्दन भी जरुरी है। प्रदूषण (९०[४०7) हमारे शहर व कस्बे वातावरण के मुख्य प्रदूषक हैं। अनेक शहर अपने सम्पूर्ण मल निष्मण का लगभग 40 से 60 प्रतिशत और औद्योगिक सडे पदार्थों का बहाव बिना शुद्ध किए पास की नदियों में बहा देते हैं। छोटे से छोटा कस्बा भी अपनी खुली नालियों के द्वार अपनी गन्दगी निकट बहने वाले नदी या नाले भें बहा देता हैं। शहरी उद्योग अपनी चिमनियों से घुआ और गन्दी गैसें छोडकर वातावरण को प्रदूषित करते है। जिन क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर अधिक है वहा काफी बीमारिया होती हैं जो विशेषरूप से 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों और 50 वर्ष आयु से अधिक के लोगों को प्रभावित करती हैं। सल्फर डाइआक्साइड, नाइट्रोजन डाइआक्साइड, आदि का प्रभाव इन बीमारियों को जन्म देता है। देहली के चारों ओर वी वायु की गुणवत्ता इस प्रकार की है कि इसने देहली को विश्व के चार सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की कतार में खडा कर दिया है। शहरी क्षेत्रों में वातावरण प्रदूषण का विषय इतना महत्वपूर्ण समझा जाता है कि उच्चतम न्यायालय ने भी जुलाई 995 में वातावरण सम्बन्धी कानूनों को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए जिसमें दिल्ली के लगभग 46 सकटमय उद्योगों को नवम्बएदिसम्बर 996 तक या तो बन्द किया जाना था यह कही अन्यत्र लगाया जाना था। इस आदेश का दिसम्बर 996 में प्रभावित श्रमिकों ने विरोध भी किया लेकिन शिखस्थ न्यायालय (865 0०0) ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (४००० 22ज़ांड। एट्ड्ाण्ग-नपटार) के अन्दर इन उद्योगों के न स्थापन पर अपने निर्णय को नहीं बदला बल्कि उन्हें किस्ती पडौसी राज्य में लगाने के आदेश पर अडिग रहा। वाहनोत्सर्जित (एल्काला।थ ८०79) वायु प्रदूषक भार कल 64 अविशत, ऊर्जा चालित उद्योगों से 6 प्रतिशव, तथा उद्योगों से 6 प्रतिशत मानरा गया है। जगत सामाजिक संगठन 345 इसो प्रकार का महत्त्वपूर्ण निर्णय उच्चतम न्यायालय ने अक्टूबर, 996 में आन्ध प्रदेश के एक अन्य वातावरण संरक्षण सम्बन्धी मामले में भी किया। इस निर्णय द्वारा 600 किमी, लम्बी तटरेखा (८०४४/४४८) पर उच्च ज्वारेय रेखा (छाष्टा) ॥06 |) के सहारे ४00 भीटर के भीतर शिरिम्प (एक छोटी समुद्री मछली) (६४:एछ7) सवर्द्ध पर रोक ला। दी तथा मार्च 997 तक प्रतिबन्धित छषेत्र में सभी प्रकार कौ सरचनाओं को नष्ट करते का आदेश भी दिया! देश को अकेले तमिलनाडु और आम्ध्र प्रदेश से शिरिम्प मछली के निर्यात से लगभग 600 करोड रुपये का विदेशी विनिमय प्राप्त होता है। केद्धीय प्रदूषण नियत्रण बोर्ड के एक अनुमान के अनुसार मत्स्य सर्द फार्म (॥८घ७७ टय।ए८ शिए0७) से उत्पन गन्दा पानी पश्चिमी तट पर 2.37 क्यूबिक मीटर था (7#6 फक्लदाजबा गालाल, उब्गाएद्ा। 6, 997)। जो विष हम वातावरण में घोल रहे हैं वह वायु, जल और भोजन के माध्यम से हमारे पास वापस आ जाता है और धीरे-धोरे हमारे शरोर में प्रवेश करके कैन्सर, प्रतिगेध विहीन अव्यवस्थाएँ या हार्मोन प्रणाली सम्बन्धित ऐगों में दर्शाता है। इसमें कोई आश्चर्य नही कि डाकररों का दावा है कि भारत में वातावरण की बदत्तर होती दशाओं ने भारत के चार महानगें--दिल्ली, चेलई, मुम्बई और बगलौर--में कैन्सर कौ जकड के अवत्तर बढा दिए है। कैन्सर के यह अवसर जीवन काल में 7 से ]] प्रतिशत तक हो सकते हैं। सन्‌ 200। तक भारत में कैन्सर पीडितों को अनुमानित सख्या 8 लाख तक बताई गई है। वाल्तव में, बातावरण को गिशवट से गरीब लोग घनी लोगों की अपेक्षा अधिक पीडित होते हैं। नपरीय समस्याओं के कारण (८णा5९5 थ एक्कशा ए700थाओ) मैकबेह और शोस्ताक (४०ए७७॥ ३७0 5॥०४७७, 978 . 98-205) जिन्होंने अमरीका में शहरी समस्याओं को चार कारकों से छोड़ा, का अनुममन करते हुए हम भारत में शहरी जीवन की समस्‍्त्याओं में निम्नलिखित पाँच कारण चिन्हित कर सकते हैं. ()) शहर में और शाह से 558 औद्योगिक विकास, (॥) सरकार कौ असहानुभूति, (७) दोषमुक्त नगरीय नियोजब और (७) स्वार्धी ताकतें। प्रवबन (१ह्ञाच्ना।०ा) जैसा कि पहले कहा जा चुका है, लोग शहरों/कस्बों में आते जाते रहते हैं क्‍योंकि वहां गेबगा के अवसा अपेक्षाकृत अच्छे होते हैं। भारत में गांवों से शहरों में और शहरों से ग्रा्मो में प्रवजन महत्त्वपूर्ण है। 99] के जनगणना आकडे दर्शाते हैं कि 777 प्रविशत मामलों में पैब्जन ग्रामोण से शहरों में और ॥8 अतिशत मामलों में शहरों से शहरों में या। (7:४९ 2:06, [00., 998.. 26) ! अनजनपदीय ([7८६-१७७ं८() प्रवजन, ऊँ प्रव॒जन या अन्तराज्योय प्रव॒जत और अत्तर्राज्यीय प्र्रजन का विश्लेषण देर है कि लगभग 60 प्रतिशत प्रवजन लघु दूरी प्रवजन, 2! प्रतिशद मध्यम दूर अव्जन और ] प्रतिशत तम्बी दूरी के प्रव्॒जन रहे (8052, 979 87)। गशब ग्रामीणों का शहरों में प्रवेश आय स्लोतों को कम करता है। दूसरी ओर आज धन लोग उपजगगीय क्षेत्रों में रहना पसन्द के हैं। घनी लोगों को यह गतिशीलगा राहरों के वितीय हानि पहुचाती है। शहरों को ओए तथा शहरों से बाहर को ओर प्रव्रजत 346 नगरीय सामाजिक संगठन समस्याओं को अधिक गम्भीर बना देता है आद्योगिक विकास (0६779 070) भारत में जहाँ शहरी जनसख्या विकास 4 प्रतिशत है, वही औद्योगिक विकास लगभग 6 पतिशत वार्षिक है। नवम्‌ पचवर्षीय योजा के अनुसार औद्योगिक विकास 8 प्रतिशत वार्षिक होना चाहिए। इस वृद्धि से शहरों में अतिरिक्त रोजगार की आवश्यकता होने की अपेक्षा थी। वृतीयक (८४४४०) क्षेत्र भी प्रव्॒जकों को शरण प्रदान करता है यद्यपि उनको आमदनी निम्न स्तरीय ही होती है। सरकारी उदासीनता (#फ॒णां0) ण॑ 6 60७थाग्राध्य) हमारे नगरों का प्रशासकीय प्रबन्ध भी उस गडबडी के लिए उत्तरदायी है जिसमें नगरवासी अपने आप को पादे हैं। म्युनिसिपल प्रशासन नगरीय विकास के साथ-साथ नहीं घलता है, न हो स्थान की दृष्टि (६७9४0श)9) से और न ही मूल ढांचे के प्रबन्धन में ही। भविष्य के लिए योजना बनाने की न तो क्षमता ही है और न ही इच्छा। जो कुछ विद्यमान है उसका प्रबन्ध करने की भी न तो कुशलढा है और न ही सामर्थ्य। जब तक हम शहरों को प्रबन्धन क्षमता में सुधार नही करते तब तक शहरी अव्यवस्था से छुटकारा नहीं पा सकते। दूसरी ओर राज्य सरकारें भी स्थानीय निकायों पर विशेष नगरीय समस्याओं के समाधान के लिए धन इक्टठा करे में प्रतिबन्ध लगा देती हैं। दोषपूर्ण नगरीय नियोजन (फलल्लाएह प्रा शिक्गमाएए) नागरिक सेवाओं के मानकों (६१७४०४) में सामान्य गिशवट में एक चौंकाने वाला काएण है हमारे योजना बनाने वालों तथा प्रशासकों में असहाय (॥८७9/८5७॥८5७) होने की भावना का उदय | योजना आयोग से नीचे को ओर देखने पर पता लगता है कि लोगों में महानगर जनसख्या अनियमित वृद्धि के प्रति भाग्यवादी (0७॥59०) स्वीकृति को मान्यता प्राप्त है। चास्तव में, नगगैकरण पर राष्ट्रीय आयोग के एक सदस्य ने यह भाव व्यक्त किया था कि हमारे देश में नगयों के सुनियोजित विकास के लिए बहुत कम प्रयल किया जा रहा है। स्वार्थी शक्तियों (१६६९९७-ए/२९5। ए०5:७७) शहरी समस्याओं का अन्तिम कारण है स्वार्थो शक्तियों जो लोगों के विरुद्ध काम करती हैं लेकिन निजी व्यापारिक हिों और लाभों को बढावा देतो हैं। नगरवासी आमतौर पर उन निर्णयों को प्रभाविद करने में शक्तिहीन होते हैं जो अभिजात वर्ग के लोग अपने हितों, शवित और लाभ को बढाने के लिए लेते हैं। वे इस बात का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते कि उनके निर्णयें से कितने लोगों को चोट पहुंचती है। स्वार्थी लोगों की भूमिका का एक सबसे अच्छा उदाहरण था महाणष्ट्‌ के एक है आयुक्त का दस वर्षों में 25 बार स्थानावरण जिसने स्वार्द प्रेरित यजनीतिशों और छोटे अधिकारियों के नक्शे कदम पर चले से इन्कार करते हुए अनेक अवैध निर्माणों को धगशाही करा दिया। जगत स्रामजिक संगठन ड्वा शहरी समस्याओं के समाधान ($0क्ष075 ॥0 च्ाफशा ?77काशाड) यदि हम शहरी समस्याओं का समाघान चाहते हैं तो कुछ उपाय करने होंगे। कुछ सुझाये गए उपाय इस प्रकार हैं : () गाय केद्रो का चुव्यवस्थित विकास और काम्र के अवसरों को उपलब्ध करा ($॥रक्षा॥८ 70600फमाथा। ण॒ एफ (छ#ाछ बावे (एस/04 तु 7०0 0/70॥0॥76) हमारी नगरीय समस्याओं का एक महत्त्वपूर्ण समाधान है तेजी से बढते शहरी केन्द्रों का सुव्यवस्थित विकास और विनियोजन (8५७४४ए०॥/) कार्यक्रम का नियोजन जो आगामी 20:25 वर्षों में समूचे देश में एक बडी सख्या में अच्छी रह वितरित, जीन योग्य (/७/०) नणर केद्रों को विकसित कर सके । अब तक तो लोगों को गाों मे हो रोके रखने के लिए प्रामोण विकास योजनाओं (तर08 बराक और वार) के माध्यमों से मरामीण क्षेत्रों में पारिश्रमिक ऐजग प्रदान करने के कार्यक्रमों पर ही ध्यान केच्ित किए हुए थे। जहाँ मामोण ेजगाए मुहस्या कराने के लिए कार्यक्रमों में काफी न्‍्यायस्गत ऐं वहा केवल इतना ही कला काफ़ी नहीं है। कृषि क्षेत्र में एक निश्चित बिन्दु के बाद लाभकारी रोजगार उपलब्ध कराना सम्मय नही है। इस उद्देश्य के लिए हमें ऐसे कार्यक्रमों पर बल देना होगा जो शहरों में लोगों को गेके रखने के लिए बहुआयामी क्रियाकलापों को करने कौ अनुमति देते हों। 69) नगर नियोजन के झाथ क्षेत्रीय नियोजन (#िक्ञालव शक्ांबड द्ंगड़ ॥४४ द8 शक्रशाएर) नगर नियोजन लगभग नगर केच्धित ही होता है। हम हमेशा से कस्बों और शहरों के नियोजन को बात करते रहे हैं, तेकिन समूचे क्षेत्र के नियोजित विकास की कभी नहीं जिससे कि जनसंख्या का तर्कसगत वितरण हो सके और क्रियाकलापों का भी समुचित विभाजन हो सके। नगर नियोजन वो एक काम चलाऊ (७०-॥००) समाषान है लेकिन क्षेत्रीय नियोजन अधिक टिकाऊ हो सकता है। उदाहरणार्थ, गन्दी बस्तियों में रहने वालों को नगर विकास प्राधिकरणों के माध्यम से शहरों में मकान दिलाने की अपेक्षा यदि क्षेत्रीय नियोजन के माध्यम भवजकों को अन्य क्षेत्रों भें मोडा जा सके, जहाँ उन्हें अच्छा रोजगार मिल सके, तब विद्यमान शहरी विकास की गति रोकी जा सकती है। यह प्रशसनोय है कि नवम पचवर्षीय योजना के प्राएम्प में भारत सरकार ने क्षेत्रीय योजना सगठन स्थापित करने के और सार्थक शैबरोय स्थापन योजनाओं के विकास में राज्यों को सहायता देना प्रारम्भ कर दिया है। (५, उच्योग्रे के फिछ़े क्षेत्र ये ले जाने के लिए प्रोत्साहन लित्वाफबक़ाए उ्बीएहींट 80 06 80 27दक्तकावें 47९०5) पु मूल्य नोदि जो भूमि के बडे टुकड़े सस्ती दर पर देती है, का पुनर्नियोजन किया जाता दाकि उद्योगों को पिछड़े क्षेत्रौ/जनपर्दों में ले जाने के लिये प्रोत्साहित किया जा सके। 348 मंग्गैय सामाजिक संगठन इससे भी नगरों और महानगें का क्रमबद्ध विकास हो सकेगा। बडे शहरों के अन्दर और चारों ओर सम्भावित उच्च मूल्य की भूमि को बाद में पूरी कीमत वसूल करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वार प्रहण करने की नीति पर भी गम्भीरता से विचार किये जाने दो आवश्यकता है। (५) नफरपालिकाएँ अपने वित्तीय सप्ताथनों का प्रवन्‍्ध करे [िक्षिलफ्रांधारठ 0 7 का स््रक्रादव्ा मट50द्राए८5) लोग नगरपालिकाओं को कर देने को बुग नहीं समझते यदि उनके धन का सदुपयोग सडवों के रखरखाव, सीवर प्रणाली प्रदान करने, पानी की कमी पूछ करने, और बिजली भरदात के में किया जाये। यह तथ्य सर्वविदित है कि शहर वित्तीय ससाधरनों की कमी से परेशान रहे हैं। यदि भ्रष्ट म्युनिसिपल अधिकारियों को निवारक (त८«7८४0) दण्ड दिया जाये तो वोई कारण नही है कि म्युनिसिपल कारपोरेशन अपने नागरिकों से धन इकटठा करने मैं कठिनाई अनुभव करे | शहर को अपने विकास की कीमत स्वय उठानी चाहिए। राज्य से उच्च वित्तीय सहायता कठिन होती जा रही है। सम्पत्ति, जल और बिजली करों के पुनर्तिधारण द्वाए घन एक़द्र किया जा सकता है और आवश्यक मुविधाएं उपलब्ध कगने के लिए प्रति व्यक्त प्रति वर्ष अधिक धन एकत्र किया जा सकता है। शहर में या आसपास जब कोई नया उद्योग या व्यापार शुरू हो तो उस पर थोडा सा कर लगाया जा सकता है ताकि स्थानीय निकाय को अधिक धन उपलब्ध हो सके । (५) गिगी परिवहन को प्रोत्साहन (ह॥८०क्रवहुणह (70 रिद्रए5ए07) मगर परिवहन ही सार्वजनिक एकाधिकार क्यों हो ? जब परिवहन व्यवस्था राज्य कर्मचारियों द्वारा सम्भाली जादी है, यह देखा गया है कि वे बहुत बुरी तरह रूखेपन से व्यवहार करे हैं। मजदूर सघों के समर्थन से वे बार-बार हडताल पर जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि निजी परिवहन व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया जाये। निजी तौर पर चलाई जाने वाली मिनी बसें और टेम्पों सेदाए थोडा सा अधिक किगया वसूल करेंगी और दैनिक यात्रियों को भी अच्छी सेवा के बदले में धोडा अधिक पैसा देना बुग नही लगेगा। (५) कियया नियत्रण अधिनियम में सुधार (4कराष्यबलल्या ता सिहर एटहाएरणं 44) नये मकानों के निर्माण पर प्रतिबन्ध लगाने वाले या मकानों को किया पर देने से सम्बन्धित कानूनों में सुधार किया जाना चाहिए। कौन सा मकान मालिक दो या तीन कमरों के किये पर देने वाले मकान पर पाँच-सात लाख रुपया लगायेगा और आगामी 0 से 20 वर्षों तक के लिए 000 से 200 रु प्रतिमाह किग्वए पर देगा और उसे न तो किराया बढाने का अधिकार होगा और न वह उचित आधार पर मकान खाली भी कण पाएगा। महाराष्ट्र ने किएया नियत्रण अधिनियम में सुधार कर अप्रणी भूमिका अदा की है जिसने हजारों मकात गे के लिए उपलब्ध करा दिए हैं। इसो अकार के कदम अन्य राज्यों में भी स्वागत योग्य । नफौय साम्ागिक संगठन उ49 (॥0) यावज्यरिक आवाप नीति अफाना (40ककाए सिबक्रादयार प6%509 7ाद)) मई 988 में सरकार ने ससद में राष्ट्रीय आवास नीति अस्तुत की थी जिसका उद्देश्य 0999 के अन्त तक आवास विहोनता की स्थिति को समाप्त करना तथा एक निश्विव मानक तक आवाप्त की गुणवत्ता को ऊंचा उठाना था। इस प्रकार नीति अति महत्त्वाकाक्षी तथा सब्ज बाग दिखाने दाली प्रतीत होती थी। यह एक स्व मात्र था जो एक दशक में पूर्ण होना असम्भव था। अब तो इक्कीसवी शर्ताब्दि आरम्भ भी हो गयी है। सरकार को नौति को सरल नोति बनाना होगा। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि एनएचपी की अवधारणा विवेकहोन है। जएदप्री नीति विस्तृत आधार वाली नीति है। इसका उद्देश्य वित्त प्राप्ति तक सुलभवा और भूमि तथा निर्माण सामग्री को उपयुक्त दरों पर उपलब्ध कराना है। यह निर्माताओं को नये प्रकार की निर्माण सामग्री के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित भी करती है। साथ ही यह नौति भूमि अवधि, प्रूमि अधिप्रहण, एपार्टमेन्ट मालिकाना अधिकार को सीमित करना, नगरपालिका नियमों और किराये के नियमों को सम्पूर्ण परिधि पर पुनर्विचार करने पर भी बल देती है। लेकिन यह सब कठिन कार्य है। एन एच पी धनी निर्माताओं, जमीनदारों और ठेकदारों के लिए है। इसको विलासिवापूर्ण आवासों को ्तोत्साहित करना है और सहकारी तथा सामूहिक आवास समितियों को प्रोत्साहित करना है। इसको गरीबों और निम्न आय वर्ग के लिए विशेष योजनाएँ चलानी चाहिए। नियोक्ताओं को प्रेरित करना होगा कि वे अपने कर्मचारियों के लिए मकान बनाकर दें। इसे (एनएचप्री) अपनी 00 करोड रुपये कौ अधिकृत पूजी को बढ़ाना होगा जो वित्तोय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हर जगह प्रयोग नहीं को जा सकती। जब तक अधिक व्यवहारिक आवास नीति नहीं अपनायी जादी तब तक निश्चित रहें की प्राप्ति अम्मम्भव होगी। (7४) सरकालक विकेद्रीकरण ्िष्यत॑क्ार्त 2०:00व/:707) नेवाचारक नियोजकों (.900७॥४७ क्रौआशध9. और कुछ आमूल परिवर्तनवादियों (79003) के प्रस्ताव स्थानीय निकायों की सरकार के सरचनात्मक विकेन्द्रीकरण का स्वत । इससे पढौसी क्रियात्मक चपूहों (49 899000॥009 ३णा०॥ हाएप७) के सृजन को स्वन पूण हो सकता है जिन्हें सामुदायिक केद्धर' कहा जाये जिसमें नगरपालिका अधिकारी और नगण्वासिपों के प्रतिनिधि सम्मिलित हों। यह केद्ध पडौस की आवश्यकताओं बाण बाते उन पर कार्यवाही करेंगे। उदाहरण के लिए, कई शहरों में कई नई स्थापित हो गई है जिनमें 0,000 से 50,000 वक लोग रहते हैं। इस प्रकार ये इस्तिया स्वय में एक छोटा फप्बा बन गई हैं। गृहकर, सडक कर, प्रकाश कर, आदि कुछ कर +२ का से इन सामुदायिक केद्रों को हस्तान्तस्ति किये जायें, बजाय मगरपालिकाओं को के। यह केद्र, मगर स्मुनिसिपल कार्पोरेशन को सन्दर्भित किये बिना, पडौस के मामलों को निर्देशित कर सेंगे और इस प्रकार एकब किये मए घन को सड़कों, प्रवाश व्यवस्था आदि _ जरखाव पर प्रयोग कर सकेंगे। इस ्रकाद की शहर के भौतर विकेद्रीकृत सरबवा का 'ई यह है कि बहो व्यवस्था जो लाखों लोगों पर काफ़ी नियत्रण का अधिवार देवी है, बही उनके जोवन को बनाने में जो सस्थाए है उनमें उनकी प्रभावों भूमिका को अस्वीवार कर देती 350 नगय सामाजिक प्गठत है। सामुदायिक केद्ध उन्हें अपनी सरकार बनाने की अनुमति दे देगा। अन्त में, यह कहा जा सकता है कि नगरीकरण, नगरवाद, और शहरों की समस्याएं कभी भी हल नहीं हो सकती जब तक कि नगरीय नियोजन सुधार नहीं जावा और आमूल परिवर्वनवादी उपाय नही अपनाये जाते। यह लाभ के आधार पर नहीं होने चाहिए जो कि बुछ स्वार्थी लोगों के लाभ के लिए ही होगा। भूमि, प्रविधि, और करें का प्रयोग लोगों की भलाई के लिए होना चाहिए, न कि कुछ शक्तिशालियों के हित के लिए। नगरवासियों को सक्रिय होना पडेगा और स्वय को सगठित करके शहरों में विद्यमान आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के बदलने के लिए आन्दोलित होना होगा। नगरों का वि-मगरीकरण और गाँवों का नगरीकरण (ऐशाफशगांरआएण! ए॑ एा/९६४ आए एक्रग्रांस्थाता ए शी]3265) यदि हम शहर को एक भौतिक इकाई मानकर नही बल्कि लोगों के समूहों, जिन में से सबमे शक्तिशाली व्यापारी, राजनीतिज्ञ और गज्य कर्मचारी होते हैं, के क्रियाकलापों का एक केद्र मान कर विश्लेषण करें तो हमें पठा लगता है कि कभी यह समूह मिलकर काम करते हैं, वो कभी सर्ष में, लेकिन उनके प्रमुख निर्णय शेष लोगों के जोवन को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त शहरों में (जैसे कि लुधियाना, कलकत्ता, मुम्बई, इन्दौर, भीलवाडा, आदि में) व्यापाए केद्रों के चारों ओर के क्षेत्र में कम आमदनी वाले लोग रहते हैं और अनेक सामाजिक समस्याओं से घिरे होते हैं। इसके साथ-साथ, विकसित प्रौद्योगिकी एव बडे पैमाने के उद्योग, शिल्प उद्योगों और घोलू औद्योगिक इकाइयों को चलन से बाहर (०85७९) और अप्रतिस्पर्धी बना देते हैं। नया आर्थिक विकास, उल्लेखनीय रूप से सेवा क्षेत्र (६४०४ 5०८०७) में, बाहरी आन्तरिक नगरीय औद्योगिक क्षेत्रों में काफी होता है। इसलिये लोग अन्य क्षेत्रों को चले जाते हैं। जो शहर के अन्दर रह जाते हैं वे पुराने, सामाजिक रूप से पिछड़े अकुशल और अर्थकुशल श्रमिकों में से होते हैं। उनके साथ वे आव्रजक (प्राण्राहा॥एंशे भी शामिल हो जाते हैं जो शहर के अन्दर के भाग में अर्द्ध कुशल और अकुशल कार्य को तैयार रहते हैं। शहरी क्षेत्रों में आर्थिक मन्दी की यह प्रक्रिया तथा शहरों से जनसख्या वा बाहर जाना सम्मिलित रूप से विनतीकरण (१८ए४थ्माटआ7णा) कहलाता है। दूसरी ओर अनेक ग्रामीण उपनगरैय क्षेत्रों का नगरीकरण भी होता है। वास्तव में सभी नगगैय कैद इस अधोस्थिति (6८०ग्र०) को नही जाते । पुय्ने औद्योगिक नगर ही वि नगगैकरण का सामती करते हैं। कई औद्योगिक शहरों में समान रूप से जनसख्या में वृद्धि होदी है। विनगरीक्ण की प्रक्रिया फिर से लौटाई भी नहीं जा सकही। दिल्ली में जब उच्च न्यायालय ने प्रदूषण से बचने के लिए भारी उद्योगों को दिल्ली से हटाकर अन्य क्षेत्रों में लगाने के आदेश दिये, इन उद्योगों भें काम करने वाले हजाएं उद्योय कर्मियों को दिल्ली छोडना पडा और उद्योग के नये स्थानों पर बसना पडा। अनेक सरकारी अधिकारियों को भी दिल्ली से हटकर गाजियाबाद और गुडगाँव के आस पास के के मे जाना पडा। इससे प्रभावित लोगों को भी दिल्ली छोडने को बाध्य होना पड़ा। उपनाग्व क्षेत्र जहा ये कार्यालय और उद्योग लगे हैं, धीरे-धीरे शहरीकृत हो गए। इस शंका जाय सामाजिक संयठन उठा विरगरौकरण शहस्वासियों को और नगरीकरण गाँव वासियों को प्रभावित करता है। भगीय-य्रागीण सीया (हाशिया/उपान्ती पर (छा छाभ-एक्रेआ गिंणएले स्वागता के पश्चात्‌ जो परिवर्तन देखा गया, यह है नगरों के चारों ओर नगरीय-ग्रामीण शिया (उपान्त) का होना। नमर ग्रामों के भौदर लगभग 5 किलोमीटर दूरी दक प्रवेश कर गये हैं। इस प्रकार बहुद सा विकास अनियत्रित, अस्त व्यस्त, और प्रवाह के रूप मे हुआ है। जब कोई शहर से बाहर जाता है तो उसको नयी आवासीय बस्तियाँ, कुछ फैक्ट्रियों, सडक के दोनों ओर वाणिज्य सस्थान, शीतगृह इकाइयों, भण्डार गृह, लकडी के गोदाम आदि दिखाई देगे। पे सब लक्षण नगर के विस्तार के प्रतीक है। 'प्रामीण नातैय हाशिया' ऐसे क्षेत्रों को नामाक्ति के के लिए प्रयोग किया गया है। अत हाशिया (उपान्त) क्षेत्र ग्रामीण शहरी भूमि प्रयोग करने वाले मिश्रित लोगों के बीच का वह बिन्दु है जहों नगरीय सेवाओं कौ उपलब्धि कम हो जातो है और वह बिन्दु जहाँ भूमि का कृषि प्रयोग प्रधान होता है। यह क्षेत्र न केवल लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं बल्कि ग्रामोणजन के लिए काम भी उपलब्ध करते हैं। यहाँ तक कि वे लोग भी जो कृषि जारी रखते हैं उन्हें भी विस्तृत सब्जी बाजाए, फत, दूप, आदि के लिए अच्छा बाजार मिल जाता है। यह परण्परागत अधिवृत्तियों और मूल्यों को और साथ हो परम्परागत ग्रामीण जीवन शैली को भी प्रभायिव करता है। संपचनात्मक रूप से 'ग्राम्ीण-नगरीय हाशिया' में ग्रामीण हाशिया और नगरोय हशिया दोरों सम्मिलित होती हैं। 'नगरीय हाशिया' में म्युनिसिपल या गैर-म्युनिसिपल कस्बा और नारीकृत गाँव शहए कस्बे को छूते हुए सम्मिलित होते हैं। 'प्रामीण हशिया' में म्युनिपिपल या गैर्म्युनिसिपल कस्बे, आशिक रुप से नगरीकृत गाव (जो मुख्य शहर से दूर होते हैं) और पूर्णरुपेण गाव शामिल होते हैं। इस प्रकार नगगैय प्रामीण हाशिया में शहरौ गलियोरे और उप-नगर शामिल हैं, लेकिन उपग्रह और हरित पेटी क्षेत्र नहीं आते। गलियारे वाले क्षेत्र (७७१4०:8) नगए केद्रों से कभी-कभी 30 किलोमीटर बक दूरी तक विल्लृत होते हैं जबकि उप-नगर में नगर के आस-पास के क्षेत्र आते हैं। अधिकतर उप-नगर आवासीय विशेषता वाले होते है। उप नगर में लोग नगर से अपनी पहचान जोडते हैं और शहर के अर ही रहने का दावा करते हैं। उपनयर और सेटेलाइट में अन्तर केवल शहर से दूरी का है। उप नगर शहर से निकट होते हैं जबकि सेटेलाइट दूर होते हैं। भरे हाशिया (॥9॥85) क्षेत्रों में गाँव तौन प्रकार को परिवर्तन प्रक्रिया से गुजस्ते हैं (७) गाँवों के भीतर भूमि प्रयोग में परिवर्तन, (0) व्यवसाय में परिवर्तन, (०) गाँवों के लोगों को जैवनजैली में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन। ५" निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारत में अब नगर असमान रूप से विक्तित हे ऐ है। प्रदूषण, असमानता, घर से कार्य स्थल ठक परिवहन सुविधा का अभाव और भी से प्रकार के कारक हैं जिनके लिये आवश्यक है कि बस्तियों के विषय में नीति और शहरों के प्रिन छेडे में सुविधाओं वा उपलब्ध कराया जाना केवल राज्य सज्कयों और स्थानीय रिख्ययों पर ही नहीं छोड़ा डाना चाहिए बल्कि स्थानीय निवासियों को भी उठको बस्तियों के 352 नगतय सामाजिक सगल पुनर्जागरण के लिए प्रभावशाली एवं लाभकारी ढग से सम्मिलित क्या जाना चाहिए। लयूइस वर्थ (0०७ ५४४४७) का ग्रामीष-नगरीय का मॉडल ठथा टानीज का ग्रेमिवरेफ्ट (ठ«ण९्णःटाअ)-गैसिलशेफ्ट (छ८छथीबत्मभी) का मॉडल आज के सत्दर्भ में समकालीन शहरी मामलों के विषय में अवधारणा सम्बन्धी स्वरूप पर्याप्त नहीं प्रतीत होवे। बेरोजगार, गरोबी, जाति एवं साम्प्रदायिक संघर्ष, सार्वजनिक अव्यवस्था, और प्रदूषण, आर ने शहरी नीति पर बहम की आवश्यक्ता को बढ़ा दिया है। 2 जनसंख्या गतिकी (एक्॒णेआंगा ऐएज़ाभा॥।०5) जनाकिदीय विश्लेषण (0९00ट्वाशयुक्० ॥09)55) जनसख्या का अध्ययन इसके आकार, सरचना, वितरण, विकास और इसकी वृद्धि का समाज के आधिक, साम्राजिक और सास्कृतिक पक्षों पर प्रभाव पर केद्धित है। यह कहा जा सकता है कि जनसख्या विस्तार के भीतर दो विस्तृत क्षेत्र हैं. (४) जनाकिकीय विश्लेषण, अर्थात्‌ आकाए, वितरण, रचना, जननक्षमता (९:४॥79), मृत्युदर, प्र॒जन, और गतिशीलता, और (७) जनसख्या विश्लेषण अथवा जनसंख्या परिवर्तन व गरीबी, निरक्षर्ता, खराब स्वास्थ्य, परिवार सरबना, व्यापार क्रियाकलाप, आदि जैसे आर्थिक, सामाजिक और सास्कृतिक तत्वों के बीच सम्बन्ध जो कि विधिन समाज विज्ञानों की अवधारणाओं और सिद्धान्तों पर आधारित हों। यहा हम दोनों पक्षों का संक्षेप में विश्लेषण करेंगे। आपु रचना (006 (०णफ॒ण्ञं0०9७) देश में लोगों की आयु रचना जनसख्या परिवर्तन के तत्वों से कार्यात्मक रूप से सम्बद्ध होती है, जैसे जननक्षमता, मृत्यु, विवाह आयु, प्रव्रजन, आदि | इसका वितरण (0/॥700000) भी सामाजिक आधिक प्रभाव की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उत्पादक कार्य, आय में भागौदाएे, भेजनन (7209000७०॥0॥) प्रक्रिया में भागोदारी, उपभोग का स्तर, और आवश्यक सेवाएँ, सभी आयु से प्रभावित होती हैं। 99 की जनगणना के अनुसार भारत में 37 8 प्रतिशत जनसख्या 0-4 वर्ष आयु समूह में, 55.5 प्रतिशत 5-59 वर्ष आयु समूह में ओर 67 मतिशतत 60 + आयु समूह में आती है (#७७क० ९ 7१०६ ँब4, 98.. 9) | लिंग के आधार पर पुरुषों में 3773 प्रतिशत 0-04 वर्ष आयु समूह के, 55 60 प्रतिशत 5-39 वर्ष आयु समृह के, और 6 67 प्रतिशव 60 वर्ष से ऊपर की आयु समूह के हैं, जबकि में 37.79 प्रतिशत 0-4 वर्ष आयु समूह के, 55 55 प्रतिशव 5-59 वर्ष आयु समूह और 666 प्रतिशव 60 + वर्ष आयु समूह के हैं (वहो 6)। अनुमान है कि इस वर्ष “५ 0) के अन्त तक कुल जनसख्या का लगभग 32 प्रतिशत 74 वर्ष से नोचे आयु सह के, 8 प्रतिशत 60 वर्ष से उपर और 60 प्रतिशत 5-59 वर्ष आयु समूह के होंगे। ((7८4, 992 : 9) । 95] से 25 वर्ष से कम आयु समूह की जनसख्या में वृद्धि हुई है, का काप मृत्यु दर में कमो है। इस आयु सरता के प्रभाव इस प्रकार रहे () बच्चों वी चास्पप, शिष्ठा, चिकित्सा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्दि के लिए अधिक घन का आवटन, 0) एक वई में तेजो से जनप्ख्या वृद्धि; 8) काम करने वाले लोगों पर अधिक लोगों का 354 जनसख्या गविकों निर्भर होना, और (4) श्रम की निम्न उत्पादकता । लिंग रचना (5९६ (०णा| [905607) जनसख्या में लिंग अनुपात महत्त्वपूर्ण होता है क्‍योंकि इसका प्रभाव विवाह दर, मृत्यु दर, जम दर और यहा तक कि प्रव्॒जन दर पर भी पडता है। 99! जदसख्या आकड़ों के अनुम्नार भारत में प्रति 000 पुरुषों पर 927 स्लियों का अनुपात आता है। लिंग असन्तुलन के वाएण हैं श्री बाल हत्या, बालिकाओं की उपेक्षा, बाल विवाह, बच्चे की जन्म पर मृत्यु, सियों के साथ बुरा व्यवहार, और कठिन कार्य । लिग अनुपात लगातार गिरता चला जा रहा है। 90 में 972 से 93 में 950, 95 में 946, 997 में 930, और 997 में 927 रहा (5 रै॑ शव, 499] आत ॥ब्ज.ए056 90विंद गावात, 998 70) निमन्देह ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगऐैय क्षेत्रों में लिंग अनुपात अधिक ऊपा है क्योंकि एकल पुरुष शिक्षा, गेजगार तथा अन्य कारणों से प्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में चले जाते है। अलग राज्यों में भी लिंग अनुमान में अन्तर है। 3 शाज्यों में लिंग अनुपात गष्रीय स्तर से ऊंचा है तथा 2 गज्यों में निम्म है (॥॥28.0:८ /णरिंद कादाघ, 7998 : ।5)। दैवाहिक रचना (१३साश (०कए०॥त००) 994 में विवाह की औसत आयु स्त्रियों की 94 और पुरुषों को 247 वर्ष थी (वही . 462) | शहरी स्त्रियों 20 24 वर्ष आयु समूह में विवाह अधिक करती हैं। विवाह आयु प्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरों में काफी ऊँची है। 95 के बाद से स्त्रियों और पुरों दोनों की विवाह आयु में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं (स्त्रियों में 5 4 से 9 4 और पुरुषों में 99 से 247 वर्ष)। वैवाहिक प्रस्थिति के अर्थ में, 994 में 50 4 प्रतिशत लोग अविवाहिं थे, 446 प्रतिशत विवाहित और 5 प्रतिशत विघु/तलाकशुदा/पृथक किए हुए थे। लिंग आधाए पर 456 प्रतिशत स्रिया और 549 प्रतिशत पुरुषों ने विवाह हो नहीं किया, खिया 466 अधिशत व 427 पुरुष विवाहित हैं और 24 प्रतिशत पुरुष व 78 प्रतिशत महिंलाई विधु/तलाकशुदा/पृथक हैं (वही 464)। सामान्य रूप में यद्यपि भारत में विवाह की आयु यह दर्शाती है कि लगातार इसमें वृद्धि ही हुई है तथापि विकसित देशों को तुलना में यह काफी न्यून है। निम्न विवाह आयु सामाजिक प्रस्थिति तथा रिरयों के स्वास्थ्य को प्रभावित करदी है। सामाजिक प्रभाव विशेष रूप से शैक्षिक स्तर में कमी, विधवाओं के उच्च अनुपाव में वृद्धि, बच्चों की सख्या में वृद्धि, तथा पुरुषों पर निर्भरता में वृद्धि है। अपरिपक्व आयु पे बच्चे को जन्म देने से माँ और शिशु के स्वास्थ्य पर प्रभाव पडता है। ग्रामीण-शहरी रचना (एणर्नाफ्ा ए०क्रु०ञपणा) सन्‌ 99। के जनगणना के अनुसार कुल जनसख्या के 25.73 प्रतिशत शहरी और 7427 अतिशत ग्रामीण हैं। 998 में शहरो जनसख्या अनुमानत 28.3 प्रतिशत थी (277 कर्णी० 77००, 998 74) यद्यपि शहरी जबसख्या के प्रतिशत में काफ़ो वृद्धि उनग्रख्या गतिकी 7] (90 में 08 प्रदिशत से 395 में 73 प्रतिशत और 98] में 23 7 प्रतिशत), तथापि 9) में 26 प्रतिशव जनसख्या को शहरौकरण का उच्च स्तर नही कहा जा सकदा। लगभग 2249 मिलियन लोगों में से (या भाएत की कुल जनसख्या का 26 66%), जो 99] में अपने पुराने निवाप्त से नयी जगहों में जाकर बस गए, 64 5 प्रतिशत गाँव से गाँव में प्रव॒जन वाले थे,72 प्रविशव्र गांव से शहरों मे, 8 प्रतिशत शहरों से शहरों में, और 6 प्रतिशत शहरों से गांवों में जाने वाले थे (वही- 26)। परिवम में अव्रजत गविशोलत़ा, जो शहरीकरण के साथनसाथ होती है, अच्छी मानी जाती है क्योंकि यह रोजगार के अवसर तथा अन्य सुविधाएं अदान करती है लेकिन भारत मे यह ग्रामोण गरीबी को शहरों में जाना दर्शाती है ओर इस प्रकार गरीब बस्तियों में धीमी वृद्धि के बावजूद नगरों और कस्बों में जनसख्या दबाव का पैमाना तेजी से बढ रहा है। गांवों से शहरी क्षेत्रों में प्रवृजन में वृद्धि से औद्योगिक व वाणिज्य के क्षेत्रों में सस्ते श्रम की पूर्वि की अपेक्षा की जाती है लेकिन साथ ही इससे शहरों और कस्बों में अधिक समस्याए पैदा होने की भी अपेक्षा की जाती है। यद्यपि भारद की प्रापोण जनसंख्या में भी यूद्धि हुई है तथापि फुल जनसख्या (अर्थात्‌ 74 2%8) का लगभग 8 44 प्रतिशत 000 व्यक्तियों से भी कम व्यक्तियों वाले छोटे गाँवों में और 3657 प्रतिशत 2000 जनसख्या से कम के गांवों में रहते हैं। व्यावसायिक सरचना (006फएशाणाण $0एलए०) आर्थिक रूप से सक्रिय लोगों (5 से 59 वर्ष आयु) पर निर्भर आश्रितों (4 वर्ष से कम या 60 वर्ष आयु से अधिक) की सख्या बहुत अधिक है। 993-994 में भारत में लगभग 45 प्रतिशत लोग (44 86%) (5-59 वर्ष आयु समूह में) अनुमानत आर्थिक रूप से सक्रिय गा कार्यत थे और लाभग 55 प्रतिशव आर्थिक रूप से निष्क्रिय थे (वही 28) | 993-94, में 449 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में और 36 3 प्रतिशत लोग शहरी क्षेत्रों में श्रमशवितत में ते थे (वही . 49)। लिंग के सन्दर्भ में 676 प्रतिशत पुछ्ष 05-59 आयु समूह के) और 324 प्रतिशत लिया उत्पादक कार्यों में लगे हैं। 5 से 9 वर्ष कौ आयु ममूह में प्रामीण और शाही क्षेत्रों में पुरुषों की क्रियाशीलता की दर क्रमश 73 8 प्रतशित और 262 प्रतिशत हैं; जब कि छियों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर क्रमश 49 प्रतिशत वया 85 प्रतिशत हैं (वह , 429) । 2993-94 में 646 प्रतिशत लोग प्राथमिक क्षेत्र (कृषि) में, 4 2 प्रविशतर लोग द्वैतोयक क्षेत्र (निर्माण) में और 2। 2 अतिशत लोग तृदीयक क्षेत्र (नौकरी) में लगे थे (बह - 229) | पुरुषों में कार्य न करने वालों की सबसे बडो सख्या पूर्णकालिक छात्रों की है और लियों में घलू काम करे वाली सलियों की। व्यावसायिक रचना की यह सरवना का अमाव साम्राजिक स्तर पर पड़ता है जो पुन स्लियों की सामाजिक प्रस्थिति को प्रभावित करता है। भ्रम शक्ति में शहरी भागीदारी दोनों के लिए (हरो-पुरुष) ग्रामोण क्षेत्रों को अपेक्षा शहरों में काप्े कम है। 0-4 वर्ष आयु प्मूह में विशेष रूप से क्रियाशोलता को दर दर्शावी है कि रहती और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में बाल श्रम प्रया री और पुरुषों दोनों में प्रचलित है। 903 94 में ग्रायीण क्षेत्रों में पुरुषों में यह दर 5-9 वर्ड आयु समूह में .] प्रतिशत और 0-4 दर्ष आयु समूह में 38 प्रतिशत थी तथा स्तियों में 5-9 वर्ष आयु समूह में !4 356 जनसंख्या गतिकी पतिशत और 0-4 वर्ष आयु समूह में 4 प्रतिशत थी। शहरी क्षेत्रों में पुरुषों में 0-4 वर्ष आयु समूह में यह दर 0.5 अतिशव और दियों में 45 प्रतिशत थी। साक्षरता सचना (छ३८१ 577ए०ए०7९) 99 की जनगणना में साक्षण्ता स्तर 7 वर्ष और उरसे ऊपर की आयु की जनसख्या के लिए किया गया था। पूर्व की जनगणना में इस उद्देश्य के लिए 5 वर्ष और इससे ऊपर आयु समूह की गंणना की जाती थी। 9 में कुल जनसंख्या का 52.2] प्रतिशत साक्षर पाए गए (64.3% पुरुष, 39 29% सयाँ) (वही ॥42)। एनएसएस का अनुमान है कि 997 के अन्त तक पुरुषों की साक्षरता दर 72 प्रतिशत और रिदयों को 49 प्रतिशव हो गई (7#6 घ्रषदाकाग 7.्ञाठू, #एग 47, 2000) । सर्वाधिक साक्षरता दर (997 में) मिज़ोस्म में (95%) है और न्यूनतम बिहार में (8 38%) है। शैक्षिक रचना के उपलब्ध आकडे कुछ विशेषताएँ दर्शाते हैं. () साक्षयों की अपार सख्या कुछ हो वर्षों त+ स्कूल जाती है और स्कूल छोडकर जाने वालों की सख्या बहुत अधिक है। 99] में भारत म कुल साक्षरों में से 567 प्रतिशत 3 वर्ष से भी कम स्कूल गये थे, 23 8 प्रतिशत 3-6 वई को शिक्ष प्राप्त थे, ]] प्रतिशत 7-] वर्ष, 68 प्रतिशत 2-4 वर्ष और 7 प्रतिशत 4 वर्ष से अप्िक् वी शिक्षा प्राप्त किए हुए थे (वही 48)। ०) एक ओर उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की कर है और दूसरी ओर हमें अधिक सख्या में शिक्षित बेकारों का सामना करना पड़ रहा है। भाषायी रचना (ता2098९ (0०एरफुणज्ञाणा) हमारे सविधान में वर्णित 5 प्रमुख भाषाओं में से सर्वाधिक प्रतिशत में लोग हिन्दी बोलते हैं ७3०४), इसके बाद बगला वेलुगू और मराठी बोलने वाले (8: अत्येक), तमिल और उर्दू (6% प्रत्येक), गुजरती 65%), मलायालम, कन्‍्नड और उडोया (4% प्रत्येक), पजाबी 83%), ३ अन्य भाषाएं (असामी, कश्मीरी, सिन्‍्धी, सस्कृत, आदि सहित) (९४) बोलने वाले लोग । धार्मिक रचना (एटाह्वा०घ५ (०09ए०5४०) यद्यपि सविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष देश कहा गया है तथापि यहाँ अनेक धर्मों वा सम्मिश्रण है। कुल जनसख्या का (99। में) 82 6 प्रतिशत हिन्दू, 4 प्रतिशत मुप्ततमात, 24 ग्रतिशव ईसाई, 20 प्रतिशत सिख, 07 प्रतिशत बौद्ध, 0.5 प्रतिशद जैन और 04 प्रतिशत अन्य हैं। जहाँ जैन लोग 60%) और उसके बाद मुस्लिम (29%) अधिकार 'शहरवासी हैं वही हिन्दू अधिकतर ग्रामवासी हैं (शहर कौ जनसख्या का 76% और ग्रामीण का 84%)। अनुसूचित जातियाँ और अनुसूचित जनजातियाँ ($सधव000 (2४५९५ १5 5घा0०6०१ प्र) अनुसूचित जाति के लोग अधिकतर हिन्दू धर्म के हैं। 99॥ की जनगणना के अवु्ार बाग्रज्या गतिको उह7 जनसंख्या का 648 अतिशत भाग अनुसूचित जादि और 808 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों में थे। (006 7%ठुत्रि८ 22202, 998. 34) । इस प्रकार मोटे तौर पर भाए्त में 4 लोगों में से एक व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति का है। इन समूहों के सज्यवार वितरण में बड़ी भिलताएँ हैं। कुल अनुसूचित जातियों में अधिकतम सख्या उत्तर प्रदेश में, फिर पश्चिम बगाल, बिहार, तमिलनाडु, और आख्ध प्रदेश में है, जबकि नागालैण्ड, मिजेप्ष, अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जाति के लोग बिल्कुल नहीं हैं। (वही 34.35) | नागालैष्ड व मेघालय में 80 प्रविशत से अधिक अनुसूचित जनजदि के लोग हैं और हणियाणा, जम्मू और कश्मीर, पंजाब, सिक्किम और गोआ में अनुसूचित जनजाति के लोग बिल्कुल नही हैं। अनुसूचित जनजातियों के लोगों की सर्वाधिक सख्या मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र उद्यौसा, बिहार और गुजरात में पाई जाती है। कुल अनुसूचित जनजाति की जनसख्या का लगभग तोन पाचवां भाग 2.75%) उपरोक्त पाँच राज्यों में है (वही 34)। जनसंख्या विस्फोट (एकण॑बाण्पर छ्ञोौएआ॑०प) द्वितीय महायुद्धोत्त काल (अर्थात 945 के बाद का समय) को जनाकिकी में जनसख्या विस्फोट का काल कहा जाता है। यह वह काल था जिसमें भारत सहित सम्पूर्ण विश्व की चनसख्या में अभूतपूर्व तथा तेज गति से वृद्धि हुई। उदाहरण के लिए जब 600 एडी में भारत कौ अनुमानित जनसख्या 0 कंग्रेड थी, वहों 800 में 2 करोड, 90। में 23 84 करोड, 9 में 36] करोड, 997 में 84% करेड, 997 में 95 52 करोड तथा मई 2000 में यह 00 कोड थी (#कफ्कश 70पिद खहद्ोण, 998 42 ॥ाए टकलार ए /78 997 :02) । इसका अर्थ यह हुआ कि जहाँ 600 एड़ो और 800 एडो के बीच 20 वर्षों में इमसें 20 प्रतिशत वृद्धि हुई और अगले 00 वर्षों में (वा 80। और 90। बोच) लगभग 00 प्रतिशत ७४ 66%) वृद्धि हुई, वहों अगले 00 वर्षों में (90 से 2000 तक) यह वृद्धि 39 प्रतिशत हुई। यदि जनसख्या वृद्धि को पुन तौन स्पष्ट अवधियों में विभाजित करें ; (७) 90। से 93 तक, (७) 93। से 960 तक, और (०) 96 से 999 तक, वो पता चलता है कि 30 वर्ष कौ प्रथम अवधि में केवल 7 प्रतिशत को वृद्धि हुई, अपले 30 वर्षों में 57.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई और अगले उ8 वर्षों में (बा लगभग चार देशों भें) 427 प्रतिशत की विस्फोटक वृद्धि हुईं। इस प्रकार 92] से पूर्व जनसख्या वृद्धि मन्पर गि से (590०००८०), 92। से 95] के बौच तोव् गति से (3/0), और 97 के इसको + बाद इसको विस्फोटक (८७।०७४४६) कहा जा सकता है। उनमख्या मे वृद्धि (रसर१5९ 0 कएणाणआण्गे िस्प्य एव परिवार कल्याण मव्रालय द्वार 997 में वैयार किए गए राष्ट्रीय जनमख्या नीति "पक के अनुसार कुल प्रजनन शक्ति दर (०४ द्िशशत सक्० पाप), यानी 2, सन्‌ 200 उक प्राप्त कर लिया जायेगा। लेकिन एजिस्ट्रार जनरल की प्रेष्ठाओं के अनुसार, 2. उ58 जनसख्या गतिकी का टी एफ आर वर्ष 2026 से पूर्व प्राप्त नहीं किया जा सकता (यदि मौजूदा जनाकिकी प्रवृत्ति जारी रहे)। यह दर्शाता है कि सरकार और राष्ट्र जनसख्या वृद्धि नियत्रण करने में कितने उदासीन रहे हैं। विस्फोटक गति से वृद्धि करती हुई भारत में जनसख्या के निम्नलिखित पक्ष प्रमुख हैं » आजादी से पहले भारत की जनसख्या में 0 करोड की वृद्धि में साढे बारह साल, दूसरे 0 करेड में सवा नौ साल, तौसरे 0 करोड में साढे सात साल,चौथे 0 करोड में सवा छह साल है और पाँचवें 0 करोड में मात्र पाँच साल दो महीने का समय लगा। ० एक दशक पूर्व विश्व में प्रत्येक छठा व्यक्ति भारदीय था और शताब्दि के बदलते हो प्रत्येक पॉचवा व्यक्ति भारतीय है। * भारत की जनसख्या में हर मिनट में 30 और प्रतिदिन 43,200, और हर वर्ष 4.5 करेड व्यक्ति जुड़ जाते हैं (0७७७५ (०0०0फ७५ञछजाथ [963, व॥९ मं॥/छादषा प्रक्राह०, &०ह०5 8, 999) # भारत की जनसख्या में वृद्धि 45 दिन में एक चन्डीगढ (5,40,725 जनसख्य), और प्रत्येक माह में एक आस्ट्रेलिया (( 85 करोड) की जनसख्या के बबर हो जाती है। भारत में हर वर्ष में जनसख्या में वृद्धि (| 55 करोड) फ्रास (584 मिलियन जनसख्या) ब्रिटेन ७8 8 मिलियन जनसख्या) और इटली (576 मिलियन जनसख्या) की भिश्रित जनसख्या से कुछ कम है। ० 2035 तक भारत चीन से आगे निकलकर विश्व का सबसे अधिक जनसख्या वाला देश हो जायेगा | जब भाए्त में जनप्ख्या वृद्धि की वार्षिक दर 35 प्रदिशत है वही चीन में यह 2 प्रतिशत है। 999 के अन्त में चीन की आबादी 725.9 करोड थी और भारत की 99 5 करोड थी। चीन की जनसख्या को 200 एक 440 करोड पर नियत्रित करने का तथा वृद्धि दर 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष के मीचे रखने का लक्ष्य तय किया गया है। (8035४9, !५७५ 8, 2000) * भारत की जनसख्या में एक दशक में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि चार शज्यों-बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश-में ही है। (बिन बिमारू--8//7 के नाम से भी जाना जाता है)! » जो जोडे (८००.०७) पुनरेत्पादी विस्तृति (८०7०००८४४७ 5») से बाहर हो जाते हैं उनका तीन गुणा इस चक्र में प्रवेश कर जाते हैं। जो पुनरेत्पादी चक्र में प्रवेश करते हैं उनकी प्रजनन क्षमता तीन गुणी अधिक होती है, अपेक्षाकृत उनके जो चक्र से बाहर शो चुके हैं। * वृद्धि की वर्तमान दर पर अधिकतर भारतीयों का जीवन असह्य (एकट्शडण) हों जायेगा--चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना मुश्किल होगा, शिक्षा, आवास आदि पर व्यय अधिक हो जायेगा, प्राविधिक एव व्यावसायिक शिक्षा मात्र अभिजात वर्ग की ही विशेषाधिकार बन जायेगा और भोजन को कमी एक बार फिर से आधे से अधिक राष्ट्र की गरैबी रेखा से नोचे ले जायेगी। जनसस्या गतिको 359 जनसंख्या वृद्धि या जनांकिकी उथल-पुथल के विश्लेषण्‌ में यह कहा जा सकता है कि देश तीन विविध चरणों से गुजरता है जिसमें प्रत्येक में विभिन्‍न प्रवृतिया होगी हैं। वह तीनों चरण अधिक जन्म-अधिक मृत्यु, अधिक जन्म-कम मृत्यु, और कम मृत्यु-कम जन्म की म्रद्धता दर्शाते हैं। प्रथम 'स्थिए'! (#७00797)) चरण में जन्म और मृत्यु दोनों ही दर ऊँची औए अनियत्रित होती हैं, इसलिए जनसंख्या वृद्धि कम होती है। दूसपा चरण “विस्तार (८एथअंणा) का है क्योंकि जन्म दर काफी अधिक है और मृत्यु दर घटती जाती है। तोसग चरण 'अधोगति' (0८८४७) का है। भारत अभी भी द्वितीय चरण में से गुजर रहा है जिसमें प्रजनन दर मृत्यु से अधिक रहती है। प्रजनन दर भी कम हो सकती है जब आधिक व सामाजिक स्तर में सुधार आ जाये। आधिक व सामाजिक परिवर्तन के कुछ लक्षण हैं 'शहरीकरण, औद्योगीकरण, (दोनों ही उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए परिवार व मातेदारी बन्धरनों के महत्व को कम कर देते हैं) साक्षरता, तथा शिशु मृत्यु । जर्सख्या वृद्धि के कारण (एम्च०५5९5 ण॑ एछफपगांणा ठएशथीओ 98 के बाद जनसख्या वृद्धि की व्याख्या निम्न कारकों के आधार पर की जाती है : उपचागलक व निरोधक औषधियों के काएण मृत्यु दर में कमी, अकाल और महामारी पर गिय््रण,युद्धों में कमो, तथा जनसंख्या का बडा आधार (825८) | जवसख्या विस्फोट के लिए निम्मलिखित कारण बताये जा सकते हैं ). जन्य एव प्ृत्यु दर के बीच विस्तृत दूरी 000 64 फ्ेहच्नए्आ) फता। भाएं एध्व पिले पात में वार्षिक औसत जन्म दर जो 956 में प्रति हजाए जनसख्या पर 42 थी, 996 में घटक 28] हो गई। मृत्यु दर भी 95-6। में प्रति हजार जनसख्या में 27 से घटकर 290 में 9 ही रह गई (0600० 27०//६9908 37) | इस प्रकार क्योंकि जम दर उपेक्षणोय कमी और मृत्यु दर में तीव्र कमी देखी गई है, अत इस वृहत दूरी ने हमारी अनप्रज्या को तेजी से बढाया है। प्रजनन दर (प्रति स्री जन्म दिए गए बच्चों को औसत 'ख्या) 950 के दशक में 6 से घटकर 993-94 में 44 ही रह गई। यदि हम वार्षिक गर्षपात के आँकडों । करोड से करोड़ के बीच, जिसमें 04 करोड स्ववयात और 0 67 करोड़ प्रेरित गर्भपात शामिल है) को जन्म की वार्षिक सख्या में जोड दे 07 करोड) जो कि रेश में होते हैं, तो हम घातक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परिवार के प्रजनन काल में प्रत्येक पब में से एक भारतोय ख्री हर समय गर्भवतो रहती है। 2. विवाह के समय कप आयु (6७ #6 2४ शाहांग्ले रण देश में बाल विवाह आम बात रहो है। 93। की जनगणना के अनुसार, भारत में 72 शव विवाह १5 वर्ष की आयु से पूर्व और 34 प्रतिशत ॥0 वर्ष वी आयु से पं सम्पन जेवे ये। तब से स्री पुरुषों दोनों में विवाह की औसत आयु में वृद्धि हुई है। यद्यपि अमान है कि विवाह की औसत आयु में वृद्धि हो रही है तथापि आज भो बड़ी सख्या में 360 जनसख्या गठिकी लडकियों का विवाह ऐसी आयु में हो जाता है जब वे न तो सामाजिक रूप से या भावातमक रूप से या मनोवैज्ञानिक और आयु क्रम से हो विवाह के लिये दैयार होती हैं। बाल मृत्यु दर का प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्लो को विवाह के समय आयु से है। 99 में भारत में औसत बाल मृत्यु दर 000 प्रति जीवत जन्म (0८ #095) पर 74 थी--आमीण क्षेत्रों में यह दर 80 तथा शहरी क्षेत्रों में यह दर 49 प्रति हजार पर थी। यदि विवाह के समय सल्ियों की आयु के सब्दर्भ में उन्हें दौन समूहों में विभाजित करें--8 वर्ष से कम, 8 वर्ष से 20 वर्ष हक, तथा 27 वर्ष से अधिक--तब हम देखते हैं कि इन तीनों समूहों में शमीण क्षेत्रों भें बाल मृत्यु दर (978 में) क्रश !4, 42 और 85 थी जब कि शहरी क्षेत्रों में यह दर क्रमश 78,66 और 46 थी। यदि हम जनन क्षमता दर को आयु समूहों से जोड़ें ध्रवि स्री से जन्में बच्चों को औसत सख्या) तो हम देखते हैं कि जैसे जैसे आयु समूह अधिक होगा है, प्रजजन दर कम होती जाती है। यदि जनसख्या वृद्धि पर नियत्रण करना है तो खतियों का विवाह (प्रामोण और शहरी, क्षेत्रों में) 27-25 या 23-25 आयु समूह में किया जाये न कि 5-8 या 8-2] वर्ष आयु समूह में । 3. अत्यधिक निरक्षता (म्रांषा वालो परिवार नियोजन का प्रत्यक्ष सम्बन्ध खतरियों को शिक्षा से है और री शिक्षा विवाह के समय आयु, ख्तियों की प्रस्थिति, उनकी प्रजनन शक्ति, बाले मृत्यु दर आदि से भ्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध है। एत एमएस के द्वार (999 के ऑकडों के अनुसार भारत में समूचा साक्षरता प्रतिशत 62 प्रतिशत था जबकि 99 में 5222 तथा !98 में 43 56 प्रतिशत था। 99 में पुरुष साक्षरता प्रतिशत 64 3 था जबकि झ्लियों की साक्षरता का प्रतिशत 39 29 था (वही ,42)। 999 में, यह अनुमानत क्रमश 73 तथा 49 प्रतिशत था। शिक्षा व्यक्ति को उदार, विशाल हृदय, नये विचारों के लिये तत्पर तथा तर्कसगत बनाती है। यदि ख्री और पुरुष दोनों की ही शिक्षित किया जाता है ग्रो वे सरलता से परिवार नियोजन के तर्क को समझ जायेंगे, लेकिन उनमें से कोई एक या दोनों ही अशिक्षित होंगे दो वे अत्यधिक रूढिवादी, घर्मभीरू एव विवेकहोन होंगे। यह बात इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि केरल में जहा कुल साक्षर दर 89 8] प्रतिशत और खियों की साक्षरता दर 869] प्रतिशव है (997 में) वहा सबसे कम जन्म दर (॥7 8 प्रति हजार) है, जबकि राजस्थान में सती शिक्षा दर 20 44 प्रतिशत (वही 378 42) के साथ देश में जन्म दर तीसरे स्थान पर सबसे ऊची है (34 6 प्रति हजाए सबसे ऊँची जन्म दर उत्तर प्रदेश में (36 प्रति हजार है और उसके बाद मध्य प्रदेश (34 7 प्रति एक हजाएं में है। ये साख्यिकी ऑकडे अन्य गज्यों के लिए भी काफो सही हैं। 4, परिवार नियोजन के प्रति धार्मिक दृष्टिकोण (फशाड्रिए०5 880/906 प0४2765 स्थ्ाताज शक ॥्षांगड)ी धार्मिक दृष्टि से कट्ट एवं रूढिवादी लोग परिवार नियोजन के उपायों के उपयोग के विष्ड होते हैं। अधिकतर महिलाएँ यह तर्क देठी हैं कि वे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं जी झकतीं। कुछ रिरियों यह दर्क देतो हैं कि सियों के जीवन का उद्देश्य ही बच्चों को जन्म दैना ऋमख्या यतिकी है) । है। कुछ अय् स्ियों के दृष्टिकेण में निष्रियता है. “यदि मेरे भाग्य में हो अनेक बच्चों के जम देवा लिखा है वो मैं उन्हें जन्म दूगो, यदि नहीं तो नही। इसके विषय में मैं चिन्ता क्यों कह 27 भारतीय मुसलमानों में जन्म दर एवं उत्पादकता दर हिन्दुओं को अपेक्षा अधिक है (स्लिम महिलाओं में उप्ादकता दर 44 है, जबकि हिन्दुओं में 33) | 978 में ऑपरेशन्स सर्च युप द्वारा मुसलमानों में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, यद्यपि अधिकतर पुर और खी उत्तदाता आधुनिक परिवार नियोजन के तरीकों को जानते थे, किन्तु या तो वे धार्मिक आधार पर उनका प्रयोग नहीं कर रहे थे या उनको सही जानकारी नहीं थी। 992 में जनसख्या अनुसन्धान केद्ध, उदयपुर द्वारा किये गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि 2/8 मुसलमान पुरुष साक्षात्कारियों में से 43 प्रतिशत परिवार नियोजन को स्वीकृति देने वाले थे, 26 6 प्रतिशत अस्वीकृति देने वाले थे और 303 प्रतिशत मे ठौक से जवाब नहीं दिया (वही : 0) । इसकी तुलना में 2748 हिन्दू पुरुष साक्षात्कारियों में से 67 अतिशव ने इसे सहमति भ्रदान की, 4 5 प्रतिशत ने अस्वीकृति, और 23 8 प्रतिशत ने अनिश्चितता प्रकट की (वही 0)। यह दर्शाता है कि मुसलमान हिन्दुओं की अपेक्षा परिवार नियोजन में अधिक रूढिवादी हैं। अय कारण (0॥0 (ब्रा5९७) बनरस्या वृद्धि के कुछ अन्य कारण हैं. सयुक्त परिवार और इन परिवारों में युवा दम्पत्तियों में अपने बच्चों के पालन पोषण के प्रति जिम्मेदारी में कमी, मनोरजन के साधनों की कमी, पैथा बन्ध्याकरण, ट्यूबोक्टोरी तथा लूप के बुरे प्रभावों के विषय में गलत सूचना या सूचना की क्मी। बहुत से गरोब माँ बाप इसलिए बच्चे पैदा काते हैं क्योंकि उन्हें उनकी आवश्यकता है। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि हमारे देश में लभभग 35 करोड बाल श्रमिक हैं। यदि यह परिवार उन बच्चों को काम करने से रोक लें तो उनके परिवार को आमदनी बहुत कमर हो जायेगी। गरीबों के द्वार अधिक बच्चे पैदा करना दर्शाता है कि गरोबी और जनसझ्या के बीच आतरिक सम्बन्ध है। गरीबी जनसख्या वृद्धि का कारण और प्रभाव भी है। अधिक बच्चे पैदा बरके (बेटे) अपने परिवार को बढती आवश्यकताओं से जूइने माँ बाप को बाध्य होकर उ्े स्कूल जाने से रोकना पडता है ताकि वे घर खर्च में मदद कर सकें। और फिर, अशिक्षित या अज्जारी बच्चे अपने पिता के जैसे भाग्य के ही उत्तराधिकारी होंगे और अपने पिता की सै रख इते पुत्र चाहेंगे जितने कि जीवन यापन के लिए आवश्यक होते हैं। जनसंख्या विस्फोट के प्रभाव (साल्ल5 ० एगणेब्रॉणा ६0507) अनम्नख्या चूद्धि वा पत्यक्ष प्रभाव लोगों के जोवन स्तर पर पडता है। यही कारण है कि आजादी के बाद से हमारी कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में चमत्कारिक प्रगति के बावजूद पी हैमाएँ प्रति व्यक्त्ति आय में सन्तोषजनक वृद्धि यही हो पाई है। अनसख्या वृद्धि ने भारत पर किस प्रकार प्रभाव डाला है 2 अनुमान है कि 2.5 करोड 362 जनसंख्या गविकी लोग 000 क्येड में से अर्थात 25%) आवास विहीन हैं, [7 करोड लोगों को 07%) स्वच्छ पीने का पानी नहीं मिलता, 32.89 करोड प्रौद 63%) अशिश्षित हैं, 5 वर्ष आयु से कम 53 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं, और समूचा देश विश्व मानव विज्ञास्त सूची में 35 वें स्थान पर है। हमारे शहरों में अत्यधिक भीडभाड (जो कि केन्सर वृद्धि की तरह गन्दी बस्तियों में फ्लपूल रही है) ने यातायात, विद्युत ठथा अन्य सेवाओं में व्यवघान डाला है। इससे शहरी व उप नगगैय क्षेत्रों में अपराध और हिंसा में वृद्धि हुई है। यह सब कुछ प्रतिवर्ष .5 करोड जनसख्या में वृद्धि से प्रभावित हुआ है (वही )। यदि जनसंख्या इम्री दर से बढती रही तो अब से कुछ ही वर्षों में हमारे पास वेगेजगार, भूखे, और असहाय लोगों की फौज हो जायेगी जो कि देश की आर्थिक, सामानिक, राजनैतिक व्यवस्था और सस्यात्मक ढाँचे की नीव को ही हिला देंगे। चुनाव का खेल सख्वा का खेल है। चाहे शिक्षा, गेजगार, आवास, जल आपूर्ति या कि अन्य कोई क्षेत्र हे, एक ही प्रश्न है क्विनों के लिए ? यहा तक कि वर्तमान में 00 करोड वी जनसख्या के लिए (मई 2000 में) सभी के लिए रोजगार या आवास या स्वास्थ्य रक्षा कार्यक्रम के विषय में सोचना भी निरर्धक है, क्योंकि 200। में 3.55 करोड लोग और बढ जाएगे, अन उनका भा समायोजन होना हां है। एक वर्ष में .55 करोड लोगों की वृद्धि के लिए हमें प्रति व .5 लाख प्रार्थामक विद्यालय और 3 75 लाख माध्यमिक विद्यालय अध्यापकों वी आवश्यकता होगी, 5000 अस्पताल और डिस्मैन्सरियों वी, 2000 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्रों की, 2 लाख अस्पताल के बिस्वों की, 50 हजार डाक्टर की, 25 हजार नसों की, सवा करोड क्विटल से अधिक खाद्यान, 20 करोड मोटर कपड़े की, और 25 लाख मकानों की तथा 40 लाख नौकरियों वी आवश्यक्ना होगी। (दी हिन्दुस्तान टाइम्स, जुलाई 4, 997 और इडिया प्राम मिडनाइट दू मिलेनियमी जीवन की गुणवत्ता पर जनसख्या वृद्धि का प्रभाव घे्लू वेदना की (म्र0फथ्ाणत 3॥शफ [004 (पा) के अन्तर्गत, अर्थात्‌ लोगों की बचनाओं मूलभूव आवश्यकताओं के अर्थ में पर्क्षण क्या जा रहा है (देखे बोस, 996) | एचएम आई (प्रा) सूची के पाँच मापदण्ड हैं पका मकान, सुरक्षित पीने का पानी, बिजली, मफाई व्यवस्था, तथा खाना पकने के लिए इंधन। कुछ विद्वानों ने इसका (बनसख्या वृद्धि) परीक्षण मानव ससाघनों के अर्थ (साक्षरता, स्वाम्थ्य आदि) में क्या है। वर्तमान में 49] प्रतिशव भारत के लोगों के घरों में विजलो नहीं है, 697 प्रतिशव शौचघर सुविधा, (फलश या अन्य प्रकार के शौचालय) प्राप्द नहों है, 575 प्रतिशव के पास पक्के मकान नहीं हैं और 9 प्रतिशन को सुरक्षिव पीने का पानी उपलब्ध नहीं है (आउटलुक, अगस्त 2 996 53) | यदि हम भारत में 4990 की मानव विवास्त सूचो वी तुलना दुछ चयनित वस्तुओं के आधार पर अन्य देशों से करें दो हमें पद चलता है कि बढ़ती जनसस्या का हमारे जीवन की गुणवत्ता पर गम्भीर प्रभाव पडा है। 4996 की यूएलडी पी (/श07) की रिपोर्ट के अनुसार (छ80००८ ७79८7 5॥) आस्त केवल 4 डालर (लगभग 500 रुपये) प्रति व्यक्नि प्रतिवर्ष स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करवा है उर्याक अन्य विकासशोल देश, जैसे दक्षिय कोरिया और मलेशिया, 50 से 460 डालर खर्च करते हैं। हमारे देश की गरोबी रेखा से नोचे रहने वाली लगभग 37 जनसख्या गतिकी 363 गा जनसख्या पर इस अपर्याप्त घनशशि के प्रभाव को केवल कल्पना ही की जा सकती | यह सब आँकडे क्या पूर्वापास (57०0/०४0५) देवे हैं 2 2] वी सदी प्रारम्भ हो गई है। 970 के दशक में प्रकाश और आशा थी। 980 के दशक में अन्धकार का समय आया। जनसंख्या विस्फोट, उप्रवाद एव अलगाववाद को बल मिला। 990 के दशक में ये सब मामले और अधिक गहरावे गए। हमारे देश को विश्व अर्थव्यवस्था को कठोर स्पर्धा का सामना करना है। भारत अब एक ऐसी नीति की तलाश करेगा जो जनसख्या विस्फोट के प्रकाण को सस्ती से निपटने में सक्षम होगी। जब तक भारत को ऐसी मीति नहीं मिलती, इसका भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता । जनसंख्या वृद्धि एवं नियंत्रण की सैद्धान्तिक व्याख्यायें (ष्णचांदा एफराशा॥ाणा5ड त॑ एतगरांणा एाएज आत (णाए०) जनप्तख्या पर नियत्रण और विकास (06९0०ज़ाता बात 00000 00९९ एकफणंजाण्ण) जनसज्या और विकास के बीच के सम्बन्ध को 940 के दशक में प्रिन्सटन विश्वविद्यालय जनसख्या अनुसन्धान कार्यालय द्वारा इस आघार पर कि विकास जननक्षमता (७॥0/0) की दर को कम कर देता है, समझाया गया है। अब यह कहा जाठा है कि विकास मृत्यु दर को जनम दर को अपेक्षा अधिक कम करता है जिसका परिणाम जनसख्या में या होती है। पि भी कुछ समय के बाद जन्म दर भी आवश्यक रूप परे कम होती ही है और इस कारण एक बाए फ़िर से जनसख्या वृद्धि दर धोमी हो जाती है। लेकिन यह सिद्धान्त इस गहत्वपूर्ण प्रष्त का उत्तर नही देता कि जैसे-जैसे विकास होगा तो जन्म दर में कमी कब आयेगी ? यह, यह भी नहीं बदादा कि जननश्षमता किस स्वर तक कम होगी और वह समय अवधि जिसमें यह वो शुह्र होगी क्यों होगी ? जननक्षमता कमी की गति और समय प्रश्नों के बाद फिर अत उठता है उन कारकों की पहचान का जो जननक्षमता में कमी पैदा करते हैं। जनाकिकी 'खिरतन के समय का अनुमान लगाने के लिए सयुकत राष्ट्र के एक अध्ययन में 2! चरों (६०४०७)५७) को परख। गया जिसमें प्रति व्यक्ति आय, नगरीकरण, स्री शिक्षा, आदि शामिल थे। परिणाम व्यर्थ ही रहा। फोतू अर्थव्यवस्था का सिद्धाल (॥९079 ण॑ :८णाणा३ ० ]005९०5) झा पैद्धानिक दृष्टिकोण के अनुसार एक गृहस्थों बड़े परिवार को कीमत (८०४) का पुल प्राप्त लापों से करता है। जब तक बच्चों के पालन पोषण की कीमत अतिरिक्त अयके अर्थ में प्राप्त लाभों की तुलना में कम रहती है तब तक जन्म दर ऊँची बनी रहेगी। परिर्त तब आएग जब नगरीकरण, आवश्यक रूप से बच्चों को विद्यालय भेजना, बाजार पेश (ता एथ॥८७चन००७) आदि जैसे सामाजिक आर्थिक परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप बच्चों के लासन-पालन की कीमत लाभों को अपेक्षा ऊची होगी। जौन वाल्डवैल का अहम में क्मो का सिद्धान्त (982) भी यही बढाता है कि जननक्षमता में कमी तव 364 जनसख्या गतिकों शुरू होती है जब ससाधनों की कमी (7८४८४७७) माता पिठा की अपेक्षा बच्चों की ओर हो जाती है और यह कमी वृहत्‌ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों से सम्बद्ध होती है। गर्भ निरोध तक पहुँच सम्बन्धी विचारों के विसरण का सिद्धाल (एकटणज गे जागन्नता गण 9९95 हट्डआएंए्ड 300९५ (0 (० ०कुए/णा) उपरेक्त सिद्धास्त, जो जननक्षपता के आर्थिक और सामाजिक निर्षाप्कों पर आधारित हैं, को एक अन्य सिद्धान्त के द्वारा चुनौती दो गई है जो गर्भ निरोध तक पहुँच और जननश्षमता नियत्रण के सम्बन्ध में विचारों के विस्तार की धूमिका पर जोर देता है। एन्सले कोल (973) ने इस सिद्धान्त का [850 और 930 के बौच यूरोप में प्रजनन शक्ति दर में कमी के अध्ययन के द्वाग समर्थन किया। गर्भ निशेधकों की उपलब्धता ठर्वरता दर में कमी तथा इसके विपरीत वृद्धि करती है। भारत में अध्ययनों ने इन सभी सिद्धान्तों का समर्थन किया है और अन्य कारकों को ओर भी सकेत किया है जो जननक्षमता को त्रभावित करते हैं, जैसे विवाह के समय अधिक आयु या वे कारक जो गर्भ निशेधक विधियों के प्रयोग में बाधक बनते है, जैसे सनी शिक्षा, बेटों का महत्व, गरीबी, आर्थिक क्रियाकलापों में ख्री सहभागिता, आदि । के जी जौली, अनिरद्ध जैन, आदि द्वारा इस सन्दर्भ में भारतीय आँकडों के साथ अनुभवाश्रित अध्ययन किए गए हैं। जौली (0॥9, 986) ने गर्भ निरेधी विधियों की प्रचलन दर और नगरीकरण के स्वर, री शिक्षा, आर्थिक क्रियाकलापों में स्तियों की सहभागिता के बीच सकारात्मक सम्बन्ध पाया और आर्थिक असमानता के स्तर और गैर हिन्दू जनसख्या के बीच नकारात्मक सम्बन्ध देखा। जैन (0985) ने अन्तर्रज्यीय आकडों पर कार्य करते हुए पाया कि शिशु मृत्यु सबसे महत्वपूर्ण चर है जबकि ख्री शिक्षा, नगरीकरण, आदि अप्रत्यक्ष रूप से सम्बद कारक हैं। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि जहा तक गर्भ निशेधक उपायों के भ्रचलन दर का सम्बन्ध है सी शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण कारक है (देखें प्रणव बनर्जी, 4992 250-256) जनसख्या नीति (ए09090०० !९णाल्शे सकोर्ण रूप में “जनसख्या नीति यूएनईपी (एगधठ०) का अर्थ है (973 632), “जनसख्या की विशेषताओं या आकार, सरचना और वितरण को प्रभावित करने का प्रयल” | बुहत्‌ रूप में इसका अर्थ है “आर्थिक और सामाजिक दशाओं को नियमित करने के प्रयल जिनसे जनाकिकीय परिणाम सम्भावित हों”। नोटमेन (975 20) ने कहा है कि उक्त सकीर्ण अर्थ उस “स्पष्ट नीति' (न ॥०॥ ए०॥८५) से है जो जनसख्या की विशेषताओं के अत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं, ओर विस्तृत अर्थ 'उपलक्षित नीति' (70000 707०) से है जो इन विशेषताओं के परोक्ष रूप से और कभी कभी बिना बाह्य (७०९ इरादे को प्रभावित करी है। दो प्रकार को जनसख्या नोतियों बताई गई हैं (3) प्रसव विरोधी (३987) नीति जिसका उद्देश्य जनसख्या वृद्धि को हतोत्साहित (05८००४०) करना है, और (७) वितरणात्मक (0:७४0०७०7०) नीति जिसका उद्देश्य जनसख्या के वितरणात्मक असन्तुलन जनप्रख्या यतिकी 365 पर विचार कला एवं उन पर कार्य करना है। राष्ट्रीय विज्ञनों की अकादमी ने जनसख्या नौति का इस प्रकार विवेचन किया है : (७) जो पूर्व निर्धारित उद्देश्य के अनुसार जनाकिकीय प्रक्रिया को प्रभावित करे (उदाहरण के लिए लोगों को नगर क्षेत्रों से उप-नगदीय क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित करना) और (७) जो जनाकिकीय प्रक्रियाओं से उत्पन माँगों की पूर्वि करे (उदाह्णार्थ उपनगरीय क्षेत्रों में लोगों को मूल सुविधाएँ प्रदान करना)। भारत जैसे विकासशील देश की जनसख्या नौति के उद्देश्य निम्न होने चाहिए' () जम दर कम करना (0) परिवार में दो बच्चों तक सख्या सीमित करना (0) मृत्यु दर कम कला (0) वेज गति से बढती जनसख्या के परिणामों के श्रवि जन जागरण पेदा करना (५) आवश्यक गर्भ निरोधक उपाय उपलब्ध करना (४) गर्भपात को वैध बनाने सम्बन्धित कानूनों का क्रियान्दयन (५8) प्रोत्साहन एवं हतोत्साहन दोनों देना। दूसरी ओर, इसके यह भी उद्देश्य हैं ७) भोड-भाड वाले क्षेत्रों में लोगों का केन्धित होता रोकना (8) नये क्षेत्रों में प्रभावी आवाप्त के लिए आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध काना, और (०) कम जनसख्या वाले स्यातें में कार्यालयों का पुर्वस्थापन। एक बार जनसख्या नियंत्रण कौ आवश्यकता अनुभव हो जाये तो विशेषज्ञों से सलाह के तथा अध्ययन के लिए आयोगों और समितियों की नियुक्ति करके नीति बनाई जानी है । वेब विविध कार्यक्रमों के द्वारा इसका क्रियान्वयन हो और समय समय पर मूल्याकन । भारत कौ जनसख्या नीति (3) जनसख्या के कुल आकार का (४७) अधिक वृद्धि दर का, और (०) आमीण तथा शहरी क्षेत्रों में असमान वितरण की समस्या का प्रत्यक्ष परिणाम है। क्योंकि हपाये नौति के उद्देश्य की आवश्यकता है जीवन की गुणवत्ता में सुधार' और व्यक्ति मुझ की वृद्धि करना', अत साम्ताजिक प्रगति और व्यक्तिगत सुख पूर्वि की अपलब्धता के विस्तृत उद्देश्य को भाप्त करने के साधन के रूप में कार्यवाही होनी चाहिए। गाए में, 952 में बनाई गई नीति अस्थाई, लचौली, और 'प्रयल और भूल' के दृष्टिकोण 'र आधारित थी। धीरे-धौरे इसके स्थान पर अधिक वैज्ञानिक योजना प्रारम्भ की गई। राष्ट्रीय योजना समिति द्वारा राधा कमल मुखर्जों की अध्यक्षता में 940 में नियुक्त जनसंख्या पर उप-समिति ने (938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा नियुक्त) आत्म नियंत्रण, जन्म नियत्रण के सस्ते व सुरक्षित उपायों के ज्ञान का विस्तार तथा जन्म नियत्रण उपचार केन्रों के स्थाएता पर बल दिया! इसने विवाह आयु बढाने, बहु विवाह प्रथा को हदोत्साहन करने, सेषगोय (0गाणयां5800) शोे्गों से पीडित लोगों के बन्ध्याकाण (बअधद्या॥टक्षाणा) वया कार्यक्रम (८७७७॥॥० 97हञथ्याए०) चलाने को सिफारिश कौ। 943 की भोर परमिति, जो सरकार द्वारा नियुक्त को गई थी, ने आत्म नियत्रण विधि को प्रमाणित किया और परिवारों के स्वेच्छा से सोमित करने! को वकालत की। स्वतत्रता के बाद 952 में जनसख्या नौवि समिति और 953 में पतिवार नियोजन अनुपनथात और कार्यक्रम समिति गठित की गई। 95 में एक केद्रीय पणिवाए नियोजन बोर्ड बगाया गया जिसने बन्ध्याकण पर बल दिया। 980 के दशक के दौणन अधिक एविदशालों परिवाए नियोजन कार्यक्रम एक उपयुक्त समय के भीतर जनसख्या वृद्धि को स्पा कले के लिए बनाया गया। पूर्व में जब सरकार द्वारा यह माना जा रहा था कि परिवार 366 जनसख्या गविकी नियोजन कार्यक्रम ने लोगों को काफी भ्रेरित कर दिया है और सरकार को केवल गर्भ निषेध की सुविधाए ही प्रदान करनी हैं, बाद में यह अनुभव किया गया कि लोगों को प्रेरणा कौ और शिक्षिद करने की आवश्यकता थी। अप्रैल 976 में स्वास्थ्य व परिवार नियोजन मत्री कर्ण सिंह ने ससद के सामने राष्ट्रीय जनसख्या नीति प्रस्तुत को जो सरकारी और गैर सरकारी संगठनों, शैक्षिक सस्थाओं, सुविख्यात जनाकिकी शास्लियों तथा अर्थशांज्लियों से लम्बी बातचीत व सलाह के बाद बनाई गईं थी। इस नीति में कार्यक्रमों के विस्तृत आयाम थे जिनमें विवाह की आयु कानूनी रूप से बढाना, उन राज्यों को प्रत्यक्ष आर्थिक प्रोत्साहन देना शुरु करना जो परिवार नियोजन में अच्छी भूमिका अदा करें, री शिक्षा के सुधार की ओर अधिक ध्यान देना, सभी उपलब्ध जन सचार के साधनों द्वारा सार्वजनिक शिक्षा पैडियो, टेलीविजन, प्रेस, फिल्म), नसबन्दी तथा बन्ध्यकरण ऑपरेशन कराने वालें को वित्तीय प्रोत्साहन देना तथा प्रजनन जीव विज्ञन और गर्भ निरोध में नये अनुसन्धान शुरु करना शामिल हैं। यद्यपि इस नीति को ससद की मान्यता मिल गई, यह उस समय बनाई गई थी जब आपात काल लागू था। भारतीय युवा काम्रेस के अध्यक्ष सजय गान्धी के नेतृत्व में बन्ध्यकरण आन्दोलन में इतनी ज्यादतिया हुई कि लोगों ने इसको अत्याचार माना। कुछ उत्तर भारतीय राज्यों में यह कार्यक्रम इतनी सवदेनहीनता वथा अति उत्साह से चलाया गया कि आपातकाल के बाद 977 के चुनाव में ये ज्यादतिया चुनाव का मुद्दा ही बन गई और केद्ध में काम्रेस पार्टी पराजित हुईं। 980 में जब इन्दिग गान्धी पुन सत्ता में वापस आई उन्होंने परिवार नियोजन कार्यक्रम के अपने वायदे को पूरा करने में सावधानी और सूझबूझ से काम लिया। तब से, लगभग सभी शज्य तथा केन्र सरकारें इतनी कतराती रही हैं कि जनसख्या वृद्धि दर जो कि 2 प्रतिशत कम होने की उम्मीद थी, अभी भी 0000 में) लगभग 2 35 प्रतिशत है। 979 में जनसख्या नीति पर कार्य कर रहे समूह (५०॥णाढ 070०) ने शुद्ध प्रजनन दर (ए९ वश्ञ्ञा०0/0:५७ 72८) एक (0) तक कम करने के लम्बे समय के जनाकिको लक्ष्य रखने को सिफारिश की । इस लम्बे समय के लक्ष्य के उद्देश्य इस प्रकार रखे गए () परिवार का औसत आकार 43 बच्चों से 23 बच्चे रखा जाये, (2) प्रति हजार जनम दर 33 से 2 होगा, 6) मृत्यु दर प्रति हजार 4 से 9 होगी जबकि बाल मृत्यु दर 29 से 60 होगी, (4) परिवार नियोजन के द्वारा वरणीय (८॥&/0०) 22 प्रतिशत सुरक्षित दः्पत्तियों की बजाय 60 प्रतिशत दम्पत्तियों को सुरक्षित किया जायेगा और 5) 2050 & 0 तक भाख की जनसख्या 20 करोड तक हो जायेगी। 993 में, एक राष्ट्रीय जनसख्या नीति भ्रस्तावित करने के लिए स्वामीनाथन समिति गठित की गई जिसने मई 994 में एक नीति पत्रक (20॥८/ 0॥2/0 मअस्तुत किया। परिवार नियोजन (ए्रण्ाज़ शए/ग्राणए्रो 950 के दशक में भारत सरकार समर्थित परिवार नियोजन कर्यक्रम चलाने वाला प्रथम देश था जबकि शेष जगत को इस समस्या का आपास भौ नहीं था। आज 50 वर्ष बाद भी भारत जनसख्या नियत्रण में पीछे है। दुर्दानन आपात काल में 975 व 3977 के बीच, राजनैतिक भेताओं, सरकारी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों ने जोर से बन्ध्यकरण की वकालत की। जकसख्या ग्रतिकी 367 उन्हेंने महत्वकांी कार्यक्रम बनाए और जन इच्छा के विरुद्ध चलाया भी । बन्ध्यकरण कराने के ऐसे झोस कठोर और जवर्दस्ती वाले तरेके अपनाए कि आज जनता के समक्ष परिवार नियोजन की बात करना भी सकोच होता है। परिदार कल्याण/नियोजन विभामों के सम्बन्धित अधिकारी इससे हमेशा स्तम्भित (६०॥८०) रहे हैं । विशेषज्ञों मे लक्ष्य पूर्ति की उम्मीद छोड दो है। सत्य वो यह है कि व्यवहार में देश के पास न तो प्रभावी कार्यक्रम रहा है और न ही लक्ष्य। यजनैतिक दल बड़ी सावधानी से विषय से बचकर चुनाव अभियान में इस विषय पर बोलते तक नहीं। एक बार जो विषय उच्च नाटकीय राजनैतिक प्रकरण हुआ करता था अब मात्र निषेध (3900) बन कर रह गया है। 977 में परिवार नियोजन दो 'रिणाय कल्याण' नाम दिया गया और परिवार कल्याण के सभी पक्ों को लेत हुए <«णा से परे, लियो के शिक्षा स्तर को सुधारने के कार्य सहित विषय इसमें सम्मिलित किए गए। परिवार नियोजन जागरण मुहिम में भारत सरकार ने 'पह्ा बच्चा अभी नहीं' के यू एनईपी (भा?) के दिशा निर्देशन पर प्रत्येक अगले बच्चे के जनम में फासलों की मुहिम को चलाया। परिवार नियोजन के तरीकों में बन्ध्यकरण, लूप, गर्भ निशेघक गोली (90, निवर्तम है अवाक, | लय (गा्ञापा), शो (5४०७॥) और डायाफ्राम (000[079ग) आदि हैं। कष्डोम और गोलियाँ उच्च सामाजिक आर्थिक समूहों में अधिक प्रचलित 28% है,मध्यमवर्गाय समूह में निवर्दन (१४॥॥072%०/) विधि तथा कण्डोम प्रचलित हैं, और निम्न सामाजिक स्व में बन्ध्यकाण को प्राथमिकता दी जाती है। सामाजिक रूप से सम्पन लोगों में परिवार नियोजन आपरेशन अधिक प्रचलित नहीं है क्योंकि इस समूह के लोग जन्म निफरण के अन्य तरीके भी अपनाते हैं। काफी सख्या में लिया एक से अधिक तरीके अपनाती हैं जो कि परिस्थितियों, उपलब्धदा तथा समय पए मनशस्थिति कैसी है, इस बात पर निर्भर कज़ा है। अपाये गए उपाय (वा #0०फ८०) 9 में अधिकारिक रूप से चलाए गए लगभग 50 परिवार नियोजन क्लिनिक प्रधम पचवरषीय योजना (95.56) के बीच स्थापित किए गए। तब से सामुदायिक स्वास्थ्य केद्रों के एक जाल, प्राधमिक स्वास्थ्य केद्रों और उप केद्रों का जाल, पूर्व सरकारी सहायता से एज राजकारों के माध्यम से परिवार नियोजन कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु बनाया गया है। बडी सख्या में केन्द्र व उपकेद्ध प्रामीण क्षेत्रों में भी प्रत्येक पव वर्ष योजना में स्थापित किए गए है। 958 में देश में लगभग 5 लाख उप केन्र,25,000 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्र तथा 2500 सामुदायिक स्वास्थ्य केद्ध थे। परिवार नियोजन के विभिनल वरीकों में से सरकार अब तक 'शिविर दृष्टिकोण' पर अधिक निर्भर रही है जो कि जिला अधिकारियों पर अधिक निर्भर रहे जो अपने अभिकारी 'पर बन्ध्यकरण अभियान के लिए (अधिकतर पुरुष बन्ध्यकरण) दवाब डाल सकें! सरकार ने विधिल राज्यों और जिलों के लिए लक्ष्य विर्धारित किए ओर उठ्ें प्राप्त कले के लिए अधिक प्रतोधन व विश्वास में लेकर कार्य सम्पल काने के लिए उपाय किए। लक्ष्य प्राप्ति दर 000%) 3976-7 में देखो गई जबकि अला अलग वर्षों में बन्ध्यकरण 368 जनसख्या गतिकी लक्ष्य प्राप्ति की दर 40 से 65 प्रतिशत के बीच रही। 976-77 की सर्वोच्च उपलब्धि दर को 'सजय अभाव” कहा गया है जो कि दबाव, निर्दयता, भ्रष्टाचार और अतिश्योक्तिपूर्ण उपलब्धि आँकर्डो का परिणाम था। निर्दयदा और बर्बरता के सबसे बुरे शिकार रहे दृरिजन, चपरासी, लिपिक कर्मी, स्कूल अध्यापक, अबोध ग्रामीण, अस्पतालों के मरीज, जेल के बन्दी, तथा फुथ्पाथों पर रहने वाले व्यक्ति। परिवार नियोजन विधि के रूप में इस बर्बरता (विसक्रमण) ने अन्तत 977 में सरकार के पतन का द्वार खोल दिया। परिवार नियोजन कार्यक्रमों में लगे गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र दो विशेष कार्य करते हैं लोगों को सेवाएँ प्रदान करना तथा इन सेवाओं के विषय में सभी लोगों तक सूचना पहुँचाना ताकि लोगों को परिवार नियोजन अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सके। लगभग 5 लाख चिकित्सा एव सह-चिकित्सा कर्मचारी इस कार्यक्रम में लगे हैं। इनके अतिरिक्त लगभग 5 लाख अशकालिक आमोण स्वास्थ्य दिग्दर्शक भी हैं। राष्ट्रीय जनसख्या नीति. (2000) फरवरी 26, 2000 को भारत सरकार ने एक नई नीति को घोषणा की। इसके मुख्य लक्षण निम्न थे 7 आर्थिक और सामाजिक विकास का उद्देश्य लोगों के जीवन स्तर को उठाना, उनके लिए कल्याण सबधी कार्यक्रम बढाना और उन्हें समाज में उत्पादी परिसम्पत्ति (77007८४६ 5525) बनने के अवसर उपलब्ध करना है। अवलम्बनीय ($०४(७0००।८) विव्मस के लिए जनसख्या को स्थिर करना आवश्यक है। ऐसे विकास के लिए सभी व्यक्तियों के लिए प्रजननीय (#07000८॥४४) स्वास्थ्य सबधी देखभाल सुलभ करवाना, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए अवसर बढाना, सफाई, सुरक्षित पीने का पानी व मकान जैसो मूल सुविधाएँ देना, महिलाओं का सशक्तिकरण करना एवं उन्हें काम करते के अवसर प्रदान करना तथा यातामाद व सचार के साधन उपलब्ध करवाना जरुरी है। 2... भारत में जनसख्या में वृद्धि के मूल कारण हैं. प्रजननीय आयु समूह में जनसख्या का बडा आकार, उच्च प्रजनन क्षमता (७709), तथा लडकियों का कम आबु में विवाह। अत राष्ट्रीय जनसख्या नीति के प्रमुख उद्देश्य होंगे गर्भनिरोध, स्वास्थ्य अधघसरचना (79४॥ए८0४७), स्वास्थ्य कार्मिक तथा जननीय स्वास्थ्य देखभाल के लिए एकीकृत सेवा पर अधिक ध्यान देना। इसका मध्य-कालीन लक्ष्य होगा सन्‌ 200 व्रक प्रजनन दर को कम करना। इसका दोर्घ-कालीन लक्ष्य होगा 2045 तक जनसख्या को उस स्वर पर लाना जो अवलम्बीय आर्थिक व सामाजिक विकास के लिए उचित है। 3. उपर्युक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए 4 राष्ट्रीय सामाजिक जनसाख्यकीय लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें 200 तक प्राप्त करना होगा। यह लक्ष्य हैं : (0) मूल प्रजननीय और बाल स्वास्थ्य सेवाएं और अधसरधना सबधी आवश्यकताएँ पूरी करना, (५) 74 वर्ष की आयु तक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करना, (80) शिशु जततंज्या गतिकी 369 मृत्यु दए को प्रति हजार पर 30 से कम करना, (0) मातृ मृत्यु दर को एक लाख पर 00 से कम कण; (३) बच्चों की रोकने योग्य बीमारियों के लिए टीकों द्वारा उन्मुक्त (एग्ाणा5०) कर; (थे) लडकियों का विवाह 20 वर्ष के बाद करमे को प्रोत्साहित करा, (धो) प्रसव (0८॥ए८॥८७) 80 पतिशत सस्थात्मक तरीकों से और 00 प्रतिशत प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा करवाने पर बल देना, (शा) गर्भपात (००॥१४८८०४०७७) के बोरे में पूरो जानकारों उपलब्ध कावाना, (४0 एड्स के बारे में जानकायी देना, (0) प्रेषणशील (००:शाझ०॥॥८०॥५८) बीमारियों पर नियत्रण करना, (४) जननीय और बाल स्वास्थ्य देखभाल में चिकित्सा की एकीकृत व्यवस्था पर बल देता, (४) कुल प्रजनन ध्वमता (पर) स्तर के लिए छोटे परिवार के विचार को प्रोत्साहित करना । झ लक्ष्यों की प्राप्त के लिए निम्न प्रोम्राम को लागू करने पर बल दिया गया है योजना का विकेन्रीकरण, ग्राम स्तर पर सेवाओं की उपलब्धि, महिलाओं का सशक्तिकरण, नं में गद्दी बस्तियों, गावों में जनजातीय समुदायों व किशोरों पर अधिक ध्यान देना, और गैःसलारी सराठनों का सहयोग । जनसख्या नियत्रण का कार्य क्योंकि राज्य सरकारों का है, झतिए मानीटर करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना को जायेगी जिसके चेयरमैन मधानम्री तथा सदस्य सभी राज्यों के मुख्यमत्री, केद्रीय परिवार कल्याण मत्री, गैए्सरकारी सा के प्रतिनिधि, मशहूर जनाकिकी विशेषज्ञ, आदि होंगे। छोटे परिवार के विचार को बढावा देने के लिए निम्न अभिप्रेरणा सबधी उपायों का शव दिया गया है : () अनुकरणीय कार्य के लिए ग्राम पचायतों व जिला परिषदों को पवार देना, (४) दो बच्चों तक लडकी के लिए महिला और शिशु विकास विषाग द्वार 40 रापे नकद प्रोत्साहन देना, (४9 याँवों में पहली सन्‍्तान 9 वर्ष की आयु के उपयान्‍्त 88 के लिए 500 रुपये का पुरस्कार, (४) गरीबी रेखा से नीचे दस्पत्तियों के लिए दो इच्चों बाद बध्यकरण (४(८४॥६०४०॥) के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना लागू करना, (९) गाँवों में बालगुों और बाल सतर्कता केद्र स्थापित करता। इसके अलावा कुछ और उपाय निम्न अपनाये जायेंगे. 6) सुरक्षित गर्भपात के लिए को सशक्त का, (2) रोगीवाहन (अगएआ००) सेवाओं के लिए कर्जा देना, 0) जडकियों के व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए समर्थन देना, (५) 976 के बाल-विवाह प्रीन्‍्य अधिनियम को सख्ती से लागू करा, 5) 2026 तक लोकसभा के लिए सदस्य रेस्या न बढागा। उस प्रगति (ए7087655 #लयांश्स्ट्0) उस प्रदवर्शीय योजना के बाद, अजले आठ पचवर्षीय योजनाओं में इस कार्यक्रम को पता दी गई, लेकिन 968.69 से ही जन्म दर में कमी देखी गई। 96! में जो जम दर | 7 अति हजार थी, 994 में 2877 और 995 में घटकर 25 2 प्रति हजार रह गई। 956 मर 9 के बीच लगभग 3 करोड जन्म-जापान की वर्तमान जनसख्या के बएबर-राल गए (0 मलबे वफ़ात, फििजिए्शए 40, 7997) | 370 जनसंख्या गतिकौ सभी क्षेत्रों में लक्ष्यों वी उपलब्धि खशब नही रही है यद्यपि बन्ध्यकरण कौ सख्या कम हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार (धागर5, 992 93), जो कि स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मत्रालय द्वारा चलाया गया था, 3 वर्ष से 49 वर्ष आयु समूह की भारतीय ख््ियों में से केवल 6 प्रतिशत ही किसी आधुनिक गर्भ निरोध के तरीके का प्रयोग करती हैं। तथापि एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार लगभग आधे दम्पत्ति परिवार नियोजन का अनुसरण नहीं करते यद्यपि 90 प्रतिशत इसके विषय मे जानकारी रखते हैं (7॥6 सादफराद। ग/46, सत्काप्शए 40, 997) । भारत में कण्डोम का प्रयोग इतना कम है कि यह प्रतिवर्ष केवल प्रति दम्पत्ति 6 है। सर्वेक्षण के द्वारा बन्ध्यकरण दर पर दिए गए आकडे (0%)--जो परिवार नियोजन कार्यक्रम का मुख्य आधार है--अविश्वसनीय हैं क्योंकि अधिकतर बन्ध्यकरण 2 या तीन बच्चों के जन्म के बाद अपनाया जाता है। भाख की कुल उर्वस्ता दर अभौ भौ 35 है और यह सर्व विदित है कि यह दर 3 से 2 पर लाना एक कठिन कार्य है और वह अवस्था भारत में अभी शुरु भी नहीं हुईं है (सहाय, 977)। आज यह प्रयास भी इस सौमा तक कम हो गया है कि आशौष बोस, एक सुविज्ञ जनाकिकीयशास््री ने अपने 990 के दशक में भारतीय जनसख्या' विषय पर वक्तव्य में (७ फरवरी 99 में दिल्लो में) कहां कि देश में परिवार नियोजन कार्यक्रम पूरे तर से असफल हो गया है और इसकी सफलता के लिए बिल्कुल नये दृष्टिकोण की आवश्यक है। जनसख्या वृद्धि को रोकने में प्रगति बहुत धीमी गति से हुई है जैसा कि चीन से तुलना करने पर स्पष्ट हो जाता है जिसने गहन परिवार नियोजन कार्यक्रम के माध्यम से 970 से 20 करोड बच्चों के जन्म को रोक दिया है और जननक्षमता दर को अर्ई (०॥8७9/०) माताओं में 582 से कम करके 25 पर ला दिया है (छ्ली जो 5 वर्ष से 49 वर्ष को आयु के बीच उत्पादक वर्षों में औसत सख्या में बच्चों को जन्म देगी (7#८ कशव/848 गींशल, 7एए , 994) । चीन ने शहरी क्षेत्रों में 'एक दम्पत्ति का एक बच्च्चा' का प्रतिमान अपनाया और ग्रामीण क्षेत्रों में एक दम्पत्ति के दो बच्चों के बाद प्रतिबन्ध लगाया तथा नियोजित बच्चे तथा उनके माता पिता के लिए भी प्रोत्साहन दिए। जो इन प्रतिमानों का उल्लघन कतते उन्हें दण्डित किया जाता था। नियोजिव बच्चे को शिक्षा तथा पालन पोषण के लिए 4 वर्ष वी _ आयु तक विशेष भत्ता दिया जाता था तथा उसके माता पिठा को मकान बनाने के लिए भूमि या फार्म के लिए मशीन आदि दी जाती थी। चीन में इस कार्यक्रम का अमुख भाग है, देर से विवाह और देर से बच्चों को जम देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना। भारत में प्रजनन स्वास्थ्य (८ए700एलाए८ ॥८०७४) से सम्बद्ध उपलब्ध तथ्य (9%॥0०४, 4०8०७ 2, 996 5६ सकेत करते हैं कि ० वर्ष भर में कुल गर्भाधानों (८०४८००४०४७) के लगभग 78 प्रतिशत अनियोजित होते हैं और लगभग 25 प्रतिशत निश्चित रूप से अनचाहे होते हैं। हा! ०. भारत में लगभग दीन करोड सरियाँ अच्छी परिवार नियोजन सेवाएँ चाहती हैं क्योंकि वे उपलब्ध सेवाओं/कार्यक्रमों से सन्तुष्ट नहीं हैं। * प्रतिवर्ष होने वाले लगभग 7 करोड गर्भपादों में से 3! प्रतिशत आल (डएणां॥0९005) होते हैं। काप्ख्या गतिकी ञा गर्भ 2 तथा बच्चों को जन्म देने की अवधि में एक लाख से अधिक लियाँ मार जाती हैं! * लापग तीन चौथाई प्रसव घरों में हो होता है और केवल एक तिहाई प्रसव डाक्टर, नर्स या मिडवाइफ के सहयोग से होते हैं। * प्रत्येक 3 बच्चों में से एक बालक एक वर्ष के जीवन काल में ही मर जाता है और प्रत्येक नौ में से एक पाँच वर्ष की आयु तक पहुँचते मर जाय है। शिशु मृत्यु दर (ध्या घराण।आ३) मामीण क्षेत्रों में 52 प्रतिशत है। परिवार नियोजन के प्रति दृष्टिकोण (8॥॥7065 "03 स्थिया। ए/्यापराह) प्रीवार नियोजन का विचार एक औसत भारतीय र्री तक भली-भाँति पहुँचा दिया गया है। परिवार नियोजन के प्रति सिरयों का दृष्टिकोण शिक्षा, आयु, आय पृष्ठभूमि, पति का व्यवसाय, और अन्य कारकों में उसकी प्रस्थिति (कार्य की) आदि हैं। आयु के अर्थ में यह देखा गया है कि जैसे-जैसे आयु समूह में वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे परिवार नियोजन को स्वीकार के वाली ल्ियों का प्रतिशत कम होता जाता है। लेकिन अधिक आयु समूह में भी लगधग दो विदाई स्वीकृति होती है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अधिक सज्या में भारतीय लियाँ आयु की चिन्ता किए बिना भी परिवार नियोजन स्वीकार करती है। 988 में कोठारी और गुलादी (989 7) द्वारा राजस्थान में किए गए सर्वेक्षण में गा गया कि अध्ययन किए गए कुल व्यक्तियों में से 88] प्रतिशत परिवार नियोजन के १ में थे और 9 प्रतिशत विरुद्ध थे। कोठारी (994) ने यह भी देखा कि 993 में गज्स्थान में राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार 3-49 वर्ष आयु समूह की विवाहित द्वियों में 90 प्रतिशत परिवार नियोजन के कुछ तरीके जानती थी, और 762 अविशञत वाच्छित गर्भ निेध प्राप्त करने के खोतों के विषय में जानती थी, यधपि केवल 3 8 अविशत हो वास्तव में उनका प्रयोग कर रही थी। राव तथा इनबराज (280 »ए0 [72] द्वारा तमिलनाडु के वेल्लोर नगर तथा आपात के गांवों में परिवार नियोजन के भ्रति दृष्टिकोण पर एक सर्वेक्षण किया गया था। जल 2,426 व्यक्तियों का साक्षात्कार इस इरादे से किया गया कि वे समझते थे कि बच्चों की फ््या नियंत्रित करना दस्पत्ति के वश में था। लाभग 37 प्रतिशद ने पक्ष में और 4] अदिशद ने नक्मग़त्मक उत्तर दिया (76 /०एकबबाँ | फक्कए ॥2॥8४.. 2-22) | उन &9 व्यक्तियों में से जो इसको सम्भव मानते थे, 466 प्रतिशत इसको परिवार नियोजन से सम्भव पानते थे, 37.5 प्रतिशत स्व नियत्रण के द्वार, जबकि 59 प्रतिशत ने रे निश्चित दरैका नहीं बताया। जब उनसे पूछा गया कि क्‍या वे स्वय परिवार नियोजन के पक्ष में थे, 6३6 अतिशव ने “हाँ” कहा और 25.4 पदिशन मे “ना! कहा | परिवार वियोजन जायें के विरद आक्रमक्ता (80७00) दिखाने के कारणों में थे * यह सलियों के लिए रैनि ब्याक थे, यह परिवार अर्थव्यवस्था के विरूद्ध जाते हैं, यह ईरवर की इच्छा के विरुड प और ये अप्राकृतिक व्यवहार है। परन्तु क्‍योंकि प्रति 0 व्यक्तियों में से 7 परिवार गिपोजन के पक्ष में थे, यह इस तथ्य को प्रकट काता है कि आजकल लोगों ने अपने 372 जनसख्या यविको विश्वासों में तथा मूल्यों में कम परम्परागत होना शुरु कर दिया है। राष्ट्रीय सामुदायिक विकास सस्थान द्वारा 6 राज्यों के 43 जिलो के 365 गार्वों के 4,224 उत्तरदाताओं पर किया गया अध्ययन दर्शाता है कि 5 6 प्रतिशत परिवार नियोजन के पक्ष में थे और 237 प्रतिशत परिदार प्रतिपक्ष में थे (8७॥2६प७008 700 शक्पक्का जाए, प्र 7त्प्रयव्र। ण॒ क्‍क्कापरए ४) हमारे समाज के गरोब वर्ग में क्योंकि अशिक्षा व्याप्त है, अत यह देखा गया है कि निम्नतर में कम शिक्षित ल्लियों पश्वार नियोजन विधियों अपनाने में अधिक उत्साहहीन (४०८०० होती है। वे सोचती हैं कि क्योंकि उनके पास धन नहीं है अत उनके बच्चों की आय ही उनके जीवन आशा होदो हैं। औसत भारतीय निर्धन दम्पत्ति दो या तीन से कम बच्चों से सन्तुष्ट नहीं होते। यह तथ्य समय समय पर किये गये अध्ययनों से उजागर होता है। लगभग एक दशक पूर्व एक बहुत बडे सर्वेक्षण से, जो कि 32,000 उत्तरदाताओं पर स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मत्रालय द्वाय प्रोयाजित कराया गया था, यह निष्कर्ष निकला कि अधिकतर दम्पत्ति न केवल दो या तीन बच्चे चाहते थे बल्कि वे यह भी चाहते थे कि उनमें से दो पुत्र हों (चार मशवीफाब। वफ्राट5, ि०६८णो2टा 5, 987) । सन्‌ 997 में 'जनसख्या के विषय में भारदोय युवा वर्ग का सामाजीकरण” पर एक सर्वेक्षण परिवार नियोजन फाउस्डेशन, दिल्ली द्वाग आपरेशन रिसर्च ग्रुप दिल्ली के सहयोग से किया गया था। इस सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा ओर दिल्ली के 22 जिलों के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के 25 स्कूलों से चयनित 7, 785 लडके व लड़कियों के दृष्टिकोण का अध्ययन किया गया। उत्तरदादाओं की एक बडो सख्या दो बच्चों वाले परिवार की पक्षपर थी। जब 90 प्रतिशत उत्तरदाा एक पुत्र और एक पुत्री को अच्छा मानते थे, वही 73 प्रतिशत उत्तरदाता बच्चों में लिंग को कोई महत्व नहीं देता चाहते थे। अधिकाश उत्तरदाता 22 वर्ष से कम की आयु विवाह के लिए सही आयु नही मानते थे। उनमें से काफी सख्या में उत्तरदाताओं को गर्भ निरोध विधियों का थोडा सा ही ज्ञान था। उनमें से अधिकाश ने यह ज्ञान टीवी देखकर प्राप्त किया था। (77९ मलाबाब्ा गीकछ, गए 45, 992) । 992 में राजस्थान में उदयपुर के जनसख्या अनुसन्धान केन्द्र द्वारा एक सर्वेक्षण किया गया था जिसमें 5,2। सर्तियों का (09 शहरी क्षेत्रों से, और 492 मामीण क्षेत्रों से) जो 3-39 वर्ष आयु समूह से 27 जिलों से थी, साक्षात्कार किया गया। सर्वेक्षण से पता लगा कि हाल ही में विवाहित स्त्रियों में से ७058) शहरी क्षेत्रों में 99 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 84 प्रतिशत रिियों का आधुनिक परिवार नियोजन की विधियों में से कम से कम एक का ज्ञान था (अर्थात बन्ध्यकरण, कण्डोम, गोली, [000 और इन्जैक्शन) जो कि मासिक पर्म बचाव व निकास जैसे परम्पणगत तरीकों से भिन्‍न थे (वही . 82) जहाँ तक उनके पतियों का सम्बन्ध है, 2,433 गरामोण पतियों में से 57 प्रतिशत परिवार नियोजन को स्वोकृति देते थे, 6.8 प्रतिशत अस्वीकार करते थे और 264 प्रतिशत अनिश्विव थे। शहरी पतियों में 74.9 प्रतिशत इसे स्वीकार करते थे, 9 4 प्रतिशत अस्वीकार, और 5.7 प्रतिशत अनिश्चित चे। जिन स्त्रियों पर सर्वेक्षण किया गया उनमें से 277 प्रतिशव (बन्ध्यकरण पुरुषों की जनसंख्या गतिकी 373 लिया या पलियों) मे बन्ध्यकरण कराया था। 2035 89%) स्त्रियों ने परिवार नियोजन के किग्नी भी तर्ेके के प्रयोग न करने के कारण (वहा 03) बताए. बच्चे चाहती थी 97%), बेय या बेटों चाहती थी (29%), सह प्रभावों की चिन्ता ( 3%), ज्ञान का अभाव 67%), बन्ध्यकरण का डर (3 %9), धर्म विरुद्ध ( 4%), परिवार नियोजन के विरद्ध 8%), पति द्वारा विरोध 57%) या ससुराल वालों का विरोध (0 7%), स्वास्थ्य अनुमदि नहीं देता 02%), असुविधा (0.4%), और मासिक धर्म में रकावट (0 7%)। साक्षात्कार की गई 3,027 रियों में से (2433 आमीण और 594 शहरी) (उनको शेडकर जो स्वयं या उनके पति बन्ध्या करवा चुके थे) 755 प्रतिशत परिवार नियोजन के पृ में थे, जबकि 23 4 प्रतिशत ने कोई विशेष रूझान नहीं दर्शाया (वही 0)। इनमें से 505 अरतिशव हाल ही में विवाहित स्त्रियाँ किसी न किसी प्रकार को गर्भ निरोध विधि का अयोग कर रही थी (वही : 86) कार्यक्रम का मूल्याकन (ए९एब्रांणा 0 6 ?7087शगर) मेरे हर पर भारत में नौकरशाह यह तर्क देकर जनवा को गुमराह कर रहे हैं कि क्योंकि झा अशेधित (७००७) जन्म दर (८82) 960 में 42 प्रतिहजार से घटकर 996 में पतिजार 25 हो गई हैं, अत परिवार नियोजन बिल्कुल सफल रहा है। लेकिन यह दावा प्रामक है। किसी विकासशील देश के लिए इतना ही काफ़ी नहीं है कि इसका अशोधित जेस दए घट गया है। महत्त्वपूर्ण है कमी ((८०॥४०) की दर। थाइलैण्ड का सौबीआर /960 में 44 प्रति हजार से घटकर 996 में 7 प्रति हजार रह गया, जबकि भारत में इसी अवधि में सीबोआर 42 से 25 तक ही हुआ। थाइलैण्ड ने गर्भनिरोधक प्रचलन दर ((००३०९)॥४७ ९९९2 0०८ ए०९, हक ५ 75 प्रतिशत से अधिक प्राप्त कर ली है जबके भारत में यह केवल 43 प्रतिशत हो है, और यहा पुत्र परिवार नियोजन के अधिकतर कर्क्रम (मरे सीप्ी आर 43% में से 30% हो) तीन या अधिक बच्चों के जन्म के बाद हो ऊपनाए जाते हैं। 3-49 वर्ष आयु समूह को केवल 6 प्रतिशत स्त्रियों ही किसी न किसी आपुनिक गर्भ निशोध विधि का प्रयोग करती हैं। जनसंख्या नियत्रण 95। में प्रारम्म होने के समय से ही शत प्रतिशत केद्ध प्रयोगित कर्म रह है। जनसख्या नियत्रण पर व्यय वर्षों से बढ़ता जा रहा है। प्रथम पचवर्षीय पेजन अवधि (95.56) में 4 लाख रुपये के बजट से यह बढ़कर आठवी पंचवर्षीय पेज (92:97) अवधि में 6500 करोड रुपया हो गया। प्रतिशत में यह नियत घनपशि | प्षेत्र में नियत राशि का केवल 5 प्रतिशत है । प्रश्न है जनसख्या नियत्रण बेर सवा का ही उत्तरदायित्व क्यों हो ? राज्य इस व्यय में भागीदारी क्‍यों न करें ? क्या वृद्धि पर नियत्रण से उ्हें लाभ न होगा ? फिर भी, राज्य सहकोरें प्रारम्भिक शिक्षा, साय केद्रों आदि जैसे कार्यक्रमों पर अधिक धन व्यय करती हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से हमाज्या वृद्धि गेकने में योगदान करती हैं। लेकिन राज्य सरकों भी इन योजनाओं पर जिस्प ओर शिक्षा को) किस प्रकार खर्च करती हैं ? एक उदाहरण इसको समझे में *दयक हेगा। गांव के एक उप स्वास्थ्य केद्र में पुस्ष (ध7ए-५) और सी (जाएफपर ५ #00॥) कार्यकर्ता होते हैं। एएचएस (&)४॥५७) का वेद परिवार कल्याण कार्यक्रम के उ74 जनतसख्या गतिकी अन्तर्गत केद्ध सरकार के अनुदान से वहन किये जाते हैं जबकि पुरुषकार्यकर्ताओं के वेतन स्वास्थ्य बजट में से राज्य सरकारें वहन करती हैं। परिणामद ग़ज्य सझ्कोरें स्री कार्यकर्ताओं के सभी पद भर देती हैं परन्तु पुरुष कार्यकर्ताओं के सभी पद रिक्त पडे रहते हैं क्योंकि बहाना यह शेता है कि कम खर्च के उपायों के कारण ऐसा करना पडता है। उदाहएण के लिए उत्तर प्रदेश और असम में एक भी पुरुष कार्यकर्ता नही है, यद्यपि मानक (०9) के अनुसार ठत्तर प्रदेश में 20,000 पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता तथा असम में 5000 पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता हेने चाहिए। इन दोनों ग़ज्यों में एएनएम (8४४5) का एक भी पद रिक्त नही है (786 माब5/48 7/॥25, एथएथा७ 27, 996) । जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केद्दों और सी एच सी (८8८७) को ग़ज्य बजट से चलाया जाना चाहिए लेकिन वास्तव में वे परिवार कल्याण केन्द्र कार्यक्रम के अन्तर्गत केन्द्र सरकार द्वारा 500 करोड रुपये लगभग के अनुदान से चलाए जाते हैं। तब केन्र सरकार राज्य सरकार के साथ समान मूल्य हिस्सेदारी के आधार पर वित्तीय प्रतिबद्धता की सक्रिय भागीदारी से परिवार नियोजन कार्यक्रम को पुनजीर्विन एवं पुनरुद्धार का कार्य क्‍यों नहीं करती ? यह समय है कि ग़ज्य सरकारें अपना दृष्टिकोण जितना प्राप्त कर सकते हो करो” की अपेक्षा 'जितना कर सकते हो क्ये' का बनाए, यदि परिवार नियोजन के कार्यक्रम वो एक सफल कार्यक्रम बनाना है। भारत में परिवार नियोजन का कार्यक्रम शिथिल हो गया है। वास्तव में, यह कार्यक्रम पीछे की ओर जा रहा है। क्‍योंकि 94] में 8 बच्चे प्रति मिनट तथा 97] के 2। बच्चे प्रति मिनट की तुलना में आज (2000 में) हम 30 बच्चे पैदा कर रहे हैं। यह स्थिरता निश्वय ही 952 से किए जा रहे प्रयलों को समाप्त करने के लिए बाध्यवा है। यह जब सत्य है कि दम्पत्ति सुरक्षा प्रतिशत लपातार 97 में 0 4 से 998 में 4396 तक ऊँची उठी है,फिंर भी यह पूछा जाना चाहिए कि ये दम्पत्ति कौन हैं जिनको सरश्षण प्राप्त है ? ये वही दम्पत्ति हैं जिनके दो या तीन बच्चे हो चुके हैं और जिन्होंने दो बच्चों के परिवार के मानक को पहले से ही हानि पहुँचा रखी है। जो भ्रश्न पूछा जाता है वह है यदि देश में जन्म 6 बिन्दु दक कम होने में 28 वर्ष लगे (970 में 368 से 998 में 25 2) तब 200। तक 27 त्रति हजार के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए 77 बिन्दु की गिरावट लाने में क्तिने वर्ष लगेंगे ? स्वास्थ्य मत्रालय की अधिकारिक गणनाएँ बताती हैं कि ठच्च प्रजनन स्तर वाले चार राज्यों--5त्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान को बीडा उठाना है। इन चार राज्यों में हो देश वी 40 प्रतिशत जनमख्या है। इन चार राज्यों में जन्म दर 995 में ग्टीय औसत 252 प्रति हजार से कही अधिक थी (उत्तर प्रदेश में जन्म दर 35 4, मध्य प्रदेश में 32.8, राजस्थान में 337 और बिहार में 325 थी (0:/0०८ 208०४ 2, 996 , 56) इन चार राज्यों में जब जनसख्या वृद्धि दर 338 प्रदि हजार 995 में) है, वही आय्यर प्रदेश, तमिलनाडू, केरल, और कर्नाटक दक्षिण भारत के चाए राज्यों में यह दर केवल 336 है। आश्चर्य तो यह है कि इन चार राज्यों के लिए निर्धारित बन्ध्यक्रण लक्ष्य उनके यहा वी जनसख्या की अपेक्षाओं से कही कम हैं। जब तक ये चार राज्य अपना क्रियान्वयन स्वर नहीं सुधोरेंगे तव तक जनसख्या ऐेकने वी समस्या देश के लिए विकट बनी रहेगी। विभिन्‍न अध्ययनों से यह तथ्य उद्घाटिव होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक जमप्र्या गदिकी 35 ़ाप्य केद्रों को सेवाओं का लाभ पूर्णरूपेण नहीं उठाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और ग़जस्थान जैसे साज्यों में जहां यह प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट है, इनका उपयोग केवल 5 प्रतिशत तक ही है। असख्य अध्ययनों ने यह सकेत किया है कि गाँवों मे केवल प्रीडिया ही है जो लोगों के प्रश्नों का तुरन्त उत्तर दे देता है और परिवार नियोजन में सहायक हो सकता है। ब्लॉक विस्तार एव स्वास्थ्य सहायकों को ही यह भूमिका दो गई है लेकिन अर्न॑वैयक्तिक सवाद बहुत महत्त्पूर्ण होता है। परिवार नियोजन प्रचार का कया तगीका व क्या उद्देश्य होने चाहिए ? एक महत्वपूर्ण सुझाव है कि हमारे नोरे होने चाहिए 'तीसरा बच्चा कभी नहीं, 35 वर्ष की आयु के बाद बोई बच्चा नहीं । यह दो विकल्प हैं जो कि पूर्णरूपेण दम्पत्ति के नियत्रण में है। जीवन स्तर सुधार, अच्छी शिक्षा प्रदान करना, दो बच्चो के स्वास्थ्य की गारन्टी और ख्तरियों/माताओं के खाप््य के लिए अच्छी सेवाएं उपलब्ध कय्नने के साथ जुडा हुआ इस प्रकार का प्रचार देवियों की ऐसी मानसिकता बना देगा जिससे वे स्वय इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उत्सुक होंगे। घर का अलोभन एक अच्छा प्रोत्साहन कारक मही हो सकता। धन प्रेरक के लिए प्रेह्माहर हो सकता है ताकि वे अभियान के दौरान दम्पत्ियों को प्रेरित कर सकें लेकिन उस जक्ति के लिए नही जो बन्ध्याकरण कराने जा रहा है। कुछ विद्वान आगे आने वाले समय में जनसख्या विस्फोट रोकने के लिए आशावादी रेबाचितर (00८४) प्छुव करते हैं। एक बिन्दु यह रखा जाता है कि हमारे देश में ऐसे अनेक ससाधन रे जिनका दोहन नहीं हुआ है। यदि उनका सही विकास किया जाये तो जनसंख्या की तौन गुणा अधिक जनसख्या का जीवन चलाया जा सकता है। दूसरा बिनु यह है कि औद्योगिक विकास, आर्थिक विकास और निर्यात में वृद्धि से गरीबी, बेगेजगारी और बढ़ती जनसंख्या से निपटा जा सकता है। ये दोनों ही विचार थोथे और वर्हीन हैं। किसी भी देश के लिए वे साधन और सेवाए जो उपलब्ध हैं, न कि जो सम्मावित वे है लापदायिक हैं क्योंकि वे जनसख्या की आवश्यकताओं को पूण कर सकेगें। जब वर्षा में केंद्र तथा राज्यों में राजनैतिक अस्थिसता हो, जब राजनैतिक दल सामुदायिक की अपेक्षा सत्ता हथियाने और उसे बनाए रखने की होड में हों, जब जातिवाद, फैवाद, प्रा्यवाद, भाषावाद बढ रहा हो, तब इन सबके चलते हम अपने सत्ता में अभिजात वर से यह अपेक्षा कैसे कर सकते है कि वे विकास और आधुनिकौकरण औएया उन परापनों का दोहन को जिनका अभी तक दोहन नहीं हो सका है। ागीमाथन समिति (६९ (०एए्ा॥६0 लिफोनाथन समिति द्वार अस्तुव नौति पत्रक में नीति के क्रियान्चयन के लिए कुछ सरचनात्मक परेर्टर तया स्वास्थ्य के लिए समष्टिगत (#०॥50८) दृष्टिकोण बताया गया है। इस समिति ईए मुन्नाए गए कुछ महत्त्वपूर्ण उपाय इस प्रकार हैं 6) 2000 तक 2] की कुल जननशक्ति सक्ष्य को आ्राप्त करके जनसख्या स्थिर करना। (2) दीव्र और न्यूनतम आवश्यकता कि १७३ लागू करना। 6) पचायतों, नगरपालिकाओं और राज्यों कौ विधायिवाओं के माष्पम कि ऊर्ष्याकार ((८:॥८४९४) सरचित पतिवार कल्याण कार्यक्रम के स्थान पर , लोकद्वाज़िक नियोजन लागू करना। ७) जननशक्ति दर के राष्ट्रीय औसत उपलब्धि 376 जनसख्या गविकी के लक्ष्य को छोडकर केद्धोय व राज्य सरकारों द्वार विशेष गर्भ निरेेध विधियों के प्रयोग के लिए क्क्ष्य निश्चित करने का विचार त्यागना। 6) गर्भ निरोध विधि प्रयोगकर्ताओं और उनके प्रेरकों को नकद या वस्तु के रूप में दिया जाने वाला प्रोत्साहन समाप्त कर दिया जाये। इसके ब॒जास सरकार और अन्तर्यष्टीय दानदाता एजेन्सियों से उपलब्ध होने वाली धन राशि से जनसख्या एव सामाजिक विकास कोष स्थापित किया जाये। यह कोष गाँव, कस्बे, जिला, और राज्य स्तर के सामाजिक जनाकिकी आवश्यकताओं के उपभोग में फासले को दूर करने के काम में लगाया जाये। () देश को जनसख्या नीति को नियोजित, क्रियान्वित तथा सचालिद करने के लिए एक राज्य जनसख्या एबं सामाजिक विकास आयोग की नियुक्ति करना। पीएसडी सी (75700) की उप-समितियाँ भी राज्य, जनपद तथा पचायत्र स्तर पर बनाई जायें जिनमे विभिन्न राजनैतिक दलों, व्यवसायों में से जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि हों तथा गैर सरकारी सगठनों, महिलाओ तथा युवा सगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हों। 6) इस समय परिवार नियोजन केवल खियों की जिम्मेदारी बन कर रह गया है, स्पष्ट रूप से आवश्यकता इस बात की है कि परिवार सोमित करने की सम्पूर्ण जिम्मेदारी को खतियों पर रखने की प्रवृत्ति को रोका जाये। राष्ट्रीय जनमख्या नीति के एक आवश्यक भाग को जनसख्या कल्याण के भैत में बनाने के लिए समिति द्वारा बनाए गए कुछ सामाजिक-आर्थिक तथा चिकित्सा सम्बन्धी उद्देश्य इस प्रकार थे () लडकियों के विवाह के लिए 8 वर्ष से कम आयु की सख्या को शून्य करना, (2) प्रशिक्षित कर्मियों द्वार कराये जाने वाले प्रसवों (8८॥५८०८७) के प्रतिशव को बढ़ाकर 00 प्रतिशत किया जाना, 6) जच्चा-बच्चा मृत्यु दर को घटाना, (4) क्षय रोग, पोलियो, डिप्थीरिया, काली खाँसी, टिटनेस, और खसरा के विरुद्ध बच्चों का सार्वजनिक मुक्तिकरण (॥रशशा॥52007), 5) सभी के लिए आथमिक स्वास्थ्य देखभाल ऊा प्रावधान, (6) जन्म सीमित करने को विधियों पर व्यक्तियों को सूचना ताकि उन्हें अपने परिवार नियोजित कलेने में पूर्ण इच्छा से नियोजन करने का अवसर मिले, (7) सार्वभौमिक आधार पर अच्छी गुणवत्ता वाली गर्भ निरोध सेवाएं उपलब्ध कराया जाना, (8) प्राथमिक शिक्षा का सार्व भौमीकरण हु अनेक विद्वानों ने इस समिति की सिफारिशों की आलोचना की है और सुझाव दिया है कि उन्हें बिल्कुल अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। उनके मुख तर्क हैं. () पिपोर्ट में गहन विश्लेषण, औचित्य और तीव्रत्म का अभाव है। सुझाया गया दृष्टिकोण विशुद्ध रूप से प्रबन्धात्मक (पा87०४००») है और सुझाए गए कदम पूर्व के असफल इन सूत्रों की पुनरावृत्ति मात्र हैं, कि “विकास सबसे अच्छा गर्भ निरोध हैं!” (2) न्यूनवम आवश्यकताओं और जनसख्या नियत्रण का कोई सम्बन्ध नही है। वे सभी लक्ष्य जो तमाम राजनैतिक दायदों के साथ विभिन आम चुनावों और पचवर्षीय योजनाओं के बावजूद गत दशकों में प्राप्त न किए जा सके, 200 तक तथा आगे भी किस प्रकार पूर्ण हो सकेंगे जबकि हमाये जनसंख्या ने (अवर्‌बर 2000 में) 00 करोड का चिन्ह पहले ही पार कर लिया है जिसमें से लगभग 37 करोड लोग अभी भी गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीने के लिए मजबूर हैं ? 8) राजनीति से प्रेरित जनसंख्या आयोग अप्रभावी रहेगा। () समिति ने उन लोगों के लिए कोई हतोत्साहन नहीं रखा जिन्होंने परिवार नियोजन प्रतिमानों का उल्लघन किया। करुणाकरण जक्ख्या गतिको ६7४॥ समिति ने हतोत्साहनों को शुरु करने का प्रस्ताव रखा है-भले हो प्रचलित न हो--ताकि परिवार नियोजन कार्यक्रम अधिक प्रभावी तथा तेज गति से कार्य करे। ऐसा एक कार्यक्रम ग़जस्याव सरकार द्वाा चलाया गया था जिसके अनुसार कोई भी व्यक्ति जिसके तोन बच्चों परे अधिक बच्चे हों चुनाव नही लड सकता। परन्तु यह कार्यक्रम केवल काजों में ही है। इसको अभी भी व्यवहार में लाया जाना है। महाराष्ट्र मे भी जुलाई 2000 में इसी प्रकार का कार्यक्रम सुझाया है। (5) रिपोर्ट यह नहीं स्पष्ट करती कि हम तेज गति बढने चाली जनसख्या के क्‍यों गेक नही सके, यद्यपि 95 से ही अबोध रूप से भारत में जनसख्या कार्यक्रम चल रे हैं। क्या यह असफलता प्रशासनिक व्यवस्था में कमी के कारण हुई या गलत नीतियों के काए या दोषपूर्ण क्रियान्वयन के कारण ? यह मौलिक प्रश्न है जिसकी एिपोर्ट में उपेक्षा की गई है। इस विश्लेषण के बिना रिपोर्ट में अस्तुत सरचनात्मक परिवर्तन अप्रासागिक हो सकते 60) भाज़ में जनसंख्या नियत्रण करने की राह में सबसे बड़ी बाघा है राजनैतिक उदासीनता, लेकिन समिति ने इस पश्च को कोई महत्व नहीं दिया। राजनैतिक नेताओं के कानूनी उपायों को लागू कले में साहसी होना है जो विषय की तीव्रता और आवश्यकता को उद्घाटित कर सकें। उन लोगों के लिए कुछ हत्ोत्साहन (0/97००॥0५८७) जो दो बच्चों के परिवार के प्रत्मिमान को नहीं मानते, इस प्रकार हो सकते हैं « प्रोलति न देना, किसी चुनाव वाले पद के लिए अयोग्य प्रानना, आरक्षण लाभ न देना, बेंक ऋण मना करना, आदि | इनको कानूनी तौर पर लागू किया जा सकता है। जससस्या विस्फोट नियंत्रण के लिए सुझाए गए उपाय ॥ इ8ण8९७४९७ (० (०त्राए० एतकुणेग्रांएण छकु[०७०7) मोर देश में लगातार विस्फोटक स्थिति कौ जनसख्या के लिए आत्म मथन की आवश्यकता । सरकार को समस्या के विस्तार का आभास है और सरकार सोचती है कि गद्न और शक के सामने यह सबसे बड़ी चुनौतों है। लेकिन परिवार नियोजन के क्षेत्र में निश्चित किए गए लक्ष्यों को प्राप्त करे के लिए गम्भीर कदम उठाने में 976-77 के सरकार के अुष्वव ने आगे आने वाली सभी सरकारों को अति सतर्क बना दिया। फिर भो, अभी भो कार्य केले के लिए समय है। जनसख्या वृद्धि रोकने के लिए निम्नलिखित कार्यक्रमों को के के सुझाव दिये जा सकते हैं : आलाहन कया हतोलाइन सिट्शाबाछ ए ३ 4फाट्शाधाठ5) दे बच्चें। के परिवाए प्रोतमान को अपनाने के लिये दर्पातियों को कुछ प्रोत्साहन देंने की बह के अन्तर्गत पहचाने गए प्रोत्साहन हैं : नकद पुरस्काए'प्रोलति/वेतन वृद्धि और विशेष पे, सेवा निवृत्ति की आयु में वृद्धि, दो बच्चों के लिए शिक्षा भा, आवाप्त ऋण के लिए पेगेयता व्यवहार, यातायात के साधनों की खतेद, तथा दो बच्चों तक चिकित्सा व्यय की (स्नंगरापधाइध्णा८०) एवं मुफ़्त चिकित्सा। दो बच्चों के परिवार प्रतिमात का उल्तपन के वालों को उकृत प्रोत्साहन न देना होत्साहन होगा। जनसख्या नोवि के पेज में कुछ विचारों द्वात एक महत्वपूर्ण प्रश्य उठाया गया है--सहयोग बनाम दबाव, 378 जनसख्या गतिकी या प्रोत्साहन बनाम हतोत्साहन, या केरल अ्तिररूप (8000) बनाम चीनी प्रतिरूप ? कुछ विचारक सहयोग के समर्थक हैं तो कुछ अन्य दबाव के । एक भारतीय प्रोफेसर (अमर्त्य सेव, नोबेले पुरस्कार से पुरस्कृत, अब अमैका के निवासी) ने अगस्त 995 में दिल्ली में सम्पन हुए प्रतिष्ठित जे आएड़ी टाय मैमोरियल भाषण श्रखला में 'जनसख्या स्थिरैकरण कार्यक्रम विषय पर बोलते हुए 'सहयोग' के दृष्टिकोण का पक्ष लिया और कन्डोरसेट (फ्रास के) वथा माल्यस (ब्रिटेन के) के दो प्रसिद्ध सिद्धान्तों में दबाव के प्रयोग को भर्त्सना कौ। उन्होंने कन्डोरसेट (८०४००७०) के उप्त दृष्टिकोण को स्वीकारा जिसमें जनसख्या की समस्या वा “विवेक को प्रगति' पर आधारित छोटे आकार के परिवार के प्रतिमान के उदय की बात कही गई है। कन्डोरेसेट का विश्वास था कि ख्री शिक्षा लोगों को स्वेच्छा से छोटे परिवार पर विचार कलेे में प्रेरित करेगी और उत्पादकदा दर में भी कमी लाएगी। परन्तु माल्थस ने “परिवार नियोजन के स्वेच्छा से स्वीकार' के विचार पर सन्देह जताया है। उसके विचार से कुछ सकारात्मक प्रतिबन्ध (080४८ ८४८८७) जैसे आधिक दाख्िय (फ्याण)) भथवा मृत्यु दर में वृद्धि लोगों को जनसख्या वृद्धि दर में कमी करने के लिए बाध्य (००८००) करेंगे। सेन ने कन्डोरसेट के “सहयोग” (८७०७८:६७०४) के रास्ने को ही निसन्‍्देह सही माना और माल्यस के “दबाव' (००८7८०7) के रास्ते को अवाच्छनीय और जनसंख्या रोकने में प्रतिकूल प्रभाव वाला बताया । उसने अपने दृष्टिकोण के समर्थन में केरल का उदाहरण दिया (यही विचार उसकी पुस्तक “इण्डिया इकौनोमिक डेवलपमेण्ट एण्ड सोशल अपोर्चुनियी” में भी दिया गया है) और 'जनसख्यात्मक परिवर्तन को केरल परिकल्पना' नामक परिकल्पना का विकास किया। इस परिकल्पना में उन्होंने साक्षरता में वृद्धि और अच्छी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल जनसख्या वृद्धि नियत्रण के दो महत्वपूर्ण कारक बताए हैं। लेकिन अपनी परिकल्पना का समर्थन करते समय ऐसा मालूम पडता है कि सेन ने केरल के सम्बन्ध में कुछ आँकडों को उपेक्षा की है। 94]-97 के बीच केरल में साक्षरता की दर में वृद्धि हुई थी, फिर भो जनसख्या वृद्धि दर (90908009 87०! 78०) (20]२) भी इस अवधि में बढी (208% मे 23% प्रतिवर्ष)! केवल 97-8 और 4987-9 के दशकों में ही राज्य की पीजी आर में कमी पजीकृत को गयी। इसलिए केरल परिकल्पना को वैध केसे माना जा सकता है ? केरल परिकल्पना में एक कमी और है, वह यह है कि 99 जनगणना रिपोर्ट के अनुसार केरल की कुल साक्षरता दर 89 8। प्रतिशत और ख्री साक्षरता 86 3 प्रतिशत थी (0४दफू0#6 7०8, 72०/7, ० ० 42) फिर इस 'लगभग कुल साक्षरता” के बावजूद मुसलमानों की जनसख्या (जी केरल की कुल जनसख्या के एक चौथाई भाग है) वृद्धि दर 23 प्तिशत प्रतिवर्ष है जो कि 27 प्रतिशत के राष्ट्रीय पीजी आर से भी कही अधिक है और स्वय केरल के हिन्दुओं के पीजी आर से दो गुनी है। इस प्रकार के तथ्यों की उपेक्षा परिकल्पना की अमान्य हो बनाती है । केरल मॉइल के विपरीत जनसख्या नियत्रण के लिए चीन का मॉडल है जो दबाव में विश्वास रखता है। हमारे देश की जनसख्या की भयावह स्थिति को देखकर विचारकों ने इस दबाव के मॉडल को जनसख्या समस्या का एक मात्र हल मानते हुए इसका समर्थन किया है। थे विचारक यह सकेत भी देते हैं कि स्वार्थ भरे राजनैतिक हित देश के नुकसान पहुंचाने के काव्रस्वा गतिकों 379 लिए विविध वोट बैंकों के जनसख्या वृद्धि दर को प्रोत्साहित कर रहे हैं। कुछ विचारक भारत के जनसख्या वृद्धि को रोकने के लिए 'सहयोग' और “दबाव' के तथा 'प्रोत्साहन' और 'होल्माइन' के समन्वय की बात करते है, लेकिन 'होत्साहन' की प्रकृति को पहचान अभी हक हीं की गई है। क्या दो बच्चों से अधिक परिवार वाले लोगों को आरक्षण के लाभ से बषित रखना हतोत्साहन होगा ? क्या प्रवेश, प्रोन्नति, वोट देने के अधिकार या चुनाव लड़ने के अधिकार से वचित करना हतोत्साहन' होगा ? क्‍या इस प्रकार के निषेध मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होगा ? भारत में विद्यमान सामाजिक-राजनैतिक स्थिति में होल्नाहनों के क्रियान्वयन के लिए रूप रेखा बनाना, विशेष रूप से, जब केद्ध में साझा सुखार बनने के लिए 'सामाजिक न्याय और आरक्षण मुद्दे' पर तेरह से बीस राजनैतिक दल गठवधन बनाएं, सरल नहीं होगा। छ्ख्डो जिठ) और पत्रों में विभाजन (कक 0 2026 ढाव #ए०ा5) बजजैद में ऑपरेशन रिसर्च म्ुप के दो जनसख्या विशेषज्ञों द्वाय फरवरी 990 में किये गए जाय देशति हैं कि समस्या को किस प्रकार हल किया जाये। उत्पादकता सरूप (५००) के आपार पर उन्होंने देश के 350 जिलों (७807०) को 6 खण्डों (जोन्स) तथा 4 थे में विभाजित किया। उन्होंने उन जोन और क्षेत्रों की पहचान को है जो उर्वस्ता दर पर भरता नियोजन के सकारात्मक अभाव दर्शाते हैं, वे क्षेत्र जहा उत्पादकवा दर किसी भी प्रकार के परिवार नियोजन के प्रयल्ल के बावजूद भी कम रही है, और वे क्षेत्र जो कठोर (890) के है जहा अधिकतम प्रयल किये जाने को आवश्यकता है। 990 के सर्वेक्षण से सकेत मिलता है कि उच्च उर्वरता (270॥॥9) के क्षेत्र हैं --उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, रश्याचल प्रदेश और एजस्थान। इनमें (990 में जस दर 34% और 377% के बीच तथा 99 में 32% और 35% के बीच थी) यह क्षेत्रवार दृष्टिकोण परिवार नियोजन कार्यक्रम के ह्ियावयन में कप्रियों को ठीक करने में सहायक सिद्ध होने की अपेक्षा रखता है। गे गर्भ निरेष विधियों की खेज (50क८॥ [ फैंश९ (0ह#बल्य[ध/00) मे तक नये, कम खर्चीले, प्रयोग में सरल, और हानिरहित गर्भ निरोध विधियों को खोज नाटकीय सफलता महीं प्राप्त हुई है। यद्यपि गर्भ निरेध गोलिया बड़ी मात्रा में स्वीकार को गई हैं और यह विधि हरियाणा, मध्यप्रदेश, पंजाब, पश्चिम बगाल, गुजणत और उड़ीसा में 'ेपेलित हो ही है, पण्तु यह भी आवश्यक है कि भारतीय जडी यूटियों का भी उनके अपधोय प्रभाव के लिए पूर्णरूपेण अनुसन्धान किया जाये। अण्डमान और निकोबार द्वोप स्प्के कुछ आदिवासियों को आहार आदतों और स्वास्थ्य स्तर के महन छानबीन करते हुए, डिजे बुछ में उलादकता दर अत्यन्त कम देखी गई है, पाया गया कि यह आवश्यक धान अदान कर सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक और फार्मास्ुटिकल उैलनिया ग्धनिगेध प्रौद्योगिकी में नवीन आविष्कार व परिणाम प्रस्तुत करने में रुचि नही रे । हम अभी भी कण्डोम और शल्यक्रिया प्रविधि पर निर्भर हैं जबकि हमें आवश्यकता '। जनाक्रामक अविधि तथा गर्भ विेधी टौके या गोलों को जो शारीरिक स्वास्थ्य के उल्ल जनकंख्या गतिक्ी लिए हानिकारक भी न हो और मनोवैज्ञानिक रूप से भी हानिकारक न हो। विवाह आयु में वृद्धि (डक्काण कैकरियव2९ 48) परिवार नियोजन के प्रति दृष्टिकोण और परिवार के आकार और विवाह के समय आयु में प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। केरल में एक अध्ययन ने यह दर्शाया कि 970 के दशक के मध्य में विवाह के समय आयु में वृद्धि देखी गई । 969 में 5 से 79 वर्ष आयु समूह में विवाहित स्त्रियों की सख्या 30 प्रतिशत थी जबकि 974 में घटकर 4 प्रतिशत हो गई। 20-24 वर्ष आयु समूह में यह कमी 969 में 74 प्रतिशत से 974 में 56 प्रविशव रह गई (#&6 प्र०००७, !श्वा८॥ -5, 980)। समाजशास्रीय दृष्टिकोण से यह केरल में जन्म दर में नाटकीय गिसवट के लिए महत्त्वपूर्ण कारण है। इस प्रकार विवाह आयु को बढाने से अन्य राज्यों में भौ परिवार के आकार में कमी होगो। इसके लिए जनजागरण के लिए तथा अन्तर्मन से प्रथल करने को आवश्यकता है। ब्ियो को पिक्षित करना (हदटवाफछाए फछ्कर्वा5) उत्पादकता दर को कम करने में शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण कारक है। इसका प्रभाव ण्ट्यध, अप्रत्यक्ष और सयुक्त होता है। प्रत्यक्ष प्रभाव छोटे परिवार के प्रति दृष्टिकोण और विश्वास परिवर्तन में दिखाई देदा है। अप्रत्यक्ष प्रभाव (शिक्षा के) निम्नलिखित अर्थ में होते हैं * 0) विवाह करे में देर कराता है, (7) परिवार नियोजन से सम्बद्ध सूचनाओं को प्राप्त कला सुविधाजनक बनाता है, (॥0) परिवार नियोजन प्रचार को और भो विस्तृत करता है, (0) यह ऊर्ध्ध सामाजिक गतिशोलता के लिए आकाश्षा पैदा करता है (७) यह ख्ियों को रोजगार सम्भावनाए मरदात करता है, (४) यह बच्चों के विषय में आर्थिक उपयोगिता की घारणा को कम करता है, (५४) यह पति पत्लि को जन्म नियत्रण उपाय अपनाने के लिए बाध्य क्खा (शा) यह शिशु मृत्यु कम करता है, और (७) यह तर्कशीलवा को बढाता है। शिक्षा के सयुक्त प्रभाव हैं--औद्योगीकरण, शहरीकरण और आधुनिकीकरण। आधुनिकीकरण शिक्षा के साथ मिलकर उत्पादकवा को प्रभावित करता है। जेसी पनन्‍त (ताक उ0पाग्नग॑ रण एफ्स्‍।र #तगानज्रागा0ा, एड: 992, 333-340) ने परिवार में बच्चों को सख्या और शिक्षा के स्तर के बीच सम्बन्धों का विश्लेषण करने के लिए अप्रैल 985 से जून 986 तक पजाब के 486 ग्रामीण और शही परिवारों का अध्ययन किया। उसने देखा कि अशिक्षित स्त्रियों के मामले में ग्रामीण शहरी, और कुल प्रतिदर्श बच्चों को औसते सख्या क्रमश 36, 330 और 3.52 थी, कष्षा एक से 8 हक शिक्षित स्त्रियों के मामले में क्रमश 227, 330 और 250 थी, कक्षा 9 से ॥ तक शिक्षित स्त्रियों के मामले में क्रश 242, 248, और 2 45 थी, मैट्रिक से इण्टमीडिए्ट तक शिक्षित स्त्रियों के लिए क्रमश 87, 353 और 4 63, तथा स्नातक स्त्रियों के लिए वह औसत सख्या क्रमश 57, 62 और 60 थी (वही * 358)। यह दर्शाता है कि उत्पादकता शिक्षा के स्तर से विपरीत दिशा में सम्बद्ध है और स्नातक तथा स्वातकीततर रिया छोटे पसिवार प्रतिमानों को अपनातों हैं। बरसख्या गतिकी व! आर्थिढ विकाप (८शाकार शक्ल आर्थिक विकास सर्वोत्तम गर्भ निरोधक सिद्ध हो सकता है। हमें माँग और पूर्ति मात्र आर्थिक सिद्धान को किप्तो भी कौमत पर शीघ्र जनसख्या नियत्रण के लिए अपनाना है। किसी भी आर्थिक समीकरण को सन्तुलिव करने के लिए या तो हम पूर्व बढा सकते हैं जो वित्तीय और प्ौतिक ससापनों दोनों पर निर्भर करती है, या माँग को कम कर सकते हैं जो विभिन सेवाओं गण वस्तुओं को मांगने वाले लोगों को सख्या पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, केवल आवास में हो पूर्व के दृष्टिकोण यह मानते हुए कि एक छोटा सा मकान बनाने के लिए !0000 रुपये की आवश्यकता होगी ठो देश में प्रतिवर्ष बढने वाली .5 करोड जनसख्या के लिए 30 लाख मकान बनाने के लिए 3,000 करोड़ रुपये कौ वार्षिक लागत आवश्यक शोगी। लेकिन यदि हम इसी समस्या को माँग के आधार पए लें और प्रभाव जनसख्या नियंत्रण रणनीति के माध्यम से [.5 करोड जनसख्या की वृद्धि को कम कर लें तो 30 लाख मकादों कौ माँग या मकान बनाने के लिए आवश्यक 3,000 करोड रुपये की माँग भी कम हे जायेगो। इस प्रकार माँग से बचाव उतना ही अच्छा है जितना पूर्वि के लिए कार्य करना। पही किप्ती कीमत के बिना माँग और पूर्वि का सन्तुलन करना है और ऐसे ही बिना मूल्य के समाधान की हमें दलाश है। आगास्त के विषय में जो बात लागू होती है वही शिक्षा, नौकरी, गातायात और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी ठीक है। अत्येक समस्या को माँग के आधाए पर सम्राघान का प्रयल अत्यन खर्चाला पड़ेगा। इस दृष्टिकोण का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है। यदि हम समस्या को पूर्ति के आपार पर समाधान का प्रयल करें तो अन्य क्षेत्रों में भी माँग स्वय बढ़ जायेगी। उदाहरणार्थ, यदि हम मकानों की सख्या बढ़ा दें वो सीमेन्ट, ईंट, लकडी के सामान तथा बिजली की चीजों मूल्य बढ जायेंगे। लेकिन यदि इस समस्या को माँग के आधार पर लें और आवश्यक मकानों की संख्या घटा दें तो सभी क्षेत्रों पर दबाव स्वय कम हो जायेगा। प्रति मिनर 30 बेस या प्रति वर्ष 4.5 करोड जन्म की दर से शिक्षा, यातायाव, और कल्याण जेसे क्षेत्रों में धन और बस्तुओं की माग इतनी बढ जायेगी कि दस वर्ष की अवधि में स्थिति ऐसे बिन्दु 'र पहुच जायेगी जहा से लौटना सम्भव न होगा और देश दया अर्थव्यवस्था को अपार क्षति हैगी। सन्‌ 994 में 5 से 3 सितम्बर तक काहिस में जनसख्या और विकास पर हुई तृतीय अर्शशीय वस्फ्रेस्स का घोषित मुख्य उद्देश्य जनसख्या प्रकरणों, आर्थिक विकास और स्थिए विकास के बोच की कडी था। परन्तु दस में से छ दिनों वक कान्फ्रेन्स “गर्भपात जनप्ख्या निषयण के उपाय के रूप में', की वेधता और प्रभाविदा के प्रश्न पर विवाद के दलदल में फंसे रहो गरीबी निवारण, अशिक्षा, रोजगार, प्रामीण उत्थान, या तीसरी दुनिया में निर्यात की पक बाजार पहुच जैसे मुद्दों पर न कोई चर्चा, न वाद विवाद ही हुआ। 974 और 984 में अ पिस्या पर प्रथम दो अन्तषटीय कानक्रेसों में यह तर्क दिया गया कि बड़े परिवार गरीबी हि को अपेक्षा इसके परिणाम होते हैं! इसलिए गऐेबी उन्मूलन पर बल्न दिया गया। हक बड़े परिवार की आवश्यकता को समाप्त किया जा सकदा है। पस्नु तोसरो केस में इस मुद्दे को अधिक महत्व नहीं दिया गया। विकसित देशों का यह अनुभव रहा 382 जनपज्या यविकी है कि उच्च परिवार आय और सुपरी सेवाओं का अर्थ है कि बच्चे कम जन्मे। अत , उनका सुझाव है कि तीसरी दुनिया को भी इसी रास्ते पर चलना चाहिएं। बिरैण्ड (8720०) रिपोर्ट ने भी विस्तृत परिवार नियोजन कार्यक्रम की प्रशसा करते हुए कहा कि परिवार नियोजन कार्यक्रम तभी प्रभावी होते हैं जब वे आर्थिक व सामाजिक प्रगति के साथ चलाए जायें। इस प्रकार यह माना गया कि केवल विकास ही देश कौ जनसुख्या को स्थिर करने में सुचार वातावरण प्रदान करेगा। जहा जनसख्या और विकास के बीच सम्बन्ध को ठीक से समझा गया है, वही “विक्ास' की प्रकृति कुछ वाद विवाद का प्रश्न रहा है। तीसरी दुनिया के प्रमुख विश्लेषक (»0श१४४४) जो यह मानते हैं कि 'विकास' (उच्च प्रौद्योगिकी, बड़े पैमाने पर उत्पादन और प्रेरित उपभोक्तावाद के द्वारा), जैसा कि समृद्ध (॥(॥0७॥ राष्ट्रों द्वारा परिभाषित किया जाता है और तीसरी दुनिया को समझाया जाता है, जनसख्या की समस्या को और भी गम्भीर बना रहा है। यह विचार जो बाव स्पष्ट करता है वह यह है कि आधुनिक प्रौद्योगिकी ((४०४०008)) उद्योग में एक ऐसे लाभ प्रेरित अभिजात वर्ग (70-7700५8/०0 ४॥॥७) को जन्म देता है जो केवल अपने ही हितों को महत्व देता है दया श्रमिक वर्ग के कष्टों और गरीबी के प्रति उदासीन रहता है। परिणाम यह है कि एक ऐसा आर्थिक व जनाकिकी परिदृश्य (६०८४०॥०) पैदा होता है जो कि शिखर विस्फोटक (बढते धन के कारण) और तल की (बढती गरीबी के कारण) दोनों पर विस्फोटक होता जा रहा है। इस प्रकार मान्यता यह है कि जनसख्या समस्या को सामाजिक परिषेक्ष्य में नहीं देखा जाना चाहिए। वह विकाम जो विदरण तथा समानता के लक्ष्य को लेकर चलता है, गरीबी का 5न्मूलन कर सकता है और जनसख्या वृद्धि पर रोक लगा सकता है। गैर हरकारी सस्थाओं की भूमिका (2०/6 ० ॥४605) किसी भी कार्यक्रम की सफलवा लोगों द्वारा इसकी स्वीकृति पर निर्भर करती है। जब तक समस्त समुदाय कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं होगा और इसे अपना कार्यक्रम नहीं समझेगा तब तक वाच्छित परिणाम कठिन होंगे। गैर सरकारी सगठनों के माध्यम से यह सम्भव हो सकता है क्योंकि जन साधारण के साथ इनके घनिष्ट सम्बन्ध होते हैं। बडे परिवार और अधिक लड़के होने के पश्षथर विश्वास्ों को समाप्त करने, महिला सक्षिख्ता में सुधार करने में, लडकियों की विवाह आयु में वृद्धि करने में, नवजात शिशु की आवश्यक देखभाल करने में बच्चों को जन्म में फासला बनाने में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे संगठनों के पास न केवल दूरस्थ स्थानों तक पहुचने की क्षमता होती है बल्कि उनके क्रियाकलाप मूल्य-प्रभावी भी होते हैं। परिवार कल्याण विभाग ने गत पाँच छ वर्षों से परिवार कल्याश कार्यक्रम में गैर सरकारी सगठनों की बेहतर भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कई योजनाएं चलायी हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं * () जनसख्या नियत्रण और छोटे परिवार प्रतिमान को प्रोत्साहित करने के लिए योजना के मूल्य का 90 प्रतिशत तक सूगठनों को सहायता करना। (0) इन योजनाओं को चलाने के लिए स्वैच्छिक संगठनों को आगे आने के आग्रह करने के लिए सरकार द्वार विस्तृत प्रचार करना 6) इन संगठनों की भागोदारी बढाने हैतु गत आए पांच प्षो में क्षेत्रीय कान्क्रेस्स काना। (देहली, भुम्बई, कलकत्ता, चेनई और लखनऊ में) उनप्रब्या पविकी 383 8 बड़े संगठनों को उनके क्षेत्रों में छोटे सगठनों की पहचान करने तथा उनकी योजनाओं की स्वीकृति पर अनुदान देने के लिए उनकी योजनाओं की स्वीकृति पर अनुदान देने के लिए पद यूनिदरप' के रूप में मान्यवा देना। 5) परिवार कल्याण सचिव की अध्यक्षता में 'खैच्िक कार्यों पर ग़ज्य स्थाई समितियों" (५७७४० अक्याकाढ 00ग्गा(6८७5) की स्थापना का जिनके प्रति योजना दस लाख रुपये तक मजूरी का अधिकार है। (6) स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण देने हेतु गैर सरकारी सगठन के क्षेत्र में एक संस्था की पहचान करने के लिए एम्यों से कहना। 0) कम सामुदायिक भागौदाती वाले राज्यों में से अच्छा कार्य के वाले एज में जाने के लिए संगठनों के लिए अध्ययन यात्रा का प्रबन्ध करना। गैर सरकाै संगठन निननलिखित कार्य कर सकते हैं. () सलाह और सेवाए सरलता पे उपलब्ध कपता, विशेष रूप से अल्प-सेवित (णाता-5ध४८0) क्षेत्रो में; (2) अस्पतालों और ज़ाप््य गाडड़ों के साथ समन्वय करना; 6) कार्यकर्ताओं (छाताणाआं६७) को अशिद्षित कला, विशेष रूप से निम्न स्तरीय कार्यकर्ताओं को; (6) गर्भ निशेधक विधियों की नगर पूर्ति में सहायक होना, 6) स्वीकारकर्ता (४००थ॥४०:७) को अनुप्तण सेवाए (0ए४-४०-४श८०८७) प्रदान करना; और ७) शैक्षिक क्रियाकलापों को अधिक प्रप्नावी खने में योगदान करना। परिवार नियोजन कार्यक्रमों में गैर सरकारी सगठनों के प्रभावी सिद्ध न होने के निम्न कण हैं : () कई सगठन सरकारी राह्मयता अनुदान भोजनाओं से अनभिज्ञ हैं। (2) अनुदान गत कले के लिए प्रार्थना पत्र प्रक्रिया बड़ी लम्बी और पेयौदा है। 6) छोटे कस्बों में काम कले वाले सगठन अनुदान ऐजेन्सियों तक कम पहुँच पाते हैं। (4) सगठनों के प्रति सरकारी का रूख अप्तहयोग का होता है। 6) सगठनों के पास कोष तथा प्रशिक्षण देने वे व्यक्तियों को कमी होती है। रवि (एगतञणा) शिर् रुप में कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में हमने यह विश्वास करने की गलती की कि हमारी जनसख्या हमारी परिसम्पत्ति है , और अब हम यह सोचने की महान भूल कर रहे हैं कि >त की तीब्र जनसख्या वृद्धि विकास की प्रक्रिया, अर्थात साक्षरता, स्वास्थ्य देखभाल, गैजगा, आदि से रुक जायेगी। यदि राष्ट्र 5 करोड जन प्रतिवर्ष वृद्धि से बचना चाहता है कि केवल 'एक ही रास्ता बचा है कि आवश्यक परिवार नियोजन तथा हतोत्साहन की जे धूंट लोगों को पिलाई जाये। इसके लिए एक उपयुक्त जनस्ख्या नोति की अं पयकता है। नयो आध्धिक नौति के सफल होने का कोई अवसर नहीं है जब तक कि कैफ़े साथ मिलने वाली जनसख्या नीति न हो। हपादी सरकार को जनसख्या नौति का उद्देश्य न केवल सख्या की शक्ति पिष्णलांत। आाथाह//॥) की अनियत्रित मानव वृद्धि (777९ह0॥8९0 कण हाएफए) सा होना चाहिए बल्कि जनप्ख्या की अनियत्रित गतिशीलता को ग़ेकना, आदत के में लोगों का जमाव रोकना, लोगों के विविध मिश्रण के लिए रहने को पर्याप्द पक, और आकर्षक चातावरण अदान करना भी होना चाहिए। इन उद्देश्यों को प्राकृटिक एव उन समाणन दोनों के दोहन के लिए जनसख्या नियोजन एवं वियमितीक्पण के उद्देश्य से 384 जनसख्या गतिकी मिलाकर जोडना होगा। इस प्रकार केवल जनसख्या वृद्धि को स्वय एक समस्या के रूप में नही देखा जाना चाहिए बल्कि ससाथनों की उपलब्धता की इसके साथ गम्भीर चिन्तन से देखा जाना चाहिए। परिवार नियोजन को उस्त दलदल से बचाना है जिसमें यह फंसा है। इसके लिए कार्यक्रम को आन्वरिक रूप से देखा जाना है और विकास इकाई के रूप में देखा जाना है। अगरचि यह भी मान लें कि जनसख्या वृद्धि रोकने का सबसे अच्छा उपाय विकास है, तब इसका उल्टा भी सही है. अधिक जनसख्या वृद्धि धोमो गति के विकास के लिए उत्तरदायी है। यदि नकागत्मक नहीं तो परिवार नियोजन अभियान को फिर से खडा करे के लिए अनेक उपाय करने होंगे। थोडी बाध्यता के साथ प्रोत्याहर भी आवश्यक होगा। देघानिक उपाय भी सहायक हो सकते हें लेकिन तुस्त आवश्यकता इस बात की है कि उत्तरदायी माता पिता की भावना पैदा करने के लिए सामाजिक जागृति और भागीदारी अधिक से अधिक हो। सबसे अधिक बल इस बात पर दिया जाना चाहिए कि परिवार नियोजन कार्यक्रम में अत्यधिक जोर बन्ध्याकरण पर देने के बजाय फासले की विधि को प्रोत्साहित किया जाये ताकि इससे अनुरूप जनाकिकीय प्रभाव प्राप्त किया जा सके। हमारे देश में लगभग पाँव में से तीन 7%) विवाहित ख्लिया कम उम्र को हैं 80 वर्ष से कम) और दो या अधिक बच्चों की माँ हैं। 'बच्चिया हो बच्चे पैदा करें' इस दध्य को हमें रोकना है। यह केवल “फासले को विधि तथा लडकियों का 23 वर्ष आयु के बाद ही विवाह को प्रोत्साहन देने से हो सकता है। इसके साथ ही परिवार नियोजन, जनसख्या विस्फोट रोकने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका से ल्लियों को सामान्य प्रस्थिति को धान में भी सहायक होगा। वह ख्री जिसके पास पालन पोषण के लिए अनेक बच्चे हों और जो बारबार प्रसव प्रक्रिया से गुजरती हो, वह अपना अधिक समय माँ और पलि के रूप में हो व्यतोत करती है और घर को चार दीवार में ही बन्द रहती है। वह समुदाय और समाज में कोई भूमिका अदा नहीं कर सकती जब तक कि वह अपने परिवार के आकार को तर्क सगव न बना ले। परिवार नियोजन न केवल परिवार कल्याण में सुधार करेगा बल्कि सामाजिक समृद्धि तथा व्यक्तिगत सुख भें भी योगदान करेगा। 3 अष्टाचार (एणाए़ञाणा) भा में प्रशचार को जडें गहरी हैं। जिस तेजो से अनेक नेताओं के नाम प्रष्टाचार से जुड़ने हो हैं, लगता है कि इबकीसवो शताब्दी में भ्रष्टाचार को बदने से रोकना असम्पव होगा। बुध हम ग़ज्य और केद्र के उच्च राजनीतिजञों को यह कहते हुए सुनते हैं कि “हमें प्रष्टाचार विद्ध युद्ध कजा है” “भ्रष्टाचार को बुराई से लड़ना है,” “भ्रष्टाचार से हम कोई समझौता नही करेंगे, “किप्ती भी भ्रष्टाचारी व्यक्ति को गाफ मही किया जायेगा, चाहे वह कितना भी मे क्यों न हो”। फिर भी यह सर्व विदित है कि हमाय देश भ्रष्टाचार में कितना डूबता जा पा है। एक मुख्य म्री सरकारी भूमि को अपने निजी प्रयोग के लिए वास्तविक मूल्य की पाई में खरौदने में सफ़ल हो जाता है। एक अत्यन्त वरिष्ठ अधिकारी अपने मकान के लिए निःशुल्क मार्बल, लकडी व अन्य चीजों का प्रबन्ध करता है। एक नव ख़तत्र विधायक को शासक दल का समर्थन करने के लिए 50 से 75 लाख रुपये और प्री पद का लोभ दिया जाता है। एक सरकार दफ्तर में चपरासी एक फाइल ढूँढने के 0 रे मागता है। एक रेलवे टिकट निरीक्षक जो खाली यान में शयिका का आवंटन का »20 रपये से 300 रुपये प्रति दिन कमाता है। एक आयकर आयुक्त के निवास पर छापा गे हुए सौबी आई. अफसरों को अघोषित लाखों रूपए को सम्पत्ति मिलती है। हमारे चारों में कितने भ्रष्ट राजनेता, अफसरशाह और व्यापारी 'सी' और 'डी' श्रेणी वाले पड में पाये जे हैं। कायगाएं पर अनु भवजन्य अध्ययन में लगे हुए अपराषशा्ियों को 3 भी यह जानना शेष है कि रिश्वत और दलाली में लिप्त अभियुक्त और दष्डित उच्च अप रजीविज्न, शासक और गैल्शासक दलों के एजनीतिज्ञ, उच्च स्तरीय सरकारी अफसर बैल में बदगोे, दरी व निवार बुनकर, या रसोईये के रूप में साधारण बन्दियों की तरह किशन अर कार्य करे हैं। उणणा (तक) से दों में, प्रचार यो 'रिश्वत का कार्य” कहा जा सकता है। इसे “बिजी लाभ के लिए. पेवबनिक शक्ति का इस भ्रकार प्रयोग कप्ना जिसमें कानून तोडना शामिल हो या जिससे फेज के गाररप्छों का विचलन हुआ हो” भी कहा जाता है। डीएचबेली (0 प्र फथाल्के [६ 00४ हा 7॥07७०७, 97)) ने भ्रष्टाचार को इस प्रकार बताया है “निजी लाभ दा के परिणायस्वरूप सत्ता का दुरूपयोग जो घन सम्बन्धित नहीं भी हो सकता है। रनिली (तत्व, त॑. १ब८ा१६ 0805, 983) ने कहा है, “ऐसे तरोकों से 386 प्रशचर सार्वजनिक शक्ति का निजी लाभ के लिए प्रयोग जो कानून का उल्लघन करता हो”। मौरिस जैफेटल (७००४७ इ$खशीटा, ला, !४४९०॥४८ ८८, 985) ने कहा है, “प्रष्टाचार वह व्यवहार है जो मानदण्डों और सार्वजनिक भूमिका निर्वाह के कर्तव्यों को सचालित करे या निजी लाभों के लिए पद के उचित उपयोग से विचलन होता है” । यह निजो लाभ कुछ कार्यों पर लगे प्रतिबन्धों की अवहेलना करके या उस कार्य के प्रति बैध विवेकाधिकार (८छ0ग्रा॥८ 05टाथा09) का प्रयोग करके, या उस कार्य के प्रति कुछ कर्तव्यों को पूण कले के द्वाद प्राप्त किया जाता है। जे नाय (9 ३५७८, 967 40) का कहना है कि “भ्रष्टाचार निजी लाभों के लिए सार्वजनिक पद का दुरूपयोग दर्शाता है”। भ्रष्टाचार को इस प्रकार भी समझाया गया है “यह आर्थिक या प्रतिष्ठा सम्बन्धो लाभों की प्राप्ति के लिए सार्वजनिक भूमिका के प्रति औपचारिक कर्तव्यों से विचलन है।” समाज में भ्रष्टाचार अनेक स्वरूपों में फैला हुआ है। इनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं रिश्वत, देने वाले के पक्ष में अवैध, बेइमानी से युक्त कार्य करने को प्रेरित करमे के लिए नकद या वस्तु या उपहार में दिया गया), भाई-भतीजावाद (॥&90०057) (सम्बन्धियों को अनावश्यक पक्षपात द्वारा सरक्षण प्रदान करन), दर्विनियोग (0597[90.४7907) (दूसो के घन को अपने प्रयोग में लेन), सरक्षण (930707०8०) (सरक्षक द्वार गलव समर्थन/प्रोत्ताहन दिया जाना और इस प्रकार पद का दुरूपयोग करना) और पक्षप्रात ([89900757) (एक व्यक्ति को छोडकर दूसरे को अनावश्यक वरीयता देना) । भाई-भतीगावाद (९७०॥५॥) सामाजिक विश्लेषण बताता है कि सामाजिक बन्धन और नातेदारी भ्रष्टाचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आधुनिकौकरण के मान्य आदर्श तथा आज के शासक़ों द्वाए अपलन में लाए जाने वाले आदर्श परम्परात्मक समाज के सार्वजनिक व्यवहार के प्रतिमानों और मूल्यों के विपरीत हैं। आज नातेदारी व जातिगत निष्ठाए सार्वजनिक सेवकों के मस्तिष्क में पहले से ही रहती हैं। आधुनिक प्रशासक का सबसे प्रथम दायित्व अपने परिवार के सदस्यों के प्रति होता है और इसके बाद निकट नातेदार या वश या फिर नृजातीय समूह के प्रति। इस प्रकार के बन्धन नियमों और प्रक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। नातेदार व जातियों ऐसे व्यवहार को, जो सार्वजनिक भूमिका की औपचारिक्ता से विचलित होते हैं, 'विंचलन' या भ्रष्टाचार नही समझते बल्कि इसे वे पारिवारिक दायित्व मानते हैं। यह अनेक सार्वजनिक सेवकों के निम्न और उच्च स्तर पर भ्रष्ट कार्यों को स्पष्ट कर्ता है। भ्रष्टाचार. एक ऐतिहासिक पत्िक्ष्य (एकचक्ताफफ़ांणाः 4 प्रांजमांदों एचऊक्च्ता्णे भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी तथ्य है। यह अनन्त समय से प्रत्येक समाज में किसी न किसी रूप में पाया जाता है। प्राचीन समय में मिल, बेबीलोनिया और हैब्यू समाजों में न्यायाधीश रिश्वत लेते थे। रोम में सार्वजनिक पदों पर चुनाव के दौगन रिश्वत एक आम बाव घी। ऋस में 5वी शताब्दि में इग्लैण्ड को प्रष्टाचार का गड्डा (॥0॥-00) कहा जाता था। उननीसवीं शर्ताब्दि में भी ब्रिटेन में भ्रशचार इतना अधिक था कि गिब्बन (9907) ने इसे #क्चचार उहा सपैधानिक स्वतत्रदा का सबसे अचूक लक्षण कहा है (छक्का, ० 42॥, 5 99)। भार में कौटिल्य ने भी अपने 'अर्थशास्र' (०, 5६७४88%79, 967 75.7) में ग़ज्य कोष से सरकारी कर्मचारियों द्वारा गबन किये जाने का सन्दर्भ दिया है। उसने सरकारी कांबारियों द्वाय अपनाए जाने वाले लगभग 50 प्रकार के गबन और अस्य भ्रष्ट तरीकों का वर्षन किया है! अशोक के शासनकाल में भ्रष्टाचार कम पैमाने पर पाया जाता था। (न, ॥थाणातंग, २0, 4ललवा 40, 7960 3) | मध्ययुगीन समाज में भी भ्रष्टाचार क क्षेत्र कम था क्योंकि कर वसूली के लिए कय से कम अधिकारी थे। जितना अधिक घने सह दे लोग करते थे उतनी ही उनको प्रशसा होती थी, न कि उन पर दोष लगाया जाता थ। ब्रिटिश शासनकाल में रिश्वत न केवल भारतीय अफसरों द्वाग स्वीकार की जाती थी रत्वि उत्प पदस्थ अग्रेज अधिकारियों द्वार भी। क्लाइव और वारेन हेस्टिंग्ज तो इस कदर ४४ पाए गए कि उनके इस्लैण्ड लौदने पर एक ससदीय सप्तिति द्वारा उन पर मुकदमा चलाया गया। प्रथम और द्वितीय महायुद्धों के दौरान आर्थिक क्रियाकलापों के विस्तार ने देश में प्रशबाए के नए तरीकों को जन्म दिया दिखें, ५७, ४, 948 3-5)। युद्ध के दैगन लगाए गए अतिबन्यों, नियत्रणों और अभावों ने रिश्वत, भ्रष्टाचार और पक्षपात के लिए 'पेष्ट अवसर अदान किए। स्वतत्रता के बाद यद्यपि राष्ट्रीय स्तर का उच्च राजनैतिक अभिजात गर्ग एक दो दशकों तक अति ईमानदार बना रहा किन्तु तोसरे (962) और चौथे (967) नो के बाद नवोदित राजनैतिक अभिजात वर्ग ने अपने ईमानदार होने के विषय में जनता भा विध्वास खो दिया। सभी स्तरों के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों ने होते बातों के लिए बडी-बडी रिशवतें स्वीकार करना प्राम्भ का दिया। आज केद्रीय एव रस दोगों स्तरों पर ईमानदार छवि के मत्रियों और प्रशासकों की सख्या उगलियों पर गिनी जे सकती है। स्वतंत्र भारत में सब से पहले 949 में विध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेता व ँबालौन उद्योग मत्री को 25 हजाए रुपये रिश्वत लेने के लिए जेल को सजा दी गयी थी। /082 में कृष्ण मेनन पर 2000 जीपों की खरीद के मामले में धूप खाने का आरोप था। ईदेा गाधी के शासनकाल में 20 कय्रेड रुपये के क्युओ आयल कपनी के साथ का विश प्रौदा, 60 लाख रुपये का नागरवाला मापला, मारुति उद्योग घोटाला, एचबी रेसयू पाइब्बी का घोयला उद्पाटित हुए थे। 980-990 के दशक में भी अनेक केद्रीय मे और मुख्यमंत्री उन उच्चतम स्तर के राजनीविज्ञों मे थे जिन पर अपने राजनैतिक सत्ता के खत में ब्रष्ट करोकों को अपनाने का आरोप लगा था। तब से एक बड़ी सछ्या में परमा्ियों, मत्रियों और उच्च स्तरीय नौकरशाहों पर लगभग सभी राज्यों में अवैध रूप से ही सप्रह और भाई-धतोजावाद अपनाने के आगेप लगे हैं। सरकार यो लाइसेन्स प्रणाली, निया के नियमों, और सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार ने जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रद्यवार का रिखा किया है। प्रष्टाचार केवल भारत, चोन और पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों में ही नहीं बढ़ जो है, बर्कि अनेक यूरोपीय देशों में भो फैल रहा है। समृद्ध और विकसित देशों में पर को कल्पना तक नहीं की जा रही थी, पल्तु अब जो वष्य सामने आ रहे हैं वे अर्स ते है ले, वितनीय भी हैं। इन दिलों जर्मनी के लोकप्रिय नेता व पूर्व चासलर पर उ88 अटाचर भी रिश्वतखोय का आरोप साबित किया गया है। फ्रांस में घोटाले के आरोपित वहा के राष्ट्रीय विघानम्भा के स्पीकर को भी 8 महीने का कयवास दिया गया था। रूस के राष्ट्रपति येल्तसिन की बेटी के स्विस बैंक के खाते में लाखों डालर जमा पाये गये। अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान चीन की एक हथियार बेचने वाली सरकारी कपनी द्वाय दिया गया डेमोक्रेट पार्ट के चुनाव में लगभग एक लाख डालर का चन्दा अब 2000 में) सार्वजनिक हो चुका है। अमेरिका में यह भी बताया गया है कि 995 चुनाव में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मद में व्यापारियों को लगभग 7 हजार मिलियन डालर खर्च करने पड़े थे। इटली का प्रधान मत्री भी !990 में भ्रष्टाचार में कुख्यात रहा था। पश्चिमी यूगेप को बड़ी-बडी कम्पनियों ने अपना माल बेचने के लिए दलाली या कमीशन देने की परम्परा शुरु की है। पाकिस्तान के दो भूतपूर्व प्रधानमत्रियों श्रीमति भुट्टों और नवाब शरीफ के नाम प्रष्टाचार के लिए बहुत मशहूर हो चुके हैं जिसके लिए उन पर मुकदमा भी चल रहा है ! ऐसे भ्रष्ट आगेपित नेता लोग आरोप को "राजनीतिक दुश्मनों की एक चाल' कह कर बेशर्मी से टाल जाते हैं। यह कहना गलत नही होगा कि न केवल एशियाई देशों को, बल्कि यूगेपीय और विकसित देशों को भी भ्रष्टाचार का कैंसर खाता चला जा रहा है। ईमानदारी में सबसे ऊपर (0 में से 9 अक प्राप्त करने वाले) फिनलैण्ड, डेनमार्क, न्यूजीलैंड, स्वीडन, कनाडा और आईसलैण्ड को रखा गया है (फल तु कबाव, $०.८7०४०, 79, 2000) ! एक गैरूसरकारी जर्मम संगठन (पब्राक्ुलाण परशक्षावतणाब), (गी6 स॥८एरअदा। व्राधा5, 5८9(७८७७८६४ 9, 2000) के अनुसार, सन्‌ 2000 की भारत विश्व के अध्ययन किये गये 90 देशों में नीचे (७०॥००४) से इक्कीसवा प्रष्ट देश माना गया है। यह संगठन, वित्तीय पत्रकारों के तथा उन देशों से व्यवहार करने वाले व्यापारियों के दृष्टिकोणों के अनुसार उनके लेन देन में उस देश को ईमानदारी या प्रष्टाचाए की श्रेणी प्रदान करके मूल्याकन करदा है। इस अध्ययन में इस संगठन ने नाइजेरिया, युगोस्लेविया, उक्केन, इल्डोनेशिया, अगोला, रशिया, पाकिस्तान, चीन, थाइलैप्ड, इटलौ और मोरक्को को भ्रष्ट देश पाया। लोकसेवको मे भ्रष्टाचार (2077ए00 4ण्ञणाह ९कांट इद्चए्छज७) लोकसेवकों में भ्रष्टाचार हमेशा एक या दूसरे रूप में विद्यमान रहा है, यद्याप इसका स्वरूप, आयाम, प्रकार और छवि समय-समय और स्थान-स्थान पर बदलते रहे हैं। एक समय था जब रिश्वद गलत कार्यों को कराने के लिए दी जाती थी लेकिन अब सही कार्य को सही समय पर कयने के लिए दी जातो है। सार्वजनिक सेवाओं में कौन से कार्यों को 'प्रष्ट' कहा गया है? यद्यपि 'भ्रष्टचार शब्द के व्यापक अर्थ हैं किन्तु काबूनो प्रावधानों के अन्तर्गत लोकसेवकों के निम्नलिखित व्यवहार ब्रष्ट कहे गए हैं (व०॥०७७, 992. 254-256) ()) अधिकारिक हैसियत से किए गए हार्य के लिए पुरस्कार स्वरूप भेंट स्वीकार करना, (०9) अवैध रूप से कोई भी वस्तु यां आर्थिक लाभ प्राप्त कला, (४) सार्वजनिक सम्पत्ति का धोखाधडी से दुरुपयोग करना, (४) आय के ज्ञात ससाधनों से अधिक अनुपात में सम्पत्ति या आर्थिक ससाधन जुदाना, (शे अधिकाएक पद का दुरुपयोग, (४) सरकारी व्यवत्ार से सम्बन्धित किसी व्यक्ति से बीमती उष्ावार 389 वस्तु खगैदने के लिए धन उधार लेना, यह मानते हुए कि उधार लिया धन वापस नहीं किया जाग है, (जा) उच्च स्थिति या पद पर होने वाले व्यक्ति द्वार ऐसे लोगों से भेंट/उपहार खौका कला जिनके साथ उनके पद के नाते सम्बन्ध हों, (॥॥) जानबूझ कर नियमों की अनदेखी करते हुए देयकों/करों/ आदि के भुगतान करने से बचने में नागरिकों की मदद बजा, (0) किसी बढाने से किसो कर्त्तव्य को करने से इन्कार करना जिससे दूसरों का फायदा होता हो,(जेसे अपाधी की मदद करने की नीयत से पुलिस अधिकारी का किसी मामले को पजौकृत न करना)! केद्ग सरकार में कमर से कम चार ऐसे मख्रालय हैं जो घन अर्जन के लिए सोने की खान माने जाते हैं। ये हैं: रक्षा, पेट्रोलियम, ऊर्जा (90७८) और सचार मत्रालय। रक्षा म्रालय प्रतिवर्ष रक्षा सम्बन्धी वस्तुओं को खरीद पर लगभग 30,000 और 40,000 करोड़ रुपे के बौच खर्च करता है। यह कहा जाता है कि अख्र-शस्त्र, गोला-बारुद, अतिरिक्त कल पुर्बे (४० एथ।9 और मिरणज विमानों की मरम्मत व खरीद के लिए ॥5 से 40% दलाली आम चलन रे । पेट्रोलियम मत्रालय त्रेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर प्रतिवर्ष 30/00 करोड रुपये से अधिक खर्च करता है। 998.99 में इस ने 24,000 करोड रुपये, 999-2000 में 54,00 करोड रुपये खर्च किये और अनुमान है कि 2000-200। में यह राशि 64000 कप्रेड रुपये होगी। आयातित ठेल के बैरल किसी न किस्ती के लिए दलालो के हप में आय का अच्छा साधन प्लिद्ध होते हैं। तेल की खुदाई के अधिकार देने में, पेट्रोल पं वो खोलने में, पाइप लाइनों को बिछाने के लिए रिश्वत दिये जाने में भी बहुत सा धन लगता है। ऊर्जा पत्रालय लगभग 4,000 करोड रुपये प्रतिवर्ष खर्च करवा है जो अपने अधिकारियों को काला धन कमाने के अच्छे अवप्र प्रदान करता है। सचार मंत्रालय का बजट भी प्रतिवर्ष हजारों करोड रुपये का होता है और इस मत्रालय में भी दलाली आम है। चार अन्य विभाग जहा प्रष्टाचार अविव्याप्ठ है वे हैं पी डब्ल्यू डी (लोक निर्माण विधाग) पुलिस, चुंगो (७४८७०), और राजस्व (४८7७०) । पी डब्ल्यू डी को बजट और भेजनाओं के अन्तर्गत भवनों के निर्माण, सडकों के रख-रखाव, नालियों के निर्माण, बाघों (4५व9) के निर्माण, आदि के लिए एक बडी धन राशि आवरित की जाती है। इस विभाग में ऊर से लेकर नौचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त है, जैसे कार्य स्थल (॥/०) का चुनाव, अनुमानित का (८४/ए४८१ ८०४0) का तैयार किया जाना, धन की स्वीकृति, वस्तुओं की खतीद, माण कार्य करवाना, बिलों का भुगतान, और विवार्दों का समाधान, आदि। यह कहा जाता कि किसी प्रोजेक्ट के लिए स्वीकृत समस्त राशि में से लगभग 70% कार्य पर खर्च किया जा है, 20% ठेकेदार का लाभ और 0% विभिन अफपरों की जेबों में चला जाता है। पुलिप्त विभाग को सबसे अधिक प्रष्ट विभाग कहा जाता है जहा एक कान्स्टेबिल से तैकर उच्च पदस्थ अधिकारी तक र्श्वद लेते हैं। आश्चर्य कौ बात यह है कि पुलिस और शिकायतकर्ता दोनों से रिश्वत लेती है। पुलिस के अधिकार इतने विस्तृत हैं कि दे ईमानदार व्यक्ति को आगेप लगाकर गिएफ्तार व परेशान कर सकते हैं। सरौबों को “छोटे बहानें पर (जैसे, रिक्शा चालक, आदि) उनकी जेबों से उनका सारा पैसा निकाल । , इक ड्राइवरों से घन लेना, दुकानदारों से हफ्ता वसूल करता, आदि भ्रष्टाचार आम बातें हे 39 प्रटाचार भ्रष्टाचार को सम्भावना उन क्षेत्रों में अधिक है जहा अत र्ण निर्णय किए जाते हैं, जैसे कर सप्रह का मूल्याकन, ठेके स्वीकृत करना, बिल पास करना, चैक जारी केजा, आपूर्ति को मान्यता देना, आदि। अधिकारियों को पूर्व-निर्धारित प्रतिशत दिया जाता है और यह धन राशि उस सस्थान में सभी के हिस्से में आती है। रेल विभाग में वैगनों के आवटन में, खगब होने वाली चीजों के पार्सल बुक कयने, नष्ट हुई चीजों के दावे पास करने, आदि के लिए पैसा देना पडता है। कई मस्थानों में तो ठेका देते समय एक निश्चित प्रतिशत धन गशि नियमत ली जाती है। इसी प्रकार यदि यह धन राशि न दी जाये तो बिल के पास होने व चेक आदि प्राप्ति में देशो होना इसका परिणाम होता है। अक्सर बेईमाव ठेकेदार और आपूर्विकर्ता (5ए०ए॥९१७) जो निम्न कोटि की चीजें देना चाहते हैं या थोडे कार्य की स्वीकृति प्राप्त कला चाहते हैं अपना काम करवाने के लिए अपनी गलत कमाई में से कापी खर्च कर देते हैं। कर बचना, खराब निर्माण, थोडी मात्रा में माल आपूर्ति करना, सरकारी वाहनों की मरम्मत, आदि के लिए अत्यन्त ऊची कीमत वसूल करना भ्रष्टाचार के अन्य उदाहरण हैं। भ्रष्टाचार न केवल उच्च स्तर पर व्याप्त है बल्कि निम्न स्तर तक भी फैला हुआ है। सहायक एवं कनिष्ठ अभियन्ता, टेलीफोन, राज्य विद्युत परिषद और जलदाय विभाग के मध्यम और निम्न श्रेणी के अधिकारी, सजस्व व चुगी विभाग के नियक्षक, सचिवालय लिपिक, और रेलवे के कनिष्ठ कर्मचारी वर्ग छोटे-बडे पक्षपात के लिए रिश्वत स्वीकार करते हैं। कई मस्थानों में कनिष्ठ अधिकारियों को दलाली वी निश्चित राशि बधी है। उदाहरणार्थ, इस्जीनि्याग विभाग में एक जूनियर इन्जीनियर सौदे की पूरी रकम का 5%, सहायक अभियन्ता 3% , और अधिशाषी अभियन्ता 2% मागता है। आयकर विभाग में दर भिल हैं निरीक्षक 0,000 रुपये, तथा कमिश्नर के 5 लाख रुपये या अधिक बंधे हैं जो कर की गाशि पर निर्भर करता है। पुलिस विभाग में दर भिन्न हैं कॉस्टेबिल 0 रुपये से 2000 रुपये तक, उप निरीक्षक और निरीक्षक 2000 रुपये से 0,000 रुपये तक, उप-अधीक्षक और पुलिस-अधीक्षक 0,000 रुपये से 20,000 रुपये या इससे भी अधिक हैं। सरकारी कार्यालयों में किसी कार्य की अनुमति प्रदान किए जाने के बाद भी जब तक सम्पूर्ण स्वीकृत धनराशि का % यु 2% रिश्वत न दिया जाये तब ठक सम्बन्धित लिपिक स्वीकृति पत्र को टाइप नहीं करेगा या डाक में नही डालेगा। निम्नतम स्वर पर चपरासी भी अपने साहब से मिलने देने के लिए आगन्तुक से 0 रुपये या 20 रुपये झाड लेते हैं। सरकाए विभागों में भ्रष्टाचार इतना व्याप्त है कि एक प्रधानमत्रो को भी एक सार्वजनिक सभा में कहना पडा कि सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए आवटित धन राशि 00 रुपये में से जनता के ल्ञाभ में केवल 20 रुपये हो लगते हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि जनता की उदासीनता के कारण ही देश में भ्रष्टाचार इतनी विकट स्थिति में पहुचा है। पेंट (उपहाए) देना शहरों में भ्राशचार का एक प्रमुख रूप है। एक ठेकेदार किमी अभियन्ता को या लेखा अधिकारी को अपने बिल पास करने के लिए सूखे मेवे के डिब्बे और मिठाइया और चोँदी के गिलास उपहार में देता है। डाक्टर और यहा तक कि पुलिस अधिवारी भी अपनी इच्छा के स्थान पर स्थानान्तरण के लिए मत्री का उपहार देठा है। वह व्यापाते जो आयकर के ऑकलन को अपने पक्ष में कराने में सफल रहा है एक फ्रिज, या वार या बोई कीमती बिजली का सामान या सोने को देन बेटे के जन्मदिन या बेटी के विवाह में प्रशचार 5० देगा है। इन सब में उपहार देने का एक स्वरूप और साथ ही कुछ 'सास्कृतिक मूल्य परिलक्षित होते हैं। 'लरित धन' (६9८८४ 70729) भ्रष्टाचार के तरीकों में सामान्य है, विशेष रूप से अतुदाव (208) व संस्वीकृति (६॥०॥०४७) के मामलों में। यह प्रचलन सार्वजनिक कार्यों में प्रशासनिक विलम्ब का परिणाम है। एक बार एक फाइल किसी कार्यालय में आ जाये, इस पर निर्णय प्राप्त करना टेढ़ी खीर हो जाता है। विलम्ब से बचने के लिए 'गतिवान घन जैसे भ्रष्ट तरीके प्रयोग में लाए जाते हैं। कभी-कभी किसी फाइल पर निर्देश पर होने बाद भी इसकी सूचना प्राप्तकर्ता को देर से जादी है जब तक कि वह अधीनस्थ अधिकारियों को उपयुक्त धन नहीं देता। रिश्वत और दलाली कौ दर प्रतिवर्ष ऊचो ही होदी जा रही है। वैकल्पिक आर्थिक रौतियों के लिए गठित प्रारम्भिक समिति ने (शल्फुअभणए एक्ट 0 40(090५४ ॥200॥0णा० ?०॥०६७), जो वामपन्यी अर्थशास््रियों का एक समूह है, रात में कुछ अनुसन्धान किए हैं। इसका अनुमान है कि दलाली की राशि 980-8 में 30 कोोड़ रुपये से 990.9 में 9,44 करोड रुपये की आश्चर्यवकित करने वाली रचाई तक पहुच गई, अर्थात्‌ एक ही दशक में राशि में छ गुनी वृद्धि हो गई। गा भाल़ में 947 के भ्रष्टाचार निशेषक अधिनियम के अन्तर्गत भ्रष्टाचार के पजौकृत मानों को स्ख्या 98 और 987 के बीच 300 से 500 तक थी लेकिन 988 के अधिनियम के लागू होने के बाद अब यह संख्या ,700 से 2,00 प्रतिवर्ष तक है। जब 98 में पीवी आई और राज्य सरकाएं द्वारा ,205 भ्रष्टाचार के मामले पंजोकृत किए गए, 99 में 320 और 998 में 370 मामले पजीकृत किए गए थे और 2,667 को गिए्तार किया गया था। पंजीकृत किए गए मामलों में केवल 70% से 75% मामलों में ही को आगेप-पत्र जारे हुए। (2कक४० # 7८०, 998, 225-227) । उदाहरण के हैः पा, 998 में 287 नये मामले दर्ज किए गए जबकि 4,644 मामले पहले से हो में लम्बित पड़े थे। रावधिक सख्या में मामले 998 में महाराष्ट्र में ७90) और बाद गजस्थान (840), पंजाब (752), उडीसा (740), जम्मू कश्मीर (568), कर्नाटक 605), केरल (52), मध्य प्रदेश (508) में रिपोर्ट किये गये। 998 में 5409 केस की शनदीन की गयी और 902 लोगों पर मुकदमे चले जिनमें से केवल 239% हो अभियुक्त उए गए। (कार ॥ ख़दयव, 998 227 सजेतिक भ्रद्मवार और घोटाले (एल ए०7०्ए०७ घग0 उच्णाकाऊ) ३7 पवविदित है कि एक बड़ी सख्या में राजनीतिइ न केवल भारत में बल्कि विश्व में प्रष्ट है। पजनीविजं के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश होने पर लोगों को कभी आपात नहीं पहुचता। अगनदार ग़जनीतिजञ वर्तमान में लुप्त प्राय प्रजाति होती जा रही है। भ्रष्ट राजनीतिज्ञ न केवल रेदग, बिना दण्ड के बच निकलते हैं बल्कि वे तो राजनीदिश मच पर सम्माननीय नेता के हे अकड़ कर चलते हैं। लाल बहादुर शात्री और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे मत्रियों उदाहरण कम हैं जिनकी मृत्यु पर बैंक में जमा राशि नगण्य थी। हमारे इस घरती पर जब ले व्यक्ति बेगेजगारी के काएण अपने भूछे बच्चों की रोटो का प्रबन्ध करने के लिए चोते 3932 अष्टाचार करता है तब उसको जेल की हवा खानी पडती है, जबकि वे लोग जो देश को दोनों हाथों से लूटने में लगे हैं सम्माननीय नागरिक होते हैं क्योंकि या तो वे राजनीति में बडी तोप हैं या सता के केद्ध। गत दो या अधिक दशकों में, हमारे देश में भारी दलालो और परेक्ष भुगतान से सम्बन्धित अनेक घोटाले और आर्थिक अनियमिताओं के मामले प्रकाश में आए हैं। इन घोटालों में अधिकतर मुख्यमत्री, मत्री, महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर आम्ोन नेता, नौकरशाह और बडे व्यापार शामिल रहे हैं। लेकिन 'साक्ष्य के अभाव' (86८ ० €छव८१३८०) के कमजोर आधार पर अपराधियों को भ्रकाशित, खोजने, पकडने, मुकदमा चलाने और दण्डित करने में कुछ भी नहीं किया गया। यहा हम 985 के बाद के कुछ कुख्याव घोटालों, जैसे बोफोर्स, स्टॉक मार्केट प्रतिभूतियों, हवाला, चीनी, और कुछ अन्य को इगिव करेंगे। कुछ बदनाम घोटाले इस प्रकार थे बोफोर्स (300075) घोटाला (986) जिसमें 64 करोड रुपये की दलाली का मामला था, हवाला घोटाला (99) जिसमें 5 वरिष्ठ राजनैतिज़ और मौकरशाह शामिल थे (जिनको अदालत ने बाद में छोड दियए0, पशुधन घोटाला (999) जो बिहार के पूर्व मुख्यमद्नी के विरुद्ध था जिसमें १3 करोड रुपये की दलाली का मामला था, दूरसचार विभाग घोटाला जिपमें एक केद्रीय मत्री के घर 3.5 करोड रुपये नकद और साथ ही करोड़ों रुपये के आभूषण, राष्ट्रीय बचत पत्र, सावधि जमा-पत्र आदि पाये गये थे, जब मत्नी जी स्वय इलाज के लिए लब्दन में थे, विटूमिन कोयला घोटाला जो बिहार (996) में 00 करोड रुपये का था, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा रिश्वत घोटाला (993) जिसमें मोर्चा के चारं सासद और जनता पार्टी के तीने विधायक 40 लाख 'पये प्रत्येक पर लेने का आरोप था (जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मरसिहराव एवं उनके एक मत्रिमडलीय साथी को सीबीआइ की विशेष अदालद ने 29 सितम्बर 2000 को दोषी कशर दियः), भारतीय बैंक घोटाला (99-95) जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक को 2,358 करोड रुपये की हानि हुई, सीमेन्ट घोटाला (985) जिसमें महाराष्ट्र के मुख्यमत्री शामिल थे, भूखण्ड घोठ्यता (0988-89) जिसमें महान के एक अन्य मुख्यमत्री शामिल थे, महाराष्ट्र प्रतिभूति ($८०॥॥॥९४) घोटाला (992) जिसमें एक करोड रुपये लेने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री आग्रेपी थे, चीनी घोटाला 0994) जिसमें एक केद्रीय मत्री शामिल थे और देश को 650 करोड रुपये की हानि उठानी पड़ी, असम का कोषागार धोखाघडी घोटाला (995) जो 200 करोड रुपये का घोटाला था, और तमिलनाडु के पूतपूर्व मुख्यमंत्री के विरुद्ध करोड़ों रुपये के 38 घोटाले। तमिलनाडु के मुख्यमत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप 7995 में लगाए गए थे। तमिलनाई के राज्यपाल ने वो अप्रैल 995 में जनता दल अध्यक्ष को तमिलनाडु के मुख्यमत्री के विरुद्ध प्रष्टाचार नियेधक कानून के अन्तर्गत उनके विरुद्ध लगाए गए 38 आपेपों में से दो के लिए मुकदमा चलाए जाने तक की अनुमति अदान कर दी थी। इन दो आएोपों में से एक 365 करोड रुपये के कोयला आयात सौदे से सम्बन्धित है जो अगस्त 993 में हुआ था और दूसग् राज्य सरकार से भूखण्ड खरीदने के सम्बन्ध में था जो उन्होंने अनुमानित बाजाए मूल्य 427 करोड़ रुपये के स्थान पर केवल 82 करोड़ रुपये में खरीदा था। इस पूर्व मुख्यमंत्री के विरुद्ध मामले, जिसकी पार्टी केद्र में 7998-99 में भाजपा-नीत मत्रिमण्डल की घटक थी, ए्रशचार 393 वम्िलगाडु को विशेष अदालतों में स्थानान्तरित कर दिए गए थे, फिर फरवरी 999 में उन्हें शान कले के लिए सामारण न्यायालयों में स्थादान्दरित कर दिए गए क्योंकि वे प्रतिदिन केद्र साकार से अपना समर्थन वापस लेने की धमकी दे रही थी। इन्हीं मुख्यमत्रों पर सिताबर 995 में अपने गोद लिए बेटे के विवाह पर 50 से 75 करोड रुपये खर्य करने का भी आग्रेप है। एक अन्य मुख्यमंत्री जिन पर अप्रैल 995 में भ्रष्ट कार्यों में लिप्त होने के आएप लगाए गए थे वे पश्चिम बगाल के मुख्यमत्री हैं जो गत 23 वर्षों से वहा के मुख्यमत्री के पद हा बने हुए हैं। यह आगेप उन पर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री और एक मार्क्सवादी मेता ने लगाए थे। सिविल सेवाओं में भी भ्रष्टाचार सामान्य है, यहा तक कि उच्चासीन पदाधिकारियों के किरद्ध शिकायतें आती हैं व जांच होती है। यद्यपि सर्कता एजेंसियों को जनता व मीडिया को आश्वस्त करने के लिए क्रियाशील बना दिया जाता है, लेकिन आरोपित अधिकारी शायद ही दष्डित किए जाते हैं। सन्थानम (६07७0) समिति ने भी सकेत दिया है कि ऐसा विष्वाप्त है कि सकें भ्रष्टाचार के विरुद्ध थी लेकिन भ्रष्टाचारी लोगों के विरुद्ध नहीं थी। ऐसे व्यक्तियों के पास आवश्यक शवित, प्रभाव और सुरक्षा थी। इनके तीन प्रमुख उदाहरण निन हैं एक कापरेस पार्टो के केद्रीय सार मत्री जिनके घर से बहुत बडी रकम पाई गई थी और जो अनेक मामलों में आरोपित थे, एक बिहार के तथा एक तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री मो थोड़े समय के लिए जेल भी भेजे गए थे और जिनके मामले न्यायालयों में अब भरी विधाराधोन पड़े हैं (अक्टूबर 2000 में)। केद्रीय सतर्कता आयुक्त ने जनवरी और फरवरी 2000 में भ्रष्टाचार लिप्त सरकारी अधिकारियों के लगभग 200 नामों को सार्वजनिक कर देने के लिए वैबसाइट पर डाल दिया। भारतीय प्रशासन और पुलिस सेवा अधिकागी !07, ग़जस्व सेवा अधिकारी (भय कर, आबकारी व सीमाशुल्क) 77; और वन सेवा अधिकारी 23। इसके अलावा उसने एक ओर हवाला काड में प्रस्त सजनैतिक नेताओं के केसर, जो अदालतों द्वार सब मिस्त का दिये गये थे, पुन जोंच के लिए सौबी आई को (जनव, 2000 में) सौंप दिये हैं, दे दूसरे ओर रक्षा सौदों की जांच का काम भी हाथ में ले लिया है। यद्यपि इस जाच में काफ़ी समय लगने की सम्भावना है, फिर भी लगता है कि अब राजनैतिक भ्रष्टाचार को नियत्रित कने के लिए राजनैतिक इच्छा विकसित हो रही है। केद्रीय सतर्कता आयुक्त कहा 'के अफ़प्तों और ग़जनैतिक नेताओं के गुस्से को सहन कर पायेगा यह तो समय हो कपेगा। पर जिप्त तेजी से अनेक नेताओं के नाम भ्रष्टाचार से जुडने लगे हैं, लगता है कि उसपौसवी शत्ाद्दी में भी प्रशठचार को बढने से रोकना असम्भव होगा। भारतीय जनमद सस्या ([गक्ष व्राधशराणाल रण एफक्राट 0फ्रच्राए) ने सितम्बर [99 में धर्चार से सबधित दिल्ली व चेलई में 500 साक्षर वयस्कों की महम से एक सरवेहण किया था। अधिसख्य (888%) सूचनादाताओं का मानना था कि भ्राश्चाए एक पर सामान्य समस्या है जबकि 3% की राय इसके विरुद्ध थी तथा 0% ने इसके बारे ग़य व्यक्त नहीं की। लगभग 958% ने पुलिस को सबसे ज्यादा प्रष्ट बढाया, 93% ने टेलोफोन व बिजली विभाग फो, 874% ने केद्र सरकार को, 85 8% ने गज्य जाए के, 834 % ने न्याय प्रणाली व अदालतों को प्रष्ट कहा। पाँच में से तोन उग्रव प्रधशचार सूचनादाताओं 6 4५८) ने कहा कि भ्रष्टाचार तो सदैव रहेगा परन्तु इसको मात्रा को नियत्रित किया जा सकता है, 2 3% ने कहा कि इसदी जड़ें गहरी नहीं हें और इसे समाप्त किया जा सकता है। भ्रष्टाचार के कारण (७5९८5 ण॑ एणाणए007) () स्व-हित वाले ग्रजनीतिक अभिजपत का अध्युदय भ्रष्टाचार या सार्वजनिक बेईमानी के कई कारण बताए गए हैं। प्रथम कारण है ऐसे ग़जनैतिक अभिजात वर्ग का अध्युदय जो राष्ट्रहित के कार्यक्रमों और नीतियों की अपेक्षा अपने हिंत में विश्वास करते हैं। वास्तव में, ड्िटिश शासन के पश्चात का शासन मत्रियों और नौकरशाहों का शासन कहलाता है। आजादी के बाद प्रथम दो दशकों में गजनैतिक अभिजात इस हद तक ईमानदार, समर्पित और राष्ट्रवादी थे कि वे हमेशा देश की प्रगति के लिए कार्य करते थे। 967 में चौथे आम चुनाव में राज्यों और केन्द्र में सत्य में ऐसे लोग आए जो अपने निहित स्वार्थों के आधार पर कार्य करते थे, या यों कहा जाये कि वे अपने परिवार, जाति, क्षेत्र, दल, आदि के स्वार्थों के लिए कार्य करते थे। हो सकता है कि उनके कार्यक्रम और उनकी मौतिया राष्ट्रहित की रही हों लेकिन मुख्य रूप से वे उनके निजी हितों पर हो आधारित थे। उन्होंने नौकरशाहों को भी अपने पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रोत्साहित किया। हमारे देश में अधिक सख्या में नौकरशाह रीतिवादी (72॥55) हैं और समाज हित के विकासवादी कार्यक्रमों की अपेक्षा अपने पारिश्रमिक तथा अन्य लापों के प्रति अधिक चिन्दित रहते हैं। इस प्रकार रजनोतिशों और नौकरशाहों मे अपने पद और शक्ति का दुरूपयोग अवैध लाों के लिए प्रारम्भ किया। नये व्यापारी नेता, जो अपने मुनाफे को शक्ति और सत्ताषारी लोगों के साथ बाटना चाहते थे, का अभ्युदय भी सार्वजनिक सेवकों में भ्रष्ट आदतों के विकास के लिए उत्तरदायी रहा। भ्रष्टाचार का उदय सरबक्सरी अफसरों के निर्मय लेने की शक्ति से भी होता है, जैसे लाइसेंस जाये करने, आयकर निर्धारण, विस्तार (७८४४०) प्रदान करा, आदि में। नियमों के अर्थ (,(2]97८(४४०४) ने कि नियम, अधिकारियों को परोक्ष रूप से घन लेकर जेब में डालने योग्य बनाते हैं। अनेक अधिकारी हजारों और लाखों रपये देकर अपने को किसी खास जगह तैनात करते हैं, केवल इसलिए कि उन जगहों पर हजाएँ-लाखों रुपये रिश्वत कमाने का अवसर होता है । (2) सरकार की आर्थिक नीतियाँ दूसय्र कारण है सस्कार की आर्थिक नीदि। हाल के अधिकतर घोटाले उन क्षेत्रों में हुए । जहाँ क्रय नीति या मूल्य सरकार के नियत्रण में हैं। चोनीं, उवैरक, तेल, सैन्य अस्त्शरस, बिजली के उपकरण कुछ उदाहरण हैं। एक अप्रवासों भारतीय (शारा) व्यापार ने न्यायालय में दावा किया कि भारत को लुग्दी (एण9) बेचने के लिए ठेका आरप्त करने के लिए उसे पूर्व अधानमंत्री के मौखिक आश्वासन पर, चद्धास्वामी को 20 लाख रुपये देने पड़े। इसी प्रकार कौ दलाली अन्य कई घोटालों में देनो पडो। मुख्य समस्या अर्थवत्र वो भ्रमित सात परशपार 395 रियों से मुक्त करने की है। लेकिन निजीकरण के प्रति उदास्ीन रपैये से भी काम नहीं चतेगा। अब देश को स्पष्ट और पारदर्शी नियमों को आवश्यकता है। कुछ व्यक्तियों (जैसे मर, महानिदेशकों, और सचिवों) द्वार एकतरफा निर्णय भ्रष्टाचार को न्योता देना है। 995 में मदर का एनरान प्रोजेक्ट (ह॥70॥ 770६८) मुसौबत में लटक गया क्योंकि उप्तको शर्त व रतें गुप्त रूप से तय हुई थी। ज] आवश्यक वस्तुओं में कमी पध्टचाए कमी के कारण भी होता है। जब आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति में कमी होती है, स्तधारे लोग उन वस्तुओं की पूर्ति सुनिश्चित कले के लिए कुछ अपेक्षा करते हैं या उनकी कोने बढ़वा लेते हैं। यह तब होता है जब माग बहुत ज्यादा होती है लेकिन रोजाना की अवायकताओं की पूर्ति बहुत कम होती है, जैसे चौनी, सीमेन्ट, तेल, आदि । (॥ थकाया में परिवर्तन हे समान में मूल्य व्यवस्था में परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं। नैयिकवा, ईमानदायी और झा के पुराने आदर्श निरर्थक माने जाते हैं और भेंट स्वीकार करता मूर्खता की अपेधा आवश्यक्ता' (॥020) के रूप में मादा जाता है। ($) आपषवी भ्रशाप्रनिक संगठन अशेचार प्रशासनिक कमो से भी पनप सकता है। देखभाल व सर्तकवा कौ कमी, प्रशासनिक वासियों को अत्यधिक शक्ति देना, गैरजिम्मेदारी, व्रुटिपूर्ण सूचना व्यवस्था, आदि को न केवल भ्रष्ट होने का अवप्तर प्रदान करते हैं बल्कि भ्रष्ट तरौके अपनाने के बंद भी वे अप्रभावित रहते हैं। प्रशचार के कारणों को आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, वैधानिक और न्यायिक श्रेणी भी रखा जा सकता है।आर्थिक कारणों में, उच्च जीवनशैली के प्रति अति मोह, मुद्रा श्रसार, शेप प्रघाली तथा ज्यादा लाभ लेने की प्रवृत्ति है ।स्रामाजिक व्यवप्तायियों में ईमानदारी को कप, जोषन के प्रति भौतिकतावादो दृष्टिकोण, सामाजिक मूल्यों में गिरावट, अशिक्षा, अम्ल (३०५०४७४४८) सास्कृतिक गुण, सामन्तवादी स्मृतिया ([०003॥9९ ०४०), जनता की सहनशीलता व उदासीनता, तथा शोषणवादो सामाजिक सरचना हैं। एसेविक कारणों में, राजनेतिक सरक्षण, अप्रभावी राजनैतिक नेतृत्व, राजनेतिक तटस्थवा (4०0), राजनेतिक नैतिकता, चुनाव में घन देना, गजनैतिक और राजनैतिक उप-सस्कृति गाय साठागाठ, आदि हैं। वैधानिक कारणों में अपर्याप्त कानून, कानून में कमिया, कानून ने बे में सुस्तो है। न्यायिक कारणों में, महगी न्याय व्यवस्था, न्यायिक उदासीनवा, “नर में प्रदिवद्धवा की कमी; तथा वकनौकी कारणों से अपपरधियों का अधिक घूट रेज, आदि है। है ह+ + पर को बढाने वाले कुछ कारक इस प्रकार भी है पहला कारक है एक अधिवारी * ऐप में शवित्त का केन्द्रित होना जिसके लिए मनमाना निर्णय करना सम्भव है और पोडित 39% भअ्र्लचार नागरिक प्रभावी हल पाने की स्थिति में नही रहता। शक्ति और विवेक कार्यकारिणी, पुलिस और न्यायपालिका में निहित हैं जिसके सभी सदस्य चरित्रवान नहीं होते हैं। दूसरा कारक है आर्थिक व सामाजिक पिछडापन। लोकसेवक और उसके ग्राहकगर्णों (लाक्षाश०) की प्रस्थिति के बीच फासला इतना अधिक होता है कि लोकसेवक समाज के प्रति अपने दायिलों को भूल जाता है और ग्राहकगण उसकी अपमान भरी भाषा भी सहन करते हैं। तीसय कारक है उपनिवेशवादी और सामन्ती ताकतों से शक्ति प्राण लोगों की जनता के द्वारा आधीनता स्वीकार करना। चौथा कारक है अधिकारियों का गैर जिम्मेदारीपूर्ण रबैया और प्रशाप्ननिक विलम्ब। पाँचवा कारक है भ्रष्टाचार के मामलों से उदासीनता से निपटना। जो लोग श्रेणीक्रम का लाभ उठाते हैं और शक्तिशाली होते हैं वे जबावदेहो से कतराते हैं और भ्रष्ट अधीनस्थ व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करने में ढोलापन दिखाते हैं। यह बाव पुलिस, सचिवालय, पी डब्ल्यू डी, सीमाशुल्क (८०६०:४५) और बई अनेक विभागों में है। अतिम कारक जनता वी चीख-पुकार में कमी तथा जनमच की कमी है जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठा सके। हमारी साम्ताजिक व्यवस्था ऐसी 'मुलायम' है कि लोग सबसे प्रष्ट व्यक्ति के विरुद्ध नि््रिय और गूगे बन जाते हैं, उनके समाज विगरेधी व्यवहार को सहन करते हैं और शक्तिशाली जन-प्रचार करने में असफल रहते हैं। भ्रष्टाचार का प्रभाव (प्रपत्र ण॑ (0००0०) भ्रष्टाचार की बात करते समय क्‍या हमें बडे वित्तीय मामलों या घोटालों पर ही बात करनी चाहिए या फिर सार्वजनिक, नौकरशाही, औद्योगिक, सस्थात्मक आदि प्रकार के भ्रष्टाचार पर या फिर उन मामलों पर भी जो दिखाई तो नहीं देते किन्तु हमारे दैनिक जीवन में छाए रहते हैं और हमारे नैतिक तानेबाने को कमजोर बनाते रहते हैं। कुछ लोग महसूस करते हैं कि हों भ्रष्टाचार को कई श्रेणियों मे बाट लेना चाहिए। एक विचार के अनुसार भ्रष्ट कार्य का आपार "धन राशि' (४७0७४) होनी चाहिए, जबकि दूसग़ विचार है कि “आवश्यकता (॥९20) पए ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए। एक बडे लाभ की प्राप्ति के लिए खर्च किए गए थोडे रुपये पर परेशानी नहीं होरी चाहिए। दूसरा विचार यह है कि 'वाछ्ित सेवा' प्राप्त कले के लिए “खर्च' की गई राशि चिन्ता का विषय नहीं होनी चाहिए। भ्रष्टाचार तभी आता है जब 'कौमत चुकाई जाती है लेकिन उसके लिए कोई सेवा नहीं की गई। लेकिन भोजन में मिलावट था नकली दवाए बेचने पर और इसी प्रकार के मामलों को क्‍या कहें? सामान्यद हमीरे दैनिक जीवन में ऐसे मामले “भ्रष्टाचा/ नहीं कहे जाते। क्‍या परीक्षा में मकल करवाना भ्रष्टाचार है ? क्या उत्तर पुस्तिका में परीक्षक द्वार अक बढाए जाना, किसी मित्र की सिफारिश पर या नातेदार या सहयोगी के कहने पर, (लेकिन धन स्वीकार कर के नहीं) भ्रष्नचार है? अपने बचाव में परीक्षक कहते हैं कि वे 'एहसान' करते हैं और एहसान करा प्रष्टाचार कैसे हो सकता हैं? बहुत से लिपिक कार्यालय जाते हैं और उपस्थिति-पजिका पर हस्ताक्षर की देते हैं, लेकिन अपनी कुर्सी पर नहीं मिलते । वे तभी उपलब्ध होते हैं जब उन्हें फाइल आगे बढाने के लिए धन दिया जाता है। यहा घन लेगा भ्रष्टाचार है। कुछ लोग कहदे है कि जब भ्रष्टाचार अमेरिका, जापान, इग्लैण्ड, फ्रान्स, कनाडा और प्ाका 39 उतरी जैसे विकसित देशों में है तो भारत में अनावश्यक रूप से लोग इसके लिए क्‍यों दिनित हैं? यह लोग पूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार की अ्रकृति उन देशों में हमारे देश से भिन्न है। ज देशों में भ्रष्टाचार केवल उच्चस्थ व्यापारी लोगों के बीच होता है, जबकि भारत में हें रेल आस्षण के लिए, न केवल व्यावसायिक सस्थाओं में प्रवेश हेतु बल्कि बच्चों को प्रषमिक स्कूल में प्रवेश के लिए भी, सिनेमा टिकट खरीदने के लिए, गैस सिलेण्डर खरीदने के लिए, बिना हेलमेट स्कूटर चलाने के लिए, बकाया राशि (35८४४६) का बिल पास करामे के हिए, टैक्स वापप्त लेने ८४५४०) के लिए पैसा देना पड़ता है। अन्य देशों में जब अवैध इलुओं को प्राप्त कने के लिए पैसा दिया जाता है, भारत में वैध और अधिकारिक चौजों को प्राण कले के लिए पैसा देना पडता है। आम आदमी के दैनिक जीवन को यह सब बातें प्रषादित करती हैं। अठः हमें ऐसे प्रष्ट कार्यों पर भी चिन्ता करनी है। प्रष्टाचार ने हमारे समाज को कई प्रकार से प्रभावित किया है (॥) इसने देश के आर्थिक विकाप्त को रोका है, 2) इसमे समाज में हिंसा और अराजकता को जन्म दिया है क्योंकि प्र्ट व्यक्त के पास कानून लागू करने वालों को अपने फाय्दे के लिए खगैदने की एन शक्ति है, 6) इसने जातिवाद, भाषावाद, और सम््रदायवाद को जन्म दिया है, (4) इसने को गिराया है और वेयक्तिक चित्र को नष्ट किया है, 5) इसने अकुशलता को बदया है, भाई-प्तीजावाद और सुस्त में वृद्धि को है और प्रशासन के हर क्षेत्र में अनुशमरहोनता को जन्म दिया है जिसये साधारण आदमी का जीवन कष्टप्रद हो गया है, 6) ने जनता की दृष्टि में अफसरों की विश्वसनीयता को कम कर दिया है, 0) इसने देश में के धर में वृद्धि की है, () इसने खाने-पीने की चीजों मे, दवाओं में मिलावट का रास्ता और उपभोक्ता पदार्थों में कमी पैदा कौ है, और ७) इसने सरकार को केद्ध और एम दोदों स्तों पर अस्थिर बनाया है। डापू/विधान (8 685/00) शबार गिोषक अधिनियम (एएथ्जाणा रण 0०सण्एएण हट) सितम्बर 988 में लैगू हुआ। इसमें 947 के भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के प्रावधान समाहित थे और आप्ैसो (9८) की कुछ धागएं, अपराधी अक्रिया सहिता (एाप्रगाणथ। .70८९तएा० 00६) और 952 का अपयाधी कानून अधिनियम (कगाए०० 0७ ४०) के प्रावधात भे स्मविष्ट है। यह पवा लगने पर कि द्विदौय महायुद्ध के बाद लोक सेवकों में रिश्वरखोरी औए प्रशचार काफ़ी बढ़ गए हैं और बहुत से स्वार्थी अधिकारियों ने बहुत धत इकट्ठा कर !] है दया भौजूदा आई पीसी. और सी. आरपी सी समस्याओं से जूझने के लिए अपर्याप्त हक !997 दा प्रष्टाचाए नियेधक अधिनियम पारित किया गया। सी आरपोसी (८४7९८) में एक सेवकों से सम्बन्धि अपराध सशेय (००5गराथ््रौ०) नहीं है, तेकिस ॥947 के अदिनियम ने अपराधियों के विरुद्ध अपराध की कुछ मान्यताएँ बनाना न्यायालय के लिए उवेश्यक हो गया। 4947 के अधिनियम के अन्वर्गत साक्ष्य अस्तुत करने या बोझ आरोपी आ गया। आयेपी के विरुद्ध जाँच उप-पुलिस अधीक्षक से बीचे के अधिवारी द्वार नहीं भी जासकतों। 947 के अधिनियम मे रिश्वत लेना, धन का दुरूपयोग करना, आर्थिक लाध 398 अशचाःर उठाना, आये से अधिक सम्पत्ति जमा करना ठथा अभिकारिक पद का दुरूपयोग करना आदि भ्रष्टाचार के कार्य व अपय्रध घोषित किये हैं। परन्तु मुकदमा चलाने का अधिकार केवल विभागीय अधिकारियों को दिया है, न कि केद्रीय जांच ब्यूगे (08) को। 988 अधिनियम में 'लोक सेवक' शब्द का क्षेत्र व्यापक कर दिया गया और इसमें बडी सख्या में कर्मचारियों को शामिल किया गया। केद्रीय कर्मचारियों और केन्द्र प्रशामित राज्यों के कर्मचारियों के अलावा, सार्वजनिक उपक्रमों, राष्ट्रीकृत बैंकों, केन्द्रीय व गज्यों से सहायता प्राप्त सहकारी समितियों के पदाधिकारी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कर्मचारी, उप कुलपति, केद्धीय व राज्य सरकारों से आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाली सस्थाओं में वैज्ञानिक और प्रोफेसर, तथा स्थानीय प्रशासन से सम्बन्धित सस्याओं के कर्मचारी, सभी को “लोक सेवक घोषित कर दिया गया। यघ्षरि, ससद सदस्य तथा विधायिकाओं के सदस्य सार्वजनिक कार्य करते है तथापि उन्हें इस अधिनियम की परिधि से अलग रखा गया है। इस अधिनियम के अन्तर्गत 947 के अधिनियम में वर्णित सभी भ्रष्ट कृत्य सम्मिलित किए गए हैं (रिश्वत, दुरूपयोग, धन सम्बन्धी लाभ उठाना, आमदनी से अधिक सम्पत्ति एकत्र करना)। अधिनियम सम्पूर्ण भारत में (जम्मू और कश्मीर को छोडकण सभी नागरिकों पर लागू होता है, भले हो वे देश में रहते हों या देश से बाहर। यदि लोक सेवक के विरुद्ध न्यायालय में अपराध सिद्ध हो जाता है तो इसमें कम से कम 6 माह के कारावास का दण्ड है, लेकिन यह 5 साल से अधिक नहीं हो सकता। इस प्रकार 6 माह का कारावास तो आवश्यक (7007) है ही और न्यायालय का विवेक इस सम्बन्ध में मान्य नही है। यदि लोक सेवक को यह अपराध करे का अध्यस्त पाया जाता है तो उसको दो वर्ष से कम की सजा नहीं होती लेकिन सात वर्ष से अधिक का कारावास और आर्थिक दण्ड नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए किए गए उपाय (४रद्धा5४०९५ शा 00 (०्रॉशा) (०-०७) विद्यमान केन्द्रीय जाच ब्यूगे और भ्रष्टाचार-विशेधी पुलिस जोंच पडताल, कार्यवाही प्रारम् करने और भ्रष्ट मत्रियों तथा शीर्षस्थ अधिकारियों को दण्डित करने मे असहाय सिद्ध हुए हैं। इसमे आश्चर्य नही, हाल ही में लोगो ने न्यायिक सक्रियवाद' (062 8८४७०) बात करना शुरु कर दिया है। यह सर्वविदित है कि सीबी आई बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के मामले की तेजी से जाच केवल उच्च न्यायालय के सरक्षात्मक शाखा के अन्तर्गत ही कर सकी । सीबी आई सरकारी तन्त्र होने के कारण सरकार को दरकिनार करके लम्बी अवधि के आधार पर न्यायालय को सीधे रिपोर्ट नही कर सकती | इसकी कार्यप्रणाली सरकारों देखोख के बिना नहीं चलती। सीबी आई के अधिकारियों ने अपने ऊपर राजनैतिक दबाव की बाद स्वीकार की है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि निम्न और मध्यम कोटि के लोक सेवकों पर सतर्कता बरतने में सीबी आई की भूमिका सीमित हो होगी। लोकपाल और लोकायुक्तों | ही भ्रियों तथा उच्चस्थ राजनीतिज्ञों को दण्डिद करना होगा। समाज केवल पुलिस की निगरानी पर निर्भर नहीं रह सकता क्योंकि पुलिस कुख्यात है कि वह भ्रष्ट के विरुद्ध साक्ष्यों को मिटाने, तोडमोड कर तस्तुत करने तथा झूठे मामले बनाने में माहिर है। अद्यगार 399 श्री के सन्थानम की अध्यक्षता में एक भ्रष्टाचार निरोधक समिति का गठन 960 में किया गया था। विधाग के कामकाज को कुशल बनाने के लिए सन्यानम समिति ने यह गाय सुझाए थे. ()) सतर्कता (भंह9700) अधिकारियों को भ्रष्टाचार की शिकायतों की जब कोने की स्वत देना,न कि प्रष्ट अथाओं की जॉच करने की, (2) सतर्कता अधिकारियों के कुशल कार्य के लिए ओलति का आश्वासन देना, 6) उच्चस्थ अधिकारियों के मामलों के जांद पड़ताल के लिए सतर्कता अधिकारियों को उनके मूल केडर में वापस भेजने से जुदा का आश्वासन देना, (4) केद्धीय सतर्कता आयोग में केन्रीय लोक सेवाओं और फीकी ऐैवाओं को प्रतिनिधित्व देना। (यह सिफारिश 998 के अन्तिम महोंों में सतर्कता अगेग का पुनर्गठन काके लागू कर दी गई, 6) सतर्क विभाग के अराजपत्रित कर्मचारियों के विभाग के नियमों और कार्यप्रणाली के विषय में गहन प्रशिक्षण देना क्योंकि सतर्कता के 9 % मामलों की छानबीन निम्न स्तर पर ही होती है, ७) मामलों की छामबीन में विलम्ब मे ऐक़ने के लिए सरकार द्वात व्यवस्था के चरणों की सख्या में कमी। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ही केद्ध सरकारी और अन्य कर्मचारियों के किद्ध प्र्टाचार के मामलों को देखने के लिए 964 में केन्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना के पई थी। केद्रीय साकार ने निम्नलिखित चार विभागों की स्थापना भ्रष्टाचार पिसेधी गायों के अन्तर्गत की, () कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग में प्रशासनिक सतर्कता प्रभाग (0०७0८ शह्ाआप्ट एधणा), 00) केद्रीय जाँच ब्यूगो (28), (0) पक बैंकों/सार्वजनिक उपक्रमों/मख्रालयो/विभागों में घरेलू सरर्कता इकाइया और (९) मर्कवा आयोग (0५०.))। भव मुख्य सतर्कता आयुक्त द्वाणा भ्रष्टाचार से निपटने के लिए दिये गये कुछ सुझाव विद्यणोय * दिखें, ॥2040 बाबा त॒ 2:29॥7 4क्राशफए/4707, ।०५-$९एा/थाफट 907 438) (॥) केद्रीय मत्रियों और सासदों के विरुद्ध कार्यवाही काले के लिए (एजनीविक शा के विद) शक्तिवान लोकपाल सस्था की स्थापना करना, 2) सीबी आई पए निर्भर शा लोकपाल को अपनी स्वतत्र जाँच पड़ताल करने वालो तथा मुकदमा चलाने वाली होनी चाहिए, 6) लोकपाल के पास अपनी छानबीन करने के बाद मत्री के विरुद्ध बिऱ्े अदालद में प्रथम दष्टा दोषी ठहराए जाने के बाद मुकदमा चलाने की शक्ति होनी “हर ६) न्यायालय में आगेपी मत्रों के विरुद्ध आेप पत्र दाखिल किए जाने के बाद उसे कहो रुप पे अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, 6) मुख्य सर्वता आयुक्त को ५३। जो का पद भी दिया जाना चाहिए, 6) केद्रीय लोकायुक्त, सामान्य ब कर्मचारियों और पूछताछ तथा अभियोग चलाने वाली एजेन्सियों से जुड़ा | बाहर। पीवीसी. (०५०) के अमुख कार्य इस प्रकार हैं: .) किसी भी लोक सेवक के विरुद बशदर शिकायत आने पर उसकी जाँच पड़ताल करना, (0) भ्रष्टाचार के लिप्त आरोषी कि के विर्द्ध की जाने वाली कार्यवाही के प्रकार के विषय में अनुशासनात्मक अधिकारी ब झी देगा, (४) नियमित मामला चजीकृत वरने के लिए सीबी आई को निर्देशित कैप झट मन्रालयों/विभागों/बैंकों/ सार्वजनिक उपक्रमों में सकता और भ्रष्टाचार | +« क्यों का निशेक्षण और उन पर रोक लगाना। 400 प्रद्टाचार राजनीतिजों और सार्वजनिक कम्पतरियों के भ्रष्टाचार पर आयोग (एकाज़ांइच0॥$ 0॥ (०ाप्॒एंणा एण॑ एणाएलंंाऊ 6 ?7फार (०एफश्ालऊ) गन 50 वर्षों में राजनीतिजों और सार्वजनिक कम्पनियों के विरुद्ध लगे भ्रष्टाचार के आएं की जाँच के लिए भारत सरकार द्वार दो दर्जन से भी अधिक आयोग (955 और मार्च 2000 के बीच) नियुक्त किए जा चुके हैं। इनमें से नौ आयोग दो 963 से 983 तक हो विविध राज्यों के मुख्यमत्रियों के विरुद्ध नियुक्त किए गए थे। ये थे पजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रताप म्िंह केग्ें के विरुद्ध दास आयोग (963), जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बखशौ गुलाम मुहम्मद के विरुद्ध आयगर आयोग (965), णोआ के मुख्यमत्री दयानन्द भाण्डेडकर के विरुद्ध कपूर आयोग (968), उडीसा के मुख्यमत्री बीजू पटनायक के विरुद्ध खना आयोग (967), असम के मुख्यमत्री वीके मेहताब के विरुद्ध मंघोकर आयोग (968), तमिलनाडु के मुख्यमत्री करुणानिधि के विरुद्ध सरवारिया आयोग (976), कर्नाटक के मुख्यमत्री देवगज उर्स के विरुद्ध ग्रोवर आयोग (१977), आम्ध्र प्रदेश के मुख्यमत्री वेंगल राव के विरुद्ध विमदा लाल आयोग (१977), और पजाब के मुख्यमत्री जैलसिंह के विरुद्ध गुरुदेव सिंह आयोग (979) मत्रियों के विर्द्ध पाँच आयोग इस प्रकार थे केन्द्रीय वित्त मद्री टीटी कृष्णामाचारी (जीवन बीमा निगम के अध्यक्ष और सचिव भी) के विरुद्ध छागला आयोग (0956), बिहार के पाँच मत्रियों के विरुद्ध अथ्यय आयोग (967), बिहार के 3 मत्रियों के विरुद्ध मघोलकर आयोग (968), केरल के मत्री आर के कुँजू के विरुद्ध आयोग (969), और केद्रोय रक्षामत्री बन्सौलाल के विरुद्ध (ठेके देने पर) रेड़्ी आयोग (977) | भ्रष्टाचार के ही आरोपों के विरुद्ध पाँच अन्य आयोग इस त्रकार थे सरकाए मामलों में अतिरिक्त सवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करके हस्तक्षेप करने तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध जाच के लिए मोरारजों देसाई के पुत्र कान्ति भाई देसाई और प्रधानमत्री चरण सिंह की पली गायत्री देवी के विरुद्ध वैद्यालिगम आयोग (१979), केरल और 20३8६ स्पिरिट घोटाले के विरुद्ध कैलासम सदाशिवम और रे आयोग (987), बोफोर्स दोष सौदे में भ्रष्टाचार के आपोपों पर जाँच हेतु शकरानन्द समिति (990) और सुरक्षा घोटाले पर जानकीरमन समिति (992) | बोहण समिति की स्थापना जुलाई ॥993 में भारत में भ्रष्टाचार के अध्ययन के लिए की गई थी जिसमें सरकारी कार्यकर्ताओं, राजनैतिक महानुभावों, अपराधी गठजोड़ और माफिया सगठनों के बीच सम्बन्धों का अध्ययन किया जाना थां। समिति ने अक्टूबर 5. 993 को अपनी एिपोर्ट अस्तुत की थी। सरकार 8 माह तक इस रिपोर्ट को दबाए छी लेकिन ससद में विपक्षी दलों के दबाव डाले जाने पर | अगस्त, 995 को यह पिपोर्ट ससद के दोनों सदनों में रखी गई। इस रिपोर्ट में राजनीतिशें और अपराधियों के बीच गठजोड पर विध्वसक प्रहार किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि माफिया जाल एक समानान्वर सकाए चला रहा है जिससे राज्यतत्र निरर्थक हो गया है। समिति ने तो यह भी कह डाला कि कु सासद और विधायक केवल इन “गिरोहों' और सशख सेनाओं के बल पर ही राजनैतिक सता में आए हैं। समिति में एक सर्वाधिकार ऐजेन्सी को स्थापदा कौ सिफारिश की है जो सभी इशबार बा एजेन्सियों से सूचना एकत्र करे, उनकी बुलना करे, और उन अपराधी सिश्डिकेटों, तस्कर पिऐेहें और देश में कार्ययट आर्थिक लॉबीज के विरुद्ध तुस्‍्त प्रभावी और निरोधक कार्यवाही को जिटोने स्थानीय स्तर पर सरकारी तत््र से तथा राज्य और केद्धीय स्तर पर राजनीतिशों औएप्रवाजन से वर्षों से सम्पर्क जाल विकसित कर लिया है। भारत में ]! राज्यों में (बिहार, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्टू, राजस्थान वए उत्तर प्रदेश आदि सहित) मत्रियों, विधायकों, सरकारी कार्यकर्ताओं तथा अन्य सार्वजमिक वार्यकर्तओं के विरुद्ध भ्राश्चार के आगेपों को जाँच के लिए लोक आयुक्त की स्थापना की गई है। एट्टीय स्तर पर ऐसो कोई सस्था नहीं है जो मत्रियों की ईमानदारी व नैतिकता पर गिगह रखने का कार्य करती रहे, यद्यपि अगस्त 992 में और पुन अगस्त ]994 में प्रधाममत्री ने वायदा किया था कि स्वीडन के ओमबड्समैन (07000) और योरोप के कुछ अय् देशों की तरह यहा भी कानूनी तौर पर केद्धीय स्तर पर एक सस्था बनाई जग्ेगो। गत 26 वर्षों में पाच बार (/963, 97, 977, 7985 और 989 में) लोकपालों के गियुक्‍्त के के सम्बन्ध में लोकसभा में लोकपाल विधेयक प्रस्तुत किया गया था किन्तु परत क्रो नहीं किया गया। सयुकत मोर्चा सरकार ने भी सितम्बर 996 में लोकपाल विधेयक ससद में पेश किया था जो भी पास मही हो सका! 999 में अटल बिहयगी कौ गजग गठबन्धन सरकार ने भी लोकपाल बिल पास करने का आश्वासन दिया पर पानु अक्यूबर 2000 तक पु नही हो पाया है। वास्तव में रूकावट यह है कि एजनैतिक उैछाशक्ति का अभाव रहा है । लोकपाल का दूसरा स्थानापन (5४७४0७॥०) नहीं है दिस़का कार्यदषेतर उच्च पदस्थ लोगों, प्रधानमत्री सहित, के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आगेपों की जच करने तक ही सीमित हो। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा चलाना केवल दी सम्पत है जब शिकायतरकर्ता को सरकार की अनुप्रत्ि प्राप्त हो जाये जो कि शायद हो कभी किसी खास कारण पर दी जाती है। जब तक संस्कार सहमत न हो, कोई भी नागरिक विशेष अद्वालत अधिनियम के अन्तर्गत अपोल नहीं कर सकता कि कार्यवाही के लिए प्रथम दृष्ट मामला बनता है। लोकपाल में यह दोनों बाधाएँ नहीं होंगी जो कि किसी अमित दाग एक शपथ-पत्र भर कर चलाया जा सकता है। उधचा प्ले सर्व (एएफआा8 (007 ७:४०) अर हमे समाज में भ्रष्टाचाए को ऐेकना सम्भव है? कई नेता जब प्रथम बार सत्ता में आते रैते घोषणा करते हैं कि वे प्रष्चार मिटाने के लिए वचनवड्ध हैं, लेकिन जल्दी ही वे स्वय ४ हो जाते हैं और घन इकट्ठा करना शुरु कर देते है। 977 में जब बगाल में कम्युनिस्ट > अर रुता में आई, तब यह कहा जा रहा था कि यह कुछ ही वर्षों में भ्रष्टाचार समाप्त कर । आज पार्य में अधिकतर सत्ताघारी नेता इस हद तक प्रष्टाचार में लिप्त हैं कि किये का एक सदस्य, जो एक समय त्िपुश का मुख्यमत्री था, वो अप्रैल 7995 में ग्प्‌ से हे हा कारण निकाल दिया गया, क्योंकि उसने पार्टी के शोर्पस्थ व्यक्ति को प्रष्ट र पाई भदीजावाद में लिप्त होने का दोषी ठहसया। 984 में जब शजोव याघी प्रषानमत्री के भी अ्रशचार के विरूद्ध जग का ऐलाव कर दिया लेकिन जल्दी ही वे स्वयं फई घोडले में आगेषित हो गए। इस प्रकार प्रष्टायार एक सस्थात्मक 402 अष्टाचार (]750/०७७०३॥॥४८०) रूप ले चुका है। धि प्रष्टाचार के विषय में कई भ्रामक घारणाएं (0909) हैं जिनको हमें मिटाना पडेगा, यदि इससे हम वास्तव में लडना चाहते हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं, भ्रष्टाचार जीवनशैली बन गया है और अब इसके विषय में कुछ भी नहीं किया जा सकता, या कि प्रष्टाचार स्वतंत्रयोत्तत काल की घटना है और यह जनतत्र में लोगों को अत्यधिक आजादी देने का परिणाम है, या कि गरीब और पिछडे देशों के लोग सामान्यत बेईमान और स्वभाव में अविश्वसनीय होते हैं और आसानी से ललचा जाते हैं, जबकि विकसित देशों के लोग भ्रष्टाचार में कम लिप्त होते हैं, या कि भ्रष्टाचार केवल निम्न या आपोनस्त्य सदर पर हो होता है, या कि भ्रष्टाचार शिक्षित लोगों की अपेक्षा अशिक्षित लोगों में अधिक पाया जाता है, या कि भ्रष्टाचार प्रमुखत राजनीविज्ञों के कारण फैलता है। यह सभी भ्रमात्मक तथ्य अत्यन्त भदे और अशोधित (७४०८) हैं और भ्रष्टाचार को गेकने के उपायों की योजना बनाते समय हमें इनसे सावधान रहना है। प्रष्टाचार को कम करने के कुछ तरीके सुझाए गए हैं। ये हैं एक, भ्रष्टाचार को नियच्ित करने के लिए हमें कानून, कार्यविधि, और प्रशासन पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। विशिष्ट स्तर और विशिष्ट व्यक्तियों के विशेष स्थितियों में काम करने और व्यवहार करे के सम्बन्ध में कानून और नियमों का होना आवश्यक है। “बुरे” कानूनों/नियमों को समाप्त किया जाना चाहिए। यदि कानून/नियम अत्यन्त कठोर, जटिल और द्विअर्थक हों तो इससे प्रशवाए को प्रोत्साहन मिलेगा ही। कानून ऐसे म हों कि उनमें विवेक प्रयोग की अत्यधिक छूट हो। विवेक का प्रयोग अधिकारी के स्तर और उसकी भूमिका के आधार पर निश्चित होना चाहिए। प्रशासनिक कारकों में सरचनात्मक और प्रकार्यात्मक दोनों ही कारक शामिल हैं। सगठन की सरचना किस प्रकार की है यह तथ्य भ्रष्टाचार के लिए कमजोरियों का निर्धारण करेगा। प्रकार्यात्मकता (0००००) कर्म करने की निरन्तर प्रक्रिया को इंगित करी है जो कि कार्य की गुणवत्ता, परिमाण, निरीक्षण तथा मान्य कमियों की अधिकता दर्शादी है। दो, कृत्रिम कमी और अभावों पर नियत्रण हो जिससे अवैध सन्तुष्टि की सुविधा को बल मिलता है, दीन, सतर्कता में वृद्धि हो। यह एक प्रम है कि सतर्कता से कुशलवा में बाघा उत्पन होती है, बल्कि यह तो इसमें वृद्धि करती है। सद्धिग्य अधिकारी जिनकी निष्ठा सन्देहास्पद हो, को सवेदनशील पदों से दूर रखा जाये। भ्रष्टाचार के ज्वलत बिन्दुओं का अचानक निरीक्षण किया जाये। चार, उदारीकरण की नीति को सावधानी से लागू किया जाये। कभी-कभी उदारीकरण और मुक्त बाजार की नीतिया भ्रष्टाचार को कम करदी हैं लेकिन वर्तमान में उदारीकृत अनुमतिया (६०7८७००७), कोई 'पक्षपात' प्राप्त करने के बदले में स्वीकृत की जाती हैं। अमेरिका, जापान, दक्षिणी कोरिया, कनाडा, घौन, फ्रास, जर्मनी जैसे पूंजीवादी देश अत्यधिक भ्रष्ट समाजों में गिने जाते है। जापान में तो आए दिन हम भ्रष्टाचार, घोटालों आदि के विषत में सुनते रहते हैं जो कि चेईमानी और दम्भ (0;9००7७) के सस्थानीकरण को दशत हैं। पाँच, चुनाव के खर्चों पर सख्ती से नियत्रण लगाया जाये। अन्तिम, भ्रष्टाचार को सफलता मे रोकने के लिए लोगों का सहयोग लिया जाना चाहिए। हम अन्तिम दो उपायों की विस्तार से विवेधना करेंगे। भ्रष्टाचार के मामलों को सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी जाती? क्या इसलिए कि अशचका 403 लोगों को डर रहता ऐ कि प्रष्ट लोग उन्हें ही हानि पहुचा देंगे ? वे उदासीन होते हैं कि समाज के सुधाला उनका कर्तव्य नही है, और निराशायादी होते हैं कि भ्रष्ट लोग शक्तिशाली और प्रणावगशाली लोग होते हैं और उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी। तथापि, ऐसे ज्ोग हैं जो भ्रष्टाचार के मामलों को अधिकारियों के समश्च लाने का प्रयास वो करते हैं। ये वै होग होते हैं जो बेचैन रहते हैं, जिनमें अपराध भावना नहीं होती है और जिन्हें समाज को प्रताई के लिए कुछ कल में चैन मिलता है । भ्रष्टाचार एक बहुमुखी शैतान है जिसको लोगों के सामूहिक प्रयास से ही पराजित किया जा सकता है। यदि जनसमुदाय यह मानस बना ले के बेझान राजनौतिओों को नहीं चुना जाना है तो आधी बाजी जीत ली ! लेकिन अहम्‌ प्रश्न फ है कि क्या यह कभी होगा? पाल जैसे प्रजातन्र में क्या लोग कभी यह महसूस करेंगे कि भ्रष्टाचार जैसी समस्या पे लड़ने के लिए उन्हें अहम्‌ भूमिका निभानी है 2? वास्तव में, अधिकतर प्रष्टाचार इसलिए तेवर है क्योंकि लोग सहनशील होते हैं और इसके विरुद्ध हल्ला-गुल्ला नहीं करते हैं तथा गक्तिशाली मंच की कमी भी होती है। यद्रपि अनेक बुद्धिजोवी, शिक्षित, सुपरिचित और सष्टवादो नागरिक देश को इस शैतानी समस्या के प्रति चिन्तित रहते हैं लेकिन वे अपना , शक्तिशाली जनमत बनाने में नहीं लगा पाते और असफल हो जाते हैं। जिम्मेदार और जागहक नागरिकों का सम्मिलित प्रयाप्त प्रष्टाचार के स्तर को मीचे गिय सकता है। मरे विश्वविद्यालयों के छात्र भो ऐसे समाजोन्मुखी उद्देश्यों को लेकर इस बुराई के विरुद्ध आदोल्न प्रारम्प कर सकते हैं। एक और प्रभावशाली उपाय ऐसे तरीकों को लागू करना हो सकता है जो राजनैतिक के चुनावी धन को स्थाई रूप से प्राप्त करे में मदद करें, या केद्रीय साकार चुनाव भरष से चुनाव को वित्त व्यवस्था प्रदान करे। यह व्यवस्था जर्मनो, नावें और स्वीडन और भोतेप के कुछ प्रगतिशील देशों में अपनाई जा एही है। एजनीतिक दलों को राज्य द्वार आर्थिक सहायता पूर्व चुनावों में उनको मिले वोटों के आघार पर की जा सकती है। यह धन अति वोट के हिसाब से, यों कहिए दो रुपया प्रति वोट, या इसी प्रकार निश्चित किया जा पडता है। 8 के हिसाब से घन देने का विचार सप्तद में हाल के ही वर्षों में चर्चा का विषय बना है, लेकिन वर्तमान (अक्टूबर 2000) राष्ट्रीय जनताव्रिक गठबंधन सरकार महसूस की है कि वह नकद धन देने में असमर्थ है | यह सत्य प्रतीव नही होता। मुद्रास्फीति की ईमान दा पर संसद और विधानसभाओं के चुनाव के लिए लगभग 000 करोड रुपये को अवश्पकता है। क्योंकि चुनाव प्रति 5 वर्ष में होते हैं अठ सरकार को केन्द्रीय बजट में 200 कोड रुपये वार्षिक रखने होंगे। क्योंकि हमारा वार्षिक बजट 50,000 करोड पे परे भी अधिक का होता है, इसका अर्थ हुआ कि वार्षिक बजट में 04% ही चुनाव पर रोगा। यदि सरकार यह समझती है कि इतना थोडा सा घन भी नहीं दिया जा सकता दोयें पर चुनाव कर लगाया जा सकता है। चुनाव को स्कागे सहायता प्रष्टाचाए को कैजी हद तक कम करेगी! चुनावों में ग़ज्य द्वाा घन दिया जाना न केवल प्रष्ट व्यापारियों जि जादों समू्ें से आने वाले योगदाव को कम करेगा बल्कि स्वर एवं स्वच्छ चुनावों में थे दोगदान करेगा और विधायिकाओं में ईमानदार व्यक्तियों को आकर्षित करेगा हा दिविष पार्थयों द्वार खर्च किए गए घन को समान कोगा। 404 भ्रट्टाचार उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त, लोकपालों की नियुक्ति उच्चासीन लोगों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आगेपों को देखने के लिए एक प्रभावी उपाय सिद्ध हो सकता है। वर्तमान में ॥7 राज्यों में नियुक्त लोकपाल निष्पभावी हो गए हैं क्योंकि कई अयोग्यवाए और कमिया रह गई हैं। उनके ही अनुभवों से पदा लगा कि लोकपालों के अधिकार विस्तृत किए जाने की आवश्यकता है। उनकी सिफारिशों को की दर्जा दिया जाना चाहिए। इनको सिफारिशों को ससद पटल पर रखा जाना चाहिए ओर प्रचार माध्यमों द्वाय प्रकाशित किया जाना चाहिए। लोकपाल के लिए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या दो या तीन अन्य न्यायाधीश होने चाहिए। उनका चयन कार्यपालिका द्वाय न होकर चार लोगों की एक समिति द्वारा होना चाहिए, जिसमें प्रघानमत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा के अध्यक्ष, और विपक्ष के नेता होने चाहिए। लोकपाल के पास स्वतत्र जाँच तन्त्र होना चाहिए। अन्त में यह कहा जा सकता है कि आजकल भ्रष्टाचार लोगों को कोई आघात नहीं पहुचाता। जब इस प्रकार के कृत्य पकडे भी जाते हैं, तब भी मत्री और बडे अधिकारी तो आजाद घूमते हैं। ज्यादा से ज्यादा उनका स्थावान्तरण कर दिया जाता है। जब तक भ्रष्टाचार पर नैतिक, कानूती और साम्राजिक प्रतिबन्ध नहीं लगठे तब तक इसको समाप्त करने या कम करने की कोई सम्भावना नहीं है। वैसे भ्रष्टाचार को सभी स्तरों पर जड से उखाड फेंकना सम्भव नहीं हैं, लेकिन इसे सहनशीलता की सीमा तक रोके रखना सम्भव है। भ्रष्टाचार एक कैंसर की तरह है जिससे प्रत्येक भारतीय को सावधान रहना है। सार्वजनिक जीवन में इंमानदार लोग जो अपने चरित्र और ईमानदारी के लिए सुविख्याव हैं, आधिक क्षेत्र में सरकारी नियत्रण की कमी, उदारीकरण की नीति और चुनावी खर्चे में नियन्रण, भ्रष्टाचार को गेकने के महत्वपूर्ण नुस्खे हो सकते हैं। लोगों ने प्रष्ट व्यक्तियों को बहुत समय से सहन किया है। अब समय आ गया है जब गम्भीर गजनैतिक शासकों द्वाए भ्रष्टाचार को रोकने कौ बाद को गम्भीरता से लिया जाए। [4 काला धन (छाब्ला: .णाल) कत्माधन एक सामाजिक व आर्थिक समस्या है। सामाजिक सन्दर्भ में इस समस्या को समाज पबुरे समाजशास्रीय प्रभाव डालने वाली समस्या माना जाता है, जैसे, सामाजिक असमानता, झमाजिक वंचनाए, आदि। आर्थिक स्दर्भ में काले धन की समस्या को समानान्तर (गशा०) अर्थव्यवस्था, भूमिगत अर्थव्यवस्था, या अनाधिकारिक (छार्णी८») के रूप में देखा जाता है जो सरकार की आर्थिक नौतियों का परिणाम है और मिप्तका देश की अर्थव्यवस्था तथा राष्ट्र की सामाजिक विकास योजनाओं पर घातक प्रभाव पढ़ता है। जब गरीबी जैसी समस्या उन लोगों को प्रभावित करती है जो गरीब हैं, बेरोजगारी उें प्रधाविद करती है जो बरोजगार है, शराबखोरी व नशीले पदाधों का प्रभाव उन पर पडता जो उन चौजों का उपभोग करते है, काला अथवा बेहिसाबी धन ऐसी समस्या है जो उरें पजाविद नहीं करती है जिनके पास काला धन होता है बल्कि यह वो समाज के सामान्य आदी को प्रभावित काती है। इसमें आश्चर्य नहीं कि इसी कारण इसको एक अलग प्रकार की समस्या कहा गया है। अद्याएणा (एच्ात्क) काला घन कर-अपवचित ((७७८४७त८०) आय है। यह कानूनी और गैस्काूनी दोनों मे अर्जित की जा सकती है। इसका कानूनी खोत यह है कि आय अर्जित करने वाले शक्ति कासदेश्यों के लिए अपनी समस्त आय को प्रकट नहीं करते । उदाहण्णार्थ, सरकारी डक का अनाष्यास भत्ता (॥णानृ") 8णींडणढ बीएश००८८) लेते हुए भी तिजी अभ्यास का, अध्यापकों का ट्यूशन, परीक्षा तथा पुस्तकों की रायल्टी से धन अर्जित करते हुए भी बेस आय को आयकर विवरणी में न दर्शाना, वकीलों का अपने आय-व्यय खत में दर्शायी पर शि से कही अधिक वसूल करा, आदि। इसका गैस्कानूनी सलोत है रिश्वत, तस्करी, डा बाजार, नियत्रित मूल्यों से अधिक मूल्य पर वस्तुओं का विक्रय, मकान दुकान के लिए पाये लेना,मकान को ऊंची बढ़ी हुई कौमतों पर बेचना किन्तु लेखा-पुस्तकों में काफी कम गत्य दर्शाना, आदि। कले घन को सफेद धन में बदलना ठया सफेद धन को काले में बदलना सम्भव है। आहपार्य, जब कोई व्यक्ति वस्तु खरीदे बिना बिक्रोकर भुगतान करके दुकानदार से रमौद 7 कर लेता है, ऐसी स्थिति में वह काला धन बना लेता है क्योंकि रसतौद के आधार पर डे अतिपूर्त (ल्ग्रणणउथाा८ण) भुगतान मिल हो जावा है। इस मामले में वास्तव मे 406 काला एन जिस धन का भुगतान किया ही नहीं गया वह काला घन है। ऐसे मामले में दुकानदार वही वस्तु दूसरे व्यक्ति को बिना रसीद दिए बेच देता है। हि ओर यदि कोई व्यक्ति प्रयोग की हुई कार सफेद धन में 90000 रुपये देकर खरीदा है, लेकिन केवल 60,000 रुपये की रसीद लेता है तो बेचने वाले के लिए 30,000 रुपये की शेष धनराशि काला धन होगी। इस मामले में सफेद धन काला घन हो जाता है। काले धन का फैलाब (१887स्‍/॥07९ ०॑ छत्तबाधात्टे किसी भी समाज में काले घन के प्रचलन के महत्व का आकलन करना साल नहीं है। अमरीका, ब्रिटेन, नावें, स्वीडन, और इटली में अर्थशासत्रियों ने विभिन्‍न उपाय किए लेकिन काले घन में लगे हुए धन का आकलन नही कर सके। नावें और स्वीडन में प्रश्गावली विधि से लोगों से उत्तर निकलवाने का भ्रयल किया गया कि कया उन्होंने क्रेठा या विक्रेता के रूप में गैरकानूनी क्रियाकलापों में भागीदारी की थी? इटली में भूमिगत अर्थव्यवस्था का अनुमान वास्तव में रोजगार में लगे हुए और अधिकारिक रूप से रिपोर्ट किए गए श्रम बल के आकार के बीच अन्तर का पता लगाने का प्रयल किया गया था। इससे भूमिगत अर्थतत्र क्षेत्र में उत्पादकता निर्धारण में सहायता मिली। ब्रिटेन ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद (ञध०) के सरकारी अनुभान को उपभोग पश्च की आय पक्ष की तुलना के लिए बनाए गए अनुमान से समानान्तर अर्थव्यवस्था का मूल्याकन करने का प्रयास किया। अमगैका में गटमैन (60००7) ने माना कि केवल नकद घन ही गैर-कानूनी लेनदेन में प्रयोग होता है। उसने एक निश्चित अवधि में आर्थिक लेनदेन के लिए वॉछित मुद्रा (८वए४९० ०एए्घ००) और उसी अवधि में बैंकों से बाहर चलन में आ रही चास्तविक (४०४०) मुद्रा राशि के बीच के अन्तर का पता लगाने का भ्रयल किया। विभिन विधियों के प्रयोग के बावजूद समाज में काले घन के महत्व का अनुमान लगाना सम्भव मही है, यद्यपि इसे विश्वव्यापी घटना कहा जाता है। न केवल विकासशील देशों में इसका चलन बताया जाता है, बल्कि अमग्रैका, ब्रिटेन, रूस, जापान, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में भी यह प्रचलित है। लगभग ॥5 वर्ष पूर्व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा सबधी फड (॥/7-7 द्वाए कराए गए अध्ययन (शा० परणणहगा पक पफत॑दाह्वाणणाव ए०००गाए, 062६एँएथ 983 37) से पता चलता है कि भूमिगत अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में भारत का स्थान प्रथम है, इसके बाद अमरीका दूसरे स्थान तथा कनाडा दीसरे स्थान पर आठा है। भारत में काला धन या अलिखित धन प्रो कालदार के अनुमान से 953-54 में 600 करोड रुपये था जबकि 965-66 में वाचू समिति का अनुमान 4,000 करोड रुपये था और 969-70 में यह अनुमान ,400 करोड रुपये था। रागनेकर (२8४४प्टा८छ) ने काले घन के आकडे 96-62 में ,50 करोड रुपये, 7964-65 में 2,350 करोड रुपये, 968 69 में 2,833 करोड रुपये, और 969-70 में 3,080 क्रेड रुपये बताए हैं। चोपडा (ह८काहहार कब रीगाहव्यों न्याय, ०0] अच्0, ऐिपाटा5 77 बाते 78, 6त 24 क्ाव ४०३ ॥॥ 982) ने अनुमान लगाया कि 960-6। में 96 करोड रुपये काला घन था जो 496-7 में बढकर 8098 करोड रुपये हो गया। गुप्ता (ल८छाठक्ाट दबे 7०धरव्श 227, क़ता कब 407 गशण्श) 6, 982 : 73) के अनुसार हमारे देश में काले धन को राशि 967-68 में 3॥84 कोड रुपये और 978-79 में 40,867 करोड रुपये थी। उसके अनुमान से 967:68 में सकल घरेलू उत्ताद (5)प०) का 95% काला घन का था जो 978-79 में इढकर 49% हो गया। 98] में एक स्रोत के अनुसार काला धन अनुमानत 7500 करोड़ पे (अर्थात वर्तमान मूल्य पर राष्ट्रीय आया का 68%) था और दूसरे स्रोत के अनुसार काला धन अनुमानतः 25,000 कंग्रेड रुपये (अथवा वर्तमान मूल्य पर राष्ट्रीय आय का धयक्) वा। ग़द्दीय जन वित्त प्रबन्ध और नीति सस्था (७४ंणाग पराह्मोण० ण॑ एप७॥० ०४ 20 ९०8८५) के अनुमान के अनुसार काले धन को राशि 985 में एक लाख कोड़ रुपये के आस पास या गाष्ट्रीय आप का 20% थी। योजना आयोग के अध्ययन के अनुसार अनुमानतः काला धन 70,000 करोड रुपये की श्रृंखला में ही था। इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष 50,000 करोड़ रुपये काले धन के रूप में और पैदा हो जाते हैं (:॥९ म/&0क्‍क्षत (०, 2 80७४५, 99: 7) | पूँजी की इस अप्रत्याशित वृद्धि का परिणाम यह हुआ के विदेशों में इसका बहाव होने लगा जो सरकारी अधिकारियों के अनुसार 500 लाख डालर (गा 200,000 करोड़) था। 996 में हमारे देश में अनुमानित काला घन 4 लाख करोड पे से भी अधिक था (7० मबफ्राक्क गरम, उैथापश/, 20, 997)। विभिन्न भर्पशाख्ियों के अनुमानों के मुताबिक आज हमारे देश में 7 लाख करोड रुपये से अधिक शा धन है जो सकल घोलू उत्पाद के 40 प्रतिशत के बगबर है (7॥९ हहद/छादश गा, $ककाधयां००, 27, 2000) | विद्वानों ने यह भी सकेत किया है कि हमारे समाज में विद्यमान कुल काले घन का तेगपग एक चौथाई (०6%) कर अपवचित (६७८-८४७१८०) आय से है। अमेरिका में काला न सकल गाष्ट्रीय उत्पाद (5धए) का लगभग 8% होने का आभास है। भारत में जब अत घन गैरकानूनी साधनों के द्वार अधिक एकत्र किया जाता है, अमरीका में यह कानूनी के माध्यम से अधिक होता है (लगभग 75%) | लापन उन होने के कारण (00३७७ ० एलालजागह एबल६ ०0०) 7 जेदवार्यवादी कर कामूडज और कर योखाषड़ी दाद पद 7.द बकव विद सबा८) करें और शुल्यों (७00) में वृद्धि कुछ लोगों को उनसे बचने के लिए बाध्य कर देवी है। पेंशन नियम (अक्टूबर 2000) के अनुसार 50,000 रुपये तक को आय आयकर से मुक्त सक0 रुपये के मानकित करौतो (॥270.70 0८०ए८॥०७) को छोडकर)। अप्ज के > शीति के युग में क्या कोई मध्यम वर्ग व्यक्ति इस सौमा के भीतर रहकर जीवित रह “जता है? एक राज मिलो या बढई शहर में 50 रुपये प्रद्िदिन दया महानगों में 50 से जपे तक लेते हैं। गोलगप्पे वाला तथा पानवाला भी 200 रुपये से 300 रुपये प्रतिदिन वर लेता है। यह मानते हुए कि ये लोग वर्ष में 300 दिन कार्य कर लेते हैं तब भी *जो आय आयकर को निर्धारित सीमा से अधिक आती है। पर इनमें से कितने लोग आय 408 काला पर कर देते हैं? एक फिल्म अभिनेता जो एक फिल्‍म के 30 या 40 लाख रुपये से लेकर 5 करोड रुपये तक लेता था, उसको मार्च 999 तक 30% कर देना था। मार्च 999 के बाद अब (2000 में ) उसे 30% कर के अलावा 0% अधिशेष (एफ) भी देना पडता है ।कर देने के बजाय वह दोहरे लेखे रखता है और कर भुगतान से कतणाता है और अधिक काले घन का स्वामी हो जाता है। एक डाक्टर जिसकी निजी प्रेक्टिश से 500 रुपये से 7500 प्रतिदिन आय होती है, एक शल्यचिकित्सक (5ए४४८००) एक शल्यक्रिया (आपरेशन) के 5,000 से 0,000 रुपये लेता है और महीने में कम से कम 0 आपरेशन करदा है, एक एडवोकेट एक पेशी के 2000 रुपये से 25,000 रुपये वसूल करता है, एक दुकानदार ,.000 रुपये से 5,000 रुपये रोज का व्यापार करता है, एक ठेकेदार का व्यापार चक्र 0 करोड रुपये वार्षिक है, एक उद्योगपति जिसका वार्षिक लाभ करोडों रुपये में आता है-- सभी अपनी समस्त आय में से 30% का आयकर व अधिशेष देने से बचने के लिए बाध्य हैं। अप्रत्यक्ष कर, जैसे उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, चुगी सीमा शुल्क, आदि भी कर प्रवचना और काले घन को भ्रोत्साहित करते हैं। बड़ी कम्पनियों और निग्मों द्वात कर अपवचन उत्पाद कर (८४८५० 007) के रूप में एक वर्ष में 400 कग्रेड रुपये तथा सीमा शुल्क (८ए४००७ ०णए) के रूप में 3500 करोड रुपये श्रति वर्ष होने का सन्देह किया जाता है। अपवचन-विरुद्ध निदेशालय (07हट०बवा८ एलाटाबी 0 #वात-एर्दाणा) के द्वारा 99 से 996 तक पकडे गए उत्पाद कर का अपवचन 99-92 में 562 करोड रुपये से बढकर 995-96 में ,236 करोड रुपये हो गया, जबकि फेरा (८2.५) उल्लघन का अपवचन 994-95 में 663 करोड रुपये से बढकर 995-96 में ,447 रुपये हो गया (#४66 70०८७, '०४८ए७४ 30, 996 . 97-03) । उत्पाद एवं सीमा शुल्क की सकल प्रवचना का अनुमान (दोनो शुल्कों को मिलाकर) 7500 करेड से 0,000 करोड़ रुपये के बीच आता है या इन दोनों शुस्‍्कों से प्राप्त कुल वसूली का दसवा भाग आता है। 996 में अन्तिम तीन महीनों में एक शीर्षस्थ कम्पनी (70) के द्वारा फेय (#82५) उल्लघन लगभग 300 करोड रुपये का प्रकाश में आया। यदि यह बात एक सुप्रसिद्ध उद्यम फर्म के साथ हो सकती है तो क्या अन्य पीछे रहेंगे ? नरसिंह राव सरकार के कुछ भत्रियों (जैसे पैट्रोलियम और सचार मत्री) में से प्रत्येक के 25 करोड रुपये से अधिक के भ्रष्टाचार के मामलों में लिप्त होने की घटनाए देश मे काले घन के उदय और राजनीतियों तथा बडे व्यापारियों के बीच साँठ गाँठ की ओर सकेत करता हैं। 996 में विश्व आर्थिक मच (५/०6 8८०४०० 0०79) के ससार के 49 देशों के 200 व्यापार प्रबन्धकों (७४६७8०8६ ७८०॥७४८७) द्वारा भ्रष्टाचार की विशेष विषय सूची पर कर जएज बा के झुदे एए किए गए स्ेक्षण के भारत को #6का स्थार मिल्ला था िडमानों में) और ईमानदारी सुनिश्चित करने वाले उद्यमियों में 46वा स्थान (॥दाव 70% प०/थाफध 30, 996 97) | 2000 में किये गये 90 देशों के एक अन्य सर्वेक्षण में भार को नोचे से इक्कोसवां स्थान (भ्रष्ट देश का) मिला था। यदिं आय कर और कम कर दिया जाये वो धन छिपाने की प्रवृत्ति कम हो और इस प्रकार राजस्व में वृद्धि हो सकती है। परन्तु क्या यह उचित होगा? यह 4993-94 ख़्ता न 409 परिलिष्ठित हुआ था जबकि आयकर की अधिकतम सीमा 40% से नीचे कर दी गई थी। जे अलावा दुकानदार और स्वरोजगार में लगे लोगों के लिए कर राशि निश्चित कर देने के परिणाम स्वरूप अधिक आयकर वसूल हुआ क्योंकि अधिक से अधिक लोग कर तर में शमिल हो गए। 2 याद शुत्द वी विविध दरे (028! का थी सििटएल 2पर9) एक समान उत्पादों पर भी उल्लाद कर को दरें अलग-अलग हैं (यद्यपि 2000-200! की बजट प्र अन्तर को कप्र किया गया है)। उदाहरणार्थ, बल और प्विगरेट उत्पादन में उत्पादों को पूर्ण श्रेणीवद्धता से कर अपवचना को प्रोत्साहन मिलता है। वस्धों में, विविध किस्मों के बे के लिए अलग-अलग उत्पाद शुल्क लिया जाता है। वख्र निर्माता नियमित रूप से वख उत़ाद कौ गुणवत्ता गिए देते हैं और कप दर का उत्पाद पुल देते हैं। केवल इतने से ही लापग 000 करोड़ रुपये के काले घन की उत्पत्ति होती है। समूचे निर्माण क्षेत्र में, स्टील 45% सोमा और बिक्री करों कौ बचना से 50,000 करोड रुपये के काले धन में वृद्धि होती है। 4 रिस्रण नीवि (८007० 7०0८) कते इन का एक और कारण है सरकार कौ मूल्य नियंत्रण नीति। नियत्रण के लिये वस्तुओं के चयन वरथा उनके मूल्य निर्धाएण में सरकार माँग और पूर्ठि के निहित लबक को ध्यान में के खती है। उदाहएणार्थ, 998 के लिए सम्रयुक्त आर्थिक अनुसधान राष्ट्रीय परिषद पिश्यांगा॥ 00७ त॑ #फ॥०० 860007० २८5६४०॥-)४९-५ 8९) की रिपोर्ट के अनुसार 965-66 से 974-75 की नो वर्ष की अवधि में सोमेन्ट, स्टोल, कागज, वनस्पति, प्ालित वाहन ठायरों और उवरकों जैसी छ वस्तुओं में मूल्य नियत्रण लागू करने के पर्नावरुप भारतीय अर्थव्यवस्था में 840 कररेड़ रुपये मूल्य का काला धन उत्मन हो गया। फो प्रकार चौनी पर नियंद्रण के फलस्वरूप 99-92 में लगभग 400 करोड रुपये का काल धन बन गया। 2000-200 के वित्तीय वर्ष में भी चोरी पर टैक्स बढाने का ऐसा ही परिणम होगा। विदेशी विनिमय के नियमितिकरण से भी आयातों में अधिक मूल्य लगाने व निर्यातों मैं कण मूल्य लगाने तथा मुद्रा की काला बाजाती फो प्रोत्साहन मिलवा है। अत नियंत्रण के माय तया अर्थव्यवस्था जितनी अधिक नियमित होगी, इसके उल्लघन के प्रयल भी उतने ही होंगे जो जमाखोरी, धोखाघडी, कृत्रिम अभाव एवं परिणामत काले धन में वृद्धि मो | + ढोय व्यवत्या (8064 5;5/670) मे व्यवस्था काले धर का एक और झोत है। आयात कोटा, निर्यात कोटा और विदेशी के विनिमय कोटा अधिक मूल्य पर बेचकर उनका दुरुपयोग किया जाता है। अपवार्ष किम ऐसी सस्कृति को बढावा दे रहा है जो उद्यमियों को कए कानून तोडने के लिए उक्पते है, विशेषरूप से फेण (752५) कानून। कुछ वर्ष पूर्व (99293 में) जब सरकार 470 काला धन मे निर्यातकों को सीमा शुल्क का भुगतान किये बिना वस्तुओं को आयात करने की स्वीकृति देने को योजना बनाई तो इस योजना से भी धन बनाने कौ ठरकीबें निकाली गईं, जेसे अधिक लाभ भ्राप्त करने तथा निर्यात के लिए कर में छूट के प्रावधानों का लाभ उठाने के लिए निर्याव वस्तुओं का अधिक मूल्य दर्शाना, आदि | 992-96 की अवधि में यजस्व आसूचना निदेशालय (0॥6८07थ6 ० ॥२९८४८७०९ व८॥8८४०८) तथा सोमा अधिकारियों ने 605 ऐसे मामलों का पता लगाया। एक निर्यातक घणने ने (989390 कण») वो 85 करोड रुपये का लाभ अर्जित किया। उ अप्राव (६८८०७) काला धन अभाव तथा बुरिपूर्ण सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के कारण भी बढ़ता है। जब आवश्यक कस [ओं को कमी होने लगती है तो लोगों को नियत्रित मूल्य से अधिक मूल्य चुकाना पडता है जो काले धन को बढाता है। रसोई गैस, सीमेन्ट, केरोसोन, चीनी, रिफाइप्ड बेल, आदि को कमी का फल गैर-कानूनी सौंदेवाजो और काला धन होता है! 6 मुद्रा स्फीति (शग्रीबणा) अन्तर्पद्टीय बाजार में पेट्रोल आदि जैस्तो वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि, सरकार द्वरात लगाए गए शुल्कों व करों में वृद्धि, वस्तुओं को कौमतों में वृद्धि, अलिखित घन से लोगों द्वारा प्रत्यक्ष उपभोग की स्थिति बनाना, उत्पादन से सट्टे को ओर ससाधनों को मोडना यह सब स्थितिया मुद्रा स्फीति बढाती हैं और काला घन बनाती हैं। 7 लोकतात्रिक व्यवस्था में चुनाव तथा राज्नेतिक कोष बचना (छह था 4 2ला०लसब्यार ईाहा ब्ाव॑ री00॥त्थ स्वत) देश में प्रत्येक चुनाव में हजारों करोड रुपये लग जाते हैं। लोकसभा का चुनाव लडने के लिए एक उम्मीदवार आमदौर पर दस लाख से 20 लाख रुपये और विधानसभा चुनाव के लिए पाँच लाख से 70 लाख रुपये आजकल खर्च करता है। अनुमान है कि अकेले लोकसभा चुनाव के लिए राजनैतिक दल चुनाव खर्च के रूप में 000 करोड रुपये तक भुगतान करते हैं। राजनीतिज्ों को भी अपने चुनाव क्षेत्रों में विकास के लिए व्यापार ससाषनों पर भी निर्भर रहना पडता है। सख्या बल को बढाने के लिए काला धन इस व्यवस्था में बनाया जाता है। राजनौतिज्ञों को धन का सहयोग देने के लिए ईमानदार उद्यम घरानों के पास भी अलिखित धन पैदा करने के अलावा कोई उपाय नहीं रहता। उम्मीदवार को क्योंकि कानूनी रूप से सीमित खर्च की ही स्वीकृति होती है और कम्पनिया अपने लाभ में से केवल 5% हो राजनीतिक दलों को चुनाव खर्च के लिए दान के रूप में दे सकती हैं इसलिए चुनाव खर्च अधिकदर काले घन वालों द्वारा हो वहन किया जाता है। यह लोग राजनैतिक सरक्षण तथा आर्थिक छूट की अपेक्षा करते हैं जो कि सत्ताधारी राजनैतिक अभिजात वर्ग की सुविधा अनुसार वस्तुओं पर कृत्रिम नियत्रण, वितरण के साधनों में कमी आदि के रूप में प्राप्त होते हैं। ये सब तरोके काले घन को जन्म देते हैं बला घन बाय & अबत पूरप्पत्ति का लेबदेन (२८० हा गरोक्कदटादत5) समति लेगदेन काले घन को उत्तन करने का महत्वपूर्ण साधन है। आजकल मकान खरीदना पा उमर खग्मेदगा लाभप्रद समझा जाता है। शहरी क्षेत्रों में आवासीय स्थानों कौ कमी के झण ग्रमौण कृषि भूमि को शहरी आवास भूमि में बदलने की प्रवृत्ति बढ रही है। कृषि पम्प आवास्लीय कालोनी स्थापित काना गैरकानूनी है। पजीयौकरण पत्रों 68७7900॥ (5500 बसी निर्माताओं (००॥०४४०७३) के द्वार दर्शाया जाने वाला मूल्य वास्तविक बाजार मूल्य से कहो कम होता है। इससे भूमि विक्रेता को पूँजी प्राप्ति कर (८३७॥७॥ 89०० (०0) मे बचे में सहायता मिलती है। एक अनुमान के अनुसार सम्पत्ति के गैरकानूनी लेनदेन से है एड वर्ष में ज्गभग 2000 करोड रुपये धन के रूप में बढ जाते है, यदि यह मान लिया गो कि प्रति वर्ष शहरी सम्पत्ति में लगभग 50 लाख सौदे होते हैं। मुद्राक शुल्क (६900 009) को ऊँची दरें-जो कि भिल-भिन्‍न राज्यों में 454% मै2% की सीमा के बीच है--सम्पत्ति के कम मूल्य और असूचित सौदे या दोनों के प्रमुख रण है। सुझाव यह है कि यदि शुल्क 2 से 3% कम कर दिए जायें तो कर प्रवचना नही ऐोगै। दूसरे बाधा है शहरी भूमि सीमा अधिनियम जो भूमि को पूर्ति कम करता है और फैला बाजार को जन्म देवा है। मोटे तौर पर वास्तविक सम्पत्ति लेनदेन से वर्ष में 3,000 झड़ रपये काला घन बनते हैं। 9 जिकरण [#क्रलांडबांगा) जा ने निजी क्षेत्र या मत्रियों और नौकरशाहों के लिए काला घन बनाने के नये क्षेत्र पोल दिए हैं। 996 में संचार मत्रालय का एक उदाहरण सामने आया जिसमें सम्बन्धित मत्री (एफहाव के मत्रिमष्डल में) को ठेके तथा अनुज्ञा-पत्र (॥00॥००७) स्वीकृत करने का अप्ैका था जिसका मूल्य ,50,000 करोड रुपये था। मत्री ने अपने पक्ष की कम्पनियों को के लिए विभागीय सहयोगियों तक को किनारे कर दिया। यह मामला मत्री के कि मई 99 से न्यायालय में विवाग़धीन है। अकेला आयकर विभाग ही आयकर गियर के उल्तघन के आरोप में इस मत्री जी से 20 करोड़ रुपये (नवम्बर 996 में) वसूल केसे की सोच रहा था हालाँकि ऐसा कर नही प्का। नरसिंहयाव सरकार में एक और केन्द्रीय रस) मद्े शक्तिशाली व्यक्ति थे जिन पर सितम्बर 995 में एक सम्बन्धित व्यक्ति को कम मूल्य पर एक खान (४४४८) के निजीकरण के मामले को हरी झण्डी दिखाकर 6 ग रुप काले घन के रूप में बनाने का आरोप था। जनवा वी चौख पुकार से सौदा वो छादिया गया, पसन्‍ु मत्री बच निकले। पेट्रोलियम मत्रालय भी निजीकरण से सम्बन्धित एक ते में लिए था। मवालय ने 992 में कुछ चुने हुए तेल क्षेत्र खोल दिए। एक सौदे के के विशेष व्यक्ति को तेल क्षेत्र में ठेका दिया गया और आरोप है कि पूर्व पेट्रोलियम मत्री _ ठेके को हासिल करे में मदद करने के लिए एक समूह से 7 कोड रुपये प्राप्त किए। . मयला हम्बे समय तक केन्रीय जाच ब्यूगे (08) के जाँच के अन्तर्गत रहा (64 बल्ट कल कर 30, 996 99) | उम्मीद है कि निजोकरण के माध्यम से काला घन ने के और मागले भी प्रकाश में आएगे। 42 काला पर 30 कृषि आय (#ह्ञाव्वकर। ॥॥0076) राजनैतिक आधार पर शासकों की कृषि आय को आयकर के थेरे में लाने की अनिच्छा ने भी काले घन की वृद्धि में योगदान किया है। बडे औद्योगिक घरने गत कुछ दशकों से बडे कृषि फार्म खरीदकर उन पर कुछ न कुछ उगाकर एक बडे तरीके से कृषि क्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं। अन्य स्रोतों से एक किया गया काला घन कृषि आय मद में दिखाकर सफेद घन में बदलने का प्रयास किया जाता है। कृषि आय पर कर लगाकर इस घटना को रोका जा सकता है। 2000-200। के केन्द्रीय बजट में पहली बार फार्म हाउसों पर कृषि के अतिरिक्त अन्य आय पर कर लगाया है। आर्थिक प्रभाव (छ८छए7०मांट ॥फ्पग्ट) काला भन देश की अर्थव्यवस्था को अपूरणीय (र८एभा0७) हानि पहुँचाता है और इसका प्रभाव आम आदमी पर अधिक पडठा है। कुछ प्रमुख आर्थिक प्रभाव हें * मुद्रा स्पीति दबाव में वृद्धि, विकास कार्य में बाथा, ससाधनों में अव्यवस्था, कर आधार का सीमितिकरण, और समानान्तर अर्थव्यवस्था का उदय। देश का आर्थिक सन्तुलन खतरे में पड जाता है, सामान्य व्यापार के क्रियाकलाप प्रभावित होते हैं तथा वित्तीय सम्थानों और वाणिज्य सस्थाओं के ससाधन विकृत और इधर-उधर हो जाते हैं। सामाजिक प्रघाव (50९6० ट०८७) आर्थिक भ्रभावों के अतिरिक्त, काले धन के अनेक सामाजिक दुष्परिणाम भी होते हैं। जहाँ आर्थिक दृष्टि से काला धन राजकोष में जाने वाली देय राशि को गेकता है, आर्थिक असमानता बढाता है और आर्थिक विकास कार्यक्रमों को बाधा पहुचावा है, वही सामाजिक दृष्टि से यह सामाजिक असमानता को बढ़ाता है, प्रष्टाचार के जन्म स्थल का काम का है, ईमानदार लोगों में है पैदा करता है, तस्करी, रिश्वव जैसे अपराधों को जन्म देता है, तथा समाज के गरीब और कमजोर वर्ग के उत्थान के कार्यक्रमों पर कुष्रभाव डालता है। यह यथार्थ दरें, जैसे विकास दर, मुद्रा स्फीति दर, बेरोजगारी दर, गरीबी, आदि के सही आकलन को विकृत करता है जो पुन इनको रोकमे की सरकारी नीतियों को प्रभावित करता है। नियत्रण के उपाय (३॥९७चा९5 ० (0००४०) गत 50 वर्षों में सरकार ने काले धन को बाहर लाने के उद्देश्य से अवसर प्रदान करे के लिए अनेक योजनाओं को घोषणा की है। इनमें से कुछ योजनाएं हैं. विशेष धारक बॉण्ड को चलाकर, उच्च मुद्राक वाले मुद्रा नोयों को कम करके, छापे मारकर, और स्वैच्छिक घोषणा कौ योजनाएँ, आदि। जुलाई 499। में केद्ीय वित्तमत्री मे एक नयी योजना प्रस्तावित वी थौ-राष्ट्रीय गृह बैंकिंग योजना--जिससे काला घन निकलवा कर राष्ट्रीय आर्थिक योजनाओं में लगाया जा सके। इस योजना के अन्तर्गत अलिखित घन को घन के स्रोत की घोषणा किए बिना एन आई एचबो (जाप्ठ9) में 60,000 रुपये की न्यूनतम सीमा से) किवनी भी घनराशि जमा कराने का अवसर प्रस्तावित किया गया था। यह प्रस्ताव 7 माह तक खुला रहा और गा क् 43 बल 3), 992 को बन्द हुआ। इसके अन्तर्गत खातेदार को अपने खाते से 60% तक की राशि निकालने कौ अनुमति दी गई थी। इस योजना में 40% तक खर्च करने की बदस्या निन योजनाओं के लिए की गई थी, जैसे, कच्ची बस्ती उद्धार और गरीबों के लिए मन बने में | धनपशि का आहरण करने की अनुमति तब थी जबकि उस राशि के प्रयोग के दरेश्य का स्पष्टीकरण किया जाये। इन लोगों पर 40% की दर पर कर लगाया गया था जबकि शेष गशि को खुली अर्थव्यवस्था में पुन लगा दिया गया। 997-98 के बजट में करके रूप में 30% घन की अदायगी काले घन को कानूनी बनाने के लिए दिए जाने पर ध्मदर भी प्रस्तावित किया गया था। बुछ विद्वानों का मानना है कि इन सभी उपायों ने वर्फ की चट्टान के ऊपर से स्पर्श मर किया है। पचास वर्षों को अवधि में इन सभी उपायों से मात्र 5,000 करोड़ रुपया ही जीव है! इन योजनाओं का मुख्य दोष यह है कि दे पहले से ही बनो हुई काले धन की ज्िति को केवल स्पर्श ही कर पाती हैं, लेकिन वे काले धन की उत्पत्ति की जड में नही जाती और यही काएण है कि इतनी समस्याओं के बावजूद भी लोग काला धन एखने के जोखिम उठने को तैयार रहते हैं | जब तक इस समस्या का समाघान नहीं होता, काले धन का सकट बण्या ही रहेगा । यह सुझाव दिया गया है कि काले घन और समानान्तर अर्थव्यवस्था की समस्या, कुछ के में कर पटा कर, आय की स्वैच्छिक घोषणा के लिए प्रोत्साहन देकर, आर्थिक झुफ़िया के के चुस्त दुरस्त करके, मकान बनाने पर खर्च किए गए थन को कर से मुक्त रखकर, छुटकारा पाकर नियत्रण किया जा सकता है। अलग-अलग किये गए पलों का अधिक लाभ नहीं होगा बल्कि परस्पर क्रियान्वित उपाय तथा दृढ़ राजनैतिक सं और गजनैतिक अभिजाव वर्ग की प्रतिबद्धता काफी हद तक सफ़ल सिद्ध हो |॥ 45 तस्करी (ग्रहण 9) अवधारणा एव प्रकृति (0०४९ छगव 'र(घः) तस्करी एक आर्थिक अपराध है जो पारम्परिक श्वेदवसन अपराध से गुणों के आधार पर भिन है। आर्थिक लाभ इस अपराध का मुख्य उद्देश्य है। जिन वस्तुओं की अधिकतर तस्करी की जाती है वे हैं हेरोइय व अन्य मादक पदार्थ, सोना, चाँदी, हथियार और विस्फोटक सामग्री, हाथ की घडिया, इलैक्ट्रानिक वस्तुए, सिन्येटिक धागे, आदि। वैश्वोकरण (६00७2४2०४०7) के कारण व्यापार गतिशीलता में वृद्धि सम्भव हो गई है तथा सचार कै तीब् साधनों आदि ने तस्करी को और भी सरल कर दिया है। यह अवैध कार्य या वो अकेले या फिर कुछ सहयोगियों के साथ या बिना सहयोगियों के किया जाता है। अपराधी गिरोह मुख्यत अवैध तरीकों से घत्र कमाने के उद्देश्य से तस्करों में लिप्त रहते हैं) गुणवत्ता में ये अपराध अन्य अपपर्षों से भिन हैं क्‍योंकि नियमों और कानूनों में कमियों का लाभ उठाते हुए उनकी कार्यविधि (50005 0०००७) भिल होती है। राजस्व गुप्दवर निदेशालय (7टणभ९ ० 7२८५६७०९ ॥7०॥8८४८८), प्रवर्तन निदेशालय ()॥#6८०»० छण्शग८्थ्णध्या), नशीले पदार्थ नियत्रण विभाग (रकक००४८ 00४8० छेफ&३०), तथा विदेश व्यापार महानिदेशालय (९०३४० ठदकशब रण छ0रंहए गर30०) हे अपगशर्धों के होने की सूचना मिलने पर कार्यवाही करने वाले सक्षम अधिकारी हैं। विग्तार (पार १७80ल्‍/00९) सीमा शुल्क अधिकारियों द्वाग वस्तुओं के कब्जा/जब्दी (७2००/००॥िट्आ/०/) मामलों कौ सख्या प्रतिवर्ष 50,000 से 60,000 तक होती है। इस प्रकार से अधिग्रहित (5०४८०) वस्तुओं का मूल्य 400 कर्रेड रुपये से 000 करोड रुपये तक प्रतिवर्ष होता है। उदाहरण स्वरूप, पाँच वर्षों में994 और 998 के मध्य सीमा शुल्क अधिकारियों द्वारा अधिग्रहित वस्तुओं का प्रति वर्ष मूल्य 7047 करोड रुपये था। इन प्रांच वर्षों में औसतन लगभग 35 मामले प्रतिदिन कब्जा/जब्ती के हुए और इस प्रकार जब्त की गई वस्तुओं का मूल्य प्रति दिन 34 क्ेड रुपये के आमपास था। १998 में जब्द की गई वस्तुओं में से 63 7 करोड रुपये मूल्य के मादक पदार्थ, 39 करोड रुपये मूल्य के विद्युत उपकरण एवं वस्तुएं, 232 करोड रुपये मूल्य का स्वर्ण, 0.5 करोड रुपये मूल्य की चांदी, तथा 549 करोड रुपये मूल्य कौ अन्य वस्तुए थी। इन सभी वस्तुओं की तस्करी में लिप्द व्यक्तियों की संख्या 952 थी (छमार महक, 998 220) । त्स्ै 45 तस्करी में मादक पदार्थों को गिनती सूची में स्वोपरि थी। 985 के मादक पदार्थ अधिनियम (००४८ 77785 ०, 985) और 988 के (ए7)५075) अधिनियम के गबगूद, मादक पदार्थों की तस्करी अपराध जगत के बाजार में धन बनाने वाला चक्र है। कलरो किए जाने वाले मादक पदाथों में गाजा, हेरोइन, हशोश तथा अफ्रोम सबसे अधिक ऐैने हैं। 997 में इस प्रकार की तस्करी के लिए 2,797 व्यक्ति और 998 में ,330 भक्ति गिफ्तार किए गए थे जिनमें 48 विदेशी व्यक्ति भी सम्मिलित थे (टकराट 44, 998 223)। यह दर्शाता है कि मादक पदार्थों की तस्करी का बाजार अति विस्तृत । झसे नवधनवान वर्ग को जन्म दिया है जो अचल सम्पत्ति, फिल्म निर्माण, हवाई कमी दया प्रतिष्ठित उपक्रमों (००७००४४७ ॥००६०७) पर नियत्रण रखते हैं । राष्ट्र विरेधी क्यो, आतकवादी गतिविधियों तथा हथियाएं के गुप्त व्यापार में उनकी भूमिका को हाल में है विन किया गया हैं। साठ करी (07०॥९४॥ 5978/799) )द तस्करी भी संगठित व्यवसाय को तरह ही सहयोगी प्रयलों पर आधारित होती है, जैसे, झेें निम तत्व सम्मिलित होते हैं: कुछ व्यक्तियों का सगठन, इस प्रकार योजना बनाना भदस्य पकड़े न जाएं, सफलतापूर्वक वस्तुओं की तस्करी के लिए धन सम्रह, सदस्यों के बाद, तथा राजनैतिक सम्बन्ध बनाना ताकि पकड़े जाने पर बचाव हो सके। तक्ण (फबमालल्तंआा८७) ओड़ व्यक्तियों के सहयोग पर आधारित तथा संगठित रूप में लम्बे समय के आधार पर वाली तस्की को निम्नलिखित विशेषताएं हैं- देती (९३७-७०/) के आधार पर कार्य, अर्थात्‌ व्यक्तियों का दल या समूह जो ते्बे समय तक चलता है। - श्रेषीदद्ध सरचना, अर्थात्‌ ऐसी संरचना जिसमें निम्मतम से उच्चतम स्तर तक अधिकार और जिपतमें ऐसी व्यवस्था हो कि आपसी दायित्वों और विशेषाधिकायों को स्पष्ट व्याज्या हो। - योजना (!9गाणष्टो, अर्थात्‌ सफल तस्करी के लिए पूर्व में ही प्रबन्ध करना, जोखिम गे का, तथा सुरक्षा एवं सरक्षण सुनिश्चित कला! मेड्त सत्ता, अर्थात्‌ केद्धीय नियत्रण के आघार पर कार्य करना। यह अधिकार एक वि या कुछ सदस्यों के हाथ में होता है। हे (872 ०॥॥590०0), अर्थात्‌ किसी एक कार्य में विशिष्टता प्राप्त कजा, बैग सेल, सम हे हथिवाए, दि पी । कुछ समूह एफ से अधिक वस्तुओं की रस्फरी में लगे एहते हैं। हम विधाजन, अर्थात्‌ कर्तव्य और उत्तरदायित्व सौंपना। 46 क्स्कय - सुरक्षा के उपाय, अर्थात्‌ कानून लागू करने वाले अधिकारियों द्वार बाधा पैदा करने वालों से बचाव का प्रबन्ध करना। सुरक्षा कदमों में पुलिसकर्मियों, वकीलों, डाक्टरों, गजनेदाओं, न्यायधीशों तथा समाज में प्रभावशाली व्यक्तियों से सम्पर्क स्थापित करना सम्मिलित है । नकद धन देना या भेंट स्वरूप वस्तुएं देना, चुनाव में मदद करना, विवाह आदि में सहायता करना, विदेशी यात्राओं का प्रबन्ध करना, आदि कुछ ऐसे उपाय हैं जो सगठित तस्करों द्वागा अपने बचाव तथा गिरफ्तारी एव दोष सिद्धि (००राघला०्0) से बचने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। - . आचरण सम्बन्धी प्रतिमान (०००४० ४8०7७), अर्थात्‌ आचार सहिता बनाना तथा सदस्यों के लिए कार्यविधि तैयार करना, इससे अनुशासन बनाए रखने, दक्षता, वफादारी, आज्ञा पालन और आपसी विश्वास बनाए रखने में मदद मिलदी है। सगठित सरचना (0हक्रांकल्ते 5(7एलएचश) सगठित तस्करी में स्थितियों को श्रेणीबद्ध सरचना होती है। यदि पिरामिड के रूप में इसको व्याख्या करें तो 'लार्ड्स' (०7०5) यानि शक्तिशाली नेता सब से ऊपर होते हैं जो महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं और सगठन का सचालन करते हैं। ये नेता मध्यम और निम्नतम स्तर के सदस्यों के साथ मालिक और नौकर वाले सम्बन्ध को बनाए रखते हैं। मध्यम स्तर पर दल में वे 'लेफ्टिनैण्ट' (॥८0/७॥०॥७) होते हैं जो नेता की आज्ञा का पालन करते हैं। निम्नतम सतह पर 'वाहक' (८7७७) होते हैं जो तस्करी के सामान को हवाई जहाजों, रेलों, कारों या बसों से ले जाते हैं। यह श्रेणीबद्ध सरचना व्यक्तिगत बफादारी, आचार सहिता और आज्ञाओं की एक अ्रखला से जुडी रहती है। यह सरचना तस्करों के भावी जीवन को प्रभवित करती है, विशेष रूप से सस्तरण में निचले सदस्यों को। इन सतही तस्करों में लडकिया भी होती हैं जो हस्करी की वस्तुओं को ले जातो हैं। यह सतही तस्करी या तो सगठन में देतन भोगी होते हैं या उन्हें निश्चित धनयशि मिलती है या लाभ में से हिस्सा प्राप्त होठा है। मध्यम स्वर के तस्करों को या हो सतही तस्करों में ले लिया जाता है या कभी तस्करी का अनुभव रखने वाले नये भर्ती कर लिए जाते हैं। तस्करी अपराध के नेता अलग जीवन जीते हैं जो सम्मान वाला एकाकी जीवन होता है। फिर भी अपराध जगत के प्रति उनको निष्ठा बनी रहती है जहा वे विस्तृत समाज के मूल्यों से अलग होते हैं, लेकिन शक्ति, सम्मान और विलासितापूर्ण जीवनशैली उठ्हें प्राप्त रहते हैं। प्राय तस्करी “अभिषद' (सिण्डिकेट) आमदौर पर स्थापित मुख्यालयों से कार्य करते हैं और अपनी कार्यशैली स्वय बनाते हैं। वे हिंसा के प्रयोग से बचते हैं जो उन्हें उत सगठिव गिरोहों से भिलता प्रदान करता है जो हिंसा या हिंसा को धमकी का प्रयोग करते हैं। अभिषदों के इन सदस्यों को समाज ने सम्माननीय नागरिक के रूप में पहचाना है जो सम्प्रान्त (7०४0) अवासीय क्षेत्रों में रहते हैं, उच्च पदस्थ लोगों से खुलकर मिलते-जुलते हैं और किन्हीं विधिमान्य आय के कार्यों में लगे होते हैं। तस्करों के अभिषद्‌ प्राय बडे महान में या आसपास के बडे शहरों में काम करते हैं जो सचार के बडे केन्द्र होते हैं और जहा से क््क्ता 588 आवागमन एवं माल का वितरण सुलभ होता है। उत्तस्पूर्व के राज्य, कश्मीर, बिहार, पजाब और तमिलनाडु कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहा आतकदादो, हथियार बन्द लोग, नक्सलवादो, घुसपैठिए अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पुलिस व सेना से भिड़ते रहते हैं। वे आवश्यक अज्न, हथियार व गोला-बारूद के साठित सख़रों से मिलते रहते हैं। एक न्यूजीलेण्ड निवासी द्वार सचालिव लन्दन स्थित कम्पनी के वाई जहाज के चालक दल के 6 सदस्यों की गिरफ्तारी, जिन्होंने दिसम्बर 995 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जनपद में अति छदमवाले हथियारों को गिराया, और जिन्हें फावरी 2000 में ययायालय द्वाय लम्बा कारावास दिया गया, व्यवस्थित बन्दूक सचालन की सगठित तस्करी का एक उदाहरण है। प्रपुख भारतीय आरोपियों में से एक बिहार का व्यक्ति था जबकि दूसरे के पप्म धिंगापुर का पासपोर्ट था। आधार सहिता (00606 त एच) ऐसा कोई साक्ष्य नही हैं कि विभिन्‍न तस्कर सगठन एक हो आचार सहिता का पालन करते हैं। किनु आमतौर पर तस्कर निम्निलिखत निर्देशों का पालन के हैं मुखबिर (/णश्र) मत बनों, टीम के सदस्य के रूप में काप करो, सगठन के प्रति बफादार रहो, दूसरों के हित में रंग न अडाओ, दिए हुए काम शान्ति व सुरक्षा से करो, आँख व कान खुले और मुह बन्द रखो। इस प्रकार, तस्करों की आचार सहिता पेशेयर अपराधियों से फिलदी जुलती है, जिन पर उनके अपराधी कार्यों के काएय कानून अधिकारियों का दबाव रहता है। अलिखित निययों में हैं: रहस्य बनाए रखना, स्वय के आगे सगठन को महत्व देना, अप्ने निकट मित्रों और रिश्तेदारों को कुछ भी न बताना, तथा आड्ञा का उल्लघन न करना। अल़िल की विधिया ($घलर्य भित्लाजांडगड)े वे काक़ क्या हैं जो संगठित तस्करी को जौवित रखते हैं? इस सरदर्भ में चार कापक महत्वपूर् हैं. सुगठित सरचना, आचार सहिता, बचने के उपाय और कानून की कमजोरिया। आग सुगठित संरचना को समझना आवश्यक है। निर्धार्य' या 'हवाला' को निर्धारित करमे संगठित तस्करों का अस्तित्व “हवाला' (0) पर निर्भर होता है दधा सरकार, कानून व पसिस के उच्च पदस्थ व्यक्तियों से सम्बन्ध बनाए रखने के लिए तस्करों के पास इन सब करें को करने के लिए अपने सदस्य होते हैं जिल्हें कार्य सौंपा जाता है ताकि प्रष्ट अध्वारियों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाए रखें। इन सदस्यों को 'प्रष्टकर्ता' (८०पाणए/थ) शजा सकता है। “प्रष्टकर्ता' का काम है रिश्वत देना, धमकाना, बातचीव का और पतिसकर्षियों, राजनीतिक, न्यायाधीशों , नौकरशाहों और उन सभी को अपनी गिएफ्त में रखना सेगदित अपराधियों को गिरफ्तारी यानी मुकदमें तथा दष्ड आदि से बचा सकें। इसको हम सत्ता का निषफलोकरण' (०णएह८३४०॥ ० 80॥09) कह सकते हैं। 'निष्फलीकरण” एवं उच्च दोनों स्तरों पर होता है। निचले स्वर पर वे लोग होते हैं जो काबून लागू ले वाले संगठनों में होते हैं, अर्थाद्‌ पुलिस कर्मी, वकील, मजिस्टेर, आदि। इन लोगों को पित्त देकर 'प्रश्कर्ता' कानून लागू करने की प्रक्रिया को ही दिप्फल' कर देता है। उच्च स्श्ष मन्री, सांसद, विधायक, आदि होते हैं। बा8 तस्क्यी यह कहा जा सकता है कि सगठित तस्करों का बचाव अनेक प्रकार से होता है. 6) नेता आमतौर पर गिरफ्तार नहीं होठे क्योंकि दे कार्य दृश्य के पीछे रहते हैं। (७) सस्दरण में निचले लोग यदि पकडे जायें तो वे अपने से उच्च लोगों की कार्यवाही से छूट जाते हैं। इस प्रकार से मुक्ति 'हवाले वाले व्यक्ति' (॥८ 9) द्वारा सुनिश्चित की जाती है। (७) सुगक्षा या तो राजनैतिक दर्लों को योगदान करके, राजमैतिक शक्ति प्राप्त करके, या नेताओं द्वारा स्वय ससद, विधायिका या म्युनिम्मिपल कार्पोरेशन के चुनाव लडकर प्राप्त को जाती है। (४) कानून प्रतिपालक अधिकारियों को नियमित रूप से राशि देकर। (४) कानून की ख़ामिया भी बचाव प्रदान करती हैं। वकील लोग कानूनी कार्यवाही करके अपने मुबक्किलों के बचाव का प्रबन्ध कर लेते हैं क्योंकि यह खामिया उन्हें ऐसा करने में सफलता दिलाती है। फरवरी 2000 में बिहार में विधानसभा चुनाव में विभिन्‍न राजनैतिक दलों के 5 गम्भीर अपराधियों द्वारा विधायक पद का चुनाव लडना घी बताता है कि किस प्रकार अपराधी प्रतिष्ठित व्यक्ति बन कर सत्ता का दुरुपयोग करके अपनी अपराधी क्रियाओं से बचाव प्राप्त करते हैं। सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण (800, एाशाएर भाव ०१७शांइ३वणा) भा में साप्राजिक परिवर्तन : अवधारणा, उद्देश्य, दिशाएँ एवं प्रतिरोध (8059! (एक्राह्ल $# 04 ३ (०४९९७, 5०थ5, जिश्ली0ा प्रात र८डांजगा९९5) प्ामाजिक परिवर्तन की अवधारणा (007०७ए॥ ण॑ 5०लंबा टकम्ाइ०0 सामाजिक सम्बन्धों के स्थापित स्वरूपों, सामाजिक मूल्यों, संरचनाओं या उप-व्यवस्थाओं में परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन कहलाता है। सामाजिक परिवर्तन समग्र अथवा आशिक हो सकता है, यद्ञपि अधिकतर यह आशिक हो होता है। जिस प्रकार परीक्षण प्रणाली में परिवर्वन शिक्षा प्रणालो में आशिक परिवर्तन माना जाता है, उसी प्रकार मन्दिएं में अप्पृश्यों के प्रवेश को वर्णित करने वालों को दण्ड के विधान का क्रियान्वयन, विवाह विच्छेद की वैधानिक अनुमति, अल्पायु विवाह पर ऐेक सम्बन्धी विधान, आदि को समाज में आशिक सामाजिक परिवर्तन कहा जा सकता है। बैकों का राष्ट्रीयकरण, कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण, आदि प्रमाण की आधिक प्रणाली में आंशिक परिवर्तन के उदाहरण हैं, क्योंकि यह परिवर्तन अन्य पे में दि सम्पत्ति के स्वामित्व को व्यवस्था के साथ-साथ विद्यमान रहता है। कठिनाई तो सयाज के समग्र परिवर्तन या सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन को पहचानने में आती है। यदि हम करें कि समाज के न केवल कुछ पक्टों में बल्कि प्रत्येक पश्च में परिवर्तन हो गया है तो से समग्र परिवर्तन कहा जायेगा लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है। इसी प्रकार परिवार व्यवस्था, बेंकि। व्यवस्था, जाति व्यवस्था या फैक्ट्री व्यवस्था के कुछ पक्षों में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन इनमें से किसी भी व्यवस्था में समग्र परिवर्तन कभी नहीं होता। कोई भी सामाजिक व्यवस्था समग्र रूप में कभी परिवर्तित नहीं होती। सामाजिक परिवर्तन सदैव अथवा अधिकाशत आशिक ही होता है। पर कोहेन (979 .75) ने कहा है कि समाज में लघु अथवा वृहद्‌ या मौलिक (00॥0 97८) परिवर्तनों में अन्तर किया जा सकता है। समाज या सामाजिक व्यवस्था के पल अथवा महत्वपूर्ण लक्षणों में परिवर्तन को 'वृहद्‌' परिवर्तन कहा जाता है। यदि जेल को पैक सामाजिक व्यवस्था के रूप में लें वो इसकी महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ हैं. बन्दियों को अशिष्षण देना, बन्दियों के लिए भोजन, मनोरजन एव स्वास्थ्य रक्षा का प्रबन्ध का, जेल के तोड़ने वाले अपगधियों को दण्ड देना, अपराधियों का मित्रों व परिवार जनों से कण काया, तथा जेल से भागने को रोकने के लिए प्रबन्ध कला, आदि। अब मात्र लिया जाये कि समस्त सुरक्षा बल हटा लिए जाते हैं और कैदियों को दिन के समय बाजार जाने 420 साम्राजिक प्रिवर्त और आपनिकीकरण की स्वतत्रता दे दी जाये लेकिन रत को जेल में रहना आवश्यक हो तो जेल व्यवस्था में यह परिवर्तन जैल के अन्य पक्षों की भी प्रभाविव करेगा। ऐसा होने पर इसको जेल व्यवस्था में 'मूलभूव और वृहद' परिवर्तन कहा जायेगा। इसी प्रकार अन्तर्जातीय सम्बन्धी अतिबन्धों को हटा लिया जाये तो इसे जाति व्यवस्था में 'प्रमुख' परिवर्तन कहा जायेगा। सामाजिक घ्यवस्था में मूल लक्षणों को पृथक कएा कठिन नहीं होता। ठदाहए्णार्थ, लोकतात्रिक राजनैदिक व्यवस्था में चुनाव व्यवस्था में परिवर्तन न हो, किन्तु चुनाव व्यवस्था में परिवर्तन चुनाव परिणामों को प्रभावित करते तो यह कहा जायेगा कि चुनाव व्यवस्था राजनैतिक व्यवस्था का “मूल' लक्षण है। सामाजिक विकास की अवधारणा एवं सूचक (एफ९ (एगाल्ए्फु६ गण पाठंध्याण5 ण $०लंग 060श0फएएशा) सामाजिक विकास एक ओर मानव आवश्यकताओं और आकाक्षाओं के बीच और दूसरी ओर सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों के बीच अच्छा सामजस्य स्थापित करने के लिए एक नियोजित सस्थात्मक प्रक्रिया है। यह समाज में व्यक्तियों के लिए आर्थिक प्रगति को अच्छी जीवन स्थितियों में परिवर्तित करता है। यह गरीबी, निरक्षरता, अज्ञानता, अस्मानवा, विवेकहौनता, तथा समाज में प्रचलित दमन आदि के विरुद्ध एक युद्ध की घोषणा है। इसका उद्देश्य न केवल निर्बलों तथा विशेषाधिकार वचितों का उत्थान करना है, बल्कि सभी नागरिकों के जीवन की भुणवत्ता को सुधारना है। यदि सामाजिक विकास की पूर्वावश्यकता सभी नागरिकों को अपने समाज निर्माण में भागीदारी है, तो लोगों का यह भी विशेषाधिकार है कि सामान्य प्रयलों में भागीदारी के लाभों का भी वे लाभ उठाए। सामाजिक विकास का अभिकल्प निर्धारित (6०७89) करे में चार बातें निहित हैं (0) समाज में लोगों की आवश्यकताओं का आकलन, (४) समाज में कुछ रचनात्मक परिवर्तनों को प्रारम्भ करना, जिसमें कुछ पुरानी प्रधाओं का उन्मूलन, कुछ नयी परम्पराओं की स्थापना व कुछ विद्यमान सस्थाओं को बदलना सम्मिलित है, (00) सस्थाओं को व्यक्तियों के भ्रति उत्तरदायी बनाना जिससे वे कुछ चुने हुए व्यक्तियों व समूहों के लिए हो नही, अपितु समाज के सभी खण्डों के हित के लिए कार्य कर सकें, (0) निर्णय लेने की प्रक्रिया में लोगों को सम्मिलित करना, अर्थात्‌ नियोजन को जमीनी स्तर (87955 7000 ।९४थ) तक ले जाना। सामाजिक विकास के अभिकल्प (४८७8०) तैयार करने की विधि में पाँच चीजें सम्मिलित हैं. 6) नऔति नियोजन (छ०॥८७ फाशाएगह), अर्थात्‌ उद्देश्य निश्चित करना तथा वरीयताए एवं रणनोतिया तैयार करना, (४) कार्यक्रम बनाना (फाण्डाकरणणमाणट्र), अर्थात्‌ संसाधनों को जुटाना , (0) क्रियान्वयन (30ण77४०॥४६), अर्थात्‌ निर्णय लेने कौ भ्रक्रिया में जनता की भागीदारी, (9) सगठन (०8०णण्णट्), अर्थात्‌ लोगों कौ सेवाओं तथा संसाधनों में लाभ उठाने के लिए और आवश्यकता पडने पर व्यवस्था को बदलने के लिए तैयार कप्ना और,(९) मूल्याकन, अर्थात्‌ उद्देश्यों और क्रियान्वयन के बौच को दूरी को मापा तथा भविष्य को योजनाओं के लिए प्रति पुष्टि (८६९७७८७० देना। सामाजिक विकास के महत्त्वपूर्ण निरदर्शा (70280) है : () जौवन स्तर में स्रगाजिक परिवर्त और आधुनिकौकरण बट परिर्वन, (0) गरीबी उन्मूलन, 69) शिक्षा में विस्तार , (0०) गेजगार स्वर में वृद्धि, (४) समाजिक न्याय, अर्थात्‌ अवसरों का समान वितरण, (७) कमजोर सपूहों का उत्थान, (छा) जौवन की विविधताओं और विषमताओं से सुरक्षा (ध४) समाज कल्याण सुविधाओं में पुषाए (0) अस्मानताओं का उन्मूलन-क्षेत्रीय, प्रखण्डीय तथा सामाजिक, (0) स्वास्थ्य सरक्षण शव विकास, (39) पर्यावरण संरक्षण, (») विस्तार कार्यक्रमों में सभी की भागीदारी जिसमें परग तथा सरचनात्मक दोनों प्रकार के परिवर्तन सम्मिलित हों। पातत मे सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य (6०ण5 ० $085ंग एाज्राहल ॥ प्रा09) पाए को राजनैतिक स्वतत्रता के समय अनेक बुद्धिजीवियों ने अनुभव किया कि भारत के क्षेत्र में असफल रह गया है, क्योंकि यह पूँजीवाद साग्राज्यववाद का शिकार छा है जहा विकास की सम्भावनाए कम होती है। साप्ताजिक सास्कृतिक परिवर्तन, जिसको 53 वर्ष पूर्व प्राम्भ किया था तथा जिसको भविष्य के लिए हमने अपना उद्देश्य बनाया ै पर्नासक परिवर्तन के उद्देश्य से किया है। इससे जन आकाश्षाओं और आवश्यकताओं को पूर्ति में सहयोग मिलेगा। गणतत्र की स्थापना के प्रारम्भिक दस वर्षों में जिम सामूहिक क्यों को योजना हमने बनाई थी वे थी सामाजिक, ग़जमैतिक, आर्थिक व सास्कृतिक। सामजिक उद्देश्य गे. समावक्ष, न्याय, स्वक्मद, बुक्तिकण और व्यक्तियाद। भर्षिक उद्े्यों में वितण सम्कशी न्याय तथा आर्थिक पर्म दर्रन (7०0/029) के स्थान पए आर्थिक य्ुक्तिकण (:2/072!57) सम्मिलित थे। ग़जनैदिक उद्देश्य थे. ऐसी एजौतिक व्यवस्था की स्थापना करना जहा शासक वर्ग जनता के प्रति उत्तरदायी हो, सत्ता का विकेन्रीकरण हो, तथा अधिकारिक लोगों के निर्णय कौ प्रक्रिया में किया जा सके। हमारा सास्कृतिक उद्देश्य था 'पवि्रता' के स्थान पर “पर्म पद की नोति। हमारे सत्ताधारी अभिजनों (ए०छ८ा ०॥०) ने इस सम्बन्ध में निनलिखित उद्देश्य बनाए * * शक्तिशाली केद्रीय साकार की स्थापड यह इसलिए आवश्यक था क्योंकि ऐतिहाम्िक दृष्टि से भारत में राजनैतिक सत्ता का विखण्डन हो चुका था। स्वतत्रता के परचात यह भय था कि धार्मिक, भाषायी, जातीय, जनजातीय, वावादी शक्तिया सत्ता का और भी विखण्डन कर सकती हैं। केन्द्र में शक्तिशालों तथा राज्यों को आदेश देने वाली साकार हो ऐसे प्रयलो को गेक सकेगी। १ अर्थ व्यवस्था को आधुत्तिक बनाता यह प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करने, देश को आत्म निर्भर बनाने, तथा स्वदेशी पूजी क्षेत्र बबाने के लिए आवश्यक था। १ भ्रेमजवा्टी सप्राज की रखता: यह निजी पूजीपतियों की भूमिका को प्रतिबन्पित करने के लिए आवश्यक था, न कि उनको समाप्ठ करने तथा प्रमुख उद्योगों के जन स्वामित्व पर बल देना था। जातियों, क्षे्ें तथा वर्गों में असमानताएँ कम करना। १ मूलपूत मानव अधिकारों का सरक्षण करना, जैसे, स्वत प्रापण का आपकार, स्वत धार्मिक अभिव्यक्ति का अधिकार, रजमैतिक भागोदारी का अधिकार, आदिः 422 सामाजिक परिवर्त और आपुनिकीकारण * एक ऐसे ममाज की स्थापना करना जहा व्यक्ति निस्वार्थ, त्याग, सहयोग दथा आदर्शवाद को ओर प्रेरित हो । सामाजिक परिवर्तन के अध्ययन सम्ब्धी उपागम (#एए704९०7९५ 0 |€ 5009 ० $80ल5ंग (एएम्ण्ट्ट०) योगेद्ध सिंह ने सामाजिक परिवर्तन पर अपने प्रारम्भिक लेखों में (969 77) भाख में सामाजिक परिवर्तन के अध्ययन की प्रकृति और प्रक्रिया पर तीन उपागमों की चर्चा की थी द्ार्शनिक-ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उपागम, राजनैतिक-ऐतिहासिक उपागम, सामाजिक मानवशाख्रीय और समाजशाररीय उपागम। दार्शनिक-ऐतिहासिक उपागम के स्रोत भारतोय एवं पश्चिमी दोनों ही बताए गए हैं। भारतीय दर्शन और धर्म ने परिवर्तन के दार्शनिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसकी विशेषता थी समाज में काल चक्रीय गति (विलय प्रलय, सतयुग कलियुग) जो समय-समय पर अवताएं के द्वार खण्डित किया गया तथा पुन सक्रिय किया गया। इस सिद्धान्त का आपार कर्म, धर्म और मोक्ष में विश्वास है। एक समय था जब इस सिद्धान्त पर दृढ़ विश्वास कियां जाता था लेकिन अब यह विलुप्त होता जा रहा है क्योंकि इसका व्यवस्थित विश्लेषण सम्भव नहीं है। ऐतिहासिक उपागम से सामाजिक परिवर्तन का अध्ययन भारतीय इतिहास के आलिखों द्वारा होता है, उदाहरणार्थ जादि प्रथा में परिवर्तन या ज्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन का अध्ययन विविध युगों के ऐतिहासिक आलेखों के आधार पर किया जाता है, जैसे मौर्यकाल, गुप्त काल, ब्राह्मणिक काल, मुगल काल, ब्रिटिश काल तथा स्वातत्रयोत्तर काल। इस उपागम की सीमा यह है कि ऐविहासिक आलेख उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, या फिर साक्ष्य विश्वसनीय नही होते हैं। अत इस उपागम पर निर्भर रहने से समाजशासतरीय सामान्यौकरण भ्रामक हो सकता है। सामाजिक मानवशास्त्रीय उपागम अन्य दोनों उपागमों की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित समझा जा सकता है। इस उपागम में गहन क्षेत्रीय कार्य या सहभागी अवलोकन विधि का प्रयोग होता है। इस प्रकार के उपागम में सैद्धान्तिक प्रस्थापनाए मानव जातीय आकडों की व्याख्या करते हैं जो या तो अध्ययनकर्दा के स्वय के या दूसरों के क्षेत्रीय कार्य के परिणाम होते हैं। इस उपागम की सोमा यह है कि यह सूक्ष्म स्वर (प्राध्व०००5०) के आधार पर स्थूल स्तर (88070८०5॥) के विषय में सामान्यौकरण का प्रयल करता है। यह निर्विवाद कल्पना सार्वभौमिकता एवं समरूपता पर आधारित है। लेकिन भारत में विषमता और विविधता अधिक है | इस प्रकार एक गाँव को किस सस्या (जैसे परिवार, जाविं, आदि) के परिवर्तन को दो समय--अवधि के बीच अध्ययन कर के हम इस सामान्य निष्कर्ष पर नही पहुच सकते कि दूसरे गांवों में या समूचे भारत में इसी प्रकार के परिवर्तन होते हैं। सामाजिक मानवशास्रीय उपगाम की त्रुटिया समाजशास्रीय उपागम द्वार कम हो गई हैं। सामाजिक उपाग्म में आनुभविक जाँच पडताल वृहद्‌ स्तर पर की जादी है और सामान्य निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं। सामाजिक परिवर्दन पर अपने बाद के लेखों में योगेद्र सिंह (977) ने भासत में सामाजिक परिवर्तन के विषय में पाँच उपागमों वी चर्चा की है। ये हैं उद्विकासीय उपागम, अधर्ष उपागम, सास्कृतिक उपागपण (सस्कृतीकरण, पश्चिमीकरण, लघु व महत्‌ परम्पणए, ग्रशजिक परिवर्त और आपुनिकीकरण 423 सकुवितीकरण और सार्वभौमीकरण), संरचनात्मक उपागम (कार्यात्मक दा द्न्दात्मक मॉडल पर आधारित, तथा एकौकरण उपागम | इदविकारीय उपागम (0ल्‍णएए0्यऊ +फफाव्यप) जञ उपागम में एक लम्बी श्रंखला में छोटे-छोटे परिवर्वनों के द्वारा सरल से जटिल मन्द गति से होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है। प्रत्येक परिवर्तन व्यवस्था को थोडा सा बदलता है, लेकिन लम्बे समय बाद परिवर्तन का समय का प्रभाव नवीन जटिल स्वरूपों को बम देता है। उद्विकासीय उपागम में विविध विद्वानों ने चार उप पद्धतियों का प्रयोग किया है : एक रेखीय (एशां।प८थ), सार्वभौमिक (ए१८०5०७)), चक्रीय ((थाल्व) एव बहेसीय (लए धागा) । सर्प उपागय (00णाल #एए्ञाए३ती) झ उपागग के अनुसार आर्थिक परिवर्तन, सामाजिक समूहों तथा समाज व्यवस्था के विविष भें के बौध गहन सबर्षों के माध्यम से अन्य परिवर्तनों को जन्म देता है। इसके पीछे तर्क यह है कि यदि समाज में मतैक्य हो और यदि विविध खण्डों में एकीकरण हो तो परिवर्तन लिए बहुत कम दबाव रह जायेगा। सास्कृतिक उपागय (एज #फ्एाण्ब्णा) इस उपागम में समाज के बदलते हुए सास्कृतिक तत्वों का विश्लेषण कर के परिवर्तन का अध्ययत किया जाता है! इसी उपागम के अन्तर्गत एम एन श्रीनिवास ने सस्कृतिकरण व परिवमोकण की प्रक्रिया के माध्यम से तथा मैक्रिममरियट ने सकुचितीकाण व सर्वधोमीकरण की प्रक्रिया के साध्यम से परिवर्तन का अध्ययन किया। सरवनात्पक उपागप ($फ0८एारबों 6ए/7०७९००) पेह उधागम साम्राजिक सम्बन्धों के जाल तथा सामाजिक साचना में परिवर्तन का अध्ययन करता है (जैसे जाति, नातेदारी, फैक्ट्री प्रशासनिक सरचना, आदि)। इन सामाजिक साचनाओं पा सम्बन्धों को तुलना अन्त. सास्कृतिक दृष्टि से वथा सास्कृतिक दृष्टि के परे भी की जाती । योगेद्र सिंह 0977 :7) के अनुसार परिवर्तन के सरदचनात्मक विश्लेषण के सम्बन्धों के सह्पण में नये सामजस् के गुणात्मक प्रकृति का अध्ययन निहित है। एडीकृत उपागम (क्ाल्ट्रय्रासप #क॒ुछाण्यटओ ऐेगेद प्िह 6973 : 22 <ग) मानते हैं कि उपरोक्त कोई भी उपाषम धारत में सामाजिक परेवर्नन का व्यापक पश्मिश्य प्रस्तुत नही कस्दा। अत उन्होंने सामाजिक परिवर्तन से सम्बद दिप्रिन विचारों बो मिलाकर एक नए उपागम का विकास किया जिसको उन्होंने 'एकीकृत' उप्रयम कहा है। इस उपागम में उन्होंने (अ) परिवर्तन की दिशा (एक रेखोय या चक्रौय), (न) व24 सामाजिक परिवर्तर और आपुनिकीकरण परिवर्तन का सन्दर्भ (लघु या वृहद्‌ सरचनात्मक स्तर के द्वारा), (स) परिवर्तन होने वाली घटना का सासभूत क्षेत्र (अर्थात्‌ सास्कृठिक या सामाजिक सरचना) आदि को मिला दिया है । भारत में सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति एवं दिशा (रिवाप्र ब्राव छॉतश्लांणा ठ 8००॑ंग (एथाएर वध [989) क्या हमने अपने सामूहिक लक्ष्य प्राप्त कर लिए हैं ? बीसवी शवाब्दि के पूर्वार्थ तक भारतीय समाज को परम्पणंगत समाज समझा जाता था यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने हमारे देश को औद्योगिक बनाने का प्रयल किया और अनेक सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन लाने की प्री कोशिश की, लेकिन लोगों के जीवन के गुणात्मक सुधार करने और जीवन स्तर उठाने में उनकी कोई रुचि नहीं थी। ग़जनैतिक स्वतत्रता प्राप्ति के बाद क्या हम अपने समाज का आपुनिकीकरण करने में सफल हुए ? यदि हाँ, तो परिवर्तन का स्वरूप क्‍या रहा है ? इस प्रश्न के उत्त के लिए यह समझना आवश्यक है कि एक परमपग्गत समाज क्‍या है और आधुनिक समाज क्‍या है ? परम्परागत समाज वह है जिसमें (।) व्यक्ति को प्रस्थिति उसके जन्म से निश्चित व निर्धारित होती है, अर्थात्‌ व्यक्ति सामाजिक गतिशीलता के लिए सपर्ष नहीं करता है, (॥) व्यक्ति का व्यवहार रिवार्जों और प्रथाओं से सचालित होता है और लोगों के व्यवहार में पीढ़ी दर पीढ़ी थोडा ही परिवर्तन आता है (५७) सामाजिक संगठन का आधार सस्तरण होता है, (४) व्यक्ति अपनी पहचान प्राथमिक समूह से बनावा है द्था परस्पर अन्तक्रिया में नातेदारी सम्बन्ध महत्वपूर्ण होते हैं, (४) प्रस्थिति को अपेक्षा व्यक्ति को सामाजिक सम्बन्धों को स्थापना से अधिक महत्व दिया जाता है, (४) लोग रूढिवादी होते हैं (५॥) अर्थव्यवस्था सरल होदी है दथा जीविका से परे आर्थिक उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है और (७४) समाज में मिथकौय (ए५0॥८०) विचार प्रभादी होते हैं। इसके विपरीत आधुनिक समाज वह है जिसमें ()) समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति उसकी स्वय की योग्यता एवं सामर्थ्य से निर्धारित होती है, (8) व्यक्ति का व्यवहार रिवाजों की अपेक्षा कानून से अधिक नियत्रित होता है, (४) सामाजिक सरचना का आधार समानता होता है, (०) द्वैतीयक सम्बन्ध भ्राथमिक सम्बन्धों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं; (७) समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति अर्जित होती है और सामाजिक जीवन में तथा सामाजिक सम्बन्धों में इसका अधिक महत्व होता है, (७) लोग नदीनता में विश्वास करते हैं, (७४) अर्थव्यवस्था * पर आधारित होती है, और (७०) समाज में तार्किक विचारों का बोलबाला होता है। तब क्या इसका अर्थ यह हुआ कि परम्पयवाद और आधुनिकता दो चरम सीमाए (टाल) हैं और ये दोनों एक साथ नही चल सकती ? योगेद्ध सिंह तथा एससो. दुबे विद्वानों का मत है कि दोनों का सह-अस्तित्व हो सकता है। परम्परावाद को स्वीकाजे का यह अर्थ नहीं कि आधुनिकता को अस्वीकार कर दिया जाता है। इसका सरल सा अर्थ है आधुनिकता की शक्तियों पर नियत्रण। इसी प्रकार आधुनिकता को स्वीकार करने का यह अर्थ नही है कि परम्पणवाद को पूर्णरूपेण अस्वीकार कर दिया जाये। इसका अर्थ है कि परम्पणवाद के केवल उन तत्वों को रखा जाये जिनको समाज द्वारा प्रकार्यत्मक मात्रा जाये। इस दृष्टिकोण के आधार पर हमें यह पता लगाना है कि किस सीमा तक भारतीय समाज साम्रजिक परिवर्त और आएनिकीकरण 425 प्पगद और किसी सौमा तक यह आधुनिक हो गया है। यह कहना गलव न होगा कि भारत में सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति ही ऐसी है कि झमें आधुनिक व परम्परा का स्पष्ट समन्वय दिखाई देता है। एक ओर तो हमने उन दिश्वारों, प्रधाओं और संस्थाओं की उपेक्षा की है जिनकी आवश्यकता अनुभव नहीं की गई, ते दूसरी ओर हमने उन मूल्यों को अपनाया है जिनको हमने अपने मौलिक उद्देश्यों की प्राप्त में सहायक माना है। ब्रिटिश काल की तुलना में आज स्व॒तत्रता अधिक है। सामाजिक पैमाने में उन्‍नति के अधिक अवसर प्राप्त हैं। हम परम्पणगत सामाजिक प्रथाओं को छोडने में तथा नई सस्थात्मक खाओं के निर्माण में अधिक विवेको हो गए हैं! गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में कमी हुई है। गणवंत्र बनने के बाद गत 50 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय में कई गुणा वृद्धि हुई है दथा पिछड़े तथा निम्न जाति के लोगों के लिए उच्च सामाजिक स्थिति की उलव्यि अब कोई भ्रम नही रह गया है। क्या हमने साम्प्रदायिक सौहाई (#70०7%) प्राप्त कर लिया है ? क्‍या हम रिरियों के पुरुऐों की समानता पर ले आए हैं ? क्या हम अस्पृश्यों की स्थिति में सुधार कर सके हैं ? क्या हम विधिन वर्गों में से उपेक्षा भाव निकालने में समर्थ हुए हैं , जैसे कृषक औध्ोगिक श्रमिक, दैनिक वेतन भोगी, आदि ? क्या हम सम्पत्ति के विशेषाधिकाएँ को निम्न गर्ग के लोगों के पश्च में लाने में समर्थ हो सके हैं ? क्या हम समाजवादी समाज होने का दावा कर सकते हैं ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर है कि हमारे समाज में आन्दोलन बढ गये हैं और सामाजिक असन्तोष फैल गया है! विद्यमान वृहद्‌ असन्तोष हमारे समाज में अनेक बढते हुए विरोधाभासों का परिणाम है। कुछ विशेषाभास (०००७३०/०४०॥७) इस प्रकार हैं हमारी भूमिकाए तो आधुनिक हो मई हैं किनु हमारे मूल्य अभो भी परम्पणगत हैं, हम समतावाद दशते हैं किन्तु हम भेदभाव का व्यवहार करते हैं; हमारी आकाश्षाए बहुत ऊँची तो हो गई हैं किन्तु उनकी प्राप्ति के साधन या तो उपलब्ध नहीं हैं या पहुंच से बाहर हैं, हम राष्ट्रवाद की बात तो क्ते हैं लेकिन हम क्षेत्रवाद को प्रोत्साहन देते हैं; हम दावा करते हैं कि हमार गणतत्र समानता लाने के लिए समर्मत है किन्तु यह जाति व्यवस्था के शिकजे में जकडा हुआ है, हम तर्कशौल होने का दावा करते हैं किन्तु हम अन्याय व पश्षपात को भी भायवादी भावना से स्वीकार करो हैं, 'म उदारीकरण की नीति की घोषणा करते हैं, फिर भी अनेक नियत्रण लागू करते हैं, हम व्यक्निवाद का समर्थन करते हैं लेकिन हम समूहवाद को लागू कर्ये हैं, हम आदर्शवादी असकेति का उद्देश्य बनाते हैं लेकिन हम भौतिक सस्कृति के पश्चघर हैं, अनेक नये कानून जाग किए जाते रहे हैं लेकिन ये कानून किसो को लाभ नहीं पहुचाते, केवल वकौल हो उससे नाषान्ित होते हैं। विधान अनेक हैं किन्तु न्याय बहुत कम, कार्यक्रम व सरकार कर्मचारी किन्तु जन सेवा कम, अनेक योजनाए हैं किन्तु कल्याण कम, सरकारी क्षेत्र कम, फर्म तत्र अधिक हैं हया प्रशासन कम है। इन सभी विशेधाभासों का परिणाम यह है कि हमारे सम्राज में असन्तोष बढता जा रहा है। भ्रष्ट तत्र तथा अप्रतिबद्ध राजनैविक अभिजाद वर्ग दया उप-अभिजन जो अपने निज घाएं में रवि लेते हैं जिस्हें देश के भविष्य की कोई चिन्ता नहीं होती; उन्होंने विकास का 426 सामाजिक प्ररिवर्त और आयुनिकोकरण विरोध किया, निहित स्वार्थों, समूहों, आर्थिक एकाधिकारियों और घर्मान्थ धार्मिक नेताओं तथा निष्क्रिय अधिकारियों आदि ने भी जमकर विरोध किया क्योंकि वे अपनी अपार शक्ति को कम होते नहीं देख सकते थे। सामाजिक परिवर्तन का प्रतिरोध (ए९हंज्याल्ट 00 $०ल॑ग एकक्षाएले यह सत्य है कि भारतीय समाज परिवर्तित हो रहा है और विकास को कुछ दिशाए स्पष्ट होती जा रही हैं, फिर भी सत्य यह है कि हम सभी लक्ष्यों की प्राप्ति में सफल नही हो पाए हैं जो हम चाहते थे ! हमारे लक्ष्यों की प्राप्ति में क्या बाधाए रही हैं ? गुल्तार मिरडल जैसे कुछ पश्चिमी विद्वानों ने सुझाया है कि भारत की आर्थिक कमजोरी का कारण लोगों में तकनौकी कुशलता की कमी नहीं है बल्कि साहस, स्थिति सुधारने को इच्छा, श्रम का सम्मान कल में कमी है। इस प्रकार के विचार तर्कहीन व पश्षपात है । कुछ पश्चिमी व भारतीय विद्वानों द्वारा इनको चुनौवी भी दो गयी है। इन विद्वानों में (७०5, 967), मिल्टन सिंगर (0966, 4969), टी एन मदान (968), योगेद्ध सिंह (973) और एससी दुबे, आदि हैं। ग्रामीण भारत के क्षेत्रों में किए गए विविध अध्ययनों से पता लगा है कि ग्रामीण लोगों में सुधार के लिए वीब्र इच्छा है। वे लोग कठिन परिश्रम करने के लिए अपनी व्यर्थ की तथा 240%00 के बदलने के लिए और प्रलो भन तथा मानव कमजोरियों से ऊपर उठने के लिए तैयार हैं। विकास सबधी प्रयासों में बाधक मानवीय कारक नहीं हैं, बल्कि राजनैतिक परिस्थितियों, सामाजिक सरचनाए, तथा आर्थिक कठिनाइया हैं। इस सम्बन्ध में निम्न कारकों का विश्लेषण आवश्यक है। फम्पएओ की शक्तियों (/<७ रण 7040000) समाज में परिवर्तन तभी सभव है जब कि नए कार्यों को करने की विधियों को स्वीकार करने के प्रति अभिरुचि उत्पन की जाए। परम्पयओं से लगाव तथा नवीन विचारों की अस्वीकृति सामाजिक परिवर्तन में बाधा उत्पन्न करते हैं। सास्कृतिक एकत्रीकरण (8९८0०8007) को मात्रा तथा अन्य समाजों से सम्पर्क की मात्रा किसी भी समाज में सामाजिक परिवर्तन की सीमा निर्धारित करते हैं। सास्कृतिक एकत्रीकरण की मात्रा के कारण आविष्कारों की सम्भावना तथा अन्य सस्कृतियों की नवीन विशेषताओं का प्रारम्भ सीमित हो जाता है जो इस बात पर निर्भर करवा है कि परम्परा को त्यागने की तत्मरता कितनी है। दूसरी सस्कृतियों के सम्पर्क में आने से जो कुछ ज्ञात होता है वह विस्तारित हो जाता है, यही सामाजिक परिर्वतन का स्रोत है। पृथक (50/9/८0) समाज परिवर्तन का अनुभव कम करते हैं लेकिन जो समाज मिलते-जुलते रहते हैं वे तेज परिवर्तन का अनुभव करते हैं। जो समाज बिल्कुल परिवर्तित नहीं हो तो उसमें लोग स्वतत्ञता पूर्वक मेलजोल से इन्कार करते हैं तथा दूसरों के रोति-रिवाज, ज्ञाव, तकनीकी एवं विचारधाराओं में भागोदारी करे में उत्साह नहीं दिखावे। यह इन्कार इसलिए होता है कि वे अपनी परम्पग्रओं को पवित्र मानते हैं। उनकी मान्यता है कि पराम्पप्रओं के गुण पवित्रता के सचरण (#&5छा5$»07) से आते हैं। पण्परा से प्रेषित इसलिए स्वीकार नहीं किए जाते कि वे विद्यमान होते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे किस्ती स्थिति में नियमों की आवश्यकता पूर्ण करते हैं। वे समाज में मग्रनिक परिवर्ति और आएनिकीकरण ब27 झपित का काम करते हैं। अत. वह भूमिका जो परम्परागत प्रतिमाव (70595), आधिक हद तकरीकी रूप से परिवर्तित होते हुए समाज में निभा सकते हैं, कुछ इस बात पर निर्भर कली है कि समाज के परमपया से अभावित व्यवहार क्या स्थान रखता है। यहाँ परम्पण और आपुनिकता के अटूट क्रम (८०ध्राणाणण) के बीच विभाजन रेखा खौची जा सकती है। पालगगत समाज में परम्परागत मूल्यों को महत्व दिया जाता है क्योंकि वे अतीत से अर्जित दिए जे हैं; लेकिंन आधुनिक समाज में परिवर्तन की दशाओं का स्वागत होता है क्योंकि दे दर्तमन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। जति बवत्या (९०56 5,760) जि प्रया न्याय व समृद्धि दोनों को ही प्राप्ति में बाधक रहो हैं। किंगस्ले डेविस (957 6) का यह कथन सत्य था कि आतुवशिक व्यवप्ताय का विचार, मुक्त अवसरों के विचार, उक्त प्रतिष्पर्दा, बढतो हुईं विशेषता, वथा व्यक्त की गविशीलवा जो गतिशील औद्योगिक से संबंधित है, के बिल्कुल विपरीत है। विकास योजनाओं के विशेष रूप से आमीण क्षेत्रों मे असफल होने का कारण गुटबाजी शेवा । गुर्यों की रचना का आधार जाति या उपजाति की सदस्यता होता है। कई क्षेत्रों में जहं कृषक एक जाति के होते हैं, दूसरी जाति के लोग उनके साथ कोई सहयोग नही करते स्पोंकि उलें किसो लाभ को आशा नहीं रहती है। उन क्षेत्रों में जहाँ कृषक सत्ताषारी हैं घहाँ ' विगत कार्यक्रम विस्तृत स्वीकृति प्राप्त करने में असफल रहते हैं। कोई भी कार्यक्रम जो 'छ जाति की सहायता के लिए होता है दूसरी जातियों द्वारा उसका विशेध किया जावा है जो शी में उनकी स्थिति से ईर्ष्या करते हैं या दूसगों की कौमत पर अपनी स्थिति के हित के लिए उलुक़ होते रहते हैं। जाति को तरह ही अन्त जाति गुटबाजी भी सामाजिक परिवर्तन रे बाप होती है। प्रएपर में अन्य जातियों के लोगों के साथ अन्तक्रिया में जाति प्रथा के बन्धन 'विशीत्ता तथा औद्योगीकाण की अुमति प्रदान नही करते थे, और आज राजनीति में इसके 'गग से शासक रचनात्मक दिशा में कार्य नहीं करते हैं। विलियम कैप 963 63) ने भी पत दिया है कि हिन्दू सस्कृति वथा हिन्दू सामाजिक सगठन भारत में विकास की कम दर के निर्णायक कारक हैं। मिल्टन सिंगर ((966 - 505) इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करते। से मान्यता है कि ऐसा कोई पर्याप्त साश्य नहीं है जो यह दर्शाता हो कि हिन्दू सस्कृति है. बदस्था ने भा के विकास में कोई बाधा उत्मल की है। उस्होंने कैप (गण) के केक को अनुपान पर आधारित (॥ए८८ण०॥४०) मूल्याकन माना है जो उल्होंने घार्मिक विचारों को गलत समझकर लिए हैं। दिखा अनता तथा भय फलब; बह्गकाकावट दब सटवा) खत के वाएण अश्ञानता भ्रय उत्पन करती है जो सामाजिक परिवर्तन में बाघा डालती हा के अनुसार कार्य कला सुरक्षित होता है क्योंकि उनका परीक्षण हो चुका होता है। है और बाद यह है कि नया' अनजान होता है, अव उस्ससे बचना ही ठीक होता है। वे विकार जो वर्तमान भौतिक सस्कृति से सम्बद्ध हैं यदि उनको अधिक आवृत्ति होती है वो 428 सामाजिक परिवर्वी और आधुन्िकीकरण लोग उनके आदी हो जाते हैं और परिवर्तन के प्रति उनका वैमनस्य भाव कम हो जाता है। इसके विपरीत, यदि भौतिक सस्कृति से सम्बद्ध आविष्कार अधिक व जल्दी न हों वो परिवर्तन कम होता है और भय का कारण भी। जब निरक्षरता सस्करण को श्ोत्साहन देती है, तब शिक्षा समानता के विचार पर बल देती है। यह विवेक को भी प्रोत्साहन देती है। शिक्षित लोग हे प्रकार की इच्छाओं को जन्म देते हैं तथा उनकी प्राप्ति के साधन भी विकसित करते हैं। मूल्य (7॥९ ॥८065) सामाजिक परिवर्तन में मूल्यों की भूमिका विवाद का विषय है। उदाहरणार्थ, होगल (प८्टूण) का विचार था कि सामाजिक परिवर्तन विचारों की अभिव्यक्ति का परिणाम है। मार्क्स का विचार था कि लम्बी अवधि के सामाजिक परिवर्दन पर मूल्यों का कोई प्रभाव नही होता है। उन्होंने सोचा कि सामाजिक परिवर्तन आर्थिक शक्तियों की अन्तक्रिया का प्रतिफल होता है, जो कि वर्ग सघर्ष में प्रकर होता है। अधिकतर भारतीय समाजशास्त्रो इस विचार से सहमत हैं कि मूल्य, व्यक्ति और सामृहिक व्यवहार दोनों को प्रभावित करते हैं और इस प्रकार सामाजिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करते हैं। अनेक लोग अनुभव करते हैं कि मूल्य परिवर्तन का परिणाम होते हैं, अत मूल्यों को सामाजिक परिवर्तन में प्राथमिक कारक नहीं मानना चाहिए। जाति प्रथा के मूल्य (सस्तरण, अपविग्रता, अन्तर्विवाह) भारतीय समाज के परिवर्तन में बहुत बाधक थे। जब लोगों ने तकनोकी तथा औद्योगीकरण को स्वीकार कर लिया, तभी भौगोलिक गतिशौलता के बाद सामाजिक गतिशौलता सम्भव हुई। भाग्यवाद ने भी कठिन परिश्रम तथा सामाजिक परिवर्तन में बाधा उत्पन की। अकाल, बाढ, भूकम्प, निर्धनता, बेरोजगारी सभी ईश्वरीय प्रकोप के परिणाम समझे जाते थे। औद्योगिक समाजों में लोगों ने सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति पर नियत्रण सम्भव है तथा अवाछनीय स्थिति निशाशाजनक बाघा नही है, बल्कि मनुष्य की शक्ति को चुनौती है। स्वजातिबाद (॥॥्ा०८८एश»ण) भी लोगों को दूसरी सस्कृतियों अथवा नवीन विचारों को स्वीकार करने से रोकता है ! भारतीयों के मस्तिष्क में जातिवाद इतनी गहरी जड़ें जमा चुका है कि यद्यपि वे सास्कृतिक सापेक्षवाद (लगाकर उद्बधशज्या) के दर्शन के अति सचेत होते हैं फिर भी वे दूसरों के विचारों को अपने विचाएं के प्रकाश में मूल्याकन के के शिकार हो ही जाते हैं। स्वाभिमान व इज्जत का विचार लोगों को दूसरों के विचारों वी स्वीकार करने से रोकते हैं। वे समझते हैं कि वे इतने विद्वाव व विचारवान है कि दूसरों के विचार उनके लिए कोई महत्व नही रखते, इसलिए उन्हें छोड देना चाहिए। सत्ाधारी आभिजन /226 2१9#€7 न्‍7॥) हमारे देश के लगभग सभी विद्वानों ने माना है कि सरकार भारतीय समाज में परिवर्तन लाने वाली प्रमुख ए्जेन्सी रहो है और सामाजिक परिवर्तन का एक अच्छा भाग सरकारी रजेन्सियों द्वाग ही प्रेरित और निर्देशित हुआ है। सरकार में सुधारवादी कार्य सत्ता में अभिजनों पर निर्भर होता है। परेटो (227००) ने इन्हें शासकीय अभिजन (8०ए८एणड था) कहा है। सभी अभिजन समुदाय के कल्याण या समाज के विकास के लिए अतिबद्ध नहीं होते। अनेक सम्रगिक परिवर्त और आपुनिकौकरण 429 अपिमों के कार्य स्वार्थों पर आधारित होते हैं। इस लेखक ने (975 55-66) 'स्व' (७॥) दषा जन (9०90) के हिलों में कार्य कर रहे अभिजनों को चार समूहों में वर्गीकृत किया है : वदासीन (90किवा)) (5-॥-), छलयुक्त (कमाए (६ + 7), प्रगतिशीत्त (70हव८5४५८) (8-, ?+), तथा विवेकी (भांणाओ५) ($ +, ?+)। समान में प्रगति सताआप्त राजनैतिक अभिजनों पर हो निर्भर करती है। स्वतत्ता के प्रथम बीस वर्षों में हमारे राजनेतिक अभिजन राष्ट्रवादी व विवेकी थे, जबकि शेष 30 वर्षों में वे विवेक्हीन तथा क्षेत्रवादी हो गए हैं। क्योंकि छलयुक्त और उदासीन अभिजनों का प्रभाव प्राहि्रौल व विवेकी अभिजनों पर बना रहा, इसलिए हमारे समाज का विकास अवरुद्ध हो गय्मा। राजनैतिक अभिजन की तरह ही हमारे अफसरशाह नवीनतावादी (#ग्0ए॥४८) की ओा प्ास्कारिक (॥०४४॥०) अधिक है; हमारी न्याय पालिका उदार होने की अपेक्षा अधिक पाम्परावादी है; हमारी पुलिस काबून की अपेक्षा सत्ता के नेवाओं के प्रति अधिक प्रतेवद है। अत: चूकि हमारे नीति निर्माता तथा कानून पालक उन कल्याणकारी विकास वी आवश्यकता नहीं समझते, इसलिए विकास उपेक्षित रहा है। मग्र्या विष्छोट (#कृपघंघघणा झफकु0507) बनगरष्या के पिस्फोट के कारण निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की संभावनाएं अवरुद्ध हो जाती | एमाती जनसंख्या में लगभग .5 करोड बच्चे प्रति वर्ष बढ रहे हैं। अनुमान है कि इतनी लिए हमें हजागें और लाखों में ससाधनों का इन्तजाम करना होगा। इस प्रकार अपिक जरसंज्या गीबी रोकने के प्रयासों और तोव् विकास की राह में रुकावट डालती है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जहाँ तक भारत में सामाजिक परिवर्तन को दिशा कप्फ्न है सांस्कृतिक निस्‍्तरता न र मात्रा में रही है। साथ ही आधुनिक मूल्यों, प्रथाओं या सस्ाओं में परिवर्तन भी आया है। परम्पसात्मक स्वरूप स्थिर नही रहा है तथा आधुनिक पे समान्यव लम्बी अवधि तक चलते रहने के कारण कार्य प्रणाली में हो समाविष्ट हो । गिोजन तथा सामाजिक परिवर्तन (शक्राणाजड बणपे 5००9 (॥काहणे बि्लो निरिचत क्रिया के प्रति अतिबद्धता नियोजन कहलावी है। यह सामाजिक सस्याओं का न सामाजिक, आधिक और साजमैतिक स्थितियों में समायोजन है। यह आवश्यक नहीं है कि नियोजन तर्क संगत हो हो क्योंकि यह सदैव विश्वसनीय वैज्ञानिक सूचनाओं पर पारित नहीं होता है! उदाहरणार्थ, यदि भारत में निर्षता उन्मूलन के लिए केवल उत्तादन है वृद्ध पर हो बल दिया जाये और जनसंख्या विस्पोट के नियत्रण के पथ वी उपेशा बी री है तब ऐसे नियोजन को वर्कसगत कैसे कहा जा सकता है ? सामाजिक नियोजन के दिन उद्देषप तोते है- 6) सामाजिक संगठन में परिवर्तन (४) सामुदायिक कल्याण, जैसे शिक्षा मा में सुधार करना, नौकरी के अवसरों में वृद्धि करता, सामाजिक कुरोतियों को समा सा, आदि ५५ मर (सट्णाथय) के अनुसार नियोजन की दीन प्रमुख विशेषताएं हैं (ओ) उद्देश्यों का और मूल्यों की घोषणा, (ब) मूर्दता (८००८७८०८७) अथवा विषय सामग्री वी ब30 साम्राजिक प्रिवर्ति और आधपुनिकीकरण निश्चितता निर्धारित करता, (स) विविध कुशलताओं तथा विविध पेशे की ट्रेनिंग में समन्वय स्थापित करना। योजना को सफलता के लिए कुछ बातें ध्यान में रखना आवश्यक है : () योजना का निर्माण लोगों के द्वात होना चाहिए, (0) लोगों को भागीदार अत्यन्त आवश्यक है, (0) योजना को प्राएप्प करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं को आगे आना चाहिए, न कि योजना बनाने वालों को, (१४) प्राथमिक्ताए पूर्व निश्चित करनो चाहिए, (४) निर्णय करने में मध्यस्थवा उस व्यक्ति के द्वारा की जाती चाहिए जो तकनीकी ज्ञान रखता हो और जो दक्षता प्राप्त पेशेवर >यक्ति हो क्योंकि उसमें विकल्प ढूँढने को क्षमता होती है। भारत में 4940 के दशक में एम विश्वेशरैण द्वारा आर्थिक नियोजन का प्रतिपादन किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के अवसर पर (938-39) एक अखिल भारतीय योजना बनाने के उद्देश्य से भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस ने राद्यीय योजना समिति कौ नियुक्ति कौ। लेक्नि बम्बई योजना (टाटा-बिडला योजना) ने हो भारत के लोगों को नियोजन-चेतना प्रदान को । 943 में भारत सरकार ने एक वाइसशय काउन्सिल की कमेटी, जिसे पुनर्निर्माण कमेटी ऑफ काउन्सिल (२८००३: ८७७०० (00फषणत९९ 0 (०ण्णला) के नाम से जाना जाता है, की स्थापना कौ (जिसकी सहायता प्रान्तीय नौति समितियों ने की) जिसका उद्देश्य पुनर्तिमोण की योजना तैयार करना था। 944 में योजना तथा विकास विभाग का भो निर्माण किया गया। परन्तु, उस समय सरकारी योजनाए निश्चित आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बनाई गई थीं। उतका सम्बन्ध केवल जीवन स्तर उठाने, लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने, कृषि मूल्यों को स्थिर करने, उद्योगों का विकास करने, धन सम्बन्धी विषमता को दूर करने, तथा पिछडे वर्गों को उठाने के प्रकरणों से था। विविध प्रान्तों से अपनी-अपनी योजनाएं बनाने के लिए कहां गया था। उनके लिए न तो ससाधन बजट था और न हो किसी प्राथमिकता का ही उल्लेख था। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारत की स्वतत्रता प्राप्ति तक भ्रेरित सामाजिक परिवर्तन सम्भव न था क्योंकि () पर्याप्त नियोजन द्वार विकास की प्राथमिकताओं को पूर्व निश्चित नहीं क्या गया था, (9) उत्पादन वथा राष्ट्रीय आय की आवश्यकता से सबधित पर्याप्त आक्डे तैयार नहीं किए गए थे, (४) विकास उद्देश्यों के लिए केवल सीमित विदेशी विनिमय ही उपलब्ध था, (४) निजी उद्यमी औद्योगिक विकास में बडी पूँजी निवेश करने में कम उत्साही थे क्योंकि सरकाये नीतियाँ उनके लिए सहायक नही थी, (४) विदेशों से कच्चा माल, मशीनें और प्रमुख वस्तुए आयात करने की सुविधा नहीं थी, (७) जनसख्या वृद्धि को गेक्ने के गभीर प्रयल नहीं किए गए थे, (६) प्रान्तीय तथा केद्रीय समितियों के बीच नियोजन प्रक्रिया में दालमेल नही था, (६४0) विश्व युद्धों के कारण मुद्रा स्पीति में वृद्धि होती जा रही थी, और (७) प्रशासनिक भ्रक्रिया का विकास मुख्यत॑ राज्य के पुलिस कार्यों के उद्देश्य से किया गया था। नौक्रशाही को विकास योजनाओं में रुचि लेने की ट्रेनिंग नहीं दी जाठों थी। स्ववत्रता के पश्चाद्‌ भारत सरकार ने सन्‌ 950 में सभी गज्यों और केंद्रीय योजनाओं में तालमेल बैठाने के उद्देश्य से योजना आयोग को नियुक्ति की ) मह आयोग (0 ब्राथमिकताओं को निश्चित करने (7) देश के ससाधनों के सतुलित नियोजन के लिए (00 देश के भौतिक, पूँजी एव मानव ससाधनों का मूल्याकन करने (४) समय-समय पर प्रगदि का मूल्यांकन तथा पुन समायोजन को सिफारिश करने (४) उन कारकों का पता लगाने के बरम्नविक परवर्त और आशुनिकोकरण 4 लिए जो आर्थिक प्रगति में बाधा डालते हैं, आदि कार्य करने के लिए था। | अपने प्राएम होने से अब हक योजना ने नौ पचवर्षीय योजनाए तैयार की हैं तथा प्रत्मेक योजना विशेष उद्देश्य पर केद्धित की गई है। उदाहरणार्थ, अप्रेल, 95] में जब प्रथम ज़ वर्षीय योजना प्रारम्भ को गई ऐो इसका भ्रमुख केन्रबिन्दु कृषि विकास था। द्वितीय पेण्मा में भागे उद्योगों पर बल दिया गया, जबकि शेष सा योजनाए कृषि व औद्योगिक विदा दोनों पर केच््रित थी। श्रेपित परिवर्तन के लिए अन्य प्राथमिकताएँ थी परिवार ग्ोजन, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, 5 से 7% वार्षिक राष्ट्रीय आय में वृद्धि, मूल उद्योगों वा विकास (लोहा, इस्पात, शक्ति, रसायन), मानव ससाधनों का अधिकतम प्रयोग, आर्थिक शक्ति का विकेद्रीकरण, आय वितरण को असमानताए कम्र करना, सामाजिक न्याय तथा आता प्रात कला, आदि। यह कहा जा सकता है कि भारत में नियोजन का मुख्य उद्देश्य शो के जीवन स्तर को ऊंचा उठाना तथा उनके लिए समृद्ध जीवन के लिए अवसर प्रदान सज़ा रह है। किन क्या भाएत में नियोजन से नियोजित परिवर्तन का उद्देश्य प्राप्त हो सका है ? 3 वर्ष के नियोजन की अवधि में आर्थिक विकास को दर 35% रही है। यद्यपि यह निश्व मे आय में 4% की वृद्धि को तुलना में बुरी नही है, किन्तु विकासशील देशों की 7% से !0% की वृद्धि को अपेक्षा अच्छी नहीं है। 95 से 2000 की अवधि में भारी राष्ट्रीय आय 3.5% की हो वृद्धि सम्भव हो पायी है। गेनाल्ड लिप्पिट (२0090 7/97०, 958 96-99) के अनुसार कहा जा सकता है कि यदि विकास कार्यक्रम को सफल बनाना है तो कुछ प्रिद्धान्वों को क्रियान्वित कला रोग । झ़्े कुछ महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं : ) विकास प्रस्ताव व प्रक्रिया में परस्पर मेल होना बह, (0) विकास्त के लक्ष्य समुदाय के लिए सार्थक मूल्य वाले होने चाहिए, (8) को सामुदायिक सांस्कृतिक मूल्यों तया विश्वासों का समुचित ज्ञान होना चाहिए, 00 विकस पक्तिया में समुदाय की भी सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए, (३) विकास समूचे यंग के संदर्भ में होना चाहिए और (छ॑) विकास की विविध एजेन्सियों के बीच सम्ेषण मे सहयोग आवश्यक है। जापान, जर्मनी सहित देश जिन्होंने प्रगति की है, वे देश हैं जहाँ ने दे कोई योजना आयोग है और न ही कोई योजना। क्या भारत को भी वही गाता अजाता नहीं चाहिए ? किडित परिवरत के कारक (क्िलणड ० 090९१ ए॥०१९ !950 में स्थापिद योजना आयोग देश के ससाधनों एवं आवश्यकताओं का समग्र रूप से विधा करते हुए देश के विकास के लिए पचवर्षीय योजनाएं यनाता रहा है। यदि हम अभी ते नौ योजनाओं का जायजा लें हो पता चलता है कि पा के पाँच इयर कुछ काम पूर्ण कर लिए हैं। हमारे सभी योजनाएं कभी कृषि उत्पादन ५०... वा, कभी ऐेजगार, कभी औद्योगिक विकास और इसी प्रकार उन्मुख रहे है। लेकिन रे और बेरोजगारी बढ़ते हो रहे हैं। +0 वें की अवधि में आर्थिक विकास कौ औसत दर अधिक नहीं है। 95] और 432 सामाजिक परिवर्वी और आपुनिकौकरण 999 के दौरान हमारी राष्ट्रीय आय 35 जतिशत के लगभग बढी थी, कृषि उत्तादन 27 अ्रतिशव, औद्योगिक उत्पादन 64 प्रत्रिशत व्रथा प्रति व्यक्ति उपभोग प्रतिशत बढा। यद्यपि सरकार ने दावा किया कि गरीबी रेखा के नीचे के लोगों की सख्या 999 में 34 प्रतिशत ही थी लेकिन क्‍योंकि बेरोजगार लोगों की सख्या में भी बृद्धि हुई, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि गरीबी को रोक लिया गया है। इसमें आश्चर्य नहीं कि आज अधिक लोग कुण्ठा का अनुभव करते हैं और आन्दोलनों की सख्या भी प्रतिवर्ष बढ़ती जा रहो है। वैधानिक उपाय (€झ्रंडआारट फैध्वध्रार५) सामाजिक कानून और प्रशासनिक उपाय काफी सख्या में भारत में विविध श्रेणियों के लोगों के लिए लागू किए गए हैं, जैसे, श्तियों, दलितों , जनजातियों, श्रमिकों, किसानों, पिछडी जातियों और इसी ठरह के अन्य लोगों के लिए प्रमुख कानूनी उपाय हैं बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 929 जिसको 974 में सशोधित किया गया जिससे लडकियों का विवाह 8 वर्ष से कम और लडकों का विवाह 2 वर्ष से कम रोका गया, 954 का विशेष विवाह अधिनियम जो माता पिता की अनुमति के बिना विवाह की स्वीकृति देता है तथा अन्तर्जातीय विवाह और तलाक की भी स्वीकृति देता है, हिन्दू विवाह अधिनियम, 955 जो 8 वर्ष से कम लडकियों और 2। वर्ष से कम लडकों के विवाह को अवैध करार देता है तथा तलाक की अनुमति देता है, 856 का विधवा पुनर्विवाह अधिनियम जो विधवाओं के पुनर्विवाह की अनुमति देता है, 96॥ का दहेज विरेधी अधिनियम जो विवाह में दहेज लेने व देने पर पतिबन्ध लगाता है, 955 का अस्पृश्यता अधिनियम अस्पृश्यता को व्यवहार में लाने वाले को दण्ड का प्रावधान करता है, 956 का हिन्दू एडोप्शन एण्ड मेन्टिनेस्स अधिनियम जो खत्रियों को दतक बालक रखने की अनुमति देता है, 797/ का गर्भ समापन अधिनियम जिसमें गर्भपात को अनुमति दी गई है, 956 का हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम जिसमें स्त्रियों को पली, पुत्री या मां के रूप में सम्पत्ति का अधिकार प्रदान किया गया है, तथा समान पारिश्रमिक अधिनियम जो कि रोजगार के दौरान री पुरुष की कार्य दशाओं के भी मजदूरी में भेदभाव को रोकता है। प्रशासनिक उपाय थे जमीन्दारी प्रथा उन्मूलन, मण्डल आयोग को सिफारिशों को लागू करना जिसमें नौकरी में ओबीसी (080) के लिए 27 प्रतिशद स्थान आरक्षित करना था। लोक सभा व राज्य विधान मण्डलों में अब महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने सम्बन्धी योजना ससद में विचार के लिए रखी गयी है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जातियों के लिए 5 प्रतिशत तथा 7 प्रतिशत जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित हैं। नगरीकरण और औद्योगीकरण (एरक्तग्ांडबाणा झत्त ए्रतेंपजञायंबार॥2807) नगरीकरण ((8व्वरंडआंणा) भारत की शहरी जनसख्या स्वतत्रता प्राप्ति के बाद तेजी से बढी है। इन असख्य लाखों लोगों के लिए शहर ही वह स्थान होता है जहा वे रोजगार की तलाश में आते हैं। 96। की उमविक परिर्ति और आपुनिकीकरण 433 ऋण के अनुप्तार कुल जनसंख्या का केवल 0 8 प्रविशत (या 23 8 कररड में से केवल 258 कोड) शहों में रहते थे | 99] में यह प्रतिशत बढकर 25 72 हो गया है और 200 हक लगप्रय 35 प्रतिशत लोग शहरों के निवाणी हो जायेंगे (अनुमानित एक अत्ब जनसंख्या का $ करोड)। इसका अर्थ यह हुआ कि आने वाले 5 वर्षों में 2005 तक) 0 लाख से ए कोड की आबादी वाले लगभग 35 नगर होंगे। मुम्बई, देहली और कलकत्ता में 5 कोड़ पे दो कयेड के बीच लोग होंगे, जबकि 998 में इनकी जनसख्या क्रमश 772 लाख, /2 लाख व 26 लाख थी। एक कारक जिसने शहरी आबादों की वृद्धि में योगदान किया है वह है औधेगेकरण। यह वैसा ही हुआ जैसा कि पश्चिमी देशों में जहा कि बढ़ता हुआ नगरीकरण अपिकाशत औद्योगीकरण का ही परिणाम था। गाँवों से नगरें में गति के लिए धात/खिचाव (0/0000॥) काएक अधिक कार्यकारी रहा है। घात कारकों में प्रथम, कृषि क्षेत्र में रोजगार हो बम आबादी बढ़ने से हो जाती है, दूसरे, जहा कृपि का आधुनिकीक्णण हो रहा है वहा गैर में पूर्णत्पेण कमी हो जाती है। खिंचाव कारों में प्रथम है ग्रामीण जीवन को ओोधा शो में अच्छे जोवन जौने के अवसर। शहरों में अर्थव्यवस्था भी यृहद्‌ होती है मम दृढ़ निशदयी व खोज करने वाले लोग जीविव रहते हैं और कुछ मामलों में समृद्ध भी हे जे हैं। शहरों में भिखारियों को आमदनी भी बढ़ने की सम्भावनाएं रहती है। दूसो, साफ पानी, शिक्षा, संचार एवं मनोरजन के साधन शहरों में अधिक सम्भव होते हैं। कारक है शहरों का सास्कृतिक आकर्षण तथा आधुनिक जीवन के तरीकों और केद्मक का आकर्षण युवा श्रामी्ों को जो सबसे ज्यादा अच्छा लगता है वह है शहरी ' दौलत और जीवन शैली, लेकिन शायद “शहरी” होने को इच्छा गहराई में छिपी रहती “गौ युवाओं की भाँति सोचने और समझने की इच्छा। आधुनिकीकरण के सिद्धान्तवादी पैप्रिया को 'उदारैकरण' मानते हैं। शहरों में हो व्यक्तिवाद जन्मता और पनपता है और रहो व्यक्ति को पारम्परिक सीमाए तोड़ने का अवसर मिलता है और उन आदर्शों और लक्ष्यों को प्रति का अवसर मिलता है जिनसे उसकी अपनी पहचान बनती है। शहरों को बढती जनसख्या उद्घाटित करने से अधिक छिपाती है। शहरों में ने बले प्र्येक व्यक्ति को घर नहीं मिल सकता या तो किया न दे पाने के कारण या से कर्य स्थल से दूर होने के कारण घर नहीं मिलता। यह उन्हें गन्दी बस्तियो में रहने को (बा है। मुम्बई में हौ लगभग आधी आबादी-65 करोड लोग- अस्थाई वस्तियों उपायों पर रहते हैं। शहर को आबादी 964 से तीन गुनी बढ गई है लेक्नि अस्थाई परे पदरह गुणा बढ़े हैं। दिल्ली, कलकहा और चेनई के गजधान क्षेत्रों मे कच्ची लें में हते वाले लोगों की सख्या लाखों में है जबकि जयपुर, अहमदाबाद, बैंगलोर, है भेदि जैसे शहों में भी उनकी भी सख्या लादों में है। गन्दी वसतियों में वृद्धि के *प है शहोकण मे पारिवारिक सम्बन्धों, अन्तर्जातीय व अन्वर्सामुदायिक सम्बन्धों, ख्लियों *थदि, अपराध तथा किशोर अपताध आदि को भी प्रभावित किया है। रही नियोजन में थोडा पश्षपाव रहा है क्योंकि इसने पारम्परिक रूप से शक्तिशाली ३ मे वर्गोय लोगों के हितों को ही दर्शाया है। जर आवश्यकताओं को कभी पी ध्यान + रहें खा गया है। उदाहरणार्थ, गुम्नई में व्यापारिक और आवासोय प्रयोग की धूम के 434 सामाजिक परिवर्वर और आधुनिकीकरण पुनरुद्धार में नियोजित अनुपात 80 20 का था जिससे वह अत्यधिक भीड, सकरापन तथा सडकों, उपनगरीय रेलों और जलापूर्ति, बिजली और गन्दे पानी के निकास की व्यवस्था आदि पर अत्यधिक दबाव पडा। शहरी भीडपाड पैदा करने में मुख्य कारण हैं, दोषयुक्त नियोजन, विदेशी नमूने, समझदारी और सार्वजनिक यातायात में विनियोजन में कमी, अधिक कानून, तथा नियोजन और निर्माण में निजी एजेन्सियों को न लगाना, आदि। नगरों के निकास को कम करने का समाधान रिंग कस्बों के विकास सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को मजबूत करने के साथ ही निजी वाहनों पर दबाव कम के में, नही है बल्कि सार्वजनिक यातायात को त्वरित बनाने में है। मुम्बई में उप नगरीय रेलों ने नगर के उप नगरों को 720 किलोमीटर तक बढा दिया है। नगरीकरण से कार्य शक्ति के ढाँचे में भी परिवर्तन आता है (अर्थात्‌ प्राथमिक (कृषि), द्वैतियक (रचना में) और तृतीयक व्यवसाय (व्यापार, यातायात, सार्वजनिक प्रशासन, बैंक और अन्य सेवाओं में लगे लोग) तथा प्रामीण नगरीय उत्पादन फासले में भी परिवर्तन आया है। उदाहरणार्थ, यदि हम पश्चिम बगाल को ही देखें, राज्य में 495 व 99] के बीच शहरीकरण की दर महाणष्टू, गुजरात, तमिलनाडु और साथ ही अखिल भारतीय स्तर की तुलना में कम थी। इसने राज्य में सभी तीनों क्षेत्रों (आथमिक, द्वैतियक व तृतीयक) में कार्यशक्ति के विठरण को प्रभावित किया। इस राज्य के शहरी क्षेत्रों के प्राथमिक क्षेत्र में 95 व 997 के बीच कार्य शक्ति का प्रतिशव 3 37 से 8 22 प्रतिशत के बीच था, द्वैतियक क्षेत्र में 34 78 व 406 के बौच तृतीयक क्षेत्र में 5225 तथा 6073 के बीच रहा (500#9शा८ द्रव उी0#66/ #96४9, ०एटय्राएशथ 24-27/ 00०८ए०७६० 4, 998 3035) औदच्योगीकरण (00506958॥09) औद्योगीकरण ने न केवल नगरीकरण को प्रोत्साहित किया है, बल्कि सामाजिक सरचना और सामाजिक सस्थाओं को भी प्रभावित किया है। इसका एक प्रभाव तो विशिष्ट शिक्षा कौ महत्ता की वृद्धि में देखा जा सकता है जिसने फिर विवाह आयु को प्रभावित किया है। परिपक्व और वयस्क युवा शिक्षा पूर्ण होने तथा जीवन में स्थापित होने तक विवाह रोक देते हैं। यौवनारम्भ के पश्चात होने वाले विवाह, वैवाहिक तथा पारिवारिक सम्बन्धों को भी प्रभावित करते हैं। व्यक्ति अपने हितों और आकाक्षाओं में अधिक रूचि लेते हैं। इसके अलावा औद्योगीकरण ने गविशीलता को प्रेरित किया है। गतिशीलवा सामाजिक प्रस्थिति में परिवर्तन की अपेक्षा पार्श्वीय (8८:०) होती है। लेकिन जैसे जैसे श्रमिक उद्योग में दक्षता प्राप्त करता जाता है उसकी सामाजिक प्रस्थिति भी बदलती है यद्यपि परिवर्तन लम्बाकार (४थ॥८थ) आधार की अपेक्षा क्लॉतजीय (#92०ए/2) आधार पर अधिक होता है। औद्योगीकरण ने नियत्रण के साधनों को भी प्रभावित किया है। अनौपचारिक साधनों ने औपचारिक साधनों को स्थान दिया है। लुमिस ने भी कहा है कि औद्योगीकरण ने बाजार अर्धव्यवस्था को जन्म दिया है जो परम्परागत मौखिक नियत्रण के साधनों को स्वीकार नही करती बल्कि नियत्रण के उपायों को लिखित में स्वोकार करदी है। औद्योगीकरण ने मजदूर प्रमागिक एरिवर्त और आधुनिकौकरण 435 प्रो के विकास में भी योग दिया है जिनसे नियोजक कर्मचारी सम्बन्धों पर भी प्रभाव पडा है वा कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक कल्याण और हितों की रक्षा पर भी ध्यान दिया गया है। इससे सरकार को सामाजिक कानून बनाने को बाध्य होना पड़ा है। अन्त मे, ओद्ेगीकरण के प्रभाव की बात करते हुएं, समाजशारत्रियों ने सचार साधनों पर भी इसके प्रधाव की ओर सकेत किया है जिसने गांव वालों की आत्मनिर्भरता कम की है, जीवन काल में वृद्धि की है और व्यापाग्रेगुख मनोरजन को प्रोत्साहन दिया है। सश्षेप में, औद्योगीकरण ने समाज के दिलों और मूल्यों को इस कदर प्रभावित किया है कि व्यक्ति की पहयान, प्रस्िति, ता और व्यवहार एक बार पुन नई शक्ल वथा नये उद्देश्यों पर सोचने को मजबूर हुए हैं। सप्माजिक (सुधार) आन्दोलन [($0तगाो (एशतता) भिरशाशधा5] पा में सामाजिक आन्दोलन केवल विरोध और असहमति प्रकट करने वाले आन्दोलन हो नहीं रे हैं, बल्कि सुधारात्मक, प्रतिक्रियात्मक के साध साथ सामाजिक-धार्मिक और स्वतत्रता आन्दोलन भी रहे हैं। ये आन्दोलन, जिन्हें “परिवर्तन को प्रोत्साहित/विरेध करने के सामूहिक अयत्न" कहा गया है, बौद्धिक विकास, सामाजिक सरचनाओं, वैचारिक वरीयताओं (५६३०४ ८७ ए:४४०॥०८७ और सत्य के ज्ञान आदि से अस्तित्व में आये। यह परवविदित सत्य है कि समाज की विशेषताएं ही आच्दोलनों के प्रारूप (॥9:5) तैयार करती । अत, सामाजिक साचना के तत्व और समाज के भविष्य कौ छवि ही सामाजिक के विश्लेषण को केद्ध बिन्दु प्रदान के हैं। ब्रिटिश काल तक हमारे देश में सामाजिक आन्दोलन घर्मोन्मुख थे, यध्थपि 930 के देद गद्दीय आन्दोलनों का भी उदय हुआ जो कि स्पष्ट रूप से साम्राज्याद और की शक्तियों के विरुद्ध थे। लेकिन स्ववँत्रता के बाद जो नयी स्थिति पैदा हुई, गैस गजनैतिक कुप्रशासन, आर्थिक शोषण, महिलाओं छा अपमान व तिसस्कार, सास्कृतिक किला आक्रमण के लक्ष्यों (878०0) में विविधता पैदा की दया विविध आद्दोलनों में या। साप्राजिक आन्दोलन अक्सर विशेष भागीदारें कौ पहचान (इणपा0 रण ध्पण एथापण/वाक) के आधाए पर चिन्हित किए जाते हैं जनजातीय पेश हस्जन आन्दोलन, महिला आन्दोलन, किसाव आन्दोलन, छात्र आन्दोलन, अधोगिक श्रमिकों का अन्दोलन, आदि। इसी प्रकार जिद समूठों के विरुद्ध वे जा रहे हैं जी सामूहिक की अकृति के आधार पर भी वे चिन्हित किए जाते हैं जैसे बराह्यण विशेषासक्ता, वामपन्‍्यो विशेधी, दलित पिरोधो, आदि | वर्गोकरण का एक और आयार है सगगत खहाब (वाणमंग आणं/णग्टू०) यानी, वह स्थान जहा उनका उदय हुआ और थे अ॒का कार्यक्षे्र है; जैसे विदर्भ आन्दोलन, तेलग्रावा आन्दोलन, लोग आलम शेख या वानाज्वल आन्दोलन, उत्तराज्वल आन्दोलन, आदि। इस प्रकार के नाम ३) का पता चलता है। आन्दोलन उद्देश्यों से भी जाने जाते हैं, जैसे, हिन्दों विद्येधो अोलन। आवदोलगों को उनके शीर्ष नेतृत्व से भी जाना जाता है, जैसे, गान्यी आम्दोलन, पड आउोलन, जेपी आन्दोलन, आदि। एमएसए रब (978) ने होन प्रवार के 436 सामाजिक परिवर्वर और आयुनिकीकरण आन्दोलनों को बात की है-ससुधारवादी, परिवर्तनवादी (+भ्राईगणकपार०) और क्रान्तिकारी । यहां हम अपने विश्लेषण को एक ही प्रकार तक सीमित रखेंगे, अर्थात्‌ सुधारवादी । सुधारवादी आन्दोलन मूल्य व्यवस्था में आशिक परिवर्तन लाते हैं। वे सरचनात्मक परिवर्दनों को प्रभावित नही करते (जैसा कि परिवर्तनवादी कर्ते हैं और न ही वे सामाजिक व सास्कृतिक व्यवस्थाओं की पूर्णता में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाते हैं (जैसे कि क्रान्तिकार आन्दोलन करते हैं)। यहा हम पाँच विशिष्ट सामूहिकता से सम्बद्ध आन्दोलनों की चर्चा करेंगे, अर्थात्‌ कृषक आन्दोलन, जनजाठीय आन्दोलन, दलित आन्दोलन, पिछडी जाति/वर्ग आन्दोलन और महिला आन्दोलन। इन सभी आन्दोलनों में ये पाँच तत्व हैं, 6) सामूहिक लक्ष्य (0) बृहद्‌ स्वीकृति घाले (6८४ ३००८७५८०), कार्यक्रमों को समान विचारधारा, (००चाए7०॥ 70200०१७) (४० सामूहिक क्रियान्वयन (४४) कम से कम सगठन स्तर, (0) भेतृत्व | इस प्रकार उपरोक्त विशेषताओं वाला कोई आन्दोलन 'एजीटेशन' (88॥2000) से भिन है क्‍योंकि विशेध में न तो कोई विचारधारा और न ही कोई सगठन होता है। घनश्याम शाह (५0०8| १(0ए६७१८७/७ 7 700/9, 999. 9) की मान्यता है कि कुछ विद्वानों द्वारा कुछ “सामूहिक कृत्यों' को 'एजोटेशन' कहा गया है, लेकिन दूसरों ने उन्हें “आन्दोलन' ही कहा है, जैसे भाषायी राज्यों के गठन कौ माँग। शाह स्वय उन्हें आन्दोलन (िकएए 2) या समाज के विशेष स्तर के सामाजिक आन्दोलन का ही एक हिस्सा मानता । इस प्रकार बनाज्वल की माँग बिहार में, उत्तर प्रदेश में उत्ताज्दल की माँग, मध्य प्रदेश में छत्तोसगढ को माँग उसके अनुसार सामाजिक आन्दोलन कहे जा सकता है (वही 9)। सामाजिक आन्दोलनों के विश्लेषण में सामान्यतया दो उपागम प्रयोग में लाये जाते हैं मार्क्सवादी और गैर मार्क्सवादी। मार्क्सवादी उपागम के अनुसार आन्दोलन में निन लक्षण मिलते हैं (() समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए सामूहिक कार्यवाही (0) इसका कारण समाज के आर्थिक ढाँचे में स्थित है या विरोधी हितों में जो कि दो विपरीत वर्ग के हो, (0) शक्तिवान वर्ग विचारधारा को सुधारने और शोषित वर्ग को नियत्रित के के लिए राज्य की दमनात्मक शक्ति (0००५० 7०४८) का प्रयोग करता है जबकि शक्तिहीन वर्ग इसका प्रतिगेध करता है। (७) एक ही वर्ग के सदस्यों के न केवल समान हित होते हैं, जैसे कि अन्यों के, बल्कि समाज में अपनी स्थिति के विषय में समान चैतना में श्री भागीदार होते हैं। (शाह, वही 24)। गौर मार्क्सवादी उपाय ने इस उपागम वी इस आधार पर आलोचना की है कि (४) यह सास्कृत्िक कारकों की उपेक्षा करता है ओर सरचनात्मक कारकों पर अधिक बल देता है। (७) यह आर्थिक कारकों का अधिक निर्धारण करता है। (०) यह पराभवी (८०ए०००७) उपागम है। गैर मार्क्सवादी विद्वानों के उपागम में सामाजिक आल्दोलनों के विश्लेषण में बहुत विविधता है। कुछ दो कारणों की छामबीन नही करते जबकि अन्य आन्दोलनों के लिए उत्तरदायी कारणों पर बल देने में भिलता रखते हैं। कुछ सास्कृतिक कारकों पर, कुछ व्यक्तिगत गुणों पर, कुछ अभिजनों द्वारा किए जाने वाले जोड तोड़ पर और कुछ परम्पपत और आधुनिकता के बीच सघर्ष पर बल देते हैं। उपगोक्त पाँचों आन्दोलनों (कृषक, जनजातीय, दलित, पिछडी जाति और महिल) के विश्लेषण में हमारी धारणा मुख्यत एआर देसाई, रजनी कोठारी और एसएराव के उपागर्मो सग्निक एरिवर्त और आयुनिकीकरण 4 पर आधारित है। देसाई (986) ने माना है कि कुछ आन्दोलन हमारे सबिधान द्वाण लोगों के गगरिक और लोकठंंत्रिक अधिकारों की सुरक्षा न करने के कारण होते हैं। रजनी कोठारी (984 : 986) की राय है कि समाज के रूपान्तरण (धब्आाईण्रगा॥707) में राज्य की अग्रफलता जिसमें विशाल जन समूह का दमन (स्याथ्छक्रणा) और उपेया (०00४83007) आम बात हो, लोगों को अपने अधिकारों को विविध सघर्षों के माध्यम से माने को बाध्य होना पड़ता है। गुर (5605, 970) और एम एसएस ए गव (979) ने प्रमाजिक आच्दोलनों को सापेक्ष वज्चनाओं (आाए० 9०ए0एथ0णा) के सदर्भ में समझाया है। राव ने पीड़ित द्वारा सापेक्ष वज्वना के साथ कुछ करने की सम्भावना पर बल दिया है। पनश्याम शाह (979) और टी के ओमन (0077८०, 977) सामाजिक आन्दोलनों की व्याख्या करते समय सापेक्ष वब्वना के उपागम को स्वीकार नहीं करते। ओमन का तर्क है के वज्तना सिद्धानववादी आन्दोलनों को 'परिवर्तन कौ लगातार चलने वाली प्रक्रिया' नही मातते। वे वज्वना के स्रोतों को भी नहीं मानते । शाह का मानना है कि वज्बना सिद्धान्ववादी की प्णा !॥6०7५७) चेतना के महत्व की भी अवहेलना करते हैं तथा भागीदारों के पक्ष को भी उपेक्षा करते हैं। जनवातीय आदोलन (नाता (श०/शएशा।॥) अदिवापियों के आन्दोलन 772 में बिहार से शुरु होकर, अनेक याज्यों में हुए हैं: आप्र प्रदेश में विद्ोह, अप्डमान निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश, असम, मिजोरम और नागालैण्ड पेक कई आन्दोलन चले। उननीसवी शताब्दी में विद्रोहों में सम्मिलित प्रमुख जनजातिया थी *मिद्दे (80), कोल 6795 और 4837), मुष्डा (889), डाफ्ला (875), खासी और गे (829), कछगे (839), सन्याल 0853), मुस्या गोण्ड (886), नागा (844 और 8/9), पुल्या (868) और कोन्ध (87) | ए आए. देसाई 979), गए (974) और गुहा (983) जैसे कुछ विद्वानों ने बताता के बाद के जनजातीय आन्दोलनों को कृषक आन्दोलन माना है, लेकिन के एस सिंह (9985) ने ऐसे उपागम की आलोचना कौ है क्योंकि इसका कारण थे आदिवासियों के और राजनैतिक सगठन, मुख्य धारा से उनका सापेक्ष एकाकीपन, उनके नेतृत्व के और उनकी एजनैतिक गतिशीलता की कार्य शैलो। आदिवासियों को सामुदायिक पैहगा बड़ी मजयूत है। जनजातीय आन्दोलन न केवल कृषक सम्बन्धी थे बल्कि वनों पर अधारित भी थे। कुछ विद्वोह तो नृजातीय प्रकार के थे क्योंकि वे जमीदाएं, साहुकाएें और छैटे ओटे सरकारी अधिकारियों के खिलाफ थे जो न केवल उनके शोषक थे बल्कि विदेशी + पनश्याम शाह, ०9. ले! , 4998, 86) हे सकी जब आदिवासी कर्जा या ब्याज चुकाने में असमर्थ रहते थे तब महाजन और जमींदार झेकी भूमि हड़प लेते थे। इस प्रकार वे अपनी हो भूमि पर काश्वकार हो गए और “फ्री बन्युआ मजदूर। पुलिस और राजस्व अधिकारी कभी उनकी मदद को नहीं आते पै। इसके विपरोत वे भी अपने व्यक्तिगत कार्यों या सरकारी कार्यों के लिए मुफ्त में उनको मेवार लेते थे। न्यायालयों को आदिवासी कृषि व्यवस्था और रिवाजों का हात नहीं था ररेके उनकी दशा का भी ज्ञान नही था। जमौन हडपने, बन्घुआ मजदूी, न्यूनतम पारिश्रमिक 438 साम्राजिक प्ररिवर्त और आधुनिकौकरण और जमीन पर कब्जा, आदि ने अनेक जनजातियों-जजैसे मुण्डा, सन्याल, कोल, भील, वर्ली आदि--को अनेक क्षेत्रों-जैसे असम, उडोसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र मे--विद्रोह के लिए बाध्य कर दिया। वन प्रबन्ध के कारण भी कुछ जनजातीय विद्रोह हुए क्योंकि कुछ क्षेत्रों में वन ही उनकी आजीविका का साधन थे। ब्रिटिश सरकार ने कुछ विधानों के द्वारा व्यापारियों और ठेकेदारें को वर काटने की अनुमत्रि दी थी । इन नियमों ने आदिवासियों को न केवल वन उत्पादों से वज्चित रखा बल्कि वन अधिकारी उनको उत्पीडित भी करते थे। इससे आन्ध्र प्रदेश और कुछ अन्य क्षेत्रों में आदिवासी आन्दोलन चलाने लगे। राघवैया ने 97 में आदिवासियों के विद्रोहों-778 से 970 की अवधि के +-विश्लेषण में 70 विद्रोहों की सूची बनाई और समय क्रम से व्यवस्थित किया। भारतीय मानवशाज्रीय सर्वेक्षण में 976 में जनजातीय आन्दोलनों के अपने सर्वेक्षण में भारत में चल रहे 36 आन्दोलनों की पहचान कौ। यह कहा गया कि यद्यपि ये ब्रिद्रोह न तो अधिक सख्या में थे और न ही जल्दी जल्दी हो रहे थे, फिर भी मध्य या पूर्वी भारत में शायद ही कोई प्रमुख जनजाति रही हो जिसने गत 50 वर्षों में अपनी पीडा को व्यक्त करने के लिए आन्दोलन का सहारा न लिया हो। उत्तरपूर्वी व मध्य भारत में जनजातीय आन्दोलनों पर कुछ अध्ययन किये गए और उनका उल्लेख किया गया है। परन्तु दक्षिण भारत में टू त कम सख्या में या बिल्कुल नहीं के बराबर जनजातीय आन्दोलनों के विषय में जानकारी है । यह इसलिए है क्योंकि दक्षिण भारत में जनजातियाँ या दो अत्यन्त आदिकालीन अवस्था में हैं, या अत्यन्त अल्पसख्या में, या इतने एकाकी ((50।9८0) रहते हैं कि आन्दोलन के सगठन में सक्षम नही है, यद्यपि उनमें शोषण के विरुद्ध असन्तोष काफी है। (केएस सिंह, 983 >७) | एल के महापान 0972 409) ने भी देखा है कि सख्यात्मक रूप से अल्प तथा घुमक्कड जनजातियों में महत्वपूर्ण सामाजिक, धार्मिक, प्रस्थितीय गतिशौलता के या गजनेतिक आन्दोलन नहीं हुए हैं। जनजातीय आन्दोलनों का विवरण अध्याय नौ में भी दिया गया है। कृषक आन्दोलन (एच्ब$था६ 0 #हाछायंशा ०४९शशा5) कृषक आन्दोलनों पर दो विचार हैं, एक, कि ये आन्दोलन स्वतत्रता के बाद उभरे और शुद्ध रूप से सामाजिक और सास्कृतिक प्रकृति के हैं, दूसरा, ये आन्दोलन स्ववत्रवा से पहले भी थे और उपनिवेशवादी शासकों तथा जमीदारों के विरुद थे अर्थात्‌ वे गजनैतिक और सास्कृतिक थे। मूर जूनियर (घनश्याम शाह, 998 34-35 द्वाय उद्धृत) ने भारत में कृषक आन्दोलनों एश लिखते हुए 2967 में) भारतीय दृषकों की क्रान्तिकारी क्षमद्या को स्वीकार नहीं किया है। उसके अनुसार भारतीय कृषक परम्परा से निष्क्रिय एवं भीरू होते हैं जिसके कारण मुगल और ब्रिटिश काल में कृषि अकुशल तथा दोषपूर्ण बनी रही । इसलिए बहुत बडे कृषक आन्दोलन भी नहीं हुए। लेकिन मूर कौ घारणा को ए आर देसाई, कैथलीन गफ और डी एन घनाये द्वारा चुनौती दी गई है। उनका तर्क है कि इठिहासकारों ने अनेक कृषक आन्दोलनों की ग्मबिक परिवर्ति और आयुनिकौकरण 439 अनदेखी की है। गफ ने गत दो शताब्दियों में लगभग 77 कृषक विद्रोहों की बात की है किसमें सबसे छोटे आन्दोलन में कई हजार कृषकों ने सक्रिय समर्थन किया था। ए आर देसाई (909 : शा) ने भी देखा कि सम्पूर्ण ब्रिटिश शासन काल तथा बाद में भी भारतीय ग्रामीण परिदृश्य विगेष और विद्रोह के स्वर्ों से उद्वेलित था और यहा तक कि बडे पैमाने पर संघर्ष दर्षों तक जले जिसमें सैकडों ग्रामीण भी सम्मिलित ये। रणनौत गुहाय (983) ने कहा है कि विविध स्वरूपों एवं स्तरों के कृपकर आन्दोलन 9 वो सदी के अन्त तक शुरु हो गए थे। ब्रिटिश शासन के दौग़न कम से कम ]0 विद्रोहों कौ जानकारी है। घनाये 983 5) का तर्क है कि मूर के सामान्यीकरणों पर प्रश्न विन्ह लगाया जा सकता है क्योंकि भारत में अनेक किसान आन्दोलन और विद्रोह हुए हैं। एआए देसाई (986) और घनश्याम शाह 998 7 3-39) के अनुसार भारत के दृषक आन्दोलन, समय के आधार पर पूर्व-ब्रिटिश और स्वतत्रयोत्तर कालों में वर्गकृत किए गए ₹! स्वतंत्रयोत्त काल को पुन पूर्व नक्सलवादी और उत्तर नक्सलवादी काल में बॉटा गया है या इनें पूर्व व उत्तर हरित क्रान्ति युग भी कहा गया है। बाद के काल को पूर्व और उत्त आपातकाल युग में और भी वर्गीकृत किया गया है। एआए देसाई की यह भी राय है कि कृपक आ्दोलनों की प्रकृति कृषक सरचना के अनुसार भिन्‍न है जिसमें विविध कालों के परिवर्तन हुए हैं। उसने (986) उप-निवेशवादी भारत को ब्रिटिश सीमा में रैयतबाडी , राज शाप्तन के दौरान जमीदायी क्षेत्रों और जनजातीय परिक्षेत्रों (2०४८७) में बाँटा है। से शेड में कृषक संयर्ष की विविध विशेषताएं थी, विभिन प्रकरणों को उनमें उठाया गया था और उसमें विविध स्तर के कृषक सम्मिलित थे। उसने स्वतत्रयो्तः सपपों को पुन दो भ्रैणियों में बॉटा : घनी किसानों द्वारा चलाए गए आन्दोलन तथा गरीब किसानों द्वारा चलाए हर आतदोलन। इस प्रकार कृपक सरचना समूचे देश में एक समात रूप में विकसित नहीं हुई । कैथलीन गफ (974) ने कृषक विद्रोह्ें को उनके उद्देश्यों, विचारघाय और संगठन जो विधियों के आधार पर पाच प्रकारों में बॉटा है. (0) ब्रिटिश लोगों को बाहर खदेडने के लिए पुन्श्यापना के विद्रोह, ताकि पूर्व के शासकों को पुनर्स्थापित किया जा सके (॥) पर्विक आन्दोलन; (॥)) सामाजिक दस्युता, (४) सामूहिक न्याय के लिए आतकवादी दुर्घावना, और (७) विशेष शिकायतों के समाधान के लिए जन विद्रोह। जहा तक कृषक से सम्बद्ध प्रकरणों का प्रश्न है, तो कुछ तो काश्तकार भूस्वामी के बीच सपर्ष से हद थे, कुछ बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय के जमीदारों द्वाप दबाव के काएण थे (हिन्द) ओर ईछ साम्रदायिक हिंसा, सरकारी कर्मचारियों तथा पुलिस द्वाा उकसाए जाने, आधथिक दशा पुषाले के कारण, अधिक पारिश्रमिक की माँग के लिए, बेगार आदि कारकों के कारण थे। कुछ लेखक मानते हैं कि गान्धी जी ने कृषक समाज को राष्ट्रीय स्वतत्रदा के लिए प्रेरित किया पा, न कि जमीदारों और साहूकारें के विर्दध। अन्य लेखक भी हैं जो सुझाव देदे हैं कि रैक आदोलगों व राष्ट्रीय आन्दोलनों के बीच का सम्बन्ध परस्पर आदान प्रदात का था। देषक वर्ग की मार्गों को उठाना और साम्राज्यवादियों के विर्द समयावधि की सुरक्षा के हित, कर भाषी, और सस्तो दर पर ऋण आदि विषयों पर राष्ट्रीय नेतृत्व मजबूती से बल न दे ग। 440 सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण आजादी के बाद नेताओं ने कृषक समाज को जमीदारों और भूस्वामियों के विरुद्ध आन्दोलित करने का प्रयल किया। शोषित कृषक वर्ग एक जुट नही थे क्योंकि वे अपने मालिकों से गुटीय बन्धनों से बन्धे हुए रहते थे। प्रारम्भ में गरीब कृषक बहुत कम लडाकू अवृत्ति के थे, लेकिन बाद में जैसे-जैसे भूस्वामी विशेधी तथा धनी कृषक विरोधी भावना मध्यम वर्ग द्वाव बनती गई, गरेब किसानों की विद्रोही शक्ति भी क्रान्तिकारी शक्ति में बदल गई। लेकिन क्रान्तिकारी कदम उठाने वाले कृषक अखिल भारतीय स्तर पर कार्य नहीं कर पा रहे थे। कुछ ही क्षेत्रों में कृषक आन्दोलन संगठित हो पाए थे। विभिन क्षेत्रों में प्रमुख कृषक आन्दोलन इस प्रकार थे तेभागा (७8889), तेलगाना और नक्सलवादी | भूदान और सर्वोदय आन्दोलन में कृषकों के हितों को भी उजागर किया गया था, लेकिन उनका सचालन कृषकों द्वारा न होकर विनोबा भावे और जय प्रकाश नारायण द्वारा हो रहा था। तेभागा आन्दोलन (946-47) अनेक कारकों द्वारा चलाए गए थे। ये कारक थे 943 का अकाल, जोतदारों, जमाखोरों व काला बाजारियों के विरुद्ध अभियान, आन्दोलन में शामिल आदिवासियें की सामाजिक एक, तथा बटाई पर काम करने वालों (&४४:८८००७००४७) की बढती सौदेबाजी की क्षमता। क्योंकि इस आन्दोलन का विस्तार सीमित था अत यह असफल रहा। हिन्दू मुसलमानों के बीच को खीचातानी, अर्थात्‌ साम्प्रदायिक राजनीति, वर्ग और जाति के बीच तालमेल की कमी, और कृषक समाज के भीतर ही ४3083 के लिए उच्च वर्ग के जोड-तोड के कारण भी यह आन्दोलन असफल रहे (धनाग्रे)। तेलगाना आन्दोलन (946-5) दक्षिण भारत में प्रारम्भ में तो सफल रहा लेकिन अन्त असफल रहा क्योंकि साम्यवादियों ने भारतीय सेना के विरुद्ध मुस्लिम रजाकारों का समर्थन किया जो कि राष्ट्रीय भावनाओं और आन्दोलन के विपरीत गया। धनागरे ने इस आन्दोलन को विस्तृठ वर्ग आधारित आन्दोलन कहा क्योंकि इसमें भूस्वामियों के विरुद्ध मध्यम, गरीब, भूमिहीन किसान शामिल थे। नकक्‍सलबाड़ी आन्दोलन (बच्चो च०रसाला) फरवरी 967 में पश्चिम बगाल में जब कम्यूनिस्ट पार्टो ((/) के सहयोग से सयुकत मोर्चा सरकार सत्ता में आई, तब कुछ सक्रिय एवं स्थानीय समूहों का उदय हुआ। उनमें से एक चारू मजूमदार तथा कानू सान्याल के नेतृत्व में शुरुहुआ जिसने कृषक समाज में सशखता को विकसित करने पर जोर दिया जिससे किसानों को सशस्त्र सघर्ष के लिए तैयार किया जा सके प्रारम्भ में नेताओं ने बेनामी भूमि पर जबरन कब्जा में कृषकों से भाग लेने को कहा लेकिन बाद में उन्होंने गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से वर्ग शतुओं को समाप्त करने पर बल दिया। इस प्रकार जन आन्दोलन का स्थान भूमिगत छोटे समूह दस्तों ने ले लिया। इस प्रकार नक्‍्सलबाडी आन्दोलन कौ गुरिल्ला कार्यवाही ने पश्चिम बगाल और आशऋ्धर प्रदेश में सबसे अधिक प्रभाव डाला और बाद में बिहार में भी। नक्सलबाडी में कृषक विद्रोह 972 में पश्चिम बगाल के दार्जिलिंग जिले में तीन प्रमनविक परिवर्ति और आवुनिकौकरण ब्वा के में शुरु हुआ। राजवशी (पूलरूप से एक जनजाकि), ऑगव, मुष्डा, सम्धाल इस क्षेत्र में सबत्ते अधिक थे। अन्तिम वीन जनजातियों के लोग वे थे जो छोटा नागपुर (बिहार) से शर्णितिंग के चाय बगानों में काम करने आए थे। भूस्वामी जोतद्र कहलाते थे और कशकार अधियायी। अधियारी की जस्थिति संकटपूर्ण थो। उनका इतना शोषण होता था बुआ मजदूरों जेसा व्यवहार उनके साथ होता था कि इससे 7950 और 7960 के शो में कृषक आन्दोलन हुए। कानू सान्याल और अन्य लोगों ने !960 के दशक में कृषक गणों को लेकर, जिनमें जमीदारो उन्मूलन, जोतने वाले को भूमि तथा काश्तकार से भूमि जाली कराने से रोकना, आदि, के लिए शोषित किसानों के बीच प्रथम प्रवेश लिया। बेनामी पूणि पर पुन. काबिज होने के लिए 950 व 960 के दशकों में किसान सभा द्वायर किसानों मे अद्वान किया गया कि फसल काटो और अपनी जगह में भण्डारण करों, किसान प्रमितियों के समभ्ष अपने भूस्वामित्व का साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए जोतदारों से कहो, एल बचाने तथा फसल को पुलिस से बचाने के लिए शख्र धारण करो, आदि। 960 के पा 900 के दशकों में नक्सलबाडी कृपक आन्दोलन के दूसरे चरण में गुप्त उम्रवादी दस्ते बनाए गए तथा कृषकों से जोतदारों और बागान श्रमिकों की भूमि पर कब्जा करने को कहा गया बिन्ोने गरीब किसानों से जमीन खरीद ली थी, छीनी गई भूमि को जोतने और सम्पूर्ण प्राण फसत्न पर कब्जा करने को कहा गया, भूस्वामो से भोजन कौ माँग और उसके मना करने ' उससे जबरन लेने, तथा जोवदार को अग्ेयाश्नों से उसे वचित करने को कहा गया। नसततवाडी क्षेत्रों में 967 में मक्सलबाडी विद्रोह को पुलिस कार्यवाही द्वारा दबा दिया गया, अगस्त-सिताबर 968 में पुन. शुरु हो गया जो 972 ठक चलता रहा। पश्चिम गगाल में नक्सलबाडी आन्दोलन की भ्रमुख विशेषताएं थी एक, कृपकों और अग्िक वर्ग के हितों की रक्षार्थ गतिशीलता और इसमें सभी जूजातीय (जनजातियों सहित) जाति समूह सम्मिलित थे; दो, अपनाए गए साधन गैर्सस्थागत और हिंसा को प्रोत्साहित दिया जाता था, तीन, नेतृत्व काम्युनिस्ट पार्टो के नेताओं द्वास प्रदान किया जाता था, चौथे, हक रदेश्य था जोतदाएों को नोचे की ओर ले जाना तथा बन्धन युक्त सीमानत कृपकों वो उप कौ ओर उठाता। इस प्रकार, गान्थी जी के सर्वोदय आन्दोलन और नक्सलबाड़ी अन्तर यह था कि प्रथम का उद्देश्य सामुदायिक स्वामित्व के साथ जमौन के अक्तिगत स्वामित्व को हटाना था जब कि दूसरे का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वामित्व था। रेस आन्दोलन को असफलता के कारक थे इसका राष्ट्र विशेधी झुकाव, जैसा कि इक गति इसके समर्थन से जाहिए होता था, इसका भारतीय राष्ट्रीय नेवृत्न वी रिया कला और बीती नेतृत्व को अपनी आकाक्षाओं का स्रोत मानना, राज्य सत्ता को हृथियाने का इसका अर झादा, हिंसा और वामपतन्यियो मे गुटबाजी का खुला समर्थन। आरके मुखर्जी (978) रे आन्दोलन का विश्लेषण सामाजिक सरचता और सामाजिक परिवर्तन के अर्थ में किया है। उप तर्क है कि यद्यपि आन्दोलन का घोषित इ्दा गज्य सता हासिल करता था, पस्नु उलव में यह आन्दोलन व्यवस्था के विरुद्ध नहों था बल्कि इसको अतिवादिता के विद पखामे और किसान के बीच वस्तु विनिमय को नियमित करने का उद्देश्य था (98:34) | भारत में कृषक आन्दोलनों का अष्ययन विद्वानों द्वारा छ विविध दृष्टिवोणों से भी ब42 सामाजिक प्रिवर्त और आपुनिकीकरण किया गया है - (0) सूक्ष्म एव विशद्‌ स्तर पर सर्घो के रूप में उनको कार्य प्रणालो के अर्थ में, 0) राजनीति वे कृषक आतन्दोलनों के बोच सम्बन्ध, अर्थात्‌ काम्रेस, कम्शुनिस्ट जैसो शजनोतिक पार्टियों द्वारा समर्थन, 6) सामाजिक सरचना (जाति, वर्ग और शक्ति) और कृषक आन्दोलनों के बीच सम्बन्ध, (4) हरित क्रान्ति और कृषक आच्दोलनों के बीच सम्बन्ध (हरित क्रान्ति ने न केवल परम्परागत कृपक सम्बन्धों को प्रभावित किया बल्कि आर्थिक विषमताओं को बढाया और प्रामीर्णो की सामाजिक आकाश्षाओं को भी बढाया) (७) कृषक कानूनों और आन्दोलर्नों के बीच सम्बन्ध (अर्थात्‌ आन्दोलन जिनके कारण कानून बने और कानून जिनकी वजह से आन्दोलन हुए, और 6) आन्दोलनों की गतिशोलता और सगठन के बीच सम्बन्धा कृपकों के कल्याण के लिए कुछ आन्दोलन गान्धीवादी सिद्धान्तों पर संगठित किए गए थे। दो ऐसे आन्दोलन थे विनोबा भावे का भूदान आन्दोलन और जय प्रकाश नारायण का सर्वोदय आन्दीलन। भूदान आन्दोलन का त्वरित (977८090) उद्देश्य धनी वर्ग से जमीन इकट्ठा कर के गरीबों में बॉटना था। परन्तु यह आन्दोलन अपने उद्देश्यों की प्राष्ि में असफल रहा। धार्मिक आन्दोलन (एशाह005 |भृ०एशाशा(5) भारत में धार्मिक आन्दोलत मुख्य रूप से रूढिवादी, हिन्दू विचारधारा विरोधी, ब्राह्मण विरोधी, मुस्लिम पक्ष के, या सिख पक्ष के रहे हैं। ये आन्दोलन या तो विशेष प्रदर्शन (97०८४) के आन्दोलन थे या अलग पहचान के लिए थे या सामाजिक सम्बन्धों के विद्यमान व्यवस्था में परिवर्तनों को उचित ठहराने के लिए किए गए थे। कुछ आन्दोलन अपने विश्वास के मेतराओं को रूढिवादी विचारधारा के विशेध में चलाए गए थे, कुछ ब्राह्मणवादी, हिन्दुत्व और जाति व्यवस्था के खिलाफ थे, कुछ शुद्धता और अशुद्धता के विचारों के विरुद्ध थे और कुछ ब्राह्मणों की भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध थे। ओमन ने धार्मिक आन्दोलनों को तीन श्रेणियों में बॉटा है (0072८७, 87) () वे आन्दोलन जो आवश्यक रुप से हिन्दुत्व के विरोध में चलाए गए थे और अलग धर्म के रूप में स्थापित हुए, जैसे जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म (2) भक्ति आन्दोलन जो हिन्दुत्व की बुराइयों के शुद्धिकरण का प्रयल था तथा जाति प्रथा के अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष था लेकिन फलत पर्न्यों में बट गया, जैसे आर्य समाज 6) वे आन्दोलन जो हिन्दूवाद से अलग॑ होने तथा अन्य धम्ों में परिवर्तित के लिए किए जा रहे थे। भारत में धर्म के विशेध में प्रध आन्दोलन थे छठी शताब्दि में जैववाद और बुद्धवाद । जैनवाद वेद के प्रभुत्व को अस्वीकार करता था और बलि के विरुद्ध विद्रोह! बुद्धवाद भी वैदिक बलि प्रथा और ब्राह्मणों के प्रभुव्व का विरोध करता था। वै्यव और शैव * आन्दोलन तथा कबीर, चैतन्य व नानक द्वाश शुरु किए गए आन्दोलन मनुष्य और ईशबए के बीच, अर्थात्‌ ब्राह्मण को मध्यस्थता को समाप्त करने के लिए प्रयलशोल थे। कर्नायक में वीरेशवाद आन्दोलन जादि प्रथा की कठोरताओं, मूर्तिपूजा, अस्पृश्यता, आदि की प्रथाओं के विरुद्ध थे, लेकिन इसकी परिणिति धार्मिक अधिकारैवाद और श्रेणीक्रम सगठन में हुई और उदय एक पन्थ के रूप में हुआ। प्रयोगिक पीवर्त और आपनिकौकरण ६ | आर्य समाज आन्दोलन का जन्य पंजाब में मुख्यत ईसाइयों और मुसलमानों दाता किये बने वाले घर्मान्तरण के प्रयलों के विरुद्ध हुआ। इसका घी आधार वैदिक दर्शन ही दा। इसके अतिरिक्त इसमें शुद्धि पर भी बल दिया गया था। आज (998-2000) यह पर्अलकाण का पक्ष हिन्दू परिवार तथा वजरग दल द्वाय पुन उठाया गया है। पर्मान्तरण ((थवाएधयज्न०)) आन्दोलन निम्नलिखित बिन्दुओं पर बल देता है (ओमन, 9 एा, 9-92). 0) विशिष्ट ऐतिहासिक कालों में धर्मान्दरण, विशेष रूप से इस्लाम औए ईसाई, आर्थिक व जनैदिक उद्देश्यों से प्रेरित थे। धर्मानतरण सामूहिक घटनाएं थी। सामूहिक अन्तरण के विपरीत व्यक्तिगत या परिवार अन्वरण उच्च और मध्यम वर्ग तक हो सीमित थे। 8) यदि किसो क्षेत्र में निम्न जाति के लोगों का धर्मानतरण हुआ और उन्होंने विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक सुधार का अनुभव किया और निश्चित प्रजनैतिक अनुभव प्राप्त किया तो इससे ऐैस्ब्राह्मण जातियों को भी धर्मान्तरण के लिए प्रोत्साहन मिलता था। 9) कि्ती जाति के एक प्रभाग का पर्मान्तप्ण धर्मान्वरित लोगों में तनाव पैदा कर देवा था। 6) विभिन धार्मिक समूहों द्वार अपनाई गई धर्मान्तरण की रणनीति में भी अन्तर था। मुस्लिम लोग अभिजनों को पहले परिवर्तित करते थे जबकि ईसाई मिशनरी निम्न जाति के लोगों का धर्मान्तरण पहले करते थे। 0) पर्मालिणति लोगों के साथ पूर्ण सामाजिक समानता के आधार पर व्यवहार नहीं किया जाग था। 6) रुपय के साथ थर्मान्तरण आन्दोलन की तेजी भी घट गई। आज हिन्दू विश्वास में पुत्र पर्मान्तरण करने पर बल दिया जा रहा है घ्ड्छ्झ फ्ड्लो जाति/वर्ग आन्दोलन (83000900 (0३४४00955 ४०५ धपरध्णा5) मे आदोतनों का उदय राष्ट्रीय आन्दोलन के विस्तार के साथ भारत के विभिन भागों में है वे के वचित एवं दलित लोगों में हुआ। धार्मिक और जाति आद्दोततों में अन्तर यह है जे धार्मिक आन्दोलन हिन्दुत्व को बुराइयों पर आक्रमण थे, वही जाति आन्दोलन हिदुतन के खहूप गत दाँचे में हो अपने धर्म को छोडे विना समस्याओं का समाधान करे को बत कहते थे। पिछड़ी जाति/वर्ग आन्दोलनों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है. (9) विविष मे के भ्रेदभावों के विस्द्ध विशेष (0) आत्म-साम्मान और प्रस्टििति प्राप्त क्से के लिए लत (0) प्रस्थिति गतिश्ोलवा आन्दोलन (४) जादि एकहा आन्दोलन, और (०) जाति यान आन्दोलन । प्रस्थिति गविशोलवा आन्दोलनों को उप श्रेणियों में वर्गकृत किया जा मेहता है, जैसे अनुकूलिनी (3070८) आन्दोलन, सास्कृतिक विद्ोहोग्युखी आदोलन, और ते विशेषो आल्दोलन। बदव सामाजिक प्रिवर्त और आपुनिकौकरण पिछड़ी जाठिया धर्म, शिक्षा, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में बचना का शिकार हो रहो थी। वे अपने भाग्य को तब तक इस्ी स्थिति में स्वीकार किये हुए थीं जब तक कि बाह्य प्रभावों ने उनमें जागृति पैदा करने को पर्याप्त दशाएं प्रदान नहीं कर दी। इस प्रकार का प्रकटीकरण (८ क०७॥४०४) ईसाई मिशनरियों द्वा अनुसूचित जनजातियों के लिये कार्यक्रम आयोजन से हुआ जिन्हें तब दलित वर्ग में माना जाता था। अन्य दशा थी राष्ट्रीय आन्दोलन जो कि समठावादी विचार प्रदान करतो थी और उन सामाजिक आन्दोलनों का समर्थन कसी थी, जो कि किसी भी प्रकार के भेद भाव का विरोध करते थे। तीसरी दशा थी उच्च जातियों द्वागा आयोजित सुधार आन्दोलनों की जिन्होंने दलित जातियों तथा पिछडे वर्गों के लिए शिक्षा और कल्याण कार्यक्रम प्रारम्भ किए। यह आन्दोलन अनेक रूढिवादी ब्राह्मण प्रथाओं के विरुद्ध थे। अन्तिम, ब्रिटिश लोगों द्वार प्रारम्भ किए गए कानूनों की समतावादी व्यवस्था ने भी भेदभाव के खिलाफ पिछडी जातियों को आन्दोलित होने का अवसर प्रदान किया! उच्च प्रस्थिति के लिए पिठडी जाति आन्दोलन तीन विचारधारओं पर आपारित थे (एमएस ए राव, $0लबा ॥/0/शाश्ाठ का आद।व, 953 97-98) | प्रथम, अनेक जातियों ने उच्च वर्ण प्रस्थिति का दावा किया, जैसे उत्तर भारत में अहोरों ने, पश्चिम बगाल में गोपाओं ने, महाराष्ट्र में गावलियों ने, आन्य्र और कर्नाटक में गोला लोगों ने तथा तमिलनाडु में कोनार ने यदु (क्षत्रिय) होने का दावा किया। इसमें अपने-अपने क्षेत्रों में उच्च जातियों की जीवन शैलो अपनाना शामिल है, (एम एन श्रीनिवास ने इसको सस्कृतीकरण की प्रक्रिया कहा है)। इम्तियाज अहमद ने कहा है कि गतिशौलता की इस प्रक्रिया को प्रारम्भिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए या विरोध पएक आन्दोलन या गतिशीलदा के विरेष के रूप में। उच्च वर्ग के लोग इनका विशेष करते थे। उच्च प्रस्थिति का दावा करे की इच्छा के अलावा इसने पिछडी जातियों को सघ बनाने के लिए प्रेरित किया ताकि दबाव समूह के रूप में काम करते हुए वे जनगणना अधिकारियों पर उन्हें सस्कारीय प्रस्थिति वाली जातियों के रूप में दर्ज काने के लिए दबाव डाल सकें। जाति समूहों को गतिशोल बनाने की यह विधि 93 तक काफी महत्वपूर्ण हो गई। दूसरी विधि थी आत्म निर्धारण की खोज में हिन्दू धर्म की पुनर्व्यख्या, जैसे श्री नागयण धर्म परिपालन आन्दोलन जो कि केरल के इज्नावा लोगों ने चलाया। केरल के इझ्जावा लोगों ने स्पष्ट रूप से ब्राह्मण विरोधी झुकाव दर्शाया और अपने अधिकायें की प्राप्ति के लिए जन आन्दोलन का मार्ग अपनाया। दूसरे प्रकार को विरोध विचारधाय थी ब्राह्मणवादी आर्य धर्म और सस्कृति का विशेष जैसे तमिलनाडु में द्रविड कपघम आन्दोलन। तोसरी विचारधाग थी हिन्दुत्व का परित्याग और किसी अन्य धर्म का अनुगमन जैसे, महाराष्ट्र में मेहर लोगों द्वाव किया गया आन्दोलन तमिलनाडु के नादरों ने उच्च प्रस्थिति प्राप्त करने के लिए प्रभाव की राजनैतिक प्रक्रिया का प्रयोग किया जबकि महाराष्ट्र के मालियों ने सास्कृदिक विद्रोह का प्रयोग किया। ओमन (0०एथा, ०० ०५, 94) के अनुसार ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि (9) सस्कारिक दृष्टि से थे जातिया बिल्कुल निम्न स्थिति में नहीं थी, (७) स्थानीय मापदण्डों से चे आर्थिक दृष्टि से समृद्ध थे, (०) उनकी सख्यात्मक शक्ति महत्वपूर्ण थो; और (0) और उन्हें क्षेत्रीय शासकों का समर्थन भ्राप्त था, जैसे महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा का। प्ममिक पीवर्त और आपुनिकीकरण ब45 ब्यवप्नायिक परिवर्तन, शिक्षा के प्रति झुकाव, शहरौकरण, विशिष्ट और करिश्माई नेतृत्व आदि कारों ने भी उसको गतिशौलता सम्बन्धी आदोलनों में उनकी सहायता की। वास्तव में, ओर जातियों वो हिन्दू धर्म के भीतर ही उच्च प्रस्थिति प्राप्त करे में सफलता नहीं मिली स्सके कारण उन्हें बुद्ध धर्म की शरण में जाने को प्रेरणा मिली। संस्कृति विशेषी आन्दोलमों में इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया गया था. (3) जातिवादी हिलुओं के विरुद्ध विपरीत संस्कृति का विकास विशेष रूप से ब्राह्मणों के वर्चस्व का विरोध करता, लेकिन हिन्दू बने रहना (8) 'मुख्य धासा' सस्कृति में घुल मिल जाने या मात्र इसका विष कले को अपेक्षा अपनी स्वयं की समानान्तर सस्कृति का निर्माण कला। महाराष्ट्र के दंत पेयर आन्दोलन से इसी प्रवृत्ति का पता लगा। दक्षिण में द्रविड़ आन्दोलन दो चरणों में विक॒ित हुआ : दरह्मण विशेधी (जाति) चरण और उत्तर विशेधी (क्षेत्र) चरण। प्रथम चरण मैं रद ने ब्राह्मणों को विदेशी और द्रविडनाद में घुसपैठिए कहा। उन्होंने द्ाह्मणों द्वारा एव 'दराणों' की खिल्लो उड़ाई और वर्णाश्रम को विवेकहीन कहा। उन्होंने एक विपरीत पजेति का विकास किया जिसके द्वाणा उन्‍्हेंने मूर्तिपूजा, बाल विवाह और याघ्य वैधव्य जैसे उद्गगवादी प्रधाओं की निन्दा को और द्रविड स्वभाव की सस्कृति का विकास किया। ऐ परे थे (आन्दोलन) अपने उद्देश्य में ब्राह्मण विशेष छोडकर उत्तर भारत प्रभुत्व विरोधी गए जिम्तका उद्देश्य प्रभुता सम्पल द्रविड राज्य की स्थापना था। जहां द्रविड आन्दोलन तमिलनाडु तक ही सीमति था, दलित पेन्थर आन्दोलन शहरी महा से बाहर भी फैल गया। इसका प्रमुख उद्देश्य दलितों में बौद्धिक जागरण और चेतना ऐश कजा था। महाराष्ट्र में मेहः आन्दोलन भी यहा उल्लेखनौय है। प्रथम, उन्होंने हिन्दुत्व परित्याग के विपदीत संस्कृति वाली रणनीति का सहाय लिया और बाद में अपने उन के लिए राजनैतिक एणनीति का। यद्यपि पिछड़ी जातियों के आन्दोलन अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में आशिक रूप से अत ऐे लेकिन उन्होंने उच्च जातियों को गतिशीलता सम्बन्धी क्रियाकलापों के लिए सप से के शॉंडल भी प्रदान किए। लेकिन प्रगतिशील जातियों के आन्दोलन मुख्यत बाल बिग विशेष, विधवा विवाह प्रोत्साहन, महिला शिक्षा, व्यावसायिक परिवर्तन, शिक्षा, और उैसस्य जातियों के बीच सामाजिक रुकावें समाप्त करने जैसे सुधारोमुखी आन्दोलन थे। पिछड़ी जातियों के लिए सरक्षणात्मक सरकार नोति ने जनगणना प्रतिवेदनों, रेछवरोकपण, सांस्कृतिक विद्रोह, या विपरीत सस्कृति के बनाने के बजाय स्वय को पजनीतिक पे सगठित करके अपने हितों और कल्याण के लिए लडने के लिए मेरित किया। इस रसौतेक एणनोदि का उद्देश्य था उन्हें दलित पिछड़ी जावियों की घूची में दर्ज कराना, अर्थ समयावधि को बढवाना, तथा सरकारी नौतियों और कर्मर्क्रमों के क्रियाच्वयन के रिर दबाव इलवाना। अगस्त 990 में मण्डल आयोग की सिफारिशों के ला तने के के भर विधिन राज्यों सख्यक आयोगों कौ स्थापना के बाद, बहुत बः कम संख्या | कक, सभी श्रेणियों में (8, छ, ० और 7) पर्ों को पूर्यरूपेय भरने के लिए आश्षित कोटा (5% अनुसूचित जाति और 27% पिछड़ी जावि क) ऋष्त करने के *र दा पिछली जातियों की मान्यवा प्राप्त कले के लिए अयलशौल हैं। 446 सामाजिक परिवर्तर और आएनिकीकरण महिला आन्दोलन (२४०ग्ार्म'5 |चि०फल्माधा।5) आजादी से पूर्व और पश्चात अनेक सुधार आन्दोलनों की चिन्ता का प्रमुख बिन्दु खियों क॑ प्रश्थिति था। ब्राह्म समाज तथा आर्य समाज के नेताओं के चिन्तन के विषय थे. सत्ती पुनर्विवाह, तलाक, स्री शिक्षा, पर्दा प्रथा, बहु विवाह और दहेज आदि। जस्टिस रानाडे ने बाह विवाह, बहुपलि प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबन्ध तथा शिक्षा तक पहुचने से वर्चित रखने वी आलोचना की, राजा राम मोहन णय ने सदी प्रथा के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और महर्षि करवें ने विधवा विवाह का समर्थन किया, गान्यी जी ने राजनैतिक स्वतत्रता तथा साथ ही सामाजिक और राजनैतिक अधिकारों के लिए लड़ने के लिए खियों की सामूहिक गतिशीलता में रुचि दर्शाई। कुछ विद्वानों ने सूक्ष्म स्तर पर, अर्थात्‌ क्षेत्रीय आधार पर राजनैतिक स्वत्रता आन्दोलन में स्लियों की भूमिका का अध्ययन किया है। उदाहरणार्थ, अपर्णा बसु 0984) और प्रवीन सेठ (979) ने गुजरात में इसका अध्ययन किया, राधवेन््र राव 983) ने कर्नाटक में उमा राव (984) ने उत्तर्देश में। गोविन्द कोल्कर के अनुसार स्ववत्रता आन्दोलन में महिलाओं की भूमिका 'कामरेड' की अपेक्षा सहायकों की अधिक थी। घनश्याम शाह (वही 36) ने कुछ विद्वानों का सन्दर्भ दिया है जिन्होंने बिहार और बहू में जनजातोय, कृषक तथा अन्य आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका कौ ओर सकेत किया है। उदाहरणार्थ, मनोषी मित्रा 984) और इद्धा मुन्शी सल्दान्हा 986) ने जनजातीय आन्दोलनों में श्लियों कौ लडाकू भूमिका का विश्लेषण किया है कि किस प्रकार अधिकारियों से मुचाटा लेकर, परम्पपगत अर््रों को चलाकर तथा विद्रोहियों को उनके छिपने के स्थान में आपूर्ति रेखा को बनाए रखने में योगदान किया। सुनिल सेन (984), पीटर कर्टर्स (987), आदि ने तेलगाना, पश्विम बगाल व महाराष्ट्र के कृपक आन्दोलन में उनकी भूमिका का विश्लेषण किया है। मी बेलायुघन (984) मे केरल में रस्सी श्रमिकों के कम्युनिस्ट-नीत आन्दोलन में उनकी भूमिका का विश्लेषण किया है। सेन ने मध्य प्रदेश में कच्चे लोहे को खानों में मजदूर सपों द्वारा सचालित सघ्षों में रयों की सहभागिता को दर्शाया है। यह कहा जा सकता है कि आन्दोलनों में महिलाओं की सहभागिता के चार प्रमुख स्वरूप हैं. ()) विशिष्ट श्रेणी के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अधिकाएँ के लिए, जैसे, आदिवासी, किसान और औद्योगिक श्रमिक, (0) जिियों की स्वायत्तता तथा कार्य दशाओं में सुधार के लिए, (॥0) कार्य के लिए समान पास्श्रमिक के लिए, (४) सामात्य सामाजिक आन्दोलनों में पुरुषों और बच्चों को प्रभावित करने वाले प्रकरणों के लिए (जैसे गर्भपात, बच्चों को गोद लेना, यौन शोषण, आदि) ब्रिटिश राज के अन्तर्गत उदारवादी समतावादी विचारधाण ने भारतीय महिलाओं में सामाजिक जागृति की दशाए उत्पल कर दीं। अनेक महिला सगठनों का क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर उदय हुआ। महिला समाज तथा महिला थियोसोफिकल सोसायटी महिलाओं के लिए आधुनिक आदर्श प्रोत्साहित करने के लिए स्थानीय स्तर पर छार्य किया। अमुख राष्ट्रीय सगठन इस प्रकार थे. भारत महिला परिषद (904), भारत स्री महामाइल (990), वुमेन्स इप्डियन एसोशिएशन (097), नेशनल काउन्सिल ऑफ वुमेन इन इण्डिया ग्रगणिक परिकर्त और आइुनिकीकरण क्वा (909) और आल इण्डिया वुमेन्‍्स काफ्रेन्स (927) तथा कस्तूरबा गान्धी मेशनल मैमोरियल दुष्ट। इन संगठनों ने ऐसे प्रकरणों को उठाया जैसे स्री शिक्षा, खशब सामाजिक रिवाजों का उगूतन (र्दा, बाल विवाह) अधिकायें और अवसरों कौ समानता और श्लियों का उसपरीडन। सगे पार्टी के समर्थन से कुछ महिला नेताओं ने विधायिकाओं में समान मताधिकार और ग्रनिषित्व तक की मांग की । यह कहा जा सकता है कि भारतीय महिलाओं के आद्दोलनों कैदे प्रमु लक्ष्य थे : एक, महिला मुक्ति या उत्थान, अर्थात्‌ सामाजिक प्रधाओं का सुधार तक महिलाएं समाज में अधिक महत्वपूर्ण रचनात्मक भूमिका निर्वाह में सक्षम हो जायें, और दे, पुरुषों के लिए समान अधिकार अर्थात्‌ राजनैतिक, आर्थिक तथा पारिवारिक क्षेत्रों में पृष्ठो दवा भोगे जा रहे नागरिक अधिकारों को महिलाओं के लिए भी विस्तृत करना। जन फोर (979) प्रधम को 'कोरपोरेट ख्रौवाद' और दूसरे की 'ठदार खलीवाद' कहती है। महिला सथओं द्वात अपनाई गई रणनीतियां थी . सार्वजनिक सभाओं का आयोजन करके माँमें ग़ग, सज़ारी अधिकारियों को अपने दृष्टिकोण बताना, दशाओं की जाँच कराने के लिए समेतिया बनावा तधा ल्लियों को आन्दोलित करने के लिए सम्मेलन करना, आदि। महिलाओं के आन्दोलनों के लिए वाच्छित प्रोत्साहन प्रदान करने वाले कारक थे सिें प पुरुषों के प्रभुत्व पर पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव तथा पूरक यौन भूमिकाओं को अदा पर पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव, शिक्षित अभिजाद महिलाओं द्वाद नेतृत्व प्रदान विदा जगा, पर्म द्वाग स्वीकृत सामानिक प्रधाओं के परिवर्तन में पुरुष समाज सुधारकों का सपा, सामाजिक धार्मिक अभियृत्तियों और दर्शन में परिवर्तन, स्वय सेवा के कार्यो में हो गहिला सगठनों के प्रति पुरुषों के विशेष और सामाजिक विद्वेप में कमी, महिला अददोलं के हवा देने में गजनैतिक गरद्टीय नेताओं का नरम रुख अपनाना और महिलाओं आसोतषतों को उनका उत्साह पूर्ण समर्थन। 975-85 के दशक को अव्र्रषट्रीय महिला सक़ के रुप में घोषणा ने भी रियो कौ हौनता को भावना को समाप्त करने और उनको भसे पहचान का बोध कराने में प्रेरणा दी। केद्रीय सामाजिक कल्याण परिषद, 953 रे शत सर द्वात स्थापित भी ल्ियों के कल्याण के लिए स्वैच्छिक प्रयलों को सुदृढ बनाता और प्रेत्माहित करता है। भारत सरकार का कल्पाण मत्रालय भी स्वैच्छिक संगठनों को पे रहों में कामकाजी महिलाओं के लिए आवास बनाने या उतका विस्तार करने के लिए बदन देता है। । समाणिक आस्दोलनें पर अपनी चर्चा का समापन हम इस कथन के साथ कर सकते कि घात में साम्राजिक आन्दोलन मुख्यत केद्धित हैं या तो (3) त्वरित सामाजिक परिवर्तन गे वो जकड़ कर तथा विद्यमान प्रतिमानों और मूल्यों की पुरर्स्थापित करके व्यवस्था प्र कले पर और (७) पुणतरी सरचना को समाप्त कर नयी सरवना की स्थापना ए बम्मवा परिवर्तन के प्रयल करके। यह दूढ्ता पूर्वक कहा जा सकता है कि सामाजिक या दो परिवर्तन प्रतितेधक या परिवर्तन प्रोत्साहक थे, अर्थात्‌ जितका उद्देश्य निषीयों को वज्बनाओं से बचाना दथा उनके कल्याण तथा उत्थान के विषय में सोचना ५। हमे उन सुर आस्दोलनों पर ध्यात केद्धिव किया है जिन्होंने सस्थासकक साधनों के किस सध्य प्राप्ति का प्रयल किया, हिंसा का सहाग नहीं लिया ठधा जो गतिशनोलता की । के माध्यम से बुछ वैचारिक समूहों दवा चलाए गए थे। छ-प्रकार के आन्दोलनों का 448 सामाजिक परिवर्वर और आधुनिकीकरण विश्लेषण बताठा है कि ये आन्दोलन आमतौर पर करिश्माई नेताओं द्वार चलाए या फैलाए गये या राजनैतिक दलों और धार्मिक सगठनों द्वार। पहले मामले में विचारधारा नीचे की ओर त्रसारित कौ गई जबकि दूसरे में ऊपर की ओर। किसी विचारधारा पर आधारित कोई आन्दोलन बदलता है दो यह आवश्यक नही है कि समय के साथ इसका विस्तार होगा। यह शत प्राप्त भ्री कर सकवा है और खो भी सकता है क्‍यों कि या तो इसे प्रासगिक नहीं माना शया या फिर सरकर द्वात दबा दिया गया। विश्लेषण से अन्य तथ्य जो उभर हैं, वे हैं : 6) सामाजिक आन्दोलन सामाजिक सरचना के ही उत्पादन हैं जो कि समाज की कुछ दशाओं में उभरते हैं (४5) सामाजिक आन्दीलनों का अपना एक ढांचा होता है जो उन्हें उनके लक्ष्यों से सम्बद्ध होकर कार्यात्मक बनाते हैं, और (७) सामाजिक आन्दोलनों का सामाजिक सरचना पर प्रभाव पडता है जिसके वे उत्पाद हैं (५छकत८३००, एप , *]२४४४७वव (०फचफरए बछए0 एट2३5कां ए८टएण! था १८ फैलकड्ग/ ं्र च5.5 २०0, उठठव्ग 2/9/छशालाछ का #॥47०, ५0 4, 4978 . 8) सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाएँ (ए700९5$65 0 $02ं2 (0७४720) सस्कृतिकरण की अवधारणा (0९ €०ण्ल्थ्क थे $375८्एंस्शर00) श्रीनिवास ने सस्कृतिकरण की परिभाषा इस प्रकार को है “एक ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा निम्म जातिया उच्च जातियों, विशेष कर ब्राह्मणों, के रीति-रिवाजों, सस्कारों विश्वार्सों, जीवन विधि, एव अन्य सास्कृतिक लक्षणों व प्रणालियों को गृहण करती हैं”। वास्तव भें, श्रीतिवास सस्कृतिकरण की परिभाषा का समय-समय पर विस्तार करते रहे हैं। आरम्भ में उन्होंने सस्कृतिकरण के बारे में यह कहा कि “यह गतिशीलता की वह प्रक्रिया है जिसमें निम्न जातिया शाकाहारी एवं मद्यपान निषेधी बनकर एक दो पीढियों में जाति सस्तरण में ऊपर की ओर अग्रसर होती हैं? (962 42) । बाद में उन्होंने इसे पुन परिभाषित करते हुए कहा कि “यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा निम्न जावि, जनजाति या अन्य समूह अपनी प्रथाओं, कर्मकाण्डों (#॥0885), विचारधागओं (:0८०००७५) एवं जीवन-विधि (३७ ० ०) को बदल कर द्विज जाति (४४०८-००४) ८०४८) की दिशा में अग्रसर होती है” (966 : 6)। सस्कृतिकरण का यह दूसरा विचार अधिक विस्तृत है क्‍योंकि श्रीनिवास ने प्रथम परिभाषा में भोजन की आदतों, सस्कारों, तथा घार्मिक प्रथाओं के नकल की बात की है, लेकिन बाद में उन्होंने विचारों के नकल की भी बात की है (जिसमें कर्म, धर्म, पाप, पुण्य व मोश आदि के विचार भी सम्मिलिद है)। निम्न जातियों द्वारा उच्च जातियों तथा ब्राह्मणों कौ प्रथाओं और आदतों की नकल की प्रक्रिया में जब कभी निम्न जातियों के लोग कुछ ऐसे आचरणों को अपनावे हैं जो वर्तमान विवेकी मानदण्डों के अनुप्तार अच्छे च प्रकार्यात्मक (एग्रघा००») समझे जाते हैं, तब वे उन रिवाजों/प्रथाओं को अमान्य मानकर उनके स्थान पर बाह्यणों के उन मूल्यों एवं विचारों को गृहण करते हैं जो वर्तमान स्तर के अनुसार अपमानजनक (ठथ873070) एवं विकार्यात्मक (0०5) समझे जाते हैं। श्रीनिवास ने मैसूर के अपने अध्ययन से कुछ उदाहएग सामाजिक परिवर्तन और आदुरिकीकरण 449 दिए हैं। निम्न जातियां द्ियों के प्रति अभिवृनियों, और विवाह, यौन, आदि मामलों में उदार होती हैं। वे तलाक, विधवा-विवाह, तथा यौन परिपक्ववा के पश्चाद विवाह की अनुमति देती हैं। किन्तु ब्राह्मण यौन परिपक्ववा पूर्व ((7०-909०79) विवाह को व्यवहार में लाते हैं, विवाह को अविच्छिन (&70/55079७) मानते हैं, विधवा पुनर्विवाह को ग्ेकते हैं, और विधवा को आभूषण व साज श्रृंगार व अच्छे व्न पहनने से रोकते हैं तथा सिर मुडवाने की सिफारिश करते हैं। वे वधुओं में कुंबागपन (8779), पतियों में सुचिता/विशुद्धता (00000), वा विधवाओं में संपम और आत्म-नियंत्रण के पश्षथर हैं, लेकिन निम्न जाति जैसे संस्तरण में उठती है और इसके तरीके अधिक सस्कृतिकरण होते जाते हैं, यह यौन और विवाह विषय पर ब्राह्मणों के आचरण गृहण करने लगती है। संस्कृतिकरण का परिणाम खियों के प्रति कठोरता का व्यवहार होता है! अयुक्तिसगत (ध39०७४) आचरण अपनाने का एक और उदाहरण यह है कि एक ब्राह्मण और उच्च जादीय हिन्दू पलो को आदिष्ट (शाह) किया जाता है कि वह अपने पति को देवता माने। पली से अपेक्षा को जाती कि वह अपने पति के भोजन करने के बाद भोजन करे, अपने पति की लम्बी आयु के लिए अनेक दतव धारण करे, पुत्र प्राप्ति को धार्मिक आवश्यकता माने, इत्यादि। संस्कृतिकरण में निम्न जातियों द्वारा इन्हों विश्वार्सो व आचरणों/रीतियों को अपनाना आता है। अत ये उदाहरण इंगित करते हैं कि संस्कृतिकरण केवल उच्च जातियों, विशेष कर ब्राह्मणों को प्रयाओं, रीतियों, आदतों मूल्यों का अथा व अविवेकी नकल करना है। कया यह कहा जा सकता है कि असस्कृतिकरण (०६-६३७४४७2३४०7) कौ प्रक्रिया प्रो सम्भव है ? श्रोनिवास का मानना है कि “यह अकल्पनीय नहीं है, नकल करे वाली जातियों का असंस्कृतिकरण भी कभी-कभी हो सकता है” (985 , 62) सस्कृतिकरण और ब्राह्णोदरण (58)जव्वसटबाणा बाते फिल्वेगराग्रयायया00) श्रीनिवास (985. 42-43) ने 'सस्कृतिकरण' शब्द को “ब्राह्मणौकरण से अधिक प्राथमिकता दी है। उन्होंने इसके कुछ कारण दिए हैं : 6) संस्कृतिकरण शब्द विस्तृत है, जबकि ब्राह्मपोकरण शब्द सकीर्ण व सीमित है। वास्तव में द्राह्मपीकरण सस्कृतिकरण की व्यापक प्रक्रिया में शामिल है। उदाहएणार्थ, वेदिक काल में ब्राह्यणप सोम रस का पान करते थे, मास खाते थे, और पशु बलि चढाते थे। लेकिन उन्होंने यह आचएण वेदिक काल में त्याग दिया, शायद ऐसा उन्होंने जेन एव बौद्ध धर्म के प्रभाव भें आकर किया। आज अधिकहर ब्राह्मण शाक्ाहर एवं मद्यनिषेधी हैं; केवल कश्मीये, बगली और सासस्वत ब्राह्मण मासाहारो भोजन करे हैं। यदि 'बराह्मणोकरण' शब्द का प्येग किया जाता है दो यह भताने की आवश्यकता भो पडतो है कि कौन से ब्राह्मण के विषय में कहा जा रहा है। 2) सदर्भ समूह या सस्ृतिकरण के एजेन्ट सदैव हो ब्राह्मण नहीं होते हैं। वास्तव में ब्राह्मणों ने हो, जिन्हे तिपमों की घोषणा का अधिकार सौंपा गया था दूसरी जाति के सदस्यों को ब्राह्मणों के पवि-रिवाजों और सस्कायें को मानने का निषेध किया था। लेकिन इस प्रकार के नियेधों ने निन जातियों को अपने सैतिगिवाओं के सस्कृतिकरण से नहीं रोका। श्रीनिवास ने मैसूए की पिन जातियों का उदाहरण दिया है जिन्होंने लिगायतों (जो बाह्यण नहीं हैं लेक्नि दावा करते है कि दे बाह्मप के बग़बए है) की जीवन-शैली अपना लो है। दक्षिण घारत के लोहार स्वय 450 सामाजिक परिवर्वा और आयुनिकीकरण को विश्वकर्मा ब्राह्मण कहते हैं, जनेऊ धारण करते हैं, और उन्होंने अपने सस्कारों का सस्कृतिकरण भी कर लिया है। फिर भी उनमें कुछ अब भी मास खाते हैं और मंदिर सेवन करते हैं जिसके कारण बहुत सी जातिया, यह्य तक कि अस्पृश्य जञातिया भी उनके हाथ का पानी तक नहीं पौतो हैं 985 43)। इस श्रकार क्योंकि निम्नजातियों ने देश के विभिन क्षेत्रों में क्षत्रिय, वैश्यों और जाटों कौ नकल की, इसलिए 'ब्राह्मपीकरण' शब्द को सास्कृतिक व सामाजिक गतिशीलता की प्रक्रिया की व्याख्या करने के लिए उपयुक्त नहीं समझा गया। सस्कृतिकरण की विशेषताएँ, (07९5 ण॑ $8॥5वउआाणा) सस्कृतिकरण की प्रक्रिया में कुछ तथ्य उल्लेखनीय हें सस्कृतिकरण कौ अवधारणा को आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रभ्ुत्व से जोड दिया गया है, अर्थात्‌ प्रबल जाति (60फएणावा ८४६०) की भूमिका को परिवर्तन की सास्‍्कृतिक सचरण में विशेष महत्व दिया गया है। यद्यपि कुछ समय दक निम्न जातियों ने ब्राह्मणों की नकल की, लेकिन शोघ्र ही स्थानीय प्रबल जाति कौ नकल की जाने लगी और यह जाति गैर ब्राह्मण होती थी। 2. सस्कृतिकरण उन जातियों में कभी न कभी अवश्य होती था जिनको आर्थिक व राजनैदिक शक्ति प्राप्त थी लेकिन सस्कायों की दृष्टि से उनकी स्थिति ऊचौ नहीं थी, अर्थात्‌ उनकी राजनैतिक व आर्थिक स्थिति व कर्मकाण्डी (#02) स्थिति में बडा अन्तर था। ऐसा इसलिए था क्योंकि सस्कृतिकरण के बिना उच्च स्थिति का दावा प्रभावहीन था। जाति-व्यवस्था में सत्ता के दीन प्रमुख केन्द्र हैं सस्कार, राजनैतिक व आर्थिक । एक क्षेत्र में सत्ता हथियाना दूसरे दो क्षेत्रों में भी सत्ता प्राप्लि में वृद्धि कर देती है। लेकिन श्रीनिवास कहते हैं कि असगतिया होतो हो गहदी हैं। 3 आर्थिक उनति सस्कृतिकरण की आवश्यक शर्त नहीं है और ऐसा भी नही है कि आर्थिक उनति के साथ सस्कृतिकरण होना आवश्यक है। तथापि, हो सकता है कि कोई समूह (जाति, जनजाति) राजनैतिक सत्ता प्राप्त कर ले और इससे उसकी आर्थिक उन्नति हो और सस्कृतिकरण भी हो। श्रीनिवास (/985 * $7) ने मैसूर के एक गाव रामपुर के अस्पृश्यों का उदाहरण दिया है जिनका अत्यधिक सस्कृतिकरण हो गया है यद्यपि उनकी आर्थिक दशा में कोई परिवर्तन नही हुआ। आर्थिक विकास, राजमैतिक शक्ति प्राप्त करना, शिक्षा, नेतृत्व, दथा सस्तरण का हर प्रकरण इन सभी या कुछ तत्वों को प्रदर्शित कर सकता है। 4. सस्कृतिकरण दुहरी प्रक्रिया (.४०-७४७५ 970०८५७) है। ऐसा नही है कि निम्न जाति उच्च जाति से कुछ 'प्राप्त' ही करती है, बल्कि उसे कुछ 'प्रदान' भी करती हैं। हम देखते हैं कि पूरे भारत के हिन्दुत्व के बडे देवगाओं के अलावा ब्राह्मण कुछ स्थानीय देवताओं को भी पूजा करते हैं जो महामारी से रक्षा करते हैं तथा पशुधन, बच्चों के जीवन व अन आदि को भी सरक्षण देते हैं। ऐसे प्रकरणों की भी जानकारी है जहां कहीँ कही ब्राह्मण अपने किसी गैर ब्राह्मण मित्र के माध्यम से रक्त बलि भी देता है (औनिवास, 985 60)। यद्यपि स्थानीय सस्कृतिया दिने' कली अपेक्षा 'लेती अधिक सागरानिक पीवर्त और आशतिकौकरण बडा है, फिर भी सांस्कृतिक हिन्दुत्व ने स्थानीय तथा लोक बत्वों को आमसाव (8050) कर लिया है। आत्मसाव करने की प्रक्रिया इस प्रकार होती है कि लोक परम्पताओं ओर बड़ी परणग्रओं के बौच निरतरता (८००/४७(५) बनी रहती है। 5. गविशीलता की इकाई समूह होती है न कि व्यक्ति या परिवाए। 6. ब्रिटिश शासन ने सस्कृतिकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया जबकि पजनीतिक स्ववेत्रता ने इस परिवर्तन की ओर बढने वाली प्रवृत्ति को कमजोर बनाया। अब समस्तरोय (छञाट0प्रश) गतिशेलता को अपेक्षा ऊष्वोन्चर (एप) भतिशीलता पर बल दिया जा रहा है। 7, भारत में सामाजिक परिवर्तन की बात सेस्‍्कृदिकरण वे पश्चिमोकरण के सन्दर्भ में करने का अर्थ है, उसकी व्याख्या प्रमुखत- सास्कृतिक अर्थों में करना न कि सरचना के अर्थ में । श्रीनिवास (989 :55) ने भी माना है कि संस्कृतिकरण में जाति-व्यवस्था हक रा स्थितीय (90#४७॥४) परिवर्तन सरचना सम्बन्धी परिवर्तन के बिना हो वा है) 8. संस्कृतिकरण में समूह को उच्च स्थिति की उपलब्धि स्वत नहीं होती। समूह को अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा कली होती है और इस अवधि में उसे अपने दावे के लिए निरन्तर दबाव बनाए रखना पड़ता है। इस दावे को स्वीकार करे की शुरुआत कले में एक या दो पीढ़ो का समय भी लग सकता है। कई मामलों में जाति का दावा लम्बे अन्तयल के बाद भी स्वीकृद नहीं होता। कई बाए ऐसा भी होता है कि यह दावा एक समय या स्थान में सफल म हो, पर दुसरे स्थान व अन्य समय में स्वीकार कर लिया जाये। संस्कृतिबरण निस्‍्न जाति को उच्च पद प्राप्ति में सहायक न भी हो, तब भी यह उसे भाप्त खने, अशुद्ध व्यवसायों को बदलने, मद्यपान बन्द करने, और कुछ सास्कृदिक परम्पणओं, विश्वाय्ों व देवताओं को अपनाने से वो नहीं रोकता। इस प्रकार गविशोलता के लक्ष्य के प्राप्त किये विना श्री सस्कृतिकरण की प्रक्रिया लोकप्रिय बनी रह सकती है। ग्स्कृतिकरण के प्रोत्साहन के कारक (क्िल०5 ए:णएणीांजड $शा5॥स(2॥05) सस्कृतिकरण को सम्भव बनाने वाले कारक हैं; औद्योगौकरण, व्यावसायिक गतिशौलवा, विकसित सेचए च्यवस्था,सावजा का अणाए था 'रीस्दनी पौद्योगिवदे ५ इसमें जाएवर्य यहीं कि सस्कृत पार्षिक विदाएँ का विस्तार ब्रिटिश शासन काल में हुआ। सचाए साथनों के विवाप्त के साथ संस्कृतिकरण उन क्षेत्रों में चला गया जो पहले अगम्य (79005६४७४६) थे और साक्षता के विस्तार ने इस प्रक्रिया को जाति सस्तरण में निम्न जातियों तक को अभामत करा दिया। श्रीमिवास मे एक विशिष्ट कारक का उल्लेख किया है जिस ने निम्न जातियों में सस्कृतिकरण को फैलाने में सहायता को है। यह (कारक) है कर्मकाण्डो (॥४93) क्रियाओं में मोच्चाएण दी पृथकता जिसके बाएण द्वाह्मणों के सस्कार सभी हिन्दू जादियों ओर अस्यृरयों के घी सुतप हो गए। बाह्मणों द्रात जो गैएद्िज (807 एशं८०-००४) जातियों पर प्रतिबन्ध लेगदे गये थे, उन्होंने केवल वैदिक मंत्रोच्चारण पर पावन्दी लगायी थो। इस प्रकार तिल 452 सामाजिक परिवर्ति और आएनिकौकरण जाति के लोग भी ब्राह्मणों के सामाजिक आचार विचार को सरलदा से अपना सके । इससे संस्कृतिकरण और भी व्यावहारिक बन गया। श्रीनिवास के अनुसार ससदीय प्रजातल्र की राजनीतिक सस्था ने भी सस्कृतिकरण की वृद्धि को बढावा दिया है 0985. 49) | भारत के सविधान में मद्यनिषेष, जो कि एक सास्कृतिक मूल्य है, वर्णित है। कुछ राज्यों ने इसे पूर्ण या आशिक रूप से लागू भी किया है। पश्चिमीकरण की अवधारणा (क्रल एग्राल्का' ग॑ ए९छल्वरांरगांगा) इस अवधाण्णा का सन्दर्भ गैर्पश्चिमी समाज को प्रौद्योगिकी, सस्थाओं, विचागधागओं व मूल्यों में परिवर्तन से है जो लम्बे समय तक पश्चिमी समाज के सास्कृतिक सम्पर्कों का फल है (श्रीनिवास, 9682 55)। भारतीय समाज का उदाहरण देते हुए, तकनीकी परिवर्तन, शैक्षिक सस्थाओं कौ स्थापना, राष्ट्रीयी। का उदय, एवं नई राजनीतिक सस्कृति आदि का पश्चिमीकरण भारत में दो सौ बर्षों के ब्रिटिश शासन का ही प्रतिफल कहा जा सकता है। प्रश्विमीकरण के प्रमुख लक्षण इस श्रकार हैं. (0) तकनीकीकरण तथा युक्तिवाद (7900॥2057॥) पर बल (2) इस (पश्चिमीकरण) प्रक्रिया पर सस्कृतरिकरण का प्रतिकूल प्रभाव नहीं है बल्कि कुछ सीमा तक यह इसको प्रोत्साहित करती है। श्रीनिवास ने पहले कहां था कि सस्कृतिकरण पश्चिमीकरण की भूमिका है। परन्तु बाद में उन्होंने अपना यह विचार बदला और कहा कि यह आवश्यक नही है कि पश्चिमोकरण के पूर्व सस्कृतिकरण आये (985 60) । लेकिन दोनों प्रकियाए एक दूसरे से जुडी हुई हैं। एक को दूसरे के बिना समझना सम्भव नहीं है। हैरोल्ड गूल्ड (पआ०0 ०070) ने भी कहा है कि ब्राह्मणों और अन्य उच्च जातियो के लिए सस्कृतिकरण सस्कृत हो रही निम्न जातियों से दूरी बनाए रखने का एक प्रयल है। इस प्रकार एक अर्थ में ब्राह्मण निम्न समूहों से दूर भाग रहे हैं जो उन्हें पकडने का प्रयल कर रहे हैं। भारत में पश्चिमीकरण का स्वरूप और गति अलग अला क्षेत्रों में जनसख्या के विविध खडों में अलग अलग पाई गई है (श्रीनिवास, 985 5]) | उदाहरणार्थ, जनसख्या का एक समूह अपने वस्तरों, भोजन, व्यवहार, भाषा, खेलकूद, तथा छोटे बिजली मशीनों के उपयोग में पश्चिमीकृत हो गया, जबकि दूसरे समूह ने पश्चिमीकरण के बाह्य प्रभावों से अछूते रहकर भी पश्चिम के विज्ञान, ज्ञान, साहित्य आदि को आत्रसात किया। जैसे, ब्राह्मणों ने वेषभूषा तथा बाह्य रूप (चोटी हटाकर बाल कटवाना) स्वीकार कर के, अपने बच्चों को पश्चिमी स्कूलों में भेजकर, सुख सुविधाओं का उपभोग करके पश्चिमीकरण को स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने भोजन, नृत्य, शिकार करना तथा अशुद्धता से मुक्ति, आदि को स्वीकार नहीं किया। परन्तु यह अन्तर केबल सापेक्षिक रूप में बल देने का है। यह स्पष्ट अन्तर नहीं है। श्रीनिवास ने पश्चिमीकरण' शुब्द को “आधुनिकोकरण' शब्द को अपेक्षा अच्छा माना है जब कि डेनियल लर्नर, हैरोल्ड गूल्ड, मिल्टन सिंगर और योगेद्ध सिंह ने 'आपुनिकीकरण' शब्द को उचित माना है। वह “आधुनिकीकरण” को व्यक्तिपरक तथा पश्चिमीकरण को चस्तुपरक मानता है (सेमीनार, 88, 986 2) | आधुनिकीकरण' में तथाकथित “लक्ष्यों को तर्क सगतता' (६४0079!9 ० 8००७) को निश्चित नहीं माना जा सकता क्योंकि मानव लक्ष्य मूल्य बरीयताओं (छार्शदा०्पर००७) पर आधारित हैं। अत दर्कसगतता को सामाजिक क्रिया ग्ाम्जिक प्ररिर्ति औ आपुनिकीकरण 453 के लक्ष्यों के आधार पर मानकर केवल साथनों के आपार पर पूर्वानुमान (ज़ाल्मण) किया जा सकता है। विद्वारो द्वाग अवधारणाओ के समर्थन (5ल४०४5१ 50एफ०० ॥० 6 (०ष्क्ा5) ब्नार्ड कोहन (8८7ए0 0०09) और मिल्टन सिंगर (॥॥॥॥67 $ण8०) जैसे विद्वानो ने सस्कृतिकरण की अवधारणा का आनुभाविक (८ण.४7०४) अध्ययनों के आधार पर उसकी वैधता (४३8/09) का समर्थन किया है। कोहन ने 950 के दशक में पूर्वों उच्र प्रदेश के एक गाव का अध्ययन किया था। इस गाव में दो जातिया प्रमुख थी-अबल जाति ठाकुर तथा बड़ी सख्या में अस्पृश्य जाति चमार। भूमिहीन चमाएं ने तो स्थानीय स्कूलों में शिक्षित होकर वधा आय में वृद्धि करके ठाकुर जमीदारों के विवाह और जन्म के समय सस्कारों को घाएण करके संस्कृतिकरण प्रारम्भ कर दिया। दूसरी ओर अनेक ठाकुर जो शहरों में प्रव॒जन (णांहा/०) करके औद्योगिक मजदूर, क्लर्क, या अध्यापक हो गए थे, उन्होंने अपने धार्मिक दृष्टिकोण, वेशभुपा व आचार व्यवहार में पश्चिमीकरण धारण कर लिया। इस प्रकार जब उच्च जाति जीवन-शैली तथा धार्मिक विश्वामों में पश्चिमीकृत हो रही थी, तब निम्न जाति हक हो रही थो तथा सस्कायों, विश्वासों, और आचारों के पारम्परिक स्वरूप को धारण कर रही थी। सिंगर (967 : 66) ने मद्रास शहर के प्रमुख उद्योगपतियों के अध्ययन के आधार पर उच्च और निम्न जातियों कौ जीवन शैली तथा धार्मिक विर्वासों में परिवर्तन को भिन्न मक्रिया पायी जिसे उन्होंने, 'कोप्ठोकरण' (८७आाएथआ!गाध्ताओ5आ०॥)) कहा। यह प्रक्रिया औनिवास के सस्कृतिकरण व पश्विमीकरण की प्रक्रियाओं से भिन्‍न है। उन्होंने पाया कि सास्करिक अपवित्रता 60780 90॥४॥0४) का डर दफ़्तोों और फैक्ट्रियों दोनों में हो कम हो रहा है। उदाहणार्थ, फ्ेक्टियों में विविध जाति के लोग आपस्त में मुख्य रूप से मिलते शुलते थे, वे एक जलपान गृह में भोजन लेते थे, एक ही बस में यात्रा करते थे, व गजनैतिक में एक दूसो के साथ मुक्त रूप से भाग लेते थे। बाह्मणों था अन्य उच्च जातियों ने ऐसे व्यवसाय अपना लिए थे जो “अपवित्र' समझे जाते थे जैसे चमडे का काम | सिंगर ने इस प्रक्रिया को 'कोष्छोकरण' कहा है। उच्च जातियों में फ़ैबट्रो में उनके श्रम व अच्छे हिन्दू के कर्तव्यों के बीच कोई संघर्ष नहीं था। दोनों (फैक्ट्रो और घर को परिस्थितिया) के अलग-अलग क्षेत्र ये और उनके आचार व्यवहार के स्तर भी अलग थे। ठदाहरणार्थ, फैक्ट्री में वे पश्चिमी वेषभूषा पहनते, अप्रेजी बोलते, तथा पश्चिमी दौर तरीके अपनाते थे, लेकिन पर में वे भारतीय वेष धारण करते, स्थानीय भाषा बोलते, और अच्छे हिन्दू जैसा आचरण बसे ये। सिंगर ने इसी को 'कोष्ठीकरण' कहा है। लैकिन सिंगर के दृष्टिकोण को कोई नई व्याख्या नहीं देदां। व्यक्ति का व्यवहार र्पिति के अनुसार बदलता रहता है, यह एक सर्व विदित तथ्य है। इसका यह अर्थ नहीं है कि पह 'कोष्लीकरण” है। वास्तव में, यह एक निस्तरता (०णाणणारे है। घोहन पी अनुभव करते हैं कि भारोय समाज में क्रोष्तोकरण निस्‍तरता से भिल नहीं है। परनु यह खोकार किया जा सकता है कि इस रिस्तस्ता में परम्मणों की रूढिवादिता विद्यमान है। यह सक्रिय और गतिशील निस्वस्ता है, और सिंगर इस वश्य को स्वीकार करते हैं 454 सामाजिक प्ररिवर्त और आपुनिकीकरण (0967 68) । लोग नई परिस्थितियों से अनुकूल कर लेते हैं। अवधारणा की अनुभूति (एकत्कााण्फ ण॑ पछ6 0व्णत्कू0 संस्कृतिकरण की प्रक्रिया यह सकेत देती है कि (अ) यह (संस्कृतिकरण) परिवर्तन कौ एक भ्रक्रिया है, (ब) इसमें उर्ध्व गतिशीलता, अर्थात्‌ जाति सस्तरण में निम्न जातियों को ऊपर उठने की आकाक्षा है, (स) यह सस्तरण पर आघात (2/3८०७ है तथा यह सस्कृति का समान स्वर बनाने का प्रयास है। जहा तक सस्तरण पर आघाव का प्रश्न है, न केवल निम्न जातिया बल्कि जनजातियां और संस्तरण के मध्य क्षेत्रों की जातिया भी उच्च जातियों की प्रथाओं, रीति-रिवाजों, तथा जीवन-शैली को अपनाने का प्रयल करती हैं। इस प्रकार ब्राह्मणों की जीवन-शैली और रिवाज सभी हिन्दुओं में फैलते हैं। क्या इसको सस्तरण पर आक्रमण और सस्कृति का समानीकरण (८९०।०७७) कहा जा सकता है ?2 हैरोल्ड गुल्ड ने 096!, 965) इसे सास्कृतिक नकल करना नही बताया है, बल्कि सामाजिक आर्थिक बचन (१८ए7४०४०7) के प्रति विद्रोह एव चुनौती की अभिव्यक्ति कहा है। कुंछ विद्वान मानते हैं कि यह संस्तरण पर आक्रमण है, लेकिन इसे सस्कृति के समानीकरण में सफलता नहीं मिली। जहा तक “उर्ध्ध गतिशीलता' का सम्बन्ध है, योगेद्र सिंह ने इसे सस्कृतिकरण का “सर्दार्भित विशिष्ट लक्षण” (००घाध्खणथे 59०लग९ ००7००७४०४) कहा है। यह इस कारण कि यह निष्न जाति द्वाए उच्च जाति की सास्कृतिक नकल के की प्रक्रिया है, जो णजपूत, जाट, ब्राह्मण, बनिया भी हो सकती है। कुछ स्थानों में तो जनजातिया भी हिन्दू जातियों को प्रधाओं की नकल करने लगी हैं। अन्त में, जहा तक केवल “परिवर्तन की ग्रक्रिया' का प्रश्न है, सस्कृतिकरण को एक "ऐतिहासिक विशिष्ट” लक्षण कहा गया है। इस अर्घ में इसका सन्दर्भ भारतीय इतिहास में उस प्रक्रिया से है जिसके कारण इतिहास कौ विभिन्‍न अवधियों में अनेक जातियों की स्थिति में तथा उसके (भारत के) सास्कृतिक स्वरूपों में परिवर्तन आए। यह सामाजिक परिवर्तन के आन्तरिक स्रोत को और भी सकेत करता है। सामाजिक परिवर्तन समझने में इग अवधारणाओ की उपयोगिता (ए५९॥॥ए९5५5 ० 06 एणालश्फु७ ॥॥ एाऐशऊश्यायागह 5024 ए0०ग९९) भारतीय समाज के विश्लेषण में सस्कृतिकरण की अवधारणा को एक उपकरण के रूप में इसकी उपयोगिता को स्वय श्रीनिवास ने अत्यधिक सीमित बताया है क्योंकि “अवधारणा जटिल एवं अयथार्थ हैं! (वही, 985 :44) | हम भी इस अवधारणा की कुछ कमिया इगित कर सकते हैं (0) सदर्भ समूह (८०१०० 87009) सदैव ब्राह्मण जाति नही होता, अपितु कई मामलों में वह स्थानीय प्रबल जाति (राजपूत, बनिया, जाट, आदि) होता है, इसलिए सामाजिक प्रिवर्ती और आधुनिकीकरण 455 ०) 9) 0) 6) ७) ५) ७) ७ संस्कृतिकरण का संदर्भ न केवल हर मॉडल में भिन्न मिलता है (जैसे ब्राह्मण मॉडल, राजपूत मॉडल, बनिया मॉडल, आदि) पस्तु एक ही मॉडल में अलग-अला क्षेत्रों में भी भिनता मिलती है। मोमेद्र सिंह (973 :8) के अनुसार यह (प्रिनता का लक्षण) सस्कृतिकरण के विभिन 'सद्भित विशिष्ट' लक्षण में विरेधाभास पैदा करा है। श्रीनिवास ने शक्ति (90४०) व भ्रपुत्व (त07/0आ०८) को सस्कृतिकरण कौ प्रक्रिया से जोड दिया है। इससे सामाजिक परिवर्तन के सस्कृतिकरण मॉडल में सरचनात्मक इकाई भी शामिल हो जादी है। श्रीनिवास ने इसको स्पष्ट नही किया है। उनका कहना है कि अनेक निम्न जातियाँ अतीत में उच्च स्थितियों तक पहुंची हैं और या वे ग़जकीय आदेश से या शक्ति हडप कर प्रबल जातिया बन गई हैं। “सस्कृतिकरण” तथा 'पश्विमोकरण” की अवधारणाए सामाजिक परिवर्तन का विश्लेषण मुख्यत. सस्कृति के सन्दर्भ में करती हैं न कि सरचना के सदर्भ में। सस्कृतिकरण जाति व्यवस्था में केवल "स्थिति परिवर्तन' प्रकट करता है तथा वह सरचनात्मक परिवर्तन इमित नहीं करता। जेटरबर्ग (22॥ध०शह, 965 .40) इस विचार के हैं कि श्रीनिवास्त की दोवों अवषारणाए 'सत्य की दावा करने वाली' (ध७)॥ ४४४८४) हैं। श्रीनिवास ने स्वयं कहा है कि संस्कृतिकरण एक अत्यन्त जटिल तथा विषमरूपी (हहटाणह६४९००७४) अवधारणा है। इसको एक अवधाएणा के रूप में समझने को अपेक्षा अवधारणाओं के 'एक बल्डल के रूप में समझना लाभदायक होगा। यह विस्तृत सास्कृतिक प्रक्रिया का केवल एक नाम है। श्रीनिवास का मॉडल केवल भारत में सामाजिक परिवर्दन को समझाता है जो कि जाति व्यवस्था पर आधारित है। अन्य समाजों के लिए यह उपयोगी नहों है। थे अवधारणाएं सास्कृतिक परिवर्तन के किसी सिद्धान्त की स्थापना नहीं करती, यहाँ तक कि सामान्य परिभाषाएं भी सिद्धानतहीन हैं! ज़ेटरर्ग 965 :40) का कहना है कि ये दोनों अवधारणाए उपयुक्त या अनुपयुक्त, प्रभावशाली या मूल्यहीन तो हो सकती है, परन्तु सही या गलत कभी नहीं हो सकती। हार्पए भी इस अवधारणा को एक प्रकार्यात्मक अवधारणा मानता है जो कि परिवर्तन की ऐतिहासिक अवधारणा से बिल्कुल भिन्‍ है। योगेद्र सिंह (973 व7) की मान्यता है कि सस्कृतिकरण अतीत तया वर्तमान में आरद में सास्कृतिक परिवर्तन के अनेक प्चों क्य विवरण नहीं देता, क्योंकि यह माप परम्पणओं को उपेक्षा करता है जो कि सास्कृतिक परम्पाओं का स्थानीय स्वरूप है। मेकिम मेरियट (955 :9-9) ने भी भारत के एक प्रामौण अझपुदाय के अपने अध्ययन में यही पाया। देश के कुछ भागों में (जेसे पजाब तथा देश विभाजन से पहले का पिन्य) जातियों द्वार जो कुछ भो नकल किया डातां था दे सास्कृठिक पस्म्पणए नहों यों बल्कि इस्लामी परम्पराएं थीं। पजाब में छिछ घर्म वा उदय हिन्दू परम्पतओं और सूफौवाद व रहस्यवाद के आदोलनों के सश्लेषय का प्रविफ्ल है। 456 सामाजिक परिवर्त और आधुत्रिकोकरण उपरोक्त विवेचन यह प्रकट करता है कि श्रीनिवास के द्वारा विकसित की गई दोनों रण भार के सपूर्ण परिवर्तन का नहीं अपितु भांत्रें सोमित परिवर्तन का सकेव देती । सामाजिक परिवर्तन पर पश्चिम का प्रमाव (6 काउग्ल ० छह एछ। 0त 5059 (॥३0१९) अलायस (4॥985, 972 2) के अनुसार भारत पर पश्चिमी प्रभाव का पाँच चरणों में विवेचन किया जा सकता है। प्रथम चरण सिकन्दर की विजय के साथ प्रतिरोधी सम्पर्क है जो कि बाद की शत्ताब्दियों से वाणिज्य व व्यापार से शक्तिपूर्ण आदान प्रदान के रूप में सदियों तक चलठा रहां। दूसरा चरण पद्धहवी शताब्दी के अन्त से प्रारम्भ हुआ जब वास्वोडिगामा कालीकट में अपने जहाजों के साथ 498 में आया। कुछ ही ब्षों में पुर्तगालियों ने गोआ पर अधिकार कर लिया। लेकिन इन पश्चिमी लोगों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा। तृतीय चरण प्रारम्भ हुआ जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अठारहवी शताब्दी के प्रारम्भ में अपना शासन प्रारम्भ किया और बाद में अठाएवीं शताब्दी के मध्य तक ब्रिटिश साम्राज्य भारत में स्थापित हो गया। भारत में पश्चिमी सस्कृति के विस्तार का यह प्रधम कदम था। चतुर्थ चरण प्रारम्भ हुआ उलीसवी शताब्दी के भारम्म तथा औद्योगिक क्रान्ति के आगमन से। अग्रज़ों द्वारा कच्चे माल के रूप में आर्थिक शोषण से प्रारम्भ हुआ और तभी से सास्कृतिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में भी पश्चिमी सस्कृति का वर्चस्व प्रारम्भ हुआ। पाचववाँ और अतिम चरण प्रारम्भ हुआ 947 में भारत की राजनैतिक स्वतत्रता के साथ। हमारी सामाजिक व्यवस्था तथा हमारी सस्कृति पर प्रभाव के अर्थ में पश्चिमी सस्कृतिं की क्‍या छाप पडी है ? इसको सक्षेप में इस प्रकार बठाया जा सकता है ()) बैंक व्यवस्था, लोक प्रशासन, सैन्य सगठन, आधुनिक औषधियाँ, कानून आदि जैसी पश्विमी सस्थाओं को देश में प्रारम्भ किया गया। (0) पश्चिमी शिक्षा ने उन लोगों के दृष्टिकोण को विस्तृत किया जिन्होंने आजादी व अधिकारों की बात शुरु की। नवीन मूल्यों, धर्म निरपेक्ष व न्‍्याय सगत भावना तथा व्यक्तिवाद, समानता व न्याय के विचारों के समावेश ने बडे महत्व का स्थान ले लिया। 8) वैज्ञानिक नवीनताओं की स्वीकृति ने जीवन स्तर ऊचा उठाने की आकाक्षाओं को ऊचा उठाया और लोगों के लिए भौतिक कल्याण उपलब्ध कराया। (५) कई सुधार आन्दोलन हुए। अनेक परम्पणगत विश्वास तथा व्यर्थ की भ्रथाए त्याग दी गई तथा अनेक नए व्यवहार स्वरूप अपनाए गये। 6) हमारी तकनीकी, कृषि, व्यवसाय और उद्योग आधुनिक किए गए जिससे देश का आर्थिक विकास एवं कल्याण हुआ। 6) राजनैतिक मूल्यों के सस्तरण की पुर्नरचना की गई। प्रजातत्र स्वीकार करने के बाद सभी रियासते भासतौय राज्य में सम्मिलित कर ली गई तथा सामन्‍्दों और जमीदारों के सामानिक परिवर्वर और आधुनिकीकरण 457 अधिकार और शक्ति समाप्त हो गई। () विवाह, परिवार जाति जैसी सस्थाओं में सरचनात्मक परिवर्तन आए और सामाजिक ठथा धार्मिक जीवन में नए सम्बन्ध बनने लगे। (8) रेलवे, बच्त यात्रा, डाक सेवा, हवाई एवं समुद्री यात्रा, प्रेस, रेडियो और प आदि संघार माध्यमों के आने से मानव जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रभाव पड़ा है। 9) राष्ट्रीय भावना में वृद्धि हुईं है। (0) मध्यम वर्ग के उदय ने सप्ताज के प्रमुख मूल्यों में परिवर्तन कर दिया है। अलाठाश (&|४085) ने भी पश्चिमी सस्कृति के प्रभाव को हमारी सस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में चार प्रकार के परिवर्तनों फे आधार पर समझाया है : निरस्नात्मक (७!ए४०७/४७) परिवर्तन, योगात्मक (00/200८) परिवर्तन, समर्थन 0! 077४6) परिवर्तन, तथा संश्लेषात्मक ($)॥॥0॥०) परिवर्तेन। निरस्नात्मक परिवर्तन वे हैं. जिमसे सास्कृतिक विशेषताएँ, व्यवहार के स्वरूप, मूल्य, विश्वास और सस्त्याए लुप्त हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, हम युद्ध में प्रयोग आने वाले शच्तों में पूर्ण परिवर्तन, सतो प्रथा का उन्पूलन आदि ले सकते हैं। योगात्मक परिवर्तनों में जीवर के विभिन्‍न पहलुओं से सबंधित नयी सास्कृतिक विशेषद्ाओं, संस्थाओं ,च्यवहार स्वर्पों तथा विश्वाप्तों को अपनाना सम्मिलित है। इस प्रकाए के जोड़ लोगों की संस्कृति में पहले विद्यमान नही थे। हिन्दू समाज में विवाह-विच्छेद की व्यवस्था, पिता की रूम्पत्ति में पुत्री को भाग देना, पचायतों में चुनाव प्रथा आदि इस कार के पणिर्तन के कुछ उदाहरण हैं। समर्थक परिवर्तन वे हैं जो पश्चिमी सम्पर्क में आने से पूर्व समाज में विद्यमान विश्वास, मूल्य या व्यवहार स्वरूपों को अधिक मजबूद करते हैं। इसका एक मात्र उदाहरण है कर्ज व्यवहार में हुण्डी का प्रयोग। सश्लेपात्मक परिवर्वन वे हैं जो वर्तमान में विद्यमान तत्वों से नए स्वरूपों की रचना करते हैं और साथ हो नए स्वरूपों को परी अपनाते हैं। इसका उदाहरण उस परिवार की रचना है जो आवास की दृष्टि से तो एकाको है परनु कार्य ((00८४०४) की दृष्टि से अब भी सयुकत है, जो मात्रा-पिता दथा सहोदर्ों के प्रति सामाजिक दायित्वों को पूर करता है। दहेज प्रथा की तिरन्‍्तरता बनाए रखना, किन्तु दहेज की धन राशि लेने-देने पर प्रतिबन्ध लगाया जाना तथा बच्चों का माता-पिता के साथ जीवन साथी के चयन में सहयोग काना सश्लेपात्मक परिवर्तन के दो अच्छे उदाहरण हैं। पश्चिमी प्रभाव के कारण परिवर्तन का उपरोक्त विधाजन केवल विश्लेषण के उद्देश्य से है, लेकिन एक दूसरे से उनको अलग कणना सम्भव नरी है। एक हो प्रकार के परिवर्तन के भीतर हम दूसरे प्रकार के परिवर्तनों के तत्व भी देख सकते हैं उदाहरणार्थ, बल उद्योग के परास्भ करने में समर्थक तत्व देखे जा सकते हैं क्योंकि यह कपड़े के उल्लनादन को सुविधा प्रदान करता है। परन्तु साथ ही क्योंकि इससे हायकरघा (४&॥0॥009) उद्योग को आषाव लगा है, तो यह कहा जा सकता है कि इसमें हटाने योग्य अथवा निरस्नाममक परिवर्तन के तत्व भी काम करते हैं। खुले कारगृहों (४ज॥-25 एगं०४७) का आए भी एक और उदाहण है जिसमें तीन विविध प्रकार के परिवर्तन कार्य करते हैं। इसी प्रकार, शिक्षा व्यवस्था, बैंकिंग व्यवस्था, विवाह व्यवस्था, आदि में परिवर्तन मिलते हैं। का अब प्रमुख प्रश्न है कि : पश्चिम के सम्पर्क के बाद घारत कटों पहुंच गया है? क्या 458 सामाजिक परिवर्ती और आधुनिकीकरण भारत ने प्रगति की है ? क्या इसने लोक कल्याण में योगदान किया है ? क्या इस प्रश्न का निमपेक्ष उत्तर सम्भव है ? क्‍या ऐसे विश्लेषण में आत्मपरकता 6एशंट्लाप्रंएण) तथा दार्शनिक पश्चपात(एाशि०४०आप्व 9870279) को हटाया जाना सम्भव है ? कुछ विद्वान मानते हैं कि भारत को द्वितीय महायुद्ध के पश्चात अनेक समस्याओं का सामना करना पडा, जैसे आर्थिक पिछडापन, बडी सख्या में लोगों का गपैबी की रेखा से नौचे जीवनथापन करना, बेरोजगारी, जीवन के सभी क्षेत्रों में धर्म का प्रभुत्व, मामीण ऋण, जातीय संघर्ष, साम्प्रदायिक दुर्भावना, पूँजी की कमी, तकनीकी दक्षता वाले दक्ष कार्मिकों की कमी, आदि । इन समस्याओं का समाघान भी पश्चिमो प्रभाव ने दिया है। लेकिन अन्य विद्वानों की मान्यता है कि पश्चिमी प्रभाव ने भारत को इन समस्याओं के समाधान में कोई सहायता नहीं की । यदि कुछ समस्याओं का समाधान हुआ है तो कई दूसरी समस्याएँ खडो हुई हैं और भारत उन्हें पश्चिम के नमूने पर सुलझाने का प्रयल नही कर रहा है। भारत स्वदेशी ढग से उन्हें सुलझाने का प्रयास कर रहा है। देश की स्वतत्रता के बाद ही औद्योगिक विकास में वृद्धि, शिक्षा का विस्तार, भ्रामौण विकास, जनसख्या पर नियत्रण आदि पाया गया है। इस प्रकार पश्चिमी न को मुक्ति से और न कि पश्चिमी सम्पर्क से भारत में आधुनिकीकरण सम्भव हुआ । वास्तविकता यह है कि जीवन के कुछ क्षेत्रों में पश्चिमी प्रभाव को स्वीकार करके हम सही हो सकते हैं। आधुनिक मेडिकल साइस, आधुनिक तकनीकी, प्राकृतिक प्रंकोपों का सामना करने के आधुनिक उपाय, देश की बाहरी खतगें से सुरक्षा प्रदान करने के आधुनिक तंरैके, आदि भारत के इतिहास में पश्चिम के अद्वितीय योगदान के रूप में गिने जायेंगे। लेकिन, भारत इनके साथ-साथ लोगों के उत्थान के लिए अपनी परम्परागत सस्थाओं, प्रथाओं और विश्वासों का भी प्रयोग कर रहा है। इस प्रकार पश्चिमी प्रभाव के बाद भी तया विविध व्यवस्थाओं के आधुनिकौकरण के बाद भी भारत, भारत ही रहेगा। भारतीय सस्कृति आने बाले कई दशकों तक सुरक्षित रहेगी। आधुनिकीकरण : अवधारणा निदर्शक, प्रकृति और समस्याएँ (१॥00077/59007 : (०7९९क्ञां, [गरतांटडा075, [07९ बाते ?770%0श75) आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता की अवधारणाएँ (एण्मल्कड ण॑ ध०१०चांपु ४0 ?०5४ #०३च्ाए) मरम्परा उन सामाजिक प्रथाओं का एक समुच्चय 0०0 कु व्यवहार सम्बन्धी प्रतिमानों और मूल्यों को सिखाते हैं जो अतीत से जुडे होते हैं। पर ये विस्तृत स्वीकृति के सस्कारों (>वतटा9 ४००८००४० ए्राए७) और प्रदौकात्मक व्यवहार के अन्य स्वरूपों से जुडे रहते हैं। आधुनिक परम्पप्ंगत समाज से विच्छेद (57०४४) का प्रतिनिधित्व करवा है। स्टुअर्ट (997 40) ने आधुनिकदा के पाँच विशिष्ट गुण बताए हैं. तर्क पर बल, प्रगति में विश्वास, प्रकृति और वातावरण पर नियत्रण, (बौद्धिक विशेषत), घर्मनिरपेश् सत्ता का वर्चस्व, और राज्य/ राजनैतिक मामलों से घार्मिक प्रभाव का सीमान्दौकरण (राजनैतिक विशेषता), ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें मुद्रा व्यवस्था विनिमय का साधन हो (आर्थिक विशेषता), धर्म का पतन सामाजिक प्रीरवर्त और आधुनिकीकरण 459 और पर्मनिरपेक्ष भौतिक सस्कृति का उदय, (धार्मिक विशेषता), परम्भरागद सामाजिक व्यवस्था का पतन और नये श्रम विभाजन का विकास और नये वर्गों का उदय (सामाजिक विशेषताए)। इस प्रकार, आधुनिकता नये सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक और बौद्धिक व्यवस्थाओं का समुच्चय (८८) है जो परम्परागत व्यवस्था से बिल्कुल पिन है। परन्तु यद्यपि पएपत से आधुनिकता में रूपान्तरण शक्तिशालो है, फिर भी यह पूर्ण नहीं है, अर्थात पण्पतागत अभिवृत्तियां और व्यवहार जीवित रहते हैं। एंथोनी गिड़न्स के अनुसार, आधुनिकता की तोन महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं . औद्योगीकरण, पूँजीवाद (वस्तुओं का उत्मादन, सर्पात्मक बाजार के लिए मजदूरी वाले श्रमिकों का उपयोग करना) और निरीक्षण (#॥0थ93०८) (ग़ज्य और अन्य संगठनों का व्यक्तियों और समूहों पर नियत्रण) (४९७, 8 07007॥०), 997 :4) यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आधुनिकता विज्ञान, वर्क और प्रगति में विश्वास रखने पर बल देती है। आधुनिकता से सम्पर्क रखने वाले वैज्ञानिकों को वस्तुपरक विशेषज्ञ समझते हैं, विज्ञान को जगत के नियमों की खोजकर्ता और मानव को प्रकृति और पर्यावरण पर नियंत्रण करने वाला और तर्क को मानव दशाओं में सुधार करने वाला अर्थात्‌ प्रगति को प्राप्त करमे के लिए समझते हैं। “उत्तर आधुनिकता शब्द तब प्रयोग में आया जबकि आधुनिक समाज आधुनिकता के परिणामों के भ्रति सावधानी पूर्वक विवेचन के बाद अच्छी तरह इसको जान गया, विशेष रूप से इसके नकारात्मक पक्ष को। एन्योनी गिडन्स उत्तर आधुनिकता को चैतन्यता (शी००शोफ़े (अत्यपिक आलोचनात्मक जागृति या चैतन्य आधुनिकता) कहता है क्योंकि यह (नयी अवस्था) आधुनिकता के घातक परिणामों पर बल देती है (जैसे पर्यावरण पर औद्योगोकरण का)। प्रदूषण, जन सहार के लिए बुत अख्ों का प्रसार, आदि आधुनिकता के जोखिम भरे परिणामों के उदाहरण हैं। आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता में अन्तर यह है कि : 6) पहला विज्ञन/तर्क से सम्बन्धित है जबकि दूसरा पर्यावरणीय मानवता और प्रकृति पर व्यावहारिक विज्ञान के अति घातक प्रभावों से, (४) पहला सामाजिक प्रगति में विश्वास करता है तो दूसप प्रगति के प्रयल्लों के घातक परिणामों पर, (जैसे कार प्रदूषण, दुर्घटना), (॥7) पहला गदर रज्य को समाज की सौमा मानता है, लेकिन दूसरा वैश्वोकरण को प्रक्रिया के सत्दर्भ में देखता है, (६) पहला आर्थिक विकास पर बल देवा है जबकि दूसरा बढ़ते हुए सांस्कृतिक विक्ाप्त पर, ()) पहला जगत को विरोधाभास के अर्थ में लेता है (जैसे खरो/पुरुष, इश्तुपरक/ आत्मपरक) लेकिन दूसरा समानताए व एकता खोजने का प्रयल कख्ा है (जमे, आत्मपएक और वस्तुपरक) 08.6 000596, 997 .43) आधुनिकोकरण की विज्षेषषञाएं (06 (कहबगलच्मंज्राक गे १॥०वेलापेग्न००) कार्ल ड्यूश (९०0 7. , 0००७८, ००. ०५, 494 . 95) ने आधुनिकता के एक हि (अकोत्‌ सामगिक जनसख्यालक था जिप्ते वह सामाजिक गदिशोलवा भो कहते है) दा भर्द्भ देते हुए इगित किया है कि इसके कुछ सूचक (04/८८७) इस प्रकार है; यतरों के ग्ाष्यम से आपुनिक जीवन के प्रति विगोपन या अनावृत्ति (८०७०८), शहगक्रण, कृषि प्यों में परिवर्तन, साथरता तथा अति व्यक्ति आय में वृद्धि 460 सामाजिक परिवर्त और आशुनिकौकरण इजेन्सड (छाष्टाध०त0, 95 3) के अनुसार सामाजिक सगठन (या आधुनिकीकरण) के सरवनात्मक पश्चों के मुख्य सूचक (70०८७) हैं : विशिष्ट भूमिकाएं उन्मुक्त विचरण वाली (7०८ ॥0»77) होती हैं (अर्थात्‌ उनमें प्रवेश व्यक्ति के प्रदत्त लक्षणों से निर्धारित नही होता है), तथा घन व शक्ति जन्म के आधार पर निश्चित नहीं होते (जैसा कि परम्पणगत समाजों में होता है)। यह मार्केट जैसी सस्थाओं से, (आर्थिक जीवन में), मतदान से, और ग्जनीतिक जीवन में पार्टी कार्यों से सम्बद्ध होते हैं। मूर (१४०००८, 96। 57-82) ने बताया है कि आधुनिक समाज के विशेष आर्थिक, राजनैतिक और सास्‍्कृतिक लक्षण होते हैं। आधिक क्षेत्र में आधुनिक समाज के लक्षण विष्त हैं. () अत्यन्त उच्च स्तरीय तकनीकी का विकास जो ज्ञान के व्यवस्थित खोज से होता है, जिसका अनुसएण प्राथमिक व्यवसाय (कृषि) में कम द्वैतौयक (उद्योग, व्यापार) और तृतीयक (नौकरी) व्यवसायों में अधिक होता है, (9) आर्थिक विशिष्टताओं को भूमिकाओं का विकास, (४४) भ्रमुख बाजाें, जैसे वस्तुओं का बाजार, श्रम बाजार, तथा मुद्रा बाजार के क्षेत्र व जटिलता का विकास | राजनैतिक क्षेत्र में आधुनिक समाज कुछ अ्थों में प्रजातात्रिक या कम से कम जनवादी (9०7ण/४॥०) है। इसके लक्षण हैं. () शासकों के अपने समाज से बाहर शक्ति के सन्दर्भ में पारम्परिक वैधता में गिरावट, (9) शासकों की उन शासितों के प्रति एक प्रकार के वैचारिक उत्तरदायित्व (/0८0087८8) 8००००४५७४१॥४३५) की स्थापना जो ग़जनैतिक सत्ता के वास्तविक धारणहारी होते हैं, (॥)) समाज की राजनैतिक, प्रशासनिक, वैधानिक एवं केन्द्रीय शक्ति की सीमाओं का विकासशीक्त विस्तार, (४) समाज में अधिक से अधिक समूहों में सभावित शक्ति का निरन्तर फैलाव और अन्तत सभी प्रौढ नागरिकों में तथा नैदिक व्यवस्था में फैलाव और (५) किसी भी शासक व्यक्ति या शासक समूह के प्रति प्रदत्त राजनैतिक प्रतिबद्धता में कभी होना। सास्कृतिक क्षेत्र में आधुनिक समाज के लक्षण हैं. 6) प्रमुख सास्कृतिक और मूल्य व्यवस्थाओ के प्रमुख तत्वों जैसे, धर्म, दर्शन और विज्ञान में बढ़ता हुआ अन्तर, (9) धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और साक्षरता का विस्तार, (0) बौद्धिक विषयों पर आधारित विशिष्ट भूमिकाओं के विकास के लिए जटिल सस्थात्मक व्यवस्था, (७) संचार साधनों का विकास, (४) नवीन सास्कृतिक दृष्टिकोण का विकास जिसमें प्रगति व सुधार पर बल,'योग्यताओं की अभिव्यक्ति और प्रसनता पर बल, व्यक्तिवाद का नैतिक मूल्यों के रूप में मानने पर बल तथा व्यक्ति की कुशलठा और सम्मान पर बल दिया जाता है। विस्तृत रूप में, आधुनिकोकरण के प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं . वैज्ञानिक परिमेक्ष्य, कारण और तर्कवाद, धर्मनिरपेक्षता, उच्च आकाक्षाएं तथा उपलब्धि परकता (ल्माटएशगढात णगथा(॥700), मूल्यो, मानदण्डों और अभिरुचियों में सम्पूर्ण परिवर्तन, नवीन प्रकार्थात्मक सस्थाओं की रचना, मानव ससाधनों में निवेश (/८॥॥ग्टगा), विकास परक अर्थव्यवस्था, जातेदारी, जाति, धर्म या भाषा परक हिंदो की अपेक्षा राष्ट्रीय हित, मुक्त (०9८७) समाज, गतिशील व्यक्तित्व । सामाजिक एरििर्ल और आश्ुनिकौकरण 46 आपुनिकीकरण के परिमाप (४छयडा765 ० ॥॥०वशयारताणो आपुनिकौकरण के परिमापों के विषय में व्याख्या कप्ने हुए रस्टोव और वार्ड (ए७७0५ जाएं 0, 964 :4) मे इनमें परिवर्तन के इन विशेष पक्षों को सम्मिलित किया है. () अर्थव्यवस्था का औद्योगीकरण, त्रथा उद्योम, कृषि, दुग्ध उद्योग (ताज विशणगह), आदि में चैज्निक तकनौंकी धारण कर के उन्हें अधिकारिक उत्पादक बनाना, (7) विचारों का धर्मनिर्पेध्षीकरण; (8) भौगोलिक एवं सामाजिक गतिशीलता में उल्लेखनीय वृद्धि, (5) भौतिक जीवन स्तर में वृद्धि (३) प्रदत्त प्रस्थिति से अर्जित प्रस्थिति में परिवर्तन, (ह) भौतिक जौवन स्तर में वृद्धि; (५४) अर्थ व्यवस्था में निर्योव शक्ति (ह्रष्माणगल दाटाहए का जैविक (»॥ण»८) शक्ति से अधिक उपयोग; (५४) प्राथमिक उत्पादन क्षेत्र की अपेक्ा ट्तीयक तथा तृतीय उत्पादन क्षेत्रों में अधिक श्रमिकों का कार्य करना (अर्थात्‌ कृषि व मत्स्य कार्यों की अपेक्षा निर्माण और नौकरी आदि व्यवसायों में अधिक श्रमिक) (00) तीद़ शहरीकणण, (७) उच्च स्तरीय साक्षरता, (5) प्रति व्यक्ति उच्च राष्ट्रीय उत्पादन, (७) जन संचार का निशुल्क विस्तार, (68) जन्म के समय उच्च जोवन अपेक्षा। आधुनिकोकरण की पूर्व आवश्यकवाए (एल्‍लश्वुए5६5 0९ व०0थाबब( ०0) प्रम्परवाद से आधुनिकीकरण में परिवर्तन होने से पूर्व सम्राज में आधुनिकीकरण की कुछ पूर्व आवश्यकवाएं मौजूद होनी चाहिये। ये हैं. () उद्देश्य की जानकारी तथा भविष्य पर दृष्टि, ()) अपनी दुनियां से परे भी अन्य समाजों के प्रति जागरूकता, (॥)) अति आवश्यकता वा भाव, (७) विविध भूमिकाओं एवं अवसरों की उपलब्धता, (४) स्वय लादे गए कार्यों एव बलिदानों के लिए भावनात्मक तत्परता, (४) प्रतिबद्ध, गतिशोल एवं निष्ठावान नेतृत्व का उदय €र्मदेश्वर प्रसाद, 970 * 79) आधुनिकीकरण बडा जटिल है क्योंकि इसमें न केवल अपेक्षाकृत नए स्थाई ढाँचे की आवश्यकता होती है, बल्कि ऐसे ढाँचे को भी जो स्वय को निस्‍न्‍्तर बदलती दशाओं एवं समस्याओं के अनुकूल बना ले। इसकी सफ़लता समाज कौ आन्तरिक परिवर्तन को सामर्ध्य पर निर्म करती है। जेट्याड (8:520080॥, 7965 659) की मान्यता है कि आधुनिकोक्र्ण के लिए एक प्रमाज के तीन संरचनात्मक लक्षण होने चाहिए - 6) (उच्च स्तरैय) संरचनात्मक अन्तर, (४) 0च्च कोटि की) सामाजिक गतिशीलता, और (४४) अपेक्षाकृत केन्रीय तथा स्वायत्तता री सस्थात्मक सरचना। सभी समाज आधुनिकीकरण की एक सी प्रक्रिया स्वीकार नहीं करते हैं। हर्वर्ट ब्लूमर ला छणण९5, 964 - 29) के विचार को मानते हुए पाच तरीके बताये जा सकते जिनमें एक परम्परागत समाज आधुनिकोकरण की प्रक्रिया के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त वर सकता है। ये हैं : (7) अस्वोष्मात्पड अनुन्िया (२८८८८ 4१८फ्आाए८) ] एक परम्पणगत समाज आधुनिकीकरण को अस्वोकार कर सकदा है। यह अनेक अकार से 462 सामाजिक प्ररिवर्ति और आपुनिकीकाय विविध स्तरों पर हो सकता है। शक्तिशाली समूह, भूसामन्तशाही, सरकारी स्वल्पतन्र (णहबा०णफ्, मजदूर सघ तथा धर्मान्ध लोग अपने हिदों की रक्षा के लिए आधुनिव्तेकरण को हतोत्साहित (05०००४००८) कर सकते हैं। सामाजिक पूर्वाप्रह (ए़्धुं०ण४८८७), परम्पएगव जीवन के कुछ स्वरूप, विश्दासों व प्रधाओं में दृढ आस्था ठथा विशेष रुचि कुछ लोगों को आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को अस्वोकार करने और परम्परागत व्यवस्था को बनाए स्खने के लिए बाध्य कर सकते हैं। (2) विकव्पदुक्त अनुनिया (0फ्रादशर म०क्रू०छर) प्राचीन और नवीन के बीच सन्धि (००४७|००८४००) अनुक्रिया अथवा आधुनिकोकरण तथा पस्परात्मकता के बीच सह-अस्तितव (००-८०७७४८००८) दब होता है जब आधुनिकोकरण की प्रक्रिया परम्परागत जीवन को प्रभावित किये बिना हो निस्पृह ((८४७०॥८०) विकास के रूप में चलता रहता है। इस प्रकार आधुनिकीकरण तथा परम्सशत्मक व्यवस्था में कोई संघर्ष नहीं होता क्योंकि प्राचीन व्यवस्था को कोई खतरा नहीं होता। आधुनिकीकरण के लक्षण प्रस्पपरात्मक जीवन के साथ-साथ रहते हैं। (3) आत्मसाती अनुक्रिया (65हद्रधा ८ सि559005८) इस हर में परम्परागत व्यवस्था द्वाय आघुनिकोौकरण को प्रक्रिया का आत्मसावीकरण निहित है जो कि जीवन के स्वरूप और सठनात्मक पश्च पर कोई प्रभाव नही डालदा। इसका उदाहरण बैंकिंग व्यवस्था में बैंक कर्मचारियों द्वारा कम्प्यूटर विचारधारा का स्वीकार करना है, अथवा गाँवों में किसानों द्वारा कृत्रिम उर्वरवों और ट्रेक्टरों का प्रयोग करता है। दोनों ही उदाहरणों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया परम्पणत्मक व्यवस्था या उसके मूलभूत ढाँचे वो प्रभावित किए बिना आदी है। (4) समर्थक अनुक्रिया (59#एक्र'€ २२९५१०फ८) इसके अन्तर्गत नवीन व आधुनिक बातें स्वीकार को जाठी हैं क्‍योंकि उनसे परम्परात्मक व्यवस्था को बल मिलता है। उदाहरणार्थ, पुलिस या सेना में आधुनिकौकरण की प्रक्रिया पुलिस की कार्यक्षमता तथा सेना की शक्ति में वृद्धि करती है। विविध परम्परात्मक समूह और सस्थाए परम्परागत हितों को जाये रखने के लिए आधुनिकोकरण द्वाय प्रदत्त अवसरों का प्रयोग करते हैं तथा परम्परागत स्थिति को दृढ़ता से बनाए रखते हैं। आधुनिकीकरण परम्परत्मक हितों को आगे बढाए रखने के लिए ससाधन और सुविधाए उपलब्ध करा सकदा है। (5) विपल्लागरी अनुक्रिया (07708 #९फ्४९) इस अभुक्रिया में परम्परात्मक व्यवस्था को कई बिन्दुओं पर समायोजन द्वारा खोखला बनाया जाता है ज्ञो कि आपुनिकीकरण द्वाय उत्पल स्थितियों के कारण किया जाता हैं । साधारण ये पाचों अनुक्रियाएँ विविध सयोजनों (८००४७८४०७४४०४७) द्वार परम्परागत व्यवस्था के विविध बिन्दुओं पर होतो रहती हैं। अनुक्रियाए वर्रेयताओं (7६/८7६४०८७), सामामिक परवर्त और आधु्तिकीकरण 463 श्चियों (ाधव्के, तथा पूल्यों (//०८७) से प्रभावित होती रहती हैं। माइरन वीनर (9४०७ ५४८४), 4996 : 8) के अनुसार आधुनिकौकरण को सम्भव बनाने वाले प्रमुख साधन (ह5पणशध्या।9) इस प्रकार हैं (7) शिक्षा (हदरटद्ा००) शिक्षा राष्ट्रीयता का भाव जागृत की है तथा तकनीकी नवीनताओं के लिए आवश्यक दक्षता और अभिरुचियाँ पैदा करती है। एडवर्ड शिल्स ने भी आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा कौ भूमिका पर बल दिया है । परन्‍नु आर्नोल्ड एण्डरसन (806 #5तटा500) की मान्यता है कि औपचारिक शिक्षा ही केवल अध्यापन कुशलता के लिए पर्याप्त नहीं है। कभी-कभी विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा व्यर्थ हो सकती है, क्योंकि यह डिग्रीधारियों की संख्या में वृद्धि कर देवी है, किसु आधुनिक दक्षता तथा अभिरुचियों से पूर्ण लोगों की सख्या में वृद्धि नही करती । (2) सवार (स्ोपण) (0एस्‍क्ापशाव्यया) जनसचाए के साधनों का विकास (टेलोफोन, टीवी, रेडियो तथा फिल्म आदि) आधुनिक विचाएं को प्रसारित करते का एक महत्वपूर्ण साधन है। केवल खत यह है कि यदि इन पर संण्फाते नियंत्रण हो तो यह एक ही प्रकार की विचारधारा को प्रसारित कोंगे। प्रजातत में प्रेस अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए स्वतत्र होता है। () राष्ट्रीय पर आयारि विचारधाय (600०७ ककल्व कह रंब80॥०659) बहुल (90७) समायों में राष्ट्रवादी विचारपागए सामाजिक दरायें (5०८० ८९०३४०४८७) के एकौकएण के लिए अच्छा स्राथन होती हैं। वे लोगों के व्यवहार परिवर्तन हेतु राजनैद्रिक अभिजन को भी सहायदा करती हैं। परन्तु बाइन्डर (870) की मान्यता है कि अभिजनों को विचारधाय आधुनिक हो सकती है, लेकिन यह आवश्यक तहीं है कि इससे विकास को भी सुविधा प्राप्त हो। (4 वफ्तिषाई (चमत्कारी) ने ((/ढशएकादवा८ 7६44६४१%) एक करिश्माई (चत्मकारी) नेत लोगों को आधुनिक विचार, विश्वास, रीति-रिवाज तथा व्यवरर अपनाने के लिए प्रेरित कजे में अच्छी स्थिति में होता है क्योंकि लोग उसे श्रद्धा व निष्ठा से देखते हैं। भय यही एहवा है कि ऐसा नेता कहीं राष्ट्रीय विकास के स्थान पर च्यक्तिगत यश के लिए आधुनिक मूल्यों एवं अभिषृचियों का अयोग न करते लो। 6) अव्ीड़क घरयाएी पता (2०८घकार ठमर्माव्य 4ग्रफिगा0) यदि सरकारी सत्ता कमजोर है दो यह आधुनिकौकरण कौ क्रिया के उद्देश्यों को ऋ्रप्त वे के लिए बनौ नीतियों को क्रियावयन (छरफ्ठा८००८णआ०॥) में सफलता प्रात्त नहीं कर रक्‍्ती, किन्तु यदि सरकार मजदूत है वो यह लोगों को विकास के उद्देश्य से व्यवहार एव 464 साम्राजिक परिवर्तन और आशनिकौकरण अभिरुचियों को अपनाने के लिए बाध्य कर सकती है और इसके लिए अवपीडन (००थ००7) का सहारा भी ले सकती है। परन्तु माइरन वीनर का मत है कि तानाशाही शासन की ढाल के नौचे राष्ट्रीयता देश को विकास की ओर जाने के स्थान पर देश के बाहर आत्महत्या का विस्तार स्वरूप (६0८० ०5एथ१४००) सिद्ध हो सकती है। इस सन्दर्भ में बुश प्रशासन (अमेरिका में) के राजनैतिक अभिजनों की नीतियों का उद्धारण देना गलव नहीं होगा जो कि उन्होंने ईगक आदि के लिए बनाई थी। रूस को श्रेष्ठता समाप्त हो जाने के बाद अमेरिका को सरकारी सत्ता ने अविक्सित एवं विकासशोल देशों को आधुनिकीकरण के नाम से पीडित करने को नीति अपनानी प्रारम्भ कर दी। माइरन वीनर 966 9-0) ने समाज के आधुनिकीकरण के लिए मूल्यों, अवसरों एवं विकासशील सम्राज तनाव और प्रतिरोधों के भीतर होने के आधार पर कार्य करता है। तनाव आधुनिकता व परम्परा के बीच निहित सघर्षों के कारण बना रहता है। तनाव अतीत की धरोहर होते हैं जो कि आर्थिक विकास के दबाव के कारण बने रहते हैं। बहुधा विकास की भक्रिया में कुछ तनाव सुलझ जाते हैं | स्थायित्व और मरक्षण की शक्तियों तथा परिवर्तन और आधुनिकीकरण की शक्तियों के बोच दोहरा सम्बन्ध होता है। विकासशील समाज इन समस्याओं का सामना चनुरता से करता है। अत परिवर्तन और आधुनिकोौकरण की चुनौतियों का जैसे, क्षेत्रवाद, प्रालीयता, अशिष्षा, प्रवजन (एशझ्ा०७००), मुद्रा स्पीति, पूँजी वी कमी, रक्षा खर्च में कमी के उद्देश्य से पडौसी राष्ट्रों से सामजस्य, राजनेतिक भ्रष्टाचार, नौकरशाही की अकुशलता, और अग्रतिबद्धता आदि का सामना धैर्य पूर्वक एवं विधि पूर्वक तरीके से तर्कशील अभिस्वीकरण (96०75) प्रक्रियाओं द्वाग करता है। परम्पणगत समाज के दूटने से व्यक्तिगत स्वतत्नता में वृद्धि, सत्ता का समतलीकरण, व निर्णय लेने में जन समूहों का योगदान अधिक होने लगता है। आधुनिकीक्रण की भ्रक्रिया में सामाजिक सरचना के प्रतिरोधों को हटाना सम्मिलित है। साथ ही साथ केवल सभी स्तरों पर आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व सास्कृतिक विकास का नियोजन ही लोगों को आधुनिक विचारों एव मानदण्डों में भागीदारी के लिए प्रेरित करेगा और महत्वपूर्ण सामाजिक समूहो--बुद्धिजीवियों, राजनैतिक अभिजनों , नौकरशाही एवं तकनीकी विशेषज्ञों --को नियोजित परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करेगा। आधुनिकीकरण की समस्याएं (?7छगशण्र5 ण॑ १०वेशग्रोडक्षात्त) आधुनिकीकरण की कुछ समस्याएं निम्नवत हैं (0) आधुनिकीकरण का प्रथम विरेधाभास यह है कि एक आधुनिक समाज को तुरन्त हर प्रकार से बदल जाना चाहिए, लेकिन ऐसे नियमित एवं विकास का समन्वित स्वरूप का अनुमानित नियोजन नहीं हो सकता | अत एक अकार वी सामाजिक हलचल चैदा हो ही जाती है। उदाहरणार्थ, जन शिक्षा व्यवस्था को माग है कि दक्ष (॥9०0) व्यक्तियों को उनकी ट्रेनिंग तथा उनके ज्ञान के अनुकूल व्यावसायिक श्रूमिका में लगा देना चाहिए। लेकिन सभी शिक्षित लोगों का काम दिलाना सदैव सम्भव नहीं होता है। इससे शिक्षित लोगों में निराशा एवं असवोष पैदा होदा है! (2) दूसरी समस्या यह है कि आधुनिकीकरण की अवधि में सरचनात्मक परिवर्तन असमान साम्रणिक प्ररिवर्त और आपुनिकौकरण 465 ७) ७) ७) (0 होता है। उदाहरणार्ष, उद्योग आधुनिक बनाए जा सकते हैं, लेकिन परिवार व्यवस्था, धर्म व्यवस्था आदि रूढ़वादी ही बने रहते हैं। इस प्रकार की निवृत्तियाँ व अविच्छिनताएँ और परिवर्तन के स्वरूप, स्थापित सामाजिक और सरचनाओं को प्रभावित करते हैं और अन्दगगल (889 वह गत्यावग्रेध (७ण।टवा८०६७) पैदा करते हैं। इसका दूसरा उदाहरण है भारत में मताधिकार की आयु 2) से कम करके 8 वर्ष कर देना। यह आयुनिकत्ा में प्रवेश का एक कदम हो सकता है, किन्‍नु इसने एक सकट पैदा कर दिया है क्योंकि निर्वाचक समूह इस अनुमान पर निर्भर करता है कि नागरिकता की परिपक्व भावना होगी तध, नीतियों में भागीदारी योग्यता होगी। वीसरी समस्या है कि सामाजिक व आर्थिक सस्थाओं वा आधुनिकीकरण परापरागत जीवन शैलो के साथ सघर्ष पैदा करता है। उदाहरणार्थ, प्रशिक्षित डॉक्टर परापगात वेद्यों के लिए खबर हो जाते हैं। इसी प्रकार मशीनो द्वारा निर्शित वस्तुएं घरेलू श्रपिको को रोजी ऐेटी से बचित् कर देदी है। इसी तरट बहुत से परम्पणवादी लोग उन लोगों के विशेधी हो जाते हैं जो आधुनिकता स्वीकार करते हैं। फलत परम्पतवादी और आधुनिक तगैकों में सघ॒र्ष असतोष का काएण हो जाता है। चौथी समस्या यह है कि अक्सर लोग जो भूमिकाए धारण करते हैं, वे आधुनिक तो होती हैं, किन्तु मूल्य परम्पारात्मक रूप में जारी रहते हैं। उदाहरणार्थ, मेडिसिन और सर्जरी में ट्रेनिंग लेने के बाद भी एक डॉक्टर अपने मरीज से यही कहता है, “में इलाज करता हूँ, ईश्वर ठोक करता है!” यह दर्शाता है कि उसे अपने पर विश्वास नही है कि वह बीमारी का सही निदान कर सके बल्कि स्वयं पर आगेप लगाने की बजाय वह उन तरैकों की निन्‍दा करता है जिनमें उसका जीवन-मूल्यों को विकसित करे के लिए सामाजीकरण किया गया है। पाँचवो समस्या यह है कि उन साधनों के बीच यो आधुनिक बनातों हैं और उन संस्थाओं व व्यवस्थाओं में जिनको आधुनिक होना है सहयोग की कमी है! कई बार इससे सास्कृतिक विलम्बना (८णोएाश 98) की स्थिति पैदा हो जाती है दषा सस्पात्मक सर्घर्ष होते हैं। अठिम समस्या यह है कि आधुनिकीकरण लोगों की आकक्षाओं को बढाता है, लेकिन सामाजिक व्यवस्थाएं उन्हें आकाक्षाओं की पूर्ति के लिए अवसर अदान करने में असफल रहती हैं। ये कुण्ठाएँ बचनाएँ और सामाजिक अप्ततोष पेदा करतों हैं। संदर्भ ग्रंथ सूची (छा07स्‍6क-थ्क9) #फ्रीफक 34,, 'एपफ्ठश फजाँफए य विताव2, पर. (शशाएिएाशाह़ ॥0.- उदीक्षा $०5ण०६), १४० 3, 4969 हवन, 5), साह्45 70छ्पांवशता, (5४७९ एा॑ ४०090: (700, #ञ३ एफ्रा।एशा005, 80039, 960 #फ्रआए३, 00९, '(5थभी0्प्टू 00ए7फ;पतत टट6॑ [ए ह8/लाए: शेक्ञांगा०्८, प्मह कद्ीदया स्‍गकराबा. ण॒ मकाफार.. अक्काशाफवंध०ा,. पि८एछ 00, गगेफ$6]ाध्यरट, 4997 कजा90, ए४2, (०७), (6 क्राए 5०7 फावाधरीव्थाएा 4209. #96 5 द्रा0, 'रक्षाए000/ 8000 $67श००, 2000, 973 #70]3, रिवया, खादीक्ा 50 5):0%, रिबछब शिपोटबाा0७, उश्एचा, 7993 4, दिया, 8026/ #770/छ% छा #वाद्र (आप ९0), रब्रण्र॥ ?ए/॥08४/05, गंथएप्ा, 4997 #जएणुक,. रिका,. 30दग2एद.. (माक्रा0/०06७,. एच. 886. वपाधगक्षाएा/ने एगफफक्रश$, 069, 4996 #र0४क, ९56, (८७ ) 7क्कामर काव गेद्लाऋाणा. सांडाश कारक दाएव उप्रबशा। ल्‍0/॥05 शा ख़दब, ॥.अएय शा/र5ातह्र त्०ण5९, 80899, 968 4ंणणाए, उद्केयने भाव (0व्थान्ा (९१५ ), 776 70000 72000०फागए 4ध्क्र, काल्टात्व एप्राएश्ाञए 77655, श्रिछझण्टलाणा, 4950 शलोेआ, 25, प॥र >०॥7ए0त रण मेछ्छाश क्र संबबं। टाक्राडद्रा00, टैरो. छक्लाक७४55, ४80३७, 956 (5७ ए०005९७ ऊ 4938) हैएडछ7, (05, 0४एव (६2४ था. एव काबबंध्य 4 उादुंए गण (पार (ण्मद्व८ पिथा0ध एएस्‍एएएएए पिएछा52, 7.एथरेफ०छ, 90 45079, शिश्वाणा3, #कछ्काशाफ म॑क्ष'क्रशाह मा सबब, री)35 शाएारबवा0ण75, थक, 974 गे, चणए०क, पर सब्यकाडह सणश5 मु (क्काए, िबाधणाओं ?प्रणैजणण़ पट, ऐलफए, 968 छगाहए, #6, एक्राह क्ार्व 8९ ड00॥क्ार: फिककाधश, एप्राएटाआज शिट55, (४०८7 ९580 4957, संदर्भ ग्रंश सूची 467 छगोल, #0., 7796 (86 छा क्द्वंण्य, 0प्णत एग्रांघ्टाएंए 7९55, 80099, 960. फ्र्राब8, 2, 2क्ुप्रॉंविशा (कण का उवबीगः >0#0- 4द्काशफ/द्राटः, उापश ॥5008 ० 706 8वगं्रंडा॥/05, 007४, 977, छगव१३5, 2.7, (5009 060दाहक्राप्ड ० [.6०व [९ए८", #ावंक्ा उेगणानं री 8८ ॥क्रकाफंकाठ्य, उएॉए-$व्का्श/95, धण, जाए १0.3, 2998 पिलाध्याक्ा, ठ&॥0, 0, (क्राह -. #6 'ग्विंट्श 7०7४4, (0०22र्म [,९३॥णाए ९७, 'चैणां॥एजा, .४ , 973. ऐल्रथो।8, #्वापाव, दा, पका का. हवा: एक्राक्यए मेबाशाए. उाव्रशव्वाता मे 4 पका वि॥7एर, ए॥रएटाञए ता (४४074 2८६६ 862९७, 965, छहथा8, #॥06, डक्रदा& श /क्षक्राद्ाा उत्दावां क्‍क्रचशत९, 0च्गए (गराए्टाओए ६5, 080, 974. डिल्थ॥, #9१6, #व्दृधवाक गए उचशक, फि्वणए एाचरणजंए शिल्७, शा, वग्रा, 2028, ॥४॥ 9, कपल उक्कपादाता 0 70०2०, छ.र, ?ए0॥०३४०७, 7०, 988 80586, पर, ८: #माॉफिएए7/787 काब॑ 008 257७, 543 70्डांपड प्र005०, 0४४८७४७, 953, (७4००4, फाएंड, (एकप्रादाया ॥ 2ग्वंधाय कादाव, भी(5 70॥९४४००5, पिलच्च एथ॥ं, 984 (एबा0३5०७कवा, $5., दावा: कक्कबॉगएका कल ब्ाब कीगक, ध्शाबीका॥। शिग50%, 2चट्थाए, 97 (030०7, शा ओुं, 4 हशुंक्रायक्षा 72९, /5504000 770।5॥॥78 ह075८, ए९ए 009, 967. (00४5, 5079, '800८३४05 गिर एक्प्मीए: 76 एक ण॑ $द८0ण९१ (2565६ थे प्राहाल ए00८४००, 2007०तार क्राद 70८० ॥026), 80039, १० 4, 7प्रा2 एगरफा5ड, $ए9, र0घ्लंटए भाएे. वराध्णए रिक्कूणा रण॒ धो 8००००११ छ00९॥07', 4 उद्काद ु॑ आहराएा शेर उम्वगदछा काब॑ 5०:दा 4॥0ए%ग०[5 70057, 0दक, 794 (५४० ॥) भाएं 7980 (ए० ॥) (०97०8, 07, १॥3९000७0९८0 [00006* $0ण0९ ड्राफअ८४', ६0700 ब्रा मगफत्य ॥६65, ४ण जा, ऐ्र७ गा 370 8, #फुधा 24 804 ७) , ॥982. (फष्णका, ९९, 'एप्चण्कुपणा' व. उटाफाक, ४0. 42, एल, $5८फष्फट 994 एकफडले, ), 526 ॥5%० फिईस व वी्वप्ण्तंर कादागा डफ्रटलाए छाद 5056 दक्हल, #ीआं3 एफ ॥00०, 8०0०१, 967. ए-छणूा5, 53, हाडव्त' णु विकेका काडघ्रंठ09%, हज (जा, 80383030, 3969. 468 स्दर्भ ग्रंथ सूची ए०श5, किाहछ्ाटए, 7॥९ न्‍क्कप्रविएा मु काबवीब का रीक्षफिादा।ा,, शिवागवशएच एमए 2655, 95] 90659, [.7, सा ड०ण 54०8 था र०004, ०९थ॥ (0०856, ९0079, 953 06६४, [ ए, ए0प्रा एयए ए ज्रताव 6 #पा्वज़ार, 30284 8;0260, ०. 5 (2), 49% ए65७, | 7, 500९ 45९८8 तु उक्वापछ था अक्षिग्रएव, 5३ 20058 प्रणा5इट, छण्ा००७, 4964 65०, 4 | कहक़दां 5००87 का खादी, (रटर ८6१.) पाठ वताका $0०2ंटाए ण #छटपॉपाओं 0000्राट5, उठ्मा/39, 4959 7659, 6 & , #९क&7/ 59786 # [दं4, (00079 एाएथाएएए 7६55, एल, 4983 स्‍9#48॥438भ0, 07५, थपढ ए0शाधर5 छ॑ $फ्शएवे ?९८४७०ा॥ 0एआआडशाकत भ0 7.06 भ्राहु ज 09, $9द0/082८% #॥00, 975 एाक्राबह४०, 00४, [र (००९ ० हछञभाना 005525 था [04 70 0९8४, + है , #९व5खा। )वणशाशा5 9 मव, ७र्पणएं ए॒ा्रधञ्ञाए 7555, ७९४४, 4983 ए0पाक्षा, ॥४॥06 0", 8०द०7९५ (40 ८० ), पणए5 'परट६७०॥, एड, 997 700४5९, ए०७था एं ७84 घष्डठा०5, 70% 28 , टश्वाटट/ 5०००/०९५, उणाए शञ०१ शत 505, ],00000, 972 एए९, 50, गवाह कब 0शशक्शशाा, शो८55 ?चकाफापह प्र0ए5८, ०७ एश७॥, 990 7'50फ23, श्र, 'हत0टम्राणा ए $0ठढें चाएय्रफढ क्वाव॑ ऐलाण्लब८ए ए फफ४, ॥97 $ए एटा (९०) $6ठ5%/ 0शशम#शक्राछ . ण हक्ाएकाए।ए कर काद्यद,, 320 ९एफाएब0075, २८छ 260, 2969 ए0प्का०्ण, [.0ण5, 090 खाशककाट, एशा०व8० ए्राएडाञंए 2९55, (॥2००६०, 4970 छि_#कता, 04४5, 7॥९ #ण/टव 5१0९४, डी0206, ८एछ १075, 953 ए5९०४8०, 5, 76 70/कत्या 55० रु डशक्ृएल, धिट6 7655, पिटए ४०५, 4963 [ए#ह्ग्राल्श, शैडशश | (१), (##फ्राद उच्च का 20: ॑दकफूशव॑धा गदो०, $2770%7 86000, एटा, 984 छह्मग्रघ7065,.. शेंधाटा, 70क्राविप्ट्पाधा। 0 प्राएभ॑/ था. 0९08८ एरलिंसि, (कक्ाफुक्क उ०टलए- काएबा 504९5. 4997 छा, २१४७, (००), एकका कक्ष, 3०085 35946 - क्राव कराए8, 0० एफरारशञआजछ, 0४72०, 4970 0980॥, फ ., 20छप्रद्दवक कब 002/7्ुआशा। 5 (कगाव, ऐिटस 0श॥ 493 ठ्ल्तभां, एाए, 7ग#व्क ख्ार, 5९ण६९ क्षैदा ध्याव (एव, [.ताञत00, क्‍969 बन्प्ल संदर्भ ग्रंथ सूची 469 छछ0, म.प्र, बणठे हा, 0.७, (कक), माछएल बट मछश: आआछाक गा 4००8; #िणाए2082 290 ॥(९७३१ रथ्रो, ॥,0500००, 948. छाए.5, 0.5., (क्काह (क्कड काट 0०ट:करुक्णा, 007णैक 8000 0690, छ0ण0००9, 796. 6०740, ऐ; #घंडघ93, *0०प्रणए४07 छल #णाहव्व ७४0 ?प7 00८४! 27 7/2 गादीद्या इतादर. जु श्र... अक्राफाउ/णधमजा,.. िंप्स.. एच, (04 0एट्ान06८४०४७०, 7982, 6ण5, !च.७, फ़ाय्राछ्षप्णा5 ब्यव॑ िधक्रा0०क्रा०06: 70४०0 49०क ॒ 7.[6 7 9 #/2/वकृ॑प्य 29, ॥4 ॥%7प6 ए $0ल्‍०ं॥] 5ल्‍९00९5, 80570), 970. छण८, 'र्घ.5., डकंट्वापंणा काव ॥24लाएवाश ॥ मर्दों, सब 000॥09॥075, उंभएण, 3982, 0004, मक्कणोव, 7॥6 संक्रबंध ८८56 3)360, (00350 ?79॥0भ075, 'पिटफ़ 0५0, 987, 606, प्ग्वण॑0, क्राट 4वक्कगिंण क. /ैवंधामंफराहु, वीक ड०ट८०, (फ्ा॥0/4 200॥८३8075, १८७ 0८07, 988, 90०७0, 8#., (९६४४९ 9 4 'श्रणंंगठ शाउ३6 0 [,६३७ (८०१), 576८5 (क्रा९ श 5070 उवरबं8, (0४०7४ क्राव कैंक/-]6 22, 200॥707080 एएंशशञए श८55, 0३:्ामंत8०, %0. (60009, छ94॥८, 3०दंद। $#दक्षीव्वाा, 0एण० (फ्रएश॥आए 2655, 9०॥॥, 4997, 6000, 7. शव ठणुए(०, $ , (88४ ॥९६ ्॑ श्र एच्तल्कुजाटवे ८०0०9 की ॥909', #८070क्‍ांट ब्य् 7गंधांव्य प्रश्थुड छेठज0३9, ४०. हअशा, १४० 3, बंभाप४ए 6, 982. 67.0७, 7२2९४77श, (४६९ २३578 9४० [607-0286 एेश]॥000 श०0०णए९ ॥#6 चीफ ् ९ ज86 कफ पिणाक-जटजलत (0635 ९ातटकत, टब्परदा _0/72900 987, 7.॥ट(00७, 956 पक, $७जश्ञ करते 93), 0प्रछमणछ व "प्र 7409, 5ग56 एए00९88075, 9%. पण्णंं3, १८०७३४७७४ कते प्र०णुं३ ऐि३६6ज॥, 'एककल्३)गां ऐआ ७ रि३शी3 फाह कदर उठक्गबां तर लि0॥2 4दतााउकघ४००, 0९7, ४णे, 32.0 ४० 3, 3998. समणात, उन , टक्कर मर उक्त, 0०चांतह९ एमांण्डाजाए ॥7658, (३णणाऐ१०, 4946. ॥0558: 4 उक्राछः रण कतल्कप ले उ2लगतठा ब्यर्ठ डम्लग 45#7#००००७१ ४०५, ] 2४50 ॥], 4974 99वें 3984. 4०० आग, फटा रिएेपलआंटतजें #वक्मंपंडा।क50व गे वी, विवैेदा रगमा्थ तु सिप॥र अबंकांगफकरधंग, उपेक- 5०४०, 7986. [5930, [309 ए., #द्य० ५ +:- (20:८०, 30 045, गेट १णा५ 965. 470 सरदर्भ ग्रंथ ूची गेंभण, 57, रिटाहाणा गाते (काट सिधजाहु 7॥॥ 3 भिणायेी फतीकय प्रणथ्णण, ईम्सगाग्शव्बा 8प्रा/धाए, 20 (2), ॥9ाा 7०%, ?(0., 'धाप्रतद्ला5, ४0एणाफ 09 िगाणाओं 06णंगाणदा?, उगद्घाव, िंवा ॥967 गा शिकढबत, उम्तदा काधह्कृव्राण स्‍िशकरो..- 4 उाके) घ. गा।शन(2#6 आशवध्भाओफ, (एलजएए एफलआ, [फएटोज0छ, 954 हां, $ 7, 020.प5 छा लिदीक्षा (प्राद्यार, ऐडाफई शिच5 ९४ 0/0०४॥४००55, छल, 955 [99०0॥9, 8&.%!., [8८ क्शाएंए छा गरीआहधणा', उ०ण॑गछद्व/ 2; 7दएछ, 827, 959 [09छ2क9, ((. ५. (356 छा एादर।0त', 505099067 8:/2ए, $८ए(८7%्टा, 962. #399707, #.04, ॥6शावहर दा क्‍क्िप का 470, 0070 एकफ्रएटाओंए 0६55, 807099, 7966 (चत्र एफा।कऋरट्त क्र 7955) ##४८, 448४, /व5॥% 0/एक्राएबकणा का 404०, ७६3 ?0775098 ॥70758, छ0०तऋ्र039, 4953 एक०039, 85, कक्काताकुद्का मद शा 7760, ऐट८ए ४०4 ऐ८लक ?फाी।८॥055, ४८७ 60॥, 994 काका, 8, ज्ञात 504९9 $0एक्‍एणट ॥ आ एाएंशा $चएए्री, खददा #0॥707०/०७5४, 6(), 976 #0ण&७043 ?णंयर, (क्कारए का €काशफ्रककठ' तदाब, रिबछव ?09ट4४0755 बभ्एण, 7997 (065979ए फ%॥%९६१ ॥ 968) #0णग्क्रा, 7९४ट८००9 300 (50॥॥, #7०9, 'गबियाँए १४८४६ श0ट/भगरणड वा03 # शकत्क्ृ६४ छि 5॥एचणवा (026, _क्क्ाए/फ/077९ (सदर, बंभफ़ण, 3५७ 990-ण06 399 ४0097, 7०० (६९), (क्राट था खवदव 80॥5, 0767 ॥,07ट्ागघ०, 027॥, 970 (॥6977/20 973) [.८8४८, 8७, (६९), 45्थ्व्क ए (86 छा 507श कवा०9, (९ करा फिंगाए- ॥६॥ ##/फ्राक्का, (2ग्रणाएह८ एएटाजफ 7655, (०४/एत26, 4950 %9८03८!, (-]978 (९९ ), (कफ (द्क_्तर कब ८0स्‍उट्बुप्रशाटए5, विकक०एटल5 #79णाहधा5, 7.089007, 983 [६0५0, व, 079 ॥76 ३शफार ण (७९ प्र फिता4/ छ टछाश8॥700 80० काका ड०लगंग्छ,, 7०४, १२० 5, 797 गा99१74, 4-.7., 5०2८3 क्श०१टणशा5ड #जाणह प्रोफेट5 क्‍0 वध था $फहो, $7९, (८१) गक्रण $#ब्र/गा का मंडला, िवाबय ॥च्राएल रण #0ए३0०2व 09, 9099, 972 शभाक, 3. ताली, 77९ एाकपरक्ककांश का (क्राशक्माएमकर माद7, पििन्रावा एपणाटभा००5, 3गएण, 998 भ्ुंधा, ४५5, कष्टशा। 0शसरंक््ग्राधाठ का गददा 2८009, ऐ०८ए बण्व सर्दर्भ ग्रव सूची १४8॥ ऐण/ ?शात्मांणाड, ८४ 027, 984. गंप्ा950, 0१, 76 अद्िड तु 6 पडा 4 उायवु) था. गफ्यां ]रक्काएट5, एआएद्राउवों 700॥9९05, स्‍.0ट॥०७, 950, ४ चाएंज, ऐ ऐप, एफ्राद गाए (छाफाफ्राएगाएा # दा गाछऐकय 7486, हैक एएशाह्रा।हु #०फ८, 0ए070३५, 958 ैगाहग्ध:॥, 20, #क्रर्रगाका बद्ाव एशशक्कलरवा,. (एल्गाड णि. एजाएए एह5८७क, 0०७, 980 #वराजा३, ,, खिव्क व ग्रक्राक्ाप्ट, गंवा एएक।एगआणड, 080, 4988 (370 992). [था00फणा, 939४0 0, 8954० का कबं8, (2 ४०), एग्रए्शभोए ० (बरा0णिए३ शि०55, छटा;0९५, 7970, ज्ाएणच्टा शिणीर, 09, 7998, ॥र॥ाणर रण #फुफ्ाप्व भैश्णएण्ण्टा 7२९४९७४०॥, 988 (60 ८०). ि्रणाण(, कैलिएंए, 3०० 5004८ 20 (फथ्ाए० ॥ 3 एए छह! 29 न, 8गा॥55 (०४), काबग५ 4008७, हब 0008 वि०७९, छ6%02% 955. िवागाण, रच, ॥॥॥696 क604" उप्रक्राठ्ठ कह 2" (कामाप्रा0, (९१), एफाश्यज्ञाए 0 ९0080 26६५, एफंत्वठ०, 955. निभा, 06000 रक्तीक्रणा किंतु फिणम 6ए॑दाएल ॥0.- कैम/शाला, एणाव्थ] एप्रणाणातहु 0०, 994, ३)९, / ९, (करार ब्ख॑ 'वाफक्रफू छा टला! ॥द9, एि०७८०९९ 870 ६९७आ ३४, ],00000, ॥960 5, ८ १शाह॥, ग्रात #एत 806, 04070 एजाध्लत्नोए 2६७, ।१.४.956 णजला०९, आए, '$०53॥ ह०एचच्ा:क कछत 505| एफ, प0. 9 (0कतव्ला।ण! एॉकफश्ष॥ट्थांता 0 मछलांत्व घिबाा९फण0, डटाए०छव्शा कयाला।, 260), ॥977. कॉफोए०, 5४, #एफआ 4.00 69, 2०0 ऐडे पफथाओं॥, रेटक इस्शलोबचा सता का सत्यव्ण, फैमिये 0७०॥०७४०७४, २९०४७ एऐटाएं, 3996. ाषयउ, 9७८३, 0८702ण्यर 0० ७ए/एद0च था 8770, )नाधगे एएएए्जएणा5, ०७ एट0, 7994 कत्ादा३, ३ हे , एल्शग्खाव्य, चिब7॥35, छेठणो३३५, 7966. जशेत]०० फि्रैयाए53, उत्रट एपकापक मूुँ व उप 5०८०७, 5०7१०, 957. भरणलत]०० हि, ठछफ्छ ण॒ु 4डललप 7009, छकता। शीत) छा, छ6कोी/७, %. १एीट]००, रिउ्कोजं, उक८ ल्दग7छ्ज खब उत्तव! एकाहर श विदव व७<ऊ, फिल्हांव्त स्आ 6 [॥८४७, ऐचफ, ॥955. णौट, भकऊ, 7225 70707: एशेल्णाउ, 955. ब72 सर्दर्भ ग्रंथ सूची छाणा३, $30005595093 #., वह 0#एए९ #27९0८४, 'िटम #ह86 जत्त/ 0७ एफ्राजाटा5, पिटए 0, 994 उछए2०, घक्षाघ, सै'ेशाएवाशा क्षाब॑ एफद्ाएबात कर शिवेव, किएशंशाएए दाद 357८5, रिबछव शिएा८ट॥व055, ॥3छए, 779 क्ञा8065॥एग, 3530, 7॥८ १59 र[ ४९ (८6 5)587, शिह्वएग, 7756 0ण०णणक्र०ऊ, 77., (50८9 )च0एटफटााड' व उा6/ ण॒ #66ब/ट) गत उम्दा ब्राए. उत्तर 4कामकरंग्ड.. 70557, (499-99),. $४एगीआए एपचं॥०३४००5, ९छ 2६09, 985 फण्का, 2जा5, 40896 [6 का शैशए् ला काबाब, उतपरदा९ शा 2 ऐटफा 77709, एऋ्दाजाए ०0 परए0छ ए८5, एा/0३03, 958 एकाठ5, 7९०] 82 77९ माणवं। उकउध्क्क्र, 359 ?000॥03॥005, 80739, 4949 एशरशैपिब्या79, ९. , 7786 (कक९ [० फए०ग्प्रताबं/०5, एक्रा८0 ४99, 3958 एशड05०, 08, (830९ १०४६७ 5 'िश्षए्ट 800 (४०५९४, 776 ऋटएाक्शाट प्राशाठ्ु, ैगथवा 9, 4982 एल्लथ, 06९णह०, १११ डिच्येटा०, 0००एने५ एमारशफ्त्णर $०्टव0 माए्ध $77०6, (५० 4 880 2), 00०7८८एक एफा।फरएट्ट 0०, 'र८छ स्‍0209, 2997, शछिक्गफ 70९, झकबं। 02 0एव्य507070, ४९ ९०कणॉं॥ 8000 0690५ 80ण9539, 7954 ए्गप्क्ाता40, रि, (/0क्राएबद0ा द्यर्य #एव्स 59608 पा वंदद्वाव, 0.पतप एक्रषातज्ञाए 655, 0609, 998 (70 [#फ़ाटडछण्च) ए8०, १४५७, $०टब्ा #0साशा5 का ग्रादा०, (४०७० ॥ 2890 ॥प), १३७०७ ?एफएट2005, २९ए 760, 978 छि055, #परॉध्ट, संकाय मक्रफ छा क्र. एएला उलाएएह, 009 एफारणाञंए छ655, तरजण्णा०, 4967 $3ेटीएवेकाब्काते3, परति९ ककरएब्श 5070, 70750 ?€55, >्घ043040, 9ग. अिलाप्याएंकरक्ा५3, &॥6 क्र 08600फाधाा, 20०९७ 7707१ ए०ा]ए॥ कण 020, 4980 $थापिक्रादा (०68 एथएुणा ण्र 'गिल्स्यए0३ त॑ एकाएएए0फए, 0०व रण वजता9, 94 इभ, #-ेच , सर #0फ्रक्कणव 0क्राशडता तु #ै९ उद्काए था वीब, (ंच्ण 7.07छणका5$ 740 , एटफा, 956 ज्ाक, 35.५, ० (मक्राइट- काव 2०ारहुए उच्यवध्वत री उा्मुद्नग, 5 ए##एछाजञाज, 89003, %4 9940, (छ#30डएडफ७, 5056 क्ैे7एटशाशाह का. माक्ंए, (465 छुतंह0 588 ए८४/70॥5, 029, 998 इप्रक्कय३, #नेरं, उलाबंत्द 4-ब०फ्,, पर॥8 ॥छाजा८ ० 50०ंग $5पछ69०८5, छ6903ए, 2990 रे संदर्भ ग्रंथ सूची 473 जभ्ा73, 9, $ण्टंब उम्रयुक्क्ांग के कबोक, 532९ शा०ाणा5, 'िंटफ 7०0 ॥997, अरडफटाए, 7९5 (लव), इत्तंश कआाछ के छशिर टीकाए उचाशा का लि, 3$0णाणा, #987०, 968. चहल, [00 भाव ९०७, 85., (८०७.) $क्रतधट बाद (क्काहुए का कावद्ा बन्द #0कार एफॉडाफंह एका्फुआए, 2४००४०, 968. इत्रह्ठी, ९.5. (९१), 70० उक्त पा कार, 0047 ]7/706 ए॑ 30४गा०८त $0009, $ज्रा3, 972. इ७ह॥ 5.5 , क्षात ६3, $छा८३॥, सदुफाग्यार सिक्ाशएतर तु सक्ादाब) का स्था खा खा, लील््ा॥ एगजाजांग प्र०७5८, 0थए, 993. छाए, ४08ण०7079, १्रैवैधाफ्ंवठत ्ु कदका मगर, 770050॥ 655, ८ 20९०॥४, 973, आए, १एुएाव३, 5०2 4/7[व््ाणा कद (:क्राहुट का खिवात, ३०णीव 80० $6४००, ८४ 020४, [97, आए, 5प्रभृंग्ण, 'टक्का6 था 70॥" ॥॥ ॥0550 एचक्क्‌णए णा 4 उफ्राटः रण कहत्काध जा 5०07० रब 5०5 #7/7०700७॥, '४९छ४ 06७, 974 ज॥४5, १॥.१.,, #280_>ंठव ठाव ई०चंहए 4ए0त९ #7९ €०गछ रण 507४ #॥4प्र, 0प्रणप प्रशश्धधया) ८5, 80च09), 952, जआए्क, ९, (2घ छ ॥त्वला कादद, मैडं3 एफाडफा३ प०॥5९, 807599, 952. $)09, रैगए, ॥9॥9 दब 0#2क्रंदाक: वका॥- 200 ॥क्ुिकराफ खा 7) 4040, (प्रप्चआंए ४ एशाणिएं३ शिलड, ],05 #जह८०5, 973. पन्‍॥रण, ९९. 4 60८० 4॥दकफा रु खाबाब॥ टमकालफ्राफ, एचफ्टाप्राए (फा०व80 धिटड5, (००8०, 955, पगशाज, रिजामोज, उद्ा॥क, )०, 33, एलफ, $65४४४८7, 7985 वुफ़्रणश्ण, एच, 4छ्काका श्श्क्कर, #०० एफा४55०5, 0८%, 956 फिलाप्राए5, फिद/एआह, सिटकारवाध! टलवन्कृछ रण उण्थणक्छ), #जाधाप्वा प०ण ९०, ४८५७ ४७, 940 १४ाप्टी८5०, ॥(.९, ह्काम्माल 2१०१ ८नऊ रु 2ख्घटता 740०, 459 ?0फआजए पि०फ९, १२८७ 0८४, ॥985. फ, 4.0प5, 776 6%व00, एकऋंपाआओडज ण॑ (7 प्न्ट० शल्5, (४2380, 938. तल, एप , 76 मल 4म्गन्ाय 3)उच्का, ॥.एटए0छ एफाफ्राजह क्षएफ८, ॥एटॉज०५, 7936 तक, १0तं५ 453 8, छह, एकफ्रुकव्य शे 02008 (0फ्राशछ, 4.090०9, 93 वैशुबवक, 50<९63! 55७९ १०9 “0000 ४७६ छा८३६ पृष्चच्छ 555व0०0, ४०!). 3, +४० 8, $59 4-5, ]987.